विपदाओं से उभरता विकास – दुष्यंत कुमार !

Dushyant-Kumar
प्रस्तुति सिकन्दर हयात

आत्महत्या से पहले पढ़े एक बार ये लेख

जो लोग दुःख के सागर में डूबता उतराते हे वे ज़्यादा कुशल तैराक बन कर निकलते हे , इसके पीछे मनोविज्ञान का एक अहम सिद्धांत काम कर रहा हे . ऐसा हे की मनुष्य में बेहद कड़ी परिस्तिथियों में ही फलने फूलने की अंतर्निहित क्षमता हे . बेहद विचलित करने वाले अनुभवों से गुजरने के बाद उनके प्रति सकरात्मक सोच रखने वाले केवल जीवट भरे या मज़बूत लोग ही नहीं हे . असल में मनोवैज्ञानिकों ने पाया हे की जीवन में बुरा समय झेलने वाले आधे से ज़्यादा लोगो का यह मानना हे की इससे उनको जीवन में किसी न किसी रूप में लाभ मिला हे . इसलिए मनोविज्ञानी त्रासदी की वजह से जीवन में पड़ा होने वाली अधभुत संभावनावों की खोज को लेकर उत्सुक हे . यह मनुष्य की मानसिकता में दुखद प्रसंगों के हालात के पश्चात विकास के नए आयाम हासिल करने का नया विज्ञान हे इस विज्ञानं के सदियों पुरानी एक मान्यता पर प्रमाणिकता की मोहर लगा दी हे . मान्यता ये हे की जो परिस्थिति आपके अस्तित्व को मिटा नहीं सकती वह अन्ततः आपको मज़बूत बनाती हे औसत तौर पर लोग पलट कर सामना करते हे – यहाँ तक की वे सफलता के नए सोपान हासिल करते हे . मनोविज्ञानियों ने यह अर्थपूर्ण खोज हे की दुखो को हँसते हँसते झेल लेने वाले यह साबित करने के लिए काफी हे की एक सम्भावना भरी जिंदगी जीने के लिए ख़ुशी भरी मुस्कान से आगे भी कुछ चाहिए . महानगरों में ख़ुशी की हमारी प्यास अब और आगे बढ़ कर चिरआनंद की इच्छा का रूप धर चुकी हे . हम ख़ुशी की तलाश में ऐसी जिंदगी की चाहत करने लगे हे जिसमे बुरी घटनाय न हो और दर्द और तनाव भरी स्थितियां न हो . पर मनोविज्ञानियों के पास जो सूचनाए हे उनके मुताबिक समाज ऐसे लोगो से भरा हे जिन्होंने बेहद कष्ट उठाया . यही नहीं , उन्हें अपने जीवन का अर्थ दोबारा सोचने पर मज़बूर होना पड़ा . मनोविज्ञानी मानते हे की ऐसे लोगो के पास ही हमें समझाने के लिए एक ऐसी अर्थपूर्ण और गहरी जिंदगी होती हे जिसे दार्शनिक ‘एक बेहतर जिंदगी की खोज ‘ कहना पसंद करते हे इस जिंदगी में ख़ुशी तो निश्चित तोर पर होती ही हे . इसके साथ करुणा बुद्धिमता , मदद का भाव , अंतर्दृष्टि और सर्जनातमकता का विकास – ये सब भी ज़्यादातर दुःख से जन्म लेते हे . इसके वजह ये हे की बदतर हालत ही हमें बदलाव की दर्द भरी प्रकिर्या से गुजरने का कारण बनकर आते हे एक मानवीय जीवन जीने के लिए एक शांत और मुक्त जीवन का होना ही काफी नहीं हे हमें विकास की भी जरुरत होती हे और कभी कभी यह विकास हमें चोट पंहुचाता हे !

शर्ले स्थित नार्थ केरोलिना विशवविधालय के मनोविज्ञान के प्रोफेसर रिच तेदशी ने पोस्ट ट्रॉमेटिक ग्रोथ यानि हादसों से उभरा विकास कहकर एक नए विज्ञान की नीव रखी हे . हमला हिंसक अपराध का शिकार व् अचानक गम्भीर रोग की गिरफ्त में आये लोगो का वे निरंतर अध्ययन करते रहे हे . उन्होंने पाया की बेशक कई लोग उन पर पड़ी विपदा की वजह से तनाव का दंश झेलते हुए निद्रा यादाश्त की कमी व् तनाव भरे सिरदर्द का शिकार रहते हे . लेकिन यह खुद तेदेशी व् अन्य मनोविज्ञानियों के लिए खासा रोचक रहा की विपत्तियों के शिकार ज़्यादातर लोगो के लिए जीवन अन्ततः अधिक खुशहाल व् परिपूर्ण बन जाता हे एक मज़ेदार बात किसी विपदा के बाद जब नजरिया बदलता हे तो दुनिया ज़्यादा स्पष्ट व् करीब दिखने लगती हे . यह वैसा ही हे जैसे झेन फ़क़ीर अपने ध्यान में पाने की कोशिश करते हे . रंग ज़्यादा स्पष्ट व् रोचक दिखने लगते हे . सामान्य चीज़े भी अचानक सुंदर लगने लगती हे एक तरह से व्यक्ति खुद को आश्चर्य लोक में .पाता हे जब वह खुद को सामने घटित हो रहे प्रसंग से अलग खड़ा पाता हे तो पूरा संसार बहुत प्रभावशाली व् अजूबा दिखने लगता हे यह अलौकिक अनुभव होता हे निश्चित ही लोग इस अवसर पर यह कहते हे की उनकी जिंदगी सदा के लिए बदल जाती हे . और उनकी पुरानी आदतें व् मूल्यबोध एक झटके में भर भरा कर ढह जाते हे जो लोग विपदा में भी अर्थ ढूंढ निकाल लेते हे . वे आमतौर पर कोई ज़्यादा सक्षम या दुनियादार लोग नहीं होते हे बल्कि वे आम लोग होते हे पर उन्हें एक बात जो सबसे अलग बनाती हे वह यह हे की उसके जीवन में जो घटित होता हे उसे स्वीकार करने के लिए वह तैयार रहते हे मनोविज्ञान का कहना हे की विकास की एक महत्वपूर्ण कुंजी वह क्षमता की आप किसी अनुभव से खुद को बदलने का सहस जूता पाए . इसका मतलब यह भी हे की आप यह स्वीकार करते हे की आप नाजुक मिजाज हे तथा यह भी की आपके जीवन में काफी कुछ अच्छा भी हो सकता था अगर आपके जीवन में दुखद प्रसंग नहीं आते . एक बार यह अहसास हो जाने के बाद वे कुछ इस तरह की मुक्ति का अनुभव करते हे जिसकी उन्होंने पहले कभी कल्पना तक नहीं की थी सबसे बड़ी बात यह की विपदाओं की वजह से वे अपनी जिंदगी की प्रथमिकताओं से तालमेल बैठाते हुए .जिंदगी को नए तरीके से जीने का सिलसिला तैयार करते हे . तेदेशी का कहना हे की जो लोग विपदाओं से जीत कर निकलते हे वे रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाले खतरों के प्रति बेहद सजग हो जाते हे और इन खतरों का शिकार न बनने के किसी मुगालते में नहीं रहते . एमराय यूनिवर्सिटी के मनोरोग विषेशज्ञ ग्रेगरी बर्न्स ने अपनी हालिया आई पुस्तक सेटिस्फेक्श्न में लिखा भी हे – संतुष्टि दयाक अनुभवों का राजमार्ग परेशानियों के पथरीले पठार से होकर गुजरता हे ( लेखक – दुष्यंत कुमार का ये लेख कुछ वर्ष पूर्व दैनिक हिंदुस्तान अखबार में छपा था वही से साभार )

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4 thoughts on “विपदाओं से उभरता विकास – दुष्यंत कुमार !

  • April 5, 2016 at 4:07 pm
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    अफ़ज़ल भाई और पाठको ये वो दुष्यंत कुमार कवि ( 1931 1975 )- का लेख नहीं हे जिनका डाक टिकट का ऊपर चित्र हे ये तो कोई और दुष्यंत कुमार हे जिनका ये बहुत बढ़िया लेख कुछ वर्ष पूर्व हिंदुस्तान अखबार में छपा था मेरे पासरखा था तो आज प्रत्युषा बनर्जी आत्महत्या को देखते हुए मेने पाठको तक पहुंचना उचित समझा

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  • April 5, 2016 at 4:16 pm
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    लानत परतुषा बनर्जी के दोस्तों और दिल्ली के डॉक्टर नारंग के पड़ोसियों पर भी सौ बार लानत हे ये लोग कहा झक मार् रहे थे ? बनर्जी के दोस्तों की सेल्फिशनेस और डॉक्टर नारंग के पड़ोसियों की कायरता की जितनी भी निंदा की जाए कम होगी अगर इनमे इंसानियत होती तो आज दोनों हमारे बीच होते ? बाद में यही कायर और बेशर्म लोग टीवी पर आ रहे थेअ सल में इंसान की अधिकतर भावनाय और उनका उबाल फोरी होता हे उस समय अगर आप अड़ जाओ या दोस्त के साथ लम्बा वक्त गुजारो तो उन भावनव का उबाल शांत हो जाता हे वर्ना प्यार गुस्सा सेक्स आदि की फोरी भावनाय बड़े बड़े काण्ड करवा देती हे डॉक्टर नारंग के पडोसी अगर अड़ जाते तो चाहे जो होता मगर डॉक्टर साहब की जान बच जाती इसी तरह अगर बनर्जी या दिल्ली की मॉडल के दोस्त इस हालात में ज़्यादा से ज़्यादा उसके साथ समय बिताते तो वो कुछ ही समय बाद हि इस डिप्रेशन से निकल जाती और चार पांच साल बाद खुद इस बात पर ताजुब करती की आखिर वो क्यों ऐसे फालतू आदमी के प्यार में थी – ? अधिकतर भावनाव का उबाल फोरी ही होता हे

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  • April 18, 2018 at 3:27 pm
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    विचार सही विचार कितने मायने रखते हे शायद उपर इस अच्छे लेख ने एक भले लड़के को आत्महत्या के विचार से भी दूर रहने में मदद करि हो क़स्बा से———————————-
    Sarthak •रविश सर , मैं यह बात पुरे होश और हावास मैं कह रहा हु. कथुआ और उन्नाव की घटना क्रम को देख कर मुझमे मेरी आत्मा मर चुकी है. मैं बहुत ही सेंसिटिव लड़का हु. मेरे सोसाइटी में कोई पशु-पक्षी की मृत्यु हो जाती है तोह उस पर ही बहुत रो पड़ता हु और उसको उसकी खाने-पिने की प्रिय वास्तु के साथ गड्ढा खोद कर पूरी इज्ज़त के साथ दफना देता हु. और दफनाते समय यह सोचता हु के “हम लोगो ने इन प्राणियो का हर रूप में और हर तरीके से दमन करते रहे है.कम से कम मरने के बाद इनको ज़मीन तोह नसीब हो जाए.” बहुत दर्द और दुःख होता है जब कोई बलात्कार या उत्पीडन की घटना को पढता हु या सुनता हु. इंसान होने पर शर्म आती है. और कथुआ और उन्नाव के बाद तोह बहुत ज्यादा. मैं जब उस लड़की की जगह खुद को रख कर देखता हु तोह बहुत लाचार पाटा हु और यह सोचता हु के ” काश मेरे माता-पिता ने मेरी ब्रूनहत्या कर दी होती… तोह मुझे इनती दरिंदगी और दर्द से तोह ना गुज़र ना पड़ता.” आसिफा के बारे में सोचता हु तोह नींद नहीं आती और खुद को मारने का मन करता है और एक बार प्रयास भी कर चूका हु मगर असफल रहा. पता नहीं यह देश और उसके लोग किस रास्ते पर जा रहे है. सही-गलत का अंतर करने की समझ खो चुके है. सबको पर्सनल experience की ज़रूरत है.———————————————-Share ›

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    सिकंदर हयात to Sarthak • 5 days ago
    भाई थोड़ा मज़बूत बनो ज़्यादातर भले लोग थोड़े कमजोर हो ही जाते हे मगर हमें भलापन और मज़बूती दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए , मरने की बात ना करना तुम भले आदमी हो दुनिया को तुम्हारी जरुरत होगी ना , फिर कभी मरने की बात ना करना में भी अच्छा आदमी हु घर वाले भी सारे अच्छे आदमी इसी भलेपन से अब तक घर में दो मौत और कम से एक करोड़ रूपये को नुकसान हो चूका हे एक करोड़ जिसका पांच या दस % भी मुझे मिल जाता तो अब तक पत्रकारिता लेखन विचार की दुनिया खासा नाम जमा लेते और भला ही करते मगर जीवन भर हार हादसों और दुखो असफलताओ के बाद भी मेरा मरने का कोई इरादा नहीं हे घास खाकर भी हम जिन्दा रहेंगे और क्रांति के लिए झुझते रहेंगे और वैसे भी गुलशन ग्रोवर का एक डायलॉग हे ”जिंदगी का मज़ा तो खट्टे में ही हे ” ये लेख पढ़ो https://khabarkikhabar.com/archives/2586 Share ›
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    Sarthak सिकंदर हयात • 4 days ago
    धन्यवाद सिकंदर सर | आपके शब्द बहुत प्रेरणादायक है | पढने पर मजबूती ज़रूर आई, मगर लगता है यह मजबूती अस्थाई है | मैं आपके परिश्रम और हिम्मत की इज्ज़त करता हु | स्थाई मजबूती और हिम्मत के लिए हमको बहुत काम करना होगा | इश्वर से येही प्रार्थना करूँगा के आप जैसे लोगो की उम्र और होसला बढ़ा दे | आपके इन अमूल्य शब्दों और होसले केलिए बहुत धन्यवाद |

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    सिकंदर हयात Sarthak • 4 days ago
    अस्थायी क्यों भाई कम से कम इतना तो वादा करो की फिर कभी मरने की बात न करोगे न मन में लाओगे मेरे समझ में नहीं आता की कोई मरने की बात क्यों करता हे क्यों लोग सुसाइड कर लेते हे क्यों —- ? अरे जब आप लोग इतने डेयरिंग हो की मौत से ही नहीं डरते हो तो फिर भला जिंदगी की दुःख तकलीफे बुरे लोगो से लड़ाई संघर्ष वो सब तो तुम्हारे लिए तोबड़ा आसान होना चाहिए किसी और के मुकाबिल तुम लोग ये संघर्ष ज़्यादा बेहतर कर सकते हो

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    Sarthak -सिकंदर हयात • 3 days ago
    सिकंदर सर … वादा करता हु के अब कोई मरने का ख्याल नहीं आने दूंगा | कमज़ोर ज़रूर हु मगर हरा हुआ तोह नहीं हु ना | आपके दिए गए होसले के लिए बहुत बहुत धन्यवाद | अगर जीवन में मौका मिला तोह आपका आशीर्वाद लेने ज़रूर आऊँगा | शुक्रिया सिकंदर सर |

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    सिकंदर हयात Sarthak • 3 days ago
    ok

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  • July 17, 2018 at 7:24 am
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    भारत में लगभग आधे लोग हद से ज़्यादा बईमान मक्कार गद्दार और लालची हो चुके हे बाकी लगभग आधे बेहद कमजोर हो रहे हे बहुत से लोग तो बेहद टेलेंटिड हे सब कुछ हे मगर कमजोर हो रहे हे में सोचता हु की मेरे जैसे लोग अब शायद उंगुलियों पर गिने जितने ही बचे होंगे जो ना बईमान हे ना भ्र्ष्ट ना लालची ना दुष्ट और ना ही कमजोर और वीक और इमोशनली वीक देखते हे क्या होता हे हम जेसो का खेर इस दुष्ट टकलू ने भी इस मुद्दे से जुड़ा लिखा हे ———————————————————————————————————— ” आनंद मैंने कई वर्ष पहले Discovery चैनल पर एक documentary देखी थी, शेरों के झुंड पर। Documentary बनाने वाला दल कई साल तक उसी झुंड के साथ रहा था।

    उसमें उन्होंने एक तथ्य देखा था व उस पर चर्चा भी की थी, कि जैसे ही झुंड के male शावक स्वयं शिकार करने लायक बड़े होते थे, शेरनिया ही, यानी उनकी माँये ही उन पर हमले कर उन्हें झुंड से बाहर निकाल देती थी। झुंड का सरदार male शेर नहीं, शेरनिया male शावकों को बाहर करती थी, उन पर वास्तविक हमले कर। प्रकृति का सम्भवत अपना तरीक़ा था नए शेर बनाने का: जाओ बेटा, शेर हो तो अपना झुंड बनाओ, किसी बूढ़े शेर का झुंड क़ब्ज़ाओ, नहीं तो मरो।

    इंगलैंड में आम किसान परिवारों में भी primogeniture का नियम रहा है- पूरी ज़मीन बड़े बेटे को, बाक़ी बेटे युवा होते ही घर से बाहर। जाओ, कमाओ खाओ, मरो-खपो। विवशता में अंग्रेजो ने ओद्योगिक क्रांति भी कर डाली- मरता क्या न करता, फ़ैक्टरी ही लगाओ, ज़मीन तो मिली नहीं। व पूरी दुनिया की ज़मीन क़ब्ज़ा ली। सब जगह उनका राज। सारे टापू उनके।

    शेर पैदा किए अंग्रेजो ने, बेटों को घर से निकाल कर।

    Second-son का ये नियम अमरीका में cruel निर्दयी माना गया, व समाप्त कर दिया गया (सारे ही second sons गए थे वहाँ, शायद इसलिए)। लेकिन बेटे को बड़ा होते ही घर से निकालने की परंपरा जारी रही-“स्कूली शिक्षा हमने दे दी, कॉलेज में पढ़ना है बेटा तो प्लेटे धोओ, स्वयं कमाओ और पढ़ो।” वहाँ श्रम का सच्चा सम्मान है। अभी न्यूयॉर्क में एक छब्बीस वर्षीय पुत्र माँबाप के साथ रहने की ज़िद कर रहा था, माँ बाप कोर्ट में चले गए, कोर्ट ने भी निर्णय दिया-घर से निकालो इसे, अपना घर बसाए और रहे।

    गमले का पौधा घर के अंदर रहे तो सुरक्षित तो रहता है, लेकिन कमज़ोर, मुरझाया सा।

    भारत में पारिवारिक स्नेह बहुत अधिक है, रिश्तेदारिया भी पाँच छह पीढ़ियों तक निभायी जाती है, इससे भारतीय मानसिक रूप से बहुत स्थिर होते है, स्नेहशील होते है व निर्दयी नहीं होते।

    लेकिन अधिकता हर चीज़ की बुरी होती है। इतना अधिक स्नेह हो गया है कि माँ बाप let go नहीं कर पाते। हर समय बच्चे की चिंता में जीते है। बच्चा आत्मरक्षा भी नहीं सीख पाता।
    दूसरा हमारी परंपरा बन गया है कि बच्चे की सफलता माँ बाप का उत्तरदायित्व बन गया है: बच्चे भी राग अलापते रहते है,”मेरे माँ बाप ने मेरे लिए क्या किया, कुछ नहीं किया।” पड़ोसी भी मिलते ही पूछते है , “बच्चे क्या कर रहे है?”
    इस उत्तरदायित्व से ही आधी बीमारीया आयी समाज में। समाज मानने को तैयार नहीं है कि winner के यहाँ loser पैदा होना प्राकृतिक है व इसमें माँ बाप का कोई रोल नहीं है। लेकिन न समाज मानता है, न माँ बाप- लगे रहते है , पेपर आउट कराएँगे, घूस देंगे, सिफ़ारिश कराएँगे……पूरी कमाई लाड़ले के बिज़्नेस में फूँक देंगे।
    किसी एक परिवार का दोष नहीं है, संस्कृति है हमारी, लेकिन बात करने से ही बदलेगी।
    The Daily Mail द्वारा घोषित 10000 पाउंड स्टर्लिंग के पुरस्कार को Alcock व Brown ने जीत लिया था 1919 में अटलांटिक को हवाई जहाज़ से बिना रुके पार कर। व आठ साल बाद ही Charles Lindbergh ने Orteig पुरस्कार जीत लिया था अटलांटिक को solo non stop फ़्लाइट में पार कर।और उसके पाँच साल बाद Amelia Earhart पहली महिला बन गयी ये उपलब्धि प्राप्त करने वाली।
    हम तो अपने बेटों को बोले,”चुपचाप घर बैठो, हमें नहीं चाहिए कोई पुरस्कार……” और बेटी? बेटी तो अकेले घर से बाहर भी नहीं जाएगी अटलांटिक को तो लगे आग।1967 में अमरीका में चाँद पर जाने वाले रोकेट की टेस्टिंग के दौरान ज़मीन पर ही उसमें आग लग गयी व तीन Astronauts की मृत्यु हो गयी। लेकिन दो साल बाद ही अमरीकी चाँद पर पहुँच ही गए। कोई हाय तौबा नहीं, कोई जाँच आयोग नहीं जिसकी रिपोर्ट आने तक फ़्लाइट का कार्यक्रम स्थगित कर दिया जाय। ”
    Those who take risks, walk on the Moon. ”

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