विदेशी आक्रमणकारी और भारतीय मुसलमान

hurrah
दुनिया का कोई भी स्वाभिमानी मुल्क अपने किसी भी नागरिक को यह अनुमति कभी नहीं देगा कि वह अपने मुल्क के राष्ट्रनायकों और महापुरुषों को छोड़कर किसी दूसरे मुल्क से आये बर्बर हमलावरों को अपने नायक के रुप में देखे और उनके प्रति श्रद्धाभाव रखे। मगर दुर्भाग्यवश हमारे मुल्क में चंद नासमझ आलिमों के बहकाबे में आने के कारण कई लोग ऐसी मानसिकता रखतें हैं। ऐसी मानसिकता रखने वाले लोग अपनी इस सोच के कारण आज तक इस मुल्क की परंपराओं के साथ समरस नहीं हो पायें हैं जिसकी परिणति देशवासियों के बीच वैमनस्य और अविश्वास के रुप में दिखती है। इस देश का बहुसंख्यक समाज जिन बर्बर आक्रमणकारियों को अपनी मातृभूमि को पददलित करने वाले तथा श्रद्धाकेंद्रों को दूषित करने वाला समझता है, उसे यहां के कुछ मुसलमान अपना नायक और आदर्श मानतें हैं। उनकी ऐसी सोच का आधार उनका और आक्रमणकारियों का हममजहब होना है। ऐसी सोच रखते हुये वो भूल जातें हैं कि हमारी पहचान हमारे वतन से है, उसे पददलित करने वाला कोई भी हो, वह हमारा सिर्फ और सिर्फ शत्रु है चाहे उसका मजहब कोई भी हो। दुनिया की तारीख गवाह है कि हर मुल्क पहले अपने वतन के हितों को तरजीह देता है। कोई भी इस्लामी मुल्क किसी दूसरे इस्लामी मुल्क को किसी भी कीमत पर आक्रमण करने देना तो दूर उसके वतन के हितों के खिलाफ कुछ भी करने की अनुमति नहीं देगा।

आक्रमणकारियों को साथ सहानुभूति रखने और उन्हें अपने नायक के रुप में देखने की सीख यहां के मुसलमानों को उनके मजहब के कट्टरपंथी देतें हैं जो उन्हें बतलातें हैं कि मुहम्मद बिन कासिम एक तारणहार के रुप में यहां आया था जिसने हमें और तुम्हें इस्लाम की दौलत से नवाजा था। महमूद गजनवी भी उनकी नजर में इस्लाम का महान सैनिक था जो हिंदुस्तान से बुतों को साफ करने आया था। ऐसी कट्टरपंथियों के लिये नायकों की ये श्रृंखला बिन कासिम से आरंभ होकर औरंगजेब तक जाती है।

कट्टरपंथियों के बहकाबे में आकर ये चंद मुसलमान भूल गये कि जिन्हें उनके मजहबी रहनुमा नायक और आदर्श के रुप में पेश कर रहें हैं वो सिर्फ और सिर्फ आक्रमणकारी थे जिन्हें हकीकी इस्लाम से कुछ लेना-देना नहीं था बल्कि उन्होंनें अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और साम्राज्यवादी लिप्साओं को पूरा करने के लिये इस्लाम का इस्तेमाल किया था। आक्रमणकारियों की स्तुतिगान करते-2 ये लोग यह भी भूल जातें हैं कि इन बर्बर हमलावरों की तलवारें अपने हितों के पोषण के लिये मुसलमानों के खून से प्यास बुझाने से भी नहीं हिचकती थी। अपनी बदहाली के लिये यहां की सरकारों को दोषी ठहराने हुये ये लोग ये बात भी भूल जातें हैं कि जिनको ये अपना आदर्श मानतें हैं उन्होंनें तो अपने शासकीय सुविधा के लिये इस्लाम में लोगों को दीक्षित तो किया था पर कभी उनके उज्ज्वल भबिष्य के लिये स्तरीय स्कूल या महाविधालय नहीं खुलवाये थे, यहां तक कि अपने दरबार और राजकाज में भी वो मतांतरित भारतीय मुसलमानों की बजाए अपने हमवतन तुर्कों, अफगानों, मुगलों या फिर उच्चवर्णीय हिंदुओं को ही स्थान देते थे। इतना ही नहीं इन बर्बर आक्रमणकारियों ने (जिनकी यहां लंबे समय तक शासन करने की योजना थी) अपने आने वाली नस्लों की शासकीय सुविधाओं के लिये हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य फैलाने वाले कई ऐसे काम कर दिये थे जिसके फलस्वरुप भबिष्य में यहां के सामान्य हिंदू-मुस्लिम आपस में संधर्षरत रहें और उनके वंशजों के शासन के विरुद्ध कोई खड़ा न हो पाये।

इन बर्बर आक्रांताओं को नायक के रुप में देखने वालों को यह बात गांठ बांध लेनी चाहिये कि:-

– इन आक्रमणकारियों का मजहब इस्लाम भले रहा हो परंतु वो यहां इस्लाम के प्रचार की मंशा से नहीं आये थे।

– इनके कृत्यों में हजारों ऐसे काम है जो कुरआन और हदीस के विरुद्ध है।

– इनकी तलवारों ने मुसलमानों का भी उतना ही खून बहाया जितना हिंदुओं का।

– मुसलमानों की तालीम और बेहतर भबिष्य के लिये इन्होंनें कुछ नहीं किया।

– तुर्क, मंगोल, फारसी आदि हमवतनों की तुलना में ये लोग मतांतरित भारतीय मुसलमानों को हेय दृष्टि से देखते थे।

– इनके राजदरबारों व शासकीय कार्यों में मतांतरित मुसलमानों की संख्या नगण्य थी।

– इनके कृत्यों के कारण मुसलमानों का उनके हमवतन हिंदुओं से वैमनस्य बढ़ा।

इन तमाम तथ्यों की पुष्टि इन आक्रांताओं के जीवन और कार्यों के निष्पक्ष आकलन करने से हो जाता है।

मुसलमानों का खून बहाना हराम

नबी (सल्ल0) ने अपनी मुबारक जुबान से किसी मुसलमान के लिये यह हराम ठहरा दिया था कि वह किसी मुसलमान को तकलीफ दे। हदीसों में आता है:-

– हजरत अब्दुल्ला रिवायत करतें हैं कि रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया, मुसलमान को गाली देना बेदीनी तथा कत्ल करना कुफ्र है। (बुखारी) मजाहिरे हक में इस हदीस की व्याख्या करते हुये कहा गया है, ‘जो मुसलमान किसी मुसलमान को कत्ल करता है वह अपने इस्लाम के कामिल होने की नफी करता है और मुम्किन है कि कत्ल करना कुफ्र पर मरने का भी सबब बन जाये।’

– हजरत अबू मूसा रिवायत करतें कि सहाबा ने अर्ज किया: या रसूल (सल्ल0) अल्लाह! कौन से मुसलमान का इस्लाम अफ्जल है? इर्शाद फरमाया, जिस मुसलमान की जबान तथा हाथ से दूसरे मुसलमान महफूज रहे। (बुखारी)

– हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है कि अबुल कासिम मुहम्मद ने इर्शाद फरमाया, जो शख्स अपने मुसलमान भाई की तरफ लोहे यानि हथियार वगैरह से इशारा करता है, उसपर फरिश्ते उस वक्त तक लानत करतें हैं जब तक कि वह इशारा करना छोड़ नहीं देता। (मुस्लिम) इसका मतलब किसी मुसलमान को इशारातन भी दूसरे मुसलमान पर हथियार उठाने से सख्ती से मना करना है।

– हजरत बुरैदा रिवायत करतें हैं कि मोमिन का कत्ल किया जाना अल्लाह के नजदीक सारी दुनिया के खत्म हो जाने से भी ज्यादा बड़ी बात है। (नसाई शरीफ)

– हजरत उबादा बिन सामित से रिवायत है कि रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया कि जिस शख्स ने किसी मोमिन का कत्ल किया और फिर उसके कत्ल पर खुशियां मनाई तो फिर अल्लाह न तो उसकी फर्ज कबूल करेंगें और न ही नफ्ल (अबूदाऊद)

– हजरत अबू सईद खुदरी तथा अबू हुरैरा रिवायत करतें हैं कि आसमान और जमीन वाले सबके सब किसी मोमिन के कत्ल में शरीक हो जाये तो भी अल्लाह इन सबको औंधे मुंह जहन्नम में डाल देंगें। (तिरमिजी)

– हजरत अबूबक्र फरमातें हैं कि मैंने रसूल (सल्ल0) को यह इर्शाद फरमाते सुना कि जब दो मुसलमानें अपनी तलवारें लेकर एक दूसरे से लड़े और उनमें से एक दूसरे का कत्ल कर दे तो कातिल और मक्तूल दोनों जहन्नम की आग में जलेंगें।

नबी करीम ने तो अपने उन्नतियों को किसी मुस्लिम की तरफ हथियार दिखाने से भी मना फरमाया था पर बर्बर आक्रमणकारियों ने तो सत्ता पाने अथवा उसे बचाये रखने के लिये अपने हममजहबों के खून की नदियां बहा दी। नबी (सल्ल0) के हुक्म की नाफरमानी प्रायः हर मुस्लिम आक्रमणकारी ने की। महमूद गजनवी को भी नायक रुप में देखने वालों की तादाद बहुत बड़ी है पर उसके बारे में लोग इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि दौलत की चाह में भारत की तरह ही उसने फारस को भी लूटा था और मुसलमानों के खून बहाये थे। गजनवी ने अपनी सेना की एक टुकड़ी का कमान तिलक नाम के एक हिंदू को सौंपा था जिसका इस्तेमाल उसने अपने शत्रु और मुस्लिम विद्रोही अहमद नियालतगीन का दमन करने में किया था। महमूद गोरी के आरंभिक दिन फारस के मुस्लिम सरदारों के साथ सत्ता संधर्ष में बीता था। रजिया सुल्तान तो अपने मुस्लिम अमीरों से इतनी शंकित रहती थी कि उसने खोखर, जाट और राजपूतों से बहुत मधुर संबंध बना लिये थे। बलबन ने तुगरिल बेग नामक मुस्लिम सरदार का विद्रोह दबाने के लिये ढ़ाका के हिदू शासक दनुजमाधव की सहायता ली थी। खुसरो खाँ ने खिलजी वंश के सुल्तान मुबारक शाह की हत्या करवा दी थी और उसकी जगह गद्दी पर बैठा था। खुसरो मुसलमान था पर उसके खिलाफ गाजी मलिक ने एक भारी सेना लेकर चढ़ाई कर दी। खुसरो और गाजी मलिक के लंबे संधर्ष के उपरांत खुसरो की पराजय हुई और उसकी हत्या कर दी गई। यानि खिलजी वंश का अंत एक मुसलमान के द्वारा ही हुआ। तुगलग वंश के प्रसिद्ध शासक मुहम्मद बिन तुगलग ने भी मुस्लिमों के विरुद्ध कई बार सख्ती दिखाई। सागर के हाकिम बहाउद्दीन गुर्शस्प ने तुगलक के खिलाफ विद्रोह कर दिया था जिसे दबाने के लिये सुल्तान ने अपनी सेना भेजी थी। 1335 में दौलताबाद के मालिक हुशंग ने भी सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था तथा अपने विद्रोह में पश्चिमी धाट के एक हिंदू राजा बरबरा से सहयोग ली थी। फिरोज तुगलग के खिलाफ गुजरात के हिंदू और मुस्लिम सरदारों ने मिलकर विद्रोह किया था। जिसे कुचलने में लिये फिरोज तुगलग ने बड़ी भारी संख्या में अपनी फौज भेजी थी। फिरोज तुगलग की मृत्यु के बाद जब उसका पोता गयासुद्दीन तुगलक गद्दी पर बैठा तो उसके खिलाफ उसके चाचा मुहम्मद ने विद्राह कर दिया जिसे दबाने के लिये उसे दो मुस्लिम सरदारों के नेतृत्व में सेना भेजनी पड़ी। दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन फरीद के कमजोर होते ही बहलोल लोदी ने खोखर के एक हिंदू राजा जसरथ की मदद से उसपर हमला कर दिया और उसे पद से हटा दिया। बहलोल लोदी की भिड़ंत कई बार अपने धर्मभाईयों से हुई था जिसमें जौनपुर के शासक महमूद शाह तथा हिरात के शासक फतह खाँ के साथ हुआ युद्ध प्रसिद्ध है। इस युद्ध में फतह खाँ को पकड़ कर उसका सर कलम कर दिया गया था। बहलोल के शासन के अंतिम दिनों में उसके मुकाबले पर जौनपुर का शासक हुसैनशाह शर्की आ खड़ा हुआ, जो मुसलमान था। बहलोल के वंश के ही सिंकंदर लोदी का पहला संधर्ष आलम खाँ और ईसा खाँ लोदी से था। ईसा खाँ लोदी की उसने हत्या करवा दी थी। बहलोल की तरह जौनपुर सिंकंदर के राह की भी बाधा बना। जौनपुर के विद्रोह को दबाने के लिये सिकंदर लोदी को अपने भाई बारबक की हत्या करवानी पड़ी थी।

मुगल बादशाहों के प्रति मुस्लिमों के मन में नायकत्व भाव अधिक है क्योंकि इन्होनें स्थायी रुप से लंबे समय तक यहां शासन किया था परंतु ये मुगल बादशाह भी बाकी आक्रमणकारियों से अलग नहीं थे। ये यहां इस्लाम का प्रचार करने नहीं आये थे, सत्ता प्राप्ति के लिये इनका संधर्ष हिंदुओं के अलावा मुसलमानों से भी हुआ था, अपनी राह मे बाधा बनने वाले किसी को भी इन्होंनें नहीं बख्शा था।

बाबर:- बाबर का जन्म वर्तमान उज्बेकिस्तान के फरगना धाटी में हुआ था। भारत में इसे मुगल वंश के संस्थापक के रुप से जाना जाता है। दशकों से चल रहे रामजन्मभूमि विवाद इसी बाबर के द्वारा श्रीरामजन्मस्थान पर बनबाये गये मस्जिद की परिणति है। इस विवाद के चलते राष्ट्रवादियों के मन में यह प्रश्न जन्मता है कि किसी बर्बर आक्रांता द्वारा बनबाई गई किसी इमारत को इस देश के राष्ट्रनायक और करोड़ों लोगों के आराध्य श्रीराम के जन्मस्थान के आगे कैसे तरजीह दी जा सकती है? बाबर को अपने नायक के रुप में देखने वाले भी बाबर से जुड़ी कई तथ्यों से अनभिज्ञ है। बाबर के कृत्यों की निष्पक्ष विवेचना स्पष्ट कर देती है कि बाकियों की तरह वह भी इस्लाम का केवल इस्तेमाल करने वाला था। बाबर द्वारा मुगल वंश की स्थापना किसी इस्लामी राज्य की स्थापना नहीं थी वरन् उसके साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की परिणति थी जिसके लिये उसने मुसलमानों का खून बहाया। इतिहास के इस स्थापित तथ्य से किसे इंकार हो सकता है कि दिल्ली की गद्दी पाने के लिये बाबर ने इब्राहीम लोदी नाम के मुस्लिम शासक को पदच्युत किया था। बाबर के साथ पानीपत के मैदान में हुई जंग में अपवाद स्वरुप कुछ तोमर राजपूतों को छोड़कर बाकी सभी मुसलमान थे जिनकी तादाद 1 लाख के करीब थी। इन सारे मुसलमान सैनिकों को बाबर ने अपने बारुद और तोपों से रौंद डाला था।

बाबर 1519 में जब भारत की ओर बढ़ा तो उसकी राह रोकने के लिये युसूफ जई जाति के मुसलमान खड़े थे। बाबर उनको पराजित करने के बाद ही बाजौर और भेरा पर कब्जा कर पाया था। फिर पानीपत के मैदान में उसके सामने इब्राहीम लोदी नाम का मुसलमान बादशाह खड़ा था जिसके लाखों की फौज को बाबर ने बारुद और तोप का इस्तेमाल कर नष्ट कर दिया तथा लोदी की जगह दिल्ली के तख्त पर सत्तासीन हो गया। 6 मई 1529 को हुये धाधरा के युद्ध में बाबर का सामना एक मुस्लिम अफगान सरदार महमूद लोदी से था। जिसमें महमूद लोदी की कड़ी पराजय हुई थी।

क्या खानवा का युद्ध जिहाद था?

यह युद्ध बाबर और राणा सांगा के बीच 17 मार्च 1527 को हुआ था। इस युद्ध के बाद बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की थी। कई मुसलमान ये मानतें हैं कि यह जिहाद था जिसमें बाबर ने एक हिंदू राजा को धूल चटा दी थी। परंतु वास्तविकता इससे काफी दूर है, यह युद्ध जिहाद नहीं था और न ही किसी काफिर के खिलाफ था बल्कि इस युद्ध में राणा सांगा की तरफ से लड़ने वालों में कई बड़े मुसलमान सरदार भी शामिल थे। इस जंग में राणा के साथ इब्राहीम लोदी का छोटा पुत्र महमूद लोदी था जिसे अफगानों ने अपना सुल्तान धोषित कर रखा था। महमूद लोदी को चित्तौड़ में राणा ने शरण दे रखी था। राणा का साथ देने वाले मुसलमानों में मेवात के शासक हसन खाँ मेवाती भी थे जिनके पुत्र नाहर खान को बाबर ने बंदी बना लिया था। खान-ए-जहां नोहानी नाम के एक और अफगान शासक राणा के साथ थे। इसी तरह बसीन चंदेरी नाम के एक मुस्लिम शासक भी राणा के पक्ष में लड़ रहे थे (खानवा के युद्ध की एक रोचक बात यह भी थी कि इसमें राजपूत सैनिकों के साथ-2 लगभग बराबर संख्या में मुस्लिम अफगान सैनिक भी थे)

खानवा के जंग को किसी भी हालत में जिहाद नहीं कहा जा सकता। हार की आशंका से शंकित बाबर ने अपने सैनिकों में नवीन उत्साह का संचार करने के लिये इसे जिहाद का नाम दिया था। साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा से अपने ही धर्मभाईयों का गला काटने वाला गाजी या मुजाहिद नहीं हो सकता।

14 बर्ष में उम्र से ही बाबर मृत्युपर्यंत सत्ता के लिये संधर्षरत रहा और इस संधर्ष में उसका सामना केवल दो बार हिंदुओं से हुआ (चंदेरी के युद्ध में मेदिनी राय से और खानवा के युद्ध में राणा सांगा से) बाकी सारे जंग उसके अपने धर्मभाईयों के साथ ही हुये थे। सन् 1494 मे वो फरगना की गद्दी पर बैठा पर पारिवारिक झगड़ो की वजह से जल्द ही उसके चाचा ने उसे गद्दी से उतार दिया और बर्षों उसे निर्वासन में बिताने पड़े। 1497 में उसने समरकंद पर आक्रमण किया और उसे जीत लिया। विजय के इस उत्साह में वह फिर से समरकंद की ओर बढ़ा पर उसके सैनिकों ने उसे धोखा दे दिया और समरकंद भी उसके हाथों से निकल गया। 1501 में वह फिर से समरकंद जीतने निकला तो उसके रास्ते में एक मुसलमान सरदार खान मुहम्मद शायबानी खड़ा था जिससे उसे जंग करनी पड़ी। बाबर को जब लगने लगा कि वह जंग मे कमजोर पड़ जायेगा तो वह फारस चला गया और वहां जाकर उसने वहां के शासक शाह इस्माइल प्रथम से मदद मांगी जो सफीवी वंश का शासक था पर इस दोस्ती के बदले में उसने बाबर को शिया मत में ढ़ाल लिया। बाबर ने भी पूरे मनोयोग से शिया मत के सिद्धांतों का अनुपालन किया। बदले में शाह ईस्माइल ने बुखारा पर बाबर के आक्रमण में उसकी मदद की। बाबर चूंकि तैमूरवंशी था इसलिये वहां के लोगों ने उसे उज्बेकों से मुक्तिदाता के रुप में देखा और उसकी मदद को खड़े हो गये। इसी क्रम में 1511 मे उसने फिर से समरकंद पर चढ़ाई की और वहां कब्जा कर लिया। समरकंद की जनता ने भी बाबर का भरपूर स्वागत किया पर जैसे ही उन्हें बाबर के शिया अकीदे वाला होने का पता चला वो उसके खिलाफ हो गये। वहां के सुन्नियों में बाबर के प्रति भारी अनास्था फैल गई और 8 महीने के अंदर से वहां की जनता ने उसे वहां से खदेड़ दिया। यह स्पष्ट करता है कि उसके अपने इलाकों के मुसलमान भी उसे पसंद नहीं करते थे।

आज भले ही भारत के कुछ मुसलमान बाबर को अपने नायक के रुप में देखतें हों पर बाबर उस वक्त के स्थानिक भारतीय मुसलमानों के बीच भी नफरत और धृणा का पात्र था। अबुल फजल के अनुसार जब बाबर की फौज आगरा पहुँची थी तब उसे और उसकी फौज को वहां के हिंदुओं के साथ-2 स्थानीय मुसलमानों का भी विरोध झेलना पड़ा था और इस विरोध के परिणाम में बाबर के फौज और धोड़े को तीन दिनों तक खाना और चारा तक नसीब नहीं हुआ था। अपने ग्रंथ बाबरनामा में खुद बाबर ने भी इस बारे में लिखा है कि यहां के लोगों एवम् हमारे आदमियों में परस्पर अत्यधिक विरोध और धृणा की भावना थी। भारत के तत्कालीन मुसलमानों की बाबर से धृणा का पता इस बात से भी चलता है कि दौलत खाँ लोदी के देशद्रोही पुत्र दिलावर खाँ (जिसने बाबर के भारत आक्रमण में उसकी मदद की थी) को जब शेरशाह सूरी ने मुंगेर के किले में पकड़ा था तो उसके लिये मौत की सजा मुकर्रर की थी क्योंकि उसने वतन पर हमला करने वाले का साथ दिया था। शेरशाह सूरी ने मरते वक्त यह इच्छा जताई थी कि बाबर से जंग करने वाले इब्राहीम लोदी के शहीदी स्थल पर एक मकबरा बनाया जाये।

यहां तक कि आज उसके दफन भूमि अफगानिस्तान में भी कोई उसके लिये आंसू बहाने वाला नहीं है। मरने बाद बाबर को काबुल में दफनाया गया था पर काबुल वासियों ने कभी भी उसे आदर्श या नायक रुप में नहीं देखा। 1990 में अफगानिस्तान में चल रहे गृहयुद्ध के कारण बाबर की कब्र क्षतिग्रस्त हो गई थी पर किसी अफगान में मन में उसकर मरम्मत करवाने का ख्याल तक नहीं आया। उनके लिये बाबर धृणा का पात्र हैं क्योंकि उनकी नजर में वो सिर्फ एक आक्रांता था जो मध्य एशियाई मुल्क से उनके वतन को रौंदने आया था।

भारत भूमि को रौंदने वाला बाबर अपने निजी स्वार्थों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिये यहां आया था न कि इस्लाम का प्रचार करने। अगर बाबर इस्लाम फैलाने यहां आया होता तो उसकी पहली जंग किसी हिंदू राजा के साथ होनी चाहिये थी न कि किसी मुस्लिम शासक के साथ। बाबर के जीवन की किसी भी धटना से उसके द्वारा इस्लाम का प्रचार करने का कोई संकेत नहीं मिलता।

हुमायूँ:- बाबर के बाद 26 दिसंबर 1530 को मात्र 23 बर्ष की उम्र में दिल्ली के तख्त पर सत्तासीन हुये इस मुस्लिम बादशाह का सारा जीवन मुसलमानों के साथ जंग करने में गुजर गया। उसका तख्त छीनकर दर-2 भटकने पर मजबूर करने वाला भी एक मुसलमान ही था। हुमायूँ के पिता बाबर ने उसे ये निर्देश दिया था कि वो उसके साम्राज्य को अपने तीन भाईयों कामरान, हिन्दाल और अस्करी के बीच में बांटे। साम्राज्य के बंटबारे की परिणति तीनों भाईयों के बीच युद्ध के नतीजे में सामने आया और ये आपस में संधर्षरत रहे। सत्तासीन होने के कुछ दिन बाद ही हुमायूँ गुजरात के मुस्लिम शासक बहादुर शाह की बढ़ती शक्ति से परेशान होकर उसपर हमलावर हुआ। उसका यह अभियान कालिंजर का अभियान नाम से मशहूर है। 1532 में उसे मुस्लिम अफगान सरदार महमूद लोदी के साथ दौहरिया के मैदान में जंग करनी पड़ी। 1532 में ही चुनार के किले पर कब्जा करने के लिये शेर खाँ के साथ जंग करनी पड़ी जिसमें शेर खाँ की पराजय हुई और बाद में शेर खाँ ने उससे संधि कर ली। 1534 में बिहार में मुहम्मद जमान मिर्जा और मुहम्मद सुल्तान मिर्जा ने विद्रोह कर दिया जिसे दबाने के लिये हुमायूँ को उसके खिलाफ सेना का इस्तेमाल करना पड़ा। 1535 में सारंगपुर में उसे शाह बहादुर से जंग करनी पड़ी। शाह बहादुर हुमायूँ के सत्तासीन होने के समय से उसके लिये सबसे बड़ा खतरा बना हुआ था जो 1537 में उसकी मृत्यु हो जाने से समाप्त हुआ। अक्टूबर 1537 में पुनः चुनार के किले के लिये उसे शेरखाँ के बेटे कुतुब खाँ के साथ जंग करनी पड़ी, यह जंग 6 महीने तक चलता रहा। 26 जून 1539 हुमायूँ की जिंदगी का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन साबित हुआ जब चैसा के मैदान में एक मुस्लिम अफगान सरदार शेरशाह सूरी ने उसे पराजित कर दिया। 17 मई 1540 को हुये बिलग्राम के युद्ध में फिर से उसका सामना शेरशाह सूरी से हुआ और इस युद्ध के बाद उसे गद्दी छोड़नी पड़ी और निर्वासित अवस्था में सिंध जाना पड़ा। शेरशाह के मरने के बाद लाहौर पर कब्जे के लिये हुमायूँ को शेरशाह के बेटे इस्लामशाह से जंग लड़नी पड़ी। 1555 में हुआ मच्छिवारा युद्ध भी मुसलमानों के साथ ही थी। यह युद्ध सतलज नदी के तट पर हुमायूँ और अफगान सरदार नसीब खाँ और तातार खाँ के बीच हुआ था जिसके बाद पूरा पंजाब हुमायूँ के कब्जे में आ गया था। 22 जून 1555 को हुये सरहिंद के युद्ध में हुमायूँ के सामना फिर से एक मुसलमान सरदार सिंकंदर सूर के साथ था।

इस तरह हुमायूँ का सारा जीवन मुसलमानों के साथ जंग और खून-खराबें में ही बीता। हुमायूँ के शासनकाल का प्रायः हर साल मुस्लिम रक्त से गीला रहा।

अकबर:-

अकबर का साम्राज्य भी मुसलमानों का खून बहाकर सिंचित हुआ था। हुमायूँ के वक्त मुगल साम्राज्य सिमट गया था जिसके विस्तार करने में अकबर के द्वारा मुसलमानों का सर्वाधिक खून बहा। उसके अधिकांश सैन्य अभियान मुसलमानों के खिलाफ ही था ! चुनार विजय के लिये 1562 ई0 में अफगानों से, गुजरात विजय के लिये 1571 ई0 में मुजफ्फर खाँ तृतीय से, बिहार और बंगाल विजय के लिये 1574-76 ई0 में दाऊद खान से, काबुल विजय के लिये 1581 ई0 में हकीम मिर्जा से, कश्मीर विजय के लिये 1586 ई0 में यूसुफ याकूब खाँ से, उड़ीसा विजय के लिये 1592 ई0 में निसार खाँ से, सिंध विजय के लिये 1593 ई0 में जानीबेग से, कंधार विजय के लिये 1595 ई0 में मुजफ्फर हुसैन से, बलूचिस्तान विजय के लिये 1595 ई0 में ही पन्नी अफगान से, खानदेश विजय के लिये 1591 ई0 में अली खाँ से, दौलताबाद विजय के लिये 1599 ई0 में चाँद बीबी से, अहमदनगर विजय के लिये 1600 ई0 में बहादुर शाह और चाँद बीबी से तथा असीरगढ़ विजय के लिये 1601 ई0 में मीरन बहादुर से अकबर को जंग करनी पड़ी। ये सब के सब मुसलमान थे। बाबर की तरह ही अकबर को भी अफगान कबीले युसूफजई का विरोध झेलना पड़ा जिसे दबाने में बीरबल मारा गया। सूरी वंश जिसने उसके पिता को दर-ब-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर किया था को दबाने के लिये अकबर ने तत्कालीन सूरी शासक सिकंदर शाह सूरी के खिलाफ फौजकुशी की थी। यानि अकबर के द्वारा लड़े गये जंगों में सबसे अधिक जंगे मुसलमानों के खिलाफ हुई थी।

जहाँगीर:- जहांगीर 1605 ई0 में दिल्ली के तख्त पर बैठा था। सत्ता प्राप्ति के लिये उसने अपने बेटे और अकबर के लाडले पोते खुसरो की अपने दूसरे बेटे शाहजहाँ के द्वारा हत्या करवा दी थी। गुरु अर्जुन देव को फांसी देने के कारण मुसलमान उसे इस्लाम रक्षक के रुप में प्रस्तुत करतें हैं परंतु वास्तविकता यह है कि गुरु अर्जुन देव को उसने फांसी धार्मिक वजहों से नहीं बल्कि खुसरो के विद्रोह में उसकी मदद करने के कारण दी गई थी। अपने दादा और पिता की तरह सत्ता बचाने के लिये जहाँगीर को भी मुसलमानों के साथ जंग करनी पड़ी। 1606-07 में कांधार में शाह अब्बास के खिलाफ फौजकुशी करनी पड़ी तो 1622 में शाहरहाँ के विरोध के चलते कांधार मुगल साम्राज्य से निकल गया। जहाँगीर के दक्षिण भारत विजय की राह की सबसे बड़ी रुकावट कोई हिंदू नहीं था वरन् अहमदनगर का योग्य वजीर मलिक अंबर था। मलिक अंबर को दबाने के लिये उसे कई दफा अपनी फौज भेजनी पड़ी। 1626 में झेलम नदी के तट पर उसका संधर्ष महावत खाँ से हुआ था। मुगल साम्राज्य के पतन के पीछे की सबसे बड़ी वजह अंग्रेज थे। भारत में मुस्लिम साम्राज्य के पतन का बीजारोपण करने वाला जहाँगीर ही था क्योंकि उसी के शासनकाल में कैप्टेन हाकिन्स, सर टॉमस रो, विलियम फिंच तथा एडवर्ड टैरी जैसे अंग्रेज और यूरोपीय यात्री आये थे, जिन्हें उसने भारत में व्यापार की अनुमति दी थी।

शाहजहाँ:- शाहजहाँ के बारे में कहा जाता है कि वह सुन्नी मत का मानने वाला था और इस कारण शियाओं के प्रति अनुदार था और उनके साथ भेदभाव करता था। शाहजहाँ के पुत्रों दारा, शुजा, मुराद और औरंगजेब के बीच सत्ता प्राप्ति के लिये हुआ संधर्ष जग-जाहिर है। शाहजहाँ पर उसके अपने भाई खुसरो को मरवाने का आरोप है।

औरंगजेब:- मुगल वंश में सबसे अधिक समय तक शासन करने वालों में औरंगजेब का नाम आता है। औरंगजेब के बारे में यह प्रचलित है कि वह बड़ा कट्टर मुस्लिम था परंतु मुसलमानों का खून बहाने में वो भी अपने पूर्वजों का ही अनुगामी था। औरंगजेब ने सत्ता प्राप्ति के लिये अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बना लिया था तथा अपने तीन भाईयों दारा, शुजा और मुराद को मरवा दिया था। 15 अप्रैल 1658 को दारा और औरंगजेब के बीच धरमट का युद्ध हुआ था जिस युद्ध में दारा की पराजय हुई थी। 29 मई 1658 को दारा और औरंगजेब के बीच सामूगढ़ का युद्ध हुआ जिसमें फिर से दारा की हार हुई। दारा और औरंगजेब के बीच तीसरी बार जंग देवराई की धाटी में हुआ था जिसमें दारा को बंदी बना लिया गया और उसे उसके दो बेटों के साथ कत्ल कर दिया गया। अपने भाई-भतीजों के खून से भी औरंगजेब के तलवार की प्यास नहीं बुझा। उसके दक्षिण के अभियान में मुसलमानों का सबसे अधिक खून बहा। सिंहासनरुढ़ होते ही औरंगजेब ने बीजापुर के शासक आदिलशाह द्वितीय को सबक सिखाने के लिये जयपुर के राजा जयसिंह को भेजा। बीजापुर के खिलाफ उसका निरंतर अभियान आदिलशाह के अल्पव्यस्क पुत्र सिकंदर आदिलशाह के जमाने तक चलता रहा। बीजापुर के आदिलशाही शासकों का शमन करने के लिये औरंगजेब ने कई दफा सेना भेजी जो सिंकंदर आदिलशाह के कत्ल और कैद में मृत्यु के साथ खत्म हुई। बीजापुर के दमन के साथ-2 गोलकुंडा के मुसलमान शासक अबुल हसन को भी औरंगजेब के कोप का भाजन बनना पड़ा। भारत की पश्चिमी सीमा पर बसे अफगान युसूफजाई कबीले के खिलाफ भी औरंगजेब ने फौजकुशी की। सरमद हाला जैसे सूफी संत के कत्ल का पाप भी औरंगजेब के मत्थे ही है। इतना ही नहीं उसके बेटे अकबर ने ही उसके खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था और 11 जनवरी 1681 को खुद को मुगल वंश का बादशाह धोषित कर दिया था परंतु राजपूतों से अपेक्षित मदद न मिलने के कारण अकबर का विद्राह असफल हो गया और वो शिवाजी के पुत्र शंभाजी की शरण में चला गया ! इतिहासकार बड़े गर्व से औरंगजेब के बारे में ये लिखते नहीं अधाते कि वह कुरआन और शरीयत के आधार पर अपनी शासन व्यवस्था संचालित करता था पर ऐसा लिखते हुये वो भूल जातें हैं कि कुरआन और हदीस की अवज्ञा कर मुसलमानों के खून से अपना दामन गीला करने वाला औरंगजेब ही था।

उपरोक्त उदाहरणों से ये स्पष्ट है कि भारत पर आक्रमण और शासन करने वाले तमाम मुस्लिम बादशाहों के हाथ मुसलमानो के खून से रंगे हैं अगर वो कुरआन और सुन्नत पर अमल करने वाले होते तो कभी भी किसी कलमा पढ़ने वालों को दुनियवी मकसद से कत्ल नहीं करते।

क्या शराबी और समलिंगी किसी के आदर्श हो सकतें है?

राजस्थान के ऐतिहासिक काव्य वीर-विनोद में राणा साँगा और बाबर के युद्ध का विस्तृत विवरण आया है। इब्राहीम लोदी के साथ जंग में बाबर को विजय भले ही प्राप्त हुई पर इस युद्ध के बाद उसकी सेना आधी रह गई थी इसलिये वह राणा के खिलाफ जंग में अपनी विजय को लेकर शंकित था। इस अंदेशे को दूर करने के लिये वह काबुल के एक हिंदू ज्योतिष के पास पहुँचा जिसने बाबर को सलाह दी कि अगर वह शराब पीना छोड़ दे तो इस जंग में उसकी जीत होगी। बाबर ने इसके बाद शराब छोड़ दी। यहां यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि शराब पीने की अपनी बुरी लत बाबर ने कुरआन या नबी (सल्ल0) के आदेश पर नहीं छोड़ी थी वरन् जंग जीतने के लिये एक हिंदू ज्योतिष की सलाह पर छोड़ी थी।

इस पूरे प्रकरण से बाबर पर दो कुफ्र साबित होता है, एक शराब पीने का और दूसरा किसी नजूमी या गैब जानने वाले पर यकीन करने का। इसके अलावा बाबर की आत्मकथा से उसके समलिंगी होने का भी पता चलता है, बाबरी नाम के एक लड़के के ऊपर बाबर फिदा था। समलिंगियों के ऊपर पवित्र कुरआन और हदीस में लानतें भेजी गई है तो ऐसे कृत्य करने वाला बाबर क्या लानत का हकदार नहीं है? जहाँगीर भी एक शराबी के रुप मे बदनाम था। उसकी शादी आमेर के राजा भगवानदास की पुत्री मानबाई से हुआ था। मानबाई जहाँगीर की शराबखोरी की आदत से परेशान रहती थी जिससे ऊब कर उसने आत्महत्या कर ली थी। जहाँगीर अपने शासन के बाद के बर्षों में शराब पीकर सोता रहता था जबकि शासन का समस्त कार्यभार उसकी बीबी नूरजहाँ संभालती थी। इसके अलावा भी कई मुगल बादशाहों के शराबी होने और उनके द्वारा इस्लाम विरुद्ध कार्य किये जाने का विवरण मिलता है, जिसे मुस्लिम इतिहासकारों ने ही बयां किया है।

क्या इस्लामी तालीमात किसी शराबी और अय्याश को मुसलमान मानती है? क्या ऐसे लोगों को आदर्श या नायक रुप में देखा जाना जायज है? ये प्रश्न हर मुसलमान के लिये विचारणीय है।

ज्योतिषियों और नजूमियों पर यकीन करने वाला क्या मुसलमान हो सकता है?

पवित्र कुरआन के अनुसार गैब की बात जानने वाला केवल अल्लाह है, इसलिये कुरान नजूमियों और ज्योतिषियों से गैब की बातें जानने को हराम ठहराता है। नबी करीम (सल्ल0) ने भी अपनी एक हदीस में फरमाया था कि अगर कोई मुसलमान किसी नजूमी या ज्योतिष से भबिष्य जानने की इच्छा भर करे तो उसकी 40 नमाजें खराब हो जाती है। मुस्लिम बादशाहों के जीवन को अगर हम देखें तो पता चलता है कि उनमें से अधिकांश गैब की बातें जानने में न केवल दिलचस्पी रखते थे वरन् ज्योतिषियों के सलाह पर भी अमल करते थे। बाबर ने खानवा के युद्ध में अपनी हार की आशंका से शंकित होकर काबुल के एक हिंदू ज्योतिष की सलाह पर शराब पीने से तौबा कर ली थी। द्वितीय मुगल सम्राट हुमायूँ को ज्योतिष पर बड़ा विश्वास था। ज्योतिषियों की सलाह पर वह सप्ताह के सात दिन अलग-2 रंग के कपड़े पहनता था। वह हिंदू उपाय ज्योतिष के अनुसार प्रायः सोमवार को सफेद, शनिवार को काला और रविवार को पीला वस्त्र धारण करता था। कहतें हैं कि अपने बेटे अकबर का नाम भी उसने किसी हिंदू ज्योतिषी के कहने से परिवर्तित कर दिया था। मुहम्मद बिन तुगलग भी ज्योतिष में बहुत अधिक विश्वास करता था जिस कारण उसके साम्राज्य में ज्योतिषियों की बाढ़ आ गई थी।

अकबर काफिर/मुर्तद क्यों नहीं?

भारत के पंजाब प्रांत के गुरुदासपुर से प्रांरंभ अहमदिया मत के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी को मुसलमानों के तमाम दूसरे फिरके वालों ने काफिर और मुर्तद धोषित कर रखा है क्योंकि उन्होंनें खुद को एक नबी के रुप में प्रस्तुत किया और कई ऐसी बातों का प्रचार किया जिसे बाकी मुसलमान बिदअत की श्रेणी में रखतें हैं। अगर अकबर के जीवन-वृत पर नजर डाली जाये तो वह और बड़े काफिर के श्रेणी में आ जायेगा क्योंकि एक मुस्लिम होते हुये भी उसने 1582 ईसवी में दीन-ए-इलाही नाम से एक नये संप्रदाय की स्थापना की जिसमें इस्लाम के साथ-2 बाकी धर्मों के सिद्धांतों को भी अपनाया गया। दीन-ए-इलाही पर सबसे अधिक प्रभाव हिंदू धर्म का था। अकबर ने अपने मत के अनुयायियों के लिये जो नियम बनाये वो हिंदू और जैन मत से साम्यता रखता था। मसलन उसने अपने अनुयायियों को निर्देश दिया कि वो अपना श्राद्धभोज अपने जीवन काल में ही कर लें (यह हिंदुओं में प्रचलित रहे ब्रह्मकपाल श्राद्ध से साम्य था) , दीन-ए-इलाही के अनुयायियों के लिये मांस-भक्षण वर्जित था। इसके अलावा भी दीन-ए-इलाही के कई सिद्धांत इस्लाम विरुद्ध थे। पैगंबर के हिजरत काल से आरंभ हिजरी संवत् की बजाये अकबर ने इलाही संवत् चलाया तथा उसका आरंभ अपने राज्याभिषेक के दिन से रखा।

इस्लाम का अनुयायी होते हुये भी एक दीन की स्थापना कर क्या अकबर ने पवित्र कुरआन के उस आयत की अवज्ञा नहीं की जिसमें कहा गया है कि इस्लाम के साथ दीन पूर्ण हो गया? नबी के हिजरत काल से आरंभ होने वाले संवत् की बजाये अपने राज्याभिषेक काल से शरीयत आरंभ कर क्या अकबर ने इस्लाम के विरुद्ध काम नहीं किया क्या? जिन परिभाषाओं के आधार पर मुसलमान अहमदी मत के संस्थापक को काफिर मानतें हैं उससे बड़े कुफ्री अकीदे तो अकबर पर साबित होतें हैं क्योंकि मिर्ज़ा गुलाम अहमद खुद को मुसलमान तो मानतें थे पर अकबर ने एक दीन की स्थापना कर खुद को इस्लाम से काट लिया था।

इस्लामी शासन में मुसलमानों को क्या मिला?

जब गर्व करने की बारी आती है तो मुसलमान बड़े गर्व से ये बतलातें हैं कि हमने हजार बर्ष तक इस मुल्क पर हुकूमत की है पर ऐसी गर्वोक्ति करते हुये वो यह बात भूल जातें हैं कि उन मुस्लिम बादशाहों के शासनकाल में भी इनकी स्थिति बदतर ही थी क्योंकि राजदरबार और शासन कार्यों में मुस्लिम बादशाहों ने मतांतरित भारतीय मुसलमानों की बजाये अपने हमवतन तुर्क आदि तथा हिंदुओं को स्थान दे रखा था। इतना ही नहीं वो विदेशी आक्रमणकारी यहां के मतांतरित मुसलमानों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनसे धृणा करते थे। यहां तक कि अगर कभी उन्हें राजदरबार में सम्मिलत भी किया जाता तो विदेशी मुसलमान उनके शत्रु हो जाते थे और उन्हें पदच्युत करवाकर ही मानते थे। रजिया सुल्तान ने जब एक बार अपने दरबार में एक मतांतरित भारतीय मुसलमान इमामुद्दीन रेहन को स्थान दिया था तो बलबन समेत सारे तुर्क सरदार रजिया से नाराज हो गये थे। बलबन ने तो ये तक कह दिया था कि रेहन भारतीय है, वह इस भूमि में पैदा हुआ है और चूंकि उसकी धमनियों में तुर्क रक्त नहीं बहता इसलिये वह नापाक है। मजबूरन रजिया को रेहन को दरबार से हटाना पड़ा था। बाद में जब बलबन सत्तासीन हुआ तो उसने रेहन का कत्ल करवा दिया।

इल्तुतमिश की तर्ज पर मुहम्मद बिन तुगलग ने भी अमीराने-सदह की स्थापना की थी जिसमें उसने भारतीय मतांतरित मुसलमानों की बजाये मंगोल, अफगान, तुर्क और राजपूतों को स्थान दिया था। मुहम्मद बिन तुगलक का सबसे विश्वस्त सेवक रतन नाम का हिंदू था जिसका तुगलक पर सर्वाधिक प्रभाव था। तुगलग ने उसे सिंहवान का गर्वनर नियुक्त किया था। जिससे उस वक्त के कट्टरपंथी मुसलमानो को नाराज हो गये और रतन की हत्या कर दी। तुगलक ने रतन के हत्यारे और उन हत्यारों से सहानुभति रखने वालों की हत्या करवा दी थी। कृष्ण नारायण को तुगलक ने अवध की बागडोर सौंपी थी तथा भैरव नाम के हिंदू को गुलबर्ग की बागडोर सौंपी थी। मीरन राय, साई राज, धारा आदि हिंदू उसके शासनकाल में बड़े महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त थे। मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में यह मशहूर है कि वह उलेमाओं से परामर्श नहीं लेता था, यदि किसी उलेमा पर राजद्रोह या कोई अन्य आरोप लगता था तो वह उन्हें सजा भी देता था। उसके दरबार में गैर-मुस्लिम विद्वानों को भी बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त थी तथा जैन मत के दो विद्वान जिन् प्रभा सूरी तथा राजशेखर के साथ उसके बड़े अच्छे संबंध थे। सुल्तान ने जिन् प्रभा सूरी को उपहार में एक हजार गायें दी थी। उसके बारे में यह भी आता है कि वह पहला ऐसा मुस्लिम सुल्तान था जो खुलकर हिंदू त्योहारों में सम्मिलत होता था। गिरनार मंदिर में भी उसके जाने का वर्णन मिलता है। इतना ही नहीं अभिलेखों से पता चलता है कि हिंदू साधुओं के रहने के लिये उसने धर्मशाला बनबाई थी तथा गोशाला का निर्माण करवाया था। फिरोजशाह तुगलग के दरबार लगाने का तरीका बड़ा अनूठा था। उसके दरबार में 10 या 12 व्यक्तियों को ही बैठने की अनुमति थी और बाकी सब खड़े रहते थे। दरबार में बैठने वालों में उसके वंश वाले मुसलमानों के अतिरिक्त तीन हिंदू सरदार राय मदार देव, राय सुबीर और रावत अधरन भी थे। बहलोल लोदी ने भी अपने दरबार और प्रशासनिक कार्यों में हिंदुओं को ऊँचा स्थान दे रखा था जिनमें रायकरण, रामप्रताप, रामवीर सिंह, रायत्रिलोक चंद, राय धंधू जैसे लोग प्रमुख थे। शमशाबाद का गर्वनर उसने राजा करन को बनाया था। लोदी वंश के ही शासक सिकंदर लोदी ने ईसा खाँ नाम के मुस्लिम सरदार को मरवाकर उसकी जगह हिंदू राजा गणेश को पटियाली की गद्दी सौंपी थी। बहमनी राज्य के शासक हसन ने अपने दरबार में गंगू नाम के एक हिंदू ब्राह्मण को प्रमुख स्थान दिया था। अकबर के नवरत्नों में पाँच हिंदू (राजा टोडरमल, तानसेन, बीरबल, मानसिंह और भगवानदास) थे, बाकी चार में एक अरब था और बाकी उसके ही वंश और नस्ल के थे।

उपरोक्त तमाम उदाहरण से स्पष्ट कर देतें हैं कि यहां के लोगों को इन सुल्तानों ने इस्लाम में दीक्षित सिर्फ अपने हितों के लिये किया। राज-काज और तमाम प्रशासनिक कार्यों में उन्होंने हिंदुओ और अपने वंशजो को स्थान दिया हुआ था। यहां के मतांतरित मुसलमानो की उनके राज-काज में कोई सहभागिता नहीं थी वरन् वो तो इन्हे तुर्क और मंगोल खून का न होने के कारण हेय दृष्टि से देखते थे। इन मुस्लिम सुल्तानों ने भारतीय मुसलमानों को दिया तो कुछ नहीं पर श्रीराम और श्रीकृष्ण जन्मस्थान आदि पर मस्जिदें बनबाकर हिदुओं के साथ उनका स्थायी वैमनस्य जरुर पैदा कर दिया।

मुसलमानों लिये यह जरुर अध्ययन का बिषय होना चाहिये कि जिन मुस्लिम बादशाहो को वो नायक रुप में देखतें हैं वो इस्लाम का कितना प्रतिनिधित्व करते थे और उनके कृत्य कितने इस्लाम सम्मत थे? गौरी, गजनवी, बाबर आदि हमलावरों को अपने नायक रुप में देखने वाले और उसे अपना आदर्श मानने वालों को इस प्रश्न का विचार भी करना चाहिये कि इस्लाम की किस परिभाषा के इन हमलावरों को मुस्लिम माना जाये? क्या उसका कोई कर्म भी अनुकरणीय है? उन्होनें अपने 1000 साल के शासनावधि में यहां के मुसलमानों की बेहतरी के लिये क्या किया? अपने बेगमों और प्रेमिकाओं के कब्रिस्तान पर भव्य मकबरे बनवाने वाले इन मुस्लिम सुल्तानों ने क्या कभी मुस्लिमों के बेहतर तालीम के लिये कोई उम्दा स्कूल या कॉलेज बनबाये? ये लोग बस बर्बर आक्रमणकारी थे जिनका एकमात्र उद्देश्य अपने वंशजों के भबिष्य को बेहतर बनाना और अपना स्वार्थ साधना था। महमूद गजनवी की मंशा अपनी राजधानी गजनी को दुनिया के बाकी बड़े शहरों के मुकाबले खड़ा करना था इसलिये यहां से कई मजदूरों को वह गजनी ले गया था। अगर ये इस्लाम के प्रचारक होते तो मुसलमानों के खून न बहाते और न ही अपने कृत्यों से इस्लाम के दामन को कलंकित करते। कहतें हैं कि जहाँगीर के दरबार में जब सर टामस रो आये तो वो बादशाह के लिये कुछ उपहार भी लेकर आये थे जिसमें एक बड़ी खुबसूरत बग्धी, कुछ जेवरात और दुनिया का एक नक्शा था। जहाँगीर ने उसमें से बग्धी और आभूषण रख लिये और दुनिया के नक्शे को फेंक दिया। सर टामस रो उसी वक्त समझ गये कि ये बहुत बड़ा मूर्ख है। इस कारण इसके साम्राज्य को बड़ी आसानी से हड़पा जा सकता है। ये इन बादशाहों की इल्म के प्रति जहालत को दिखाता है। जब इनका हाल ऐसा था तो फिर अपने प्रजा के तालीम के लिये ये कितने चिंतित रखते होंगें ये समझा जा सकता है। मुसलमान जिस काल को मुस्लिमो के लिये स्वर्णयुग मानतें हैं दरअसल वह उनके लिये अंधकार युग था जिसने उन्हें अशिक्षित, रुढि़वादी, बेरोजगार, दकियानूस, जड़वादी और कट्टरपंथी बनाकर रखा।

हिंदू धर्म में जन्म लेने वालों में रावण भी था जो चारों वेदों का ज्ञाता और प्रचंड विद्वान था। भगवान शिव की स्तुति मे उसके द्वारा रचित श्लोकों का पाठ आज भी हिंदू करतें हैं पर उसे किसी भी रुप में अनुकरणीय नहीं समझते। यहां तक कि हिंदुओं में कोई अपने बच्चे का नाम भी रावण के नाम पर रखना पसंद नहीं करता। ये उदाहरण मुसलमानों के लिये ध्यान देने योग्य है। हमारी पहचान हमारे महान पूर्वजों से हैं, इस बात को इंडोनेशियाई मुसलमान समझतें हैं, जागृति की ऐसी ही लहर मिश्र, तुर्की, ईरान आदि मुस्लिम मुल्कों में भी आई है जो उन्हें आक्रांता और पूर्वज के बीच फर्क करना सिखलाता है। यह भाव भारतीय मुसलमानों के मानस में भी जागृत हो तो यह न केवल खुद उनके बल्कि सारे मुल्क के हित में होगा, श्रीरामजन्मभूमि, काशी, मथुरा और विश्वनाथ मंदिर विवादों का समाधान भी इस मानसिकता परिवर्तनों में है।

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15 thoughts on “विदेशी आक्रमणकारी और भारतीय मुसलमान

  • July 9, 2015 at 1:43 am
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    लेखक की बात से पूरी सहमत हु . मुस्लिम समुदाय मे क़ासिम, गौरी , ग़ज़नवी आदि जैसे लुटेरे को इस्लाम का हीरो समझते है क्यो के उन्हे कुछ मुस्लिम गुरु यही पड़ते है . जब के हक़ीक़त ए है के इन ओगो ने भारत पे आक्रमण सिर्फ धन और अपनी राज्य का विस्तार था जिस का इस्लाम से कोई वास्ता नही था. मगर इधर हालात बदले है और लोग ज्यादा टर अब उन्हे एक आकारमन्कारी की तरह देखते है.

    एक बहुत ही अच्छा लेख और विस्तार से लिखा गया है इस के लिये अभिजित साहब मुआरकबाद के हक़दार है .

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  • July 9, 2015 at 12:42 pm
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    बाबर मुस्लिम इब्राहीम लोदी मुस्लिम दोनों में युद्ध हुआ इनमें से देशभक्त कौन है?
    अकबर का सेनापति मानसिंह और महाराणा प्रताप का सूरखान दोनों में युद्ध हुआ बताओ देशभक्त कौन है?
    शिवाजी का सेनापति मुस्लिम औरंगजेब का हिन्दू दोनों में युद्ध हुआ बताओ देशभक्त कौन?
    आर्य तथाकथित ब्राह्मण भी बाहर से आये तो उनके राजाओं को देशभक्त क्यों माना जाये?
    जब छोटे-छोटे राज्य थे देश की सीमा का निर्धारण नही था तो केवल इस आधार पर किसी को देशभक्त या नायक मान लिया जाये क्योंकि वो हिन्दू धर्म(ब्राह्मणवाद) को मानते थे?

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    • June 20, 2016 at 7:01 pm
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      इन सवालों का उत्तर ना देना ही देशभक्ति है ?

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  • July 9, 2015 at 12:43 pm
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    Videsi akramankaari Hindu up mahadeep me 712 me aay Jo mummhamd bin kaasim ne raja dahir ki hattya kar ke unki do beti ka rape kiiya aur jihaad kiya is se kai logo ko jihaad ke naam pe convent kiya gaya . Lekin Indian mahadeep me jitne bhi Muslim hai wo videsi nasal ke nahi kyunki unke buzrug Jo ki Hindu the wo convent huye the rahi baat aaj muslmnaao ki Jo India paksitan Bangladesh ke hai wo arbo ko apna Adarsh maante hai aur unke khuda aur rasool ko maante hai jab ki realty ye hai Islam sirf ek hukumat karne ke liye banaya gaya . Kyunki Islam me shanti aman ki baat insan zarur kar leta hai magar result dusra hai iska jaise ki Iraq Somalia ngria yaman paksitan . Ke katle aam ko dekh kar iska andaza lagaya jaa sakta hai ki Islam mehaz ek zabarzasti hai aur kuch nahi .

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  • July 9, 2015 at 1:02 pm
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    indian musalmano ki halat us sharabi ki tarah jo pure gav ka mar khakar ghar aata hai aur ghar me aate hi apane biwi ko pitana chalu kar deta hai usi tarah ye musalman na arabo turko irani afgani kisi se lade nahi par azadi milate hi apane mulk ke sath ladai chalu kar di ladai karake pahale pakistan banaya phir usi tarike se bangaladesh bana aaj kashmir balochistan sindh kpk na jane kya kya azad karana chahate hai isake bad kya har gali mohhala azad kar denge musalman muslim jab minority me rahate hai tab une securarism se pyar hota hai aur jaise hi majority me hote hai une shariyat law chahiye hota hai india me rahanewale musalmano ko secular india chahiye up mp bihar maharashra aandra jaise hisso me rahane wale musalmano ko secular india chahiye aur kashmir me shariyat law

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  • July 9, 2015 at 1:02 pm
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    muslim apane mulk me alien ki tarah behave karate hai pak bangali aur indian 98% muslim hindu converted hai bhi apane aap ko arabo turko irani mughalo afgani se jodakar dekhate hai aur arabi hai ki inako apana gulam samajate har sal 5lakh se jyada ladakiya mehar ke nam par in musalmano ko bechi jati hai arab se koi shekh ya sultan aata hai mehar ke nam kisi muslim ladaki se shadi karata hai aur ek bacha pet me dalakar kuch rupaye hath par thama kar chala jata hai aur phone par talak talak talak kah kar shutakara pa leta hai kya koi indian muslim kisi arabi ladaki se shadi kar sakata hai nahi qki ek malik apane gulam se kaise shadi kare yahi nahi to sari duniya ki insaniyat musalman arabo me dekhate hai aur arabi hai ki ine insan hi nahi samajate musalmano ka aisahi hai jo une dando se pitata hai use apana khalifa ya sulatan man lete hai aur jo unase insaniyat ka rawaiya rakhata hai use barbad karane ka koi mauka nahi eg china ban ramdan celabrate beer festival in muslim dominated area force to iman dance aur pakistan china switer than honey higher than mountain friends hai aur india jo haj ke liye subsidy deta hai usake khilaf jihad

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  • July 9, 2015 at 1:23 pm
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    देशी-विदेशी की व्याख्या थोड़ा जटिल मसला है. भारत ब्रिटिश दौर से पहले कभी भी राजनैतिक रूप से एकीकृत नही था. इसलिए उस दौर से पहले के तमाम राज्य, एक दूसरे के लिए विदेश ही थे. मुगलो से पहले भी जो युद्ध हुए, वो एक दूसरे के लिए विदेश हो सकते हैं. इतिहास को कभी भी भावुकता या अपनी पहचान से जोड़ कर देखने की कोशिश नही करनी चाहिए. दुनिया या इतिहास को सिर्फ़ सही या ग़लत के रूप मे नही देखा जा सकता. पाकिस्तान ने यह ग़लती करी, इसका अर्थ यह नही की हम भी वोही कहे. गौरी या पृथ्वीराज को हिंदू-मुस्लिम पहचान नही देनी चाहिए. ये हर दौर के लिए सही है. राजतंत्र मे शासक, जनता के प्रतिनिधि नही माने जा सकते. इसलिए इसे बहुत संतुलित तरीके से ही पढ़ा और पढ़ाया जाना चाहिए. ये वीडियो भी देखें.

    https://www.youtube.com/watch?v=XIfH37j_ZTY

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  • July 9, 2015 at 1:30 pm
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    Kabhi mohabbat ki bhi batain karliya karo mere bhaiyon

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  • July 9, 2015 at 1:39 pm
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    देखिए, कई लोग आर्यो को भी विदेशी मानते थे. इनमे, इस देश के संविधान निर्माता, अंबेडकर और रामधारी सिंह दिनकर भी है, और कई लोग आर्य-रक्त की भी बात करते हैं. मुझे किसी ने बताया कि आर एस एस की दैनिक प्रार्थना मे भी आर्यो की श्रेष्ठता की बात है. मुझे यही लगता है कि इतिहास के चरित्रो को हमे अपनी पहचान से जोड़ कर मिथक नही गड्ने चाहिए. उदाहरण के तौर पे जयचंद को लोग गद्दार बोल कर राजनीति विज्ञान की गहराई को नही छूते. पृथ्वीराज ने जयचंद की बेटी को अगवा कर लिया, तो ऐसी सूरत मे जयचंद, का पृथ्वीराज से हाथ मिलाना, गद्दारी हो गया, जबकि पृथ्वीराज का पड़ौसी राजपूतो की लड़कियाँ उठाना, रोमांटिक व्यक्तित्व हो गया. उसके इस व्यवहार को अय्यशी और इस हिरोइज्म को दुस्साहस भी तो इतिहासकार देख सकते हैं, जिसने उस विशाल साम्राज्य को धराशायी कर दिया. जब राष्ट्रवादी लोग, ये कहते हैं कि अगर जयचंद ना होता…….तो ऐसा होता. वो ये भी तो निष्कर्ष निकाल सकते हैं, अगर पृथ्वीराज ने जयचंद को नीचा दिखाने के लिए उसकी बेटी का अपहरण नही किया होता, तो गोरेी कामयाब नहेी हो पाता.

    फिर यह भी तो है कि जो जातियाँ, हिंदू शासन मे अछूत थी, उनके लिए क्या फ़र्क पड़ता है कि राजा विदेशी है या देशी. अकबर और अशोक को भी महान कहने की बजाय, संतुलित रूप से देखा जाना चाहिए.

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  • July 14, 2015 at 3:23 pm
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    भारत मे बहुत से मुसलमान हिंदुओं को नीच और खुद को मुस्लिम शासकों की संतान समझते हैं। जबकि सच ये है कि अधिंकाश भारतिय मुसलमान धर्मांतरित हिंदुओं की संतान है। विदेशी मुसलमान तो भारतिय मुसलमानो को नीच समझते थे ।भारतिय मुसलमानो को वो शायद ही कभी कोई बड़ा पद देते थे । भारतिय मुसलमानो के बजाय उन लोगों ने राजपुतों को बड़ा पद दिया था । अगर उन्हें बड़ा पद दिया होता और उनके विकाश पर ध्यान दिया होता तो ये आज इतने पिछड़े नहीं होते ।

    भारतिय मुसलमानो मुसलमानो मे बड़ी संख्या उनकी है जिनके पुर्वजों युद्ध के जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया। बहुत से लोग ऐसे भी है जिनके पुर्वजों को लालच देकर मुसलमान बनाया । औरंगजेब मुसलमान बनने वाले हिंदु मर्दो को दो रूपया और औरतो को एक रूपया देने का फरमान दिया था। बहुतो को कपटी पीरों ने बहकाकर मुसलमान बनाया और बहुतो ने जजीया कर से बचने के लिए भी धर्म बदला ।

    इस्लामि जिहादी सेना ने आज के हिंदु और मुसलमान दोनो के पुर्वजो को आतंकित किया था । आम लोगो को भी नहीं छोड़ा गया । हजारो निर्दोष लोग मारे गए। मंदिरों को तोड़ा गया और धर्म बदलने के मजबूर किया गया । ये दुख की बात है कि मुसलमान आज अपने ही हिन्दु भाईयों के दुश्मन बन गए हैं और अपने पुर्वडों का खुन बहाने वाले अरबों, तुर्कों और मुगलो के गुनगान करते हैं।

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  • July 15, 2015 at 1:22 pm
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    धर्मवीर जी, इस देश ही क्या, पूरे विश्व के मुसलमानो के पूर्वज, किसी समय गैर मुस्लिम थे, इस बात से तो कोई मुस्लिम इनकार नही करेगा. खुद मुहम्मद साहब भी गैर मुस्लिम, बहुशवरवादी परिवार मे जन्मे. अब वो गैर मुस्लिम, हिंदू हो या कोई ओर कोई मायने नही रखता. वंशावली के पीछे तक जाओगे तो जो भी सिद्धांत पृथ्वी पे मानव जीवन की उत्पत्ति से जोड़ोगे, तो सबके पूर्वज एक ही होंगे, और वो हिंदू नही होंगे. इसलिए इन बातो का कोई मतलब नही.

    अगर, इस्लाम के आगमन से पूर्व, भारतीय समाज की हम बात करे तो, कौन से हिंदू हमारे पूर्वज थे. राज गद्दी पे बैठे, या उनके गुलाम? इतिहास को भावुकता, या तेरा-मेरा से उपर उठ के देखो.

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  • July 15, 2015 at 3:24 pm
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    जाकिर भाई, हम मे से ज्यादातर के पुर्वज सामान्य लोग ही थे । लेकिन मुहम्मद बिन कासिम, महमुद गजनी या गोरी ने उन्हे क्या दिया ? उन्हे राजगद्दी पर बिठाया या गुलाम बनाया ? उनके आने से पहले भी युद्ध होते थे लेकिन आम लोगो को नही मारा जाता था। उनलोगो ने गाँव के गाँव जलवा दिए। बार -बार कत्लेआम, लूट पाट और बलात्कार होता रहा । उस वक्त भारतिय मसलमानो के पुर्वज भी हिंदु ही थे। क्या ऐसे आक्रमणकारियो का गुनगान होना चाहिए ?

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  • July 16, 2015 at 9:17 am
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    यहाँ कोई क़ासिम, गौरी या गज़नवी को महान नही बता रहा. लेकिन यह कहना कि उससे पहले सब सही था, सही नही है. बात पुर्वजो की निकली थी, उसका मैने जवाब दिया. इतिहास मे से हीरो-विलेन ढूँढने वाली मानसिकता मुझे पसंद नही. हमारा मानना है क़ि इतिहास मे लोगो की पहचान के लेबल लगा के पढ़ना या पढ़ाना सही नही.
    अनेको इतिहासकरो, जिनमे भारतीय भी है का मानना है क़ि आर्य विदेश से आए थे. इसकी सत्यता या असत्यता अलग बहस का विषय हो सकती है, लेकिन इसे हम अपने या उनके मे विभाजित करके तो नही ही देख सकते, ना ही देखना चाहिए.

    कुछ लोग अगर पृथ्वीराज को इसलिए महान मान ले कि उसने अपना राज्य बचाने के लिए, किसी मुस्लिम योद्धा से लड़ाई लड़ी, तो इस दृष्टिकोण से मैं इत्तेफ़ाक नही रखूँगा. और फिर महिमामंडन मे हम इस हद तक चले जाएँ की किसी भी काल मे व्याप्त सामाजिक असमानता या बुराइयो से ही इनकार कर दे तो सही नही. जैसा आपने कहा उससे पहले क़त्ले आम, लूटपाट, बलात्कार नही था. ये सरासर ग़लत है.
    राजतंत्र, हर दौर मे शोषण का माध्यम रहा है. सिर्फ़ हरम मे ही नही, रनिवसो मे भी औरतो को भोग की वस्तुओं के लिए रखा जाता था. गुलाम, की स्थिति हर सामंत वादी व्यवस्था मे बुरी ही थी. हमारे पूर्वाजो के सामान्य होने मे भी कई पेच है. सामान्य आप किसे कहोगे. राजतंत्र मे राजा के अलावा, बाकि प्रजा की स्थिति एक जैसी नही थी.

    मेरा ज़ोर, इसी बात पे है कि इतिहास को भावुकता के साथ नही देखा जाना चाहिए. बस.

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    • July 16, 2015 at 10:08 am
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      जाकिर भाई पूछिये मत की ये हिन्दू मुसलिम कठमुल्ला दिमाग और सुप्रियॉरिटीवादी इन अपनी अपनी अपनी रियासत और राज़ के लिए लड़ मर रहे इन सनकी झक्की अफीमची खफ्ती चरित्रहीन अधिकांश ”बायोलेंगिक ” राजाओ बादशाओ सुल्तानों नरेशों नवाबो को कैसे कैसे पेश करते हे ? मानो पता नहीं कितने वीर और उच्च कोटि के थे

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  • July 17, 2015 at 9:34 am
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    मैं ये मानता हुँ कि इतिहास की तरफ किसी पुर्वाग्रह( prejudice) के साथ देखना ठीक नहीं है । मैं ये नहीं कहता कि इन आक्रमणकारीयों के आने से पुर्व समाजिक असमानता नही थी या शोषन नहीं नहीं था । लेकिन युद्ध के बाद कत्लेआम, लूट और हजारों महीलाओं के बलात्कार की घटना शायद ही कभी हुई हो । आमलोगों की लाशों का ढेर लगाकर कभी किसी ने गाजी की उपाधी भी नहीं ली थी। शायद ही कभी औरतों को सामुहीक रूप से आग मे कुदकर अपनी लाज बचानी पड़ी हो । ये स्थिति अत्यंत भयावह थी ।

    कंस जैसे अन्याई राजा भी इस देश मे हुए थे। आज कोई उनका गुनगान नहीं करता । पृथ्वीराज या जयपाल जैसे राजा महान हों या ना हों वो मुहम्मद गोरी और महमुद गजनी की तरह अन्याई और वहशी नहीं थे । इनलोगों का अपमान और गोरी और महमुद गजनी का गुनगान करना उचित नहीं है । लेकिन कुछलोग यही कर रहे हैं । वे अपने आप को गोरी जैसों से जोड़ रहे हैं और अपने ही देश के दुसरे लोगों, जो उनके “हमवतन” और “हमखुन” हैं, उनको 800 साल तक गुलाम बनाए रखने की बात करते हैं । मैं इसी मानसिकता की आलोचना कर रहा था ।

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