स्थायी झल्लाहट के शिकार थे इक़बाल — फ़िराक़ गोरखपुरी

Allama-Iqbal

16 मार्च 1965 शौक : कर्प्या इकबाल की शायरी के सम्बन्ध में अपने विचार तर्कपूर्ण ढंग से सविस्तार व्यक्त करने का कष्ट करे फ़िराक़ : ————- इक़बाल की शायरी शुरू से ही एक ऐसी शानदार बौद्धिकता और व्यक्तित्व का सबुत दे रही थी जिसे हम अंग्रेजी में split personailty ( विभक्त व्यक्तित्व ) कहते अर्थात एक ऐसा व्यक्तित्व जो दो भागो में बँट गया हो वे दो भाग एकदूसरे के उल्ट थे उनमे परस्पर विरोध और टकराव था इस व्यक्तिव का एक भाग हिंदुस्तान प्रेमी था और दूसरा भाग इस्लाम का समर्थक या साम्प्रदायिक . इक़बाल अपने व्यक्तिव के अंतर्द्वंद से काफी परेशान दिखाई देते हे इस व्यक्तिव का भारत प्रेमी भाग तो उनसे ऐसे बयानात दिलवाता हे सारे जहा से अच्छा हिंदुस्तान हमारा और दूसरा साम्प्रदायिक निष्ठा वाला भाग यह कहलाता हे मुस्लिम हे हम वतन हे सारा जहाँ हमारा

मानो गैर मुस्लिम सारे विश्व को अपना देश ही नहीं समझ ही नहीं सकते . वे अपने देशानुरागी भाग की रागनी तो कभी कभी अलाप जाते हे , लेकिन इस देशप्रेम से वे कोई गहरे या दूरगामी अथवा मानवीय निष्कर्ष प्राप्त नहीं कर पाते हे . बहुत से महत्वपूर्ण यथार्थ जो कदापि मात्र इस्लामी यथार्थ नहीं हे उन्हें वे केवल इस्लामी यथार्थ माने और मनवाने का निष्फल प्रयास उम्र भर करते रहे . अब इक़बाल की शायरी वर्तमान शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक में कदम रखती हे भारत के नवजागरण का दोपहर का सूर्य इस जमने में अपनी पूरी ऊंचाई पर हे . और इस नई जाग्रति से इक़बाल प्रभावित भी हे और साथ ही भयभीत भी वे इस ज़माने को अपनाना भी चाहते हे और यह भी अनुभव भी करते जाते हे की यह जमाना हिंदुस्तान से बाहर कही भी इस्लामी जमाना नहीं हे और न ही इस्लामी विचारधारा की बुलंदी का जमाना हे यह बात सोच कर इक़बाल एक स्थायी झल्लाहट और कचकचाहट का शिकार हो जाते हे . यही से उनकी शायरी एक दांत पिसती हुई शायरी दिखाई पड़ती हे इस ज़माने के तसव्वुर से बेहद परेशान होकर इक़बाल अपने आपको या अपनी साम्प्रदायिक निष्ठा को भांति भांति के बहलावे देते नज़र आते हे देशप्रेमी इक़बाल का इस ज़माने में देहांत हो चूका हे और इक़बाल इसे अपने हाथो दफना चुके हे . इस दौरान इक़बाल ने अपने साम्प्रदायिक प्रेम के औचित्य में खुदी और बेखुदी के दर्शन का एक अविष्कृत प्रकार का आडम्बर रचा . इस ज़माने में उन्होंने उर्दू शायरी को स्थगित कर दिया था और फ़ारसी जबान की शायरी शुरू कर दी थी खुदी और बेखुदी के तथाकथित दार्शनिक सिद्धांतो को व्यापकता देने में वे अपने सभी हथकंडे अपनाते थे . इस शरी में बहुत से ऐसे टुकड़े मिलते हे जिनसे व्यक्ति किसी धर्म और सम्प्रदाय के भेदभाव के बिना प्रभावित और प्रेरित हो सकता हे वे इन टुकड़ो से खुदी के दर्शन के मूल रूप से गलत तस्स्वुर को सजाते हे अर्थात तर्क तो बहुधा खूबसूरत हे लेकिन नतीज़ों की तान इस्लामी साम्प्रदायिक वरीयता पर टूट्ती हे .

—————-इक़बाल ने यह बताने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया की गैर इस्लामी तमाम सम्प्रदायों और पाश्चात्य दर्शन में मानवता की भलाई के लिए कुछ भी नहीं हे इस सम्बन्ध में में कुछ सवाल आप से आप उठ जाते हे जिनका कोई उत्तर उन्होंने नहीं दिया ———————— इक़बाल अपनी शायरी को कर्म और गतिशीलता का सन्देश बताते हे क्या उन्हें इस सचाई से इंकार होगा की हिंदुस्तान का गैर मुस्लिम भाग कर्म और गतिशीलता की जाग्रति में मुसलमानो से किसी प्रकार से भी कम या पीछे हे ? क्या उनकी शायरी ने मुसलमानो में कोई ऐसी योग्यता विवेक या जाग्रति पैदा कर दी , जिससे हिन्दू समाज वंचित हे ? क्या समस्त इस्लामी जगत की जाग्रति इकबाल की रचनाओ की ऋणी हे ? इक़बाल यह समझ ही नहीं सकते थे की देश की जाग्रति उस ज़माने में शायरी के दुआरा पैदा की ही नहीं जा सकती थी और न ही देश की जाग्रति के पुरोधा , शायरी से प्रभावित होकर कर्मभूमि में उतरते थे .शायरी और अदब का उद्द्शेय वही बन चूका हे जिसका पता हमें इक़बाल के अलावा दुनिया के बड़े बड़े साहित्यकारों की रचनाओ में पता चलता हे . में यह नहीं कहता की राष्ट्र या देश की जाग्रति में अदब और शायरी का कोई योगदान ही नहीं . लेकिन जाग्रति और कर्म के आकर्षक नारो या दो शब्दों वाल;इ नारो से कोई बड़ा साहित्यकार देश या राष्ट्र में जाग्रति नहीं पैदा किया करता आज दुनिया के बड़े अदब ने जिस जाग्रति को पैदा किया हे वह इक़बाल के प्रकार का साहित्य नहीं हे और न ही खुदी के दर्शन वाला साहित्य हे —————————————————————–लेकिन ग़ालिब के शब्दों में दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा हे

पांचवा सवाल : इकबाल दूसरे गुमराह भारतीय मुसलमानो की तरह इस्लामी विजयो और गैर इस्लामी देशो में इस्लाम के प्रचार और प्रसार के पुराने अफसानों से ख़ुशी से झूम उठते हे और फिर उसी दुनिया को वापस लाने या उसी रूप में इस्लाम को जीवित रखने का स्वपन देख देख कर आत्मविभोर हो जाते हे . अब इनसे कौन पूछे ——————————————————-इसलिए इकबाल का यह दावा बहर- ए जुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हमने एक अत्यंत हास्यापद दावा हे उस समय यह दावा और भी हास्यपद हो जाता हे जब इसे खुदाय – दो आलम के दरबार में इस उद्द्शेय और इरादे से पेश किया जाता हे की हमें फिर इस काबिल कर दे की तौहीद के नाम पर हम फिर गैर मुसलमानो को ख़त्म कर दे इस दावे की सचाई को प्रकट करता हे ; काट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर हमने

इकबाल के कलाम का सिर्फ एक असर पैदा हो सकता हे की बड़े ऊँचे स्वर में और बड़ी शालीनता के साथ प्रस्तुत अनेक तर्कों में इकबाल ने सिर्फ इस बात की कोशिश की हे की उनकी शायरी से जो मुस्लमान प्रभावित हो वे दुनिया की गैर मुस्लिम आबादी से सदा सदा के लिए अपने आप को अलग समझे और उन्हें अपना स्थायी शत्रु बना ले . क्या यह मुसलमानो को गुमराह करना नहीं हे ? इक़बाल पर जितनी किताबे अब तक लिखी गयी हे उनमे से किसी एक किताब में भी यह बात नहीं बताई गयी और न ही इन किताबो के लिखने वालो को यह बात बताने का सहस हुआ की इक़बाल विश्व वयवस्था के मामलो में और विश्व राज़नीति के मामले में क्या दर्ष्टिकोण था ? कोई यह बात बताता भी कैसे ? जब इक़बाल खुद फरमा चुके हे – शमशीर औ सीनां अव्वल ताऊस औ रबाब आखिर ( तलवार और भाले की नोक पहले संगीत और नृत्य बाद में . इकबाल का कोई भी प्रशंसक यह नहीं बताता की क्या सारी दुनिया मुस्लमान हुए बिना अपनी भलाई और सुरक्षा की क्षमता रखती हे और जिंदगी में उच्च लक्ष्यों को प्राप्त कर सकती हे . ? ये कुछ ऐसे सवाल हे जिनसे छुटकारा पाना असम्भव हे . साहित्य की अदालत इकबाल और उसके अनुयायियों को उस वक्त तक बरी नहीं कर सकती जब तक वे इन सवालो का साफ़ साफ़ जवाब न दे . समझ नहीं आता की इक़बाल किसी चुस्ती चाहते हे ? किसी क्रिया किसी गतिशीलता किसी दुनिया कैसी ‘ खुदी ‘ और किसकी ‘ खुदी ‘ ? ———– रही बात साहित्यिक और कलात्मक सौंदर्य की . यहाँ भी मीर ग़ालिब और अनीस में साहित्यिक सौंदर्य इकबाल से कही अधिक हे क्या इकबाल की भाषा और अभिवियिक्ति शैली में जो विशेषताए मिलती हे वे शेक्सपियर मिल्टन वर्डस्वर्त किट्स शेले होमर वर्जिल दाँते गोयटे टॉलस्टाय बार्क बेकन और कालिदास के काव्य में मिलने वाली विशेषताओ से कुल मिलाकर कम नहीं हे ? हां पिछली एक शताब्दी से उर्दू अदब की अल्प समर्द्धि को देखते हुए अपेक्षाकरत विचारणीय अवश्य हे लेकिन विश्व साहित्य से परिचित कोई भी विधार्थी इकबाल के कलात्मक सौंदर्य से भी प्रभावित नहीं हो सकता .

( वाणी प्रकाशन से प्रकाशित सुमत प्रकाश ‘ शौक ‘ की पुस्तक ‘ गुफ्तगू फ़िराक से ‘ ( फ़िराक गोरखपुरी से बातचीत 1959 -1976 से साभार )

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9 thoughts on “स्थायी झल्लाहट के शिकार थे इक़बाल — फ़िराक़ गोरखपुरी

  • February 15, 2016 at 6:27 pm
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    मुझे तो उर्दू नहीं आती हे मगर एक दिन मेरा अलिगेरियन कज़िन बड़ी रवानगी से मुझे इकबाल साहब का जवाब ए शिकवा पढ़ कर सूना रहा था वाकई कमाल की ज़बदस्त शायरी हे जिसका कोई जवाब नहीं अधभुत मदहोश कर देने वाली कहते हे की हिटलर भी जबरदस्त वक्ता था जो जनसमूह को पूरी तरह से बहा कर ले जाता था इसी तरह इकबाल भी बहुत सो को बहाकर ले गए चाहे वो अलीगढ यूनिवर्सिटी के पढ़े लिखे नौजवान हो या जिन्ना साहब हो जिन्ना साहब अच्छा खासा बीवी की मौत के बाद यूरोप बस गए थे इकबाल साहब ही थे जिन्होंने जिन्ना साहब को पाकिस्तान बनाने वाला कायदे आज़म बनाया था पाकिस्तान अब बन चूका हे वो भी फले फुले हमें इससे कोई ऐतराज़ नहीं हे मगर फिर कोई इकबाल या जिन्ना भारतीय मुस्लिमो में नहीं आने चाहिए ऊपर से आज हालात ऐसे हे की हिन्दूकठमुल्लाओं की फ़ौज़ हिंदुस्तान में इतिहास की सबसे मज़बूत पोजीशन का आनंद ले रही हे ऐसे में ये लेख और जरुरी हे इसलिए ”साभार ” पेश हे

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  • February 16, 2016 at 9:30 am
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    असगर अली इंजिनियर अपनी किताब इस्लाम का जन्म और विकास के अंत में लिखते हे की ” डा इकबाल जैसे आदर्शवादी इस्लाम के पहले ३० वर्षो में मौजूद समाज की तर्ज़ पर एक इस्लामी समाज कायम करने में पक्का विशवास करते हे ये आदर्शवादी ऐतिहासिक शक्तियों को पूरी तरह से अनदेखा करते हे ——————— इस्लामी भाईचारा इन आदर्शवादियों का गढ़ा हुआ एक और मिथक हे आरम्भ से ही इस्लामी समाज वर्गों और श्रेणियों में बटा हुआ रहा हे ————– हमरे दौर में जो लोग इस्लामी भाईचारे की बात करते हे वे भी सामजिक वास्तविकताओं से तथा समाज के विभिन भागो और वर्गों के बीच मौजूद आपसी टकराव से अनजान हे इसलिए ये कहना शुद्ध आदर्शवाद होगा की मुक़्क़मल भाईचारा सिर्फ धर्म के आधार पर कायम किया जा सकता हे जो ऐसे भाईचारे को जारी रखने के लिए आवशयक दशा तो हो सकती हे पर्याप्त दशा नहीं हो सकता सामान्य धर्म और विशेषकर इस्लाम का इतिहास इसे साफ़ साबित करता हे लेकिन तथ्यों के नाक के सामने होते हुए भी इस्लाम के पैरोकार इस्लामी भाईचारे के मिथक को बने रखने की कोशिश करते आये हे मेरी राय में इस्लाम के ये पैरोकार उसके लक्ष्यों की सेवा नहीं कर रहे हे ———————

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  • December 15, 2016 at 4:55 pm
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    Tabish Siddiqui13 December at 16:02 · वही लोग ओवैसी से इस वक़्त उसके सांप्रदायिक बयान को ले कर चिढ़े हुवे हैं जिन्होंने उसे चुना ही सांप्रदायिक धुर्वीकरण के लिए है.. ये बताईये कि आपने ओवैसी को इतनी शोहरत दी किसलिए थी अभी तक? उनको चढ़ाया ही इसी लिए है आपने कि वो बस आपके क़ौम की और मज़हब की बात करें.. तो वो कर रहे हैं.. वो वैसे भी सिर्फ अपने क़ौम की ही बात करते हैं.. जिस काम के लिए आपने उन्हें चुना है वो कर रहे हैंआपको हर जगह मज़हब चाहिए होता है.. कोई भी बुद्धिजीवी जो मज़हब से इतर आपसे बात करे आपको बर्दाश्त नहीं होता है.. और सब छोड़िये आपको तो शायर भी वही पसंद आते हैं जो क़ुरान के हवाले से शेर कहे और हदीसों के हिसाब से ग़ज़ल लिखे.. तभी आप अल्लामा इक़बाल को रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं.. किसी और शायर को आपने कभी रहमतुल्लाह अलैह कहा है? ये जानते हुवे भी कि भारत के विभाजन में उनका कितना बड़ा हाथ था.. आप उन्हें रहमतुल्लाह अलैह बोलते हैं जो कि किसी सूफी संत को बोला जाता हैकिस लिए पसंद करते हैं आप अल्लामा को? आपको उनके शेर भी समझ आये हैं कभी? मगर आपने ये सुन लिया कि इक़बाल क़ुरआन पढ़ के शेर लिखते थे बस आप फ़िदा हो गए.. और आपके कट्टर बुद्धिजीवी जानते हैं कि वो कितने घोर सांप्रदायिक थे इसलिए उन्होंने उनके आगे रहमतुल्लाह अलैह लगा दिया और आप ले उड़े उसे.. ग़ालिब और मीर को आप कभी रहमतुल्लाह अलैह कहिएगा? अब्दुस्सलाम को कभी रहमतुल्लाह अलैह कहिएगा? क्योंकि अब्दुस्सलाम ने ये कभी नहीं कहा कि उन्होंने क़ुरआन पढ़ के भौतिक विज्ञान में नोबेल जीता.. और वैसे भी कैसे कहिएगा क्यूंकि वो अहमदिया मुस्लिम थेरग रग में आपके संप्रदायवाद बसा है.. ओवैसी से पहले दिन ही आपने विरोध क्यों नहीं दर्ज कराया था जब उसने अपनी पार्टी का नाम “मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन” रखा था? क्यों नहीं आपसे उसने कहा कि इस पार्टी में हिन्दुवों, सिखों, ईसाईयों और पारसियों की भी जगह होनी चाहिए.. क्यूँ मुसलमानो की पार्टी बना रहे हो? हम भारत में हैं जहाँ तरह तरह के फूल हैं और तुम सिर्फ गेंदा का फूल लगाओगे बाग़ में अपने?एटीएम क्या.. वो तो रोड भी मुसलमानो की अलग करेगा और हवाई पट्टी भी.. क्यूंकि आपको चाहिए ही वही.. आपको कभी नेता, बुद्धिजीवी चाहिए ही नहीं..आपको सिर्फ और सिर्फ मौलाना चाहिए.. गज़ भर दाढ़ी वाला जो आपको और गर्त में पहुंचाता जाय और आपकी हर बेवकूफ़ी पर सुब्हान अल्लाह, मॉशा अल्लाह कहता रहे और हाँ में हाँ मिलाता रहेTabish Siddiqui

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    • December 16, 2016 at 11:34 am
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      गज भर दाढ़ी ? हमने तो किसी भी मौलाना के नहीं देखि ?
      एक फुट की ही लिख देते
      ओवेसी की भी दाढ़ी कुछ इंच की है
      हम ओवेसी केइलाके में रहते है
      ओवेसी बंधू भी पुराने हैदराबाद में नहीं अपने निर्वाचन क्षेत्र में नहीं
      बल्कि दूर बंजारा हिल्स में रहते है
      गनीमत है की अभी उन्होने यह नहीं कहा की
      हैदराबाद का हवाई अड्डा मुस्लिम बस्ती से दूर क्यों बनाया गया
      इससे मुस्लिमो के साथ भेद भाव दीखता है
      और
      केवल सभी रेले हैदराबाद स्टेशन से आरंभ की जाये सिकंदराबाद और कांचे गुडा का नम्बर बाद में रहे
      दाढ़ी
      हमने अपने जीवन में एक सरदार जी की दाढ़ी काफी लम्वी देखीं थी
      उनका कद भी लम्बा था और उनकी दाढ़ी पैर के अंगूठे को आसानी से छु लेती थी
      यानि एक गज से काफी लम्बी
      वह सरदार जी अभी भी जीवित है
      कुछ दिन पहले ही इसी माह उनसे मुलाकात हुयी थी

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    • December 21, 2016 at 6:12 pm
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      Shamshad Elahee Shams
      17 hrs ·
      जो लोग माता पिता बन चुके हैं उन्हें अपने बच्चों के नाम रखने की कवायत का इल्म अच्छे से होगा. किसी भी सजग माता पिता के लिए वह समय बेहद स्वर्णिम क्षणों का बायस होता है जब वह अपनी औलाद के लिए कोई शब्द चुनता है. वह शब्द उसकी सोच, मूल्यों और चरित्र का परिचायक होता है जिसे वह अपने बाद दुनिया में उसका नाम चलाने वाले के लिए खुद सोच समझ कर चुनता है. सिर्फ एक शब्द उसके पूरे जीवन का मूल्य सिद्ध कर देता है. एक नवाब का बेटा, मुम्बैय्या फिल्मो का हीरो २१वी सदी में मध्यकाल के एक लुटेरे के नाम से अपनी आल चलाने का फैसला लेता है, लेकिन मां की सहमति पर मैं अचंभित हूँ और क्षुब्ध भी. उसके पुरखों ने हिन्दुस्तान में चने – गुड खा खा कर रंगमंच की स्थापना की थी हिन्दोस्तान को पृथ्वी थियेटर दिया था. इंसान का काहिल होना भी उसे किस हद तक जाहिल बना देता है.Shamshad Elahee Shams

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  • November 17, 2017 at 10:53 am
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    Syed Faizan Siddiqui
    9 November at 15:39 ·
    #अल्लामा_इक़बाल_और_मुस्लिम_नौजवान
    फ़क़ीर सैयद नजमुद्दीन किसी प्रोग्राम में शिरकत के लिए लाहौर आए, अल्लामा इक़बाल भी वहां मौजूद थे, फ़क़ीर साहब के साथ उनका अनपढ़ मुलाज़िम भी था .. उससे मुखातिब होकर फ़क़ीर साहब ने कहा .. देखो – ये वही ‘डॉक्टर इक़बाल’ हैं जिनका में अक्सर ज़िक्र करता रहता हूँ .. फ़क़ीर साहब कुछ देर के लिए वहां से उठकर चले गए, मुलाज़िम ने अल्लामा को अकेला देख बड़े अदब से कहा…. डॉक्टर साहब मेरे पेट में अक्सर दर्द रहता है, कोई दवाई हो तो अभी दे दो, या पर्चे पर लिख दो .. हक़ीक़त ये है कि नई नस्ल अल्लामा को ऐसे ही समझ रही है…
    कभी कभी सोचता हूँ अल्लामा क्या थे ? इस सवाल के जवाब में अपनी अक़्ल को कल्पना की असीम वादियों में आज़ाद छोड़ देता हूँ, ताकि वो कुछ फैसलाकुन नतीजा तलाश लाए, लेकिन मेरी कोशिशें अल्लामा को समझने में हमेशा नाकाम रही हैं, थक हार कर माहिरीन ए इक़बालियात के भरोसे रहता हूँ…
    लेकिन जब इक़बालियात पर लिखी हुई किताबो में मगज मारी करता हूँ तो अक्सर को अपने जैसा लाचार पाता हूँ, इक़बाल मज़हबी, वतन परस्त, फलसफी, स्कॉलर, शायर, विचारक, सूफी, क्या है ? अल्लामा की ज़िंदगी पर तहक़ीक़ करने वाले उनके बहुत से रूप देखते हैं, हक़ीक़त ये है कि अल्लामा अबक़री (genius) शख्सियत के मालिक हैं.. अगर उनके फिक्र ओ फन का एक सिरा हाथ आता है तो दूसरा छूट जाता है…
    अल्लामा की तालीम उन्ही स्कूल कॉलेज और यूनिवर्सिटीज के हुई है जहां जाकर अक्सर नौजवान अपने आपको अक़्ल के हवाले करके तमाम अख़लाक़ी व इमानी बन्धनों से आज़ाद हो जाते हैं, ताज्जुब है कि अल्लामा उन्ही खतरनाक वादियों से आबे हयात तलाश कर लाए जहाँ से अक्सर ज़हरे हलाहिल पीकर लौटते हैं.. अल्लामा ने वहां से सब कुछ हासिल किया जहां अक्सर लुटपिट कर आते हैं…
    अल्लामा एक तरफ वतन के गीत गाते हैं तो वो गीत अमर हो जाता है, बच्चो के लिए लिखते हैं तो बच्चे उन्हें बच्चा समझ बैठते हैं, कभी वो ज़बूर ए अजम, असरार ए खुदी, रमुज़ ए बेखुदी में फारसी को अपनी फिक्र व काविश का मैदान बनाते हैं, खुतबात में कलाम करते हैं तो फलसफे के समुंदर में गौता ज़नी करते हुए नज़र आते हैं, वो महज़ शायर नही हैं, जैसा कि उन्होंने कहा था..
    “मेने कभी अपने आपको शायर नही समझा, फने शायरी से कोई दिलचस्पी नही रही, हां ! बाज़ मक़ासिद ए खास रखता हूँ, जिनके बयान के लिए हालात व रिवायात की रु से मैने नज़्म का तरीका इख्तियार किया है”
    अल्लामा का कलाम ‘कमाल’ से भरपूर नज़र आता है, उन्होंने शे’र व सुखन की जिस वादी में क़दम रखा वो उसके मर्द ए मैदान नज़र आये, यक़ीनन वो शायरी की रिवायती पगडंडी इश्क़ व हुस्न की वादियों में मेहबूब की ज़ुल्फ़ व रुखसार को अनोखे अंदाज से देख और दिखा सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी शायरी को क्रांति व इन्किलाब जैसे खुश्क विषय के लिए वक़्फ़ किया, फिर ये क़ौमी व मिल्ली शायरी महज़ शायरी नही रही .. बिला मुबालगा उन्हीने अपनी फ़ितरी शायराना सलाहियत, और फलसफे में क़ुरआन के पैगाम ए खुदा परस्ती को पेश किया है..
    अल्लामा की शायरी दर असल एक मजाज़ी पीरे जहाँदीदा की आह व ज़ारी है, जो वो अपनी लुटती पिटती क़ौम को जगाने के लिए कर रहा है, उनकी शायरी वैचारिक रूप से लागर व कमज़ोर मुस्लिम नौजवान के लिए उम्मीद का रौशन चिराग है .. अक्सर शायरी गुज़रते वक़्त के साथ अपनी आखरी उम्र को पहुंच जाती है, अपनी कमज़ोरी का इक़रार करके तेज़ रफ़्तार ज़माने के साथ चलने से इनकार कर देती है, लेकिन इक़बाल की शायरी को जब जब देखा समझा जाता है, ताज़गी चमक दमक तवानाई से भरपूर नज़र आती है, ये वो करिश्माई तलवार है जिसे रफ्तार ए ज़माना अभी तक जंग आलूद नही कर सका…
    लेकिन खालिस शायरी किसी तब्दीली का जरिया नही बन सकती, शायरी सिर्फ एहसास करा सकती है, अल्लामा ने अपनी कोशिश में कमी नही की, लेकिन अल्लामा के क़द्रदानों ने उनपर किताबे मज़मून तो लिखे, उनके नाम पर अकेडमियाँ बनाईं, लेकिन उनके असल पैगाम को फरामोश कर दिया.. अल्लामा का ख्वाब पूरा करने के लिए अल्लामा के क़द्रदानों को चाहिए कि अक्सर मुस्लिम नौजवान अल्लामा को पढ़ और समझ सकें…
    Hasan Rana

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  • July 17, 2018 at 10:00 pm
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    Jitendra Narayan
    Yesterday at 17:41 ·
    आरएसएस की बाँझ विचारधारा है,उसमें रहकर सृजन और कलासृजन संभव नहीं है। संघ में रहकर मुनाफा पैदा कर सकते हो, मोटा धन कमा सकते हो,एक के तीन बना सकते हो। अच्छे गुण्डे,माफिया बन सकते हो !लेकिन बेहतरीन लेखक, कलाकार, संगीतकार और अच्छे मनुष्य नहीं बन सकते।
    आरएसएस जन्म से उलटा पुलटा संगठन रहा है , यह बात अपने आपमें प्रमाण है कि उसमें सृजनक्षमता नहीं है।
    मसलन्, क्या आप पाँच बडे शास्त्रीय संगीतकारों और फ़िल्मी संगीतकारों के नाम बता सकते हैं जो कभी युवापन में संघ की शाखा में गए या जिनकी कला संघ से प्रभावित थी ! क्या वजह है हर क्षेत्र के कलाकार संघ से दूर रहे और उन्होंने उदारतावादी या रेडीकल परंपरा को अपनाया?

    इसी तरह क्या हिंदी फिल्मों के पाँच निर्देशक और प्रमुख अभिनेताओं के नाम बता सकते हैं जो बचपन या तरूणावस्था में कभी आरएसएस की शाखाओं में गए हों और जिनके नजरिए पर शुरू से संघ की छाप हो!

    गाली देने,झूठ बोलने या फिर नकली को असली बताने के कौशल में आरएसएस और उनके बजरबट्टुओं का जवाब नहीं है।वे साइबर संस्कृति -संघ की वर्णशंकर पैदाइश हैं।

    गिनती के दो-तीन लेखकों के बलबूते पर हिंदी साहित्य का पेट नहीं भर सकते हैं आरएसएस वाले! हिंदी की विशाल परंपरा है, आधुनिक काल में आरएसएस के जन्म के बाद सैंकड़ों हिंदी लेखक पैदा हुए हैं,उनमें से इक्का दुक्का लेखकों को छोड़कर सभी लेखकों ने उदारतावादी या वाम विचारधारा को अपनाया।सवाल यह है लेखकों के लिए संघ की विचारधारा अपील क्यों नहीं कर पाई ?

    आरएसएस वालों और उनके भक्तों से यही कहना है कि उदारतावादियों में मार्क्सवादियों को गरियाना बंद करो। इनके बिना आप किसी भी विषय का स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा का पाठ्यक्रम नहीं बना सकते । आरएसएस दंगों और घृणा फैलाने में समृद्ध है लेकिन ज्ञान -विवेक , सामाजिकचेतना और नागरिकचेतना में दरिद्र है।

    कैमिस्ट्री , ज्योमैट्री , फ़िज़िक्स और बायोटैक्नोलॉजी के एमए के पाठ्यक्रम के हिन्दुत्ववादी कंटेंट और नजरिए पर कहीं कुछ लिखा गया हो या आरएसएस नया हिंदूवादी कोर्स कैसा हो सकता है ? आरएसएस वाले मित्र मोहन भागवत जी से मिलकर पता करके रोशनी डालें !
    आरएसएस के लोगों को बीए और एमए के सभी विषयों के पाठ्यक्रमों का तुरंत हिन्दूकरण कर देना चाहिए !!मसलन् क्या उनके पास इतने लेखक , वैज्ञानिक और अवधारणाएँ भी हैं जिनके आधार पर भारत के युवाओं को महान बनाया जा सके !

    -Jagadishwar Chaturvedi

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  • November 9, 2018 at 11:18 pm
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    Sanjay Tiwari3 hrs · अल्लामा इकबाल ने १९३० में प्रयागराज में एक भाषण दिया था। कार्यक्रम का आयोजक मुस्लिम लीग था और पहली बार यहीं इकबाल ने एक अलग इस्लामी राज्य की मांग रखी। इकबाल ने यह मांग क्यों रखी इसके इतिहास में यहां नहीं जाऊंगा लेकिन उन्होंने उसी भाषण में एक और बात कही थी। उन्होंने कहा था कि यह जो अलग इस्लामी राज्य होगा (देश नहीं) उसका आधार हिन्दुस्तानी इस्लाम होगा न कि अरबी इस्लाम।
    इकबाल का इशारा इस्लाम के भारतीयकरण की तरफ था लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों ने उनकी पहली बात ही सुनी, दूसरी वाली सुनी अनसुनी कर दी। और मुसलमानों के वकील कम्युनिस्टों ने तो उन्हें कभी याद भी नहीं करने दिया। कम्युनिस्ट नेता, बुद्धिजीवी पत्रकार उन्हें कोई भगवाकरण को दिखाकर डराते रहे कि देखो ये भगवाधारी “तुम्हारी संस्कृति” को खत्म कर रहे हैं। तुम्हारी संस्कृति का मतलब अरबी और आक्रमणकारियों की संस्कृति को ही उन्होंने मुसलमानों की संस्कृति घोषित कर दिया।

    आज योगी के दो शहरों के नामकरण से ये कौमी पत्रकार इस तरह झल्लाये हुए हैं कि कुछ भी आंय बांय सांय बोल रहे हैं। लेकिन अच्छी बात ये है कि राजनीतिक दलों को समझ आ गयी है और इनके किसी भी एजंडे पर बयान नहीं दे रहे। मुसलमान भी कमोबेश मौन है। लेकिन उसके मौन रहने से काम नहीं चलेगा। उसे समर्थन में आगे आना होगा। उसे आज नहीं तो कल हिन्दुस्तानी इस्लाम का स्वरूप सामने रखना होगा जैसा इकबाल ने नब्बे साल पहले कहा था। इसी से भारत में साझी संस्कृति और गंगा जमुना तहजीब विकसित होगा। अरबीकरण करने या उसका समर्थन करने से बिल्कुल नहीं।————————————————————————————————————————————Ashok Kumar Pandey
    19 mins · अल्लामा इक़बाल को मैं कश्मीर के संदर्भ में जानता हूँ। #कश्मीरनामा के पाठक जानते हैं कि डोगरा शासन काल वाले अध्याय के शुरू में उनका एक शेर कोट किया है मैने जिसमें वह कश्मीर की ज़मीन और जनता के बेहद सस्ते मोल डोगराओं को बेच दिए जाने की बात करते हैं। वह लगातार कश्मीर में आम जनता के शोषण को लेकर सवाल करते नज़र आते हैं।वह जो दौर था उसमें आज़ादी की आहट सुनाई देने लगी थी। इकबाल जैसे अनेक बुद्धिजीवियों के लिए नई व्यवस्था में मुसलमानों की अवस्थिति का सवाल चिंता का सबब था। जानने वाले जानते हैं कि उन्होंने मुसलमानों के किये भारत के भीतर ही अलग प्रदेश की मांग की थी। सही या ग़लत एक तरफ़ लेकिन जिस तरह उस समय की राजनीति में हिन्दू कट्टरपंथ सेकुलर लगने वाली संस्थाओं के भी भीतर पल रहा था आज़ाद हिंदुस्तान में मुसलमानों के भविष्य की चिंता ग़लत तो नहीं ही थी। गाँधी और नेहरू के आदर्शवाद के बरक्स बहुत कुछ और था…
    हम चाहते थे अल्लामा और जिन्ना और मुस्लिम लीग ग़लत साबित हों लेकिन भारत में पिछले दो दशक से जो हालात हैं उनमें जितनी बार कोई नेता पाकिस्तान जाने की बात करता है, जितनी बार किसी मुसलमान को लिंच किया जाता है उनकी चिंताएं सही साबित हो जाती हैं।
    कटु सत्य यह भी कि हिंदुओं को लेकर ऐसी बातें करने वाले अनेक तत्कालीन नेता / साहित्यकार भारत मे पूज्य देशभक्त की तरह याद किये जाते हैं और अल्लामा को सांप्रदायिक कह दिया जाता है। क्या यह सोच ही उनकी चिंता को सही साबित करने वाली नहीं है?
    ख़ैर आप सोचिएगा, अभी तो मैं उन्हें उनके जन्मदिन पर मसर्रत से याद कर रहा हूँ…उनकी अज़ीम शायरी और कश्मीर के मुताल्लिक उनके संघर्ष के लिए। बाक़ी परफ़ेक्ट तो कौन है।————————————–

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  • November 9, 2018 at 11:49 pm
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    तिवारियों का फंडा और सपना ये हे की की इस्लाम में शिर्क ठुस्वा दो फिर इस्लाम अपनी मौत मर जाएगा क्योकि इस्लाम में नया कुछ नहीं हे सिवाए शिर्क कबूल ना करने के , मानना पड़ेगा जैसे राजीव नयन बहुगुणा कहते हे की उन्हें छोटे देवता और छोटे शहर पसंद हे बड़े देवता साम्प्रदायिकता फैलाते हे बड़े शहर प्रदूषण , वैसे ही बड़े बड़े मुल्लाओ ने चाहे जितनी हरमजदगी और दलाली की हो आज भी देखे तो सारे बड़े बड़े मुल्ला टाइप नेता और नेता टाइप मुल्ला सब अरबपति हे खेर लेकिन मानना पड़ेगा अदभुत हे ये छोटे छोटे लाखो मुल्ला मौलाना जिन्होंने चाहे जो हो लेकिन जिन्होंने इस्लाम में शिर्क घुसने नहीं दिया चाहे जो हो इन्होने ये नहीं होने दिया चाहे जो हुआ इन्होने नहीं होने दिया इस्लाम में शिर्क घुसने नहीं दिया इनकी जीवन शैली बिलकुल आसान नहीं थी मगर पंद्रह सौ साल से ये जरा भी डिगे नहीं मानना पड़ेगा सेल्यूट हे इन लाखो मुल्लाओ मौलाना को , मेरे जैसे जीरो स्प्रिचुअल नीड के आदमी का भी————————————————हिन्दू साम्प्रदायिक विचारधारा को छोड़कर दुनिया की बाकी सभी विचारधाराओ में वीर दृढ़ लोग होते ही हे मतभेद अपनी जगह मगर इनकी वीरता और दर्ढ़ता को सलाम हे ऊपर मेने मुल्लाओ को सेल्यूट किया आगे में मरहूमसमाजवादी लेखक संपादक राजकिशोर को भी सेल्यूट करता हु ”ये भी हे गाजी पूरइसरार बन्दे ” इसी वर्ष अपनी मौत से सिर्फ दो महीने पहले अपने एकलौते बेटे की दर्दनाक मौत पर भी राजकिशोर विचारो और उसूलो से डिगे नहीं बेटे की अन्तियम किर्या के समय शमशान घाट पर वो लोगो को बता रहे थे की ” ये नास्तिको की परीक्षा की घडी हे कोई राम नाम सत्य का नारा नहीं लगाएगा ” फिर इतने बड़े हादसे के बाद भी अपनी बेहद खराब हेल्थ के बाद भी वो मोदी को हटाने के लिए चिंतित थे और उनकी बेटी बीवी इतने बड़े हादसे के बाद भी फिर खुद राजकिशोर जी के हॉस्पिटल में जिंदगी मौत से झूजने के बाद भी हस्पताल के और लोगो के सुख दुःख में हाथ बटाती थी सेल्यूट इस वीरता को इस ईमानदारी को

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