फ़िल्मी दुनिया में निराश हुए थे प्रेमचंद ”

filmसिकंदर हयात

महान लेखक प्रेमचंद भी 1934  – 35  में कुछ समय के लिए  मुंबई की फ़िल्मी दुनिया का हिस्सा रहे थे क्योकि अपने पत्र हंस और जागरण को चलाय रखने के लिए उन्हें पेसो की जरुरत थी . उनका यह भी मानना था की भारत की एक बड़ी  अशिक्षित जनता उनके लेखन को पढ़ नहीं सकती हे सो वे उस तक फिल्मो के दुआरा अपने आदर्श और विचार पहुचना चाहते थे परन्तु जल्दी ही उन्होंने फ़िल्मी दुनिया को नमस्ते कह दिया और वापस  बनारस ही आगये उसके बाद डेढ़ साल ही में उनकी मर्त्यु हो गयी परन्तु इस दौरान ही उन्होंने कहानी कफ़न  लिखी और अपना अमर उपन्यास गोदान पूरा किया था जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता हे की फ़िल्मी दुनिया को छोड़ देने का उनका फैसला सही ही था

प्रेमचंद 4 जून 1934  को बम्बई पहुंचे थे और 8- 9 महीने ही वह रहे थे जहा तक मालूम हुआ हे प्रेमचंद ने दो ही फिल्मो की कहानिया लिखी थी मज़दूरों के जीवन की कठिनाइयों पर मिल मज़दूर तथा नवजीवन या शेर दिल जिसमे प्राचीन राज़पूतो के आदर्श जीवन को प्रस्तुत किया गया था दोनों ही फिल्मो में काटछांट को देख कर प्रेमचंद दुखी हुए और अपने मित्र को लिखते हे की ” कहाँ हम और कहाँ सिनेमा वाले फिल्मो में आना मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी . में जिन  इरादो के साथ आया था उसमे से एक भी पूरा होता नज़र नहीं आ  रहा हे  ये प्रोडूसर जिस ढंग की कहनिया बनाते आये हे उसकी लिक से जो भर भी नहीं हट  सकते हे ,वल्गैरिटी  को ये एंटरटेन मेंट वेल्यु कहते हे . अधभुत  ही इनका विश्वास हे . राजा रानी उनके मंत्रियो के षड़यंत्र नकली लड़ाई शोशेबाजी यही इनके मुख्य साधन हे मेने सामाजिक कहानिया लिखी हे , जिन्हे शिक्षित समाज भी देखना चाहेगा लेकिन उनको फिल्म करते समय इन लोगो को संदेह होता हे की चले या न चले ”

हैदरबाद के एक मित्र को 13  नवंबर 1934  को लिखे पत्र में प्रेमचंद लिखते हे की ” यहाँ इंसान के पवित्र ज़ज़्बात का शोषण होता हे ” एक पत्र में वे कहते हे की यहाँ आदमी भी ऐसे मिलते हे की जो न हिंदी जानते हे न उर्दू  अंग्रेजी में अनुवाद करके उन्हें कथा का मर्म समझाना पड़ता हे

जैनेन्द्र कुमार को पत्र में प्रेमचंद लिखते हे की ” फिल्म में डायरेक्टर ही सब कुछ हे . लेखक कलम का बादशाह ही क्यों न हो , यहाँ डायरेक्टर की अमलदारी हे . वह कहता हे की में जानता हु की जनता क्या चाहती हे . हम यहाँ जनता की सेवा को करने को नहीं आये हे , हमने व्यवसाय खोला हे . धन कमाने हमारी ग़रज़ हे जो चीज़ मांगी जायेगी हम वही देंगे . ” प्रेमचंद लिखते हे की ” में जो प्लाट सोचता हु उसमे आदर्शवाद घुस आता हे और कहा जाता हे की उसमे एंटरटेनमेंट वेल्यु नहीं होता ” सिनेमा के जरिये पश्चिम की सारी  बुराइया हमारे अंदर दाखिल की जा रही हे . आप  अखबारों से कितनी भी फ़रियाद कीजिये वे बेकार हे और अखबारों वाले भी साफगोई से काम नहीं लेते जब हीरो हीरोइन की तस्वीर बराबर छपे और उनके कमाल के कसीदे गाय जाए तो क्यों न हमारे नौजवानो पर इसका असर हो  ?  ” 

फिल्म  संसार के अपने अनुभवों के आधार पर प्रेमचंद ने अपने लेखो में लिखा की ” प्रत्येक राष्ट्र का फ़र्ज़ हो गया हे की वह सिनेमा की प्रगति पर कड़ी निगाह रखे और इसे केवल लुटेरो के हाथ में न छोड़ दे . वयवसाय का नियम हे की जो माल ज़्यादा खपे उसकी तैयारी में लगे . अगर जनता की रूचि ताड़ी शराब  में हे तो वह ताड़ी शराब की दूकान खोलेगा और खूब धन कमायेगा उस इस बात का प्रयोजन नहीं की ताड़ी शराब से जनता का कितनी दैहिक चारित्रिक आर्थिक और पारिवारिक हानि पहुचती हे उनके जीवन का उद्देशय तो बस कमाना हे  , व्यवसाय  तो  व्यवसाय  हे बिज़नेस इज बिज़नेस यही वाक्य सबकी जुबान  पर रहता  हे ”

आगे प्रेमचंद लिखते हे की सवदेशी आंदोलन के समय किसी की हिम्मत नहीं थी की वह बिज़नेस इज़ बिजनेस की दुहाई देता . बिज़नेस से अगर समाज का हित होता तो ठीक हे वर्ना- ऐसे बिज़नेस में आग लगा देनी चाहिए , अगर  सिनेमा हमारे जीवन को सवस्थ आनंद दे सके तो उसे जिन्दा रहने का हक़ हे अगर वह हमारे क्षुद्र मनोवेगों को उकसाता हे हमें निर्लजता धूर्तता कुरुचि को बढ़ाता हे और हमें पशुता की और ले जाता हे उसका निशाँ मिट जाए तभी अच्छा हे    एक और लेख में प्रेमचंद लिखते हे की ” साहित्य जनरुचि का पथ पर्दशक उसका अनुगामी नहीं सिनेमा जनरुचि के पीछे चलता हे जनता जो कुछ मांगे वही देता हे साहित्य हमारी सुन्दर भावनाव को सपर्श करके हमें आनद प्रदान करता हे सिनेमा हमारी कुत्सित भवनव को स्पर्श करके हमें मतवाला बनाता हे में आदर्शो को लेकर वहां गया था लेकिन मुझे मालुम हुआ की सिनेमा वालो के पास बने बनाय नुस्खे और आप इन नुस्खों से बहार नहीं जा  सकते  हे वहां प्रोडूसर ये देखता हे की किस बात पर तालिया बज़ती हे उसी बात को वह अपनी फिल में लाएगा अन्य विचार उसके लिए ढकोसले हे जिन्हे वह सिनेमा के दायरे से बाहर समझता हे   ”

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5 thoughts on “फ़िल्मी दुनिया में निराश हुए थे प्रेमचंद ”

  • January 1, 2018 at 10:08 pm
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    प्रसन्न प्रभाकर
    23 December 2017 at 23:56 ·
    हे राम ( 2000) ,अंडररेटेड फिल्मों में से एक
    कमल हसन की यह फिल्म तमिल और हिंदी , दोनों में साथ बनी थी।

    कलकत्ता के दंगों में अपनी पत्नी के बलात्कार और हत्या के बाद पेशावरी पठान ” अमजद” शाहरुख़ खान का मित्र रहा दक्षिण भारतीय ” साकेत राम” कमल हासन अचानक से सांप्रदायिक भाव से भर उठता है और इसी का लाभ उठानेवाले उसे गांधी की हत्या के लिए तैयार कर देते हैं।

    यहाँ ठहरने की आवश्यकता है। वयक्तिगतता और सामूहिकता के मिलने का यह द्वन्द नया नहीं है। अक्सर व्यक्तिगत दुराग्रह अपनी नैतिकता सामूहिकता की ओट में ढूंढने की कोशिश करता है और यदि परिवेश अनुकूल मिले तो ऐसा हो भी जाता है। आज भी हो रहा है। हाल -फ़िलहाल भी।

    ऐसे में वो व्यक्तिगतता तो अमर हो जाती है मगर वह समूह सदा के लिए अभिशप्त हो जाता है। नियति ही यही है।

    गांधी की हत्या हेतु दिल्ली पहुंचा ” राम ! ” की पिस्तौल ऎसी जगह चली जाती है जहाँ उसे अपना पुराना मित्र अमजद मिलता है जो एक शरणार्थी की भांति ठहरा हुआ है। यहाँ लम्बा चला सीन पूर्वाग्रह और भावनाओं का अंतर्द्वंद दिखलाता है। वैचारिक तौर पर मारनेवाले एक दूसरे को बचाने लगते हैं। पुराना इमोशन आड़े आ जाता है। अमजद मृत्युशैया पर पहुँच जाता है जो मरते वक्त साकेत को अपना रक्षक बताते हुए उसके ऊपर अपनी बीबी और बच्चे को छोड़ जाता है।

    अपने वायलेंस स्टडी में आशीष नंदी यह प्रस्तुत करते हैं कि पार्टीशन के पहले और दरम्यान, उस हिंसक दौर में यह भावना ताक्षणिक प्रतिक्रिया के बीत जाने के उपरान्त अधिक प्रबल थी। वह यह भी दर्शाते हैं कि जिस पीढ़ी ने इस हिंसा को झेला था, उसकी तुलना में उसकी आनेवाली पीढ़ी अधिक क्षुब्ध और क्षोभ में रहती है। गांधीजी की हत्या में शामिल रहे मदन लाल पाहवा का वो इंटरव्यू लेते हैं और उसके बाद वह लिखते हैं कि आज भी वह द्वेष से भरा हुआ है गांधी के प्रति , किन्तु अपनी जन्मस्थली जो अब के पाकिस्तान में है , के अपने आस पड़ोस के मुस्लिमों को एक मधुर रिश्ते के रूप में एक आतुरता के साथ स्मरित करता है।
    हालांकि वह घृणा तुरंत उभरकर आ जाती है जब वह वापस अपने वर्तमान में लौटता है।

    व्यक्तिगतता को सामुदायिकता का सहारा मिलना !

    अब यह लुप्त हो रहा। उस दौरान एक दूसरे समुदाय के लोगों को बचानेवाले लोगों की संख्या कम नहीं थी। उर्वशी बुटालिया की स्टडी भी देखी जा सकती है।

    फिल्म में गांधीजी की भूमिका में नसीरुद्दीन शाह हैं। यह साइड रोल होते हुए भी गांधी की हत्या करने पहुंचे साकेत राम , जिसका ह्रदय अब बदलने लगा था , पर बड़ा प्रभाव छोड़ जाता है। वो गांधी साकेत और अमजद की बेवा को अपने साथ पाकिस्तान की पदयात्रा का आमंत्रण देते हैं।
    गांधी को मारने आया वह साकेत तो पिस्टल निकाल भी लेता है ,मगर उसपर, जो गाँधी को गोली मारता है। और फिर गाँधी को और बीती बातों को याद करके वापस रख लेता है। निमित्त बनते हैं , गांधीवादी का रोल निभा रहे ओमपुरी। गिरीश कर्नाड के माध्यम से उसकी बात गांधी से भी होती है।

    कहानी अपने अंत पर 6 दिसम्बर को आती है।

    फिल्म स्लो और इंटेंस है। बहुतों को पसंद नहीं आएगी। हाँ कमल हसन और रानी मुखर्जी के इंटिमेट सीन पसंद किये जा सकते है। उस जमाने के भारतीय सिनेमा के लिए बड़ी बात थी।

    यह इत्तेफाक ही है कि इस फिल्ल्म में शाहरुख हैं। ” हे राम” शाहरुख खान की ही फिल्म थी, भले कमल हासन उसके प्रमुख नायक रहे। क्यों न हो ?
    उनका अपना परिवार जो खान अब्दुल गफ्फार खान की खुदाई खिदमतगार से सम्बंधित था, वो विभाजन के बाद पाकिस्तान से निकलकर भारत आया था। कितने थे ऐसा करनेवाले ? (कहीं पढ़ा है कि सुभाष की आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के ” लाल किले से आई आवाज , सहगल, ढिल्लों और शाह नवाज” वाले शाह नवाज की गोद ली हुई पुत्री थीं शाहरुख की माँ)।

    यह फिल्म सिर्फ गांधीगिरी बतानेवाली ” मुन्नाभाई लगे रहो” नहीं। सच में कठोर है। गाँधी को यथार्थ के कठोर धरातल पर लाकर चिल्लाकर प्रश्न पूछती और उत्तर मौन होकर लेती है।

    जब मारने आया हुआ बचाने लगे तो ऐसा होना एक सीन के अंदर कई सीन पैदा कर देता है। यही संघर्ष इस फिल्म की पहचान है। बाहरी हिंसा के पीछे छाया मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद ।प्रसन्न प्रभाकर added 2 new photos.
    29 December 2017 at 21:46 ·
    “सत्य बोलने का अहंकार नहीं, सत्य बोलने का साहस चाहिए”
    ————
    “तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है न्यूटन मालूम है तुमको ?
    …मेरी ईमानदारी
    ना … ईमानदारी का घमंड, अपनी ही ड्यूटी करने के लिए तुम चाहते हो कि लोग तुम्हें थैंक्स बोलें”

    …सत्यकाम(1969) से न्यूटन(2017) तक

    समयांतर, सोंच में बहुत फर्क ला देता है।

    सत्यकाम को सच बोलने का अहंकार नहीं था। वह उसे कुलदाय कर्तव्य की भांति अपनाये हुए था। “कुल” यहां महत्वपूर्ण है। वस्तुतः “सत्यकाम” की विषयवस्तु “कुल” होनी चाहिए थी, सत्य नहीं। फ़िल्म का अंतिम एकालाप यही सिद्ध करता है- “खून से ही वंश की परंपरा नहीं चलती, जो विश्वास वहन करता है, वही होता है असली वंशधर…आएंगे सत्यशरण, सत्यप्रिय, सत्यकाम”। यह वस्तुतः कुल की धारणा में परिवर्तन का प्रयास था जिसमें औपनिषदिक अज्ञातकुलीन , अज्ञातवंशी सत्यकाम जाबाल का सहारा लिया गया !!
    अवश्य ही उसने अपने कुल की परंपरा से परे हटकर कदम उठाए। तब भी मूल धारणा उसके जीवन से चिपकी हुई थी।

    परंपरा से हटते हुए वह एक “अशुद्ध” अज्ञातकुलीन से विवाह करता है, उसकी पूर्ववर्ती संतान को स्वेच्छा से अपनाता है। यह उसका कर्तव्य था। वह अपने दादा को उच्च स्थान देते हुए भी, उनसे विनम्रता पूर्वक विलग हो जाता है।

    बावजूद इसके अपनी पत्नी के साथ अंतरंग क्षणों में असहज होते हुए एकाकार नहीं हो पाता। एक पुरुष की सहज सोंच के साथ-साथ यह कुल प्रदत्त सत्य का आग्रह भी था जिसकी पवित्रता उसे बनाये रखनी थी।

    न्यूटन के नायक के साथ कुल वाली कोई समस्या नहीं। समय बहुत आगे आ चुका होता है और कुल जैसी बातें अब प्रगतिशीलता के समक्ष मायने ही नहीं रखतीं। वह किसी अन्य अज्ञातकुलीना से विवाह भी करता और सहर्ष संबंध भी बनाता। किसी जमाने में अस्वीकृत “अशुद्धता” उसके लिए कोई मायने नहीं रखती।यह फ़िल्म में नहीं दिखाया गया है मगर चरित्र का चरित्र कुछ ऐसा ही है।

    कुलीनता में एक सामुदायिक बोध होता है। प्रगतिशीलता बहुधा वैयक्तिक होती है। सामुदायिकता कर्तव्यबोध को याद कराती है । वहीं वैयक्तिक प्रगतिशीलता स्वयं को सर्वोच्च मानते हुए किसी को अपने सामने जी नहीं लगाती। सत्यकाम इसी कारण स्वयं के साथ-साथ बाकियों से भी इसी सत्यनिष्ठा की आशा रखता है और पूरा न होने पर या तो दंड देता है या स्वयं का त्यागपत्र।

    दूसरेवाले में अहंकार उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। वह अपने सिद्धांतों के सामने अपने पिता को भी भाव नहीं देता तो औरों को क्या लगाता। वह स्वयं तक ही सिमटा रहता है। बाकी भ्रष्ट होते रहें ,वह नहीं होगा। यह साहस नहीं ,समझौता है।

    देशकाल का प्रभाव है। सत्यकाम आज़ादी के आसपास की कहानी है जब एक आदर्शवाद हावी था जो दम तोड़ते-तोड़ते व्यावहारिक होने पर आ गया। न्यूटन उस पुराने आदर्शवाद से कोई ताल्लुक नहीं रखता। वह स्वतः अंकुरित एक अज्ञातकुलशील वैचारिक कोंपल है । ऐसे में रेगिस्तान में इकलौता होने का अहम क्यों न हो ? हालांकि उसे बस स्वयं के पानी का इंतज़ाम करना आता है। ऐसे जीव मरते नहीं। घुटते अवश्य ही हैं।

    टूटकर भी सत्यकाम जीता है, मरकर भी। वह नहीं जीतता , उसके विश्वास जीतते हैं। संबंध अत्यधिक गुंथे हुए है। न्यूटन के साथ ऐसा नहीं। एक तरह से अधूरी कहानी है। अंत में दर्शकों पर यह निर्णय छोड़ती है कि आत्मा सिंह सही हैं या न्यूटन ? सत्यकाम का नरेन तो स्वयं उसकी महत्ता स्वीकार करता है। आत्मा सिंह कभी नहीं स्वीकारेंगे। काल का फर्क ।

    काल , कर्तव्य , अधिकार, अंतरसंबंध, और इन सब के मध्य समयाश्रित आदर्श और यथार्थ का द्वंद्व… सबकुछ बदल जाता है।

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  • May 7, 2018 at 5:04 pm
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    बड़े ही पक्के वामपंथी बलराज साहनी इतने उदार और बड़े दिल के इंसान थे की विभाजन के कई कई साल बाद जब पकिस्तान गए और रावलपिंडी अपना पुश्तैनी घर देखने गए तो उस घर में बसे उत्तरप्रदेश के मुस्लिम परिवार के साथ इतना घुल मिल गए की वहा तब एक निकाह हो रहा था उस घर में , तो घर वाले की तरह शादी की तैयारियों में लग गए और बड़े उत्साह के साथ उन्होंने छोटे भाई भीष्म साहनी को ये जानकारी दी की शादी के खाने में जो बर्तन इस्तेमाल हो रहे थे उनपर उनके माँ बाप का नाम लिखा हुआ था भीष्म साहनी एक दुखद मगर रोचक घटना सुनाते हे की विभाजन से पूर्व तीस के समय लाहौर में उन्हें बताया गया की हिंदी उर्दू के बड़े लेखक प्रेमचंद आ रहे हे तो उन्होंने ध्यान नहीं दिया किशोर थे उन्हें पता नहीं था तो उन्होंने ध्यान नहीं दिया मिलने नहीं गया बाद में जब उन्होंने जाना तो वो ताउम्र अफ़सोस रहा की वो प्रेमचंद को नहीं देख पाए कुछ साल पहले तक ndtv ने ही जानकारी दी थी की लमही दो हाथ ऐसे अभी भी जिन्दा हे जिन्होंने प्रेमचंद को छुआ था अब पता नहीं वो बाबा जिन्दा होंगे या नहीं

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  • July 15, 2018 at 11:07 pm
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    Rakesh Kayasth
    10 July at 01:18 ·
    मुन्ना को राजू के जादू की झप्पी
    ————————————-

    संजू नॉन लीनियर पैटर्न पर रची गई कहानी है। फ्लैश बैक में डूबती उतराती फिल्म के बीच मैं भी यादों के एक अलग गलियारे में दाखिल हो गया। बात उस वक्त की है, जब कई तरह की दुश्वारियां झेलने के बाद संजय दत्त ने मुन्नाभाई के ज़रिये सिल्वर स्क्रीन पर जबरदस्त कमबैक किया था।
    तब मैं आजतक न्यूज़ चैनल में हुआ करता था। हमारे मुंबई ब्यूरो ने संजय दत्त के टैटू पर एक स्टोरी शूट करके भेजी। सीने पर गुदवाये गये अपने पिता का नाम दिखाते वक्त संजय की आंखें छलक आई थी लेकिन फुटेज देखते हुए मुझे पल भर के लिए झटका लगा था। हिंदी में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था- सुनिल। जी हां सुनील नहीं बल्कि सुनिल
    पिता के जाने के बाद सीने पर उनका नाम लिखवाया तो वो भी गलत छप गया। `सुनिल’ वाला यही टैटू फिल्म संजू में रणबीर कपूर की छाती पर नज़र आया तो मुझे लगा कि वाकई संजय दत्त की जिंदगी अजीबो-गरीब विचित्रताओं का योग है। कुछ तकदीर ने लिखा और बाकी उन्होने खुद अपने हाथो लिखा `सुनिल’ की तरह।
    फिल्म अभी बनी है। लेकिन सिनेमा में रुचि रखने वालों को इस बात एहसास हमेशा से रहा है कि संजय दत्त की निजी जिंदगी किसी भी फिल्मी कहानी से ज्यादा नाटकीय है। ब्लॉक बस्टर के सारे एलिमेंट इसमें मौजूद हैं। कितना बड़ा संयोग है कि जिस वक्त संजय दत्त की फिल्म खलनायक रीलीज़ हो रही थी, ठीक उसी दौरान अंडरवर्ल्ड के साथ रिश्तों के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया था।उस फिल्म के टाइटिल सांग के बोल थे— नायक नहीं खलनायक हूं मैं।
    कहानी हरेक शख्स की होती हैं। अच्छे लोगो की भी और बुरे लोगो की भी। बुरे लोगो में अच्छाइयां होती है और अच्छे लोग भी बुरे होते हैं। लेकिन संजू किसी एंटी हीरो की कहानी नहीं है। यह उनके नायकत्व को स्थापित करने की कहानी है। एक नायक जो अपनी करनी के लिए खुद जिम्मेदार नहीं है। दिल से एकदम हीरा है लेकिन हालात, जज्बात और संगत ने उसे बिगाड़ दिया है।
    बचपन से लेकर बुढ़ापे तक संजय की जिंदगी का कोई ऐसा दौर नहीं है, जिसमें फिल्मी उतार-चढ़ाव ना हो। लेकिन उनके दोस्त राजू हिरानी ने सिर्फ दो पहलू चुने। पहला कैसे ड्रग के नशे से फंसा एक अपकमिंग स्टार पिता के आशीर्वाद, दोस्त के प्यार और अपने विल पावर के दम पर इस दलदल से बाहर आया।
    दूसरा हिस्सा पिता की सुरक्षा लिए चिंतित स्टार बेटा कैसे अपने घर में एक अदद ए.के. छप्पन और ढेर सारा कारतूस ले आया और बाद में उसे किसी तरह फिकवाया। लेकिन इस चक्कर में टाडा में फंस गया। दोनो ही ट्रेजेडी के लिए हालात जिम्मेदार लेकिन सॉलिड संजू ने डेस्टेनी का भी गेम बजा डाला और हर मुश्किल की वाट लगाके एकदम विक्टोरियस के माफिक बाहर आ गया। राजकुमार हिरानी ने संजू शुद्धिकरण महायज्ञ में अपने मुन्ना के लिए सर्किट की भूमिका निभाई। ऐसी जादू की झप्पी दी कि भाई ही नहीं बल्कि देखने वाले भी सेंटी हो गये।
    थोड़ा सीरियस नोट पर बात करें तो मेरा विषय संजय दत्त से कहीं ज्यादा उन पर बनी फिल्म हैं। संजय दत्त को अदालत ने सजा दी और वे ईमानदारी से अपनी पूरी सजा काटकर बाहर आ चुके हैं। इस नाते उनके प्रति किसी तरह की कोई नफरत कम से कम मैं नहीं रखना चाहता। लेकिन उनका नायकत्व स्थापित करने के चक्कर में राजकुमार हिरानी ने यह साबित कर दिया कि भारत में अच्छे बायोपिक नहीं बन सकते, खासकर उस स्थिति में जहां कहानी का मुख्य किरदार खुद उस प्रोजेक्ट में रुचि ले रहा हो।
    सत्यजित रे सिनेमा को सबसे आला दर्जे का कॉमर्शियल आर्ट कहा था। फिल्म में क्या बिक सकता है, यह राजकुमार हिरानी जानते थे। उन्हे पता था कि 300 लड़कियों के साथ सोना नायकत्व पर दाग नहीं लगाएगा क्योंकि अर्बन मेल ऑडियंस के लिए यह एक लुभावनी चीज़ होगा। लेकिन यह बताना ज़रूर मुश्किल है कि आखिर संजय दत्त अपने ढेर सारे पुराने रिश्ते या शादियां क्यों नहीं संभाल पाये। कैंसर से मरने वाली उनकी पहली पत्नी ऋचा शर्मा और टाडा केस के दौरान साये की तरह उनके साथ रहने वाली उनकी गर्ल फ्रेंड और बाद में दूसरी पत्नी बनी रेया पिल्लई का फिल्म में कहीं कोई जिक्र नहीं है।
    संजय और मान्यता की शादी की कहानी बहुत नाटकीय है। लेकिन मान्यता की एंट्री एक आदर्श भारतीय पत्नी की तरह होती है और पुराना सबकुछ गायब है। कुल मिलाकर `संजू’ उनकी जिंदगी की खुली किताब नहीं बल्कि कुछ दागदार पन्नों का पुनर्लेखन भर है। संजय दत्त के पास अब खोने को कुछ नहीं है। अगर उन्होने थोड़ी सी हिम्मत दिखाई होती तो सिल्वर स्क्रीन पर रची गई उनकी यह कहानी अमर हो सकती थी।
    लेकिन अगर संजय जीवन की जटिलताओं को समझने वाली शख्सित होते भी फिर उनकी जिंदगी में यह सब क्यों होता जो हुआ। अंडरवर्ल्ड के साथ कनेक्शन और अवैध हथियार की खबर ब्रेक करने वाले द डेली के पत्रकार बलजीत परमार ने जेल में संजय से बीसियों बार मुलाकत की। बलजीत का कहना है कि मुझे उनसे बातचीत करते वक्त हमेशा महसूस हुआ कि उनकी मानसिक उम्र असली उम्र से बहुत कम है। उनमें अजीब तरह की मासूमियत है और ऐसे लोग गलतियां दोहराने को अभिशप्त होते हैं।
    बड़ा कैनवास, भारी-भरकम बजट, उम्दा शूट अच्छे लोकेशन ये सब कुछ अपेक्षित था। इसमें कोई नहीं बात नहीं। फिल्म कमाई के सारे रिकॉर्ड़ तोड़ रही है और तोड़ती रहेगी। लेकिन बतौर निर्देशक मुझे कई जगहों पर राजकुमार हिरानी और उनके लेखक अभिजात जोशी अपनी सीमाओं में फंसते दिखाई दिये।
    पीके देखते वक्त भी मुझे लग रहा था कि हिरानी कई जगहों पर अपने टेंप्लेंट को दोहरा रहे हैं। इस फिल्म में भी कुछ ऐसा ही लगा। बाप-बेटे का भावपूर्ण रिश्ता हर फिल्म में एक जैसा। फोन पर, एफएम पर या टीवी डिबेट में इमोशनल ड्रामा कई फिल्मों में एक जैसा। हीरोइन से शादी करने आया एनआरआई दूल्हा चाहे थ्री इडियट्स हो या संजू लगभग एक जैसा। मंडप से लड़की का उठकर भाग जाना चाहे थ्री इडियट्स हो, लगे रहो मुन्नाभाई या संजू कमोबेश एक जैसा। एक क्रियेटिव व्यक्ति होने के नाते हिरानी के लिए थोड़ा सोचने की ज़रूरत है। लेकिन मल्टी करोड़ क्लब शायद उन्हे ऐसा करने नहीं देगा।

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  • August 1, 2018 at 10:00 am
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    लेखक लेखन और पैसा बड़ा उलझा हुआ मसला हे जिसका सिरा पकड़ना कम से कम यहाँ बड़ा कठिन हे लेखक के पास अधिक पैसा होगा तो उसे ना जमीनी अनुभवों मिलेंगे ना वो टफ होगा अधिकतर अंगेरजी लेखक इसलिए ऐसे होते हे वही अगर पैसा ना हो तो जीवन के आर्थिक तनाव उसकी लेखकीय क्षमता में दीमक का काम करेंगे हमारी भी यही समस्या रही हे ———————-
    ” Abbas Pathan
    14 hrs ·
    प्रेमचंद उस दौर के लेखक रहे है जिस दौर में हिंदी पढ़ने वालों की तादाद ना के बराबर हुआ करती थी। तब सिर्फ कहानियां सुनी और सुनाई जाने का चलन था। उस समय लोग राजा महाराजो और भूत प्रेत जिन्नों की किवदंतियां सुनकर समय व्यतीत किया करते थे। लिखने और पढ़ने का चलन ना के बराबर था। फिर भी वे निरन्तर लिखते रहे। आज प्रेमचंद के नाम से बेशुमार प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं के चूल्हे जलते है लेकिन खुद प्रेमचंद की पूरी जिंदगी मुफलिसी में गुजरी क्योकि कलम के कद्रदान इतने नही हुआ करते थे। प्रेमचंद की मुफ़लिस कलम चूल्हे चिमटे की बातें लिखती रही।

    लिखने के वो दाम नही मिलते थे, ना ही कोई खास वाहवाही मिला करती थी फिर वो कौनसी ललक थी जिसने प्रेमचंद को 300 से अधिक कहानियां लिखने की ऊर्जा दे डाली। उस समय के लोगो की अधिक रुचि माइथोलॉजी और किवदंतियां सुनने पढने में हुआ करती थी। हमने भी अपने बूढ़े बुजुर्गों से परियों की कहानियां सुनी है, लेकिन कभी प्रेमचंद की कहानी उन्होंने नही सुनाई, यहां से ये बात साबित होती है कि प्रेमचंद उस सदी में लिखकर जरूर गए किन्तु दुनिया ने उन्हें उनके जाने के बाद जाना। 11 वी सदी में ईरान में एक गुमनाम दार्शनिक हुए थे उन्होंने सारी जिंदगी खपाकर ज्ञान के 9000 सहिफे लिखे, जब मौत का वक्त नजदीक आया तो उन्होंने वो सहिफे अपनी बेटी को दिये और कहा इन्हें थोडा थोडा बेचकर रोटी खाते रहना। ये हाल था लिखने वालों का.. गोया की लेखक को कलम के हुनर के साथ फकीरी भी अनिवार्य रुप से मिला करती थी।

    आज हम लोगो को कितनी सुविधाए मिल चुकी है। फेसबुक पे आईडी बनाओ, गूगल पे ब्लॉग बनाओ और बन जाओ लेखक बस इतना आसान है लेखक बनना । हमे रेडीमेड वाहवाही करने वाले भी मिल जाएंगे और कलम में अगर धार और मक्कारी का मिश्रण हो तो राजनीतिक दलों द्वारा उपयोग लेने हेतु डिजिटल युग में खरीदार भी मिल जाएंगे।

    प्रेमचंद सरीखे लेखको को लिखने का हुनर कुदरत का दिया हुआ था और कुदरत जानती थी ये दिल का फकीर जरूर है आने वाले समय मे वक्त के बादशाह इन्हें 7 बार प्रणाम करेंगे। वे कुदरत के दिये हुए आचरण को ईमानदारी से निभाते चले गए। उन्होंने कुदरत से छेड़छाड़ नही की.. कोई पढ़े न पढ़े वे बस निस्वार्थ लिखते चले गए।

    मैंने भी 100 के करीब कहानियां और इतनी ही कविताएँ लिख डाली है, मगर सोचता हुँ यहां पढ़ेगा कौन? हम लोगो के पास सारे साधन है लिखने और पढ़ने के… लेकिन थु है हमारी मानसिकता पे की हम केवल मसाला और कुंठा पढ़ने को उमड़ पड़ते है। इंटरनेट पे पोर्न साहित्य अत्यधिक सर्च होता है, और मैगजीन बेचने के लिए उसके कवर पे अधनंगी नारी की तस्वीर लगानी अनिवार्य हो चुकी है।

    बहरहाल मैं इतना समझ चुका हूं कि हकीकी लेखक बनने के लिए दिल का फकीर बनना होगा.. आपको कोई पढ़े या न पढ़े लिखते जाइये।

    साहित्य सम्राट प्रेमचंद की जयंती पे बस इतना ही…..

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