सिल्वर स्क्रीन का डॉन “महानायक” क्यों ?

kabali
कबाली का अंदाज गुस्से का है । कबाली का अंदाज हाशिये पर पड़े व्यक्ति के चुनौती देने का है । कबाली का अंदाज सिस्टम से मार खाये नायक का है । कबाली का अंदाज खुद न्याय करने का है । सही मायने में ये अंदाज उस तलयवर का है जो आम आदमी का नायक है । और जब समाज में नायक बचे नहीं है तो सिल्वर स्क्रीन ही आम आदमी के दिलो में उतर कर एक एसा महानायक देता है जो सिस्टम को अपनी हथेली पर नचाता है । चकाचौंध की माफियागिरी को टक्कर देते हुये तीन घंटे में पोयटिक जस्टिस करता है । तो क्या रजनीकांत की उड़ान सिर्फ इतनी है । क्योकि याद किजिये सिल्वर स्क्रीन पर डॉन की भूमिका में पहली बार रजनी कांत दिखायी भी दिये तो बालीवुड स्टार अमिताभ बच्चन की फिल्म डॉन के रिमेक बिल्ला में । हर स्टाइल अमिताभ का । और 1980 में माना यही गया कि रजनीकांत तमिल फिल्मों के अमिताभ बच्चन हैं। लेकिन साढे तीन दशक
बाद सिल्वर स्क्रीन का वही तमिल नायक बालीवुड के नायकों को पीछे छोड़ इतना आगे निकल जायेगा कि मुंबई के सिनेमाघर भी उसकी फिल्म के लिये सुबह चार बजे खुल जायेंगे । या किसने सोचा होगा ।

वैसे याद किजिये तो एनटीआर ने भी अमिताभ बच्चन की डॉन के रिमेक के तौर पर युगान्धर फिल्म में बतौर डॉन की भूमिका को ही सिल्वर स्रिकन पर जिया । लेकिन बालीवुड को कभी छू भी नहीं पाये एनटीआर । और तमिल फिल्मो के लोकप्रिय एमजीआर तो दक्षिण भारत से आगे निकल ही नहीं पाये । कमाल हसन ने प्रयास जरुर किया लेकिन उनकी लोकप्रियता नायकन से आगे निकल नहीं पायी । तो रजनीकांत ने वह कौन सी नब्ज पकडी है जिसे बालीवड के खान बंधु हो या अमिताभ बच्चन वह भी इस नब्ज को पकड नहीं पाये । और समाज या राजनीति में भी नायक खत्म होते चले गये । तो समझना होगा कि निजी जिन्दगी में कुली बढई और कंडक्टरी करते हुये सिल्वर स्क्रीन के नायक बने रजनीकांत ने उस खोखले पन को हमेशा नकारा जो चकाचौंध और पावर तो देता है लेकिन आम आदमी से काट देता है । इसलिये उनके दरवाजे को जब भी राजनेताओं ने खटखटाया उन्हे ना ही सुनने को मिला । और रजनीकांत ने निजी जीवन से लेकर सिल्वर स्क्रीन पर भी उसी समाज से निकले उसी चरित्र को जीया जो समुदाय , जो समाज आज भी हाशिये पर है । इसीलिये तमाम तकनीकी माध्यमों से गुजरने वाली रजनीकांत की अदा सिल्वर स्किरन पर एक ईमानदार अदा बन जाती है । जो उन्हे आम जनता का नायक बना देती है ।

लेकिन सवाल यही कि आखिर डॉन का चरित्र ही नायक कैसे गढता है । वरदराजन मुदलियार ,हाजी मस्तान , दाउद , छोटा राजन ये नाम अंडरवर्लड डॉन के है । जाहिर है ये खलनायक है । लेकिन इन्ही डॉन की भूमिका को गढते हुये सिल्वर स्क्रीन पर जिस जिस कलाकार ने इसे जिया वह नायक बन गया । फिल्मों की कतार देखे । दीवार-, डॉन , दयावान , कंपनी-, सत्या , ब्लैक फ्राइडे , सरकार , अग्निपथ और वह सारी फिल्मे सफल हुई जो डॉन का ताना बाना बुनते हुये सिल्वर स्क्रिन पर आई और लोगो के दिमाग में छा गई । हिन्दी सिनेमा ही नहीं बल्कि दक्षिण की फिल्मो की फेरहसित देखे तो वहा भी हर वह फिल्म सफल हुई जो अ डरवर्ल्ड डॉन को लारजर दैन लाइफ बनाती । तमिल फिल्म बिल्ला , बाशा , जेमनी , अरिन्थुम अरियामुलुम , पुधुपेट्टई , पोक्किरी , मनकथा , सुदुकावुम और इसी कतार में अब कबाली का नाम भी लिया जा सकता है । जिसमें रजनीकांत डॉन की भूमिका में है । यानी लकीर बारिक है लेकिन डॉन का मतलब कही ना कही आम आदमी के हक में खड़ा शख्स होता है । जो सिल्वर स्किरन पर नायक । लेकिन कानून के नजर में अपराधी । तो क्या सिल्वर स्क्रीन का पोयटिक जस्टिस राजनीतिक न्याय व्यवस्था पर भारी पडने लगा है । या फिर सिनेमा महज मनोरंजन है । ये सवाल इसलिये क्योकि सिनेमा में ज्यादातर डॉन दलित-पिछडे समाज से ही निकलते है । गरीबी और मुफलिसी में संघर्ष करते तबके में से कोई चुनौती देता है तो ही वह नायक बनता है । याद किजिये मुब्ई में वरदराजन मुदलियार डॉन के तौर पर तब खडा होता है जब लुंगी को मराठी मानुष की राजनीति चुनौती देती है ।
जीना मुहाल करती है ।और इसपर बनी फिल्म दयावान का नायक भी सिल्वर स्क्रीन पर कुछ इसी पहचान के साथ खड़ा होता है । तो क्या राजनीतिक तौर पर कोई नायक समाज को इसीलिये नहीं मिल पा रहा है क्योकि राजनीतिक न्याय व्यवस्था कानून के राज के बदले कानून पर ही राज करने लगती है । और समाज के भीतर का संघर्ष राजनीतिक सत्ता अपने अपने वोट बैक के नजरिये से हर जगह दबाती चली जाती है । ये सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण है जब मुनाफा और मार्केट इकनामी राजनीतिक सत्ता का भी मूलमंत्र बन चुका है तब समझाना होगा कि अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्मो का मुनाफा कमोवेश किसी भी सामान्य फिल्म की तुलना में 75 से 200 फिसदी ज्यादा होता है । और डॉन के चरित्र को लेकर बनी कबाली भी पहले ही दिन सारी फिल्मों की कमाई के सारे रिकार्ड तोड़ चुकी है ।

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