शिआ-सुन्नी विभेद की पड़ताल !

sunni-shia

मुसलमान कहते हैं कि उनके धर्म ‘इस्लाम’में कोई त्रुटि और अन्तर्विरोध नहीं है। पूरी मुस्लिम जाति ”‘एकेश्वरवाद’”के आधार पर एक ही वैश्विक समुदाय है। फिर शिआ-सुन्नी विभेद क्यों??? दोनों सम्प्रदायों में विद्वेष व दुर्भावना क्यों? दोनों में परस्पर हिंसक घटनाएं क्यों घटती हैं?

मुस्लिम समुदाय अपनी अस्ल में, एक वैश्विक समुदाय (Global, Universal Community) है। इस्लाम की मूल धारणाएं सुन्नी, शिआ दोनों में समान हैं। ये समानताएं निम्नलिखित हैं–……
*.मूलधारणाएं :-
●एकेश्वरवाद ●परलोकवाद ●ईशदूतवाद( अल्लाह पर यकीन,मौत ही सच्च है,और अल्लाह द्वारा भेजे गए पैगंबर।
*.मूल स्तंभ : शहादह (अल्लाह के एकेश्वरत्व और हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के ईशदूतत्व की गवाही (लाईलाह इलल्लाह मोहम्मदुर रसूलल्लाह ) * नमाज़ * रमज़ान के रोज़े * ज़कात (अनिवार्य धन-दान) * हज * जिहाद ।
*.अन्य : ●अल्लाह पर ईमान ●अल्लाह के रसूलों पर ईमान ●अन्तिम रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) पर ईमान ●ईश्वरीय धर्म-ग्रंथों-और अन्तिम ग्रंथ कु़रआन पर ईमान ●क़यामत (प्रलय) आने पर ईमान ●अल्लाह के फ़रिश्तों (देवदूतों) पर ईमान ●अन्तिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की हदीसों (कर्म व कथन) के लिखित संग्रहों पर विश्वास तथा उनका अनुपालन।

उपरोक्त बातें इस्लाम का *मूल* और *आधार* हैं। सुन्नी और शिआ समुदायों की ‘मूल-उक्ति’ (कलिमा)–‘ला इलाह इल्ल्-अल्लाह मुहम्मद्-उर-रसूल-अल्लाह’ एक ही है। दोनों, जहां अवसर होता है एक साथ, एक इमाम के पीछे पंक्तिबद्ध होकर, नमाज़ पढ़ते हैं। एक साथ हज करते हैं। एक ही कुरआन का पाठ (तिलावत) करते हैं। परलोक जीवन में स्वर्ग (जन्नत) या नरक (जहन्नम) में एक समान विश्वास रखते हैं। ईश्वर की पूजा-उपासना में किसी को साझी-शरीक (शिर्क) नहीं करते।

*.विभेद :दोनों समुदायों में विभेद की अस्ल, ‘धार्मिक’ नहीं बल्कि एक तरह से ‘राजनीतिक’ स्तर की है। जिसे समझना आवश्यक है । हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के देहावसान के तुरंत बाद आप (सल्ल॰) के उत्तराधिकारी की नियुक्ति के बारे में मुस्लिम समुदाय में दो मत उत्पन्न हो गए। आप (सल्ल॰) के ख़ानदान वालों में से अधिकतर का विचार था कि नेतृत्व और शासन हज़रत अली (रज़ि॰) को मिलना चाहिए। (विदित हो कि वह ज़माना पूरे विश्व में बादशाहत का ज़माना था । जिसमें सत्ता ख़ानदान के ही किसी आदमी को हस्तांतरित होता था। और हज़रत अली (रज़ि॰), पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के चचाज़ाद भाई थे)। बाक़ी लोगों का मत था कि *इस्लाम* की प्रकृति बादशाहत की नहीं, जनमतीय है (जिसे आजकल जनतांत्रिक, डेमोक्रैटिक कहा जाता है)। इसलिए गुणवत्ता, अनुभव व क्षमता के आधार पर इस्लामी शासक का चयन व स्थापन आम जनता करेगी। फिर हुआ यह कि बहुमत से हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के पहले उत्तराधिकारी हज़रत अबूबक्र (रज़ि॰), उनकी मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत उमर (रज़ि॰), उनकी शहादत के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत उस्मान (रज़ि॰) तथा उनकी शहादत के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत अली (रज़ि॰) नियुक्त हुए।ये वे खलीफा थे जो मोहम्मद ( सल्ल॰) के साथ रहा करते थे ।

हज़रत अली (रज़ि॰) के समर्थक गिरोह को ‘शिआने-अली’ कहा जाने लगा। बाद के वर्षों और सदियों में शिआ मत के विचारों में (राजनीतिक आयाम के साथ-साथ) कुछ वैचारिक, आध्यात्मिक तथा धार्मिक आयाम भी जुड़ गए और इतिहास के सफ़र में ‘शिआ’ एक विधिवत सम्प्रदाय बन गया।

इससे पहले शिआ नाम का कोई सम्प्रदाय न था।** ‘सुन्नी’नामक कोई सम्प्रदाय भी सिरे से था ही नहीं**। बीसवीं शताब्दी में पहचान के लिए वे लोग सुन्नी कहे जाने लगे जो शिआ मत के न थे। विश्व भर में लगभग 90 प्रतिशत मुसलमान इसी मत के हैं।

भारत में अंग्रेज़ी शासनकाल में **‘फूट डालो और शासन करो **(Divide and Rule) का चलन ख़ूब परवान बढ़ाया गया और स्वतंत्रता के बाद कुछ पार्टियों और तत्वों ने अपने-अपने राजनीतिक हित के लिए मुसलमानों के बीच इस मामूली से विभेद को बढ़ावा दिया।

अतः सुन्नी व शिआ सम्प्रदायों में टकराव की भी घटनाएं कुछ क्षेत्रों और कुछ नगरों में रह-रहकर घटती रहीं। नादान मुस्लिम जनता (शिआ और सुन्नी आबादी) छिपे हुए शत्रुओं की साज़िश का, रह-रहकर शिकार होती रही। लेकिन दोनों सम्प्रदायों के अनेक अक़्लमन्द, निष्ठावान व प्रबुद्ध रहनुमाओं की कोशिशों से स्थिति में बदलाव और बड़ी हद तक सुधार आ चुका है। वास्तव में इसका श्रेय ‘इस्लाम’की शिक्षाओं को, इस्लाम के मूलाधार और मूल धारणाओं तथा मूल-स्रोतों (कु़रआन, हदीस) को जाता है।

इस व्याख्या के बाद एक बहुत बड़ा प्रश्न है जो अपना उत्तर चाहता है। यह वर्तमान वैश्वीय राजनीतिक परिदृश्य (Global political scenario) में, और विशेषतः कुछ शक्तिशाली पाश्चात्य शक्तियों (Western political players) के ख़तरनाक **‘न्यू वल्र्ड ऑर्डर’** की उन नीतियों के परिप्रेक्ष्य में बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है जिनके तहत वे शक्तियां मुस्लिम जगत के कई देशों में बदअमनी, झगड़े-मारकाट, फ़ितना-फ़साद, रक्तपात, विद्वेष, अराजकता और गृह-युद्ध (Civil war) फैलाकर वहां अपना राजनीतिक, सामरिक, वित्तीय व आर्थिक प्रभुत्व और नव-सामराज्य (Neo-imperialism)अमेरिका ,यूरोप और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियाँ छदम रूप से स्थापित करना तथा उन देशों के प्राकृतिक संसाधनों को लूटना, लूटते रहना चाहती हैं। इसके लिए वह अनेक देशों में ‘शिआ-सुन्नी’टकराव व हिंसा का वातावरण बनाती हैं। आम लोग जो इस टकराव और हिंसा की वास्तविकता से अनजान हैं (और समाचार बनाने, कहानियां गढ़ने, झूठ जनने और इस सारे महा-असत्य को फैलाने का सूचना-तंत्र-Media Machinery-उन्हीं शक्तियों के अधीन होने के कारण) उनके मन-मस्तिष्क में सहज रूप से यह प्रश्न उठता है कि जब शिआ-सुन्नी एक ही धर्म के अनुयायी, एक ही ‘विशालतर मुस्लिम समुदाय’हैं तो इराक़, सीरिया, ईरान, सऊदी अरब, बहरैन, यमन, पाकिस्तान आदि मुस्लिम देशों में शिओं का शोषण, सुन्नियों के साथ दुर्व्यहार, दोनों का एक-दूसरे की आबादियों, मुहल्लों, मस्जिदों में बम-विस्फोट करना, आदि क्यों है?

इसका उत्तर यह है कि वास्तव में यह सब उन्हीं बाहरी शक्तियों की विघटनकारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के करतूत हैं जो मुस्लिम-देशों पर अपने प्रभुत्व, शोषण और लूट का महाएजेंडा (Grand agenda) रखती हैं। पूरा सूचना-तंत्र (Media) या तो उन्हीं का है या उनसे अत्यधिक प्रभावित या परोक्ष रूप से उनके अधीन है, अतः विश्व की आम जनता को न तो हक़ीक़त का पता चल पाता है न उन शक्तियों के करतूतों और अस्ल एजेंडे का।
यह है उस शिआ-सुन्नी विभेद की वास्तविकता जो बहुत ही सतही (Superficial) है; और यह है उस शिआ-सुन्नी विद्वेष की वास्तविकता जो कुछ चुट-पुट घटनाओं व नगण्य अपवादों (Exceptions) को छोड़कर लगभग पूरी तरह नामौजूद (non-existant) है लेकिन इस्लाम के शत्रु और मुस्लिम समुदाय के दुष्चिंतक लोग इसमें अतिशयोक्ति (Exaggeration) करके, इस्लाम की छवि बिगाड़ने तथा मुस्लिम समुदाय के प्रति चरित्र हनन व बदनामी का घोर प्रयास करते रहे हैं। और दूसरे तो दूसरे, स्वयं बहुत से नादान मुसलमान भी इस प्रयास से प्रभावित हो जाते हैं। नादानी के चलते, अविश्वास व दुर्भावना के गर्म वातावरण का तापमान, साज़िशी लोग जब कुछ और बढ़ाकर कोई चिनगारी भड़का देते हैं तो वह देखते-देखते धधक कर शोला बन जाती है। वर्तमान स्थिति यह है कि मुस्लिम समुदाय इन साज़िशों को समझ कर, सचेत व आत्मसंयमी हो गया है।

जबकि मुट्ठीभर कमजोर लोगों को साम्राज्यवादी देश शस्त्रों की खेप उपलब्ध करा कर मदद कर रहे हैं जैसे इराक ईरान बोस्निया हरजोगोविना पाकिस्तान अफगानिस्तान और भी बहुत से नाम हैं जिनकी लिस्ट लंबी है हाँ अब मुस्लिम समुदाए को इस्लामी का दामन पकड़ना होगा जो शाश्वत है

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32 thoughts on “शिआ-सुन्नी विभेद की पड़ताल !

  • July 6, 2014 at 8:28 pm
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    हर बात के लिए गेरो को दोष नहीं दिया जा सकता हे हमें अपने अंदर भी झाकना होगा जब तक कटटरपंथी रहेंगे नफरते भी तो रहेगी ही में मूल रूप से मुज्जफरनगर का हु जहा शिया आबादी अच्छी हे हम सुन्नी सय्यद देवबंदी हे माँ बाप दोनों धार्मिक मगर दोनों ही उदारवादी थे ( पापा को तो गाव की पुत्र दुआरा परित्यक्त एक ब्राह्मण लेडी अपना बेटा और अम्मी को बहु ही कहती थी पापा भी हमारी बहुत बड़ी फेमली और जायदाद विवाद के बाद भी उस लेडी की जैसे तैसे सहायता करते थे ये सिलसिला उनकी मौत तक चला ) तो फिर भला हम शियाओ से क्यों नफरत करते शियाओ से हमारे बहुत अच्छे रिलेशन रहे तो इस पर हमारे बहुत से परिचितों को बड़ा ताज़्ज़ुब भी होता तो वो शियाओ के लिए जो शब्द प्रयोग करते थे वो लिखे नहीं जा सकते एक लाइन तो सबकी जुबा पर रहती थी की ” इनसे तो हिन्दू बहुत अच्छे ” अब बताइये मुजफरनगर में कौन सी मोसाद या सी आई ए सक्रीय थी पूरा पाकिस्तान इस समय शिया सुन्नी तनाव की ज़द में हे पिछले साल मोहर्रम पर रावलपिंडी में भयंकर दंगा हुआ था अरब ईरान से पेट्रो डॉलर की खेप आने से पहले पाक में कोई शिया सुन्नी तनाव नहीं था पेट्रो डॉलर आने के बाद से कटट्रपंथ बढ़ा और शिया सुन्नी क्लेश भी

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    • July 6, 2014 at 10:15 pm
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      भाई मुजफ्फरनगर मे मोसाद का हिंदुस्तानी सनस्करण आरएसएस के ही लोग सक्रिय थे ॥ आगे के लेख पर खुलासा करूंगा ॥ ये आपस की नाइत्तेफाकी इस्लामी नहीं है बल्कि राजनीतिक है ॥

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  • July 6, 2014 at 8:33 pm
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    शिया सुन्नी विवाद की जड मे कही ना कही एक जबरदस्त संस्कारतिक संघर्ष भी था प्राचीन ईरान यानी पर्शिया जिसमे आज का इराक़ भी था विशव का बहुत ही प्राचीन महान और महतवपूर्ण देश था जिसे खुद पर बहुत .ज़्यादा गर्व था इस देश के लोग अरबो को तो अपने आगे कुछ नही समझते थे जब हज़रत उमर ने रातो रात इस प्राचीन देश को जीत लिया तो यहा भी इस्लाम तो आ ग्या मगर आएसए लोगो की कोई कमी नही थी जो अपनी पहचान को अरब संस्कारती भाषा और अकीदे मे ही पूर्ण विलीन बिल्कुल भी नही करना चाहते थे वो अपनी अलग पहचान और संस्कारती चाहते थे तो य हुआ आज देखे भी केवल यही देश उस इलाके मे अरब नही है बाकी सब अरब देश है जो हुआ सो हुआ हम इतिहास मे नही जी सकते है शियाओ का एक अलग ही इतिहास मिजाज संस्कारती अकीदा पहचान पूर्ण रूप से विकसित हो चुका है अब कोई किसी की पहचान और वज़ूद को नही मिटा सकता है य अक्छी बात है की भारत मे कोई बहुत खास शिया सुन्नी तनाव नही है पाक मे भी य ज़िया उल्हक़ के शासन काल मे ही शुरु हुआ था खेर शांतिपूर्ण सहास्तितव ही इस ( और सभी ) समस्या का एकमात्र हल है आमीन

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    • July 6, 2014 at 10:35 pm
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      हज़रत अली (रज़ि॰), पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के चचाज़ाद भाई थे) अब उनके इंतेकाल के बाद खिलाफत मे मतभेद हुआ । इंका संस्कार क्या अलग था ? खानदान एक ही था । चूंकि ”इस्लाम लोकतन्त्र का सिद्धान्त पर ज़ोर देता है ”यहीं पर राजनीतिक महत्वाकांछा के कारण ये मतभेद उभरा ॥ जो आज नासूर बन गया है ॥ फिर भी इस्लाम मेन इसका इलाज है । हमको सही मायेणे मेन इसे समझना होगा ॥ सिकंदर हयात साहब आप उम्र मे मुझसे बड़े हो सकते हैं अधिक जानते होंगे मगर मैंने जितना इस्लाम को पढ़ा है जानने की कोशिश की है लिखा है ।

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  • July 6, 2014 at 8:42 pm
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    ”अब मुस्लिम समुदाए को इस्लामी का दामन पकड़ना होगा जो शाश्वत है ” पकड़ना होगा ? अफज़ल भाई आप ही अंसारी सर से पूछिये की छोडा ही कब था ? कौन से मुस्लिम देश की जनता कम्युनिस्ट हो गयी थी ? या नमाज़ रोज़ा हज़ बन कर दिया था कही भी तो नहीं ? में फिर कहता हु हर बात को इस्लाम से जोड़ कर हर बात में इस्लाम को बीच में नहीं लाना चाहिए जो मुद्दे हे वो इंसानी फ़ितरतो लालचों राज़नीति सत्ता सवहित की लड़ाई हे

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    • July 6, 2014 at 10:08 pm
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      सिकंदर हयात साहब इसे आपने ठीक से पढ़ा नहीं ॥ आपके मन का अंतर्द्वंद इसी मेन छुपा है …………
      विभेद :दोनों समुदायों में विभेद की अस्ल, ‘धार्मिक’ नहीं बल्कि एक तरह से ‘राजनीतिक’ स्तर की है। जिसे समझना आवश्यक है । हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के देहावसान के तुरंत बाद आप (सल्ल॰) के उत्तराधिकारी की नियुक्ति के बारे में मुस्लिम समुदाय में दो मत उत्पन्न हो गए। आप (सल्ल॰) के ख़ानदान वालों में से अधिकतर का विचार था कि नेतृत्व और शासन हज़रत अली (रज़ि॰) को मिलना चाहिए। (विदित हो कि वह ज़माना पूरे विश्व में बादशाहत का ज़माना था । जिसमें सत्ता ख़ानदान के ही किसी आदमी को हस्तांतरित होता था। और हज़रत अली (रज़ि॰), पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के चचाज़ाद भाई थे)। बाक़ी लोगों का मत था कि *इस्लाम* की प्रकृति बादशाहत की नहीं, जनमतीय है (जिसे आजकल जनतांत्रिक, डेमोक्रैटिक कहा जाता है)। इसलिए गुणवत्ता, अनुभव व क्षमता के आधार पर इस्लामी शासक का चयन व स्थापन आम जनता करेगी। फिर हुआ यह कि बहुमत से हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के पहले उत्तराधिकारी हज़रत अबूबक्र (रज़ि॰), उनकी मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत उमर (रज़ि॰), उनकी शहादत के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत उस्मान (रज़ि॰) तथा उनकी शहादत के बाद उनके उत्तराधिकारी हज़रत अली (रज़ि॰) नियुक्त हुए।ये वे खलीफा थे जो मोहम्मद ( सल्ल॰) के साथ रहा करते थे ।

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    • July 6, 2014 at 11:59 pm
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      माफ़ी चाहूंगा मेरे कॉमेंट में मुझसे बंद की ”बन ” टाइप हो गया हे

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  • July 7, 2014 at 12:03 am
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    अफ़ज़ल ख़ान जी अपनी गलतियों के लिये बाहरी ताकतों को दोष देना गलत है. यह सिर्फ मुस्लिम मे ही नही है सभी धर्मों मे कम से कम दो प्रकार है. ईसाइयों मे कॅथोलिक और प्रोटेस्टेंट, सिख मे अकाली – निरंकारी, जैन मे दिगम्बर और एक का नाम फिलहाल याद नही आ रहा है. हिन्दू मे सनातन और आर्य तथा इसके अलावा भी अनेक विभेद हैं. क्या इन सबको बाहरी ताकतों ने लड़ाया था? मेरे विचार मे तो यह फैलाव की प्रक्रिया के स्वभाविक नतीजे हैं. अब बाकी तो सभ्य हो गये संभल गये और आपस मे नही लड रहे पर इस्लाम के मानने वालों को स्भ्य बनाना बाकी है. सभी धर्म आधुनिक विग्यान के अनुसार अपने धर्म ग्रंथो मे बदलाव कर रहे है पर इस्लाम अभी भी क़ुरान मे कोई बदलाव करने के लिये राजी नही है. यद्यपि भारत के अधिकतर मुसलमान अधिक आधुनिक हो रहे हैं. मेरे अनेक मुसलमान मित्रों ने सिर्फ 2 ही बच्चे पैदा किये, बुर्का नही पहनते उनके घर मे, अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों मे उनके बच्चे पढ़ते है और उच्च शिक्षा उनके लड़के ही नही लड़किया भी प्राप्त कर रही है.

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  • July 7, 2014 at 3:37 am
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    ये सब तो ठीक है मगर ये बताइये जब मुस्लिम हिंदी में कुछ लिखते हैं तो इतनी मुश्किल, जिन्नाती और संस्कृत-आमेज़ ज़बान क्यों लिखते हैं, की पढ़ने की हिम्मत ही न हो, ऐसा सिर्फ़ राजभाषा विभाग के अधिकारी ही ,लिखते हैं, ज़रा गौर फर्माइएगा…. आसान लिखिय….ताकि सब समझ सकें….

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    • July 7, 2014 at 7:01 pm
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      बेशक आपने सही बात कही कोशिश करूंगा की लेख आसान बोलचाल मे हो …….

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    • July 8, 2014 at 9:37 am
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      ”गरीब की जोरू सबकी भाभी ” जोर हिंदी पर ही चलता हे भारत में एकतरफ ”शुद्ध ” हिंदी बोलने पर मजाक उड़ाया जाता हे दूसरी तरफ अंग्रेजी ”अशुद्ध ” बोलने पर . आसान भाषा के हम भी हिमायती हे मगर ये भी नहीं की 2 – 4 शब्द शुद्ध या कठिन आ भी गए तो लगे छाती पीटने

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  • July 7, 2014 at 9:59 am
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    आपने इस लेख मे शिया सुन्नी के मसले पर अच्छी रोशनी डाली है पर उनके लिखे एक बात से मैं इत्तेफाक़ नहीं रखता की सारा दोष बाहर वालों का है.
    ================
    ए बाहर वाले अगर हमारे मुस्लिम भाइयों को बहकाकर उनका धर्म परिवर्तन नहीं करा सकते तो उनके बहकाकर उनसे उनके ही भाइयों का कत्ल कैसे करा सकते हैं?
    ================
    देर सबेर आपको ए मानना ही होगा की जहाँ सुन्नी समुदाय सत्ता मे हैं वहां शिया समुदाय सत्ता प्राप्ति के लिये लड रहा है और जहां शिया समुदाय सत्ता मे है वहां सुन्नी समुदाय को हर हाल मे सत्ता चाहिये.
    ==================
    हां यहाँ एक बात सही है की यह लड़ाई धार्मिक ना होकर सत्ता की प्राप्ति के लिये है और धर्म का उपयोग खुद के लालच पर पर्दा डालने की एक कोशिश है.

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    • July 7, 2014 at 7:30 pm
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      असल बात ये है की धरती पर सिर्फ दो विचार धारा की लड़ाई चल रही है । इसाइयत और इस्लाम । इसाइयत की विचारधारा साम्राज्य वादी पोशक है और इस्लाम जम्हूरियत । मगर ये कितनी बड़ी विडम्बना है की ईसाइयत जमहूरियत की डगर पर है और इस्लाम के मानने वाले साम्राज्यवाद से चिपके हुवे है । कुरान का महफ़ूम उसके अलफाज नहीं बदले परन्तु मुसलमान अपना चरित्र इस्लाम के अनुसार ढाल नहीं पाया ॥ अब जब विचारधारा की जंग है तो जहां जो जिस स्थिति मे जैसे मजबूत है अपनी वाली चला ले रहा है ।
      वियतनाम दशकों झुलसता रहा क्यों ? चेचण्या बोस्निया हरजोगोविना दशकों लड़ते रहे ईरान इराक लड़ते रहे क्यों ? अमेरिका क्या इन राष्ट्रों का मालिक था ? आज भी अफगानिस्तान झुलस रहा है । अमेरिका की नीति आखिर क्यों ऐसी है ? जिस दिन आप जनाब इन प्रश्नों का जवाब ढूंढ लेंगे फिर बात कीजिये । खैर कुछ ही सही आपको लेख पसंद आया इसके लिए शुक्रिया ।

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      • July 8, 2014 at 10:07 am
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        जनाब बुरा ना माने मगर आप जब तक तमाशा दिखाते रहेंगे तब तक देखने वाले भी मजा लेते रहेंगे और पैसे भी फेकेंगे ताकि आप और तमाशा दिखाये. अब आपको इस घटना मे भी पैसे फेंकने वाला गलत और तमाशा दिखाने वाला सही लग रहा है तो अलग बात है.
        ==================
        घर आपका है और अगर इसमे कुछ भी गलत हो रहा है तो उसके जिम्मेदार आप हैं, ना की वो रिश्तेदार जो महज चार दिन के लिये आया और आपको बहका के चला गया.

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  • July 7, 2014 at 11:18 am
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    1) अगर हिन्दू धर्म कई हज़ार
    साल
    पुराना है, तो फिर भारत के
    बाहर इसका प्रसार
    क्यों नहीं हुआ और एक
    भारत से बाहर के धर्म
    “इस्लाम” को इतनी मान्यता
    कैसे हासिल हुई कि वो आपके
    अपने पुरातन धर्म से ज़्यादा
    अनुयायी कैसे
    बना सका?

    (2) अगर हिन्दू धर्म के अनुसार
    एक जीवित
    पत्नी के रहते, दूसरा विवाह
    अनुचित है, तो फिर राम के
    पिता दशरथ ने चार विवाह
    किस नीति अनुसार किये थे?
    (3) अगर शिव के पुत्र गनेश
    की गर्दन शिव ने काट
    दी, तो फिर यह कैसा भगवान है,
    जो उस कटी गर्दन को उसी
    जगह पर क्यों नहीं जोड़ सका,
    क्यों एक निरीह जानवर
    (हाथी) की हत्या करके
    उसकी गर्दन गणेश की धढ
    पर लगाई? एक
    इंसान के बच्चे के धढ़ पर
    हाथी की गर्दन
    कैसे फिट आ गयी?
    (4) अगर हिन्दू धर्म में मांसाहार
    वर्जित है,
    तो फिर राम स्वर्ण मृग
    (हिरन) को मारने क्यों गए थे?
    क्या मृग हत्या जीव
    हत्या नहीं है?
    (5) राम अगर भगवान है,
    तो फिर उसको यह
    क्यों नहीं पता था कि रावण की
    नाभि में अमृत
    है, अगर उसको घर का भेदी
    ना बताता कि रावण
    की नाभि में अमृत है, तो उस
    युद्ध में रावण
    कभी नहीं मारा जाता।
    क्या भगवन ऐसा होता है?
    (6) तुम कहते हो कि कृष्ण
    तुम्हारे भगवन हैं,
    तो क्या नहाती हुई निर्वस्त्र
    स्त्रियों को छुपकर देखने
    वाला व्यक्ति, भगवान हो
    सकता है, अगर ऐसा काम
    कोई व्यक्ति आज
    के दौर में करे, तो हम उसे
    छिछोरा कहते हैं। आप भगवान
    क्यों कहते हो?
    (7) सारे बलात्कारी हिन्दू ही
    क्यों होते
    हैं?
    (8) शिव के लिंग (पेनिस )
    की पूजा क्यों करते हैं?
    क्या उनके शरीर में कोई और
    चीज़ पूजा के
    क़ाबिल नहीं?
    (9) खुजराहो के मंदिरों में
    काम-क्रीड़ा और उत्तेजक
    चित्र हैं, फिर ऐसे स्थान को
    मंदिर क्यों कहा जाता है,
    क्या काम-क्रीडा, हिन्दू
    धर्मानुसार पूजनीय है???
    नोट: मैंने एक पक्ष रखा है कुछ बाते गलत हो सकती है और सही भी ही सकती हैं, जो गलत है किरप्या आप लोग उस को सही करें……..मेरा मक़सद किसी को ठेस पहूँचाना या आहत करना नही है……धननेवाद

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    • July 8, 2014 at 3:29 pm
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      मुस्लिम शासकों ने हिजड़े बनाये

      अरब लोगों में गिलमा यानी Salve Boys रखने की पहुत पुरानी परम्परा है .इसे इज्जतदार होने की निशानी समझा जाता था .अमीर उन गिलमा लड़कों के साथ कुकर्म किया करते थे .कुरान में गिलमा के बारे में सुन्दर लडके कहा गया है .लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गिलमा लडके हिजड़े होते हैं ,जिन्हें कम आयु में ही Castrated करके हिजड़ा बना दिया जाता है .इसके बारे में प्रमाणिक और विस्तृत जानकारी खलीफा अल रशीद और खलीफा अल अमीन के इतिहास से मिलती है .जिसे सन 1948 में लन्दन से प्रकाशित किया गया था किताब का नाम “Hitti PK (1948) The Arabs : A Short History, Macmillan, London, p. 99उसी से यह अंश लिए जा रहे हैं .दसवीं सदी ने खलीफा अल मुकतदिर (908 -937 ) ने बगदाद में अपने हरम में रखने के लिए 11 हजार लड़कों को हिजड़ा बनवाया ,जिनमे 7 हजार हब्शी और 4 हजार लडके ईसाई थे .( पेज 174 -175 ) इसका एक उद्देश्य तो उनके साथ कुकर्म करना था .और दूसरा उदेश्य पराजित लोगों को अपमानित करना भी था .
      बाद में यही काम भारत में आनेवाले हमलावर मुस्लिम शासकों ने भी किया ,जैसे जब बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर हमला किया था ,तो उसने बड़े पैमाने पर 8 से 10 साल के हिन्दू बच्चों को हिजड़ा बना दिया था .बाद में मुगलों कि हुकूमत में (1526 -1799 ) में भी हिजड़े बनाए जाते रहे .इसका वर्णन “आईने अकबरी : में भी मिलता है .इसमे लिखा है अकबर ने 1659 में करीब 22 हजार राजपूत बच्चों को हिजड़ा बनवाया .बाद में जहाँगीर ने और औरंगजेब ने भी इस परंपरा को चालू रखा .ताकि हिन्दू वंशहीन हो जाएँ .इस से पहले सुल्तान अला उद्दीन खिलजी ने 50 हजार और मुहम्मद तुगकक ने 20 हजार और इतने ही फिरिज तुगलक ने भी हिजड़े बनवाये थे .
      यहांतक कुछ ऐसे भी हिजड़े थे जो दिल्ली के बादशाह के सेनापति भी बने ,जैसे अल उद्दीन का सेनापति “मालिक काफूर ” हिजड़ा था .और कुतुबुद्दीन का सेनापति “खुसरू खान ” भी हिजड़ा ही था .महमूद गजनवी और उसके हिजड़े गुलाम के “गिलमा बाजी” (homo sexual ) प्रेम यानि कुकर्म (Sodomy ) को इकबाल जैसे शायर ने भी आदर्श बताया है .क्योंकि यह कुरान और इस्लाम के अनुकूल है .(नोट -लेख का अंतिम भाग सारांश रूप में है ,पूरा विवरण अंग्रेजी में दी गयी साईट में देखें )
      भारत सभी देशभक्त और धर्मप्रेमी लोगों से अनुरोध है कि ,किसी प्रकार के झूठे प्रचार में नहीं फंसें .इस्लाम को ठीक से समझें .आने वाले खतरों से सचेत होकर देश धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो .और जिनको किसी ने हिजड़ा बना दिया हो वह हमें क्षमा करें . भैई ईस्का तु जवब दे प्रोूफ क सथ्

      http://islamic-slavery.blogspot.com/

      http://www.faithfreedom.org/articles/islamic-jihad-articles/islamic-slavery-part-10-sex-slavery-concubinage-and-ghilman/

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      • July 8, 2014 at 3:42 pm
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        brother agar m tmhe bolunga toh bharosa nhi hoga ki islam kaise faila bhakti se ya fir logo ko majboor bna k lo ese padh lo.aur fir batana bhagwan woh jiske pass tera dil kare toh jao ya phr woh jiske pass tujhe jabardasti le jaya jaye…..

        This was the time of the life of Islamic Prophet Muhammad and his early successors, the four Rashidun Caliphs.

        Within the first century of the establishment of Islam upon the Arabian peninsula and the subsequent rapid expansion of the Arab Empire during the Muslim conquests, resulted in the formation of one of the most significant empires in world history.[7] For the subjects of this new empire, formerly subjects of the greatly reduced Byzantine, and obliterated Sassanid Empires, not much changed in practice. The objective of the conquests was more than anything of a practical nature, as fertile land and water were scarce in the Arabian peninsula. A real Islamization therefore only came about in the subsequent centuries.[8]
        hase II: The Abbasids (750–1258)
        See also: Abbasid Caliphate
        The Abbasids are known to have founded some of the worlds earliest educational institutions such as the House of Wisdom.

        This was the time of the Abbasid Dynasty (750-1258), the second great dynasty with the rulers carrying the title of ‘Caliph’.

        Expansion ceased and the central disciplines of Islamic philosophy, theology, law and mysticism became more widespread and the gradual conversions of the populations within the empire occurred. Significant conversions also occurred beyond the extents of the empire such as that of the Turkic tribes in Central Asia and peoples living in regions south of the Sahara in Africa through contact with Muslim traders active in the area and Sufi orders. In Africa it spread along three routes, across the Sahara via trading towns such as Timbuktu, up the Nile Valley through the Sudan up to Uganda and across the Red Sea and down East Africa through settlements such as Mombasa and Zanzibar. These initial conversions were of a flexible nature and only later were the societies forcibly purged of their traditional influences.[7]

        The reasons why, by the end of the 10th century, a large part of the population had converted to Islam are diverse. According to British-Lebanese historian Albert Hourani, one of the reasons may be that

        “Islam had become more clearly defined, and the line between Muslims and non-Muslims more sharply drawn. Muslims now lived within an elaborated system of ritual, doctrine and law clearly different from those of non-Muslims. (…) The status of Christians, Jews and Zoroastrians was more precisely defined, and in some ways it was inferior. They were regarded as the ‘People of the Book’, those who possessed a revealed scripture, or ‘People of the Covenant’, with whom compacts of protection had been made. In general they were not forced to convert, but they suffered from restrictions. They paid a special tax; they were not supposed to wear certain colors; they could not marry Muslim women;.”[11]

        It should be pointed out that most of these laws were elaborations of basic laws concerning non-Muslims (dhimmis) in the Quran. The Quran does not give much detail about the right conduct with non-Muslims, in principle recognizing the religion of “People of the book” (Jews, Christians, and sometimes others as well) and securing a separate tax from them inlieu of the zakat imposed upon Muslim subjects.

        American historian Ira Lapidus points towards “interwoven terms of political and economic benefits and of a sophisticated culture and religion” as appealing to the masses.[12] He writes that :

        “The question of why people convert to Islam has always generated intense feeling. Earlier generations of European scholars believed that conversions to Islam were made at the point of the sword, and that conquered peoples were given the choice of conversion or death. It is now apparent that conversion by force, while not unknown in Muslim countries, was, in fact, rare. Muslim conquerors ordinarily wished to dominate rather than convert, and most conversions to Islam were voluntary. (…) In most cases worldly and spiritual motives for conversion blended together. Moreover, conversion to Islam did not necessarily imply a complete turning from an old to a totally new life. While it entailed the acceptance of new religious beliefs and membership in a new religious community, most converts retained a deep attachment to the cultures and communities from which they came.”[12]

        The result of this, he points out, can be seen in the diversity of Muslim societies today, with varying manifestations and practices of Islam.

        Conversion to Islam also came about as a result of the breakdown of historically religiously organized societies: with the weakening of many churches, for example, and the favoring of Islam and the migration of substantial Muslim Turkish populations into the areas of Anatolia and the Balkans, the “social and cultural relevance of Islam” were enhanced and a large number of peoples were converted. This worked better in some areas (Anatolia) and less in others (e.g. the Balkans, where “the spread of Islam was limited by the vitality of the Christian churches.”)[9]

        Along with the religion of Islam, the Arabic language and Arab customs spread throughout the empire. A sense of unity grew among many though not all provinces, gradually forming the consciousness of a broadly Arab-Islamic population: something which was recognizably an Islamic world had emerged by the end of the 10th century.[13] Throughout this period, as well as in the following centuries, divisions occurred between Persians and Arabs, and Sunnis and Shiites, and unrest in provinces empowered local rulers at times.[11]
        Conversion within the Empire: Umayyad Period vs. Abbasid Period

        There are a number of historians who see the rule of the Umayyads as responsible for setting up the “dhimmah” to increase taxes from the dhimmis to benefit the Arab Muslim community financially and to discourage conversion.[14] Islam was initially associated with the ethnic identity of the Arabs and required formal association with an Arab tribe and the adoption of the client status of mawali.[14] Governors lodged complaints with the caliph when he enacted laws that made conversion easier, depriving the provinces of revenues.

        During the following Abbasid period an enfranchisement was experienced by the mawali and a shift was made in the political conception from that of a primarily Arab empire to one of a Muslim empire[15] and c. 930 a law was enacted that required all bureaucrats of the empire to be Muslims.[14] Both periods were also marked by significant migrations of Arab tribes outwards from the Arabian Peninsula into the new territories.[15]
        Conversion within the Empire: “Conversion curve”

        Richard Bulliet’s “conversion curve” shows a relatively low rate of conversion of non-Arab subjects during the Arab centric Umayyad period of 10%, in contrast with estimates for the more politically multicultural Abbasid period which saw the Muslim population grow from approx. 40% in the mid-9th century to close to 100% by the end of the 11th century.[15] This theory does not explain the continuing existence of large minorities of Christians in the Abbasid Period. Other estimates suggest that Muslims were not a majority in Egypt until the mid-10th century and in the Fertile Crescent until 1100. Syria may have had a Christian majority within its modern borders until the Mongol Invasions of the 13th century.
        Phase III: Dissolution of the Abbasids and the emergence of the Seljuks and Ottomans (950-1450)

        The expansion of Islam continued in the wake of Turkic conquests of Asia Minor, the Balkans, and the Indian subcontinent.[7] The earlier period also saw the acceleration in the rate of conversions in the Muslim heartland while in the wake of the conquests the newly conquered regions retained significant non-Muslim populations in contrast to the regions where the boundaries of the Muslim world contracted, such as Sicily and Al Andalus, where Muslim populations were expelled or forced to Christianize in short order.[7] The latter period of this phase was marked by the Mongol invasion (particularly the siege of Baghdad in 1258) and after an initial period of persecution, the conversion of these conquerors to Islam.
        Phase IV: Ottoman Empire: 1299 – 1924
        See also: Ottoman Empire
        Territories in Central Europe under the Ottoman Empire, 1683 CE.

        The Ottoman Empire defended its frontiers initially against threats from several sides: the Safavids on the Eastern side, the Byzantine Empire in the North which vanished with the Conquest of Constantinople in 1453, and the great Catholic powers from the Mediterranean Sea: Spain, the Holy Roman Empire, and Venice with its eastern Mediterranean colonies.

        Later, the Ottoman Empire set on to conquer territories from these rivals: Cyprus and other Greek islands (except Crete) were lost by Venice to the Ottomans, and the latter conquered territory up to the Danube basin as far as Hungary. Crete was conquered during the 17th century, but the Ottomans lost Hungary to the Holy Roman Empire, and other parts of Eastern Europe BAHUT H BHAI KITNA DU SHARAM AA JAYEGI TMHE KI TM BHI ENME SE KISI EK TARIKE K SIKAR HOKE MUSALMAN BANE HOGE

        Ira Lapidus distinguishes between two separate strands of converts of the time: one is animists and polytheists of tribal societies of the Arabian peninsula and the Fertile crescent; the other one is the monotheistic populations of the Middle Eastern agrarian and urbanized societies.[9]

        Islam was introduced in Somalia in the 7th century when the Muslim Arabs fled from the persecution of the Pagan Quraysh tribe. When the Muslims defeated the Pagans, some returned to Arabia, but many decided to stay there and established Muslim communities along the Somali coastline. The local Somalis adopted the Islamic faith well before the faith even took root in its place of origin.[10]

        For the polytheistic and pagan societies, apart from the religious and spiritual reasons each individual may have had, conversion to Islam “represented the response of a tribal, pastoral population to the need for a larger framework for political and economic integration, a more stable state, and a more imaginative and encompassing moral vision to cope with the problems of a tumultuous society.”[9] In contrast, for sedentary and often already monotheistic societies, “Islam was substituted for a Byzantine or Sassanian political identity and for a Christian, Jewish or Zoroastrian religious affiliation.”[9] Conversion initially was neither required nor necessarily wished for: “(The Arab conquerors) did not require the conversion as much as the subordination of non-Muslim peoples. At the outset, they were hostile to conversions because new Muslims diluted the economic and status advantages of the Arabs.”[9]

        Only in subsequent centuries, with the development of the religious doctrine of Islam and with that the understanding of the Muslim ummah, did mass conversion take place. The new understanding by the religious and political leadership in many cases led to a weakening or breakdown of the social and religious structures of parallel religious communities such as Christians and Jews.[9]

        The caliphs of the Umayyad dynasty established the first schools inside the empire, called madrasas, which taught the Arabic language and Islamic studies. They furthermore began the ambitious project of building mosques across the empire, many of which remain today as the most magnificent mosques in the Islamic world, such as the Umayyad Mosque in Damascus. At the end of the Umayyad period, less than 10% of the people in Iran, Iraq, Syria, Egypt, Tunisia and Spain were Muslim. Only on the Arabian peninsula was the proportion of Muslims among the population higher than this.[11]

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  • July 7, 2014 at 11:19 am
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    मेरे हिन्दू भाइयो को गुज़ारिश हैं के वे लोग इस्लाम कुरान को अपने मात्रभाषआ मे पढ़े टके आपको भी इसलम् की जानकारी हो जाए इस्लाम मे ईश्वर काहेता हैं के ‘ वो लोग सोचते हैं के हम कभी उठाए नही जाएंगे मरने के बाद’ यानि जब आदमी मिट्टी बन जाता हैं या फिर जलकर उसे राख बना दिया जाता तो इंसान काहेता हैं के मे कभी ज़िन्दा नही हो पौन्गा लेकिन इसपर ईश्वर कहता हैं के ‘मा के पेट मे बनने से पहेल इंसान क्या था ? कुछ भी नही तो जब मेने उसे मा केपेट मे खून के लोथडे से पैदा किया और उसे दुनाया मे लाया उसे मौत दी फिर एक दिन मे उसे ज़िन्दा भी करूंगा जिसतारहसे आप रात मे सो जाते हैं फिर सुबहा मे उठ जाते हैं मे जिस तरीके से मुर्दा ज़मीन ज़िन्दा करता हु उसीतरह से आप लोग भी एक दिन ज़िन्दा होंगे लेकिन इंसान धोखे मे हैं ‘ जिस दिन इंसान ज़िन्दा होंगा तो उससे ईशवर पूछेंगा के तूने किसकी इबादत की तो इंसान कहेंगा मैने पाथेर, सूरज , चन्द , सितारे , मृत आदमी तो ईश्वर कहेंगा जा उसीसे मांग मेरे पास तेरे लिए कुछ नही हैं

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    • July 7, 2014 at 11:46 am
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      यार आप जो भी हो पर भी मुझे ये बताओ कि हम मांगेगे ही क्यो? जिवित रह्ते हुये भेी मांगो, मरने के बाद भेी मांगो?
      ===============
      वैसे एक सेीधेी सेी बात जो हर इन्सान को समझनी चाहिये, वो ये की आप जिस भी इश्वर की इबादत करते हैं वो आप को जो भी देगा वो आपको मरने के बाद देगा जो की सत्य हो सकता है परंतु इसका कोई भी सबूत “आज” मौजूद नहीं है. परंतु ये पत्थर, चांद, सितारे, नदी, सुर्य इत्यादि आपको जो भी देते हैं वो आज, आपके जीवित रह्ते देते हैं, वो भी सबूत के साथ. फिर इनकी इबादत क्यू ना की जाये……….

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    • July 8, 2014 at 3:20 pm
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      भै उपर तुने जित्ने सवल लिखे ह न सब्के जवब ह मेरे पास लेकिन् तु एक कम कर तुने जो लिकिह ह न कि ह्मे तेरि कुरन पध्नि चहिये तु हमआरे सरे ग्रन्थ पध ले तुज्हे सरे सवाल क जवाब मिल जयेगा क्युन्कि म उत्न लिख्ना नहि चह्ता बहुत मेह्नत ह यार और और मेरि बात तु मानेगा नहि?तुज्हे बाता दु कि हिन्दु पुरे विश्व म फैले हुए थ्थ तुने अर्यन्स क नाम तोह सुन होग ना तोह तुज्हे ये भि पता होगा गि अर्यन्स पुरे विश्व मे फेल गये माहाभारत मे अप्ने भि सुना होगा अर्यपुत्र के बारे मे तोह आप् भि अर्य पुत्र हि होन्गे आप्के मुहाम्म्द भि उसि अर्यन वन्स क होन्गे
      और्४ अप्को पता होग कि मुसल्मन ने धर्म बदल्वने क लिये क्य क्य हथ्कन्दे अप्नय थे तोह हो सकता हे कि आज जो लोग ईत्ना इस्लामे ईस्लम चिल्ला रहे है उन्के पुर्वज हिन्दु हो या फिर कोइ किसि और धर्म के उन्के साथ कुच ऐसा हुआ होगा जिस्पे उन्हे आप्ना धर्म बदलना पादा होगा और आज उन्के बचे भि बदला लेने के बजय उस्के हि गुन गा रहे ह्

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  • July 7, 2014 at 12:26 pm
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    अफ़ज़ल भाई, बहुत ही अच्छा होगा की जल्द से जल्द आप आप इस खुशफेहमी से उबर आये की कुछ!!! आतंकवादी इस्लाम को बदनाम कर रहे है जबकि लेबनान से 6 गुना बड़ा हिस्सा यह लोग सीरिया वा इराक़ मे हतिया चुके है दोनो देशो की प्रशिक्षित सेना के होते हुए भी ? यह तभी संभव है जब इनको व्यापक तोर पर जनता का समर्थन मिला है ओर इसी से साबित हो जाता है की आम मुस्लिम भी दिल मे कही ना कही दारुल इस्लाम के सपने पाले बेठा है,क्या यह सच नही है की आप जेसे मॉडरेट मुस्लिम साम दाम दंड भेद लगा कर इनकी हिफाजत करते है मोके के इंतज़ार मे?धर्म की आड़ मे मुस्लिम अपनी पर्सनल लड़ाइया निपटाते है ओर दोष देते है इस्लाम के दुश्मनो को?सब के सब इस्लाम के दुश्मन केसे हो जाते है? एसा क्या है इस्लाम मे जो रंजिशे बड़ाता है?ईसाई ईसाइयो को क्यो नही मार रहे बोध ओर हिन्दू आपस मे एक दूसरे को क्यों नही मार रहे क्यो इस्लाम के सारे फिरके एक दूसरे को मिटाने के लिये आमादा है फिर भी दोष इस्लाम के दुश्मनो को मड दिया जाता है?

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  • July 7, 2014 at 12:27 pm
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    अफजल भाई नमस्कार. अंसारी जी ने इस लेख मे शिया सुन्नी के मसले पर अच्छी रोशनी डाली है पर उनके लिखे एक बात से मैं इत्तेफाक़ नहीं रखता की सारा दोष बाहर वालों का है. ================ ए बाहर वाले अगर हमारे मुस्लिम भाइयों को बहकाकर उनका धर्म परिवर्तन नहीं करा सकते तो उनके बहकाकर उनसे उनके ही भाइयों का कत्ल कैसे करा सकते हैं? ================ देर सबेर आपको ए मानना ही होगा की जहाँ सुन्नी समुदाय सत्ता मे हैं वहां शिया समुदाय सत्ता प्राप्ति के लिये लड रहा है और जहां शिया समुदाय सत्ता मे है वहां सुन्नी समुदाय को हर हाल मे सत्ता चाहिये. ================== हां यहाँ एक बात सही है की यह लड़ाई धार्मिक ना होकर सत्ता की प्राप्ति के लिये है और धर्म का उपयोग खुद के लालच पर पर्दा डालने की एक कोशिश है.

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  • July 7, 2014 at 12:28 pm
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    आप गलत बोल रहे हैं. विवाद का कारण् सियासी नही मज़हबी है. शिया लोग ना कुरान के प्रति समर्पित है, ना रसूल के लिये. वो मजहब का केन्द्र अखिरी रसूल से खिसका कर हजरत अली की तरफ ले जाने के प्रयास मे रहते हैं. इमामो को धार्मिक चरित्र मानते हैं. दरगाह प्रथा, की शक्ल मे शिर्क यही लेके आये. शायरी और मौसिकी को मुस्लिम समुदाय मे ये लेके आये. ये असल मे मुनाफिक है, और मुसलमान का चोला पहन दीन से मुस्लिम समुदाय को भटकाना चाहते हैं. कुरान की कुछ आयतो को रिसालात का कानून बतला कर अप्रासंगिक बताना, कुरान के प्रति समर्पण की कमी दर्शाता है. हदीसो के बारे मे प्रसंगिक या अप्रासंगिक होने का विवाद हो सकता है. कुरान की किसी भी आयत पे सवाल उठना मुनाफीको और इस्लाम के दुश्मनो की निशानी है. आप असल मुद्दे को छू ही नही रहे हैं. आपने इस विषय पे पहले भी ब्लॉग लिखे, लेकिन फिर असल मुद्दे को छोड़, हुजूर के उत्ताराधिकार को विवाद का कारण बताया. हुजूर आखिरी नबी थे, नबी का कोई उत्ताराधिकारी नही होता. ये बहस का विषय है ही नही.

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    • July 7, 2014 at 7:41 pm
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      जनाब वसी साहब आप ये बताइये की हुजूर सल्ल. के वफ़ात के ठीक पहले इस्लाम मे और मुस्लिम मुमालिक मे उनका जमीनी मर्तबा क्या था ??

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      • July 7, 2014 at 9:38 pm
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        अंसारी जी अफज़ल भाई के नवभारत ब्लॉग पर हमारी और वासी भाई उर्फ़ विशाल उर्फ़ विवेक साहब की अनगिनत बहस मौजूद हे अब आप इनसे बहसिये मगर मेरी सलाह हे की उससे पहले दूध बादाम का स्टॉक रखिये क्योकि इनसे बहस के लिए लोहे का दिमाग चाहिए हे ये ”मेरी मुर्गी की तीन टांग ” टाइप बहस में माहिर हे

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  • July 7, 2014 at 12:29 pm
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    लगता है आपने इस्लाम का अध्ययन सही से किया ही नहीं है यदि किये होते तो ए आपको अवश्य ग्यात होता के जिन खलीफ़ाओं का क़त्ल हुवा वो सब यहूदियों की शाज़िश के तेहत हूवी, जो यहूदी इस्लाम का बढ़ता प्रशार और उन्नति देख कर इस्लाम से लाभ लेने के लिये झूठे धर्मांतरण करके मुसलमान बन गए जिन्हें मुनाफ़िक़ कहा जाता है उन्हों ने ही मुसलमान बनकर इस्लाम को समय समय पर धोका दिया. और तब से अब तक जितने मूठि भर भटके हुवे मुसलमान हैं वो प्रतेयाक्ष या अपरतेयाक्ष रूप में इस्लाम को धोका ही दे रहे हैं. आप शीया के संदर्भ में कहते हैं के “कलमा मे शिया मुस्लिम हजरत अली का नम जोड़ते है परंतु 90% मुस्लिम (सुन्नी) कलमा में केवल नबी मुहम्मद (स.आ. व) का नाम जोड़ते हैं अभी आपको ए पता नहीं के कुछ सुन्नी भी इस्लाम से भटके हुवे हैं जो अल्लाह के अलावए भी किसी और की झूटी इबादत अर्थात पीर फ़कीरों के मज़ारों पे माथा टेकते हैं और उनसे ही मांगते हैं जिसे इस्लाम में शिर्क कहा गया है जिनका ठिकाना केवल नर्क ही है. अब जब क़ुरान/ अल्लाह बार बार कहता है के इंसान गलती का पूतला है वो कभी 100% सही नहीं है और ना ही दुनियाँ की कोई विष्य वस्तु 100% है तो ऐसे में कुछ मूठि भर लोगों के बहकने से इस्लाम बदनाम या झूठा नहीं हो जाता. दूसरों को 100% देखने वाले को सर्वप्रथम स्वय को देख लेना चाहिये के वी और उनका ईमान/ धर्म कितने में है.

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  • July 7, 2014 at 12:31 pm
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    Don’t blame to the Western world for division. These division exists in all the religion and all the society. Most important point ism how the society or religious group deal with these division. In Hinduism, we have several ethnc groups. Some believe in Idol worship and other won’t. Some has faith on one GOD and other beleive in many but it does not give us a region to fight with each other. Msulims sections can agree that they are disagree with each other and this agrrement is sufficient to bring the peace. I am not sure, why we want to blame others for our failure.

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  • July 7, 2014 at 12:32 pm
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    जिन साम्राज्यवदी देशों ने हथ्यार के बल पर जिन मुस्लिम देशों को लोगों को प्रताडित किया उनकी हत्याएिं की, उनके धन सम्पती को लूटा क्या उनसे बदला लेना भी मुस्लिम समाज के लिये पाप हो गया? रही बात आपस में मरने मारने की तो ए मार काट नहीं है अपितु जो मूठि भर यहूदी झूठी धर्मांतरण करके मुसलमान बनकर (जिनको मुनाफ़िक़कहा जाता है) इस्लाम को धोका देते और कुछ कमज़ोर ईमान के मुसलमानों को बहकाते आ रहे हैं उनके विरुध ए जिहाद ही है.

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  • July 7, 2014 at 12:33 pm
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    कुरान मे पूर्ण आस्था रखने वाला हर मुसलमान आपकी बातो को पूर्ण बकवास और मन गढ़ंत मानेगा. अपनी मर्जी से कुछ भी उल जलूल बके जा रहे हैं. खुदा का खौफ है या नही. या किसी गुरु घंटाल से दीनी तालीम ली है?

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    • July 8, 2014 at 12:29 am
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      इस मे गलत क्या है. क्या शिया सुन्नि समस्या नहि है. आज इस्लाम के नाम पे जिस तरह आतन्क्वादि हन्गमा कर रहे है , इस से इस्लाम बद्नाम हि हो रहा है.

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  • July 8, 2014 at 12:26 am
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    सिर्फ 2 बच्चे पैदा हिन्दुस्तान की जरूरत है पर आपको नही लगती. क्योंकि आपके लिए देश का कोई मततब ही नही. आपकी निष्ठा देश के साथ ही नही है. जहाँ हमारे लिये देश प्रथम है आपके लिए इस्लाम प्रथम है देश जाये भाड़ मे. मैने नंगे पन की वकालत नही की, मैने समलैंगिकता की वकालत नही की, मैने लिव – इन – रिलेशन शिप की वकालत नही की पर आपने यह सब अपनी ओर से जोड़ दिया. अंग्रेज़ी माध्यम मे पढ़ना मजबूरी है अच्छी नौकरी के लिये. यदि आप उर्दू या हिन्दी या किसी अन्य भाषा जानते है और अंग्रेज़ी नही बोल सकते, समझ सकते तो आपके नौकरी पाने या नौकरी पाने के बाद तरक्की के रास्ते बंद हो जायेंगे. यह गलत तो है पर सच्चाई भी है. आधुनिक विग्यान के अनुसार जैसे सूर्य पृथ्वी के चारों ओर नही बल्कि प्रथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमति है जबकि हमारे धार्मिक ग्रंथो के अनुसार सूर्य प्रथ्वी के चारों ओर घूमता है. यह सुधार ईसाइओं ने और हिन्दुओ ने तो स्वीकार कर लिया. यही आधुनिकता और विग्यान की बात मैने कही है. समय के अनुसार धार्मिक ग्रंथो, मान्यताओं को स्वीकार करना जरूरी है. क्या बुर्का न पहनने या घूंघट न निकालना नगापन है? हिम्मत है तो सही नाम से जबाब दो.

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    • July 13, 2014 at 12:00 am
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      मेरे पड़ोसी जनाब शुशील श्रीवास्तवा जो बैंक मेन जनरल मैनेजर उनके 7 लड़कियां हुई और अभी कल उन्होने खुशखबरी दी की अबकी तो जरूर लड़का होगा ??? आपके मन की ब्यथा का सही जवाब यही है ……….

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