Review of “The story Of weeping Camel’

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दुनिया अविश्वसनीय-सी लगनेवाली किस्सों-से इस कदर लबरेज है कि अनजाने गर उसके पास आप पहुँच जाये तो साझा करने की हसरत से दिल बेचैन हो उठता है। ‘The story Of weeping Camel’ एक ऐसी ही फिल्म है। इसे देखना कई स्तरों पर समृद्ध करनेवाला अनुभव है। सबसे विलक्षण तो इसकी ‘कथा-भूमि’ है। इस कथा की जन्मभूमि दक्षिण मंगोलिया की गोबी मरुभूमि है। गोबी मरुस्थल इस कहानी की पहली जननी है, यह फिल्म एक जननी ऊंट की है, जिसे मंगोलियाई मूल की निर्देशिका बाइम्बसुरेना दावा ने अपने इतालवी सह-निर्देशक लुईगी फालोर्नी के साथ सिनेमाई पर्दे पर उतारा है।

म्यूनिख फिल्म स्कूल में अपने ग्रेजुएशन फिल्म के लिए पटकथा तलाशने के क्रम में लुईगी फालोर्नी ही मूलतः इस फिल्म के विचार तक पहुँचे थे। यद्यपि इसके बारे में उनकी सहपाठिन रहीं बाइम्बसुरेना ने उन्हें कभी बताया था कि मंगोलिया में अपने बचपन के दिनों में ऊंटों के साथ एक सांगीतिक रिवाज को अंजाम देते हुए उसने देखा था। जब फालोर्नी ने यह तय कर लिया कि इसी विषय पर वे अपनी ग्रेजुएशन फिल्म बनायेंगे तो धन की समस्या आई। बाइम्बसुनेना मंगोलिया छोड़कर जर्मनी में रहने लगीं थी तो वहीं दूसरे स्त्रोतों से इस फिल्म के लिए उन्होंने धन जुटाने का काम किया।

फिल्म दक्षिण मंगोलियाई घुमन्तू चरवाहों के एक परिवार की है। मंगोलिया, रुस और चीन के बीच फंसा-बसा एक देश है। भौगोलिक दृष्टि से मंगोलिया का यह हिस्सा समुद्र से 5180 फीट की ऊँचाई पर बसा एक पठार है, जहाँ गर्मियों में तापमान भले तीस डिग्री सेल्सियस के आस-पास रहता हो पर जाड़े में माइनस पैंतालीस डिग्री तक पहुँच जाता है। एक सौ पचास किमी/घंटा के रफ्तार से चलनेवाली धूल भरी आँधी जहाँ एक आम बात है। तापमान के ऐसे अतिवादी छोरों पर जीवन के तौर-तरीके सामान्य तो नहीं हो सकते हैं। प्रकृति का सम्मान करते हुए वहाँ के मूल निवासियों ने जो तौर-तरीके विकसित किये हैं।

फिल्म उसके प्रति सम्मान व्यक्त करती है। गोबी मरुभूमि के जिस इलाके में इस फिल्म के कथा-नायकों-नायिकाओं की रिहाइश है। वहाँ फिलहाल वसन्त है। इसलिए फिल्म में उनकी यायावरी नहीं है, वह एक जगह टिके हुए हैं। पर वे मौसम के हिसाब से अपना आवास बदलनेवाले समुदाय के लोग हैं। ऋतुओं के अतिचारों से निबटने में उनके सबसे बड़े सहायक उनकी भेड़ें और ऊँट हैं और उनके साथ सदियों से गुजारे गये साझे वक्त का अनुभव। इन दो जमा-पूंजियों के बूते वे सदियों से पृथ्वी के उन सीमांतों पर टिके हुए हैं, जहाँ जीवन सहज नहीं है। यह फिल्म का परिदृश्य है।

फिल्म एक ‘पूर्वज’ के द्वारा सुनाई जा रही लोककथा के साथ खुलती है। इस लोककथा के केन्द्र में क्षितिज की ओर ताकते ऊँटों की जन्मसुलभ अदा है। लोककथा यूं है कि ईश्वर ने जब ऊँटों को बनाया तो उन्हें सिंगों से भी नवाजा। पर एक दिन एक हिरण उसके सिंगों की सुंदरता पर मुग्ध होकर उसके पास आया और कुछेक दिन खातिर उससे मांग ले गया। हिरण उन सिंगों को लगा कर इतराता फिरने लगा और फिर उसे ऊँट को वापस करना जरुरी नहीं समझा। उस दिन से ऊँट हिरण की राह देखता क्षितिज की ओर ताकता रहता है। फिल्म के बीच में फिर वही वृद्ध अपने परपोते को एक लोककथा सुनाता नजर आता है कि ईश्वर जब जीवों को राशि चिह्नों के तौर पर स्थापित कर रहा था, तो ऊँट भी ईश्वर के पास गया कि मुझे भी कोई राशि चिह्न (जोडियक साइन) बना दीजिए। पर ईश्वर ने उसे मना करते हुए बाकी राशि चिह्नों वाले जीवों की विशेषताओं से नवाज दिया।

फिल्म का समापन भी ऊँट के रुदन से होता है। इस तरह देखें तो आदि मध्य और अंत के साथ ऊँट फिल्म के केन्द्र में है। पर इस ऊँट पर मालिकाना हक तो चरवाहा परिवार का है। फिल्म उस परिवार के जीने के तौर-तरीके को खामोशी से फिल्माती हुई आगे बढ़ती है। उन तौर-तरीकों में निहित अर्थपूर्ण संकेतों को आप समझ सकें तो यह हमारे संसार के बरक्स एक प्रतिसंसार रचती दिखती है। प्रतिसंसार जीवन मूल्यों, जीवन दर्शन के स्तर पर। दरअसल फिल्म में यह बहुत सचेत स्तर पर नहीं फिल्माया गया है, यह खुद-ब-खुद दर्ज हो गया है। ऐसा कहने की वजह यह है कि इस फिल्म के बाबत इनके निर्देशक द्वय के दृष्टिकोणों की बात करें तो दोनों की प्राथमिकतायें थोड़ी जुदा थीं। बाइम्बसुरेना जहाँ एक लुप्त होते रिवाज को दर्ज करना चाहती थी तो वहीं फालोर्नी उस रिवाज की सादगी और सुंदरता को। पर ऐसा करने के क्रम में वे चीजें भी आ गई जो इसे सादगी और सौन्दर्य को रचती हैं या जिनके कारण यह रिवाज लुप्त होने की कगार पर है। हिन्दी में अनुषा रिजवी निर्देशित ‘पिपली लाइव’ इस खूबसूरत हादसे की शिकार फिल्मों में से एक है। जिसमें वे दिखलाना तो किसानों की आत्महत्या चाह रहे थे पर वह मीडिया के आचारशास्त्र को भी संबोधित करनेवाली फिल्म बन गई।

फिल्म जब चरवाहा समुदाय के रोजमर्रे के जीवन को टुकड़ों में टांक रही होती है, तो उनकी दिनचर्या में शामिल आदतों के उत्स में काम करनेवाले सभ्यतागत अनुभव और विवेक का पता चलता है। मसलन् भेड़ों की एक बड़ी झुण्ड को चारा खिलाने का तरीका, भेड़ों की उसी बड़ी समूह में जन्में एक-से दिखनेवाले शिशु भेड़ों को दूध पिलाने का तरीका, ऊँटनियों के गर्भधारण के बाद उनके नथुनों के फूलने से उनके प्रसव के वक्त का अचूक ढंग से अनुमान लगाने का तरीका, ऊन निकालने का तरीका आदि। यह सभी गतिविध्यिाँ और क्रियायें एक दिन में अर्जित समझदारी का परिचायक नहीं है। उनके तम्बूओं में अनवरत जलनेवाले चूल्हे में संरक्षित अग्नि और बच्चे को नहाने के दौरान पानी के किफायती खर्च को देखते हुए आपको रसूल हमजादोव के ‘मेरा दागिस्तान’ में आग और पानी के बारे में लिखे गये बेशकीमती शब्दों का बारहा स्मरण हो आयेगा।

एक साथ उस समुदाय के चार पीढ़ियों की उपस्थिति, उनके मध्य का श्रम विभाजन आदि मिलकर उस समुदाय के बचे रहने की इबारत प्रस्तुत करते हैं। यह फिल्म परिवार की संयुक्तता को ही रेखांकित नहीं करती है बल्कि मूल्यों के एक समुच्चय को भी प्रस्तावित करती है। उन मूल्यों के पीढ़ीगत स्थानान्तरण को भी दिखाती है। लोरी सुनाती हुई माँ हो या लोककथा सुनाता परदादा, फिल्म बतलाती है कि लोककथायें-लोकगीत कैसे स्मृतियों में अपना घर बनाती हंै। लोक कैसे उम्र-दराज होता है, अनुभव और मूल्य कैसे पीढ़ियों में हस्तांतरित होते हैं?

फिल्म इन्हें भी दृश्यों के मार्फत चुपचाप दर्ज करती चलती है। इस तरह फिल्म एक साथ दो स्तरों पर तिरती है। एक परिदृश्य या परिवेश के स्तर पर और दूसरे उस परिवेश के एक हिस्से ऊँट के स्तर पर। ज्यादातर मौकों पर इसे अलगाकर देखा जाता रहा है। मतलब ऊँट ही केन्द्रीयता अर्जित करता रहा है। पर यह कहानी जितनी ऊँट के रुदन की है, उतनी ही उस परिवेश की भी जो उसके रुदन के मायनों को सुनता-समझता है।

यह आत्म निर्भर समुदाय के उस दुनिया की कहानी है, जो अपनी प्रकृति से, अपनी जमीन से, अपने पशुओं से जुड़ा है, जो पूंजी की आदिम या प्राचीन अवस्था के पास ही ठिठका खड़ा है। एक ऐसी दुनिया की दास्तान है जहाँ पूंजी मुद्राओं के अर्थ में अर्थहीन है। यद्यपि फिल्म में एक दो मौकों पर मुद्रा विनिमय को दिखलाया गया है, उसकी सांकेतिकता के निहितार्थों की चर्चा आगे करेंगे। फिलहाल आते हैं फिल्म की कहानी पर। कहानी फकत इतनी है कि एक ऊँटों के झुण्ड में इस साल बची आखिरी ऊँटनी के प्रसव की घड़ी आ गई है। पर शिशु ऊँट प्रसव के दौरान लगभग एक चैथाई बाहर आने के बाद प्रसव द्वार पर अटक-सा गया है। जिसे उस परिवार के एक बुजुर्ग और स्त्री की सहायता से दो दिनों के अथक प्रयत्न से निकाला जाता है। चूंकि यह उस युवा ऊँटनी का पहला प्रसव था, जो उसके लिए काफी भारी साबित हुआ है। इसका असर उस ऊँटनी पर यह होता है कि वह अपने नवजात शिशु से स्वयं को विरक्त कर लेती है।

संयोग से यह नवजात सफेद रंग का है, पूरे समूह में सबसे जुदा। उसका अलग रंग उसे एक अलग सौंदर्य प्रदान करता है। पर समस्या यह है कि उसकी माँ ने उसको तज दिया है और माँ के दूध के बगैर उसका बचना मुश्किल है। फिल्म का एक बड़ा हिस्सा माँ के अस्वीकार और शिशु ऊँट की याचना के तौर-तरीकों को फिल्माती है। शिशु ऊँट का भूख से हिकरना (भूख लगने से गाय जो आवाज निकालती है फणीश्वरनाथ रेणु ने उसके लिए हिकरना शब्द का प्रयोग किया था।) और अपनी माँ के पीछे-पीछे घूमना, उसके थनों तक बार-बार अपने थूथन को ले जाने की कोशिश करना और बार-बार माँ के द्वारा अपने पैरों से बरजना, कभी भाग खड़े होना, कभी लावारिस-सा छोड़ कर चल देने की भंगिमायें इस तटस्थता से फिल्मायी गयी हैं कि बतौर दर्शक मन उस शिशु ऊँट के साथ जुड़ा जाता है।

किसी भूख से बिलखते बच्चे सा उसका हिकरना मन को नम करता है। इस उत्सुकता को जगाने के बाद फिल्म आगे बढ़ती है कि आखिर होना क्या है? लामाओं के द्वारा पूजा-पाठ का एक कर्मकांड आयोजित किया जाता है, जो बेनतीजा साबित होता है। अशक्त नवजात की निरीहता दया उपजाती है। तब परिवार के बुजुर्गों के द्वारा सांगीतिक रिवाज के आयोजन की बात की जाती है। इसके लिए एक संगीतकार (वायलिन वादक) की आवश्यकता है, जो वहाँ से काफी दूर ऐमक सेंटर नाम की जगह में बच्चों को संगीत की शिक्षा देता है। उसे बुलाने के लिए घर के दो बच्चों ड्यूड और उग्ना को भेजा जाता है। इस तरह वे वहाँ से कुछ दूरी पर उग आये शहरों में दाखिल होते हैं। जहाँ टीवी है, कम्प्यूटर है, बिजली है, माॅल है। आधुनिकता और शहरीकरण का पूरा ताम-झाम है। फिल्म के प्रवाह में यह एक अवरोध-सा लगता है। एक पल के लिए फिल्म की ‘फ्लूइडिटी’ और ‘आर्गेनिक स्टोरी टेलिंग’ की पद्धति खंडित होती-सी दिखती है। पर क्षेपक-सा आ जुड़ा यह पूरा प्रसंग फिल्म के समापन में एक अर्थ को अर्जित कर लेता है। जो अनायास इस फिल्म के संकुचित तम्बू को एक सभ्यता विमर्श में तब्दील कर देता है।

ड्यूड और उग्ना जब संगीतकार को निमंत्रित करने के लिए शहर के रास्ते होते हैं, उस दौरान वे अपने परिचित के यहाँ रेतीली आँधी से बचने के लिए आश्रय लेते हैं। इस दौरान उनके घर में टीवी पर आ रहे कार्टून को उग्ना बहुत तन्मयता से देखता है। उग्ना के लिए एनिमेशन देखना एक अभिभूत करनेवाला अनुभव है। उग्ना के उम्र को देखते हुए यह बेहद स्वाभाविक है। वहाँ से छूटते ही आगे का सफर तय करता हुआ अपने बड़े भाई ड्यूड से कहता है कि हम अपने घर में टीवी नहीं लगा सकते हैं क्या? बड़ा भाई कहता है इसके लिए हमें अपनी बीस-तीस भेड़ें देनीं होंगी। उग्ना कहता है कि हमारे पास तो काफी भेड़ें हैं।

ड्यूड कहता है पर टीवी को चलाने के लिए बिजली चाहिए। उसे अपने घर तक ले जाने में हमारा सब कुछ बिक जायेगा। शहर पहुँचने पर वे उस संगीतकार को घर आने का न्यौता देते हैं। और अपने दादा के रेडियो के लिए आधा दर्जन बैटरियाँ खरीदते हैं। उस माॅल में उग्ना की बालसुलभ हरकतों को कैमरे ने बहुत अच्छे से दर्ज किया है। टाईल्स की चिकनी सतह पर फिसलते हुए चलना या तराजू के संतुलन को अपनी अंगुलियों से छेड़ देना आदि। पहली निगाह में पूरे फिल्म की संरचना में यह प्रसंग एक चिप्पी-सा लगता है।

संगीतकार न्यौते के एक-दो दिन बाद पहुँचता है। और उस चिर प्रतीक्षित रिवाज की तैयारी की जाती है। माँ और उसके शिशु को लाया जाता है। फिर आरंभ होता है, वायलिन वादन। वायलिन वादन के साथ एक अर्थहीन-सी लगनेवाली ध्वनियों का एक रुदन-सरीखा प्रलम्बित आलाप है। ‘हू-अ-स’ इन तीन वर्णों की निरर्थक-सी लगनेवाली बारम्बरता से लय जैसा कुछ फूटता है। बात गर इस लय की करें तो यह बिलकुल भी प्रभावशाली नहीं है। पर उस लय के प्रति ऊँट जिस कदर ‘रेस्पांड’ करते हैं। वह हतप्रभ करनेवाला दृश्य है। अपने परिवार के साथ बैठा उग्ना उस संगीत को सुनकर जिस कदर ‘भकुआये’ ढंग से उस पूरे प्रकरण को देख रहा है, वह देखने लायक है। पर वायलिन और निरर्थक-सी जान पड़नेवाली लय की जुगलबंदी का असर उस ऊँटनी पर होता है, जिसने अपने नवजात को त्याग दिया था। ऊँटनी की आँखों से निकलनेवाले आँसुओं की खातिर इस फिल्म को देखा जा सकता है। ऊँटनी के रुदन के साथ ही प्रयोजन की पूर्ति हो जाती है। मानो आँसू एक साथ ऊँटनी के प्रायश्चित और ममत्व दोनों के पर्याय हो गये हों। ‘कथार्सिस’ या विरेचन का इतना सर्जनात्मक प्रयोग मैंने अपने अब तक के जीवन में नहीं देखा है। मानो संगीत के मार्फत् ऊँटनी अपनी पीड़ा और दुखों का विरेचन करती हो। इस विलाप के साथ ही वह अपने शिशु को स्वीकार कर लेती है। और नवजात अपनी माँ के थन में थूथन लगा कर जी भर दूध पीता नजर आता है।

कायदन तो फिल्म यहाँ खत्म हो जानी थी। और ज्यादातर लोगों के लिए खत्म हो भी जाती है। पर इसके बाद भी फिल्म के आखिर में, एक पल दो पल का दृश्य है। जिसमें ड्यूड अपने तम्बू की छत पर ऐंटिनावाली छतरी लगा रहा है और उग्ना टीवी के पास खड़ा चैनल पकड़ाने के लिए यथासंभव संकेत दे रहा है। टीवी के पास ही बैटरी रखी है। और छत पर ‘सोलर सिस्टम’। समाप्तप्राय हो चुके फिल्म के आखिर में आया यह पल भर का दृश्य इस फिल्म को मेरे जानते एक सभ्यता विमर्श में तब्दील कर देता है। और अनायास ऊँट से इतर फिल्म की दूसरी बातें आपस में मिल कर फिल्म के एक नये अर्थ को रचने में जुट जाती हैं।
वह नया अर्थ है। चुनाव का।

हम कौन-सी दुनिया अपने लिए चाहते हैं। आत्मनिर्भर घुमन्तू समुदायों की समानतामूलक दुनिया या भौतिक सुविधाओं से युक्त असमानतामूलक दुनिया। प्रकृति के साथ साहचर्यवाली दुनिया या प्रकृति पर विजय हासिल करनेवाली दुनिया। वस्तु विनिमय वाली दुनिया या मुद्रा विनिमय वाली दुनिया। आदिमता की छांव को अपने में समेटनेवाली दुनिया या आधुनिकता की धूप में नहानेवाली दुनिया।

फिल्म में यह दोनों दुनिया कुछ किलोमीटर या कुछ घंटों के फासले पर मौजूद हैं। दोनों दुनिया के अपने-अपने मूल्यों के समुच्चय हैं। किसी दुनिया का चुनाव उसके साथ के मूल्यों के समुच्चय का भी चुनाव है। फिल्म में एक अर्थपूर्ण संवाद है। दादा और पोते के बीच का। फिल्म में चार पीढ़ियाँ एक साथ हैं। दो पीढ़ी लगभग अपनी जिंदगी जी चुके हैं।

तीसरी पीढ़ी उन पिछली दो पीढ़ियों के नक्शे कदम पर चल रही हैं पर उनकी संतति, जो कि चैथी पीढ़ी है, में एक विचलन दिख रहा है। उग्ना टीवी के प्रति आग्रही हो चुका है। अपने पिता से टीवी लगाने की मनुहार कर रहा है। दादा ‘टीवी’ के बारे में अपने पोते को कह रहा है कि उस ‘डेविल’ का क्या करोगे? अपना पूरा दिन ‘काँच की छवियों’ के पीछे खराब करोगे। ऐसा नहीं है कि उनके घर में आधुनिकता का पर्याय समझे जानेवाले ऐसे वैज्ञानिक उपकरणों का अभाव है। उनके पास दूरबीन है, रेडियो है। पर टीवी को लेकर उनके अपने तर्क हैं।

हर उत्पाद अपने साथ अपने संस्कार लेकर आता है। उस संस्कार के प्रति आलोचनात्मक हुए बगैर उसका स्वीकार या अस्वीकार संभव नहीं है। इस हिस्से में आकर अपने देश के संदर्भ में अनायास महात्मा गाँधी और उनकी स्वराज की अवधारणा का आपको खयाल आये तो यह कतई बेमानी नहीं होगा। फिल्म के समापन में तम्बू में टीवी का प्रवेश लगभग तीन पीढ़ियों और उनके पूर्वजों की परम्परा के समापन को ‘सिम्बलाईज’ करता है।

इस फिल्म के नेपथ्य में और भी कई रोचक बातें हैं। एक तो इसकी कोई लिखित और सुचिंतित पठकथा नहीं थी। दोनों निर्देशकों की हार्दिक इच्छा बस ऊँट के रुदन की खत्म होती प्रथा को उसकी खूबसूरती और सादगी में कैप्चर करना था। दक्षिण मंगोलिया के जिस हिस्से में फिल्म को शूट किया गया है, वहाँ ऊँट मार्च के महीने में प्रजनन करते हैं। उसे फिल्माने के लिए जब यह जा रहे थे तो रास्ते में मिलनेवाली आँधियों की वजह से इनका दल समय से पहुँच नहीं सका। और जब ये पहँुचे तो उस ‘सीजन’ की बीस गर्भिणी ऊँटों में से उन्नीस अपने बच्चों जन चुकी थीं। बस एक ही बची थी।

और संयोग से उसके साथ वह सब कुछ हो गया। जो यह चाहते थे। यहाँ तक कि वह बच्चा भी भूरे के बजाय सफेद निकला जिससे इन्हें उसे समूह में अलग से फिल्माने वाली चुनौती से निजात मिल गई।

एक अर्थपूर्ण फिल्म जिसे जरुर देखा जाना चाहिए।

*Rahul Singh Presented By Syedstauheed

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One thought on “Review of “The story Of weeping Camel’

  • January 21, 2015 at 11:48 am
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    ख़बर मिल रही है की क़स्बा जो की रवीश कुमार जी की वेबसाईट है को किसी ने हैक करके सारे लेख मिटा दिए हैं. फिलहाल http://www.naisadak.org का लिंक खुल नहीं रहा है. इस बाबत उन्होंने जानकारी साझा की है फेसबुक के क़स्बा पेज पर .
    एक बेहद घटिया हरकत है. वेबसाईट या लेख मिटा देने से विचार नहीं मिटाए जाते.

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