शरई अदालत की नहीं खाप पंचायत की चिंता करें!

khap_cartoon
by — हफ़ीज़ नोमानी

यूपी में खाप पंचायत का फरमानः दलित बहनों का रेप कर नंगा घुमाओ–उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में एक खाप पंचायत ने दो दलित बहनों के साथ रेप करने का फैसला सुनाया है। पंचायत ने रेप के बाद दोनों बहनों को नंगा कर गांव में घुमाने का भी फरमान दिया है। जानकारी के मुताबिक दोनों बहनों को उनके भाई के प्रेम प्रसंग के मामले में यह फैसला सुनाया गया है।इसी से पता चलता है के खाप पंचायत अपना एक अलग क़ानून चला रहा है और सरकार आँखे बंद की हुई है , इसी खबर के सन्दर्भ में हाफिज नोमानी का लेख पाठको के लिए —-

दारुलक़ज़ा पर वकीलों के हमले आज से नहीं बरसों से हो रहे हैं। आए दिन कोई न कोई वकील इस मासूम से अमल को अदालतों की समानांतर व्यवस्था के तौर पर पेश कर देता है और अदालतों में सनसनी फैल जाती है। सबसे ज़्यादा आश्चर्य की बात है कि कभी किसी सुब्रमण्यम स्वामी मानसिकता वाले वकील ने किसी दारुलक़ज़ा में जाकर ये जानने की कोशिश नहीं की कि आप लोगों का तरीका क्या है और मुक़दमों के फैसले कैसे करते हैं?

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बनने से पहले अनेक बरसों से इमारते शरिया बिहार और उड़ीसा के तहत ये सेवा की जा रही थी। ये दोनों राज्य बेहद गरीब होने के कारण ऐसे मामलों का शिकार रहती थीं कि छोटे छोटे मामलों के लिए भी उन्हें इतना खर्च करना पड़ता था कि जिसका मामला हो वो तबाह हो जाता था। इन राज्यों में ज्यादातर मामले ऐसी शादियों के होते थे कि किसी लड़के ने शादी की फिर साल दो साल बाद वो ये कहकर कहीं चला गया कि मुंबई जा रहा है वहां से कमाकर लाया जाएगा या तुम्हें भी बुला लेगा और फिर ऐसा ग़ायब हुआ कि बरसों उसकी कोई खबर ही नहीं मिली। और वो बदनसीब इंतेज़ार करते करते कोई गलत क़दम उठा बैठी या वो भी किसी के साथ भाग गई। इमारते शरिया ने इस पर रोक लगाने के लिए पूरे बिहार और उड़ीसा में हर शहर में एक केंद्र बनाया और गांव गांव ऐलान कराया कि अगर कोई ऐसी घटना हो तो इमारते शरिया के दफ्तर में सूचित किया जाए। इसके बाद वो साप्ताहिक नक़ीब में इसका ऐलान करते थे और पूरे विवरण के बाद लिख देते थे कि अगर छह महीने के अंदर खुद हाज़िर हो कर या अपने किसी अभिभावक के द्वारा या लिखित में अपना बयान नहीं दर्ज कराया तो आपको फरार करार देकर आपका निकाह फस्ख कर दिया जाएगा और आपकी पत्नी का किसी दूसरे के साथ निकाह कर दिया जाएगा।

इमारते शरिया इस सफलता के बाद छोटे तलाक या विरासत के मामलों को भी अपने हाथ में ले लिया और इस तरह दारुलक़ज़ा की बुनियाद पड़ गई। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड क्योंकि राष्ट्रीय स्तर का संगठन है इसलिए इसने जब इसे अपनाया तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे देश में इसका जाल फैल गया और स्वामी मानसिकता वाले हिंदू वकील ये समझने लगे कि अब मुसलमानों को शायद हमारी ज़रूरत ही न रहे। या और कोई बात हो?

हमें याद नहीं कि कभी किसी मुस्लिम वकील ने किसी हिंदू संगठन को या हिन्दुओं के किसी भी मसले को अदालत में उठाया और न हमारे हिन्दू वकीलों को ये तौफ़ीक़ हुई कि वो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के सामने जाटों की पंचायतों या खाप पंचायतों का विवरण बयान करते। अदालत ने मुसलमानों से कहा कि आप किसी को उसकी अनुपस्थिति में सज़ा नहीं दे सकते। लेकिन किसी भी शहर या राज्य की खाप पंचायत में जो सज़ाएं दी गयी हैं उस पर न किसी ने आपत्ति की, न उनके पंचों को आजीवन जेल में डालने का हुक्म दिया। दारुलक़ज़ा अधिकतम फरार मान कर उसकी पत्नी को दूसरा विवाह करने की इजाज़त देता है लेकिन खाप पंचायत तो सजाए मौत देती है और उस पर अमल भी कराती है। पूरा देश जानता है कि दर्जनों लड़के और लड़कियों गोली से, तलवार से और लाठियों से मौत के घाट उतार दिए गए और न मारने वालों को सज़ा हुई, न हुक्म देने वाले जाहिल पंचों को। इसी खाप पंचायत ने एक ऐसी भी सज़ा दी है जिसकी पूरी दुनिया की अदालतों में मिसाल नहीं मिल सकती। एक लड़का और उसी गाँव की लड़की घर से भाग गई, मामला पंचायत में आया तो तय किया गया कि जो लड़का भागा है उसकी जवान बहन भागने वाली लड़की के भाई के पास पत्नी के रूप में रहेगी और इस पर अमल भी किया गया लेकिन किसी की ग़ैरत ने जोश नहीं मारा।

बहुत सम्मान के साथ सुप्रीम कोर्ट का हर हुक्म स्वीकार लेकिन ये भी निवेदन करना है कि कभी उसने इस पर भी विचार किया कि दर्जनों लड़कियों और लड़कों की हत्या कर देने वालों, हत्या करा देने वालों और हत्या का हुक्म देने वालों में से किसी एक को भी फांसी या उम्रकैद क्यों नहीं हुई? इसका कारण केवल ये है कि जिस समानांतर न्यायिक प्रणाली का मुसलमानों पर आरोप लगाया जा रहा उससे अधिक शक्तिशाली समानांतर सरकार खाप पंचायत है। हर जोड़े की हत्या की थाने में रिपोर्ट होती है लेकिन गिरफ्तारी इसलिए नहीं होती कि ये बताने वाला कोई नहीं मिलता कि किस किसने हत्या की? और कोई ज़बान इसलिए नहीं खोलता कि जिसने ज़बान खोल दी तो उसका हुक्का पानी बंद यानी वो भूखों मर जाए या आत्महत्या कर ले। ये पंचायतें इतनी शक्तिशाली हैं कि हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की किसी सरकार या किसी केंद्रीय सरकार की हिम्मत नहीं है कि इसके ऊपर हाथ डाल सके और इसके उजड्ड और जाहिल पंच डंके की चोट पर कहते हैं कि अगर किसी सरकार में दम है तो वो खाप पर हाथ डाल कर दिखाए।

दारुलक़ज़ा को शरई अदालत मुसलमानों ने नहीं कहा इसलिए कि शायद शरई अदालतें केवल सऊदी अरब में हों हिंदुस्तान में तो ये कोशिश गरीब मुसलमानों को छोटे छोटे मामलों के लिए अदालतों में जाकर उनकी हस्ती मिटाने से बचाने के लिए किया गया है। इसमें ज्यादातर तलाक़ और विरासत के मामले आते हैं और इनके बारे में इस्लामी शरीयत में इतनी विवरण दिया गया है कि जो लोग फतवे देने के ज़िम्मेदार बनाए जाते हैं उनके पास बहुत बड़े बड़े मुफ़्तियों के फतवों की नज़ीरों की जिल्दें भी होती हैं जिससे वो ज़रूरत के वक्त मदद लेते हैं। हम जानते हैं कि ये फित्ना और ऐसे फ़ित्ने अब सुब्रमण्यम की तरह की सरकार के बाद और ज़्यादा खड़े किए जाएंगे लेकिन इन सबका जवाब जाटों, गुर्जरों और त्यागियों की पंचायतें व खाप पंचायत है और दो ​​चार नौजवान मुस्लिम वकील अधिक से अधिक जिहालत भरे सज़ाए मौत के फैसले जमा कर के वो अदालतों में पेश कर दें और पूछें कि ऐसे फैसले देने वाली खाप अदालतों पर क्यों रोक नहीं लगाते और सरकारें क्यों बेबस और लाचार हैं? तो शायद हमारी उंगली उठना बंद हो जाए।

(Visited 17 times, 1 visits today)

14 thoughts on “शरई अदालत की नहीं खाप पंचायत की चिंता करें!

  • August 25, 2015 at 11:10 am
    Permalink

    इस में कोई शक नहीं के शरई अदालत काम से काम भारत के क़ानून को डिस्टर्ब अन्हि करती और अपने हद में रह कर कई मुक़दमा हल करती है और इन के यहाँ या भी है के आप को इन की बात मन्ना है तो माने ऐसा कोई दबाव नहीं है . एक बार चिस्फ जस्टिस ने कहा था के अगर शरई अदालत नहीं होती तो भारत में और लाखो केस का दबाव अदालत पे आ जाता .

    इस के विपरीत खाप पंचायत क़ानून के खिलाफ काम करती है और समाज को बाँट राही है और खाप दलिति , पिछडो पे ही जुर्म करती और देश के विरुद्ध काम करती है इस लिए इस पे सख्ती के साथ एक्शन लेना चाहिए .

    Reply
  • August 25, 2015 at 1:24 pm
    Permalink

    मुज्जफनगर दंगो की ठीक से निष्पक्ष जांच हो तो पता चल भी सकता हे की आखिर कैसे ये चमत्कार कैसे हुआ की मोदी जी को बहुमत मिल गया था ? जो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा बकौल एक साध्वी ये मुजफरनगर दंगो का कमाल था ज़ाहिर हे की ये सरकार पंचायतो पर कोई कार्यवाही कर ही नहीं सकती हे दलित भाइयो से अपील हे की इस सरकार को हटाने में जुट जाए वर्ना हम सबके बुरे दिन पक्के हे बाकी लेख की भावना अपनी जगह सही हे स्वामी जी तो अपनी बेटी ——- हैदर की शादी के बाद से शायद बोरा गए हे मगर मुझे नहीं लगता हे की ऐसा कोई बहुत ही पॉजिटिव रोल ये मज़हबी सनस्थाय निभा रही होगी मुझे ऐसा नहीं लगता हे इसका कारण ये हे की इनमे अधिकांश कटटरपंथी भरे हे उदारवादी नहीं कटटपंथी समाज का कोई खास भला कर ही नहीं सकते हे वो भी खासकर औरतो का मुझे तो नहीं लगता हे बाकी जहा तक गरीबो का सवाल हे उनके मसलो का सवाल हे वो तो बेचारे तो ज़रा ज़रा सी बात पर आभार मानते ही हे भले ही वो कोई मुल्ला हो बाबा हो पीर फ़क़ीर हो आधे माँ हो पूरी माँ हो नेता हो छुट्टी के पैसे ना काटने वाला मालिक हो गरीब तो फ़ौरन अपने भले का और सामने वाले की महानता का एलान कर ही देता हे हां जो लोग गरीब नहीं हे उनके कोई मसले किसी ने हल किये हो ऐसा मेने तो कभी नहीं देखा हे

    Reply
  • August 25, 2015 at 1:29 pm
    Permalink

    क्या नौटंकी हे?? शरीय वाले खाप वालो की तरफ उंगली उठा देते हे और खाप वाले शरीय वालो की तरफ जबकि असलियत मे दोनों ही गाहे-बगाहे देशवासियों की सामाजिक स्वतन्त्रता और न्यायपालिका के रास्ते मे रोड़े बने खड़े दिखाई देते हे ??

    Reply
  • August 25, 2015 at 5:27 pm
    Permalink

    शरद जी

    अगर आजादी के बाद ६० साल का इतिहास देखे तो शरई अदालत अपना काम सही तरह कर रही है और लाखो मसले आसानी से सुलझा रही है , हो सकता है १-२ केस कुछ विवादित रहे हो —- मगर जब आप खाप पंचायत की तरफ देखते है तो पता चले गए के उन का फैसल हमेशा भारतीय कानून के खिलाफ ही रहा है और दलित , पिछडो के खिलाफ रहा है , यहाँ तक के वे रपे और हत्या करने तक का फैसला लेते है . काम से काम अच्छे काम की तारीफ़ करनी चाहिए .

    Reply
    • August 25, 2015 at 10:24 pm
      Permalink

      बहु से रेप कि सजा ससुर से शादि—————————–
      थोदा मुस्लिम समाज पे भि लिख देते तो लेख निस्पक्स हो जाता

      Reply
      • August 25, 2015 at 10:28 pm
        Permalink

        शरई अदालत ओर खाप पंचायत एक हि सिक्के के हेद और तेल दोनो के हि बेधन्गे निरन्य

        Reply
    • August 26, 2015 at 7:37 am
      Permalink

      हाहाहाहाहा….अब क्यो बार-2 हमे मुह खोलने पर मजबूर करते हो चिश्ती साहब ?? आपकी वजह से हमे वे सच लिखने को मजबूर होना पड़ता हे जिसे पढ़ कर बाकी मुस्लिमो का दिल भी दुखता होगा पर जब बेताल को पीठ पर लाद कर चलोगे तो रास्ते मे टाइम-पास करने के लिए बेताल कुछ न कुछ तो सुनाएगा ही और बाद मे सवाल भी पूछेगा जिसका जवाब न देने पर…..आप जानते ही हे ः)

      अगर आप चाहे तो हम अभी पूरे सुबूतो के साथ शरीय कानूनों के बेवकूफी भरे इक्का-दुक्का नहीं बल्कि कई उदाहरण दे सकते हे (जब हम ऐसा कहते हे तो 100% ऐसा होगा भी) क्योकि हमारी आंखो पर कोई पट्टी नहीं बंधी हे और हमारा दिमाग स्वतंत्र सोच रखता हे !!…. जिन शरीय कानूनों पर आपको इतना नाज हे उनके बारे मे सिर्फ इतना बताना काफी होगा कि <>

      नवंबर 2014 मे ट्विटर पर एक अरबी हैशटैग जिसका अर्थ है ‘ हम शरिया क्यों नहीं चाहते’, 24 घंटे में पांच हजार से भी ज्यादा बार प्रयोग हुआ।

      विस्तार से जानकारी चाहिए तो बस एक बार “कुबूल हे” बोल दीजिये हम आपकी आंखे पूरी तरह से खोल पाएंगे ऐसी गलतफहमी हमे शरीय के बारे मे अपने पास उपलब्ध सामाग्री को लेकर हे ….बाकी मुस्लिम पाठको से एडवांस मे सॉरी

      Reply
      • August 26, 2015 at 7:41 am
        Permalink

        पिछले कमेंट मे के बेीच मे लिखा हुआ….अरबी देशो मे भी शरीय कानूनों का विरोध शुरू हो चुका हे ….. प्रकाशित नहीं हो पाया था

        Reply
  • August 26, 2015 at 10:02 am
    Permalink

    शरद और उमाकांत जी

    अगर आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर लिखे गए तो अलग बात है .में ने भी लिखा है के १-२ मसले को चीड़ दिया जाये तो शरई अदालत अपना काम सही कर रही है और इसे भारतीय कोर्ट ने भी मन है , दूसरी बात आप को हक़ है शरई अदलात का फैसला माने या न माने अगर आप शरई अदालत का फैसला नहीं मानते तो आप कोर्ट जा सकते है . लेकिन खाप पंचायत तो फरमान सुनाती है और अपने फैसले पे अमल करती है और क़ानून के खिलाफ जाती है.

    अब आप जो भी कहे लेकिन मन्ना पड़े गए के खाप पंचायत देश के क़ानून के विरुद्ध काम करती है . खाप पंचायत का मसला हर रोज्ज अखबार में आता है.

    Reply
    • August 26, 2015 at 11:57 am
      Permalink

      लो भाइ करलो बात किस कानुन कि बात करते हो जिसे कभि हिन्दु विरोधि या कभि मुस्लिम विरोधि साबित करने मे लगे रहते हो
      जनाब चिस्ति जि इस देश मे सविधान के अलावा भि दो समानन्तर सरकरे चलति है
      १-शरई अदालत
      २-खाप पंचायत
      दोनो के हि सविधान के विरुध उल जलुल निरनय
      फर्क ये है कि हिन्दुओ को खाप पंचायत के और मुस्लिमो को शरई अदालत के निरनयो मे बुराइ दिखाइ हि नहि देति

      Reply
  • August 26, 2015 at 1:30 pm
    Permalink

    अमरीश पूरी की एक फिल्म आई थी जिसका डाइलॉग काफी फेमस हुआ था “डोंग कभी रोंग नहीं होता”ः)
    उसी तर्ज पर चिश्ती साहब जैसी सोच वालो की नज़र मे मुसलमान से जुड़ा कुछ भी कभी गलत नहीं होता चाहे वो याक़ूब मेनन और ओसामा बिन लादेन हो या फिर श्रीया कानून ः)

    Reply
    • August 26, 2015 at 1:32 pm
      Permalink

      श्रीया के स्थान पर शरिया पढ़ा जाये…असुविधा के लिए खेद हे

      Reply
  • August 28, 2015 at 2:25 pm
    Permalink

    पेज 3 खाप और ऑनर किलिंग
    ——————————–
    कल्पना कीजिए कि अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश या हरियाणा में शीना बोरा जैसी किसी लडकी की ऑनर किलिंग हो, तो मीडिया क्या करता ? सारी शहरी जमात वहां की खाप की टीवी पर ईंट से ईंट बजा देती और ग्रामीण अपनी हिफाजत में लट्ठ लेकर निकल पडते. अनपढ ग्रामीण कहते कि ये खानदान की इज्जत का सवाल था.
    लेकिन यहां सवाल पेज 3 वाली जमात की खाप का है. किसने तीन-तीन शादियां की, क्यों की, लडकी किस लडके के साथ प्यार कर बैठी और मां ने कैसे अपने छद्म-बेटी को अपने पूर्व पति की मदद से ठिकाने लगाया, ये सब ऐसे सवाल हैं, जिसमें पेज 3 वाले ये नहीं पूछ रहे कि इतने पढे-लिखे और हाई-फाई होने का बावजूद आप भी ऑनर किलिंग कर रहे हो.
    देश में मीडिया पर इस वक्त राधे मां और शीना बोरा के भूत सवार हैं. गुजरात में आरक्षण को लेकर आग लगी हुई है, प्याज और दालों के भाव में आग लगी हुई है, पूर्व सैनिक हफ्तों से अनशन पर बैठे हुए हैं, लेकिन देश की जनता खूब चस्का लेकर टीवी देख रही है. मधुर भंडारकर की फिल्म जो चल रही है………

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *