फ़िराक के घर में फैज़ !

feroz

by — मनोहर नायक

( उपमहादीप के दो महान कवियों फेज़ अहमद फेज़ 1911 – 1984 और रघुपति सहाय उर्फ़ फ़िराक गोरखपुरी 1896 – 1982 आज़ादी से पहले के साथी रहे मर्त्यु से पूर्व दोनों दोस्तों की आखिर मुलाकात 1981 में जब फ़ैज़ भारत आये तब उनके इलाहाबाद प्रवास में हुई थी उसी पर ये विवरण लेखक मनोहर नायक पुस्तक क्रांति और रोमांस का शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ संपादक भारत सिंह , आलोक सिंह साभार )

फ़िराक के साथ ही ज़ेहन में जिस दूसरे शायर का ख्याल आता हे वो निसंदेह फैज़ ही हे इस सदी के दो महान कवि .———- बात 1971 की हे भारत पाकिस्तान की जंग चल रही थी फ़िराक़ घर पर अपने एक दोस्त प्रशंसक के साथ बैठे रेडियो से समाचार सुन रहे थे . भारतीय सेनाय आगे बढ़ रही थी . एकाएक देश प्रेम की एक जोरदार लहर फ़िराक़ के दिल में उठी और वे बोल पड़े , ” बस यही मौका हे भारत को पाकिस्तानी शहरो पर बमबारी कर देनी चाहिए . यह सुन कर कुछ हतप्रभ उस दोस्त ने कहा ” जरूर कर देनी चाहिए फ़िराक़ साहब , तब हो सकता हे की बम फैज़ पर भी गिरे क्योकि बम किसी को बख़्शता नहीं हे ……. ” ओफ़ यह मेने क्या कह दिया ? फ़िराक बोले मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था जंग तबाह करती हे संस्कर्ति को गर्क करती हे फ़िराक बेहद परेशान हो गए थे

1981 की गर्मियों में फैज़ भारत आये थे इलाहबाद भी आये . यूनिवर्सिटी में फैज़ का अभिनंदन किया गया . फ़िराक और महादेवी इस समारोह में उपस्तितिथ थे फैज़ की शायरी का जिक्र करते हुए फ़िराक ने कहा ” फैज़ की शायरी की जान उसकी तहज़ीब और नरमी हे हिंदुस्तान की तहज़ीब जंग तोप और लाठियो से नहीं बनी यहाँ की तहज़ीब उन आत्माओ ने बनाई जो पीपल के पत्ते की तरह नरम और चमकदार थी हमारी तारीख और हमें कई लाख लोगो ने सिर्फ सांस लेकर बनाया हे हमें बनाने में हमें बनाने वालो में आसमान जमीन खेत हिमालय और मासूम बच्चे भी हे ” अपने इलाहबाद प्रवास में फेज़ कई जलसों में शामिल हुए पर उनमे सबसे अलग और सबसे महत्वपूर्ण कार्यकर्म था फ़िराक से उनकी मुलाकात का एक लम्बे अरसे के बाद फ़ैज़ फ़िराक से मिल रहे थे फ़िराक काफी पहले से बेसब्र थे अपने सेवक पन्ना को हिदायते देते हुए वहा मौजूद चार पांच लोगो से बतियाते भी जाते उन्होंने साफ़ कुरता पायजामा पहना और इंतज़ार करने लगे थोड़ी ही देर में फेज़ नमूदार हुए तपाक से फ़िराक का हाथ अपने हाथ मे लेते हुए फेज़ ने याद दिलाया की वो यहाँ पहले भी आ चुके हे तब तक वह छोटा बरामदा पूरा भर चुका था फ़िराक सामने बैठे एक नेता जी से बोले ”भाई बड़ा मैदान मार लिया लखनऊ में उर्दू को सरकारी जुबान बनवा दिया ” नेता जी जवाब में बोले हुज़ूर आप तो काफी बढ़िया तकरीर कर आये थे बड़ी चर्चा थी फ़िराक हँसे बोले आरेटरी के बारे में कहा हे – आईटी इज हारलेट ऑफ़ द फाइन आर्ट्स ( वकृतता ललित कलाओ की हरजाई हे ) इस पर उठे ठहाको और हंसी के बीच फ़िराक ने इतना जोड़ दिया ए गुड आरेटरी इज़ नेवर डिफिटेड ( अच्छी वकृतता कभी पराजित नहीं हो सकती )

इसके बाद फ़िराक ही बोले ” फेज़ में करीब 40 बरस तक एक शेर का मायने गलत समझता रहा बिना किसी के बताय ही , बाद में इसका सही अर्थ समझ पाया . शेर तुलसी का हे सीताहरण हो चूका हे तेज़ बारिश हो रही हे .” घन घमंड नभ गरजत घोरा प्रियाहीन डरपत मन मोरा ” में पहले समझता रहा की राम सोच रहे हे की सीता बेचारी भीग रही होगी किस हालत में होगी पर इसका मतलब यह नहीं हे सीता के जाने से राम की ताकत चली गयी . उनकी हिम्मत खत्म हो गयी शक्ति तो सीता थी वे सोच रहे थे अब में क्या लड़ूंगा . फ़िराक बोलते रहे तुलसी ने क्या सुंदर उपमा दी हे एक जगह . सीता सवयवर में जयमाला लिए जिस राजा के सामने से गुजरती हे वह उनकी आभा के सामने स्याह पड़ जाता हे . वही बैठी एक महिला का स्वर उभरा ”उनका आना तो याद हे मीर फिर उसके बाद चिरागो में रौशनी ना रही ” . फ़ैज़ ने कहा ये मीर का शेर नहीं हे फ़िराक के यारो ने जोड़ दिया होगा इस पर एक सज़्ज़न ने सुचना दी की फ़ला किताब में यह शेर मीर के नाम से दिया हे , फ़िराक फ़ौरन बोले , तो क्या यारो ने डाल दिया होगा फ़ैज़ ने जवाब में सौदा ( अपने प्रिय शायर ) के नाम से कहे जाने वाले कुछ शेरो को गलत बताते हुए कहा मेने सौदा के सारे दिवान छान मारे मुझे वे शेर कही नहीं मिले . कुछ देर की चुप्पी तोड़ कर फ़ैज़ ने फ़िराक से कुछ सुंनाने का अनुरोध किया , फ़िराक की आवाज़ उभरने लगी ” अब तो अक्सर चुप से रहे हे यु ही कभू लब खोले हे पहले तो फ़िराक को देखा होगा अब तो बहुत कम बोले हे ”

फेज़ ने तारीफ करते हुए कुछ और सुंनाने के आग्रह के साथ कहा , इसमें तो कुछ शेर कहे होंगे . बिस्तर पर लेटे फ़िराक कोशिश करके थोड़ा टिक कर बैठ गए . फालिज के कारण उनके ज़्यादातर बेजान हो गए जिस्म की सबसे जिन्दा चीज़ उनके आवाज़ खनकने लगी . झूमते और हाथ झुलाते हुए वे ग़ज़ल के और शेर सुनाने लगे , ” देखो मेरी ग़ज़लें रात का जुड़ा खोले हे . ” जब तक ग़ज़ल पूरी नहीं हुई फ़ैज़ मंत्रमुग्द दिखे . काफी वाह वाह की . अब फ़िराक की बारी थी उन्होंने कहा फ़ैज़ कुछ तुम सुनाओ शालीनता और संकोच से भरी मुलायम आवाज़ में फ़ैज़ ने कहा आपको में क्या सुनाऊ ? फिर सुनाया , मेरे दिल मेरे मुसाफिर ……. ग़ज़ल में तल्लीन हुए फ़िराक कुछ देर वैसे ही खोय रहे , फिर बोले ” फ़ैज़ किसी अंग्रेजी क्रिटिक के ये बात तुम्हारे लिए ही लिखी गयी लगती हे ही रोट लाइक ए पोएट ह्वाट ही फेल्ट लाइक ए मेन ( उसने एक कवि के रूप में वही लिखा जो एक इंसान के रूप में महसूस किया ) .

प्रस्तुति सिकंदर हयात

(Visited 21 times, 1 visits today)

11 thoughts on “फ़िराक के घर में फैज़ !

  • October 26, 2015 at 1:45 pm
    Permalink

    फ़िराक़ गोरखपुरी का एक शेर मुझे पसंद है —

    जरा उन की नजाकत तो देखिये,लिए खामशुदा जुल्फ हाथ में
    मेरे पीछे आये दबे दबे मुझे सांप कह कर डरा दिया

    Reply
  • October 26, 2015 at 1:49 pm
    Permalink

    दो महान शायरॉ की बात चली है तो बतलता चलूं की कल एक और महान शायर साहिर लुधियानवी की पुण्य तिथि थी.

    Reply
  • October 26, 2015 at 1:52 pm
    Permalink

    फ़ैज़ पाकिस्तानी थे, और फिराक हिन्दुस्तानी. दोनो दोस्त थे. और साहिर विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गये, और अपने एक भारतीय दोस्त के आग्रह पे भारत लौट आए.
    भारत और पाकिस्तान मे ढुंढ़ो तो दोस्ती के कई मौके है, बस सोच सकारात्मक और दिल मुहब्बत वाला होना चाहिए.

    Reply
    • October 27, 2015 at 8:44 am
      Permalink

      सच तो ये हे की जितने भी लोग ( संघी तरुण विजय टाइप भी ) पाकिस्तान गए हे वो यही कहते आये हे की जो सम्मान इज़्ज़त और दीवानगी उन्हें पाकिस्तान में मिली हे वैसी दुनिया में कही नहीं मिलती ख़ास ही नहीं आम लोगो से भी दुकानदारो का पैसा ना लेना या कम लेना आम बात हे लेखक असगर वजाहत ऐसे ही ट्रीटमेंट के बाद लिखते हे की पाकिस्तान में तो दुकानदारो का हमसे पैसा ना लेना आम हे मगर ये उमीद आप दिल्ली के दुकानदारो से ना करे वो लिखते हे ” ये तो अपने बाप को ना छोड़े ”

      Reply
  • October 27, 2015 at 9:28 am
    Permalink

    अभी कुछ ही दिनो पहले, एक पाकिस्तानी परिवार को मुंबई मे किसी भी होटल वाले ने कमरा देने से मना कर दिया और उन्हे पूरी रात सड़क पे गुजारनी पड़ी.
    इसी तरह से पाकिस्तान ने कल गीता को भारत भेजा है, और वहाँ उसे पूरी इज़्ज़त और प्यार के साथ रखा था.
    ईमानदारी से देखे तो हमे खुद मे अनेको खामियाँ और जिसे हम दुश्मन कहते और मानते आए हैं, उसमे भी अनेको अच्छाइयाँ दिख जाएगी. बात वही पे आती है कि आपका दृष्टिकोण सकारात्मक है, आप प्रेम की राजनीति कर रहे हैं, या नफ़रत की.

    Reply
  • October 27, 2015 at 10:59 am
    Permalink

    इसलिए हम कहते हे की हिन्दू कटरपंथ उतनी ही घिनोनी और संकीर्ण विचारधारा हे जितना मुस्लिम कटरपंथ बस फर्क ये हे की ये लोग बहुत ज़्यादा कायर भी होते हे जैसा की हमने दादरी में देखा ही दादरी की घटना हिन्दू कठमुल्लाओं के” कायरतापूर्ण आतंकवाद ” का सबसे सटीक नमूना हे भगत सिंह के साथी रहे बड़े लेखक यशपाल अपनी किताब ” सिंहावलोकन ” में इसी कायर आतंकवादी मानसिकता को भारत विभाजन की जड़ बताते हे अब देखिये मुंबई के होटलों ने केसी नीच मानसिकता दिखाई

    Reply
  • November 29, 2017 at 6:48 pm
    Permalink

    Alpyu Singh
    20 November at 09:35 ·
    लाजिम है…वो देख तो रहे हैं
    वो सेना में कैप्टन थे। वो अंग्रेजी केप्रोफेसर थे। वो अरबी, फारसी ,पंजाबी,ऊर्दू जानते थे। उन्हें तो फांसी पर चढ़ाया जाना था। उन्होने जेल को भी अपनी हसीं कल्पना से खूबसूरत बना दिया था । उन्हें वतन निकाला मिला था । वो इंकलाब और मुहब्बत दोनों का राग एक सुर में गाते थे । वो शायर थे । यकीनन वो फैज़ ही थे । एक ज़िंदगी जो कविता की तरह पढ़ी गई । एक कविता जो ज़िंदगी की तरह जी गई ।
    अब ज़रा कल्पना कीजिए कि आज फैज़ साहब 1978 की तरह हिंदुस्तान दौरे पर हों , जेएनयू में शायरी पढ़ें ,ऐसे ही जैसे उन्होंने उस साल के किसी एक दिन पढ़ी थी, अपना भारी भरकम डील डौल लिए सफारी सूट पहने अपने मद्धम लहजे़ में वो आज आपसे मुखातिब हों तो वो कौन सी नज्म दोहराएंगे । यकीनन वो होगी ।
    हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे’
    क्योंकि जिस दुनिया की कल्पना उन्होंने की थी वो अभी बहुत दूर है इसलिए आज भी अगर गालिब की ही तरह फैज भी ज्यादा सुने, सुनाये और गुनगुनाए जाते हैं तो वजह साफ है इनकी रचनाओं में इंसान के बुनियादी हालातों पर पकड़ ।
    इसी लिए इनके लफ्ज़ों की मार जब तब वक्त के गाल पर झन्नाटे से पड़ती ही रहती है । 7 के दशक में दक्षिण एशिया की तरुणाई जब दुनिया को बदलते देख रही थी ,उस वक्त शीत युद्ध की धुंध में जो आवाज़ें साफ दिखाई और सुनाई पड़ती थीं । वो बर्तोल्त ब्रेख्त, नाजिम हिकमत और फैज़ की आवाज़ें थीं । फैज़ की शायरी की गूंज तो आज और साफ़ हो गई है । 90 के बाद आर्थिक साम्राज्यवाद की जकड़न उसी दौर के हालात याद दिलाती है । जब भंसाली जैसे फिल्म कलाकार की अभिव्यक्ति पर थप्पड़ की गूंज भारी पड़ती है …जब गुलज़ार सरीखे कलाकारों को कहना पड़ता है कि हालात ठीक नहीं हैं । जब बोलने , कहने , गाने से पहले सोचना पड़े और डरना भी तो …फैज़ के लिखे ये शब्द जहनी कागज़ पर और उभर के आते हैं ।
    बोल के लब आजा़द हैं तेरे
    बोल …जबां अब तक तेरी है
    खुद फैज की जुबानी उनकी ज़िंदगी की कहानी किसी सांप सीढ़ी के खेल से कम न रही । पंजाब के एक भूमिहीन किसान के घर जन्म लिया ,लेकिन पिता किसी चमत्कार की तरह अफगानिस्तान के एक बादशाह के यहां नौकरशाह बने
    । जब ज़िंदगी की लेकर समझ पैदा हो रही थी तब ग्रेट डिप्रेशन ने समझाया कि भूख और गरीबी क्या होती है ? कैसे इन हालातों ने दुनिया में फासीवाद को जन्म दिया । इन खतरों को वो पहचानते थे और इसका असर उनकी कलम पर पढ़ना ही था… जनवादी सोच की जड़ में यही जहनीयत थी
    मता -ए लौह-ओ कलम छिन गई तो क्या
    कि खूने दिल में डूबो ली हैं उंगलियां मैंने
    किसी ने खूब कहा है कि फैज़ की शायरी ज़िंदा इशारों का पर्याय है, जो दर्द की चीख और कराह को कसकर अंदर दबाए और छुपाए है, मगर दरअसल जो दबाए दबते नहीं, छुपाए छुपते नहीं । 40 और 50 के दशक में लिखी नज्मों की इंकलाबी तासीर इसी लिए ऐसी थी। लेकिन इंकलाबी सफर के बाद मंजिल की निराशा ने कलम को और तीखा और गहरा किया । वो 47 में पाकिस्तान टाइम्स का संपादन कर रहे थे और 47 में ही लिख रहे थे ‘
    ये दाग-दाग उजाला..ये शबगजीदा सहर
    वो इंतजार था जिसका ..ये वो सहर तो नहीं
    लेकिन फैज़ की कलम की सबसे खूबसूरत बात है फिर से जीने की स्वप्नशील रचनाशीलता । जो जीने…हारने ….फिर से लड़ने के लिए जज्बा देती है । यही वजह है कि रावलपिंडी षडयंत्र केस में धरे लिए जाने के बाद सालों
    जेल में रहे तो संघर्ष धूप बनकर खूबसूरत कलम को सींचती रही । जो आज के हालातों में भी जीने, सपने देखने की हिम्मत देती है ।
    चलो फिर से मुस्कुराएं,
    चलो फिर से दिल जलाएं
    पाकिस्तानी गायिका नूरजहां ने एक दफा फैज़ के बारे में कहा था ” मुझे मालूम नहीं कि मेरा फैज़ से क्या रिश्ता है ,कभी वो मुझे शौहर तो कभी आशिक नजर आते हैं..कभी महबूब तो कभी बाप नजर आते हैं..तो कभी बेटा नज़र आते हैं । फैज़ इंकलाबी रोमानियत का शायद आखिरी दस्तावेज थे । 1981 में इलाहाबाद विश्विद्यालय में फैज़ ने मशहूर सीनेट हॉल में उनको सुनने आए लोगों से कहा था कि मेरा दुनिया को सिर्फ़ यही संदेश है…इश्क करिए । इश्क यानि फैज की जबान में वो इश्क जो इंकलाब जो एक खूबसूरत दुनिया का ख्वाब दिखाता है । यकीन मानिए फैज़ अब भी दुनिया से कह रहे हैं ।
    वो इंतजार था जिसका ..ये वो सहर तो नहीं
    रिपोस्ट-फैज़Alpyu Singh

    Reply
  • February 12, 2018 at 10:22 am
    Permalink

    समकालीन जनमत
    ‘जश्ने फैज़’ ने अभियान का रूप लिया, आगरा, अलीगढ़ , इलाहाबाद, लखनऊ, पटना , दरभंगा में हो रहा है आयोजन‘जश्ने फैज़’ ने अभियान का रूप लिया, आगरा, अलीगढ़ , इलाहाबाद, लखनऊ, पटना , दरभंगा में हो रहा है आयोजन
    जनमत टीम जनमत टीम
    आगरा में 13 फरवरी को होने जा रहा ‘जश्ने फैज़’ का आयोजन ऐतिहासिक रूप लेने जा रहा है. किसी एक लेखक या रचनाकार को लेकर देश के कई शहरों में एक साथ जयंती समारोह ने एक अभियान का रूप ले लिया है. आगरा के रंगलीला, जन संस्कृति मंच और सूर स्मारक मंडल के तत्त्वाधान में आगरा में 13 फरवरी को होने वाले आयोजन के अलावा 12 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में तथा 14 जनवरी को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी आयोजन होने जा रहा है. इसके अलावा जयंती के दिन इलाहाबाद, लखनऊ और बिहार के पटना , दरभंगा सहित कई जिलों में जन संस्कृति मंच की इकाइयां अपने सहयोगी संगठनों के साथ मिल इस महान शायर की जयंती मनाने जा रही है. इसका श्रेय आगरा के आयोजन को दिया जाना चाहिए जिसने महान शायर की सुपुत्री को आगरा के आयोजन के लिए आमंत्रित किया और आयोजन को राष्ट्रीय महत्त्व के आयोजन के रूप में रेखांकित किया.
    जन संस्कृति मंच के डॉ. प्रेम शंकर सिंह ने कहा है कि ‘आज के नाम और आज के गम के नाम’ जश्ने फैज़ आयोजन की स्वतः स्फूर्त तरीके से कई जगह आयोजन की थीम बन गई है. उसके निहितार्थ फैज़ की शायरी में ही मौजूद है.13 फरवरी को एशिया महाद्वीप के महान शायर फैज़ अहमद फैज़ का जन्मदिन पड़ता है. फैज़ की शायरी अविभाजित भारत के साझे स्वप्नों, संघर्षों और बड़े सामाजिक परिवर्तन की जरुरत को साकार करती है. उनकी शायरी वतन से मुहब्बत की शायरी है, बेशक उसमें महबूब भी है. वे ‘रोमानी तेवर में इंकलाबी गीत लिखने वाले शायर हैं. फैज़ की कविता सिखाती है कि वतन की मुक्ति मुकम्मल तौर पर की गई कुर्बानियों के बगैर संभव नहीं. आज वतन के हालात ने फैज़ को पहले से कहीं अधिक जरूरी बना दिया है. अभिव्यक्ति, सहिष्णुता, बन्धुत्त्व जैसे मूल्य जितने उपेक्षित आज हुए हैं, पहले न थे. उसी अनुपात में पोंगापंथ, कट्टरता, स्वार्थपरकता और हिंसा बढ़ी है. निस्संदेह यह हमारे लोकतंत्र के लिए एक मुश्किल घड़ी है. ऐसे ही किसी मुश्किल घडी में फैज़ ने लिखा होगा कि- ‘भीगी है रात ‘फैज़’ ग़ज़ल इब्तिदा करो/ वक्ते-सरोद, दर्द का हंगामा ही तो है.’
    रंगलीला के अनिल शुक्ल ने कहा कि फैज़ साहब की सुपुत्री सलीमा हाशमी हमारे इस अभियान को हौसला देने हमारे साथ रहना चाहती थी. दिल्ली और आगरा के आयोजन में उनकी उपस्थिति लगभग तय थी. पर आयोजन के जब इतने करीब हैं उनके वीसा को लेकर पशोपेश की स्थिति बनी हुई है. साहित्य और संस्कृति का हिस्सा साझेपन और संवेदनशीलता का है. इसे राजनीति से मुक्त रखना चाहिए. क्या ही अच्छा होता कि सरकार की तरफ से कोइ निर्णायक कदम शीघ्र ही उठाया जाता और हम आश्वश्त होकर आयोजन की तैयारियों में लगते. आगरा में रंगलीला के साथ सूर स्मारक मंडल इस आयोजन में हमारे सहयोगी है और साथ ही शहर के तमाम सामजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का समर्थन हमें हासिल हो रहा है.
    अलीगढ़ में जसम की इकाई इस कार्यक्रम को आयोजित कर रही हैं. जसम, अलीगढ़ की संयोजक दीपशिखा ने बताया इस आयोजन कि जश्ने फैज़ के अंतर्गत अलीगढ़ में ‘प्रतिरोध की कविता और फैज़ की शायरी’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की जायेगी. जिसका उद्घाटन जे एन. यू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रणय कृष्ण करेंगे. अन्य वक्ताओं में प्रो. अली अहमद फातमी, कवि अरुण आदित्य, डॉ हरिओम के शिरकत करेंगे. अध्यक्षता प्रो. अकील अहमद करेंगे. आगरा में आयोजन का उद्घाटन जे एनयू के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष देवी प्रसाद त्रिपाठी करेंगे जो वर्तमान में राज्य सभा के सांसद है. प्रणय कृष्ण के अलावा रख्शंदा जलील, शमीम हनफी, प्रो. अली जावेद जैसे विद्वान् आगरा के आयोजन में शामिल हो रहे हैं.
    जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, आगरा और अलीगढ़ में फैज़ के प्रशंसक ग़ज़लकार और गायक डॉ. हरिओम की मखमली आवाज़ में फैज़ की ग़ज़लों और नज्मों का लुत्फ़ उठा सकेंगे. डॉ हरिओम ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में स्थापित एक ऐसी शख्सियत हैं जिनके कुछ वर्षो के अंतराल में ही अब तक चार एल्बम आ चुके हैं. ‘रंग पैराहन’ तथा ‘इन्तिसाब’ फैज़ की गजलों और नज्मों का कलेक्शन है जबकि ‘रोशनी के पंख’ हरिओम की खुद की लिखी हुई गज़लों की सांगीतिक प्रस्तुति है और ‘रंग का दरिया’ अभी हाल में ही रिलीज हुआ है.
    अलीगढ़ में आयोजन से जुड़े प्रो. कमलानंद झा ने बताया कि इस पूरे अभियान को फैज़ और मुल्क से मोहब्बत करने वाले आमजन के सहयोग के भरोसे इस आयोजन को सफल बनाने के लिए हम प्रयासरत हैं. आज के वक्त की जरूरत के मद्देनज़र इस अभियान को व्यापक जन समर्थन हासिल हो रहा है.——————–Ashutosh Kumar
    12 hrs ·
    अलविदा अस्मा जहांगीर.
    दक्षिण एशिया में राजसत्ता, पितृसत्ता, धर्म,सेना और मीडिया की संयुक्त ताक़त को निर्णायक चुनौती देनी वाली सबसे मजबूत आवाज़. नौजवान स्त्री-पुरुषों की रोल मोडल.
    अस्मा ने सबसे पहले पाकिस्तानी स्त्रियों को अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनने का हक दिलाया. ईशनिंदा कानून के खिलाफ़ लड़कर उसे शिकस्त दी. बंधुआ मजदूरों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को मान्यता दिलवाई.

    उन्हें धर्मद्रोही और देशद्रोही कहा गया. जनरल जिया और मुशर्रफ दोनों ने उन्हें जेल भेजा. खुफिया एजेंसिया जीवन भर उनका पीछा करती रहीं.लेकिन आज उनके न रहने पर समूचा पाक-हिन्द-बांग्लादेश खित्ता रंजोगम में डूबा हुआ है .
    अस्मा जहांगीर होने से स्त्री होने के मानी खिलते हैं.

    Reply
  • April 2, 2018 at 10:38 am
    Permalink

    लेखक का नाम पता नहीं ——————————–*प्रसंग है*___
    एक नवयुवती छज्जे पर बैठी है,
    केश खुले हुए हैं और चेहरे को देखकर लगता है की वह उदास है। उसकी मुख मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली है।
    विभिन्न कवियों से अगर इस पर लिखने को कहा जाता तो वो कैसे लिखते…..
    *मैथिली शरण गुप्त*-
    अट्टालिका पर एक रमणी अनमनी सी है अहो
    किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो ?
    धीरज धरो संसार में, किसके नहीं है दुर्दिन फिरे
    हे राम! रक्षा कीजिए, अबला न भूतल पर गिरे।

    *काका हाथरसी*-
    गोरी बैठी छत पर, कूदन को तैयार
    नीचे पक्का फर्श है, भली करे करतार
    भली करे करतार, न दे दे कोई धक्का
    ऊपर मोटी नार, नीचे पतरे कक्का
    कह काका कविराय, अरी मत आगे बढ़ना
    उधर कूदना मेरे ऊपर मत गिर पड़ना।

    *गुलजार*-

    वो बरसों पुरानी ईमारत
    शायद
    आज कुछ गुफ्तगू करना चाहती थी
    कई सदियों से
    उसकी छत से कोई कूदा नहीं था।
    और आज
    उस
    तंग हालात
    परेशां
    स्याह आँखों वाली
    उस लड़की ने
    ईमारत के सफ़े
    जैसे खोल ही दिए
    आज फिर कुछ बात होगी
    सुना है ईमारत खुश बहुत है…

    *हरिवंश राय बच्चन*-

    किस उलझन से क्षुब्ध आज
    निश्चय यह तुमने कर डाला
    घर चौखट को छोड़ त्याग
    चढ़ बैठी तुम चौथा माला
    अभी समय है, जीवन सुरभित
    पान करो इस का बाला
    ऐसे कूद के मरने पर तो
    नहीं मिलेगी मधुशाला

    *प्रसून जोशी*-

    जिंदगी को तोड़ कर
    मरोड़ कर
    गुल्लकों को फोड़ कर
    क्या हुआ जो जा रही हो
    सोहबतों को छोड़ कर

    *रहीम*-

    रहिमन कभउँ न फांदिये, छत ऊपर दीवार
    हल छूटे जो जन गिरि, फूटै और कपार

    *तुलसी*-

    छत चढ़ नारी उदासी कोप व्रत धारी
    कूद ना जा री दुखीयारी
    सैन्य समेत अबहिन आवत होइहैं रघुरारी

    *कबीर*-

    कबीरा देखि दुःख आपने, कूदिंह छत से नार
    तापे संकट ना कटे , खुले नरक का द्वार”

    *श्याम नारायण पांडे*-

    ओ घमंड मंडिनी, अखंड खंड मंडिनी
    वीरता विमंडिनी, प्रचंड चंड चंडिनी
    सिंहनी की ठान से, आन बान शान से
    मान से, गुमान से, तुम गिरो मकान से
    तुम डगर डगर गिरो, तुम नगर नगर गिरो
    तुम गिरो अगर गिरो, शत्रु पर मगर गिरो।

    *गोपाल दास नीरज*-

    हो न उदास रूपसी, तू मुस्काती जा
    मौत में भी जिन्दगी के कुछ फूल खिलाती जा
    जाना तो हर एक को है, एक दिन जहान से
    जाते जाते मेरा, एक गीत गुनगुनाती जा

    *राम कुमार वर्मा*-

    हे सुन्दरी तुम मृत्यु की यूँ बाट मत जोहो।
    जानता हूँ इस जगत का
    खो चुकि हो चाव अब तुम
    और चढ़ के छत पे भरसक
    खा चुकि हो ताव अब तुम
    उसके उर के भार को समझो।
    जीवन के उपहार को तुम ज़ाया ना खोहो,
    हे सुन्दरी तुम मृत्यु की यूँ बाँट मत जोहो।

    *हनी सिंह*-

    कूद जा डार्लिंग क्या रखा है
    जिंजर चाय बनाने में
    यो यो की तो सीडी बज री
    डिस्को में हरयाणे में
    रोना धोना बंद कर
    कर ले डांस हनी के गाने में
    रॉक एंड रोल करेंगे कुड़िये
    फार्म हाउस के तहखाने में.

    5 मिनट के बाद वो उठी और बोली —
    चलो बाल तो सूख गए अब चल के नाश्ता कर लेती हूं..

    हिन्दी प्रेमियों के लिए (copied)

    Reply
  • January 17, 2019 at 10:33 pm
    Permalink

    जिन लोगो ने स्वर्गीय रविंदर कालिया सर की ” ग़ालिब छूटी शराब ” संस्मरण किताब पढ़ी हे वो जानते ही होंगे की ” ग़ालिब छूटेगी शराब पर ना छूटेगी ये किताब ” इसके आलावा भी रविंदर कालिया और ममता जी यानि कालिया दम्पति का संस्मरण लेखन में इनका कोई जोड़ नहीं हे खेर इनके सनसमरण में इलाहबाद और रानी मंडी का का जिक्र काफी हे सो कल जब इलाहबाद था तो मन में चाह ही थी रविंदर सर की निशानिया देखी जाए हम लोग कोई कपूर खानदान के आज के ज़ाहिलो ज़लीलो की तरह नहीं हे जो करोड़पति होते हुए भी अपने पुरखो की धरोहर बेच खाये मुझे तो अपने पुरखो अपने बुजुर्गो -बड़ो की निशानियाँ देखना सुनना जीना पढ़ना फील करना बेहद पसंद हे लेखक होने के नाते रविंदर सर मुझे अपने बड़ो से ही लगते हे उधर ज़हरीली मोदी योगी सरकार ने सिर्फ चुनाव जीतने की खातिर हज़ारो वर्ष पुरानी परम्परा तोड़फोड़ कर ज़बर्दस्ती अर्ध कुम्भ को कुम्भ बना दिया हे सो रिक्शे थ्री विहीलर वालो से जमकर लुटते हुए भी उनकी निशानिया कर्मस्थली प्रेस घर ढूंढने की कोशिश में लग गया एक बार रानी मंडी पंहुचा तो वकील साहब का फोन आ गया सो वहाँ से भागा मुकदमे से जुड़ा इतना भारी बैग साथ था जिसे उठाते उठाते मेरे हाथ छील गए मगर शाम को फिर आ धमका रानी मंडी गलती हो गयी की दिल्ली से ही ममता कालिया मेडम का नंबर लेकर नहीं चला लेकिन किताब से याद ही था की शबखून उर्दू पेपर के सामने सर का प्रेस और घर था अब शबख़ून ढूँढना था तो दिल्ली में अपने पुराने शिया किरायेदार को फोन लगाया जो रानी मंडी का ही मूल निवासी हु बता दू की उस किरायेदार ने मेरा बहुत खून पिया था मेरी मदर पीछे पड़ी रहती थी की तू उसे कुछ कहता क्यों नहीं मगर में उसे बहुत कोपरेट करता था सिर्फ इसलिए की वो हमारे बड़े रविंदर सर के इलाके से था खेर उसने बताया की बच्चा जी धर्मशाला की ठीक सामने शबख़ून का ऑफिस था जो जाहिर हे अब नहीं हे तो खेर वहाँ पंहुचा और अंदाज़े से एक पुराना मकान गोदाम टाइप मुझे बिलकुल वैसा लगा जैसा की ग़ालिब छूटी शराब में बेहद रोचक बताया गया ही हे मेने जल्दी जल्दी दो तीन फोटो खींचे ज़्यादा ढंग से देख और महसूस नहीं कर पाया ना फोटो ले पाया क्योकि लोग मुझे अजीब ढंग से देख रहे थे में हमेशा black चश्मा भी लगाता हु धुप में हमेशा , लोग मुझे देख रहे थे मोदी योगी का ज़हरीला टाइम हे मोब लिंचिंग का दौर हे सो मेने कोई जोखिम नहीं लिया और खिसक लिया में बेहद खुश था की मेने रविंदर सर की कर्मस्थली देखी जहा से ग़ालिब छूटी — लिखी गयी – और किताब के दो तीन और फैन को वो फोटो भेज दिया फिर 5 खुसरो बाग़ रोड भी ढूंढने की कोशिश की मगर कोई पता नहीं चला 5 खुसरो बाग़ रोड वो बंगला जहा उपेन्दर नाथ अश्क़ जी रहते थे जिन पर रविंदर सर ने ज़बर्दस्त हास्य सनसमरण लिखे हुए हे खेर आज दिल्ली पंहुचा तो ममता जी का नंबर ढूंढ कर उन्हें फोटो भेजकर उनसे पूछा की मेडम यही हे ना रविंदर सर का आपका घर और प्रेस जहा के इतने किस्से हे वज़रपात हुआ उन्होंने बताया की उनका घर और प्रेस तो नए मालिक ने खरीद कर तोड़ दिया था हलाकि इलाका ठीक वही था उन्होंने ये भी बताया की अश्क़ जी का बग्ला भी अब नहीं हे , जानकर बहुत दुःख हुआ काश कालिया जी और सभी लेखकों की कर्म स्थली सुरक्षित रखे जाने वाला समाज होता

    Reply
  • August 28, 2020 at 10:50 pm
    Permalink

    ‎Neelima Pandey‎ to जन विचार संवाद ग्रुप
    1h
    फ़िराक़ गोरखपुरी
    ——————————-

    (1) “एक बार जब फ़िराक़ दिल्ली गए तो सेना के एक रिटायर्ड अधिकारी कर्नल ख़ाँ के यहाँ ठहरे । कुछ सालों बाद वही कर्नल उनके इलाहाबाद वाले घर पर तशरीफ़ लाए । फ़िराक़ उन्हें पहचान नहीं पाए। जब कर्नल ने उन्हें बताया कि वो दिल्ली से आए हैं तो फ़िराक़ ने उनसे पूछा क्या आप वहाँ किसी कर्नल ख़ाँ को जानते हैं?”

    “कर्नल ने कहा मैं वहीं शख़्स हूँ जिसके साथ आप एक हफ़्ते दिल्ली में ठहरे थे. फ़िराक़ ने उनसे कहा, आप दरवाज़े के पास पड़ी चप्पल उठाइए। हतप्रभ कर्नल ने चप्पल उठा ली और पूछा मैं इसका क्या करूँ? फ़िराक़ ने उनके सामने अपना सिर झुकाया और कहा, मेरी गुस्ताख़ी के लिए मेरे सिर पर ये चप्पलें आप तब तक मारिए जब तक आप थक न जाएं। मैं इतना अभद्र कैसे हो सकता हूँ कि आपकी मेहमान नवाज़ी भूल जाऊँ!”

    (2) फ़िराक़ जवाहरलाल नेहरू की बहुत इज़्ज़त करते थे. 1948 में जब नेहरू इलाहाबाद आए तो उन्होंने फ़िराक़ को मिलने के लिए आनंद भवन बुलवा भेजा।

    फ़िराक़ के भांजे अजयमान सिंह, उन पर लिखी अपनी किताब, “फ़िराक़ गोरखपुरी-ए पोएट ऑफ़ पेन एंड एक्सटेसी’ में लिखते हैं, “फ़िराक़ को उस समय बहुत बेइज़्ज़ती महसूस हुई जब रिसेप्शनिस्ट ने उनसे कहा कि आप कुर्सी पर बैठें और अपना नाम पर्ची पर लिख दें. ये वही घर था जहाँ उन्होंने चार सालों तक नेहरू के साथ काम किया था। इस बार वो पहली बार प्रधानमंत्री के तौर पर इलाहाबाद आए थे और उन्हें उनसे मिलने के लिए इंतज़ार करना पड़ रहा था। ”

    “फ़िराक़ ने पर्ची पर लिखा रघुपति सहाए ।
    रिसेप्शनिस्ट ने दूसरी स्लिप पर आर सहाए लिख कर उसे अंदर भिजवा दिया । पंद्रह मिनट इंतज़ार करने के बाद फ़िराक़ के सब्र का बाँध टूट गया और वो रिसेप्शेनिस्ट पर चिल्लाए । मैं यहाँ जवाहरलाल के निमंत्रण पर आया हूँ । आज तक मुझे इस घर में रुकने से नहीं रोका गया है । बहरहाल जब नेहरू को फुर्सत मिले तो उन्हें बता दीजिएगा… मैं 8/4 बैंक रोड पर रहता हूँ। ”

    “ये कह कर वो जैसे ही उठने को हुए नेहरू ने उनकी आवाज़ पहचान ली। वो बाहर आ कर बोले, रघुपति तुम यहाँ क्यों खड़े हो? अंदर क्यों नहीं आ गए । फ़िराक़ ने कहा, घंटों पहले मेरे नाम की स्लिप आपके पास भेजी गई थी । नेहरू ने कहा, पिछले तीस सालों से मैं तुम्हें रघुपति के नाम से जानता हूँ । आर. सहाए से मैं कैसे समझता कि ये तुम हो? अंदर आकर फ़िराक़ नेहरू के स्नेह से बहुत अभिभूत हुए और पुराने दिनों को याद करने लगे । लेकिन एकदम से वो चुप हो गए। नेहरू ने पूछा, तुम अभी भी नाराज़ हो?

    फ़िराक़ , मुस्कराए और शे’र से जवाब दिया-

    “तुम मुख़ातिब भी हो, क़रीब भी हो
    तुमको देखें कि तुम से बात करें”

    (संकालित)

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *