29/9 के बाद पाकिस्तान

जब तक भारत के रूप में पाकिस्तान के सामने एक ‘दुश्मन’ है, एक ‘टारगेट’ है और कश्मीर के रूप में जब तक उसके पास एक ‘भारत-विरोधी एजेंडा’ है, तभी तक वहाँ की सत्ता पर सेना अपना दबदबा बनाये रख सकती है. भारत-विरोध वहाँ सेना के लिए अस्तित्व का सवाल है, इसीलिए कश्मीर को वह अपने ‘गले की नस’ कहते हैं, जो कट जाये तो शरीर जीवित नहीं रह सकता.तो जब कश्मीर और भारत-विरोध उनके लिए ‘जान का सवाल’ है तो यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह इसे छोड़ देंगे?

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तो भारत-पाकिस्तान के कूटनीतिक मैच में नरेन्द्र मोदी ने पहला गोल कर दिया! और सिर्फ़ एक रात में खेल के सारे नियम बदल दिये. वह मैच जो बरसों से अनवरत एक ही ऊबाऊ, थकाऊ, पकाऊ तरीक़े से जारी था, सहसा उत्तेजक हो गया. लोगों को अचानक लगने लगा कि अरे, इस मैच में भी जीत-हार का खेल हो सकता है! वरना तो लोग मान बैठे थे कि न मैच कभी ख़त्म होगा और न कोई फ़ैसला कभी निकलेगा. क्योंकि अब तक इस मैच का बस एक ही नियम था. गेंद यहाँ मारो, वहाँ मारो, इधर उछालो, उधर फेंको, इधर धावे करो, उधर धावे करो, लेकिन नियम यह था कि गेंद गोल तो क्या, ‘डी’ तक में नहीं पहुँचनी चाहिए.

Pakistan after India Surgical Strikes
पाकिस्तान क्या ‘शरीफ़’ बन जायेगा?
लेकिन अब पहला गोल तो हो गया है. गोल न करनेवाला नियम रद्द हो चुका है. तो अब आगे क्या होगा? मैच बिलकुल नये मोड़ पर है. इसलिए अनुमान लगाना इतना आसान नहीं है. पाकिस्तान क्या करेगा, या क्या कर सकता है, कुछ कर भी सकता है या नहीं, या फिर वह चुपचाप बैठ जायेगा, अब तक की अपनी सारी कुटिलताएँ छोड़ कर ‘शरीफ़’ बन जायेगा? यही सवाल आज सबसे महत्त्वपूर्ण है.

एक बहुत बड़ा जोखिमभरा जुआ
इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करना और फिर उसे इस तरह आधिकारिक रूप से प्रचारित करना एक बहुत बड़ा जोखिमभरा जुआ है, जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खेला है. छोटी-बड़ी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ तो पहले भी हुई है, ‘बदले’ पहले भी लिये गये हैं, लेकिन हर बार बिलकुल गुपचुप और परदे में ढक-तोप कर. ऐसे सारे मामले बस सेनाओं और सरकारों के बीच रह गये और दफ़न हो गये. कूटनीति ऊपर-ऊपर बदस्तूर चलती रही, ले बयान और दे बयान! इस बार बदलाव यही है कि एक तो बड़ी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की गयी, एक साथ कई जगहों पर की गयी, और फिर बाक़ायदा पाकिस्तान को और पूरी दुनिया को बताया गया कि जो हमने करना था, कर दिया, अब जो जिसे करना हो, कर ले!

वह खिल्ली उड़ाते ही रह गये!
उरी हमले के बाद जब ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के सुझाव दिये जा रहे थे, तो बहुत-से लोग इससे सहमत नहीं थे. मैं भी सहमत नहीं था. इसलिए कि ऐसी कार्रवाई से युद्ध भड़क सकने की आशंकाएँ थीं. लेकिन तीर तो अब चल गया, तो चल गया. इसलिए अब असहमतियाँ भी अतीत हो चुकी हैं. नयी स्थितियाँ जो भी हों, उनके लिए देश एकजुट है. तो क्या युद्ध जैसी कोई नौबत आ सकती है? फ़िलहाल तो सतह पर ऐसा नहीं दिख रहा है, लेकिन पाकिस्तान जैसा खल राष्ट्र है, उसे देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता कि वह कब क्या कर बैठेगा. वैसे अभी तक तो उसने स्वीकार ही नहीं किया है कि कोई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ नियंत्रण रेखा के उस पार हुई है.

स्वीकार करे भी तो कैसे? उसे दूर-दूर तक गुमान भी नहीं था कि नरेन्द्र मोदी ऐसा कोई क़दम उठा सकते हैं. इसलिए उसकी सेनाएँ चैन से चादर ताने सो रही थीं. ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कब हो गयी, उसे भनक भी नहीं लगी. तो अब पाकिस्तान की दिक़्कत यही है कि मामला न उससे उगलते बन रहा है, न निगलते. स्वीकार कर लेता, तो उसे तुरन्त जवाबी कार्रवाई करनी पड़ती, जो वह अभी करने की हालत में शायद नहीं है. यह अलग बात है कि म्याँमार में हुई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद वहाँ से खिल्ली उड़ाते हुए कहा गया था कि हिम्मत है तो पाकिस्तान में ऐसा करके दिखायें!

‘सर्जिकल स्ट्राइक’ हुई या नहीं?
लेकिन चूँकि पाकिस्तान ने स्वीकार ही नहीं किया है कि ऐसी कोई घटना हुई है, तो जवाब न देने का उसे बहाना मिल जाता है. इसीलिए वह यह कह रहा है कि भारत ने अचानक सीमा पर गोलीबारी की है. हालाँकि यह अलग बात है कि शुक्रवार को प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने तब ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की बात क़रीब-क़रीब क़बूल कर ली, जब अपनी विशेष कैबिनेट बैठक के बाद उन्होंने भारत को चेतावनी दी कि पाकिस्तान भी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने की क्षमता रखता है.

ठीक है. पाकिस्तान ऐसी क्षमता रखता होगा, लेकिन वह ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करेगा कहाँ? भारत ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ वहाँ की सेना पर तो की नहीं, बल्कि उन ‘लाँच पैडों’ पर की, जहाँ से आतंकवादियों को घुसपैठ कराने की तैयारी हो रही थी. न भारत आतंकवादियों की खेप तैयार करता है, न उनके शिविर चलाता है, तो नवाज़ जी आप कहाँ पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने की बात कर रहे हैं?

क्या पाकिस्तान चुप बैठ जायेगा?
पाकिस्तान की मुश्किल यही है कि भारत पर जवाबी कार्रवाई के लिए उसके पास फ़िलहाल कोई ‘ट्रिगर’ नहीं है. उसके बिना वह अगर कोई जवाबी कार्रवाई करता है, तो दुनिया की नज़रों में वह युद्ध को उकसाने या शुरू करनेवाली कार्रवाई मानी जायेगी. इसलिए कम से कम यह तय है कि इस बार वह इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बदले में तुरन्त तो कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं है. लेकिन पाकिस्तान चुप बैठ जायेगा, ऐसा सोचना शायद कुछ ज़्यादा ही आशावादिता होगी.

भारत-पाक दोनों के लिए नयी स्थिति
तो पाकिस्तान क्या करेगा? इसी सवाल से बात शुरू हुई थी. यह सही है कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर भारत ने पाकिस्तान को अब साफ़ सन्देश दिया है कि आतंकवादियों के ज़रिये वह जो छाया युद्ध चला रहा है, वह अब भारत को क़तई बर्दाश्त नहीं है और अब अगर भारत पर कोई आतंकवादी हमला हुआ, तो अब ऐसे हर हमले का करारा जवाब दिया जायेगा, इसे पाकिस्तान पूरी गम्भीरता से समझ ले. पाकिस्तान के लिए यह नयी स्थिति है और भारत के लिए भी.

पाकिस्तानी रणनीति का पुराना खाँचा
अब तक पाकिस्तान की रणनीति का एक बना-बनाया खाँचा था. भारत में आतंकवादी भेजो और छोटे-बड़े हमले कराते रहो. इन आतंकवादियों को कश्मीर की तथाकथित आज़ादी के लड़ाके बताते रहो और इस प्रकार कश्मीर के मामले का अन्तरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश किसी न किसी तरह करते रहो. पाकिस्तान जानता था कि भारत सिर्फ़ बोलता रहेगा, कुछ करेगा नहीं, दुनिया के दूसरे देश भी आतंकवादी वारदातों की निन्दा कर चुप बैठ जायेंगे और कश्मीर का मामला इस तरह उलझाये रखा जा सकेगा, जब तक कि उसका ऐसा समाधान सम्भव न हो, जैसा पाकिस्तान चाहता है.

अब क्या होगी पाक की नयी ‘टेम्पलेट?’
लेकिन अब इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद पाकिस्तान को मालूम हो गया है कि उसका यह पुराना खांचा अब नहीं चलेगा क्योंकि अगले किसी आतंकवादी हमले के बाद भारत जाने कहाँ तक और कैसी कार्रवाई करने का जोखिम ले सकता है! और पाकिस्तान यह भी जानता है कि भारत के साथ सीधे युद्ध करना उसके लिए हमेशा महँगा सौदा साबित हुआ है, इसीलिए उसने ‘छाया युद्ध’ का सहारा लिया. तो अब वह इस ‘छाया युद्ध’ का कोई नया खाँचा, कोई नयी ‘टेम्पलेट’ तो ढूँढेगा ही. वह खाँचा क्या होगा, अभी तो अन्दाज़ा लगाना कठिन है.

अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान
हालाँकि अन्तरराष्ट्रीय मंच पर और मुसलिम देशों के बीच भी पाकिस्तान को अलग-थलग कर पाने में भारत को काफ़ी सफलता मिली है. पाकिस्तान को सार्क सम्मेलन स्थगित करने पर मजबूर होना पड़ा, क्योंकि भारत समेत पाँच देशों ने इसमें हिस्सा लेने से मना कर दिया. बाक़ी चार देश हैं, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान, भूटान और श्रीलंका. यह भारत की बड़ी सफलता है. ख़बरें हैं कि पाकिस्तान के साथ होनेवाले कारोबार को भी भारत बन्द करने की सोच रहा है. हालाँकि भारत-पाकिस्तान कारोबार में अस्सी फ़ीसदी हिस्सा भारत का ही है, और सिर्फ़ बीस फ़ीसदी कारोबार पाकिस्तान के पास है. लेकिन इस पाकिस्तानी कारोबार का बड़ा हिस्सा कई पाकिस्तानी जनरलों की कम्पनियों के पास है. इसलिए यह कारोबार बन्द करने से पाकिस्तानी सेना की गटई कुछ तो दबेगी. कुल मिला कर नरेन्द्र मोदी अलग-अलग मोर्चों पर पाकिस्तान को घेरने और उसके विकल्प सीमित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. लेकिन क्या पाकिस्तान पर इसका तुरन्त कोई असर दिखायी देगा? शायद नहीं. क्यों?

पाक सेना के अस्तित्व का सवाल
इसका एक बड़ा कारण है और वह यह कि जब तक भारत के रूप में पाकिस्तान के सामने एक ‘दुश्मन’ है, एक ‘टारगेट’ है और कश्मीर के रूप में जब तक उसके पास एक ‘भारत-विरोधी एजेंडा’ है, तभी तक वहाँ की सत्ता पर सेना अपना दबदबा बनाये रख सकती है. भारत-विरोध वहाँ सेना के लिए अस्तित्व का सवाल है, इसीलिए कश्मीर को वह अपने ‘गले की नस’ कहते हैं, जो कट जाये तो शरीर जीवित नहीं रह सकता.

तो जब कश्मीर और भारत-विरोध उनके लिए ‘जान का सवाल’ है तो यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह इसे छोड़ देंगे? यह तो हुई एक बात. दूसरी बात है जनता का दबाव, जो जैसा यहाँ है और रहता है, वैसा ही वहाँ भी है. भारत में अभी दो दिन पहले तक नरेन्द्र मोदी को उनके ही कट्टर भक्त पानी पी-पी कर कोस रहे थे, तो ज़ाहिर है कि पाकिस्तानी सेना पर भी जनता का वैसा ही दबाव होगा कि वह इस ‘अपमान’ का बदला ले. यह कड़वी सच्चाई है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में इस कूटनीतिक मसले के तार हमेशा से जनभावनाओं से बनाये और बुने जाते रहे हैं!

सनक पर अंकुश मुमकिन है क्या?
इसलिए इस पर कड़ी निगाह रखनी होगी कि 29/9 के बाद पाकिस्तान अब क्या करता है? उसकी नयी रणनीति क्या होती है? क्या वह ऐसा कुछ करने का जोखिम उठायेगा कि युद्ध जैसी स्थितियाँ बन जायें? हालाँकि इससे वह बड़े घाटे में रहेगा, लेकिन पाकिस्तान, वहाँ की सेना, आइएसआइ और वहाँ के जिहादी तत्वों की सनक पर विवेक का अँकुश लगा रहेगा, यह भरोसे से कौन कह सकता है?
http://raagdesh.com by Qamar Waheed naqvi

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16 thoughts on “29/9 के बाद पाकिस्तान

  • October 1, 2016 at 2:00 pm
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    सच तो ये हे की पहले भी ऐसी कार्यवाहियां हो चुकी हे पहले भी खुद पाकिस्तानी मिडिया में मेने सुना हे की भारतीय कमांडो पाकिस्तानी कश्मीर में घुस गए और कार्यवाहियां की . बर्मा भूटान आदि में भी कार्यवाहियां हुई हे मगर इस ढिंढोरची सरकार का अकेला मकसद अपने कुड दिमाग समर्थको में हवा भरना था जो इस सरकार के एक भी वादा ना पूरा करने से खफा हे खेर जो हो रहा हे उससे आतंकवाद पर तो खेर कोई फर्क नहीं पड़ना हे लेकिन असल ”सर्जिकल स्ट्राइक ” हुई हे सीमा के आर पर उदारवादी लेफिटिस्ट आदि ताकतों पर . वो क्या बोले —- ? इस्लामिक कट्टरपंथ हमेशा ही सारी दुनिया में उदारवादी समाजवादी लेफिटिस्ट ताकतों को कमजोर करता आया हे यही हुआ हे बड़ी आस थी की यु पि और पंजाब में इस ज़हरीली मोदी सरकार को तगड़ी हार दी जायेगी मगर फिलहाल तो आसार बिलकुल अच्छे नहीं लग रहे हे

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  • October 1, 2016 at 4:40 pm
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    विवेक कुमार – कश्मीर में पिछले डेढ़ महीने में 100 से ज्यादा लोग हिंसा में मारे जा चुके हैं. दुनिया ने कहीं चूं तक नहीं की. ना यूएन में कोई प्रस्ताव पास हुआ, ना यूरोपीय संघ ने गुस्सा जाहिर किया और ना अमेरिका ने अफसोस जताया. इसकी वजह है दुनिया में भारत की साख. दुनिया मानकर चल रही है कि भारत एक शांतिप्रिय मुल्क है और अगर लोग मर रहे हैं तो मजबूरन हो रहा होगा क्योंकि भारत तो एक पीड़ित है. और पाकिस्तान को यही बर्दाश्त नहीं है. पाकिस्तान चाहता है कि लोग कश्मीर पर बात करें. भारत को पीड़ित नहीं आक्रांता मानें, एक ऐसा आक्रांता जो हमले करता है और जान लेता है.
    सर्जिकल स्ट्राइक के पीछे भारत के क्या मकसद रहे होंगे? अपने युद्धोन्मादी समर्थकों को शांत करने के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन हमलों से क्या हासिल करना चाहते होंगे?पहला तो आतंकवाद को करारा जवाब. यह दिखाना कि भारत आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा और मुंहतोड़ जवाब देगा. मुंहतोड़ जवाब देने का मकसद तो आतंकवाद को खत्म करना ही होगा ना. तो इस सर्जिकल स्ट्राइक से क्या आतंकवाद खत्म हो जाएगा? हमले करके इस्राएल और अमेरिका ने आतंकवाद खत्म कर लिया क्या? विवेक कुमार्

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  • October 1, 2016 at 4:41 pm
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    विवेक कुमार्
    REPLYखुद पाकिस्तान ने ही खत्म कर लिया क्या? पाकिस्तान की सेना दो साल से फाटा में आतंकवादियों के खिलाफ जर्ब ए अज्ब चला रही है. क्या आतंकवाद खत्म हो गया?दूसरा पाकिस्तान में आतंकवाद की रीढ़ तोड़ना. पाकिस्तान के भीतर बने कैंपों को बर्बाद करना. क्या कोई भी समझदार इंसान मान सकता है कि इस तरह सर्जिकल स्ट्राइक करके या हमले करके आप उस तंत्र को खत्म कर सकते हैं जो पाकिस्तान के भीतर आतंकवाद का समर्थक है? दुनिया के किसी भी युद्ध ने ऐसा नतीजा नहीं दिया है. तीसरा, कश्मीर को छोड़कर आतंकवाद पर केंद्रित बात. क्या हमले करने से कश्मीर केंद्र से हट जाएगा?दरअसल, इस तरह की कार्रवाइयों से भारत का एक भी असली मकसद हल नहीं हो रहा है बल्कि भारत की अपनी वह जमीन जरूर खिसक जाएगी जो उसने धैर्य का परिचय देते हुए तैयार की है. अब दुनिया इस बारे में बात कर रही है. जिस दुनिया ने उड़ी हमले पर एक लफ्ज नहीं बोला था, वह भारत की सर्जिकल स्ट्राइक की खबर सुनने के बाद परेशान है और भारत सरकार को लगातार आईएसडी कॉल्स आ रही हैं. यही तो पाकिस्तान चाहता था. यानी भारत पाकिस्तान के बिछाए जाल में फंस रहा है. क्या यह जीत है?विवेक कुमार्
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    ब्लॉग: विवेक कुमार

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  • October 1, 2016 at 7:01 pm
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    सब से हंसी इस बात पर आती है के जितना भारत सर्कार युद्ध के लिए अग्रसित नहीं है उससे ज्यादा यहाँ की मीडिया उतावल है क्योके उन्हें इसे बेचना है आप कोई भी चैनल देइ खिये २४ में २० घंटे युद्ध का ही जिक्र होता है ! अच्छे अच्छे समस्या छूट गए है इसके पीछे !

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  • October 1, 2016 at 7:58 pm
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    रमेश जी आपसे और अफ़ज़ल भाई और सभी समझदार लोगो से अपील हे की मेने तो कड़ी मेहनत से आत्मसंयम हासिल कर लिया हे आप भी ऐसा ही करे अब में न्यूज़चैनलो के झांसे में नहीं आता सिवाय रविश और थोड़ा बहुत एन डी टीवी के अलावा किसी न्यूज़ चेनेल को एक सेकण्ड भी देखने की जरुरत नहीं हे सरासर सब वक्त की बर्बादी हे तनाव उत्तेजना आशंका में लोग अधिक न्यूज़ देखेते हे टीवी से चिपक जाते हे ये बिलकुल सही फेक्ट हे इसलिए ये चेनेल ( सीमा के आर पार ) जानबूझ कर नीचता पर उतर आये हे इन्हें पता हे जितनी गंद फैलेगी उतना ही अधिक इनका फायदा हे इस जाल में बिलकुल ना फंसे इसलिए इनका बहिष्कार करे

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  • October 2, 2016 at 9:00 am
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    Shamshad Elahee Shams१९९१ के बाद से जारी हुई नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का एक परिणाम यह हुआ कि भारतीय फ़ौज में अधिकारियों के पद लगातार खाली हुए, उनकी कमी निरंतर बनी रही जबकि दूसरी तरफ रंगरूटों की भर्ती के वक्त आमतौर पर कोहराम मच जाता है. जाहिर है मध्यवर्ग भारतीय फ़ौज में अधिकारी पदों को भरने वाला तबका था जिसे कथित देश सेवा के कर्म में रूचि नहीं रही, वह एम बी ए, आई टी या इंजीनियरिंग अथवा प्रशासनिक सेवाओं की तरफ बढ़ गया या विदेश चला गया. दिलचस्प बात यह है कि यही तबका भारतीय फ़ौज को देशभक्ति के लेबल में लपेट कर मीडिया-सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा लफ्फाजी फेंकता है.बेरोजगारी के चलते समाज के वंचित तबके के पास फ़ौज में जाने के सिवा और चारा क्या है? यह रोजगार का माध्यम अधिक है जिसका देशसेवा से कदाचित कुछ लेना देना नहीं है. इस काम की वर्क प्रोफाइल में ही लड़ना/मरना लिखा है, जिसे आवेदक सहर्ष स्वीकार करता है. भारतीय राज्य अपने वर्ग हितो के चलते इन नौजवानों की बलि गाहे बगाहे देता रहा है, जिसे शहीद, राष्ट्रभक्त इत्यादि संज्ञाए देकर सचेतन रूप से महिमामंडित करना एक सरकारी उपक्रम है.सरकार अपने वर्गीय हितो की पूर्ती के लिए वंचितों के जुझारू तबके को इस्तेमाल करती है, लेकिन नौकरी करने वाला जब भी अपनी नैसर्गिक वर्ग चेतना से लैस होता है तभी समस्या खडी हो जाती है. जाहिर है फ़ौज की ट्रेनिंग में ऐसे अवयव मौजूद हैं जिसमे वंचित तबके की नैसर्गिक वर्ग चेतना को नष्ट किया जा सके.अंबानी, अडानी, टाटा के टुकडो पर पलने वाली हकुमत का वर्गीय हित निश्चय ही वंचित तबके के फौजियों के वर्ग हितों के अनुरूप नहीं हो सकता. युद्धोन्माद आज जब चरम सीमा पर है, चर्चा की जानी चाहिए कि भारतीय राज्य का स्वरूप, चरित्र सेवक का है या शोषक का? अगर वह एक रिप्रेसिव रिजीम है तब उसकी सेना का चरित्र जैसा है वह उसका स्वाभाविक और सचेतन रूप ही है.राष्ट्रवाद ऐसा अंधतत्व है जो कथित राष्ट्र की वेदी पर मनुष्य को डायलेसिस पर रख देता है.Shamshad Elahee शम्स कनाडा

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  • October 4, 2016 at 9:09 pm
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    ओम थानवी क्यों चुप रहे मनमोहन, क्यों बोलें मोदी? (एक प्रशासक की डायरी का पन्ना: पढ़ने को मिला था, नाम न देने की शर्त पर यहाँ साझा करता हूँ!) 1. जब देश जान चुका है कि भारत पाकिस्तान से डरता नहीं है। सर्जिकल स्ट्राइक से अभी मुँहतोड़ जवाब दिया गया है और पहले भी। जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तब भी अकधिक बार ऐसे ही धावा बोला गया था। लेकिन सवाल मन में यह आता है कि तब मनमोहन सिंह आख़िर चुप क्यों रहे? 2. उस वक़्त भी जब-जब ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक हुई, तत्कालीन विपक्ष यानी भाजपा से सरकार ने जानकारी साझा की थी। इस जानकारी के बावजूद भाजपा नेता मनमोहन सिंह पर लगातार वार करते रहे, उन्हें कायर तक कहा। 3. सवाल फिर वही है – कि पाकिस्तान को सबक़ सिखाने के बावजूद मनमोहन सिंह चुपचाप भाजपा के हाथों अपमान क्यों सहते रहे?. क्या यह सिर्फ़ संचार कौशल न होने का मामला था या जनता से संवाद स्थापित करने की नाकामी थी? या फिर सोच-विचार कर चुप रहने का सायास फ़ैसला था?

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  • October 4, 2016 at 9:09 pm
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    ओम थानवी 5. हम लोग, जो उस वक़्त की सरकार की अंदरूनी जानकारी रखते हैं, जानते हैं कि ये मनमोहन सिंह का दो-टूक फ़ैसला था कि देशहित में हमें चुप रहना चाहिए।6. दरअसल, देशभक्ति चिल्लाने, ललकारने और सफलता मिलने पर अपनी पीठ ख़ुद ठोकने का नाम नहीं होती। 7. देश की ख़ातिर अक्सर चुपचाप क़ुरबानी देनी पड़ती है और उफ़्फ़ तक न करते हुए बहुत कुछ सह जाना पड़ता है। 8. ऐसे बहुत लोग हैं जो ज़िम्मेदारी के पदों पर रहे हैं, ज़ाहिर है वे वे बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन देशहित में चुप हैं, चुप रहेंगे।9. मनमोहन सिंह की समझ यह थी कि युद्धोन्माद पैदा होने से भारत विकास के रास्ते से भटक जाएगा, हमारी तरक़्क़ी रुक जाएगी ।10. इसीलिए उन्होंने पाकिस्तान को सर्जिकल स्ट्राइक कर सबक़ दिया, लेकिन इसकी चर्चा नहीं की ।11. इस नीति के चलते पाकिस्तान को यक़ीनन सबक़ मिला। 2010 के बाद कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं हुई। कश्मीर में माहौल इस तरह सामान्य हुआ कि घाटी में पर्यटकों की बहार आ गयी । लेकिन ढोल न पीटकर युद्धोन्माद से बचा गया, आपसी तनाव भी नहीं बढ़ा और विकास की यात्रा में कोई रुकावट नहीं आने पाई। ख़ुद कुछ नुक़सान उठाया, लेकिन देश को बचाते रहे।12. भारतीय लोकज्ञान में नीलकंठ की परम्परा सभी जानते हैं, जब शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए विष अपने गले उतार लिया था।13. नीलकंठ की ज़रूरत हमें आज भी है, आगे भी रहेगी। 14. मोदीजी को इसे समझना होगा। वे इस देश का नेतृत्व हैं। पाकिस्तान को एक सबक़ वे सिखा चुके। ज़रूरत हुई तो और भी सिखाएँ। लेकिन भारत की प्रगति को बरक़रार रखना भी उनकी ही ज़िम्मेदारी है। 15. जुनून भी कभी ज़रूरी हो सकता है, लेकिन पाकिस्तान को यह सुकून नहीं मिलना चाहिए कि उसने भारत के विकास-रथ को रोक दिया। ऐसा हुआ तो अंततः वह अपने मक़सद में कामयाब माना जाएगा ।16. यह हमेशा याद रखें की भारत पिछले सत्तर साल में न टूटा है, न डरा है, न विफल हुआ है। 17. भय की भाषा बोलना और भय जगाना कमज़ोरी की निशानी है। मज़बूत राष्ट्र चुपचाप जवाब देते हैं और अपने रास्ते पर आगे बढ़ते हैं।’मजाज़’ का शे’र है – दफ़्न कर सकता हूँ सीने में राज़ को और चाहूँ तो अफ़साना बना सकता ओम थानवी

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  • October 4, 2016 at 9:11 pm
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    Om Thanvi
    4 hrs ·
    प्रधानमंत्री मोदी के पीछे हाथ धोकर पड़ने वाले केजरीवाल ने प्रधानमंत्री को सैल्यूट किया। पहले एक भाजपा नेता ने इस बात का मज़ाक़ उड़ाया। अब केंद्रीय मंत्री और अन्य भाजपा नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री को इसलिए घेर रहे हैं कि उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर पाकिस्तान के दुष्प्रचार (प्रोपेगैंडा) को बेनक़ाब करने की माँग सरकार से क्यों की। यह भाजपा की छिछली राजनीति है।
    दरअसल, यह वार केजरीवाल पर नहीं उन सब लोगों पर है जो सामरिक मामले में सेना और मोदी के साथ खड़े हैं, लेकिन कुछ सवाल कर रहे हैं या कुछ अपेक्षाएँ ज़ाहिर कर रहे हैं। इसमें क्या बुरा है? यह तो कोई लोकतांत्रिक माहौल नहीं हुआ; ऐसा तानाशाही में होता है।
    उन टीवी चैनलों पर भी शर्म आती है जो सत्ताधारी पार्टी से भी आगे जाकर पाकिस्तान में केजरीवाल के बयान के इस्तेमाल की ख़बरों पर उन्हें “पाकिस्तान का हीरो” क़रार दे रहे हैं। यानी देश का ग़द्दार? अजीबोग़रीब तमाशा है। बात-बात पर राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र्द्रोह की जुमलेबाज़ी इस सरकार के राज में जैसे बच्चों का खेल हो गई है!(भक्तों को आगाह कर दूँ कि अब मुझे तुरंत ‘आप’ पार्टी का बंदा न कह दें! कल ही तो उन्होंने – मनमोहन सिंह की संजीदगी और मोदी की ढिंढोरापीट राजनीति पर टीप साझा करने पर – मुझे कांग्रेस समर्थक होने का ख़िताब अता फ़रमाया था!Om Thanvi

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  • October 5, 2016 at 7:16 am
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    भंवर मेघवंशी प्रिय प्राणनाथ,तुम्हारा हर सर्जीकल मुझे फर्जीकल सा क्यों लगता है? तुम बिल्कुल भी नहीं बदले, वही चालबाजियां …वही गलतबयानियां ! बरसों पहले तुम अचानक घर छोड़ कर हिमालय चले गये, मेरे लिये यह किसी सर्जीकल स्ट्राईक सी घटना थी. बाद में पता चला कि तुम हिमालय कभी नहीं गये, बल्कि उस रात भी गृहत्याग कर संघ कार्यालय जा छिपे थे. प्राणनाथ, तुम प्रारम्भ से ही काफी फर्जीकल रहे हो!सुना है कि तुम्हारी इसी फर्जीक्लेटी की बदौलत यह देश जिसके तुम शासक हो, एक गैरजरूरी युद्ध का अवश्यम्भावी शिकार हो गया है. सरहदें आग उगल रही है. आतंक साक्षात आर्मी कैम्पों तक घुस आया है. देश भयंकर असुरक्षा महसूस रहा है.मीडिया ने बताया कि तुम आजकल रात रात भर जगे रहते हो, कुर्सी पर ही रात गुजार देते हो. जब देश की जनता सो जाती है, तुम भूखे प्यासे, बिना एक गिलास पानी पीये सेना को साथ लिये बगैर अकेले पड़ौसी दुश्मन देश पर सर्जीकल अटैक करके उधर भारी मारा मारी करके बड़े तड़के लौट आते हो. तुम्हारे इस करतब को मेरे अलावा सिर्फ कुछेक टीवी वाले भाई ही आज तक समझ पाये हैं. सिकुलरों, खांग्रेसियों, आपियों और युद्ध विरोधियों को तुम्हारे छप्पन इंच के सीने से जरूर जलन हो रही होगी, उनकी चिन्ता मत करना.मैं जानती हूं इस देश की सोयी हुई प्रजा तुम्हारी इस अद्भूत और उत्कृष्ट राष्ट्रभक्ति को कभी समझ नहीं पायेगी. लोग ये भी न जान पाएंगे कि ऐसे सर्जिकल हमले पहले भी दूसरी सरकारों के समय होते रहे हैं. लेकिन तब सेना को राजनीति से दूर रखा जाता था. सेना की गतिविधियों पर राजनीति या युद्धोन्माद नहीं क्रिएट किया जाता था. खैर छोड़ो, बात जरा लम्बी हो गई. इस मुश्किल वक्त में मैं तो तुम्हारे साथ ही हूं, भले ही जिन्हें सरहद पर तुम्हारे साथ होना चाहिये, वो सीमा के बजाय शहर की सड़कों पर डंडा, टोपी लगाये पथ संचलन कर रहे हैं.काश, वे भी तुम्हारे सर्जिकल काम में तुम्हारा साथ देते.
    चलो युद्ध कर लो, फिर चुनावी युद्ध भी जीतना है. जरूरत पड़े तो आपातकाल का उपकरण भी काम में ले लेना ताकि ये देशी चूं चूं के मुरब्बे शांत हो जायें.
    आर्यपुत्र, मैं तुम्हारी युद्ध अभीप्सा को प्रणाम करती हूं और असीम शुभकामनाएं देती हूं.
    युद्धरत इस समय में …तुम्हारीसदैव सीजशोदा भंवर मेघवंशी

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  • October 5, 2016 at 7:03 pm
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    Shishir Singh•2939•Frequent Flyer Member •Delhi•7 hours ago •फॉलो करें
    ” सिकंदर हयात जी, आपको इतना बेवकूफ नहीं समझता था मैं. क्या आपको अंदाजा नहीं की जो पाकिस्तान अभी अपने लोगो को ए बोल के गुमराह कर रहा है की सर्जिकल स्ट्राइक हुई नहीं सो इसका जबाब देने की कोई जरूरत नहीं है, सबूत सामने आने के बाद वो मजबूर हो जायेगा अपने लोगो के द्वारा, युद्ध करने के लिये. भारतवासी के शान्ती के लिये ए जरूरी था की सेना द्वारा ए बताया जाये की हमने बदला ले लिया पर इसका सबूत सामने आने का अंजाम सोच भी रहे हैं आप. ए सच है की युधह मे पाकिस्तान बर्बाद हो जायगपर इंडिया का कोई नुकसान नहीं होगा ए सोचना भी बेवकूफी है. बाकी केजरीवाल, दिग्विजय, चिदंबरम और निरूपम और ए लेखक महोदय के लिये एक ही कहावत है की हाथी चले बाज़ार, कुत्ते भोंके हज़ार. ” सिकंदर हयात to- शिशिर सिंह साहब इस मुद्दे पर सभी सेकुलर लिबरल लोगो ने चुप्पी ही साध ली थी ज़ाहिर हे की छी न्यूज़ और दूसरे जैसे गन्दे घिनोनो की तरह वॉर हिस्टीरिया को तो हम नहीं बढ़ावा दे सकते ये तो तय हे . आतंकवादियो कटटरपन्तियो के भी हम जानी दुश्मन हे. तो इसलिए सेकुलर लिबरल खेमा तो सर्जिकल स्ट्राइक की खबरों के बाद से चुप ही था बात बिगाड़ी भाजपा के दस दस किलो चर्बी के मुह वाले नेताओ ने अपने अपने चुनावी पोस्टर लगवा कर , इनकी मजाल कैसे हुई सेना की उपलब्धियों के सहारे अपनी चुनावी हवस पूरी करने की , मोदी ने इन्हें क्यों नहीं रोका यही से बात बिगड़ी समझिये

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  • October 10, 2016 at 9:50 am
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    Om Thanvi
    20 hrs ·
    लिखा या साझा किया लोग देख-पढ़ रहे हैं, इसका किसे संतोष न होगा; वरना इस अहसास को छोड़ कोरी ‘लाइक’ संख्या का मेरे नज़दीक कोई महत्त्व नहीं।
    फिर भी हाल में दो-चार दफ़ा इन लाइकों पर मैंने ग़ौर किया, इनके आधार पर लोगों का ‘मूड’ पढ़ने की कोशिश की: ख़ासकर मेरे अधिकारी मित्र की डायरी वाली पोस्ट (2600 लाइक, 1200 आगे साझा) और परसों संदीप अधवार्व्यु का कार्टून – 5700 लाइक और इससे भी कहीं ज़्यादा 6200 की साझेदारी। माना जा सकता है कि ये साझेदारियाँ आगे भी हुई होंगी।
    मित्रो, इस अपूर्व लाइकी से मेरा अंदेशा इतना भर है कि लोग हमारी जाँबाज़ सेना की औचक कार्रवाई के राजनीतिक इस्तेमाल, उसकी चुनावी ब्रांडिंग, मार्केटिंग, पोस्टरबाज़ी आदि से ख़ुश नहीं। भाजपा का ऐलान है कि यह इस्तेमाल आगे और बढ़ेगा (क्योंकि राहुल गांधी ने उन्हें दलाल कहकर भड़का दिया है)।
    मैंने इस लाइकाधारित ‘मूड-रीडिंग’ का सार यह निकाला है कि उत्तर प्रदेश में (भी) भाजपा की दाल नहीं गल पाएगी। आप कहेंगे अभी जल्दी है; तो लगाइए शर्त?

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  • October 10, 2016 at 10:01 am
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    Swati Mishra
    2 hrs · उड़ी हमले के बाद जिस वक़्त सेना और सरकार ये सोच रहे होंगे कि पाकिस्तान को कैसे जवाब दिया जाए, ठीक उसी वक़्त सरकार और BJP भी सोच रहे होंगे कि ख़ुद पर उठते सवालों को कैसे चुप कराया जाए।फिर एक सर्जिकल स्ट्राइक से दोनों काम हो गए। बल्कि पहले से ज़्यादा दूसरा काम सध गया।Shamshad Elahee Shams11 hrs · भारतीय फ़ौज की शुचिता पर सवाल हरगिज न उठाना, बस उसके पराक्रम की प्रशंसा करना, सीमा पर वे बैठे हैं इसी लिए १२५ करोड़ भारतीय सुरक्षित हैं जैसे कूपमंडूप जुमले अक्सर सुनाई पड़ते हैं. स्वस्थ्य लोकतंत्र में सरकार के खजाने से पैसा प्राप्त करने वाली किसी भी संस्था से प्रश्न करना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है. प्रश्न परिधि से फ़ौज को बाहर छोड़ना समाज को फ़ौजी अधिनायकवाद की तरफ मोड़ने का प्रस्थान बिंदु है. भारत जैसी सड़ी गली राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था में भारतीय फ़ौज आखिर कैसे शुचिता का कोई मानक बन सकती है, यह मेरी समझ से बाहर है.

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  • October 10, 2016 at 10:02 am
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    ।Shamshad Elahee Shams11 hrs ·भारतीय फ़ौज के पास सिर्फ एक महकमा है जो फ़ौजी कामकाज से इतर है. सी एस डी कैंटीन. सी एस डी की कारगुजारिया अक्सर समाचार पत्रों की सुर्खिया बनती रहती है फिर देशभक्ति का पानी उन खबरों पर ऐसा पड़ता है कि पाठक/ नागरिको को उसके अंत का पता ही नहीं चलता. भारतीय व्यवस्था की एक नियामक संस्था कैग ने इन स्टोर्स के आडिट की अनुशंसा की थी जिसका विरोध भारतीय फ़ौज ने ही कस कर किया था, अगर ये दूध के धुले थे तब इन्हें विरोध की जरुरत क्यों पडी? इन्हें स्वंय ही सरकार से आग्रह करना चाहिए था कि वह जब चाहे आडिट करें.क्या हमें मालूम नहीं कि इन्ही कैंटीन के एक ब्रिगेडियर स्तर के इन्चार्ज अधिकारी की गिरफ्तारी हो चुकी है, सी बी आई के छापे इन्ही कैन्टीन पर पड़ चुके है. क्या हमें मालूम नहीं है सस्ती शराब खरीद कर एक जवान जब अपने घर लौटता है तब उसका घर एक शराब का मिनी ठेका बन जाता है? सी एस डी इतना बड़ा स्कैम है जिसमे तलवारों और अशोकलाट का निशान चिपकाने वालों से लेकर दो तीन फीतियों वाले तक अपने अपने कद के अनुरूप भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. जानी वाकर शराब बनाने वाली एक विदेशी कंपनी ने २०११ में चले एक मुकदमे में अमेरिकी न्यायालय में बाकायदा यह माना था कि उसने शराब बेचने के ठेके प्राप्त करने के लिए २००३ से २००९ के बीच भारत सहित दुनिया के कई देशो में २.७ मिलियन डालर रिश्वत दी थी. इस रकम में १.७ मिलियन डालर का भुगतान भारतीय फ़ौज के अधिकारियों को दिया गया था. जब विदेशियों तक को ये नहीं छोड़ते तो देसी पूंजीपति इनके दामाद नहीं लगते कि उनका उत्पाद ये फ्री में बेच देदेशभक्ति की बीमारी का बुखार यदि उतर जाए तो गौर करे.. इन्ही बड़े-बड़े आदमियों की बड़ी- बड़ी कारे, घर और रौबदार चेहरे कितने बदसूरत नज़र आयेंगे? हाँ हथियारों की खरीद फरोख्त, उनकी जांच, परीक्षण और स्तुतियों की फाइल्स कब कैसे कहाँ से चलती होगी इसका अंदाजा पुराना जानी सुरेश नंदा जरुर बता देगा, नंदा का पता है न कौन था?

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  • October 10, 2016 at 10:08 am
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    Dilip C Mandal
    18 hrs ·
    उड़ी के शहीदों की चिताओं की राख ठंडी भी नहीं हुई। एक महीना भी नहीं बीता है हमलों को।
    और प्रधानमंत्री दशहरा का जश्न मनाने लखनऊ जा रहे हैं।
    यूपी में चुनाव है।
    प्रधानमंत्री उड़ी के किसी भी शहीद के घर नहीं गए।Dilip C Mandal
    21 hrs ·
    बुड़बक समझा है क्या?
    Mahendra Yadav से साभार
    आपको संस्कृत और हिंदी पढ़नी चाहिए, और ये अंग्रेजी पढ़ेंगे।
    आप शाक सब्जी खाएं, ये मांस- मछली, और गौमांस भी खाएंगे।
    आप इनके देवी-देवताओं की पूजा करें, और ये आपके महान लोगों को राक्षस, दैत्य और पापी बताकर हर साल दहन करेंगे।
    आप इनके पैर छूकर आशीर्वाद लें, ये आपको लतियाएंगे।
    आप अपनी बेटियों को देवताओं को समर्पित करके देवदासी बना दें, और ये उन देवदासियों से अपनी वासना पूर्ति करते रहेंगे।
    आप सेना-पुलिस में जाएं, ये हवन करेंगे, मंत्र जाप करेंगे।
    आप अपनी जाति समुदाय के नेताओं को वोट न दें, ये अपनी ही जाति को वोट देंगे।
    बिलकुल बुड़बक समझ रखा है क्या!

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  • October 11, 2016 at 10:00 pm
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    Om Thanvi
    2 hrs ·
    पाँच रोज़ पहले प्रधानमंत्री ने अपने ही लोगों से कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक पर बयानबाज़ी न करें। आज लखनऊ में अपने स्वागत में “प्रतिशोधक” के रूप में लगे पोस्टरों के बीच उन्होंने जिस तरह आतंकवाद के हवाले से राम और रावण के संघर्ष का ज़िक्र किया, जिस अन्दाज़ में “युद्ध” शब्द का एकाधिक बार प्रयोग किया, गदा उठाई, तीर चलाया, सुदर्शन चक्र थामा – उसे देख क्या अब भी किसी को शक़ होगा कि सेना की बहादुरी को भाजपा नेता अपने नेता की बहादुरी का नमूना बनाकर उत्तर प्रदेश चुनाव में इस्तेमाल करने वाले हैं। विजयादशमी के दिन प्रधानमंत्री का लखनऊ जाना अपने आप में इस योजना का हिस्सा ज़ाहिर होता है।
    अजीबोग़रीब ही है कि “प्रतिशोधकों” वाले पोस्टरों पर भाजपा नेताओं के ढेर चेहरे मंडित थे, पर एक भी सैनिक उनमें कहीं नहीं था।Om Thanvi

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