सीता तुम तो मौन थी !

sita-mata

सीता तुम तो मौन थी
राम के साथ वन पथ पर चलने से लेकर
अग्नि परीक्षा तक ……………

सीता तुम तो मौन थी
धोबी के ताने से आहात पति के
वचन निभाने से लेकर
दूसरे वनवास तक ………

सीता तुम तो मौन थी
प्रसव पीड़ा सहने से लेकर
रघुकुल का वंश बढ़ाने तक ……..

सीता तुम तो मौन थी
अयोध्या की लाज बचने से लेकर
पिता से लव – कुश का परिचय
करवाने तक …….

सीता तुम तो मौन थी
राम के राजशू यज्ञ में
शामिल होने से लेकर
कुल परम्परा को ढोने तक ……

सीता तुम तो मौन थी
पति धर्म निभाने से लेकर
निज कुल धर्म निभाने तक …..

किन्तु ऐसा क्या हुआ कि –
धैर्य की धरणी
राम की रमणी
जनक दुलारी
तुम यकायक बोल पड़ी ,
बोल ही नहीं बल्कि
चित्कार कर उठी कि –
हे माँ धरती अब फट जाओ तुम
अपनी जानकी के लिए
हे माँ धरती अब कर लो
अपनी गोद में समाहित अपनी जानकी को ….?

सीता तुम्हारा इस तरह
चिर मौन तोड़ कर चित्कार करते हुए
धरती में चले जाना
निस्चित रूप से
तुम्हारे दुःख कि पराकाष्ठा ही रही होगी ..
एक और कोशिश ही रही होगी
अपने राम कि मर्यादा को जगत में
कालजयी करने की …..
राम शब्द को सार्थकता प्रदान करने की ….
क्यू की सीता का हर समर्पण
हर त्याग , हर आंसू , अपने राम
की मर्यादा को बचाने के लिए ही तो था …

सीता क्या कभी कोई राम तुम्हे ,
तुम्हारे त्याग, तुम्हारे समर्पण को
परिभाषित कर पायेगा ……….?
सीता क्या कोई राम कभी तुम्हे समझ पायेगा …..
अगर नहीं तो सीता यही तुम्हारा दुर्भाग्य रहा
त्रेता से कलयुग तक …..
और अगर हाँ तो यही
सीता तुम्हारे नाम की सार्थकता होगी
युग-युग से युग युग तक …!!

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2 thoughts on “सीता तुम तो मौन थी !

  • December 15, 2014 at 3:52 pm
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    सीता का बोल पड़ना बोल ही नहीं चित्कार कर उठाना
    वास्तव में एक ऐसा सवाल रहा है इस समाज में जिसका उत्तर
    कभी संतोषजनक नहीं मिला किसी सीता को प्रदीप सर आपने संवेदना
    को झंकझोर दिया है !
    संवेदना से भरा सराहनीय विषय उठाने के लिए बहुत बहुत साधुवाद !

    Reply
  • December 15, 2014 at 7:30 pm
    Permalink

    रामयन मे उत्तर कान्द बाद मे मिलाया गया है , इस्लिये लग्भग सभि बाते गलत है !

    Reply

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