श्रीनिवासन को नहीं, जरूरी है क्रिकेट को बचाना !

srinivasan

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के कर्ताधर्ता अब क्या बहाने बनाएंगे। न्यायमूर्ति मुद्गल की अगुआई में बनी जांच कमेटी की रिपोर्ट से क्रिकेट का जो काला पक्ष सामने आया है, उसने क्रिकेट पर तो सवाल खड़ा किया ही है, नैतिकता, मूल्यों और आदर्शों की लंबी-चौड़ी बातें करने वाले उन तमाम दिग्गज क्रिकेट खिलाड़ियों पर भी सवाल खड़े किए हैं जो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के पक्ष में बेहयाई के साथ खड़े होकर उनके पाकसाफ होने की दुहाई दे रहे थे। कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी रिपोर्ट में उनका, उनके दामाद गुरुनाथ मेयप्पन, उनकी कंपनी में सहयोगी रहे सुंदर रमण के साथ-साथ राज कुंद्रा का जिक्र जिस तरह से किया है, उसके बाद भी अगर वे अपने पद पर बने हैं तो क्रिकेट के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और कुछ नहीं हो सकता है। इतना ही नहीं उनके गुट के लोग जिस तरह से उनका बचाव कर रहे हैं वह भी कम शर्मिंदा करने वाला नहीं है।

सट्टेबाजी के छींटे श्रीनिवासन के दामन पर तो पड़े ही हैं, क्रिकेट का दामन उससे कहीं ज्यादा दागदार हुआ है। हैरत तो इस बात पर है कि महान सुनील गावसकर हों या सर्वश्रेष्ठ कपिल देव या फिर क्रिकेट के ‘भगवान’ सचिन तेंदुलकर हर कोई खामोश है। वजहें कई हो सकती हैं लेकिन अभी तो सवाल क्रिकेट को बचाने का है तो फिर ये लोग आगे आकर क्यों नहीं कहते कि क्रिकेट को साफ-सुथरा करना है तो श्रीनिवासन को जाना चाहिए और आइपीएल की टीमें चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रायल्स पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। अदालत ने जिन बातों को सामने रखा है, उसके बाद भी ये दोनों टीमें आइपीएल का हिस्सा बनी रहती हैं तो फिर क्रिकेट का अल्लाह ही मालिक है।

हैरत इस बात पर होती है कि देश में लगातार काले धन पर बात हो रही है। सभी पार्टियां एक सुर में काले धन पर बातें करती हैं लेकिन क्रिकेट में आइपीएल के जरिए जिस तरह का खेल हो रहा है उस पर सभी दल खामोश हैं। यहां सभी राजनीतिक दलों में आम राय बनी हुई है कि क्रिकेट में जो चल रहा है चलने दिया जाए। कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या फिर दूसरे दल, सब क्रिकेट में काले खेल के गवाह हैं और खामोशी से एक-दूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं। अरुण जेटली, अनुराग ठाकुर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, फारूक अब्दुल्ला, शरद पवार, राजीव शुक्ला से लेकर सियासतदानों की एक लंबी फौज क्रिकेट संघों से जुड़ी है लेकिन क्रिकेट में कोई किसी पर कीचड़ नहीं उछालता। हर किसी के हित सधे हैं। गुजरात क्रिकेट संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। लेकिन उन्होंने भी कभी क्रिकेट के इस कलंक पर बोलने की जहमत नहीं उठाई। जाहिर है कि हर किसी के पास इसके लिए अपने-अपने तर्क हैं। तर्क नहीं भी हैं तो गढ़ लिए जाते हैं। इन तर्कों को आधार पर ही क्रिकेट खेला जारहा है और काली कमाई से तिजौरी भरी जारही है।

लेकिन क्रिकेट का यह कलंक न तो सरकार को नजर आता है और न ही उन सियासतदानों को जो काले धन पर छाती पीटते हुए नहीं थकते हैं। सट्टेबाजी के छींटे जिन लोगों पर पड़े हैं वे रसूखदार लोग हैं। क्रिकेट में उनकी तूती बोलती है। वे खिलाड़ियों को खरीदते-बेचते हैं। नीलामी के टेबल पर भी और मैदान पर भी। लेकिन है किसी में हिम्मत जो उन के गरेबां पर हाथ डाल ले। हां बिकने वाले खिलाड़ी जरूर नप जाते हैं। गाज उन पर ही गिरी। उन पर खेलने पर प्रतिबंध लगा और श्रीनिवासन आइसीसी के अध्यक्ष बन गए। अदालत ने बीसीसीआइ के अध्यक्ष पद से श्रीनिवासन को हटाया और सारे आरोपों के बावजूद वे आइसीसी की सबसे ऊंची कुर्सी पर जा बैठे। किसी ने उनके खिलाफ बोलने की जहमत नहीं उठाई। वह तो बिहार क्रिकेट संघ से जुड़े आदित्य वर्मा की हिम्मत ही कही जाएगी कि उन्होंने बहुत सारे दबाव के बावजूद संघर्ष किया और क्रिकेट के कलंकित चेहरों को सामने लाया। आदित्य वर्मा कहते हैं कि आगे का काम अदालत और क्रिकेट से जुड़े लोगों को करना है। भारतीय क्रिकेट पर जो कलंक लगा है उसे साफ करना है तो श्रीनिवासन जैसे लोगों को हटाने के लिए सबको एकजुट होना होगा। नहीं तो सट्टेबाजी और काले धन का खेल क्रिकेट में चलता रहेगा।

बोर्ड पर काबिज श्रीनिवासन गुट को लेकर जो खबरें आ रही हैं उससे यह तो पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद हालात में थोड़ा बदलाव आया है। सालाना आम बैठक को रद्द करने को लेकर भी सदस्यों में गुस्सा है। ऐसा कहा जारहा है कि सालाना आम बैठक को रद्द करना बोर्ड के संविधान के खिलाफ है। सूत्रों की मानें तो कई सदस्यों ने बोर्ड के सचिव संजय पटेल से पूछा है कि किस के कहने पर सालाना आम बैठक रद्द किया गया है। बीसीसीआइ संविधान के मुताबिक कार्यकारिणी के फैसले को टालने का अधिकार किसी को नहीं है। इसलिए अब इस मुद्दे पर पश्चिम क्षेत्र से जुड़े कई क्रिकेट संघ लामबंद हो रहे हैं। अदालत ने अपनी टिप्पणी में साफ किया था कि उसने बोर्ड के चुनाव पर रोक नहीं लगाई है। इस टिप्पणी के बाद बोर्ड के सदस्य संघों में गुस्सा है और वे अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। उत्तर क्षेत्र का सारा दारोमदार दिल्ली के रुख पर है। दिल्ली ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। यों बोर्ड के सभी सदस्य फिलहाल खुल कर इस मामले में बोलने से कतरा रहे हैं, हालांकि वे सभी सवाल जरूर उठा रहे हैं। लेकिन एक खामोशी पसरी हुई है। अगला अध्यक्ष पूर्व क्षेत्र से होना है और बंगाल क्रिकेट संघ के अध्यक्ष जगमोहन डालमिया मजबूत दावेदार हैं। लेकिन बोर्ड पर श्रीनिवासन गुट का कब्जा है। वह नहीं चाहता कि सत्ता उसके हाथ से निकले। यह गुट हर हाल में श्रीनिवासन को बचाना चाह रहा है। लेकिन सवाल अभी श्रीनिवासन का नहीं क्रिकेट का है। क्रिकेट के दिग्गजों को फैसला करना है कि श्रीनिवासन को बचाया जाए या क्रिकेट को।

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3 thoughts on “श्रीनिवासन को नहीं, जरूरी है क्रिकेट को बचाना !

  • November 22, 2014 at 11:51 pm
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    जरुरी नहीं हे इस बकवास खेल को बचाना ? मर जाना चाहीये इस खेल को इतनी बेहूदगी आ चुकी हे इस खेल में भारत में की जो दागदार हे उन्हें तो छोड़ो ये भी देखे की सचिन चैपल विवाद जो हुआ उस पर भी गौर करे तो इस विवाद से पता चलता हे की भारत में क्रिकेट का सबसे सभ्य चेहरा भी कितना सेल्फिश हे जो अपनी किताब को बेचने के लिए ऐसे सुरक्षित हथकंडे इस्तेमाल कर रहे हे मेरा ख्याल हे की ग्रेग्चेपल साहब का कसूर यही हुआ होगा की वो भारत के सरकारी नौकरी की तरह क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ियों में ऑस्ट्रेलिया वाली किलर इंस्टिक भरने की कोशिश कर रहे होंगे जो भारत के खिलाड़ियों को जो साल में एक बार जीत कर बाकी साल आराम करने में विश्वास करते हुए बर्दाश्त नहीं हुई होगी नरेंदर नाथ साहब सही लिखते हे की ”सचिन तेंदुलकर निर्विवाद रूप से विश्व के सबसे बेहतरीन बल्लेबाज हैं। ऐसा उनके रिकार्ड खुद बताते हैं। लेकिन एक बात के लिए उनसे सदा निराशा रही। और रिटायर करने के बाद यह निराशा और बढ़ गई है। उनसे निराशा इस बात को लेकर रही कि वे कभी लीडर नहीं बन सके। ठीक है, लीडर होना स्वाभाविक गुण होता है। हर किसी में नहीं होता,सचिन में नहीं था।लेकिन हमेशा अपने कंफर्ट जोन में रहना? अपने पूरे करियर में एक फिक्स पोजिशन के साथ खेलते हुए करियर बीता दी। जोखिम लेने से हिचकते रहे। और जब भी उनका पोजिशन बदला,या तो विवाद हुआ या वह विफल रहे। और बेचारे द्रविड़,लक्ष्मण जैसे बल्लेबाज अपने करियर के अंतिम मैच तक ऐसा कंफर्ट जोन नहीं पा सके। कहीं भी बिन पेंदी लोट के तरह एडजस्ट किये जाते रहे। खैर यह क्रिकेट की बात है। संभव है कि मैं गलत हूं।
    अब उन्होंने 25 साल के करियर को समेटते हुए किताब लिखी। अच्छी ब्रांडिंग हुई। अब यहां कंफर्ट जोन देखये। सचिन तेंदुलकर ने अपनी किताब में सिर्फ दो को टारगेट किया। पहले ग्रेग चैपल को,जिससे पूरा देश नफरत करता है। दूसरा कपिलदेव, जिन्हें बीसीसीआई पंसद नहीं करता। है ना कंफर्ट जोन? क्या उन्हें 25 सालों में इडियट बीसीसीआई से कभी शिकायत नहीं रही? क्सा इंडियन क्रिकेट में सब ठीक रहा? क्या आईपीएल में सब ठीक था? क्या इनसे जुड़ी कोई बुराई नहीं दिखाई दी। क्या करें, क्रिकेट का यह भगवान भी आम मिडिल क्लास की तरह बन गया जो सोचता है-क्रांति हो लेकिन पड़ोस के घर में। जोखिम लेने से डरता है। ”

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  • November 23, 2014 at 12:00 am
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    sikander 9 November 2014 12:50
    काटजू सर कुछ तो हे ही क्रिकेट बकवास खेल कुछ इस पर जब से भारत के बनियो का प्रभाव बढ़ा तब से इस खेल को बिलकुल मार दिया गया क्रिकेट खेल था गेंद बल्ल्ले की कड़ी टक्कर का मगर भारत के व्यापारियों ने जानबूझ कर इस खेल को बल्ले का खेल बना दिया फ़ास्ट बोलेरो को बधिया कर दिया गया ताकि भारत के सचिन विराट जैसे लोग रनों के पहाड़ खड़े कर सके मैदान तक छोटे कर दिए गए ताकि अफीमची दर्शक अफीम की तरह चोको छक्कों का आनद ले सके अब तो घिन आती हे इस खेल से

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  • November 23, 2014 at 12:07 am
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    क्रिकेट के नाम पर इस कदर लूट और कदाचार मचा हे की जिसे शब्दों में भी बताया नहीं जा सकता हे क्रिकेट का बहिष्कार करना करवाना हर समझदार भारतीय का फ़र्ज़ होना चाहिए यहाँ तक की मेने गौर किया हे की बहुत से आम लोग भी क्रिकेट को खेल और सेहत के लिए बल्कि जुए की तरह पैसा लगाकर खेलते हे खासकर सन्डे के दिन इन लोगो को देखा जा सकता हे और तो और अब आम बच्चो में कोई फ़ास्ट बोलर भी नहीं दीखता हे कोई मेहनत नहीं करना चाहता हे सबको बेटिंग का चस्का और चोको छक्कों का शोक हे जबकि खेल का पहला मकसद मेहनत करके शरीर को फिट रखना होता हे क्रिकेट में ये अब कही नहीं हे

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