सच्ची रामायण ! एक समीक्षा !

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sacchi-ramayan-2सच्ची रामायण पेरियार द्वारा लिखी गयी एक किताब है जो अपने वक़्त में बहुत विवादित रहा पड़ने का बहुत दिनों से शौक़ था क्यों के उस के बारे में बहुत सी पात्र पत्रिकाओं में पड़ा और सुना खासतौर से इस किताब की चर्चा दलित साहित्य में ज्यादा देखने को मिला. आखिर १० साल बाद इसे पड़ने की ख्वहिश पूरी हुई और इस के लिए खासतौर से मेरे एक मित्र है जतिन राम उन्हों ने मंडल यूनिवर्सिटी पुस्तकालय से ये पुस्तक की ज़ेरॉक्स कर किताबी शक्ल में एक हफ्ते पहले भेजी .कल ही पूरी पुस्तक पड़ ली तो सोचा आप लोगो से भी इस के बारे में शेयर करू !

सच्ची रामायण के लेखक “पेरियार इ रामासामी नयकर” जो तमिल भाषा में लिखी गयी इस का हिंदी अनुवाद रामाधार ने किया और इस का प्रकाशन मूलनिवास प्रचार प्रसार केंद्र वाराणसी ने किया है . इस पुस्तक को उत्तरप्रदेश १९६९ में जब्त कर उस पर पाबन्दी लगा दी मगर सुप्रीम कोर्ट ने १९७१ में उस पर से पाबन्दी हटा दी !

इस पुस्तक की शुरुवात ही इस के साथ हुई ” रामायण और महाभारत दोनों आर्य -ब्राह्मणो द्वारा चालाकी और चतुरता पूर्ण निर्मित प्रारभिंक प्राचीन कल्पित कथाएं है ! से द्रविड़ों ,शुद्रो और महशूद्रो की अपनी मनुष्यता को नष्ट करने के लिए ,उनकी बौद्धिक शक्ति को मलिन करने और समाप्त कर देने के लिए उन्हें फुसला कर अपने जाल में फंसा कर रखने के लिए रची गयी है . रामायण किसी इतिहासिक तथ्य पे आधारित नहीं है !ये एक कल्पना तथा कथा है और लोगो के दिल बहलाने के लिए लिखा गया है “!

इसी पुस्तक में कथा प्रसंग के तहत लिखा गया है के ” रामायण की घटनाएं और कथाक्रम बहुत कुछ अरबी योद्धा ,मदन कामराज और पंचतंत्र नामक पुस्तकों के सामान कल्पित है .वे मानव विचओ की समझ और गूढ़ विचारों से दूर है इस लिए कहा जा सकता है के रामायण हक़ीक़त से बहुत दूर है क्यों के इस में ऐसी ऐसी बाते कही गयी है जिस का कोई सुबूत नहीं है . रामायण में इस बात पे अधिक जोर दिया गया है के प्रमुख्य पात्र राम मनुष्य रूप में स्वर्ग से उतरा और उसे ईश्वर समझा जाना चाहिए . वाल्मीकि ने स्पष्ट कहा है के राम विश्वश्घात, छल. कपट , लालच ,क्रित्मता , हत्या ,अमिष-भोजि और निर्दोष पर तीर चलने का साकार मूर्ति था ! आगे पाठक देखे गए के राम और उस के कथा में कोई स्वर्गीय शक्ति नहीं है और उस के विषय में वर्णित गुण मानवमात्र की समझ से पर है तथा वे तमिलनाडु के निवासियों और भारत के समक्ष शुद्रो के लिए शिक्षाप्रद और अनुकरणीय है .”

sacchi-ramayan-3सच्ची रामायण वाल्मीकि के रामायण की तरह नहीं है और न इसे एक कहानी की शक्ल में लिखा गया है बल्कि हम इसे रामायण की आलोचना में लिखी गयी एक पुस्तक कह सकते है .इस में रामायण के हर पात्र के बारे में अलग अलग लिखा गया है और उन की आलोचना की गयी है . इस में राम ,सीता ,दशरथ हनुमान आदि के बारे में ऐसी ऐसी बाते लिखी गयी है जो में यहाँ वर्णन नहीं कर सकता और सब से बड़ी बात सच्ची रामायण में जो दलित पात्र है उन की तारीफ़ की गयी है. में यहाँ राम और सीता के बारे में की गयी टिप्पणियाँ नहीं िखना चाहू गा सिर्फ एक टिपण्णी रावण के बारे में जिस की बहुत तारीफ़ की गयी है और कहा है के राम उसे आसानी से हरा नहीं सकते थे इस लिए उसे धोखे से मार गया .इसी पुस्तक में लिखा है के सीता अपनी मर्जी से रावण के साथ गयी थी क्यों के उन्हें राम पसंद नहीं थे “इसी पुस्तक में लिखा गया है के भारत में २० से अधिक रामायण प्रचलित है और सभी कहानिया एक दूसरे से भिन्न है .

इसी पुस्तक में जवाहर लाल नेहरू की एक टिप्पणी रामायण और महाभारत के बारे में प्रकाशित की गयी है जो के १९५४ में द मेल नमक पत्रिका में छपी है उन का कहना है के ” जब में गम्भीरतापूर्वक विचार करता हु तो मेरा क्रोध बाद जाता है के ब्राह्मणो ने क्या वाहियात बात लिखी है और आज भी लोग जाहलियत के कारण इन्ही घटनाओं के आधार पर कबिता या लेख लिखते है और समाज में और जाहलियत फैला रहे है .ब्र्ह्मणो ने किस प्रकार दूसरे लोगो को अपने बराबर होने देने में रोक लगा दी है” !

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12 thoughts on “सच्ची रामायण ! एक समीक्षा !

  • May 9, 2016 at 1:44 pm
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    तो अफजल जी अगर आप इस किताब से जरा भी सहमति रखते हैं तो क्या यह किताब और आपका लेख यह सन्देश नहीं देता की हर धर्मग्रन्थ की समीक्षा होनी चाहिए ? क्यों की हमारे पढ़े लिखे होने का मतलब ही यही है की हम इस काबिल हैं की केवल वर्षों से चली आ रही मान्यताओं को ज्यों का त्यों अंधानुकरण करने से पहले उसे जांचने की हिम्मत कर सकते हैं ! पूर्वाग्रह और अपने अपने व्यक्तिगत विचारों में भिन्नता के बावजूद हम हर धर्मग्रन्थ को अलग अलग पैमाने पर तौलने की बेवकूफी तो नहीं करेंगे ! इतना हर बुद्धिजीवी के लिए तो अपेक्षित होता ही है ! वर्ना इन्ही ग्रंथो के केवल तुलनात्मक आधार पर अपने अपने धर्मो को श्रेष्ठ करार देने वाले मनोरोगी, धर्म प्रचारक और हम में क्या अंतर रह जाएगा ?

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  • May 9, 2016 at 6:55 pm
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    ना सिर्फ़, रामायण बल्कि अन्य हिंदू धर्म ग्रंथो क ले के अतीत मे भी अनेको बुद्धिजीवियों ने आलोचनात्मक लेख और किताबे लिखी. हमारे संविधान के निर्माण मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले डॉ. अंबेडकर ने भी अपनी किताबो मे बहुत बेबाकी से इनके खिलाफ लिखा.

    राम का असली चरित्र कितना महान या दागदार था, उससे कहीं अधिक महत्त्व यह रखता है कि राम को पूजने वाले, आज राम से प्रेरणा लेके कैसा आचरण करते हैं.

    यही बात हमारे समुदाय पे लागू होती है. हम लोगो का तो मज़हब ही एक व्यक्तित्व पे टिका है, वो है आख़िरी पैगंबर मुहम्मद. आज अपने को आशिके रसूल कहने वाला व्यक्ति, जो आचरण करेगा, वो पैगंबर मुहम्मद के प्रति अन्य समुदाय मे उनकी छवि बनाएगा.

    अगर आज उनपे सवाल करने पे, आशिके रसूल अगर हिंसा करेंगे, या इस्लाम को प्रेरणा मानने वाली न्याय-व्यवस्था, मृत्यु दंड सुनाएगी तो लोग यही मानेंगे कि पैगंबर मुहम्मद ने भी अपने पे सवाल करने वालो को जान से मारा होगा. आज हम इस्लाम की आलोचना पे संयम बरतते हुए, आलोचको से चर्चा करेंगे, तो गैर-मुस्लिम समुदाय मे ये संदेश जाएगा कि इनके रसूल भी संयम बरतते होंगे.

    हमे ये नही भूलना चाहिए कि इस्लाम और पैगंबर मुहम्मद की छवि की ज़िम्मेदारी, हम मुसलमानो पे है. इस्लाम या रसूल की आलोचना मे लिखी लाखो किताबे भी इस्लाम की छवि तब तक खराब नही कर सकती, जब तक मुसलमान हिंसा का रास्ता अपना कर, उन किताबो को सत्य साबित नही करता.

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  • May 9, 2016 at 8:38 pm
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    दुरुस्त फ़रमाया जाकिर साहब ! लेकिन इस्लाम और रसूल की आलोचना तो एकतरफ जब जाकिर नायक जैसे धुरंधर प्रचारक अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल यह कहने में खर्च कर रहे हैं की किसी भी धर्म को जानना हो तो उस धर्मं के लोगों को नहीं बल्कि उस धर्म के ग्रंथो को देखो ! तब और क्या होगा ? वही होगा और हो रहा भी है जो आप फरमा रहे हो ! आपका हमारा पैमाना बिलकुल इसके विपरीत हैं हम लोगों को पहले देखेंगे फिर उनके धर्म को ,क्यों दुनिया में नए से नए धर्म को आये भी वर्षो बीत चुके हैं और अब उसके परिणाम देख कर कचरा साफ़ करने का समय है और जिन्होंने नहीं किया वो बिमारी झेलेंगे ही !! चाहे वो हिन्दु हों मुस्लिम हो ,अब उसमे भीं छोटी और बड़ी बिमारी की तुलना में अपने धर्म को कोई श्रेष्ठ साबित करने में लगा रहे तो उसे मनोरोगी कहने के अलावा और क्या कहेंगे ?

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  • May 9, 2016 at 9:30 pm
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    जाकिर साहब का मानना है कि दुनिया का हर व्यक्ति, चुनिंदा किताबो से बँधा है. वो एक हिंदू को कहेंगे कि जाओ, अपनी उस किताब मे देखो, ये लिखा है, ईसाई को बाइबल का उदाहरण देंगे. उन्हे लगता है, इन किताबो को रट कर, उन्होने पूरे मानव समाज को पढ़ लिया.
    जबकि एक इंसान, इन किताबो से इतर भी अपनी सोच रख सकता है. जिस व्यक्ति ने वेद, पुराणों को पत्थर की लकीर माना ही नही, उन्हे उन किताबो का हवाला देने से क्या फ़ायदा? और इन किताबो को पढ़ कर, इंसान को कैसे पढ़ा जा सकता है.

    दुनिया के तमाम ज्ञान और रहस्यो को कागज के कुछ टुकड़ो मे ही समेटा हुआ मान लेना, कैसी विद्वता. ज्ञान तो एक सागर है, उसमे से जितना पानी निकाल लो, पूरा कभी नही पा सकते.

    कुदरत की हर चीज़, एक कौतूहल पैदा करती है, उसको बनाने वाले के प्रति विस्मय पैदा करती है, ऐसे महान रचीयता को कागज के चंद टुकड़ो मे समेटा हुआ मान लेने से बढ़कर तो उसका कोई अपमान हो ही नही सकता.

    कागज के चंद टुकड़ो से उसे जान लेने का दावा करना, उसके अपार को नकारना ही है. यही वजह है, धर्मांध लोग, इस कुदरत के किसी रहस्य की थाह नही पा पाते.

    तमाम मशहूर वैज्ञानिको ने बड़ी खोजे तभी की, जब उन्होने सत्य के प्रति अपनी प्यास जगाए रखी. समुद्र से निकाली एक बाल्टी को ही जिन्होने, सागर समझ लिया, उन्हे सागर की गहराई का अंदाज़ा तक नही हो सकता.

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    • May 10, 2016 at 6:26 pm
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      श्रेी जाकिर जेी यहि बात कुरान् पर लागु कर लिजिये

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  • May 10, 2016 at 6:30 pm
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    बेशक रामयन कि राम कि भेी अलोच्ना हो सक्तेी है अगर सेीता ने राम् को पसन्द नहि किया था तो वह उन्के साथ् वन मे क्यो गयि थि ?
    रावन केी मौत पर दुखि क्यो नहेी हुयि थेी
    राम् का मुकाबला रावन् आमने -सेामने हुआ था
    विभिशन् से कुच गोप्निय राज जरुर लिये थे

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    • May 10, 2016 at 6:39 pm
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      राज साहब, मैने अपने समुदाय के लिए ही लिखा है.

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  • May 14, 2016 at 8:01 pm
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    जहाँ तक मैं समझता हूँ हम लोग जो धर्म पर बहस करते हैं उन मछलीयोन की तरह है जो किसी न किसी जाल में फंसी है और हंसी तो आएगी ही जब कोई अपने जाल को सोने का बुना बताएगा !

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  • June 28, 2017 at 1:23 am
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    रामायण का वास्तविक मै आपको बताता हु आपको..

    रावण कौन है?
    हर जिव जंतु मनुष्य प्राणि जो भि यहा जन्मा है वो रावण है.

    सिता कोन है?
    सिता है ये सृष्टी, प्रकृती, कुदरत, कायनात.

    हर जिव, जंतु, मनुष्य, प्राणि (यानी कि रावण) अपने जन्मसे लेकर जिवन के अंत तक इस सृष्टी, प्रकृती, कुदरत, कायनात पर आधीकार जतानेकी कोशिष मे लगा रहता है. जैसे कि जमिन, पाणि, पेड, पौधे, प्राकृतीक संपदा, अनाज, मांस कुछ भी हो ये सारे प्रकृती के भिन्न भिन्न रुप है. और इस कुदरत पर अपना आधीकार जताने के बाद हर जिव, मनुष्य, प्राणी ( रावण ) ईस भ्रम मे जिता है कि ऊसने ईस प्रकृती को कुदरत को बंदी बनाया है.( रामायण कि वास्तविक कथा अनुसार रावण ने सिता का नही सिता कि परछायी का हरण किया था ) तो ये जो जिव, जंतु, मनुष्य , प्राणी ( यानिकी रावण ) इसके दस सर है. ये है ग्यान. हम इन्सान थोडा बहोत ग्यान पाकर ये सोचने लगते है कि
    हम ने इस पुरी कायनात को, कुदरत को जान लिया है, और इस कुदरत को हमने हमारे आधीन करलिया है. जैसे रावण के बंधन मे सिता कि परछाई.

    राम कौन है?
    राम है अतीम सत्य, निर्गुण इश्वर, शिव, मृत्यु जो हर जिव, जंतु, मनुष्य, प्राणी, (रावण), सुर्य, चंद्र, आकाशगंगा किसीकि तरफ बढता है धिरे धिरे. अंतीम सत्य हर किसिको अपने वास्तविक रुपसे परिचित करने हेतु हर किसी कि तरफ धिरे धिरे बढता है. और अंत मे हर वस्तु अंतीम सत्य के मे नष्ट होती है.

    राम हो, मोहम्मद पैगंबर हो, येशु ख्रिस्त हो इनकी आलोचना करने वाला खुदको ग्यानी समझता है, पर सच्चाई यही है कि असलीयत मे वो खुद को दुनीया के सामने नंगा कर रहा होता है.

    करो करो सभी धर्मोकी आलोचना करो, मेरी शुभ कामनाये आपके साथ है. ऐसे किसीके कुछ लिखने से कुछ नही होने वाला.

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  • June 28, 2017 at 2:06 am
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    भौतीकशास्त्र (physics) कि बात करे तो अल्बर्ट आईनस्टाईन या स्टिफन हॉकिंग्स को आदर्श मानकर चलेंगे.
    अगर क्रिकेट कि बात करे तो सचिन तेंडुलकर या ब्रायन लारा को आदर्श मानकर चलेंगे.
    अगर अभिनय (acting) कि बात करे तो आमिताभ बच्चन या आमिर खान को आदर्श मानकर चले.
    स्वतंत्रता का आंदोलन हो तो महात्मा गांधी का आदर्श होगा.
    वर्णवाद या किसी समाज व्यवस्था के खिलाफ लडना हो तो डॉ. आंबेडकर आदर्श होंगे.
    राजा कैसा हो तो सम्राट अशोक या सम्राट अकबर का आदर्श होगा.
    पर..पर..
    अंतीम सत्य कि बात हो तो राम, मोहम्मद पैगंबर, येशु ख्रिस्त ही पुजे जायेंगे. … मै सत्य कि बात नही कर रहा हु.. सत्य तो विग्यान के द्वारा खोजा जा सकता है. अंतीम सत्य वो है जिसे कोई टाल नही सकता, ना ऊस से कोई दुर भाग सकता है. और हर कोई अंतीम सत्य मे नष्ट होता है.
    विग्यान सत्य का ग्यान देता है और धर्म अंतीम सत्य मे विलीन होना है हर किसिको ये बताता है.

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  • May 31, 2018 at 11:17 am
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    Vinay Jha
    13 May at 16:52 ·
    दुर्वासा :–
    कल सायं भास्कर झा ने मुझे दरभंगा टावर बाज़ार में देखा, किन्तु यह सोचकर नहीं टोका कि कहीं बिगड़कर मैं फेसबुक पर ब्लॉक न कर दूँ !! मैं सब्जी खरीदने निकला था |

    कुछ सप्ताह पहले मैं सब्जी खरीदकर लौट रहा था तो आवास पर लगभग पँहुच चुका था तो तेजगति से साइकिल पर पीछा करते हुए श्वेताभ झा ने पास आकर पूछा कि “विनय झा आप ही हैं जो फेसबुक पर लिखते हैं”|

    मैंने गौर से देखा, उसका बाप भी मुझसे छोटा होगा, किन्तु मुझे नाम लेकर पुकार रहा था | अमरीकी “संस्कृति” अब दरभंगा के हिन्दुओं और अरब संस्कृति दरभंगा के मोमिनों पर हावी होने लगी है | मैंने उत्तर दिया कि मुझे सड़क या घर आकर जो टोकते हैं उनको मैं फेसबुक पर ब्लॉक कर देता हूँ | बेचारा चुपचाप चला गया, अपनी गलती का उसे आभास भी नहीं हुआ | सोचता होगा कि किस “दुर्वासा” का मुँह देख लिया ! उसके बाद उसने आजतक मेरे किसी लेख को भी यह सोचकर लाइक नहीं किया कि कहीं “टोकने” के कारण मैं ब्लॉक न कर दूँ ! वैसे भी रात के आठ बज रहे थे, रात में और प्रातः किसी से मिलना मुझे पसन्द नहीं | मिलना हो तो चार-पांच बजे अपराह्न मिल सकता है, किन्तु कुण्डली बनवाने न आये |

    मैं किसी को क्यों कहूँ कि सभ्यता सीखे ? बचपन में सभ्यता सिखाई जाती है | बड़े होने के बाद तो माँ-बाप भी नहीं सिखा सकते, स्वयं सीखना पड़ता है |

    राह चलते किसी को टोकना सभ्यता या असभ्यता नहीं है | असभ्यता है गलत तरीके से टोकना | और किसी परिचित को देखकर न टोकना भी असभ्यता है ! लाख गिरावट के बावजूद आज भी भारत के देहातों में ऐसी असभ्यता नहीं आयी है, किसी परिचित को बाज़ार में देखते हैं तो बिना टोके नहीं छोड़ते, सभ्यता एवं स्नेह सहित टोकते हैं, और यदि देखते हैं कि टोकना बुरा लग रहा है और व्यक्ति एकान्त चाहता है तो परेशान नहीं करते | अमरीकियों में भी ऐसी सभ्यता है | किन्तु भारत के पढ़े-लिखे “नागरिक” तो न घर के रहे और न घाट के, न भारतीय रहे और न अमरीकी सभ्यता सीख पाए ! लेकिन मोदी-मोदी जपते हुए मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी कर रहे हैं !!

    बहुत से ब्लॉक्ड लोग मुझे “दुर्वासा” और “कालनेमि” कहकर गरियाते रहते हैं ! असल में ये लोग दुर्वासा मुनि को कालनेमि कहते हैं ! और हिन्दू होने की डींग भी मारते हैं ! दुर्वासा मुनि के चरणों की धूल भी मैं नहीं हूँ ! दुर्वासा मुनि तो लोगों की परीक्षा लेते थे, ऋषि कभी किसी पर वास्तविक क्रोध नहीं करते | क्रोध तो पाप है | युद्ध भी शान्त मन से करना चाहिए, गीता का यही सारांश है |

    मुझे व्यर्थ की बातचीत पसन्द नहीं है | सदैव मानसिक जप करता रहता हूँ, शयनकाल में भी | आवश्यक बातचीत एक औसत मनुष्य के जीवन का बहुत छोटा हिस्सा लेते हैं, अधिकाँश बातचीत तो समय और ऊर्जा की बर्बादी है जिसका उपयोग या तो किसी सांसारिक कार्य के लिए किया जा सकता है या फिर ध्यान लगाने के लिए | राह चलते भी तो ध्यान लगाया जा सकता है, जो योग के दूकानदार नहीं समझेंगे |

    श्वेताभ झा ने तमीज के साथ टोका होता तो मैं यही कहता कि रात में मैं किसी से बात करना पसन्द नहीं करता, बात करना है तो चार-पांच बजे अपराह्न में आ सकते हैं | भास्कर झा भी यदि टोकते तो यही कहता | चाहते तो साथ चलते हुए मेरे आवास तक भी आ सकते थे, किन्तु रात में उनको घर के भीतर मैं नहीं बुलाता, भले ही बुरा मान जाएँ | सबको प्रसन्न करना तो भगवान के वश में भी नहीं है, मैं किस खेत की मूली हूँ ?

    किन्तु सम्भव हो तो मुझसे भेंट करने का प्रयास न करें, मेरे जप में बाधा पँहुचती है | जिन दिनों मैं किसी से बिलकुल भी बात नहीं करता था, चौबीसों घंटे योगसाधना में रहता था, कई वर्षों तक निद्रा से पूर्ण मुक्त था, और बाज़ार से दाल-सब्जी भी पुर्जी पर लिखकर खरीदता था, तब मुझे मच्छर भी नहीं काटते थे, मेरे चारों ओर मँडरा कर चले जाते थे ! आजकल लोगों से बात कर लेता हूँ, कम्प्यूटर भी छूता हूँ, फेसबुक भी खोलता हूँ, तो मच्छर भी काटते हैं, और अब आँख बन्द करने पर कुछ भी दिखाई नहीं देता, पहले दूर-दूर तक देख लेता था | मेरा बहुत पतन हुआ है, “धर्म” करने के कारण | साधुओं को खिलाने, गुरुकुल खोलने, संस्कृत संस्थाओं का उद्धार करने और काशी जाकर ज्योतिष सिखाने के चक्कर में मेरा बेड़ा गर्क हुआ, क्योंकि लोगों से सम्पर्क करना पडा, उनलोगों से भी जो सम्पर्क के योग्य नहीं थे |

    यह मत समझें कि साधुओं को खिलाना, गुरुकुल खोलना और संस्कृत का उद्धार करना बुरे कार्य हैं | ये सब धर्म के कार्य हैं | किन्तु धर्म और मोक्ष परस्पर भिन्न पुरुषार्थ हैं | धर्म का त्याग करने पर मोक्ष का मार्ग खुलता है जो ईसाई या सेमेटिक दृष्टि से हिन्दुत्व को देखने वाले आधुनिक लोग नहीं समझेंगे | कुण्डली में 1-5-9 के भावों को धर्म-त्रिकोण कहते हैं, इन भावों की हानि अर्थात द्वादश हैं क्रमश: 12-4-8 भाव |

    इस दृष्टि से 5 (पञ्चम भाव) है सांसारिक अर्थात धार्मिक कार्य करने की बुद्धि, तो उसकी हानि का भाव है 4 जो अन्तर्दृष्टि और विवेक का भाव है |

    9 है धार्मिक कर्मकाण्ड का भाव, तो उसकी हानि है 8 जो गुप्त ज्ञान अर्थात “आध्यात्मिक ज्ञानकाण्ड” का भाव है, जो मृत्यु के साक्षात्कार द्वारा ही खुलता है, जब मनुष्य जान जाता है कि मर्त्यलोक में जन्म ही वास्तव में मृत्यु है, असली जीवन तो इस लोक से परे है |

    और 1 अर्थात लग्न है सम्पूर्ण सांसारिक अर्थात दैहिक जीवन एवं चरित्र का भाव, तो उसकी हानि है 12 अर्थात संसारचक्र की हानि का भाव, अर्थात मोक्ष |

    लग्न पर मंगल जैसे क्रूर ग्रहों का प्रभाव अधिक हो तो व्यक्ति क्रोधी स्वाभाव का हो जाता है | मेरा लग्नेश शुक्र है और उसपर अत्यधिक बली बृहस्पति का पूर्ण प्रभाव है | उनसे सम्बद्ध क्रूर ग्रह मंगल निर्बल हैं | अतः मेरे स्वभाव में क्रोध जिनको दिखता है उनकी कुण्डली में विवेक का भाव गड़बड़ है | अपनी दूरबीन सुधार लें |

    अब मैं साधुओं को खिलाने के चक्कर में नहीं पड़ता, फालतू का पैसा भी नहीं बचा, गुरुकुलों से भी दूर रहता हूँ, ज्योतिष सिखाने के लिए आवास में किसी को बुलाता भी नहीं, और कुत्संग से बचने के अन्य उपाय भी करता हूँ | तो “समाजवादियों” ने मुझे दुर्वासा कहना आरम्भ कर दिया है ! समाजवादियों में हर पार्टी के लोग सम्मिलित हैं, भाजपा भी “भारतीय जनता” के समाज के पार्टी है | अशोक मौर्य ने आदेश दिया था की “समाज” का निषेध किया जाता है तो आज के तथाकथित इतिहासकार इसका ऊँटपटांग अर्थ लगाते हैं कि समाज का अर्थ था भीड़ लगाना | वैदिक साहित्य में “समाज” शब्द का कहीं प्रयोग ही नहीं मिलता, बाद के काल में मिलता है जब इसका अर्थ वही था जो अंग्रेजी में “कांग्रेस” अथवा “मीटिंग” शब्द का अर्थ है ! अतः अशोक मौर्य के उक्त आदेश का अर्थ है “कांग्रेस-मुक्त भारत” बनाओ ! सत्य व्यक्तिगत प्रयास से मिलता है, ‘मीटिंग’ करने से नहीं | सनातन धर्म सत्य की खोज सिखाता है, समाजवाद तो झुण्डवृत्ति है जो जंगल की विरासत है |

    कलियुग में म्लेच्छों से बचने के लिए पतनशील हिन्दू समुदाय में मठों और धार्मिक संस्थाओं का निर्माण किया गया | किन्तु जब हमारा देश अपनी पांवों पर खड़ा था तब हर ब्राह्मण स्वयं में एक विश्वविद्यालय था ! कोई केन्द्रीय विश्वविद्यालय या चर्च या वक्फ़ बोर्ड सनातन धर्म में नहीं होता था | हर ब्राह्मण सीधे ब्रह्म से जुड़ा रहता था, ब्राह्मण होने का यही सर्टिफिकेट था | ब्रह्म ही पोप था, ब्रह्म ही ब्राह्मणों और सभी वर्णों का कुलपति था, वहीं से सनातनियों में एकता सुनिश्चित की जाती थी | कोई सांसारिक संस्था नहीं थी जो सनातनियों को एक करती, फिर भी सनातनियों में दीर्घ काल तक अद्भुत एकता रही | ब्रह्म से दूर हुए, तो एकता टूटी और समाज का पतन हुआ |

    अब एकता बढाने के लिए झुण्डवृत्ति का बिगुल फूँक रहे हैं जो सनातन धर्म के बचे-खुचे अवशेषों को भी मिटा देगी | भारत को ‘स्मार्ट’ देश बनाना चाहते हैं ! आज जी-न्यूज़ टीवी ने एक पागल को प्रचारित किया है जो “भीख मांगने” के विरुद्ध पाँच हज़ार किलोमीटर का साइकिल-अभियान चला चुका है | अमरीका में भीख माँगने पर 1824 ईस्वी से ही प्रतिबन्ध है, हालांकि अमरीका के अधिकाँश भागों में इसका कठोरता से पालन नहीं किया जाता, क्योंकि अमरीकी न्यायाधीश भी जानते हैं कि गौतम बुद्ध से लेकर प्राचीन ग्रीस के डायोजिनीस (असल उच्चारण था “देवगण:”) और बहुत से साधु-सन्त भीख माँगकर ही गुजारा करते रहे हैं ! ब्रिटिश राज में सन्यासियों की गिनती भिखमंगों के अन्तर्गत होती थी, क्योंकि ईसाई चर्च में पादरियों को भीख नहीं माँगना पड़ता, वे तो बड़े-बड़े मठों के स्वामी रहते हैं, और “सन्त” कहलाने के लिए भी चर्च से तीन चमत्कार का सर्टिफिकेट लेना पड़ता है | हिन्दुओं में भी अब तोंद वाले मोटे-मोटे मठाधीश पनप गए हैं, किन्तु ईसाइयों में तो भिक्षाटन की मान्यता ही नहीं है | सभी ईसाई देशों में भिक्षाटन पर प्रतिबन्ध है | वे लोग भूल गए हैं कि ईसा मसीह और बहुत से ईसाई सन्त कैसे अपना पेट भरते थे !!

    दुर्वासा मुनि तो भिक्षाटन से अपना और दस हज़ार शिष्यों का पेट भरते थे | आज के तथाकथित हिन्दू-राष्ट्र वाले (जो हिन्दू-राष्ट्र का अर्थ नहीं समझते) और हिन्दू-विरोधी तो दुर्वासा मुनि को कालनेमि अथवा भिखमंगा घोषित करके जेल में डाल देंगे ! यही कारण है कि मैंने अपना मकान बेचकर बैंक में डाल दिया और उससे गुजारा चलाता हूँ, ताकि कलियुगी हिन्दुओं से भीख न माँगना पड़े | आपलोगों में से कितने लोग ऐसे हैं जिनके द्वार पर कभी कोई सच्चा सन्यासी भीख माँगने आया है ? यदि नहीं आया है तो आप अभागे हैं ! तीर्थ उसे नहीं कहते जहाँ भगवान हों, क्योंकि भगवान तो सब जगह हैं | श्रीमद् भागवत पुराण ने स्पष्ट कहा है कि तीर्थ उस स्थान को कहते हैं जहाँ साधु रहते हों | यदि आपके यहाँ साधु नहीं आते तो आपको तीर्थों में जाना चाहिए, क्योंकि साधुओं का ईश्वर से सीधा सम्पर्क रहता है | किन्तु साधुओं को अपनी कुत्संग से परेशान न करें | उनसे सावधानीपूर्वक बात करें | जो सच्चे साधु हैं वे अपने मन की भी नहीं सुनते, केवल ईश्वर की सुनते हैं | सच्चे साधु को पहचान सकें इसके लिए योगसाधना करना पडेगा |

    कोई व्यक्ति निठल्लेपन के कारण भीख मांगे तो अपराध है, किन्तु आप तय कैसे करेंगे कि कौन सच्चा सन्यासी है और कौन निठल्ला है ? सन्यासी होने का सर्टिफिकेट मठाधीशों से लेंगे तो विवाहित सिख दरजिन भी हिन्दू अखाड़े से महामण्डलेश्वर की उपाधि लेकर राधे माँ कहला सकती है ! सच्चे सन्यासी को तो सच्चा सन्यासी ही पहचान सकता है | जो स्वयं सच्चा सन्यासी नहीं है उसे “सच्चा सन्यासी” का सर्टिफिकेट बाँटने का अधिकार नहीं है | राधे माँ को महामण्डलेश्वर की उपाधि देने वाले “तथाकथित सन्यासी” पर आजतक कोई कार्यवाई नहीं हुई, आज भी अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् में वह ऊँचे पद पर है, हालाँकि हंगामा होने पर राधे माँ से उपाधि वापस ले ली गयी |

    कौन दुर्वासा है और कौन नहीं यह ईश्वर पर छोड़ दें, आप ईश्वर बनने का प्रयास न करें इसी में आपकी भलाई है | उपाधि देने और लेने वाला कभी भी सच्चा साधु नहीं हो सकता यह याद रखें | कोई सन्यासी यदि स्वयं अपने नाम में कोई भी उपाधि जोड़ता है तो वह साधु नहीं है, बल्कि यश का लोभी है, और महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार सारे पापों की जड़ है यश का लोभ | संसार में सदैव यश बना रहे इसके लिए वंश चाहिए और वंश के पालन के लिए पैसा चाहिए | अतः वित्त और पुत्र की ऐषणा (ईच्छा) तो केवल साधन हैं, असली पाप है यश का लोभ | अपना वंश न चलाकर हज़ारों चेलों का गुरु बने, उनका खर्चा उठायें और महंथ बने रहें, इसका “लोभ” तो छोटे परिवार के लोभ से भी बड़ा पाप कराता है (महंथ बनना पाप नहीं है, महंथ बनने का “लोभ” पाप है)| जिस जूना अखाड़ा के पदाधिकारी ने राधे माँ को हिन्दू सन्यासियों के महामण्डलेश्वर की उपाधि दी थी उसी जूना अखाड़ा के साधारण सन्यासियों को केवल आधी धोती और बिना गंजी-कुरते के हिमायल की बर्फ में मैंने देखा है |

    केदारनाथ में सड़क किनारे की बर्फ पिघली नहीं थी | मेरे साथ दो गृहस्थ और एक “ब्रह्मचारी” लड़का था | वह लड़का कैसा ब्रह्मचारी था यह मुझे पता था, किन्तु मेरे परिचितों को वह ब्रह्मचारी लगता था | खुले में बिना गंजी-कुरते के आधी धोती पहने चार साधुओं से मैंने कहा कि देखिए इस “ब्रह्मचारी” लड़के को ! वे उस लड़के पर बिगड़ गए, उसे ब्रह्मचारी मानने के लिए तैयार नहीं हुए | तब राजेश कुमार मिश्र उन साधुओं से बहस करने पर उतारू हो गए तो मैंने मना कर दिया और कहा कि बर्फ में बिना वस्त्र के रहने का सामर्थ्य आपमें नहीं है किन्तु उनमें है | मना नहीं करता तो बिचारे राजेश जी को साधुओं का शाप लग जाता (साधू शाप नहीं देते, किन्तु साधुओं का अपमान करने पर ईश्वर दण्ड देते हैं जिसे लोग साधुओं का शाप समझते हैं)| उस “ब्रह्मचारी” लड़के ने मुझसे परिचय होने से पहले ही एक सन्यासी से दीक्षा ले रखी थी, आजीवन अविवाहित रहने की डींग मारता था | मेरा लाखों रुपया जानबूझकर नष्ट किया | उसका पूरा खर्च मैं वहन करता था, किन्तु आज से तीन वर्ष पहले मुझे बिना सूचित किये उसने विवाह किया, दहेज़ भी लिया, पढ़ाई भी छोड़ दी, विवाह के बाद भी मैंने कहा कि पढ़ाई मत छोडो, आर्थिक सहायता मैं करूंगा, किन्तु अब पत्नीसेवा में व्यस्त रहता है | राजेश कुमार मिश्र मेरी मित्र-सूची में हैं, मेरे लेख नहीं पढ़ते, किन्तु उनके मित्र गोविन्द चन्द्र द्विवेदी भी केदारनाथ में उस समय थे जो आज भी मेरे लेखों को झेलते हैं | उन चार साधुओं की भविष्यवाणी सच्ची हो गयी, “ब्रह्मचारी” ने दहेज़ लेकर विवाह कर लिया, फिर भी राजेश कुमार मिश्र की आँखें आजतक नहीं खुली | बनारस की गर्मी हो या केदारनाथ की ठण्ड, केवल एक पतले कुरते में राजेश कुमार मिश्र और गोविन्द चन्द्र द्विवेदी ने मुझे भी देखा, सोलह दिनों तक हिमायल में साथ घूमे, किन्तु कभी यह नहीं समझ पाए कि गीता का यह वचन लागू कैसे होता है कि सर्दी और गर्मी में एक समान रहना चाहिए ! कई दशकों से कोई कोट या स्वीटर मेरे शरीर पर किसी ने नहीं देखा | छात्र था तो स्विट्ज़रलैंड और रूस का कोट तथा कश्मीर का स्वीटर पहनता था, गुरूजी ने छुड़ाया | एक मँहगा जैकेट पहनकर उनके पास गया तो ऐसी डांट पड़ी कि वहीं कैंची से जैकेट को मैंने काट डाला |साधुओं को पहचानना आसान नहीं होता | आधी धोती वाले गरीब भिखमंगे साधुओं का सम्मान करना तो और भी कठिन है !!! किसी बड़े मठ के स्वामी हों तो पाँव छूने में आनन्द आता है ! आखिर भगवान् विष्णु भी तो लक्ष्मीपति हैं, तो उनके भक्त गरीब कैसे हो सकते हैं !! अब ये भक्तजन भिक्षाटन पर पाबन्दी लगायेंगे और दुर्वासा को जेल भेजकर हिन्दुत्व को “स्मार्ट” बनायेंगे !!

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  • November 8, 2018 at 9:26 am
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    नरुका जितेन्द्र6 November at 21:39 · रामायण महाभारत आदि आदि हमारे साहित्य हैं वो साहित्य जो हमे इतिहास समझने मे मदद करते हैं।
    वो इतिहास जो समकालीन.. समकालीन मतलब कहानी से नहीं बल्कि जिस काल मे लिखे गए उस काल की संस्कृति समाज से नजदीक से अवगत कराते हैं साथ ही प्रचलित जनश्रुतियों से लिपिबद्ध होने तक एक कालखण्ड मे भी ले जाते हैं।
    ये साहित्य आपको तत्कालीन समाज, संस्कृति, राजनीति की स्थिति का भान कराते हैं।
    द्रविड़ आर्यों के संघर्षों की झलक है तो महिलाओं की स्थिति, जातीय व्यवस्था छुआछूत का तानाबाना स्प्ष्ट है। जो तब नैतिक मूल्य थे अब अपराध हैं जैसे अग्नि परीक्षा!!
    लेकिन
    नास्तिकता या प्रगतिशीलता के नाम पर इन साहित्य का मजाक बनाना घृणा करना मेरी नजर मे सिर्फ संकुचित मानसिकता है।
    हाँ ये मिथ/कल्पना हैं पर तत्कालीन मानव के मस्तिष्क की दौड़ दर्शाते हैं और स्प्ष्ट करते हैं तत्कालीन मानव के सोचने की हदें क्या थी उड़ान क्या थी यानी ये भी विज्ञान है जब लेखक अग्निबाण पुष्पक विमान की कल्पना करता था तो वो ये सब पा लेना चाहता था और आज पाए।
    कुछ आस्थावान इन कल्पनाओं को सत्य मानते उस पिछड़े युग को वैज्ञानिक सम्पन युग घोषित कर देते हैं, कुछ समाज के उत्तरोत्तर विकास को समझते हैं और कुछ इन्हें मिथ तो कहते हैं पर द्रविड़ आर्यों के संघर्ष को खुद की अस्मिता से जोड़ महिषासुर, रावण पूजने लगते हैं!!
    मेरी समझ मे तीसरा वर्ग पहले वर्ग से भी ज्यादा मूर्खतापूर्ण राह पर दौड़ पड़ता है और नाम है प्रगतिशील नास्तिक ब्लाह ब्लाह..

    रामायण थाईलैंड, यूरेशिया, इंडोनेशिया या भारत की प्रारंभिक कथा हो!!
    इसका मजाक उड़ाने की बजाय ये समझना जरूरी की इतने बड़े भूभाग लगभग पूरे एशिया मे ये कथा क्यों पैर पसारे है!!
    क्यों ये बद्व की जातक कथाओं से लेकर दूर दूर तक अलग अलग रूप में है!!

    खैर इन मिथ कहे जाने वाले साहित्यों मे गोता लगाने को इतना है कि 2-4 जीवन कम पड़े।
    इनमे इतिहास विज्ञान संस्कृति राजनीति सबकुछ है।

    मैं इस भूमिका से मुख्य बिंदु पर आना चाहता हूँ कि नास्तिकता क्या है जिसपर मेरे अगले पोस्ट होंगे।
    दरअसल एक युवा FB मित्र ने मुझसे इनबॉक्स मे सवाल पूछा कि सर
    “मैं नास्तिक हूँ पर दिशा निर्देशित कीजिए मानव जीवन का उद्देश्य क्या हो!!
    उक्त मित्र पारंपरिक मुस्लिम परिवार मे जन्मे हैं अबतक बस इतना संघर्ष कर पाए कि घरवाले उनकी नास्तिकता पर पहले की तरह बवाल नही काटते उनकी नास्तिकता को स्वीकार करने लगे हैं।
    अब उनसे क्या कोई मुझसे भी उम्मीद करे की मैंने अपने घर को तो मेरे जैसा बना ही दिया होगा तो सुनलें मेरी पत्नी तक आस्तिक हैं।
    बस इतना भर है कि उनकी आस्था व्यक्तिगत स्तर तक पहुंच गई है प्रदर्शन मंदिर में घण्टा बजाना उन्हें अटपटा लगने लगा है और कन्नी काटती हैं।
    बाकी हम इस विषय पर कभी बात नही करते क्योंकि और भी काम हैं गृहस्थी समाज मे इस नास्तिकता की गाल बजाई के सिवा।

    हाँ तो उक्त मित्र का ईमानदार सवाल मुझे चिंतन को मजबूर कर गया कि नास्तिक हो गए अब उद्देश्य क्या!!

    या तो FB पर टेक्स्ट बायो में नास्तिक रेशनल अलाना फलाना लिख ठीक वैसा ही प्रदर्शन गाल बजाई कर सकते जैसे पंडीत जी ललाट पर 3×6” का चंदन का तिलक और मुल्ला जी अरबी दाढ़ी रखकर महान धर्मी दयालु दीनी दिखते या खोज सकते कि ये बड़ा प्रश्न है।
    चेतना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नास्तिक तो हो गए अब आगे!!
    इस गूढ़ प्रश्न को मजाक मत समझिये।
    इसीलिए आख़िरीयत मोक्ष के झांसे आजतक सबसे ज्यादा कामयाब हैं।
    नास्तिकता कोई पड़ाव आंदोलन या उद्देश्य नहीं ये तो सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टिकोण तार्किकता की शुरुआत है।
    अब मानव जीवन के उद्देश्य क्या हों??
    इस सवाल पर चर्चा जारी रखेंगे…न.रुका

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