संजय तिवारी संपादक ” विस्फोट” आप क्यों बदल गये !

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हिंदी नेट पर मेने जितने लेखकों पत्रकारों को पढ़ा हे उनमे रविश कुमार और संजय तिवारी संपादक विस्फोट को में सबसे अधिक विद्वान मानता हु संजय तिवारी हमेशा बेहद गुणीऔर निष्पक्ष व्यक्ति और लेखक लगे उनको हम 2010 के आस पास से लगातार पढ़ते आये हे याद आता हे की किस तरह से उन्होंने मकबूल फ़िदा हुसैन की मौत होने पर जश्न मना रहे हिन्दू कटट्रपन्तियो को जम कर लताड़ा था उनके सामने टिकने की उनके तर्कों को काटने की किसी बजरंगी की हिम्मत नहीं थी मगर पिछले कुछ समय से उनकी साइट और उनके पेज पर पाया की वो कुछ ”कन्वर्ट ” ( बदल ) से हो गए हे हालांकि अभी भी बहुत बेहतर हे मगर एक इतने अच्छे और निष्पक्ष लेखक का यु ज़्यादा या थोड़ा सा भी दक्षिणपंथ में कन्वर्ट सा हो जाना गम्भीर चिंता का विषय तो हे ही ( आज भी संजय तिवारी मुजफरनगर दंगो के आरोपी नेताओं के प्रचार का प्रचार करते दिखे एक प्रोपेगंडे बाज़ वहां लिखता हे की लेकिन कोई यह नहीं बताता कि जिस शहनवाज की हत्‍या पर ये दंगे भड़के थे उसकी छेड़छाड़ से तंग होकर दर्जनों लड़कियों ने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी थी । इस पर तिवारी जी ने यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई की ऐसा था तो कोई पुलिस रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज़ कराइ गई ? इस क्लेश से आख़िरकार किसको फायदा होना था और हुआ भी ) जबकि पहले ही मिडिया का एक बड़ा हिस्सा इस सरकार का खुला चरण चुम्बन कर रहा हे ऐसा चरण चुम्बन जो इससे पहले किसी सरकार का नहीं देखा गया वो भी तब जबकि इस सरकार की कोई खास जमीनी उपलब्धि भी नहीं हे ऊपर से इस सरकार के आने के बाद से महगाई और साम्प्रदायिकता में समान इजाफा ही हो रहा हे सोशल मिडिया पर तो सबसे अधिक हिन्दू कटट्रपन्तियो फिर मुस्लिम कटट्रपन्तियो का भारी प्रचार हे ही . इंटरनेट से अधिकाधिक लोग उसमे भी कम उम्र लोग जुड़ ही रहे हे जो किसी भी तरह के प्रचार में बड़ी जल्दी बह भी जाते हे ऐसे में संजय तिवारी जैसे शुद्ध बेहतरीन ज्ञानी और निष्पक्ष लेखक पत्रकार का भी हल्का सा भी कन्वर्ट होना चिंता में तो डालता ही हे ऐसी बात नहीं हे की अब संजय तिवारी और सुरेश चिपलूनकर में कोई फर्क नहीं रहा नहीं ,मगर क्या एक निष्पक्ष लेखक से ये आशा की जा सकती हे की वो मोदी सरकार की सबसे बड़ी दुष्टता हरियाणा हिंसा पर कोई बड़ा और गम्भीर लेख तो छोड़ो दो शब्द भी ना कहे जबकि यही लोग अक्सर सोशल मिडिया पर दो लफ्ज़ो की टिप्पणियाँ तो लगातार करते ही रहते हे ज़ाहिर हे की थोड़े ही सही मगर अब दक्षिणपंथी झुकाव के कारण अब उनके दिल में इस शुद्ध संघी सरकार के लिए खासी जगह बन गयी हेलेकिन ऐसा क्यों हुआ वजह ?

मेने पाया की पिछले दिनों वो पाकिस्तानी मिडिया के वीडियो मुल्ला मौलवियों के वीडियो काफी देख रहे थे बड़े ही दुःख की बात हे की एक तो पाकिस्तानी मिडिया में कई बार हिन्दुओ के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया जाता हे इन्हे कोई रोक नहीं हे वही ये कुछ मुर्ख मुल्ला मुसलमानो को गज़वा ए हिन्द के ख्वाब दिखाते रहते हे यानि इनकी सोच की मुस्लिम फिर से दिल्ली पर कब्ज़ा करके हिन्दुओ को फिर से गौरी गजनबी औरंगजेब की तरह गुलाम बना लेंगे इनकी बाते इतनी भड़काऊ और बेहूदा होती हे की इनका अध्ययन करने के दौरान उनका शायद तिवारी जी पर गहरा असर हुआ होगा ऐसा असर जो उन्हें इस्लाम और मुसलमानो से खतरे और फिर हिन्दू कटटरपंथ के प्रति हल्की सी सहानभूति की तरफ ही ले जाएगा नतीजा उन्होंने दो साल से भी अधिक बीत जाने पर भी पहली शुद्ध संघी मोदी सरकार की असफलताओं पर भी कोई बड़ा या गम्भीर लेख तो खेर लिखा ही नहीं उल्टा मोदी सरकार की सबसे बड़ी दुष्टता हरियाणा हिंसा पर भी कोई छोटी मोटी टिपण्णी भी नहीं की सिर्फ एक बार जाटो को प्यार से समझाते दिखे हद तो ये हो गयी की हरियाणा हिंसा और मुरथल जैसे दिल दहला देने वाले काण्ड के बाद भी फिर से हरियणा में आंदोलन शुरू हो गए हे इस भरोसे की दिल्ली की चाबी लखनऊ में चुनाव को देखते हुए ये सत्ता की भूखी सरकार कोई सख्ती तो करने वाली हे नहीं उल्टा दंगइयो को छुड़वाने और मुआवज़े की मांग जोर शोर से की जा रही हे निष्पक्षता छोड़ कर दक्षिणपंथ में हल्का सा कन्वर्ट होने के कारण तिवारी जी ने अभी तक इस घिनौनी राजनीति के खिलाफ भी अपनी कमाल की कलम को खामोश ही रखा हे

इसके अलावा ये भी सच हे की मेनस्ट्रीम और सोशल मिडिया पर भी अधिकांश मुस्लिम लिखने वालो का रवैय्या निष्पक्ष नहीं हे वो भारत और दुनिया भर में मुस्लिम कटटरपंथ से जुडी हर छोटी हो या बड़ी हर घटना को संघ भाजपा कांग्रेस दुनिया अमेरिका रूस और यहूदियों की तो कन्फर्म ही बताते हे और मुस्लिम कटटरपंथ विषय पर चुप्पी ही साधे रखते हे बताते हे की हाल ही सोशल मिडिया पर हुए बुर्के परदे हिजाब पर बहस में अधिकांश मुस्लिम नामो ने किन्तु परन्तु करके हिजाब आदि का बचाव ही किया जबकि ये वहाबियो के बढ़ते प्रभाव का सबूत ही हे की छोटी छोटी लड़कियों तक से हिजाब करवाया जा रहा हे मगर अधिकांश मुस्लिम लिखने वाले इन विषयों पर मौन साध कर केवल अपने साथ होने वाले अन्याय जुल्म की ही चर्चा करते रहते हे मुस्लिम कटटरपंथ का ये लगभग वजूद ही मानने से इंकार करते हे हर बात इन्हे ”सारी दुनिया में तेज़ी से फैल रहे इस्लाम के खिलाफ एक साज़िश ही लगती हे ” एक जगह संजय तिवारी लिखते हे की Sanjay Tiwari24 April कितना लड़ेगें आप जहालत से? जहालत जेहन के आखिरी तह पर जमी हुई है, आप चुक जाएंगेलेकिन जहालत जिन्दा रहेगी।यह कोई इमरान खान नाम का आदमी है। अव्वल तो यह बहुत शातिर और झूठा है। इसकी प्रोफाइल की पड़ताल करके आपके जेहन में खुद बहुत से सवाल उठेंगे। बताता है कि मुंबई में रहता है लेकिन फोटो डाल रखी है पश्चिमी उत्तर प्रदेश की। इफको खाद का पोस्टर इसकी तस्दीक कर रहा है। फिर कह रहा है कि इसने किसी प्रीति गुप्ता नामक लड़की लव जिहाद में फंसाकर शादी की है और वह लड़की शादी के महीने भर बाद ही बुर्का पहन रही है।तो भैये ये लड़की हिन्दू तो कहीं से नहीं लग रही है। हमारे उत्तर भारत में बुर्काधारी महिलाएं एक खास किस्म से श्रृंगार करती हैं जो हिन्दू लड़कियां या महिलाएं कभी नहीं करतीं। इस लड़की की जांच की जाए तो इसके दावे की पोल खुल जाएगी।अगर मान भी लें कि इसने सचमुच यह जिहाद किया है तो फिर सवाल ये है कि इस बात का यह इतना बड़ा प्रोपेगेण्डा क्यों कर रहा है? और इसके प्रोपेगेण्डा पर हजारों मुसलमान चौबीस घण्टे से माशा अल्लाह की रट क्यों लगाये हुए हैं? क्योंकि यही तो उन्हें चाहिए। सबसे बड़ी कामयाबी तो यह है कि उसने जिहाद किया। फिर सोने पर सुहागा यह कि उसे बुर्का पहनाकर इस्लाम भी नाफिज कर दिया। माशाअल्लाह कौम को इससे ज्यादा और क्या चाहिए?अगर हिन्दू घर से आई लड़की बुर्के की अहमियत समझकर महीनेभर में ही बुर्काधारी हो गयी तो मुस्लिम लड़कियों तुम्हें इससे इतनी परेशानी क्यों होती है। यह एक कट्टरपंथी मनोवैज्ञानिक युद्ध है जो वे बहुत करीने से लड़ रहे हैं। आप स्टूडियो में बैठकर उच्च आदर्शों का ज्ञान बांटते रहिए। वे आपकी उदारता को भी अपनी कट्टरता तराशने के लिए एक शील्ड की तरह इस्तेमाल करते हैं और अपना काम करते हैं।

जो लोग कूद कूदकर लव जिहाद को हिन्दूवादी प्रोपेगेण्डा बताते हैं और हरकारा लगाते हैं उनको उस जेहन में भी घुसने की कोशिश करनी चाहिए जिसकी अजान लाउडस्पीकर लगाकर नहीं बल्कि कानोकान दी जाती है। ” तो लगता यही हे की हो सकता हे की लगातार मुस्लिम कटटरपंथ के अध्ययन और उस पर अफ़ज़ल भाई ताबिश सिद्द्की आदि जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश मुस्लिमो लिखने वालो की चुप्पी , ख़ामोशी ने एक बेहतरीन पत्रकार और निष्पक्ष लेखक को कही न कही दक्षिणपंथी खेमे में धकेल दिया इसके अलावा भी देखे तो आज हालात निष्पक्ष पत्रकारों के लिए बदतर हो ही रहे हे दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी अपने चाटुकार पत्रकारों को खूब नवाज़ा वही भाजपा भी भी इन चाटुकारो को राजयसभा में भेज ही रही हे और एक निष्पक्ष पत्रकार कब तक पेट पर पत्थर बाँध कर अपना काम करता रहे जबकि महानगरों में लगातार बढ़ती महंगाई में जीना मुहाल हे पिछले दिनों तिवारी पर हुए एक हमले और उसके बाद उनकी ख़राब माली हालात की भी खबर मिडिया साइट पर आई थी कौन जाने इससे भी वो दक्षिणपंथ की तरफ कुछ आकर्षित हुए हे कुछ भी हो सकता हे जो भी हो विशुद्ध सेकुलर विशुद्ध निष्पक्ष पत्रकारों लेखकों की संख्या का लगातार कम हो जाना ये आम आदमी के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं हे

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40 thoughts on “संजय तिवारी संपादक ” विस्फोट” आप क्यों बदल गये !

  • June 12, 2016 at 5:06 pm
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    सीधी सी बात हे भला कौन सा ऐसा निष्पक्ष व्यक्ति विचारक हो सकता हे जो इतनी गन्दी घिनौनी हरियाणा हिंसा पर अपना मुंह सी ले कोई दक्षिणपंथी झुकाव वाला व्यक्ति ही हो सकता हे ? एक तो इतनी गन्दी हिंसा , वो भी बिलकुल बेमतलब बेवजह , जाट कोई दलित आदिवासी नहीं हे ऊपर से कोई खास सरकारी नौकरियां हे ही नहीं फिर भी इतना ज़ुल्म हुआ ? इस सब के लिए कोई जिम्मेदार हे तो वो हे मोदी शाह जिन्होंने सत्ता की हवस में खटटर को जाटो पर सख्ती से रोका था बेहद दुःख हे की हम जैसे छुटभैयों लेखकों ने तो इस पर लिखा https://khabarkikhabar.com/archives/2514 हम से दस गुना बेहतर इस पर निष्पक्ष पुराना संजय तिवारी जी लिख सकते थे मगर कुछ भी तो नहीं लिखा

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  • June 13, 2016 at 11:21 pm
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    कैराना में ‘कश्मीर’ खोजने वाली दंगाई पत्रकारिता पर हल्ला बोल !June 11, 2016MediaVigilटीवी, ख़ास ख़बर58यूपी चुनाव को देखते हुए अचानक गाय से लेकर मुस्लिम आबादी का मुद्दा गरमाया जा रहा है। विकास का दम भरने वाली बीजेपी की सफलता पाने की रणनीति ही समाज के धार्मिक विभाजन पर टिकी है। लेकिन अफ़सोस जब पत्रकारों को इस साज़िश का पर्दाफ़ाश करना चाहिए तब तमाम लोग इस साज़िश का हिस्सा बन चुके हैं। या कहें कि यूपी में दंगा करने की सुपारी ले चुके हैं। इसके ख़िलाफ चेताते हुए वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी एक ज्ञापन तैयार कर रहे हैं और समाज से समर्थन माँग रहे हैं। यह एक ज़रूरी काम है, समाज का दबाव ही इन दंगाइयों के हाथ बाँध सकता है, वरना सत्ता तो उन्हें संरक्षण दे रही है। यह संयोग नहीं कि जिस ज़ी न्यूज़ के कारनामे इस लिहाज़ से सर्वाधिक निशाने पर हैं, वे बीजेपी की ओर से राज्यसभा सदस्य बनने की जुगत भिड़ा रहे हैं। पढ़िये क्या कहते हैं पंकज चतुर्वेदी– ‘इलेक्‍ट्रानिक मीडिया को पश्चिमी उ.प्र. में आग लगाने से रोका जाए, इस पर एक ज्ञापन तौयार कर रहे हैं, कौन कौन इस पर दस्‍तखत करेगा बताएं.बीते तीन दिनों से कुछ टीवी चैनल जिसमें एक विचारधारा खास के , व छी टीवी के रूप में कुख्‍यात चैनल सबसे आगे हैं, मुज्रफरनगर के कैराना कस्‍बे से हिंदुओं के पलायन की स्‍टोरी चला कर उसे ‘कश्‍मीर” की तरह हिंदू रहित बनाने की साजिश की काहनियां चला रहे हैं,इसमें एक सांप्रदायिक दल के लोगो के इंटरव्‍यू चलवाये जा रहे हैं. पहले कुछ आंकडे वह भी सरकारी वेबसाई ट से .

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    • July 30, 2016 at 1:33 pm
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      Sir, read your post carefully and found what man you are manufactured truth is always poisonous than poison the way you blend murthal kand (where nothing is foo) and more blaw blaw.. Dear sir you promised a lot but as worst at other

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  • June 13, 2016 at 11:25 pm
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    यह भी सही है कि 2013 के पश्चिमी उ.प्र. के भीषण दंगों के बाद मुस्लिम आबादी जो कि 45 हजार से ज्‍यादा थी, ऐसी बस्तियों में पलायन कर गई जहां, मुसिलम आबादी अधिक थी. इस तरह कैराना में लगभग 10 हजार नए मुसलमान पहुंचे. वह एक दीगर स्‍टोरी है, लेकिन उसका जिक्र जरूरी है कि कैराना पहुंचे मुसलमानों को मिले मुआवजे के एसज में एक बडे मुस्लिम नेतना ने उनको आवास दिए, हालांकि यह भी धोखा था, क्‍योंकि पैसा तो ले लिया गया, लेकिन आवास का मालिकाना हक नहीं. यह भ सही है कि नई मुस्लिम आबादी, जोकि लुटी पिटी आई थी, अपने समाज के बाहुलय के बीच पहंच कर कुछ आका्रमक भी हो गई. इस छोटे से कस्‍बे में रोजगार की संभावनाओं पर इन नव आगंतुक लेागों के सस्‍ते श्रम ने विपरीत असर डालाा

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  • June 13, 2016 at 11:36 pm
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    जरा उन बस्तियेां में झांक कर देखें जहां विस्‍थापित दंगा पीडित मुसलमान हैं, जिंदगी कराहती दखिेगी, उन्‍हे उन मुसलमान रहनुमओं ने भी खूब लूटा जिनकी तकरीरों के बदौलत वे ”अपनों” के बीच आ गए थे. इस पलायन की सनसनी के दो झूठ तो सामने हैं ,एक आबादी वाला, दूसरा हत्‍या वाला. कैराना के 21 हिन्दू हत्‍याओं और 241 पलायन किये परिवारों को सूची कोरा गप्प हैहमारी मांग होगी कि पलायन कीखबरकीवास्‍तविकता की जांच हो, जिसमें सिविल सोसायटी के लेाग भी शामिल किये जाएं, यदि पलायन की खबर सही है तो उसके कारणा और यदि उसका गुडागिर्दी कारण है तो गुंडो पर रासुका जैसी कडी कार्यवाही हो.इस तरह की खबर फैलाने, व उसके लिए टीवी पर बयानबाजी करने वले लोगों की प़ष्‍ठभूमि क्‍या है, वे किस राजनीतिक दल के लिए काम करते हैं और बीते दंगों में उनकी क्‍या भूमिका थी, इसके आधार पर तथ्‍यों को देखा जाए.यदि खबर झूठी हो तो ऐस टीवी चैनलों व बयानवीरों पर दंगा भडकाने की कार्य्वाही हो और इनके सरकारी विज्ञापन बंद हों.इसमें कोई शक नहीं है कि पश्चिमी उ.प्र. में भडकाउ लोगों पर पाबंदी लगाने में राज्‍य सरकार पूरी तरह नाकाम रही है या फिर साजिशन ध्रुवीकरण की किसी नई बारी का इंतजार कर रही है, बिसाहडा सुलग रहा है, गाजियाबाद, बुलंदशहर में हथियार वाले प्रशिक्षण चल रहे हैं, शामली, कैराना, गाजियाबद के कैलाभटटा, पसोंडा आदि में विस्‍थापित मुसलमनों को भडकाने के प्रयास हाे रहे हैं, यह हालात अच्‍छे नहीं है और देश की प्रगति, आर्थ व्‍यवस्‍था और छबि के लिए दूरगामी नुकसानदेह हैं, आप सभी इसके खिलाफ खडे हों, पलायन की खबर सच हो तो मुस्लिम सांप्रदायिकता के खिलाफ और यदि झूठी है तो दूसरे फिरकेकेकुछलेागोंकीहरकतोंकेखिलाफ।”(पंकज चतुर्वेदी.. उधर संजय तिवारी जी का हाल देखिये शायद मेने गलत कहा था हल्का नहीं वो पूरी तरह से ”कन्वर्ट ” हो चुके हे देखिये किस तरह से कभी इतना बढ़िया बुद्धजीवी पत्रकार आज कैसे सोशल मिडिया के सड़क छाप लोगो की अफवाहों को हवा दे रहा हे Sanjay TiwariYesterday at 19:29 · कैराना में गंगा-जमुनी तहजीब चल रही है। चैनल में आने वाली फीड में महिला कह रही है, जब नहाने जाती हूं तो ——- अधोवस्त्र खोलकर खड़े होजाते हैं।

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  • June 15, 2016 at 12:11 am
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    इस विषय पे जो आप का लेख आया था “कन्हैयाओ मत साथ दो, मत साथ लो, मुस्लिम कट्टरपंथियों का” जैसा शीर्षक था, बहुत उम्दा था. जब “जे एन यू” प्रकरण पे लोग दो खेमो मे बॅंट गये थे, संतुलित राजनैतिक वर्ग नदारद था, तो बुद्धिजीवी समझदार वर्ग भी इधर या उधर गिरने वाला ही था.

    मुझे लगता है, मोदी या भाजपा की झोली मे गिरने वाले, तमाम व्यक्तियों को हम संप्रदायिक मान के दुतकारने लगेंगे और इस ओर नज़र नही दौड़ाएंगे कि हिंदू कट्टरवाद का मुखर विरोध करते समय, मुस्लिम कट्टरपंथ भी समाज मे व्याप्त है, और जो उतना ही ख़तरनाक है, तो एक समझदार इंसान को भी आप असुरक्षित महसूस करवाओगे, असुरक्षा दक्षिणपंथ की तरफ झुकने मे सबसे मददगार है.

    मुसलमानो के हितैषी होने के लिए, अधिकांश लोग, मुस्लिमो की स्टीरियो टाइप छवि को ही प्रदर्शित करते हैं. मुसलमान सिर्फ़ मुसलमान ही रह गया है, हमारे समाज मे.
    दक्षिणपंथी और सेकुलर दोनो के लिए.

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    • June 15, 2016 at 8:35 am
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      जाकिर भाई मेने लिखा तो हे की सोशल मिडिया फेसबुक आदि पर अफ़ज़ल भाई ताबिश और इक्का दुक्का होंगे को छोड़ कर अधिकतर मुस्लिम लिखने वालो का रवैय्या बहुत हि ख़राब हे हो सकता हे की इससे भी तिवारी जी नाराज़ हो ? लेकिन वो ठीक हे की वो मुस्लिम कटटरपंथ के खिलाफ लिखे खूब लिखे हमें उससे एतराज़ नहीं हे मगर एक अच्छा खासा बुद्धजीवी लेखक कही कही सोशल मिडिया के मोदी ब्रिगेड के छुटभय्ये सदस्य की तरह बात करने लगे तो ये गलत तो हे ही जाकिर भाई देखिये उन्होंने एक संघी देवांशु झा जेसो की इतनी बेहूदा बात तक का प्रचार किया हे ” कैराना में गंगा-जमुनी तहजीब चल रही है। चैनल में आने वाली फीड में महिला कह रही है, जब नहाने जाती हूं तो —— अधोवस्त्र खोलकर खड़े हो जाते हैं। कितना दिगंबर धर्म है ये जो अपनी बहू, बेटियों को नहाते देखकर खुद को नंगा कर लेता है। Devanshu झा और याद रहे की जब बहु बेटिया मुरथल में ———- तब इनकी चू नहीं निकली थी

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      • June 15, 2016 at 6:23 pm
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        जाकिर भाई में तो ये भी कह ही चूका हु की तिवारी जी सोशल मिडिया की ” इंशाल्लाह माशाल्लाह ” ब्रिगेड से नाराज़ और भड़के हुए हे कोई दो राय नहीं की इन पढ़े लिखो का भी रवैय्या बहुत ही बचकाना हे इनकी मूढ़मति की कोई सीमा नहीं हे अब देखिये की मोहम्मद अली का इंतकाल हुआ तो लग गए अली के बहाने इस्लांम के प्रचार में , मोहम्मद अली ये मोहम्मद अली वो ये किया वो किया वगैरह वगैरह ठस दिमाग इतने हे की एक बार भी उस अमेरिकी सेकुलर डेमोक्रेटिक निजाम की तारीफ और चर्चा नहीं करते जिसमे अश्वेत होने और फिर इस्लाम में कन्वर्ट होने के बाद भी अली इतने बड़े और नेशनल हीरो बने हि , क्या मुस्लिम देशो में भी ऐसा हो सकता हे उधर पाकिस्तान मे अब्दुल सलाम नोबेल विजेता की दुर्गत ? इन बातो से इन्हे कोई सरोकार नहीं

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  • June 15, 2016 at 8:01 am
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    अच्छा हो सकता हे की तिवारी जी सोशल मिडिया पर पाठक पाने के लिए नए ” सुरेश चिपलूनकर ” बनंना चाह रहे हो ? कमाल ये हे की इन सुरेश जी को पिछले दिनों संघी प्रोपेगंडे खेमे की तरफ से ऐसी अपमान की लात पड़ी की बेहद तिलमिलाकर अब वो बार बार भाजपा संघ शिवराज को कोस भी रहे हे जबकि उधर संजय तिवारी जी ”नए नए मुल्ला ” की तरह पुरे जोश में हे अब तो ओरिजनल लिखने की जगह शायद सीधे राकेश सिन्हा की बात भी रख रहे हे खेर जो भी हो तिवारी का अंजाम अब पाकिस्तान गए भारतीय कलाकारों जैसा ही होगा शर्तिया इनकी ” कला ” अब मर जाएगी अब वो कोई नया अच्छा लेखन पत्रकारिता नहीं कर पाएंगे . — 2012 ”बंजर भूमि विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में इतनी प्रतिभाएं भरी पड़ी थीं कि जो यहां आता था बड़ा कलाकार, कवि, लेखक और संगीतकार बन जाता था। लेकिन पाकिस्तान बनते ही पता नहीं इस बौद्धिक कौशल को कौन-सा सांप सूंघ गया? जो भाग विविध कलाओं का सर्जक था वह अचानक ही बंजर भूमि में बदल गया। दस-बीस नुसरत फतेह अली जैसे पैदा भी हुए तो उन्हें बहुत जल्द ग्रहण लग गया। केवल इतना ही नहीं, पाकिस्तान बन जाने के पश्चात मजहबी जुनून में पागल होकर अथवा अपनी सुरक्षा की चिंता करके जो पाकिस्तान पलायन कर गए उनके भविष्य के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह लग गया। भारत में अपनी आवाज से लोगों को दीवाना बनाने वाली नूरजहां के जीवन का नूर ही उतर गया। पाकिस्तान में उनकी बनी फिल्म दुपट्टे में वे लिपट कर रह गईं। उनके पति शौकत, जो सफल निदेशक थे, गुमनामी के गर्त्त में चले गए। जुगुनू फिल्म के संगीत निदेशक फिरोज निजामी कहां लुप्त हो गए? चर्चित कमेडियन नूर मोहम्मद चार्ली, चरित्र अभिनेता शाह नवाज, एस. नजीर पाकिस्तान की धरती में कहां समा गए, इसका उत्तर देने वाला कोई नहीं है। बेगम पारा से पूछिए कि वे पाकिस्तान से पुन: भारत क्यों लौट आईं?सिद्ध उर्दू कवि जोश मलीहाबादी, महान कहानीकार हसन मंटो और नियाज फतेहपुरी को कौन से नाग ने डंस लिया, इसका उत्तर पाकिस्तान के पास नहीं है। प्रसिद्ध कवि फैज अहमद फैज का इन दिनों शताब्दी समारोह चल रहा है। लेकिन पाकिस्तान में नहीं, भारत में। 17 दिसम्बर को फैज की याद में एक विशाल मुशायरा मुम्बई के नेहरू सेंटर में आयोजित किया गया। ” इस ही अंजाम में तिवारी जी का स्वागत हे

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  • June 15, 2016 at 11:26 am
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    संजय तिवारी जी , अनुपम खेर का अंजाम याद रखो ( भाजपा में परेश भी हे पर वो दीवाने दक्षिणपंथी नहीं हे ) कितने बड़े कलाकार थे ये फिर पिछले सालो में इनका दक्षिणपंथी रुझान , मोदी प्रेम हिस्टीरिया में बदल गया नतीजा उनकी कला मर गयी बरसो हो गए उन्हें कोई यादगार रोल किये ? इन सालो में हमें दीपक डोबरियाल तक की परफॉर्मेंस तो खूब याद हे मगर अनुपम खोसला का घोसला के बाद याद नहीं आते ? दीपक असीम उर्फ़ अनहद ने क्या सटीक बात कही थी की सरफ़रोश फिल्म में एक मधुर ग़ज़ल गायक को आतंकवादी दिखाना बिलकुल गलत था क्योकि संकीर्ण और आतंकवादी विचार मन में आते ही उनकी कला और गला मर जाता फिर वो मधुर ना रहते अब यही तिवारी जी के साथ होगा मुस्लिम चाहे जितने कटरपंथी और दकियानूसी हो भी मगर आपके मन में मुस्लिम और इस्लाम विरोधी विचार लाते ही आप एक निष्पक्ष लेखक नहीं एक दक्षिणपंथी मामूली प्रोपेगेंडेबाज बन कर रह जाएंगे

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  • June 15, 2016 at 10:26 pm
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    जिस खेमे और मानसिकता में तिवारी जी जा रहे हे उसमे सुधीर चौधरी जैसे लोग बैठे हे जो एक बेचारी महिला की लगभग जान ले चुके थे ( झूठा स्टिंग ) नरेश गोस्वामी जिनके कई अच्छे लेख हमने भास्कर में पढ़े लिखते हे Naresh Goswamiसुधीर चौधरी को देखकर मुझे हमेशा ऐसा एहसास होता है कि ये आदमी लाशों के बीच बैठकर पिज्जा खा सकता है। शत्रु का शिकार करने के बाद भी उस पर अनंत काल तक गोलियां बरसा सकता है। जेएनयू मामले में इतनी फ़जीहत कराने और लानत मिलने के बाद भी इस आदमी के रवैये में ज़रा भी बदलाव नज़र नहीं आता। जैसे न्यूक्लियर ि‍फजिक्स में एक एंटी-पार्टिकल होता है वैसे ही ये आदमी मुझे ऐंटीमैन सा कुछ लगता है। किसी एक व्यक्ति में इतनी खीझ, इतनी घृणा, इतनी क्रूरता, और इतनी बेशर्मी नहीं हो सकती। कहीं ये आदमी किसी ऐंटीनेचर का प्रतिनिधि तो नहीं जो किसी खगोलीय गणना में भूल-चूक होने के कारण पृथ्वी पर आ गिरा है ? ” इधर तिवारी जी का चेता पाकिस्तानी वीडियो देख देख कर चल चूका हे इन्हे इतना भी नहीं पता की पाकिस्तान और पाकिस्तानी मिडिया में एक से बढ़ कर नीच और अच्छे लोग भी भरे पड़े हे कुछ का तो हाल ये हे की भारत की तारीफ किये बिना उनका रात का कहना हज़म नहीं होता मगर सिर्फ नफरत भरे पाकिस्तानियो को देख देख कर तिवारी जी खुद ज़हरीला बयान दे रहे हे की ” पाकिस्तान गिरहकटों का बड़ा वाला कैराना गिरोह है ” इस पर नरेश गोस्वामी लिखते हे ”सजय जी , आप दिव्य और अपरम्पार हैं. कुछ भी लिख देते हैं. ‘कैराना वाला गिरोह’ का क्या मतलब हैं यहां? कौन सा गिरोह काम कर रहा है वहां? ये एक तीसरे दर्जे की शरारत है… जान बूझकर की जाने वाली…. ” एक इतना काबिल लेखक आज तीसरे दर्जे तक गिर चूका हे बहुत अफ़सोस

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  • June 16, 2016 at 7:46 am
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    साम्प्रदायिकता की दुनिया ” साइको ” बना देती हे इसलिए चाहे जो हो अगला चाहे जो करे हमें इस दुनिया से दूर ही रहना चाहिए आम आदमी छोडिए इतना शानदार विध्वान तिवारी जी अब देखिये इस दुनिया में आकर किसी बहकी बहकी बाते कर रहे हे कोई तुक ही नहीं हे ? एक भले आदमी नरेश गोस्वामी उन्हें समझने की कोशिश कर रहे मगर वो फेसबुक के हिन्दू कठमुल्लाओं की भारी भीड़ की पुष्प वर्षा में खोय हे देखिये क्या अजीब बात लिख रहे हे किसी विवाद में इनके सर पर हुए हमले के बाद दिल्ली सरकार ने शायद शायद इनके इलाज की वयवस्था की थी में सरकार से अपील करूँगा की वो जाँच करे की कही फ़ंड की कमी से इलाज अधूरा तो नहीं रह गया था ” पाकिस्तानी गिरकहटो का बड़ा वाला कैराना गिरोह ” पर नरेश गोस्वामी के एतराज़ के बाद एक बेहद बेतुकी बात लिखते हे Sanjay Tiwari “जो जानबूझकर इतिहास को मश्क करते हैं, इतिहास उनको मश्क कर देता है।”मैं नहीं कह रहा हूं। यह पाकिस्तान के एक मशहूर लेखक हसन निसार कहते हैं।” Naresh Goswami संजय जी, आप गलत सिरा क्यों पकड रहे हैं. मैं किसी हसन की बात नहीं आपकी बदमाशी की बात कर फहा हूँ …. कैराना का ज़िक्र कहां से आया?

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  • June 17, 2016 at 9:42 am
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    तिवारी जी का नया नया ” घटियापन ” जारी हे जब पता हे की लाखो हिन्दू कटटरपंथी पहले ही जम्मू की घटना के सी सी टीवी फुटेज का प्रचार कर ही रहे हे तब भी ये भी शेयर करने से बाज़ नहीं आये कोई संपादक पद की गरिमा का ख्याल नहीं ? अफ़ज़ल भाई भी संपादक हे लेकिन ऐसा ही नहीं सकता की अफ़ज़ल भाई कभी भी कोई हल्की बात सोशल मिडिया पर कर दे सवाल ही नहीं हे लेकिन इनकी अब बस एक ही हवस किसी तरह अधिक से अधिक लाइक जुटाना इन्हे इतनी भी समझ नहीं की फेसबुक के हिन्दू कटट्रपन्तियो में सबसे अधिक लोकप्रिय नाम सुरेश चिपलूनकर तक को अभी लात पड़ी हे जिसके बाद उन्हें समझ आ गयी हे तो ये नए नए रंगरूट तिवारी जी भला क्या हासिल कर लेंगे हां एक ही हवस हे जो पूरी हो रही हे वो हे फेसबुक पर अधिक से अधिक लाइक बटोरने की इस हवस में एक और अच्छा पत्रकार रहे सुमंत भट्चार्य का भी दिमाग चला दिया हे अभी इन पर ऍफ़ आई आर होते होते बची हे कोई अच्छी कायदे की बात अब इनकी कलम से नहीं निकलती बस लाइक शेयर चाहते हे और आत्मुगद रहते हे इन्हे इतनी सी समझ नहीं की नेट पर सबसे अधिक हिन्दू कटट्रपन्तियो की ” फौज ” की गतिविधियाँ हे यहाँ तक कहा जाता हे की सोशल मिडिया न होता तो मोदी पि ही ना बनते ? अब हाल ये हे की सुमंत हो कोई तिवारी हो या कोई और बीमारी हो ये ” फौज ” हर घटिया सम्पर्दायिक विचार को टी आर पि दिला ही देती हे ये लोग इसे अपनी व्यक्तिगत टी आर पि समझ कर खुश और आत्ममुगद होते रहते ही दीवाने से हो रहे हे जबकि ये आपकी नहीं छिछले और नीच विचारों या आम जनरल सी बातो की की टी आर पि हे जो हमेशा रहती हे ये खुद पर मुगद रहते हे

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  • June 18, 2016 at 9:19 am
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    स्वप्न दासगुप्त की खिलखिलाहट
    आज ‘टेलिग्राफ’ में स्वप्न दासगुप्त का लेख In the echo chamber पढ़ कर मन में तत्काल उनकी जो छवि उभरी वह खीसे निपोड़ कर हँसती हुई वही सूरत थी जिस पर टेलिविजन के एक चैनल पर बहस के दौरान संविधानविद राजीव धवन ने उन्हें डाँटा था कि ‘तुम अपनी बात कह कर इस प्रकार हँसते क्यों हो !’ दरअसल, सभी उकसावेबाजों की यह एक स्थायी मुद्रा है । वे अपनी बात पर ज़रा भी गंभीर नहीं होते । उनका एक मात्र उद्देश्य सामने वाले को भड़काने का होता है ।आज के इस लेख में उन्होंने अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार उस डोनाल्ड ट्रम्प को उठाया है जिसके बारे में खुद उनका कहना है कि दुनिया के बौद्धिकों के बीच उनके प्रति ज़रा भी सम्मान का भाव नहीं है । फिर भी, अमेरिका का राजनीतिक हलका चाहे न चाहे, उसे ट्रम्प को मानना ही होगा । भारत के राजनीतिक हलकों को भी इस सच को स्वीकारना होगा ।दासगुप्ता के लिये सामाजिक मूल्यबोध नाम की चीज का कोई महत्व नहीं है । जैसे दुनिया के लोगों को बार बार तानाशाहों को मानना पड़ा हैं , जैसे लोगों को हिटलर-मुसोलिनी को मानना पड़ा था, जैसे भारत के लोगों को मोदी को मानना पड़ा है, वैसे ही अब अमेरिका को, और उसके चलते सारी दुनिया को ट्रम्प को अपनाना पड़ेगा !दासगुप्ता यह भविष्यवाणी करके इस लेख में ताली बजा कर हँसते हुए दिखाई देते हैं ! वे इसलिये खिलखिला रहे हैं कि एक अशिक्षित, क्रूर और बदज़ुबान आदमी दुनिया के चिंतनशील बौद्धिकों के सर पर चढ़ कर बोलेगा !

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  • June 19, 2016 at 7:16 am
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    तिवारी जी का हिंदुत्व की तरफ झुकाव बढ़ता ही जा रहा हे वो हिंदुत्व का प्रचार सा भी करते दिख रहे हे में भी लेखक हु में कभी धर्मप्रचार नहीं करता ये हमारा काम नहीं हे खेर अपने आस पास भी आपको कई तिवारी मिलेंगे तिवारी जी मिडएज की तरफ जा रहे हे आर्थिक इस्थिति कोई खास नहीं हे इतने साल इतनी अच्छी हिंदी पत्रकारिता लेखन किया मगर कोई लाभ नहीं कोई आर्थिक सुरक्षा ऊपर से उनके जीवन में और भी समस्याएं बताई जाती हे ऐसे ही मिडएज के कई लोग मेने देखे हे कई मुसलमान मेने देखे जिनके जीवन में इस उम्र में आर्थिक सुरक्षा आ गयी बच्चे बड़े हो गए सम्बन्धो की रिश्तों की गर्माहट आजकल ठंडी पड़ ही रही हे अय्याशी हर कोई कर नहीं सकता कोई नया काम कोई नया बिजनेस हर कोई कर नहीं सकता हे पढ़ने का हमारे देश में कोई खास कल्चर नहीं हे समाजसेवा करो तो और दस गुना बोझ आ जाएगा यानि जीवन में एक ठहराव एक खालीपन सा आ जाता हे तो आपने देखा ही होगा की ऐसे लोग मुसलमानो में खूब रिलिजियस हो रहे हे जरुरत से बहुत ज़्यादा यानि भारत में वो लोग जिनके जीवन में कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं हे एक ठहराव् हे एक नैराश्य हे और वो लोग जिनके जीवन में एक आर्थिक सुरक्षा हे मगर आगे कोई उमंग नहीं हे दोनों ही दक्षिणपंथी हुए जा रहे हे आपको अधिकांश बाबाओ के भक्त भी इन्ही दो तरह के मिलेंगे आर्थिक सुरक्षा वालो से इनका नाम होता तो जिसके पास आर्थिक सुरक्षा नहीं होती वो इनके प्यादे या रंगरूट होते हे

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  • June 19, 2016 at 7:44 am
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    आर्थिक असुरक्षा ( इनसिक्योरिटी ) और सिक्योरिटी , दोनों से ही आये जीवन में एक ठहराव एक खालीपन को जब लोग अधिक रिलिजियस या अधिक आध्यत्मिक सा होकर जब भरते हे तो वैसे मुझे खुद जीरो स्प्रिचुअल होते हुए भी कोई एतराज़ भी नहीं हे मगर मसला ये हे की उपमहाद्वीप में साठ करोड़ मुस्लिम और नब्बे करोड़ हिन्दुओ हे जिन को साथ ही रहना हे और हर कदम साथ रहना हे तो जब इन लोगो का झुकाव अधिक रिलिजियस होते हुए दक्षिणपंथ में हो जता हे तो ये हिन्दूमुस्लिम एकता के बजाय हिन्दू एकता या मुस्लिम एकता और एकदूसरे पर फिर सारी दुनिया पर ” फतह ” के सपने या तो देखने लगते हे या इस सपने का समर्थन करते हे या नहीं तो विरोध नहीं कर पाते हे बाद में यही लोग किसी जाकिर नाईक के किसी मदनी बुखारी ओवेसी के रविशंकर के रामदेव के वि एच पि के सीमेंट बनते हे संजय तिवारी जैसे सेम मसला पंकज झा नाम के मामूली पत्रकार का भि हे जो भाजपा की पत्रिका का संपादक हे दस साल पत्रकारिता करके भी खुद उसी के शब्दों में बेहद असुरक्षा हे तो अब ये रोज इस्लाम को दुनिया से खत्म कर देने की कसमे खा रहा हे उधर मेरे एक लिबरल कज़िन अब मिडएज और काफी पैसा बना लेने के बाद अब मुझे तब्लीग़ में जाने की सलाह दे रहे हे तो ये हे पुरे उपमहाद्वीप की यही स्टोरी हे

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  • June 28, 2016 at 9:48 pm
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    तिवारी जी , देवांशु झा जेसो को पढ़ते हे अब इन देवंशुओ को पढ़ते हे इनका कहना हे की मोदी सरकार 2024 तक रहनी चाहिए तभी उम्मीद हे वर्ना मुस्लिम १७ % से ३४ % होते ही देश पर कब्ज़ा कर कर लेंगे हिन्दू धर्म खत्म हो जाएगा वगैरह वगैरह ज़ाहिर हे ऐसी बकवास को पढ़ने और प्रभावित होने के कारण तिवारी जी की निष्पक्ष चिंतन की षमता खत्म हुई और वो एक दक्षिणपंथी में तब्दील हो गए एक कटटरपंथ दूसरे कटटरपंथ को कैसे सहारा और कन्धा देता हे ये इसका बेहतरीन उधारण हे देवांशु लिखता हे ”जहां तक मैं देख पा रहा हूं, ये आखिरी सरकार है जिसके सत्ता में रहते हुए भारत का हिन्दू बहुल राष्ट्र के रूप में भविष्य सुरक्षित है जो कि भारत के सेकुलर राष्ट्र होने की पहली और आखिरी शर्त भी है क्योंकि जिस दिन हिन्दू कम या मुसलमानों के बराबर हो गए उसी दिन भारत की दुर्दशा तय हो जाएगी । माननीय इकबाल महोदय की गर्वोक्ति ( हस्ती मिटती नहीं हमारी ) झूठ साबित होगी । अगर नरेन्द्र मोदी दुबारा सत्ता में लौटे जो कि मैं मानता हूं कि होगा तो हमें आशावान रहना चाहिए ।अन्यथा बहुत सचेत होकर सोचने की जरूरत है । भारत में जिस तरह के वोट बैंक की राजनीति हो रही है उसमें देश के इस्लामीकरण की संभावना प्रबल है । इसे छोटी मुश्किल मत समझिये साहब । आप देखिए, पूर्वोत्तर, आसाम, बंगाल में दुर्दशा है । आसाम में अब शायद स्थिति बेहतर हो जाए लेकिन जो आ चुके हैं, धंस चुके हैं उनका क्या। बंगाल में ममता बनर्जी वोट के लिए कुछ भी कर गुजरेगी । उत्तर प्रदेश में उनका बोलबाला है। बिहार में बढ़िया फलफूल रहे हैं । दक्षिण में उनकी संख्या बढ रही है। केरल में खुला खेल जारी है । अभी आप सोच रहे हैं कि अरे ये तो सत्रह फीसदी हैं, आप सोचते ही रह जाएंगे, ये सत्रह से चौंतीस हो जाएंगे और जिस दिन चौंतीस फीसदी हो गए उस दिन आपकी दुर्दशा तय है। पाकिस्तान, बांग्लादेश अफगानिस्तान का हाल देख लीजिए । अफगानिस्तान में 1991 तक दो लाख से ज्यादा हिन्दू और सिख थे अब 220 बचे हैं । जी ”

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  • July 4, 2016 at 11:16 pm
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    जब से किसी पारिवारिक विवाद में तिवारी जी के सर पर हथौड़ा पड़ा हे तब से ही उनके सर पर ” दक्षिणपंथ का खून सवार ” हे अब उन्हें ढाका के एक शहीद की शहादत पर भी शक हे की क्या पता वो अपने दोस्तों के लिए नहीं किस लिए मरा ? लिखते हे Sanjay Tiwari
    3 hrs · जो बीमार लोग कत्लेआम पर चुप थे, अब बोल रहे हैं। शेयर शायरी कर रहे हैं। बता रहे हैं कि कैसे एक हिन्दू लड़की के लिए मुस्लिम फराज ने अपनी जान कुर्बान कर दी।इसमें कोई दो राय नहीं कि फराज जेहनी तौर पर बीमार नहीं था और जब उसने अपने दोस्तों के लिए जान की बाजी लगाई होगी तो पल भर के लिए उसके जेहन में यह खयाल नहीं आया होगा कि वह हिन्दू है कि मुसलमान। ऐसे वक्त में उसका इंसान होना उसके लिए सबसे अहम हो गया था। यह भी हो सकता है कि खुद उसे भी जिन्दा रहने की अनिवार्य शर्त कुरान की कोई आयत न आती हो। क्योंकि वह मदरसे में नहीं पढ़ा था, अमेरिका में पढ़ता था।फिर होले रेस्टोरेण्ट में उसके साथ अकेली तारुषी नहीं थी जिसके लिए वह रुका था। अबिनता कबीर भी थी। और वह बंगाली मुस्लिम थी। तीनों साथ ही अमेरिका में पढ़ते थे। इनके अलावा एक और बंगाली मुस्लिम महिला इशरत को भी आतंकियों ने कत्ल कर दिया। इन सबके सहित दस महिलाओं को इसलिए कत्ल किया गया क्योंकि इन्होंने बुर्का नहीं पहना था, वे कुरान नहीं जानते थे।लेकिन बीमार लोगों को लगता है कि सारी दुनिया उन्हीं की तरह बीमार है और रुग्ण सोच रखती है।

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  • July 5, 2016 at 7:06 pm
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    तिवारी जी तो खेर छुटभैए दक्षिणपंथी हो गए हे ईश्वर उनका भला करे खेर शमशाद इलाही शम्स की बेतरीन टिपण्णी पढ़े शमशाद इलाही शम्स ” ढका काण्ड पर मुझे दो विश्लेषण काबिले गौर लगे:
    =================================
    १) उक्त हादसे में मारे गए इटली के नागरिको पर इटली में खासी बहस हुई. एक मत बड़ी मजबूती के साथ यह आया कि पश्चिमी देशो के बड़े बड़े ब्रांड्स ने बंगलादेश में सस्ती मजदूरी का लाभ उठाकर बग्लादेशी मजदूरों का शोषण किया है, इस्लामी उग्रवादी इसी अंतर्विरोध का फायदा उठाकर अपनी जड़े मज़बूत कर रहे हैं, लिहाजा इटली सहित सभी पश्चिमी निवेशक इस उग्रवाद के बढ़ने में सहायक है.
    २) दूसरा मत यह है जिसमे बाग्लादेश के वामपंथी भी शामिल है कि शेख हसीना वाजिद सरकार भारतीय प्रतिष्ठान के बेहद दबाव के चलते १९७१ में हुए कत्लेआम में जमाते इस्लामी नेताओ को फांसी दे रही है जिससे उग्रपंथी इस्लाम को हरकत करने का वैचारिक आधार मिल गया. ब्लागर्स,अल्पसंख्यकों, नास्तिको की हत्याएं इसी प्रतिक्रिया में हुई क्योकि जमाते इस्लामी नेताओं को लगातार फांसियां दी जा रही है. जाहिर है बाग्लादेश की इस सियासी अस्थिरता में भारतीय प्रतिष्ठान के स्वार्थ निहित है.
    कुल मिलाकर यह निष्कर्ष तो बनता ही है कि बाग्लादेश की समस्या महज उसकी आंतरिक समस्या नहीं, इसके कई भूमंडलीय कारक भी है जिन पर अकसर तवज्जो नहीं दी जाती. ”

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  • July 6, 2016 at 10:28 pm
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    चलो खेर मतभेद एकतरफ अपनी जगह वो चलते रहेंगे मगर हम दुश्मन नहीं हे संजय तिवारी जी ने ईद की मुबारकबाद दी हे उन्हें भी बहुत बहुत ईद मुबारक एक और कटटर मुस्लिम विरोधी और इस्लाम के बेहद कटटर लेकिन ग़ज़ल प्रेमी तुफेल चतुर्वेदी जी लिखते हे की उनके मुस्लिम मित्र उन्हें कभी अपने घर दावत पर नहीं बुलाते ये वाकई बहुत गलत बात हे में उम्मीद करता हु की कभी हमारी मुलाकात हुई तो में आपको जरूर ईद पर घर बुलाऊंगा मेरी मदर वाकई इतनी बेहतरीन शीर बनाती हे और ठंडी होकर तो पूछो ही मत उसे खाकर उसकी मिठास से आपके अंदर की कम्युनल कड़वाहट कम हो जायेगी सभी मुस्लिमो से भी अपील हे की ईद पर अधिक से अधिक गैर मुस्लिमो को घर बुलाय अधिक से अधिक

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  • July 20, 2016 at 3:57 pm
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    Subhash Chandra Kushwaha
    8 July at 08:31 ·
    यह हर धर्म के पाखण्डी और मनुष्य विरोधी ठेकेदारों के माथे पर कलंक रहेगा कि उन्होंने सेनाएं और आतंकी संगठनों का निर्माण किया है. वे ही बम धमाके करा रहे हैं लेकिन इंसान तो मिली जुली संस्कृति में रहने का आदी रहा है . वह एकरस संस्कृति में ऊब जाता है.
    कल ईद पर गाँव था. घर के सामने मस्जिद. है . सब जानते हैं कि सामने एक नास्तिक इस पर्व पर गाँव में सिर्फ इसलिए आया है कि यहाँ हर धर्म के लोग मिलजुलकर सारे पर्व मनाते हैं. मेरे बरामदे में नजरुल इस्लाम की पक्तियां मस्जिद के सामने से दिखाई दे रही हैं- “मनुष्य से घृणा करके
    कौन लोग कुरान, वेद. बाइबिल चूम रहे हैं बेतहासा”
    मौलवी अक्सर मेरे बरामदे में बैठे इन पक्तियों को देखते रहते हैं. कल नमाज पढ़ने वाले, नमाज के बाद सबसे पहले मेरी ओर ही लपके . सभी हिन्दू – मुसलमान एक दूसरे को मुबारकबाद देने निकल पड़े. सबसे ज्यादा खींचा-तानी मेरे लिए थी. “पहले मेरे यहाँ सिवई खाने आइये .. पहले मेरे यहाँ ” . कुछ लोग तो शहर ले जाने के लिए गाड़ी में रखवा दे रहे थे. हम सात-आठ लोग गाँव के एक छोर से शुरू किये और दूसरे तक पहुँच गए . फिर भी नाराजगी ” यह तो ठीक नहीं. दो बजे तक रुकिए, खाना खा कर जाइए ” संभव है कुछ लम्पटों को यह प्यार न मिले .

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  • October 2, 2016 at 9:47 am
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    उग्रराष्ट्रवाद साम्प्रदायिकता कट्टरता अतिधार्मिकता नस्लवाद रिलिजियस सुपीरियॉरिटी आदि की बातो में दो तरह के लोगो का मन लगता हे एक तो वो जो जरुरत से ज़्यादा खुशहाल या फ्री हे या उन्हें अपनी सत्ता और खुशाली को बचाने बढ़ाने के लिए इन बातो की जरुरत होती हे दूसरे वो लोग होते जो जिंदगी से हारे थके घिसे पिटे उजड़े हुए होते हे अपने तिवारी जी दूसरे प्रकार के लोगो में से हे सर्जिकल स्ट्राइक की खबरों के बाद इनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं हे इससे ये अपनी पिटी हुई जिंदगी में रंग भरते हे ये सब ( उग्रराष्ट्रवाद साम्प्रदायिकता कट्टरता अतिधार्मिकता नस्लवाद रिलिजियस सुपीरियॉरिटी ) ठीक किसी ड्रग्स की तरह कुछ समय के लिए गम भुला देता हे बॉडी में जोश भर देता हे ऐसा लगता हे की आप चाँद तारे तोड़ सकते हे और तोड़ भी रहे हे मगर कुछ समय बाद जब नशा उतरता हे तब ————– ?

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    • October 6, 2016 at 9:53 am
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      रविश कुमार ने प्रोग्राम किया और यशवंत ने भी यही बताया अफ़सोस दोनों ने नहीं देखा की खुद उनके अपने ही प्रिय मित्र संजय तिवारी का क्या हाल हो चुका हे ? पांच साल पहले का जीनियस संपादक लेखक आज बजरंग दल के किसी सड़कछाप हुल्लड़बाज की तरह बात करता हे नहीं तो इस तरह के लोगो का समर्थन भी खूब करता हे अफ़सोस पढ़िए Yashwant Singh : न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया आपको मानसिक रोगी बना सकते हैं। कल बहुत दिन बाद न्यूज़ चैनल खोला तो अपनी पसंद के अनुरूप ndtv प्राइम टाइम रविश कुमार को देखा। मनोरोग सप्ताह मनाए जाने के दौरान ndtv ने प्राइम टाइम में इसी सब्जेक्ट को चुना। इसी कार्यक्रम में रविश ने बताया कि ताजा शोध के मुताबिक दुनिया भर में न्यूज़ चैनल्स लोगों को मनोरोगी बना रहे हैं।यही हाल सोशल मीडिया का है। कल का ndtv prime time show आपने मिस किया है तो उसका वीडियो ढूंढ कर ज़रूर देखें। न ढूंढ पाएं तो इस लिंक https://goo.gl/JHyjk3 पर क्लिक करें. इस उन्मादी दौर और दौड़ में अगर आप खुद का धैर्य खोता देख रहे हैं तो कुछ दिन टीवी मोबाइल को अलविदा कह मेरे पास आ जाएं। दोनों भाई गले मिल रोएंगे-गाएंगे।अतिवादियों से बच के रहें। खासकर राजनीतिक। जो लोग दिन भर सिर्फ मोदी या केजरी या राहुल या संघ या कम्युनिस्ट या पाकिस्तान या चीन या हिन्दू या मुसलमान विरोधी पोस्ट लिखते रहते हैं, ये भी मनोरोगी हैं। इनसे दूर रहें। इन्हें unfriend करें। ये आपको जबरन मनोरोगी बना रहे हैं।आपके न चाहते हुए भी आप इनके मनोरोग के वर्तुल में खींचे जा रहे हैं। ये जो उगलते हैं, लगातार, धारा प्रवाह, एक ही सुर में, न चाहते हुए भी आप इन्हें सुनते पढ़ते हैं और चुपचाप इनकी वैचारिक विकृति को कन्सीव करते जाते हैं। ऐसा लगतार होने से आप तटस्थ नहीं रख पाते खुद को और कुछ न कुछ लिख बोल देते हैं।इस तरह आप अनजाने में ही मनोरोगियों के एक अंतहीन युद्ध / विकार के शिकार लोगों के गैंग के सदस्य बन जाते हैं। बहुत मुश्किल है सहज मनुष्य बने रहना। बड़ा आसान है मनोरोगी बन जाना। ये दौर ऐसा है दोस्तों। आओ, प्रेम करें, हंसें, गाएं। एक पल का जीवन है, यूँ न गवाएं। यशवंत सिंह

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  • October 12, 2016 at 9:50 pm
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    एक बात गाँठ बाँध लीजिये की साम्प्रदायिकता और जातिवाद नस्लीय श्रेस्ठता हमेशा एक ही सिक्के के दो पहलु होते हे जैसे में एक सुन्नी सय्यद हु अगर में एक सेकण्ड के लिए भी या एक दिन के लिए भी कम्युनल हो जाऊँगा तो में ठीक उसी दिन सय्यद सुपीरियॉरिटी या अशराफ सुपीरियॉरिटी में भी बिलीव करने लगूंगा लेकिन क्योकि में शुद्ध सेकुलर हु इसलिए मुझे इन बातो में दिलचस्पी और यकीन ही नहीं हे अब देखिये की तिवारी जबसे कम्युनल और मुस्लिम और इस्लाम विरोधी हुए हे तभी से ये ब्राह्मण , ब्राह्मण सुपीरियॉरिटी का भी राग अलापने लगे यही नहीं एक और घोर कम्युनल जातिवादी मुस्लिम और इस्लाम विरोधी ब्राह्मण सुप्रियॉरिटीवादी —– तिवारी एक बिलकुल पागल और नशेड़ी , बिहार में शराबबंदी से और भी पगलाया हुआ तो उससे भी इनकी जुगलबंदी खूब जम रही हे खेर तिवारी लिखते हे” राजनीतिक आजादी आने के बाद जितने उच्च वर्ण वाले थे वो सब कम्युनिज्म और सोशलिज्म की तरफ भागे। पढ़े लिखे तेज दिमाग लोग। ज्यादातर ब्राह्मण। लेकिन इसके विपरीत का जो राजनीतिक हिन्दू पुनर्जागरण हुआ उसकी कमान पिछड़े वर्ग के हाथ में थी। बीजेपी को ब्राह्मणवादी पार्टी कहा जरूर गया लेकिन असल में वह पिछड़े वर्ग का हिन्दूवादी उभार था। असली ब्राह्मणवादी दल कम्युनिस्ट पार्टियां थीं क्योंकि वैचारिक स्तर पर सबसे ज्यादा ब्राह्मण इस ओर ही आये थे। याद करिए सीपीआई के सबसे प्रखर महासचिव पीसी जोशी को जिन्होंने देश में साम्यवाद की बुनियाद रखी। यह सिर्फ एक ब्राह्मण बुद्धि ही सोच सकती थी कि लंबे समय तक जिंदा रहना है तो राजनितिक जनाधार से ज्यादा बौद्धिक जनाधार विकसित करो। और पीसी जोशी ने जेएनयू में साम्यवाद की ऐसी मजबूत वैचारिक बुनियाद रखी कि आज भी उस बुनियाद को हिलाने की ताकत हिन्दूवादियों में नहीं आ सकी है।”

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  • October 14, 2016 at 10:14 am
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    दक्षिणपंथ में निष्काम कर्म मतलब ऐसा काम जिसमे बदले में अपने लिए कुछ भी हासिल करने की चाहत ना हो नहीं होता हे बाकी विचारधाराओ में भी लोग दुध के धुले नहीं हे मगर दो चार तो ऐसे लोग होते ही हे जो बिलकुल निष्काम कर्म करते हे दक्षिणपंथ में नहीं होते हे जैसे दक्षिणपंथ का नया नया जोशीला ”संघी मुल्ला ” तिवारी वैसे तो हर बात में संघ भाजपा बजरंग मोदी का दीवाना हे मगर उन्हें ही वैचारिक रूप से कमजोर बताकर लिखता हे ” जबकि दूसरी तरफ जो हिन्दूवादी पनपे उनकी खोज सत्ता और ताकत थी। यह ब्राह्मण की सोच नहीं है। ब्राह्मण सत्ता नहीं खोजता। वह सत्ता का नियंत्रक होता है जैसे कम्युनिस्ट लंबे समय तक कांग्रेस की सरकारों के रहे। लेकिन कम्युनिस्टों से इतर जो गैर ब्राह्मण हिन्दूवादी उभार था उसने धार्मिक विस्तार के नाम पर मूर्खों की एक पूरी पीढ़ी सामने कर दी। आज जितने गलत बयानी नेता बीजेपी या वीएचपी के दिख रहे हैं वो सब ओबीसी कम्युनिटी से आते हैं। निरंजन ज्योति से लेकर साध्वी प्राची तक। यहां तक कि बीजेपी में ब्राह्मणों का भयंकर अनादर और तिरस्कार है। एक तो डर है कि बदनामी हो जाएगी और दूसरा बनिया और ओबीसी वर्चस्व जो ब्राह्मणों को अपने पास टिकने नहीं देता है।इसका नतीजा यह है कि पूर्ण बहुमत की सत्ता के बाद भी बीजेपी वैचारिक दरिद्रता का शिकार है और मुट्ठीभर ब्राह्मणवादी कम्युनिस्ट हर चौथे दिन वैचारिक रूप से बीजेपी को घेरकर लतिया देते हैं। हो सकता है सत्ता के शिखर पर जा बैठी बीजेपी को कभी यह समझ आये या हो सकता है कभी न आये लेकिन हकीकत यही है। समझ में आया तो वैचारिक रूप से टिक जाएंगे, नहीं आया तो जिस तरह उपजे हैं उसी तरह विनश जाएंगे। ” फंडा ये हे की में हु वैचारिक रूप से मज़बूत मुझे घास डालो भाजपा संघ वालो जैसे स्वपनदास गुप्त जैसे नमूने को राज्यसभा भेजा राकेश सिन्हा को सर चढ़या वैसे ही मुझे भी तो पूछो ? हालांकि ऐसे ही उमीद में अभी चिपळू ने भी करारी लात ही खायी हे

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  • November 12, 2016 at 7:05 pm
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    संजय तिवारी का भी ईमान जाग गया वार्ना एक साल से इसने भी अपना ईमान हिन्दू कठमुल्लावादी विचारधारा को मुफ्त में नीलाम कर रखा था हरियाणा हिंसा जैसी वीभत्स मोदी राजनीति पर भी इससे एक बोल भी ना फूटा था बाकी हिन्दू कठमुल्लाओ का भी हाल हे क़ी एक दो दिन तो खूब इन्होंने जयकारा लगाया ये मुर्ख सोच रहे थे की एक दो दिन में सब ठीक हो जाएगा और नयी मोदी चालीसा लिखेंगे गाएंगे अब आधे तो संघी लगे हे बैंक की लाइन में और आधे शायद बीजी होंगे ”एडजस्टमेंट ” में इसलिए अब थोड़े चुप हे खेर नया नया ”संघीमुल्ला ” संजय तिवारी ” सेकुलर ईमान ” जागने पर लिखता हे ” आपातकाल का आज तीसरा दिन। बैंकों के बाहर लाइन और अफरा तफरी तीन गुना बढ़ गयी है। लोगों की तकलीफ देखकर रोना आ रहा है। उधर इस सबसे निश्चिंत मोदी जापान में बुलेट ट्रेन के मजे ले रहे हैं। Sanjay Tiwari41 mins · पूरे दिन पूर्वी दिल्ली के इलाके में घूमता रहा। शहादरा होते हुए साहिबाबाद तक गया। कोई ऐसा बैंक नहीं दिखा जहां लंबी लंबी लाइन न लगी हो और कोई ऐसा एटीएम नहीं था जिसका शटर खुला हो। सिर्फ एक एटीएम मिला जो खुला था। उसके सामने भी लंबी लाइन लगी थी। एक और एटीएम और खुला दिखा लेकिन वह खराब था। कंपनी को भी उसकी परवाह नहीं थी तो ग्राहकों को भला क्योंकर होती?थके हारे लोगों के चेहरों पर कोई आक्रोश नहीं था। अनजाने ही उन्हें एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा दिया गया है जिसे भेदकर पार जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। इसलिए क्रोध और गुस्सा करके करेंगे भी क्या? अगर आपको लगता है कि यह देश के लिए आम आदमी का बलिदान है तो आप मान सकते हैं क्योंकि बलिदान देने का काम हमेशा आम आदमी से ही लिया जाता है। इसलिए काले धन के लिए पीले चेहरेवाले लोगों का खून पिया जा रहा है।जिससे मिलो, वह परेशान है। क्या करे? कहां जाए? धंधा व्यापार पर बुरा असर हुआ है। लेन देन ठप है। सह तो थोड़ी सी सामाजिकता है जो लाज बचाये हुए है नहीं तो अब तक मारकाट मच जाती। जिस बाजार के लिए समाज को रोज कतरा कतरा बलिदान किया जाता है वही समाज और उसी की बची खुची सामाजिकता काम आ रही है। लोग उधार और व्यवहार से इस संकट से खुद को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं। वह नोट जिसके लिए अपने बेगाने हो गये थे वह नोट बेगाना हुआ तो अब अपनों का सहारा लिया जा रहा है।शाम होते ह

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  • November 30, 2016 at 9:21 pm
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    ये आदमी फर्जिकल स्ट्राइक के समय ठीक किसी सड़कछाप भक्त की तरह कह रहे थे की ” ये लोग मोदी को जानते नहीं थे ” मानो मोदी जी कोई रेम्बो हो खेर लगता हे लाइन में लग लगकर तिवारी जी की यादाश्त पूरी तरह से वापस आ चुकी हे वैसे भी जब मेरे जैसे हट्टे कट्टे आदमी की ही हालात अब केश ढूंढते ढूढते ढूढंते मीना कुमारी जैसी हो रही हे ” हे भगवान् मैं कहा जाऊ मैं कहा जा मरू ” येस बैंक जैसे बैंक से भी मैं कालिया की तरह खाली हाथ ही वापस आया खेर अब तिवारी जी लिखते हे Sanjay Tiwari
    1 hr · एक सर्जिकल स्ट्राइक के जवाब में आतंकवादी रोज सर्जिकल स्ट्राइक कर रहे हैं और आप मुगालते में हैं कि आपने आतंकियों की औकात बता दिया है।

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  • January 21, 2017 at 4:41 pm
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    ” दो सड़ चुके दिमाग ( संजय तिवारी और मोहम्मद ज़ाहिद ) जिनमे से अब बदबू उठने लगी हे उनके बीच एक सवांद
    Sanjay तिवारी visfot
    Sanjay Tiwari मुसलमान जिस दिन पैदा होता है उसी दिन से अधर में लटक जाता है फिर ता-जिंदगी उसी अधर में लटका रहता है। जब कोई लटकानेवाला नहीं मिलता तो खुद ही लटक जाता है। उसे इसकी आदत है। पहले दीन के लिए लटकता है। फिर दीन में आकर लटकता है। फिर दीन लाकर लटकता है। चौदह सौ साल से लटका ही हुआ है बेचारा।यहां मोहम्मद जाहिद जैसे लोग इतनी गंभीर समस्या पर बात न करके माया मुलायम में लगे हैं। अरे भाड़ में गये माया मुलायम भैया। पहले इस्लाम बचाओ। पाजामे वाला कन्फ्यूजन खत्म करो ताकि सच्चा इस्लाम कायम हो सके। काफिरों से तो फिर लड़ाई लड़ ही लेंगे। See translationLike · Reply · 3 · 4 hrs
    Mohd ZahidMohd Zahid ब्राम्हण तो हजारों वर्ष से लटका हुआ है।
    अंतिम क्षण हैं , जब ज्वाला बुझती है तो लपलपाती अवश्य है और वही हो रहा है।
    इंतजार कीजिए दलित आप जैसों का दिमाग सेट करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। ” ऐसी ही गन्दगी पुरे सोशल मिडिया पर बिखरी पड़ी हे और हो ये रहा हे की लोगो को भी गन्द इतनी भा रही हे की अखबारों का बुरी तरह पतन हो रहा हे न्यूज़ चेनलो का हाल सबको पता ही हे एक बहुत ही समझदार लेखक विचारक आकार पटेल 2020 तक आधे अखबारों के बन्द होने की भविष्यवाणी कर रहे हे अब इससे जो जबरदस्त वेक्यूम बनेगा उसे कौन भरेगा ————– ? ऊपर बताई ऐसी गन्द और स्वाति चतुर्वेदी की किताब में दर्शाई मोदी की फौज या कोई इस अफ़ज़ल भाई की साइट के जैसी पॉजिटिव चीज़े क्या होगा आगे ———— ? बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल हे इसमें उमीदे और डर दोनों छिपे हे

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  • March 25, 2017 at 9:37 am
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    ”संजय तिवारीयो ( व्यक्ति विशेष नहीं भरे पड़े हे ) जेसो के लिए एक बहुत बुरी सुचना iDilip C Mandal10 hrs · जो पत्रकार अब रंग बदलकर भगवा बन रहे हैं, उन्हें कुछ नहीं मिलेगा।
    बीजेपी यूपी की सत्ता से 15 साल बाहर रही है। उसके अपने आदमी इतने हैं और इतने भूखे हैं कि आपका नंबर पाँच साल में भी नहीं आएगा। बीजेपी दूसरी पार्टियों की तरह नहीं है जो अपने समर्थकों से ज़्यादा औरों को खिलाती हैं। बीजेपी अपने वफ़ादार लोगों को पाल-पोसकर रखती है।
    इसलिए लालच में ईमान मत बिगाड़िए।iDilip C मंडळ१० —————–” Vishnu Gupt
    23 March at 13:56 ·
    आतंकवाद की फंडिग और हिंसा की पर्याय है बूचडखाने
    बूचडखाने और सभी प्रकार के मांस का निर्यात बद करो
    ==================================
    बूचडखाने की काली कमाई का जरिया भर नहीं है। बूचडखाने संरक्षित और अस्थागत जीवों की कब्र भी हैं। क्या यह सही नहीं है कि बकरे और भैंसा के नाम पर संरक्षित और आस्थागत जीवों का भी बुचडखानों में अवैध तरीके से वध होता है? बुचडखाने की काली कमाई देशभक्ति और देश की अस्मिता की कब्र खोदती है, हिंसक और आतंकवादी मानसिकताएं भी प्रचारित और प्रसारित करती है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि तथाकथित सेकुलरगिद्धों को भी जन्म देती है। कई स्वतंत्र जांचों में यह स्पष्ट हुआ है कि बुचडखानों की अवैध कमाई आतंकवादी और देशद्रोही संस्थाओं को दिया जाता है। सिफ अवैध ही नहीं बल्कि वैध बुचडखाने भी बंद कर दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही साथ सभी प्रकार के मांसों के निर्यात बंद होना चाहिए। मांस के निर्यात बंद होने से आतंकवादी और हिंसक मानसिकताएं तथा तथाकथित सेकुलर गिद्ध बेमौत मरेंगे। आपकी राय क्या है……………..?Vishnu गुप्त ” ”Dilip C Mandal
    8 hrs ·
    तीन साल में अगर Zero स्मार्ट सिटी बनीं तो इस रफ़्तार से पाँच साल में कितनी स्मार्ट सिटी बनेंगी?
    अभी मुसलमान विरोध में पगलाई जनता ने पाँचवें साल में यह सवाल पूछ दिया तो?Dilip C Mandal
    10 hrs ·
    कोई भी किसान या पशुपालक अगर बूढ़े हो चुके पशु को नहीं बेचेगा, तो क्या करेगा? आरएसएस और बीजेपी के नेता बूढ़े जानवरों को अपने घर ले जाने से तो रहे।
    ज़्यादातर किसानों और पशुपालकों के लिए बूढे जानवरों की बिक्री आमदनी का एक स्रोत है। कई किसान पुराना बेचते हैं, तब नया ख़रीदते हैं। चारा भी बहुत महँगा है।
    ऐसे लाखों जानवर अगर आवारा छोड़ दिए जाएँ तो फ़सल की तबाही हो जाएगी और देश में अनाज का संकट आ जाएगा।
    बीजेपी किसानों और पशुपालकों की कमर तोड़ने का बंदोबस्त कर रही है।
    वह अपने सोशल एजेंडे पर काम कर रही है और आप धोखे में हैं कि उसके निशाने पर सिर्फ मुसलमान हैं।
    Dilip C Mandal
    10 hrs ·
    यूपी में अवैध बूचडखाने क्यों चल रहे थे? कानूनसम्मत तरीक़े से वैध कर दिया होता, तो यह बवाल क्यों होता? बवाल तो फिर भी होता, क्योंकि बवाल करना बीजेपी का धंधा है। बहरहाल, जो अवैध है, उसे तो हटना ही चाहिए। शहर के बाहर, साफ़ सुथरे, हवादार बूचडखाने खुलने चाहिए। पशुचिकित्सक भी होने चाहिए, जो देखें कि बीमार पशु का माँस लोगों तक न पहुँचे। कचरे का निपटान भी तरीक़े से होना चाहिए। मतलब उस तरह जैसे कि किसी भी विकसित देश में होता है।Dilip C Mandal

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  • April 8, 2017 at 8:54 am
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    ” Pushya Mitra
    22 hrs ·
    सारी सरकारें बीजेपी की हैं, फिर भी गौरक्षकों को उन पर भरोसा नहीं है. फैसला ऑन द स्पॉट करने में जुट गये हैं.
    सरकार का आलम यह है कि वे गुंडों-हत्यारों को डिफेंड करने में जुटी है, उन्हें अपनी ही पुलिस पर भरोसा नहीं है.
    तो क्या इस देश में कानून का राज गुंडे लायेंगे…? Pushya मित्र ”—————————- अलवर कांड की लगभग सभी ने निदा की यहाँ तक की उन लोगो ने भी जो दबे या खुले भाजपा समर्थक हे सिर्फ इस लहसन प्याज़ भी ना खाने वाले ” सात्विक शाकाहारी और कायर भेड़िये ” संजय तिवारी को छोड़ कर लानत हे

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  • June 5, 2017 at 7:39 pm
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    Sanjay Tiwari
    5 hrs ·
    जैसे धीरूभाई अंबानी का एक दर्शन था कि कानून मत तोड़ो, नया कानून बना लो। वैसे ही प्रणय रॉय का एक दर्शन है। सरकार के आगे पीछे मत घूमो, सरकार ही ऐसी बना दो जो तुम्हारे आगे पीछे घूमे।
    मुझे नहीं मालूम यह पत्रकारिता पुराण के किस अध्याय में लिखा है लेकिन अगर आप एनडीटीवी के काम काज को देखें तो उनका यह दर्शन उनके काम काज में साफ दिखता है। एनडीटीवी के लिए बीजेपी स्थाई दुश्मन है। इसका कारण सिर्फ ये नहीं है कि प्रणय रॉय कांग्रेसी है बल्कि कारण है विपक्ष कमजोर पड़े तो खुद विपक्ष बन जाओ।।
    रामनाथ गोयनका ने इमरजंसी में इसका प्रयोग किया था लेकिन वह दौर और था। तब वास्तविक अर्थों में इमरजंसी लगी थी। यह दौर और है। सिर्फ हवा में हिटलर का नारा उछालकर आप मोदी को खारिज नहीं कर सकते। पत्रकार या अखबार को ऐसा करना भी नहीं चाहिए। याद रखिए पत्रकार या अखबार न सत्ता पक्ष होता है और न विपक्ष। जनतंत्र में वह जनता के हितों का प्रतिनिधि होता है उसे अपना जनतंत्र गढ़ने की भूल नहीं करनी चाहिएSanjay Tiwari————————————————————————।Mayank Saxena
    1 hr ·
    मैं आपको बताता हूं कि एनडीटीवी से कई बार, लाख असहमत होने के बावजूद उसके साथ फिलहाल क्यों खड़ा हूं…
    हो सकता है एनडीटीवी ने कोई वित्तीय अपराध किया हो…लेकिन क्या आप ये नहीं समझ पा रहे कि इस मामले में बैंक और उसके शीर्ष अधिकारियों को भी फिर उतना ही दोषी होना चाहिए…लेकिन नहीं, उन के ख़िलाफ़ कोई शिकायत नहीं है…पर आप तो अंधे हैं…बहरे भी और दिमागविहीन भी कि यह क्यों हुआ…
    कल शाम की ही बात है, विजय माल्या मज़े से भारत-पाक मैच देखता हुआ दिखा…उसको गिरफ्तारी के पहले ही देश से निकल जाने दिया…तमाम क्रिकेटर और बीसीसीआई के लोग माल्या से कल गलबहियां कर रहे थे…लेकिन आप को यह नहीं दिखेगा…क्योकि आप तो अंधे हैं…बहरे भी और दिमागविहीन भी कि यह चल क्या रहा है…
    अडानी और अम्बानी, दोनों ही लोन के घपलेबाज हैं…दोनों के ही ख़िलाफ़ वित्तीय अपराध के मामले या वायलेशन के मामले हैं…लेकिन एक तो हर घड़ी पीएम के साये की तरह उनके साथ रहता है…और एक के आगे पीएम 90 डिग्री पर झुक जाते हैं…पर आपको ये नहीं दिखेगा…आप तो अंधे हैं…बहरे हैं…दिमागविहीन हैं…कि ये क्या माजरा है…
    यूपी चुनाव में मायावती के ख़िलाफ, चुनाव आयोग – सुप्रीम कोर्ट की धर्म और जाति के आधार पर चुनावी फायदा न लेने के मामले में शिकायत लेता है…नोटिस भेजता है, लेकिन एक हफ्ते के अंदर ही राम मंदिर का वादा करने वाला भाजपा का मेनिफेस्टो आता है और सब तरफ शांति रहती है…लेकिन आप ये क्या जानें…आप तो अंधे हैं…बहरे हैं…दिमागविहीन हैं…आपको क्या मतलब कि ये क्या हो रहा है…
    आप के देश का प्रधानमंत्री, लगातार चुनावी हलफनामे में अपना वैवाहिक स्टेटस छुपाए रखता है…और लोकसभा चुनाव में जाकर उसकी घोषणा करता है…क़ानून यह अपराध है…लेकिन इस पर चुनाव आयोग समेत किसी को कोई दिक्कत नहीं होती…जबकि चुनाव ही रद्द किया जा सकता है…पर आप ये नहीं देखेंगे…क्योंकि आप तो अंधे हैं…बहरे हैं…दिमागविहीन हैं…आपको सच से क्या मतलब…
    आप के सामने दुनिया भर में तेल सस्ता होता है, भारत में महंगा हो जाता है…भाजपा के नेता आईएसआई के लिए काम करते पकड़े जाते हैं…ग्लोबल वार्मिंग पर प्रधानमंत्री लप्पूझन्ना बन कर जाते हैं और बेइज़्ज़ती करा कर वापस चले आते हैं…जिस ट्रम्प के लिए आप हवन करके हैं, वही आपकी आहुति में समिधा गिरा देता है…महंगाई का अंत नहीं होता…काला धन वापस नहीं आता…नोटबंदी का कोई हासिल नहीं होता…आपकी चड्ढी भी बैंकों के ज़रिए उतार लेने की तैयारी है…सरकार के ख़िलाफ़ बोलने वाले हर शख्स और संस्था का गला दबाया जा रहा है…फौज का अध्यक्ष, नेताओं की तरह भाषण देता है और वीर रस के गिलास भरने लगता है…
    लेकिन आप तो…
    दरअसल आप अंधे और बहरे भी नहीं हैं…क्योंकि इसमें भी दिमागविहीन होना ज़रूरी नहीं…अब विवेक और बुद्धिहीन हैं…इसलिए आप अंधे और बहरे हो गए हैं…ये शारीरिक विकलांगता नहीं है, मानसिक है…इसलिए आप को ये समझ नहीं आ रहा है एनडीटीवी ही निशाना क्यों बन रहा है…क्योंकि आज तक चुप रहेगा…नहीं तो उसके शेयर्स की खरीद से लेकर उसकी कर्मचारी की हत्या तक के मामले में उसको घसीट लिया जाएगा…एबीपी चुप रहेगा, नहीं तो उसके मालिकाना मामले में उसको अदालत घसीट लिया जाएगा…ज़ी न्यूज़ दलाली करता रहेगा वरना उसके सम्पादकों को फिर जेल जाना होगा…सुभाष चंद्रा को तमाम मामलों में राज्य सभा से इस्तीफा देना होगा…जागरण पक्ष लेगा, वरना उसे मजीठिया पर कोर्ट में जवाब देना होगा…नेटवर्क 18 कैसे बोलेगा, उसका तो मालिक ही अम्बानी है और फिर राघव बहल से नेटवर्क 18 जैसे खरीदा गया, वह भी तो घपला और ग़ैरक़ानूनी ही है…इसलिए सब चुप रहेंगे…
    क्या एनडीटीवी के इस काम के बारे में यह सरकार 3 साल से नहीं जानती थी…जानती ही होगी…फिर अचानक यह हमला क्यों…
    और आप तो मौन को सहमति और दलाली को बिज़नेस एथिक्स मानने वाला समाज हैं ही…आपके बाप भी तो घूस लेकर आपको पढ़ाते रहे हैं…घर में सामान भरते रहे हैं…ज़रा झांक कर देखिएगा आपकी अंतरआत्मा है भी या शरीर छोड़ कर चली गई है…
    आपको दिक्कत एनडीटीवी से नहीं है…आपको दिक्कत कांग्रेस से भी नहीं है…आपको दिक्कत वामपंथियों से भी नहीं है…आपको दिक्कत है मुसलमान से…दलित से…और इसलिए देश के संविधान से…उसमें समानता और धर्मनिरपेक्षता के अडिग मूल्यों से…
    आप बेहद नीच लोग हैं…जो शुचिता का दिखावा करते हैं…आत्म निरीक्षण कीजिए…फिर हम बात करेंगे…मुझे आपसे घिन आने लगी है…हर समझदार आदमी को आने लगी है…हम मार दिए जाएंगे…जेल में डाल दिए जाएंगे…चुप करा दिए जाएंगे…देश से भगा दिए जाएंगे…लेकिन फिर भी हम बोलते रहेंगे…क्योंकि हम आपकी तरह घिनौने और नीच नहीं हैं…और इस घिनौने और नीच में मैं अपने दोस्तों, परिवार और करीबियों को बख्श नहीं रहा हूं…मुझे आप सबसे घिन आती है…!!!Mayank Saxena

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    • June 6, 2017 at 12:50 pm
      Permalink

      अगर कोई अपार्धि पकड़ा जाये तो यह कौन सी दलील रहेगी की और अपार्धि क्यों नहीं पकडे गये ?
      करोडो अपराधी इस देश में है जो पकड़ा गया सो पकडा गया !
      प्रणव राय मुस्लिम या दलित नही था
      नोट बंदी में जो पकड़े गये व दलित मुस्लीम नहि थे
      दलित मुस्लिम का आवरण मत ओधिये
      अपर्धि वह भी हो सकते है
      फिर अदालत है
      वह अरब पति है
      वह मह्नागे से महंगा वकील भी रख सकते है फिर परेशानी की बात की

      पाहले चुनाव नियम् में पत्नी की स्थिति बताना “अनिवार्य” नहीं था जो अब हुयी है

      Reply
  • June 6, 2017 at 2:07 am
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    सिकंदर जी,
    आप को क्या हासील करना ह?. बडी दया आरही है आप की. रविश कुमार जी के कइ सारे विचार या फिर….

    बापरे चैन कि निंद आती है आप लोगो को?

    आप लोगो के लिये मै ही भगवान(अल्लाह) से प्रार्थना करता हु कि आप जिसे सत्ता मे बिठाना चाहते हो (केजरीवाल, ममता, मनमोहन ) के भगवान ( अल्लाह ) ईन की सारी ईच्छाए पुरी करो.
    आप जिनका अस्तित्व मिटते हुवे देखना चाहते हो वो मिट जाये.

    हम जैसो के लिये क्या मोदी और क्या ममता. हम लोग थोडी ना आप की तरह बुद्धी जिवी है. हम सिर्फ इतना ही जानते और समझते है. हमारी दो वक्त कि रोटी कमाने के लिये हमे काम करना होगा. और हमे ही करना होगा किसी और को नही.
    भाई मै ब्राह्मण हु, और प्रकृतीने मुझे कोइ सहुलियत नही दि है कि तुम ब्राह्मण हो तो मै तुम्हे भुख और प्यास कि पिडा या फिर जलने या कटने के पिडा नही दुंगी.
    ऐसा भी नही होने वाला है के मै ब्राहमण हु तो किसी accident मे मै अपाहीज नही बनुंगा. या फिर साप काटने से ब्राह्मण नही मरेगा. या फिर ऐसा भी नही है की मै ब्राह्मण हु तो मुझे बुढापा नही आयेगा, या मै ब्राह्मण हु मतलब मै कभी नही मरुंगा.

    क्या चाहते हो. ब्राह्मणोके खत्म कर दे दुनीया से??????

    इसी लिये कहते है..इश्वर ( अल्लाह ) जिसके सामने राजा भी उतना ही भिखारी है जितना कि एक भिखारी होता है.

    डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था जातीवाद के खिलाफ लडो ब्राह्मणो के खिलाफ नही.
    मै भी ऐसा ही कुछ मानता हु, आतंकवाद के खिलाफ लडना है मुसलमानो के खिलाफ नही.
    हिंदुत्व वादी कट्टर पंथ के खिलाफ लडना है मोदी और अमित शहा के खिलाफ नही.

    आप के केजरीवाल, ममता, रविश कुमार या फिर आपको ये बात समझमे ही नही आरही है. राजनिती के ईस युद्ध मे personnel war होगया है ये. ये विचारो कि लडाइ नही रही है अब. ये मोदी बनाम मोदी विरोधीयो के व्यक्तिगत युद्ध बन चुके है.

    आप ग्यानी हो. मुझसे जादा सही गलत समझते हो….

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  • August 8, 2017 at 4:23 pm
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    जैसा की होता ही हे की ये सभी कम्युनल राइटिस्ट लोग स्त्री विरोधी भी होते ही हे देखिये कितनी नीचता पर उतर आया हे संजय तिवारी एक ज़माने में नार्मल रहा ये आदमी अब शैतान बन गया हे मगर बात वही ना घूम फिर के- की अब मोदी के कारण ये लोग नुकसान में नहीं रहते हे मुझे पहले ही पता था की जितना हम जैसे लोग इसका विरोध करेंगे तब प्रचार ( निगेटिव ) के कारण भी सड़ चुके दिमाग के मोदी भक्तो में इसकी लोकप्रियता बढ़ती ही जायेगी जब से मेने इस संजय तिवारी का विरोध किया यहाँ वहाँ केस स्टडी के तौर पर लिखा तो कुछ ही समय में इसके फॉलोवर दुगने हो गए नेट की सबसे लोकप्रिय और रियल लड़की लेखिका ने भी इस पर कमेंट लिखा था तो हर हाल में कुछ न कुछ पाते ही हे ये लोग देखिये इसकी नीचता Sanjay Tiwari
    3 hrs ·
    सुभाष बराला इस्तीफा दो।
    नहीं नहीं ये ठीक नहीं रहेगा।
    फिर?
    मनोहर लाल इस्तीफा दो।
    नहीं। यार। इसमें भी मजा नहीं आया। स्टॉकिंग का मामला है।
    फिर?
    मोदी सरकार इस्तीफा दो।
    हां। ये मांग सही है।
    स्त्री विरोधी मोदी हाय हाय। मोदी सरकार इस्तीफा दो।
    मोदी सरकार डाउन डाउन।
    जय जेएनयू
    जय साम्यवाद।Sanjay Tiwari
    6 hrs ·
    आइये जरा चंडीगढ़ में हुए बराला प्रकरण की राजनीति समझते हैं कि आखिर बेटे पर लगे पीछा करने का आरोप बाप के इस्तीफे की मांग तक कैसे पहुंच गये।
    जो कुंडु बाप बेटी हैं वे जाट हैं। बताया ये जा रहा है कि बाप जी हुड्डा के करीबी हैं। बताने की जरूरत नहीं कि हुड्डा भी जाट हैं।
    जो बताने की जरूरत है वो ये कि बराला बाप बेटे भी जाट ही हैं। आपको याद होगा जब बीजेपी ने खट्टर को सीएम बनाया तो आरोप लगा कि बीेजेपी ने एक जाट बहुल राज्य में गैर जाट को सीएम बना दिया। खट्टर ठहरे खत्री बनिया। बेचारे इतने डर गये कि अपने नाम में से ही खट्टर हटा दिया और केवल मनोहर लाल रह गये।
    अब शायद इसी जाट अभाव को दूर करने के लिए सुभाष बराला को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया ताकि संतुलन बन जाए। जाहिर है, अगर बराला का शिकार करके उन्हें कुर्सी से हटा दिया जाए तो बीजेपी पर जाट विहीन होने आरोप और गहरा हो जाएगा।
    लिहाजा, जाल बिछाकर शिकार कर लिया गया। लेकिन मुझे खुशी है कि पहली बार अपने जाट लीडर के साथ बीजेपी मजबूती से खड़ी है। वरना इन संघी फट्टुओं की आदत ये है कि आरोप लगने पर अपने सरसंघचालक को भी बेगाना बता देते हैं।
    See Translation।Sanjay तिवारी————————–Nitin Thakur1 hr · अभी जब कैमरे बंद भी नहीं हुए.. अभी जब माइक हटे भी नहीं.. अभी जब पत्रकार चंडीगढ़ से दिल्ली लौटे भी नहीं ठीक उससे भी पहले वर्णिका भक्तों, भाजपाइयों, अपने नेताओं के बचाव में थियोरीज़ रचनेवालों का शिकार बन गई है. वो जेएनयू वाली है, वो वामपंथी है, वो खाते-पीते घर की बिगड़ैल है, उसने एक निर्दोष को इसलिए फंसाया क्योंकि वो एक राजनीतिक साज़िश का हिस्सा है, और सबसे बड़ी बात तो जो अभी खोजकर निकाली गई उसे नीचे पढ़िए-
    आइये जरा चंडीगढ़ में हुए बराला प्रकरण की राजनीति समझते हैं कि आखिर बेटे पर लगे पीछा करने का आरोप बाप के इस्तीफे की मांग तक कैसे पहुंच गये।
    जो कुंडु बाप बेटी हैं वे जाट हैं। बताया ये जा रहा है कि बाप जी हुड्डा के करीबी हैं। बताने की जरूरत नहीं कि हुड्डा भी जाट हैं।
    जो बताने की जरूरत है वो ये कि बराला बाप बेटे भी जाट ही हैं। आपको याद होगा जब बीजेपी ने खट्टर को सीएम बनाया तो आरोप लगा कि बीेजेपी ने एक जाट बहुल राज्य में गैर जाट को सीएम बना दिया। खट्टर ठहरे खत्री बनिया। बेचारे इतने डर गये कि अपने नाम में से ही खट्टर हटा दिया और केवल मनोहर लाल रह गये।
    अब शायद इसी जाट अभाव को दूर करने के लिए सुभाष बराला को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया ताकि संतुलन बन जाए। जाहिर है, अगर बराला का शिकार करके उन्हें कुर्सी से हटा दिया जाए तो बीजेपी पर जाट विहीन होने आरोप और गहरा हो जाएगा।
    लिहाजा, जाल बिछाकर शिकार कर लिया गया। लेकिन मुझे खुशी है कि पहली बार अपने जाट लीडर के साथ बीजेपी मजबूती से खड़ी है। वरना इन संघी फट्टुओं की आदत ये है कि आरोप लगने पर अपने सरसंघचालक को भी बेगाना बता देते हैं।
    6 hrs · —————–Nidhi Darbari जिन्होंने ये पोस्ट लिखी है उन पर मैं बहुत विश्वास करती थी ।
    See translation
    LikeShow More Reactions · 3 · 48 minsNitin Thakur
    3 hrs ·
    Apoorva की ये पोस्ट ज़बरदस्त चांटा है उन लोगों के चौखटे पर जो लड़कियों की “बॉडी लैंग्वेज” से ही सब समझने का दावा कर लेते हैं.
    अप्रैल 2013 में मेरी बड़ी कज़िन बहन की शादी थी और तभी मेरे exams हो रहे थे । पापा ने मुझे डिस्टर्ब न हो इसलिए घर के पास ही एक होटल में मेरे लिए रूम बुक किया था ताकि में वही रहूं और पढूं ।
    मेरा केमिस्ट्री का पेपर सुबह 7 बजे से था । मैं लेट हो रही थी, हड़बड़ी में साढ़े छह पर निकली । निकलते ही मुझे दूर से एक स्कार्पियो दिखी, मुझे वो मेरे एक जानने वाले की लगी तो मैंने स्कूटर स्लो करते हुए उस गाड़ी को ध्यान से देखा, उससे पास होते हुए समझ आ गया कि यह वो नही है जो सोच रही थी, आगे बढ़ गयी ।
    पर वो स्कॉर्पियो में बैठे दो लड़कों ने क्या सोचा और वो पीछे लग गए । मैं ने स्कूटर की स्पीड बढ़ा ली थी पर वो मेरे बगल में आके गाड़ी का दरवाजा खोल के हाथ बढाने लगे मेरी ओर । मैंने स्पीड अचानक स्लो की और दूसरे रास्ते मुड़ गयी जहां मुझे अंदाज़ था कि एक दूध का चट्टा है और सुबह लोग होंगे वहां । आगरा वाले जानते होंगे नेता जी के चौराहे से अंदर उच्चायुक्त का घर भी है उस रास्ते पर । वहां तक पहुंचते हुए उन दोनों ने मेरा हाथ पकड़ के खींचा और मैंने स्पीड बढाई । उनके मेरा हाथ खींचने के कारण स्कूटर डिस बैलेंस हुआ और मैं फिसलते हुए गिर गयी । मेरी जीन्स घुटनो से और टॉप कंधे से फट गया । उन लोगों ने गाड़ी रोकी मेरे पास । पर स्कूटर गिरने की आवाज़ तेज़ थी तो चट्टे से लोग देखने निकले बाहर । उन्हें देख के दोनों लड़के भाग गए । गाड़ी पर कोई नम्बर नही था बस सपा का झंडा था ।
    मेरे पैर कांप रहे थे, लोगों ने मुझे उठाया । स्कूटर भी खड़ा किया । चूंकि मेरा exam था तो दिमाग गया कि पेपर छूट जाएगा । मैं जल्दी में कॉलेज पहुंची पेपर शुरू हो गया था, examiner को मेरे कपड़े दिखे लेकिन उन्होंने कुछ पूछा नही, बाकी लोग मुझे घूर रहे थे । हथेली, घुटनो और कोहनी से खून निकल रहा था । लिखते हुए डर के मारे हाथ कांप रहे थे ।
    Exam से घर लौटी तो घर में इतनी भीड़ थी शादी के कारण कि बस किसी को कुछ कहा नहीं, काफी दिन बाद बताया ।
    मान लेते हैं कि उस दिन मेरे संग कुछ हो जाता या मैं उसी के लिए रिपोर्ट लिखाती तो ? जैसा घृणात्मक रवैया मुझे देखने को मिल रहा है वार्णिक के लिए वैसा ही मेरे लिए आप लोग निकालते । आप लोगों की टुच्ची तफ्तीश में जो बातें मेरा कैरेक्टर डिसाइड करती वो ये होतीं –
    लड़की अपने घर नही रह रही थी कुछ दिन से, बल्कि होटल में रहती थी ।
    लड़की क्लास ग्यारहवीं में गालियां दिया करती थी ।
    लड़की के सब लड़के दोस्त हैं, लड़कों के संग ड्राइव पे जाती थी ।
    लड़की ने जींस क्यो पहनी थी ।
    लड़की एन शादी के दिन भी शादी में नही गयी थी मतलब उसका किसी से मिलने का इरादा था उस रात ।
    फेसबुक पर प्यूबर्टी पर पोस्ट लिखती थी ।
    लड़की के हाथ मे किसी फोटो में पार्टी के वक्त ग्लास था ।
    इतना सब कुछ होने के बाद भी लड़की पेपर देने पहुंच गई, यानी लड़की भोली नही थी, खेली खाई थी, मासूम होती तो घर जा के रोती, बाप भाई को बताती ।
    सबसे बड़ी बात – लड़की ने उन लड़कों को गौर से क्यों देखा !
    इति सिद्धम कि अपूर्वा एक निहायत ही अय्याश लड़की है और लड़कों के उसको लाइन न मारने के कारण उनसे बदला लेने को यह सब किया ।
    कहानी खत्म ! पर आप जैसे लोग कभी नहीं समझ पाएंगे कि गिर के उठने में हिम्मत चाहिए होती है, ऐसा कुछ होने के बाद कई दिनों तक डर में जीते हैं, पैर चलते हुए कांपते हैं । पर आपके लिए यह बस गॉसिप करने के मुद्दे हैं ।
    आपको पता है मैंने घर में क्यो नही बताया था वहां जबकि वो भीड़ तो मेरे अपने ही रिश्तेदारों की थी क्योंकि मुझे विश्वास ही नही था कि पेरेंट्स के सिवा कोई समझ पायेगा यह भी डर था कि लोग सलाह न दें कि घर से निकलना कम कर दो ।
    आज मुझे लगता है कि मैंने सही किया नहीं बताया । यह पोस्ट भी मैं पसोपेश में लिख रही हूँ, मेरा पूरा खानदान यहां है, इसे पढ़ने के बाद वो क्या रिएक्शन देंगे !
    दुख है यह कि आप तो मरेंगे ही नहीं लेकिन यह बेशर्म लड़कियां यह सब झेल के भी जिंदा क्यों रह जाती हैं !!
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    Nitin Thakur
    Nitin Thakur दूसरी बार आपका भरेसा टूटा होगा. नहीं????
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    Nidhi Darbari
    Nidhi Darbari पहली बार भी टूटने की वजह इन पर विश्वास ही था ।
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    HimansHu Kumar
    HimansHu Kumar मुझे भी तिवारी जी से सपने में भी इसकी बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी, पर उनकी इस पोस्ट ने मेरी उस विश्वास पर थप्पड़ मारा है जो मैं उनपर करता था?———————Nitin Thakur
    3 hrs ·
    Apoorva की ये पोस्ट ज़बरदस्त चांटा है उन लोगों के चौखटे पर जो लड़कियों की “बॉडी लैंग्वेज” से ही सब समझने का दावा कर लेते हैं.
    अप्रैल 2013 में मेरी बड़ी कज़िन बहन की शादी थी और तभी मेरे exams हो रहे थे । पापा ने मुझे डिस्टर्ब न हो इसलिए घर के पास ही एक होटल में मेरे लिए रूम बुक किया था ताकि में वही रहूं और पढूं ।
    मेरा केमिस्ट्री का पेपर सुबह 7 बजे से था । मैं लेट हो रही थी, हड़बड़ी में साढ़े छह पर निकली । निकलते ही मुझे दूर से एक स्कार्पियो दिखी, मुझे वो मेरे एक जानने वाले की लगी तो मैंने स्कूटर स्लो करते हुए उस गाड़ी को ध्यान से देखा, उससे पास होते हुए समझ आ गया कि यह वो नही है जो सोच रही थी, आगे बढ़ गयी ।
    पर वो स्कॉर्पियो में बैठे दो लड़कों ने क्या सोचा और वो पीछे लग गए । मैं ने स्कूटर की स्पीड बढ़ा ली थी पर वो मेरे बगल में आके गाड़ी का दरवाजा खोल के हाथ बढाने लगे मेरी ओर । मैंने स्पीड अचानक स्लो की और दूसरे रास्ते मुड़ गयी जहां मुझे अंदाज़ था कि एक दूध का चट्टा है और सुबह लोग होंगे वहां । आगरा वाले जानते होंगे नेता जी के चौराहे से अंदर उच्चायुक्त का घर भी है उस रास्ते पर । वहां तक पहुंचते हुए उन दोनों ने मेरा हाथ पकड़ के खींचा और मैंने स्पीड बढाई । उनके मेरा हाथ खींचने के कारण स्कूटर डिस बैलेंस हुआ और मैं फिसलते हुए गिर गयी । मेरी जीन्स घुटनो से और टॉप कंधे से फट गया । उन लोगों ने गाड़ी रोकी मेरे पास । पर स्कूटर गिरने की आवाज़ तेज़ थी तो चट्टे से लोग देखने निकले बाहर । उन्हें देख के दोनों लड़के भाग गए । गाड़ी पर कोई नम्बर नही था बस सपा का झंडा था ।
    मेरे पैर कांप रहे थे, लोगों ने मुझे उठाया । स्कूटर भी खड़ा किया । चूंकि मेरा exam था तो दिमाग गया कि पेपर छूट जाएगा । मैं जल्दी में कॉलेज पहुंची पेपर शुरू हो गया था, examiner को मेरे कपड़े दिखे लेकिन उन्होंने कुछ पूछा नही, बाकी लोग मुझे घूर रहे थे । हथेली, घुटनो और कोहनी से खून निकल रहा था । लिखते हुए डर के मारे हाथ कांप रहे थे ।
    Exam से घर लौटी तो घर में इतनी भीड़ थी शादी के कारण कि बस किसी को कुछ कहा नहीं, काफी दिन बाद बताया ।
    मान लेते हैं कि उस दिन मेरे संग कुछ हो जाता या मैं उसी के लिए रिपोर्ट लिखाती तो ? जैसा घृणात्मक रवैया मुझे देखने को मिल रहा है वार्णिक के लिए वैसा ही मेरे लिए आप लोग निकालते । आप लोगों की टुच्ची तफ्तीश में जो बातें मेरा कैरेक्टर डिसाइड करती वो ये होतीं –
    लड़की अपने घर नही रह रही थी कुछ दिन से, बल्कि होटल में रहती थी ।
    लड़की क्लास ग्यारहवीं में गालियां दिया करती थी ।
    लड़की के सब लड़के दोस्त हैं, लड़कों के संग ड्राइव पे जाती थी ।
    लड़की ने जींस क्यो पहनी थी ।
    लड़की एन शादी के दिन भी शादी में नही गयी थी मतलब उसका किसी से मिलने का इरादा था उस रात ।
    फेसबुक पर प्यूबर्टी पर पोस्ट लिखती थी ।
    लड़की के हाथ मे किसी फोटो में पार्टी के वक्त ग्लास था ।
    इतना सब कुछ होने के बाद भी लड़की पेपर देने पहुंच गई, यानी लड़की भोली नही थी, खेली खाई थी, मासूम होती तो घर जा के रोती, बाप भाई को बताती ।
    सबसे बड़ी बात – लड़की ने उन लड़कों को गौर से क्यों देखा !
    इति सिद्धम कि अपूर्वा एक निहायत ही अय्याश लड़की है और लड़कों के उसको लाइन न मारने के कारण उनसे बदला लेने को यह सब किया ।
    कहानी खत्म ! पर आप जैसे लोग कभी नहीं समझ पाएंगे कि गिर के उठने में हिम्मत चाहिए होती है, ऐसा कुछ होने के बाद कई दिनों तक डर में जीते हैं, पैर चलते हुए कांपते हैं । पर आपके लिए यह बस गॉसिप करने के मुद्दे हैं ।
    आपको पता है मैंने घर में क्यो नही बताया था वहां जबकि वो भीड़ तो मेरे अपने ही रिश्तेदारों की थी क्योंकि मुझे विश्वास ही नही था कि पेरेंट्स के सिवा कोई समझ पायेगा यह भी डर था कि लोग सलाह न दें कि घर से निकलना कम कर दो ।
    आज मुझे लगता है कि मैंने सही किया नहीं बताया । यह पोस्ट भी मैं पसोपेश में लिख रही हूँ, मेरा पूरा खानदान यहां है, इसे पढ़ने के बाद वो क्या रिएक्शन देंगे !
    दुख है यह कि आप तो मरेंगे ही नहीं लेकिन यह बेशर्म लड़कियां यह सब झेल के भी जिंदा क्यों रह जाती हैं !!Apoorva

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  • August 8, 2017 at 7:52 pm
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    एक बार फिर से अपना अंदाज़ा बता दू की आखिर ये राइटिस्ट कटटरपन्ति कम्युनल धर्मांध लोग आधुनिक महिलाओ लड़कियों के व्यंगय में कहे तो ” खून के प्यासे ” क्यों रहते हे मेरा तो अंदाज़ा ये हे – देखा की सोशल मिडिया पर छोटे इकबाल के सबसे बड़े फेन इलाहबादी सज़्ज़न और उनके बहुत सारे साथी आजकल कुछ मुस्लिम लड़कियों और खासकर एक लड़की से तो बुरी तरह खार खाये बैठे हे इस पत्रकार लड़की की दोस्त और रूम मेट ने पिछले वर्ष कई मानसिक दबावों से परेशान होकर खुदखुशी कर ली थी तो उस केस के कारण और एक वेबसाइट दुआरा ज़बर्दस्ती सिर्फ विवाद पैदा करने और प्रचार पाने की खातिर कुछ मुस्लिम लड़कियों को खांमखा क्रांतिकारी आदि घोषित कर दिया गया था जबकि इनमे से अधिकतर कोई खास लिखती भी नहीं हे हद ये की उनमे से एक तो यु ही बबली सी लड़की का नाम भी था जिसने दो चार पोस्ट कभी बुर्के पर लिखी होगी बस इनमे से किसी भी महिला की ऐसा कोई खास लेखन या गतिविधि नहीं थी की उन्हें रूढ़िवाद विरोधी कोई क्रन्तिकारी घोषित किया जाए जाहिर हे की वेबसाइट ने ये घटिया हरकत विवाद पैदा करने को की थी क्योकि आज हर कोई कैसे भी करके विवाद और पब्लिसिटी चाहता हे निगेटिव पॉजिटिव शब्द अब कोई महत्व नहीं रखते हे वेबसाइट अपने मकसद में कामयाब भी हुई और खासा प्रचार मिला यही आज हर कोई चाहता हे की दिखे और बिके खेर वो जो भी हो वो एक अलग विषय हे बात आयी गयी हो गयी लेकिन छोटे इकबाल के सबसे बड़े फेन और उनके बहुत सारे साथी अभी भी रूममेट की खुदखुशी विवाद को लेकर उनसे से एक लड़की के पीछे हाथ धो कर पड़े हे और उस पर तरह तरह की बाते कर रहे हे वो बाते सही हे या गलत हमें नहीं पता हमें उससे कोई लेना देना नहीं हे हमारा विषय कुछ और ही हे हमारा विषय हे की आखिर ये कटटरपन्ति ( सभी प्रकार के हिन्दू मुस्लिम छोटे बड़े- खुले छिपे- नरम गरम सभी प्रकार के ) इन आधुनिक लड़कियों से महिलाओ इतना क्यों चिढ़ते हे इसके पीछे क्या राज़ छिपा हो सकता हे आपने देखा ही होगा की भारत के सभी कटटरपन्ति लोग वो इन आज़ाद ख्याल आधुनिक लड़कियों से बेहद चिढ़ते हे आजकल ये भी देखा की नोएडा घरेलू कामगार विवाद के बाद कुछ हिन्दू कटटरपन्ति जिम जाने वाली शॉर्ट्स पहनने वाली लड़कियों और उनकी आधुनिक माताओ को खूब कोस रहे थे आखिर क्यों ————– ? असल में जैसा की उस केस में देखे तो वो लड़की जॉब के लिए इंदौर से दिल्ली आयी थी काम करना चाहती थी सहेली के साथ अकेली रहती थी उस सहेली ने सुसाइड कर ली आदि तो बात ये भी हे की इन कटटरपन्तियो को इस प्रकार की लड़किया सिरे से ही बिलकुल पसंद नहीं आती हे इस प्रकार की लड़कियाँ जो पढ़ना चाहती हे काम करना चाहती घर से बाहर निकलना चाहती हे कुछ बनना चाहती हे अपनी जिंदगी जीना चाहती हे इन लड़कियों से इन सभी प्रकार के कटटरपन्तियो को बड़ी सख्त नफरत होती हे बहुत सख्त नफरत इसकी वजह मुझे मेरी मोटी अक्ल से मुझे तो ये समझ आती हे ये लड़कियाँ इन लोगो की बहुत बड़ी आकांशा चाहत और सपने और छुपे हुए हित पर पानी फेरती दिखाई पड़ती हे और ये इन कटटरपन्तियो की दूरदर्शिता कहा जा सकती हे की वो बखूबी जानते हे की ये लड़किया और इनका रवैया अगर फैलता हे तो इनके हितो के खिलाफ हे कैसे खिलाफ हे ———- ? वो ऐसे हे की ये लड़किया और इनका रवैया इन हिन्दू मुस्लिम कटटरपन्तियो के एक बहुत बड़े मनसूबे पर पानी फेरती हे वो मंसूबा हे की लोगो से अधिक से अधिक आबादी बढ़वाकर अपना वर्चव बढ़ाना और इसी से कई तरह के हित साधना . आपने देखा ही होगा की खासकर मुस्लिम कटटरपन्ति और हिन्दू कटटरपन्ति भी ये जरूर ही करते हे की लोगो से परिवार नियोजन ना करने आबादी बढाने की अपील करते हे या नहीं तो बढ़ती आबादी को कभी मुद्दा नहीं बनाते आपने देखा ही होगा की सोशल मिडिया के ये मुस्लिम कटटरपन्ति रोज सुबह शाम मुसलमानो की बदहाली का जिक्र करते हे सारी दुनिया को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हे मगर भूल कर भी फेमली प्लानिंग की बात नहीं करते हे क्योकि इसमें ही इनके कई हित छुपे होते हे अब होता ये हे की छोटे इकबाल के संबसे बड़े फेन इलाहाबादी सज़्ज़न और उनके साथी जिस लड़की से खार खाये बैठे हे इस तरह की लड़किया इनके इरादों में बहुत बड़ा रोड़ा बनती हे ये पढ़ना चाहती हे कुछ करना चाहती हे अपनी जिंदगी जीना चाहती हे अपनी मर्जी चाहती हे जिसमे स्वाभिवक हे की कुछ गलतिया भी होने को हो सकती हे मगर इससे ही किसी के खुद की जिंदगी जीने का हक़ नहीं छीना जा सकता हे तो इस प्रकार की लड़किया नेचुरल हे की वो ना तो जल्द शादिया करेगी और ना ही बच्चे पैदा करने की मशीन बनेगी ना ही इसमें कोई खास रूचि लेंगी यही होगा अब इन लड़कियों महिलाओ की इसी हरकत और फितरत से कटरपन्तियो को और उनके आकाओ को बहुत चिढ होती हे ये तो चाहते हे की अधिक से अधिक से अधिक आबादी बढे ताकि इनके धर्म का राजनीति का वर्चस्व बढे इन कटरपन्तियो के आका नेता और पैसे वाले लोग होते हे ये भी यही चाहते हे की अधिक आबादी हो इनके अधिक वोट हे ज़ज़्बाती और भड़काऊ मुशायरा सभाये सुनने को लाखो की भीड़ हो , जाती के अधिक से अधिक वोट हे नेताओ को फायदा हो पैसे वाले लोगो के लिए अधिक से अधिक बड़ा बाजार हो सस्ते से सस्ते लेबर हो यही नहीं अधिक आबादी से जिंदगी से परेशान लोग हे जो भेड़ बकरी की तरह इनके पीछे चले इनके कहने पर लड़े यानी अधिक आबादी से इन लोगो का कटटरपन्तियो का शोषकारियो का नफ़ा ही नफ़ा हे अब होता ये हे की ये आधुनिक लड़कियाँ इनमे भी बाकी सभी लोगो की तरह अच्छाइया बुराइया होती ही हे मगर ये तो तय हे की इनका एटीट्यूड कभी भी जल्दी शादी करके अधिक बच्चे पैदा करने का किसी भी हालत में नहीं होता हे इसलिए ये आधुनिक लड़कियाँ इन कटटरपन्तियो के हमेशा निशाने पर रहती हे हमेशा .

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  • August 8, 2017 at 9:02 pm
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    Sheetal P Singh
    6 hrs ·
    आइए ” बराला कांड पर तीसरी परंपरा की खोज पढ़िए”!
    पहली बराला साहेब के परिवारऔर सरकार ने की, दुसरी बीजेपी के आई टी सेल ने और अब यह सबसे नई ! आपका सर या तो फट जायेगा या शर्म से झुक जायेगा कि ये करीब तीन दशक से पत्रकार हैं !
    इनके नाम का क्या जिक्र करें !
    “आइये जरा चंडीगढ़ में हुए बराला प्रकरण की राजनीति समझते हैं कि आखिर बेटे पर लगे पीछा करने का आरोप बाप के इस्तीफे की मांग तक कैसे पहुंच गये।
    जो कुंडु बाप बेटी हैं वे जाट हैं। बताया ये जा रहा है कि बाप जी हुड्डा के करीबी हैं। बताने की जरूरत नहीं कि हुड्डा भी जाट हैं।
    जो बताने की जरूरत है वो ये कि बराला बाप बेटे भी जाट ही हैं। आपको याद होगा जब बीजेपी ने खट्टर को सीएम बनाया तो आरोप लगा कि बीेजेपी ने एक जाट बहुल राज्य में गैर जाट को सीएम बना दिया। खट्टर ठहरे खत्री बनिया। बेचारे इतने डर गये कि अपने नाम में से ही खट्टर हटा दिया और केवल मनोहर लाल रह गये।
    अब शायद इसी जाट अभाव को दूर करने के लिए सुभाष बराला को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया ताकि संतुलन बन जाए। जाहिर है, अगर बराला का शिकार करके उन्हें कुर्सी से हटा दिया जाए तो बीजेपी पर जाट विहीन होने आरोप और गहरा हो जाएगा।
    लिहाजा, जाल बिछाकर शिकार कर लिया गया। लेकिन मुझे खुशी है कि पहली बार अपने जाट लीडर के साथ बीजेपी मजबूती से खड़ी है। वरना इन संघी फट्टुओं की आदत ये है कि आरोप लगने पर अपने सरसंघचालक को भी बेगाना बता देते हैं।”Sheetal P SinghSheetal P Singh
    1 hr ·
    बराला कांड
    बीजेपी अध्यक्ष बराला के बड़े भाई के बेटे विक्रम बराला उर्फ़ विक्की के ऊपर इसी साल हरियाणा में ही दो मामले दर्ज हुए हैं ।
    पहला मामला मई महीने में एक नाबालिग़ लड़की के अपहरण का है । बवाल मचने पर पुलिस की मदद से उस लड़की को नारी निकेतन में भिजवा दिया गया और विक्की की गिरफ़्तारी तक न हुई । उल्टे इस घटना का विरोध कर रहे ग्रामीणों पर शांति भंग और सरकारी काम में बाधा के मुक़दमे लगाये गये ।
    दूसरा अभी पंद्रह दिन पहले का है जिसमें एक युवक को बुरी तरह मारपीट कर ज़बरन किडनैप करके कार की डिक्की में डालकर ले जाने का अपराध पंजीकृत है । इसमें भी कुछ न हुआ बल्कि पुलिस किडनैप हुए युवक को थाने में बैठाकर समझौता कराने में मुबतिला है ।
    ट्रिब्यून अख़बार के अंगरेजी भाषा के संस्करण में यह समाचार आज छपा है !Sheetal P Singh——————-Awesh Tiwari
    21 hrs ·
    आप लोगों को आपरेशन दुर्योधन याद होगा.यूपी से एक एमपी हुआ करता था नरेन्द्र सिंह कुशवाहा. उसने भी सवाल पूछने के बदले पैसे लिए थे बाद में उसकी संसद सदस्यता समाप्त कर दी गई. उसके बाद की कहानी दिलचस्प है.बसपा सुप्रीमो मायावती उसे अपनी पार्टी में निरंतर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देती रही.उसकी एक खासियत थी जिसको नहीं तिसको मर देता था और किसी भी राह चलती महिला के साथ छेड़खानी कर देता था,कई बार मुकदमा भी हुआ . फिर एक दिन वो अपने गाँव पटवध में एक पंडित जी से उलझ गया. उनके घर की लड़कियों को बोली बोलता था एक दिन पंडित जी को बेवजह पीट दिया. फिर क्या था पंडित जी ने गाँव वालों को ललकार लगाईं. गाँव वाले पहले से नाराज थे. हमें याद है पूर्व एमपी को पूरे गाँव में भीड़ ने दौड़ा दौड़कर पीटा था.फिर एक ट्रैक्टर पर खड़ा करके उनका जुलुस निकाल दिया. कुशवाहा अस्पताल गए फिर सुधर गए.
    अब बाते आगे की, हरियाणा के बराला खुद अपराधी है उनके खिलाफ न्यायालय ने खुद संज्ञान लेकर 341, 283, 174, 149 में मुकदमा कायम कर रखा है. हरियाणा में जिस लड़की के साथ छेड़खानी की बात हो रही है उसका आईएएस पिता कोई मामूली अधिकारी नहीं रहा है. पूरी तरह से मर चुके फिल्म डिविजन को जीवित करने का श्रेय पीड़ित लड़की के पिता वी एस कुंडू को जाता है वो जब फिल्म डिविजन के डायरेक्टर जनरल पद से हटे तो सैकड़ो फिल्मकारों ने केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखकर कहा कि उनका कार्यकाल बढाए जाए लेकिन सरकार नहीं मानी.हरियाणा में कुंडू लोग बड़े खतरनाक और साहसी होते हैं,अनीता कुंडू को भी आप लोग शायद जानते होंगे .पहली महिला थी जो चीन की सीमा से होते हुए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ गई थी.आगे क्या होगा या क्या होना चाहिए,खुद तय करे
    1 hr · ———————-Awesh Tiwari
    6 August at 13:29 · Faridabad ·
    बेरोजगारी भरे दिन थे,स्वास्थ्य पर एक बड़े अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप के लिए मैंने एप्लाई किया था। जब यह बात मैने अपने दिल्ली के एक मित्र को बताई तो उसने कहा फालतू एप्लाई किये हो यह किसे मिलेगा पहले से तय है। हमने पूछा किसे तो उन्होंने एक महिला का नाम लिया। मुझे लगा बकवास बात कर रहा है लेकिन जब फेलोशिप की घोषणा हुआ तो मैं अवाक था फेलोशिप उन्हें ही मिली थी। आज जब हिंदी साहित्य के दी लोगों की गलियों में घुसा तो देखा उन्होंने एक दूसरे लेखक को भाषाई नैतिकता सिखाने के लिए मोर्चा खोल रखा है। नैतिकता एक बड़ा व्यापक शब्द है। जिन्होंने जोड़ तोड़ जुगाड़ से जीवन में उपलब्धियां हासिल की है उन्हें कोई अधिकार नही कि वो नैतिकता की ठेकेदारी करें।-Awesh Tiwari

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  • August 10, 2017 at 10:59 pm
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    नयी हिंदी साइट्स में सबसे अधिक कमेंट ( मेरे हटाकर भी ) वाली खबर की खबर को तो खेर कोई प्रचार नहीं देता ( हद हसद तो तब हो गयी जब लखनऊ के सोशल मिडिया के प्रसिद्ध सूफीसंत ने ज़ाहिर किया की वो बच्ची लेमनचूस नेलपॉलिश पोस्ट वाली लेखिकाओं और अपने शिया और बरेलवी भाई बहनो के लिबरल लेखन से तो परिचित हे मगर खबर की खबर से वो परिचित नहीं हे ) तो खेर लेकिन हमें दूसरे किसी के प्रचार से कोई तकलीफ नहीं हे कारण ये हे की अफ़ज़ल भाई दुबई में बिज़नेस मेन हे उन को पत्रकारिता लेखन से कुछ नहीं चाहिए और मुझे लेखन आदि से आराम की जिंदगी की कोई चाह नहीं हे तो इसलिए बता दू की तिवारी का विस्फोट फिर से शुरू हुआ हे हलाकि पहले जैसी ( 2008 – 13 ) रौनक नहीं आएगी ( विस्फोट पर सबसे अधिक बहस और कमेंट मेरे ही थे ) कारण की अब आज सबसे अधिक पब्लिक हिंदी पब्लिक सोशल मिडिया पर जम गयी हे और उसके लाइक शेयर लिंक और बाते लोगो को जो किक देती हे सेलेब्रेटी होने का जो फ़र्ज़ी ही सही नशा देती हे वो हम या साइट नहीं दे सकते हे तो नतीजा की बावजूद इसके की सोशल मिडिया -यु ट्यूब की तरह कोई रेवेन्यू शेयर नहीं करता हे लोग सोशल मिडिया के पीछे पागल हे और नज़रे हटाने को रेडी नहीं हे इसके लाइक आदि के बाद ये बिलकुल ही कभी कभी तो सेलेब्रेटी की तरह बात करते हे पिछले दिनों सोशल मिडिया पर एक खोटी चवन्नी फ़ीस के बिना ही रात दिन लिखने और एक्टिव वाले लेखकों को अचानक लाइन से हिस्टीरिया भी हुआ था की हमारी पोस्ट जो साइट लेती हे वो हमें पैसा दे एक ने कहा फिर सबने लाइन से कहा . खेर मेन वजह वही लाइक की चरस हे इसलिए लखनऊ के सूफी संत ने खबर की खबर का नाम अपनी लिस्ट से हटा दिया शायद ये सोच कर की इन्हे प्रचार दूंगा तो कही मेरे लाइक ना कम हो जाए . खेर जो भी हे मेरी लेखकों से अपील हे की ( हालांकि मुझे पता हे की सुनेगे नहीं कारण वही सोशल मिडिया का सेलेब्रेटीचरस का नशा ) वो खबर की खबर से जुड़े लिखे . अफ़ज़ल भाई से बेहतर आदंमी नहीं मिलेगा अफ़ज़ल भाई बिज़नेसमेन हे दुबई रहते हे उन्हें पत्रकारिता लेखन साइट्स से पैसे नहीं कमाने हे लेकिन घर फूंक के भी तमाशा नहीं देखा जाता तो क्लिक और एड जरुरी हे रेवेन्यू आएगा तो अफ़ज़ल भाई को उसको अपनी जेब में नहीं रखना होगा लेखकों को ही दे देंगे नो प्रॉफिट नो लॉस का मॉडल रहेगा और यही आज हिंदी को पतरकारिता को लेखन को चाहिए ही चाहिए और जरूर चाहिए वार्ना बर्बादी होगी हो रही हे . जैसे उर्दू के सबसे बड़े पत्रकार पर छोटे पत्रकार ने आरोप लगाया था की खुद उन्होंने नोएडा में आलिशान बंगला बना लिया हे और नए उर्दू पत्रकारों से कहते हे की मेरे यहा पेट पर पत्थर बांध कर कौम की खिदमत करनी हे ज़ाहिर हे की आपकी मेहनत पत्रकारिता लेखन से उन्होंने बंगला बनाना था बना लिया . और तो खेर पड़े ही हे एक से बढ़ कर एक बईमान पंजाब के शेर अख़बार तक ने मेरे तीन व्यंगय के चवन्नी भि नहीं दी थी ( अरबपति ) कहना का आशय ये हे की ठीक से लेखन और पत्रकारिता तो तभी सम्भव हे जब नो प्रॉफिट नो लॉस का मॉडल होगा वार्ना कुछ नहीं हो सकता जहा मालिक के कमाने महत्वकांशाओ की बता आयी वही बिकाऊ बेईमानी और शोषण और प्रोपेगेंडा शुरू हो ही जाएगा तो मेरी तो यही अपील हे हलाकि मुझे पता हे की सुनेगे नहीं क्योकि ठीक इसी समय अपनी पोस्ट पर लाइक देने वाली ज़ोया के लिंक को देख रहे हे बिना यह जाने की वो सौलह साल की ज़ोया नहीं- सत्तर का भोकालचतुर्वेदी हे .

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    • August 14, 2017 at 2:18 pm
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      जैसे की ऊपर बताया की लाइक की प्यास में लखनऊ के सूफी संत ने क्या किया तो जब भले लिबरल लोगो का ये हाल हे तो बुरे लोगो राइटिस्टों की तो खेर बात ही क्या तो पिछले दिनों हिन्दू कठमुल्लाओ के गेंग ने अचानक इंदौर के देशु फिरंगी को अपना नया बाहुबली कमांडर लिबरलों का काल पता नहीं क्या क्या घोषित कर दिया और उसकी खूब जयजयकार की आजतक में काम करने वाला ”विक्षिप्त झा ” ने तो यहाँ तक बोल दिया की अगर मेरे और केशु फिरंगी के बीच कोई मतभेद हो तो उसमे केशु को ही सही माना जाए अब हुआ ये की कुछ ही दिनों बाद कई भाषाओ का ज्ञाता होने के कारण स्वाभाविक महत्वाकांशी केशु ने मोदी आदि पर भी निशाना साधना शुरू कर दिया इससे राइटिस्ट सन्न रह गए और फिर शुरू हो गयी जूतमपैजार और जूता लेकर केशु फिरंगी के पीछे सबसे आगे था वही विक्षिप्त झा और अंत में केशु फिरंगी ने भी यही कहा की पहले तो मेरी जयजयकार कर रहे थे बाद में ये लोग अपने लाइक्स कम होने की आंशका से घबरा कर मेरे पीछे पड़ गए हे और कमाल देखिये ये तिवारी भी तब बेहद खुश हुआ ये भी राइटिस्टों भीड़ के साथ अपने ही राजकुमार अपनी ही जैसे राइटिस्ट केशु फिरंगी पर हाथ साफ़ कर रहा था

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  • August 11, 2017 at 10:15 pm
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    आरोपी की कांड से पहले शराब खरीदते हुए फुटेज भी आ गयी हे लेकिन ये देखिये कितने ज़हरीले होते हे ये संघी बस ये कायर भी होते हे इसलिए इन पर कम ध्यान जाता हे मुस्लिम आतंकवादी एक आता हे और सौ पर हमला कर देता हे ये कायर आतंकवादी सौ आते हे और एक को घेर लेते बस यही फर्क हे इनमे , खेर ये देखिये तिवारी का ही दोस्त भाजपा की एक रद्दी पत्रिका का एडिटर जिन्हे खुद इन्ही के लोग नहीं पूछते इन्ही के बकौल , खेर ये खुद एक बेटी का बाप और शायद बीवी की ही खून पसीने की नौकरी के दम पर साँस ले रहा ये नीच लिखता हे ——————कुमार झा
    9 August at 23:06 · अजीब संयोग हुआ आज. स्टेशन से आ रहा था अपनी गाड़ी से. भीड़भाड़ वाली सड़क पर आगे बढ़ा. बायें-दायें हर तरफ़ से गाड़ियां निकल रही थी. देखा सामने से एक गाड़ी तेज़ी से रिवर्स होकर मेरी कार की तरफ़ आ रही है. चौंकते हुए लगातार हॉर्न बजाने लगा. दायें-बायें-पीछे कहीं जाने की गुंजाइश नही थी. गाड़ी रोककर सिवा हॉर्न बजाने के मेरे पास कोई चारा नही था. अंततः तेज़ी से वह गाड़ी मेरी कार को आगे से ठोकते हुए रुकी.
    भयंकर ग़ुस्सा आया. तबतक एक लड़का उस गाड़ी से उतर कर माफ़ी मांगने लगा. क्या करता भला? वैसे भी डरपोक क़िस्म का इंसान हूं. युवक से बात हो ही रही थी, तबतक चालक सीट से एक लड़की उतरकर मुझे ही लगी ड्राइविंग सिखाने. कहने लगी, जब वह हॉर्न देकर बैक कर रही थी तो मैंने कुछ किया क्यूं नही… आदि आदि.
    चोरी और सीनाजोरी भी! ग़ुस्से से कांपने लगा कुछ पल के लिए मैं. लेकिन उसे कुछ बोलता तबतक वर्णिका याद आ गयी. रीढ़ तक सिहर गया. तुरंत माफ़ी के अन्दाज़ में इशारा करते हुए अपन ने गाड़ी आगे बढ़ा दी. जान बची तो लाख उपाय.
    गाड़ी का क्या है, वह तो बन ही जाएगी. नौकरी, आज़ादी और इज़्ज़त बची रहे, शेष सब जय-जय रहेगा.——-झा————vious comments
    Amar Tiwari
    Amar Tiwari वर्णिका की जगह अपने घर परिवार की किसी महिला सदस्य को रखकर कल्पना मात्र तो कीजिये फिर आपकी व्यंगात्मक संघी भाषा बेपटरी हो जाती और आप विपरीत दिशा में कलम तोड़ते दिखते मिस्टर।पोस्ट के साथ न्याय की जगह मजाक हुआ है।

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