सदन में किसी की हत्या हो जाए तो आश्चर्य मत कीजिएगा!


By- विमल कुमार

मीडिया बार-बार संसद की अराजकता का फुटेज दिखाता है पर वह यह नहीं बताता कि मोदी के कार्यकाल में यह क्यों हो रहा। क्या मोदी को कोई रिमोट से नियंत्रित कर रहा है जिसके कारण सदन की यह हालत हो गयी है। जब तक आप यह नहीं समझेंगे कि इस लोकतंत्र का रिमोट किसके हाथ में है तब तक आप इस लोकतंत्र को बचा नहीं सकते। काले कृषि कानून के बाद इंश्योरेंस बिल का पारित होना सिद्ध करता है कि खुद को राष्ट्रवादी सरकार कहने वाली मोदी सरकार देश को निजी हाथों में बेच रही है।

अगर किसी दिन संसद के भीतर किसी व्यक्ति की हत्या हो जाए तो आप लोग आश्चर्य मत कीजिएगा। अगर किसी दिन संसद के भीतर किसी महिला का शीलभंग हो जाए तब आप लोग आश्चर्य मत कीजिएगा। देश मे लोकतंत्र जिस दौर में पहुंच गया है उसे देखते हुए लगता है, यह दिन भविष्य में जल्दी आने वाला है। तीन दिन बाद हम आज़ादी के 75 वर्ष पर लोकतंत्र की दुहाई देंगे और एक बार फिर पाखण्ड पर्व शुरू होगा। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री इस लोकतंत्र का गुणगान करेंगे। पर हमारा जर्जर बूढ़ा लोकतंत्र रोज संसद में शर्मशार होता रहेगा। जब राज्यों की विधान सभाओं में माइक कुर्सी तोड़ने जूते चप्पल फेंकने की घटनाएं होती रही हैं।

अगर यह दृश्य लोकसभा और राज्यसभा में दिखाई देने लगे तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए। संसद के दोनों सदनों में हाथापाई धक्का मुक्की कागज फेंकने, कोट फेंकने की घटनाएं होती रही हैं। इसलिए कल कोई और बड़ी अप्रिय घटना हो तो समझिए हम उसी रास्ते पर जा रहे हैं जो हमारे लोकतंत्र की परिणति बनती जा रही है। अब देश के हर नागरिक को गम्भीर होकर इस पर विचार करना होगा। आखिर हम कैसा लोकतंत्र चाहते हैं। सच पूछा जाए तो संसद की अराजकता केवल सांसदों की अराजकता भर या उनके उच्छशृंखल व्यवहार भर का मामला नहीं है बल्कि यह देश के जिस्म पर रोज में उग रहे नए फफोले और घाव के निशान हैं जिसे आप देख नहीं रहे। यह उसे अनदेखा कर रहे हैं। पिछले कुछ साल से जिस तरह सदन में सत्ता पक्ष विधेयकों को अड़ियल तरीके से जल्दबादी में पास करा रही है, उससे सदन में  दिन पर दिन स्थिति अराजक होती जा रही है। आखिर सरकार की हड़बड़ी क्यों? पीछे से उसे कौन नियन्त्रित कर रहा है। यह जानना जरूरी है।

यह कमोबेश माना जा सकता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष का चरित्र सत्ता में आते ही मोटे तौर पर एक दूसरे जैसा होने लगता है लेकिन आज के दौर में संसद के भीतर घट रही घटनाओं की व्याख्याया इस सरलीकरण से नहीं की जा सकती है।

करीब दो दशक तक एक पत्रकार के रूप में संसद को कवर करने के दौरान मैंने यही पाया कि संसद में जो कुछ होता है उसकी डोर कहीं और होती है। इस संसद को हाईजैक कर लिया गया है। इस संसद को रिमोट कंट्रोल से नियंत्रित किया जाता है। यूं तो संसद को चलाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की होती है और यह बात भाजपा भी बार-बार कहती रही है जब वह विपक्ष में रही है लेकिन जब से भारतीय जनता पार्टी सरकार सत्ता में आई है, वह संसद को मनमाने ढंग से चलाने लगी है। जब राज सभा में भाजपा बहुमत में नहीं थी तो वह बार-बार आरोप लगा रही थी कि विपक्ष हमारे बिल को पारित नहीं करने दे रहा है और उसमें अड़ंगा डाल रहा है लेकिन जैसे ही उसकी स्थिति थोड़ी मजबूत हुई, सत्ता पक्ष का क्रूर चेहरा सामने आने लगा और इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले वर्ष उसने कोरोना काल में शोर-शराबे के दौरान तीन कृषि बिलों को पारित करा दिया।

कल राज्यसभा में बीमा निगम विधेयक को भी शोर-शराबे में ध्वनि मत से पारित कराया गया जबकि एक सदस्य ने मत विभाजन की मांग भी की थी पर यह पहली बार नहीं हुआ है। हाल के वर्षों में कई ऐसे मौके आए हैं जब सदन में विधेयक पारित करने के दौरान कोई सदस्य मत विभाजन की मांग करता है तो सत्ता पक्ष यह कह कर उसे टाल देता है कि सदन की स्थिति सामान्य नहीं है और अराजक स्थिति में मत विभाजन करना संभव नहीं है लेकिन उसी शोरशराबे में   सत्ता पक्ष विधेयक को ध्वनि मत से पारित भी करा लेता है। इससे आप सत्तापक्ष की चालाकी और धूर्तता को समझ सकते हैं। इस पर विपक्ष आक्रामक होकर अशालीन व्यवहार करता है तो मीडिया में यह प्रचारित किया जाता है कि विपक्ष सदन को चलने नहीं दे रहा है। लेकिन मीडिया में जो खबरें दिखाई जाती हैं टीवी के पत्रकार जो बाहर कैमरे पर बोलते रहते हैं, उससे पूरा सच सामने नहीं आता है।

अब संसद की टीवी का कैमरा भी सुविधानुसार ऑफ कर दिया जाता है लेकिन पत्रकार दीर्घा में वर्षों तक बैठने का मेरा अनुभव यही बताता है कि सच बाहर नहीं आता। जब भी संसद में हंगामा होता है तो उसकी वास्तविक रिपोर्टिंग नहीं होती है जिसका नतीजा यह होता है कि जनता को एक सही तस्वीर नहीं नजर आती है। एक पक्ष विपक्ष के कारनामों को उजागर करता है तो दूसरा पक्ष सत्ता पक्ष के कारनामों को उजागर करता है इसी आरोप प्रत्यारोप के शोर में लोकतंत्र मरता रहता है। कल राज्यसभा में जो कुछ हुआ वह निंदनीय घटना थी सत्ता पक्ष के लिए भी और विपक्ष के लिए भी लेकिन ऐसी घटना क्यों उत्पन्न हो रही है, हमें इस पर विचार करना चाहिए। आखिर किस कारण विपक्ष उत्तेजित हो रहा है? क्या वह अपनी उत्तेजना में होशो हवास खो रहा है? क्या उसे चुपचाप सब कुछ स्वीकार करना चाहिए? क्या उसे सरकार के हर बिल पर समर्थन देना चाहिए? मोदी सरकार के कार्यकाल में विपक्ष की यह शिकायत रही है कि जब कोई बिल पेश हो तो उसे संसद की स्थाई समिति के पास भेजने के बजाय उसे झट पास करा दिया जाता है।

मोदी सरकार के कार्यकाल में यह प्रवृत्ति अधिक दिखाई पड़ रही है और विधेयकों को स्थायी समिति के पास भेजा नहीं जा रहा। अक्सर उसे सीधे पारित कर दिया जा रहा है। बीमा निगम विधेयक को भी विपक्ष चाहता था कि उसे संसद की स्थाई समिति में भेजा जाए और उसके बाद उसे पारित कराया जाए लेकिन उसे ध्वनि मत से शोर-शराबे में ही पारित कर दिया। कृषि बिल के साथ यही हुआ था। इस विधेयक के पारित होने से पूरा बीमा सेक्टर निजी हाथों में चला जाएगा।

पहले भी जब बीमा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों के प्रवेश का विरोध हुआ था और कहा गया था कि जब भारतीय जीवन बीमा निगम लाभ में चल रही है तो फिर विदेशी निगम कंपनियों को क्यों प्रवेश दिया जा रहा है तो सरकार का तर्क यह था कि देश की इतनी बड़ी आबादी को बीमा के क्षेत्र में कवर करना जीवन बीमा निगम के बस की बात नहीं है और इसलिए हम मुक्त अर्थव्यवस्था के तहत हर क्षेत्र को खोलना चाहते हैं। आप संसद में जो अराजकता देख रहे हैं जो हंगामा देख रहे हैं उसके पीछे मुक्त अर्थव्यस्था का दर्शन इस पर होना चाहिए लेकिन बहस अराजकता को लेकर हो रही है। संसद को रिमोट से चला कौन रहा है? मोदी की नीतियों से अर्थव्यस्था चौपट हो रही है। देश उनसे चल नहीं रहा इसलिए वे इस देश को रोज बेच रहे हैं। 15 अगस्त को देश के हर नागरिक को आंख खोलकर इस खेल को समझना चाहिये तभी वह दम तोड़ते हुए लोकतंत्र को बचा पाएंगे नहीं तो हम मूक दर्शक की तरह फासीवाद की आहटों को केवल सुनते रहेंगे।

(वरिष्ठ पत्रकार और कवि विमल कुमार का लेख।) http://janchowk.com


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