विज्ञान भी हिंदू और मुसलमान हो गया !

vigyan
मूल-लेखक — वसतुल्लाह खान

अनुवाद- अफज़ल खान

कोई भी अक़ीदा ( विश्वास ) हो उसका अपना दिव्य व भौतिक प्रणाली तथ्यों और तर्क होता है और यह प्रणाली बिना शर्त स्वीकृति की मांग करता है। जबकि विज्ञान का ज्ञान विशुद्ध भौतिक आधार पर तथ्यों की तलाश का नाम है। इसलिए अपनी जगह पर कायम मान्यताओं के विपरीत विज्ञान हमेशा अस्वीकार व स्वीकार के कसौटी पर चढ़ी रहती है।

अक़ीदा ( विश्वास ) में सवाल की गुंजाइश बहुत कम होती है जबकि विज्ञान की तो आहार ही हर ऑन सवाल उठाया है। इसलिए जब कोई दैवी विश्वास भौतिक विज्ञान भ्रमित करने की कोशिश करता है तो उसके परिणाम में जन्म लेने वाले कंफ्यूजन का अंतिम नुकसान अंततः विश्वास और विज्ञान को ही उठाना पड़ता है। इस संदर्भ में मुझ जैसे नासमझों के लिए यह समझना खासा मुश्किल है कि इंसान तो हिंदू, यहूदी, ईसाई और मुसलमान हो सकता है। विज्ञान हिंदू, यहूदी, ईसाई और मुसलमान कैसे हो सकती है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वैज्ञानिक के लिए ला धर्म होना चाहिए।

जाबिर बिन हयान, उमर खयाम, इब्न-हैशम , अलबेरूनी इदरिस, तूसी और इब्ने सीना आधुनिक विज्ञान के महान स्तंभ थे और प्रार्थना उपवास और अन्य अधिनियमों का भी आयोजन करते थे। आरिया भट्ट, लगाधा, भास्कर, बधीाना, आचार्य चन्दाज्यरा आदि प्राचीन भारत में ज्ञान खगोल विज्ञान, गणित, भाषा विज्ञान, चिकित्सा और धातु निर्माण अनुसंधान में झंडे भी गाड़ रहे थे और मंदिर में देवताओं के चरण भी छूते थे। न्यूटन गुरुत्वाकर्षण पर भी काम कर रहा था लेकिन चर्च जाना नहीं भूलता था। आयन ासटाईन कभी नहीं कहा कि उसका विचार ाज़ाफ़्त टोरा की महानता का सबूत है। इन सब महान वैज्ञानिकों ने विश्वास और प्रयोगशाला दिल में साथ साथ और मन में अलग अलग रखा।

मगर जो काम कल तक नहीं हुआ वह आज हो रहा है। जो भारत मंगल पर अंतरिक्ष यान भेज रहा है उसी भारत का प्रधानमंत्री यह भी कह रहा है कि गणेश जी के शरीर पर हाथी का सिर साबित करता है कि यह काम हजारों साल पहले किसी प्लास्टिक सर्जन ने किया होगा। गुजरात में विशेषज्ञ शिक्षा जगदीश बत्रा जी की जो किताबें स्कूलों में पढ़ाई जा रही हैं उनमें बताया जा रहा है कि महाभारत के युग में मोटर कार कैसे आविष्कार हुआ?

पिछले हफ्ते ही मुंबई विश्वविद्यालय में पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन में भारत और बाहरी दुनिया के लगभग बारह हजार शोधकर्ता और वैज्ञानिक शरीक हुए। उद्घाटन सत्र में केंद्रीय मंत्री विज्ञान और प्रौद्योगिकी हर्ष वर्धन ने प्रतिभागियों को अपने ज्ञान से सम्मानित करते हुए कहा कि बीजगणित के प्रारंभिक सिद्धांत भारत वर्ष में संकलित हुए लेकिन अरबों जब बीजगणित पर दावा बोला तो हम चुप बैठे रहे। गणित फ़ेता गोरत थीवरीम हजारों साल से भारत में उपयोग हो रहा है मगर उसे यूनानियों ने जाने क्यों अपने नाम से प्रसिद्ध कर दिया।

इसी सम्मेलन में एक सत्र प्राचीन संस्कृति सिद्धांतों के शीर्षक से आयोजित हुआ। प्राचीन भारत में उड्डयन के बारे में पायलट प्रशिक्षण स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल कैप्टन आनंद बोडरस अपने मकाले में बताया कि महा ऋषि भारद्वाज ने सात हजार साल पहले लिखा है कि भारत में साठ फुट से दो सौ फुट तक चौड़े विमान उड़ते थे। बड़े जहाजों में चालीस छोटे इंजन स्थापित थे। यह विमान दूसरे देशों तक भी उड़ान भरते थे और रडार के लिए प्राचीन संस्कृत में रोपर किन रहस्य का शबध तक मौजूद है।

एक ऐसा देश जहां अमेरिका के बाद सबसे अधिक वैज्ञानिक बताए जाते हैं। जहां वैज्ञानिकों की एसोसिएशन एक सौ दो साल से स्थापित है और लगभग तीस हजार वैज्ञानिक विशेषज्ञ इसके सदस्य हैं और जहां उन्नीस सौ बारह से वार्षिक राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन आयोजित हो रही है। यह बात अब से पहले क्यों किसी भारतीय विज्ञान मंच पर धड़ल्ले से नहीं हुई कि सात हजार साल पहले भारत में प्लास्टिक सर्जन भी थे, मोटर कार भी थी, जहाज भी उड़ रहे थे। यह सब नरेंद्र मोदी सरकार में ही क्यों सामने आ रहा है?

चूंकि मोदी की मूल संगठन आरएसएस और आरएसएस के तुफैल संगठन हर वस्तुहिंदुत्व के आईने में देखने की आदी है, इसलिए वह हर क्षेत्र को अपने नजरिए से जोड़कर दिखाने के जुनून से ग्रस्त हैं। जहां तर्कसंगत चर्चा इस स्तर पर आ जाए कि भाजपा के एक सांसद योगी आदित्य नाथ खुलासा करें कि इस दुनिया में पैदा होने वाला हर बच्चा हिंदू होता है बाद में उसका धर्म जबरदस्ती बदलो दिया जाता है और इसके जवाब में मजलिस एकता ब्रदरहुड के सांसद असद उद्दीन ओवैसी यह दावा करें कि दरअसल हर बच्चा मुसलमान पैदा होता है।

एक और सांसद यह खुलासा करें कि रावण दरअसल दिल्ली के नजदीक गाजियाबाद में पैदा हुआ और एक साहब उठकर कहीं कि ताजमहल एक मंदिर की नींव पर खड़ा है और इंडियन हिस्ट्री आयोग के वर्तमान अध्यक्ष यह रखें कि जो भी वेदों में है वह कोई प्रतीकात्मक किस्से नहीं बल्कि जैसा लिखा है वैसा ही वास्तव में हुआ भी है। इसलिए रामायण के होते हमें किसी और खोज और अनुसंधान में पड़ने की जरूरत नहीं। ऐसे माहौल में अगर सात हजार साल पहले जहाज उड़ाया जा रहा है तो आश्चर्य क्यों?

भारत पर तो यह समय आज पड़ा है। पाकिस्तान तो इस चरण से छत्तीस चौनतीस वर्ष पहले ही पारित कर दिया। पाकिस्तान में विज्ञान सम्मेलन वर्ष 1948 से हो रही हैं। लेकिन जिस तरह अनुसंधान ज़िया दौर में हुई न पहले हुई न बाद में। इस दौर अनुसंधान विशेषज्ञ भौतिकी प्रोीज़होद भाई सहित कई साथी विज्ञान समेटने की कोशिश की।

मसलन पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमीशन के वरिष्ठ साइनटसट डॉक्टर बशीर उद्दीन महमूद 1980 में यह सिद्धांत पेश किया कि चूंकि से जिन्नात ( दानव ) आग से बने हैं इसलिए उन्हें काबू में लाकर उन्हें ऊर्जा पैदा की जा सकती है।

जनरल ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी इन दी इस्लामिक विश्व में डॉक्टर सफदरजंग राजपूत ने अपने शोध मकाले में बताया किजिन्नात ( दानव ) दरअसल मीथेन गैस से बनते हैं। मीथेन न केवल बे स्वाद व बे गंध है बल्कि उसके जलने की प्रक्रिया में धूम्रपान नहीं उठता। यही कारण है कि दानव अस्तित्व रखते हुए भी आम लोगों को दिखाई नहीं देते। उन्होंने यह भी बताया कि दानव सफेद होते हैं (हालांकि दिखाई नहीं देते)।

पाकिस्तान एसोसिएशन ऑफ साइंस एण्ड वैज्ञानिक पेशेवरों जून 1986 में कुरान और विज्ञान के विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार करवाया इसमें पाकिस्तान काउंसिल फॉर वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान (पीसी आईआर) के एक प्रमुख विशेषज्ञ डॉक्टर अरशद अली बेग ने अपने शोध मकाले समाज में पाखंड की मात्रा नापने का फार्मूला पेश किया। आपने बताया कि उनके निर्मित स्केल पश्चिमी समाजों में पाखंड बाईस के पैमाने पर है और अगर व्यक्तिगत अध्ययन किया जाए तो स्पेन और पुर्तगाल आदि में सामाजिक पाखंड चौदह स्केल पर है। डॉक्टर साहब शायद समय की कमी के कारण पाकिस्तानी समाज का पाखंड स्केल न बता पाए।

अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान सपारको के अध्यक्ष डॉ। सलीम महमूद के मकाले का विषय था.आइंस्टीन का नजरिया इज़ाफ़त और वाक़िया मेराज

अक्टूबर 1987 में जो इस्लामिक विज्ञान सम्मेलन आयोजित इसमें सत्तर के लगभग मकाले पढ़े गए। 70 लाख रुपये काखर्च सरकार सऊदी अरब ने वहन किया। इस सम्मेलन में जर्मनी से आये एक विशेषज्ञ गणित ने फरिश्तो ( स्वर्गदूतों ) सूक्ष्म संख्या मालूम करने का फार्मूला पेश किया। जबकि कायदे आजम विश्वविद्यालय विभाग भौतिकी के पूर्व अध्यक्ष डॉ। एमएम कुरैशी ने वह तरीका बताया जिसके द्वारा एक प्रार्थना इनाम कैसे कीलकोलियट किया जा सकता है।

ज़िया दौर में ही चिकित्सा यूनानी चिकित्सा इस्लामी हुई और अब यही चिकित्सा इस्लामी है।

पाकिस्तान में तो विज्ञान को भी इस्लामिक विज्ञानं बहुत पहले बना दिया था , मगर पडोसी देश भारत में विज्ञानं के हर क्षेत्र में काम हो रहा था और तरक्की भी कर रहा था मगर मोदी सरकार आने के बाद उन का भी विज्ञानं भगवा रंग में रंग गया . मोदी सरकार की वैज्ञानिक सोच कुछ ही महीनों में इतना आगे बढ़ा दिया कि कौन जाने मोदी सरकार के पांच साल पूरे होने तक वेद और रामायण के बारे में पता चला कि यह तो वास्तव में दुनिया के सर्वोच्च विज्ञान जरनलज़ हैं ।

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56 thoughts on “विज्ञान भी हिंदू और मुसलमान हो गया !

  • January 13, 2015 at 12:37 pm
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    बहुत ही अच्छ लेख , वसतुल्लाह खान को में नहीं जानता मगर अफज़ल खान ने उस का अच्छा तर्जुमा किया है . हिन्दू और मुस्लमान दोनों ही अपने ग्रन्थ का हवाला देते है के आज उरोप और अमरीका जो भी विज्ञान की तरक्की है वो हमारे धर्म पुस्तक से चुराए है . सवाल है के आखिर इन दोनों को कौन समझाए के ये कितनी मुर्क्त वाली बात है .अब तो लगता है के मोदी के दौर में विज्ञान रस्ताल तक पहुँच जाए गए .

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    • January 13, 2015 at 1:31 pm
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      में आपसे सहमत हु ये बहुत अच्छा हे की अफज़ल भाई उर्दू का बेहतरीन लेखन नागरी पाठको तक पहुँचाय वास्तव में मेने दस साल इस विषय का अध्ययन किया तो पाया की उपमहादीप के हिन्दू मुस्लिम कठमुल्लाओं की बातो में हैरान कर देने वाली समानताए मिलती हे

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  • January 13, 2015 at 5:02 pm
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    यहाँ समस्या यही हे रमेश और अफज़ल भाई की हिन्दू मुस्लिम कठमुल्लाओं के बीच दिल्ली पर पूर्ण कब्ज़े की जंग हे जहा इनका पूर्ण कब्ज़ा होगा और अगला इनका गुलाम होगा दूसरा की दोनों ही दिल्ली को भारत को अपनी पुश्तैनी जायदाद समझते हे विज्ञान में भी यही हे की पूर्ण कब्ज़े की खफ्त में दोनों ही दावा करते रहते हे की साड़ी खोजे तो उनका ही पूर्वजो ने हज़ारो साल पहले कर ली थी मुस्लिम कठमुल्ला इसके लिए बग़दाद और स्पेन की सेर करते हे और बताते हे की सारी खोजे तो वही कर ली गयी थी जैसे हिन्दू कठमुल्ला मुस्लिम आक्रमणों को दोष देते हे वैसे ही ये हलाकू और स्पेन में हार के बाद सब कुछ लूट लिए जाने का दवा करते हे दोनों ही दावा करते हे की के जी गंगा जमुनी सभ्यता कुछ नहीं हे हमारी ही सभ्यता महान थी अगले ने केवल मिलावट की और कुछ नहीं देखे https://www.youtube.com/watch?v=1y8kV1YbvX8 14 : 07 से तो करना हमें यही हे की ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को इस दिल्ली पर पूर्ण कब्ज़ा की सनक से बाहर निकालना हे

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    • January 13, 2015 at 5:24 pm
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      अब देखिये अफज़ल भाई की वीडियो में एजुकेटिड कठमुल्ला ओरिया मक़बूल ( पाकिस्तानी आई ए एस ) कहता हे भारत में कुछ था नहीं सब कुछ मुस्लिम लाये और गंगा जमुनी तहज़ीब कुछ नहीं हे अब इस मेन्टल की पोल देखिये की वही खुल रही हे की इसकी बकवास बात पर तालिया बजाने वाला एंकर खुद कॉमेडी नाइट्स कपिल में आता हे अगर गंगा जमुनी तहज़ीब कुछ हे ही नहीं हे तो फिर क्यों यहाँ क्यों काम करने पैसा नाम दाम कमाने आते हो अरब ईरान तुर्की मिस्र इंडोनेशिया कज़ाकिस्तान क्यों नहीं जाते काम करने ? मुंबई हमला ना हुआ होता तो आधे पाकिस्तानी कलाकार शायद भारत आ चुके होते ?

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  • January 13, 2015 at 7:41 pm
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    इस में कोई शक नहीं है के आज उरोप और अमरीका ने जो भी विज्ञानं में प्रगति की है उस का सेखरा क़ुरान को जाता है , मुझे हिन्दू धार्मिक पुस्तक के बारे में पता नहीं है . आज भले ही लोग इंकार करे सच्चाई यही है .

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    • January 13, 2015 at 9:27 pm
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      जय हो ः) अब आपके ग्यान के आगे नमस्कार करके निकल जाने के अलावा और कोई रास्ता हमारे पास नही है 🙂 आज के दौर के कुछ कुछ दो चार नामचीन वैग्यानिको और साइन्स लेब के नाम बता देते तो हमारे जैसे खाकसार के ग्यान मे इज़ाफा हो जाता !!

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    • January 13, 2015 at 10:06 pm
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      खार भी होते हैं शामिल ,…सिर्फ गुलों से गुलसितां नहीं बनता …जिसको विचार रखने , छपवाने का अवसर मिले ,…धन्य है …आपके नज़रिये से जो ठीक नहीं , तो जाने दीजिये या फिर नज़रिया बदल कर रू-ब-रू हों….

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      • January 13, 2015 at 10:17 pm
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        शायरेी के साथ्-२ दो चार नामचीन वैग्यानिको और साइन्स लेब के नाम भेी….. जाने दिजिये इत्तेी सारेी मेह्नत आज के दौर मे कौन कर पाता हे

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  • January 13, 2015 at 9:31 pm
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    अफ़ज़ल भाई लेख बहुत बढिया लिखा है जिसके लिये हार्दिक बधाई !!
    बेशक सनातन धर्म और इस्लाम के अतीत मे विग्यान विकसित अवस्था मे रहा हो मगर आज ये दोनो ही मजहब अपने-2 वजूद वाले देशो मे ईसाइयो और यहूदियो के साइंस्दानो और साइन्स प्रयोगशालाओ से काफी पीछे है , ये एक कड़वी सचाई है जिसे कोई माने या ना माने उसकी सोच…

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    • January 13, 2015 at 9:54 pm
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      शरद जी

      असल में ये पाकिस्तान के लेखक है वसतुल्लाह खान साहब . बहुत अच्छे लेखक है . मुझे उर्दू आती है इस लिए मेरी कोशिश है के अच्छा लेख खबर की खबर में प्रकाशित किया जाए . बस एक शौक है जो आदमी पूरा कर रहा है वह भी अपने जेब से खर्च कर के . असल में हम लोग मतलब हिन्दू और मुस्लमान बस इसी ख़याल में रह गए के हमारे धार्मिक किताब में सब है . आप ने शायद लेख पड़ा हो जो में ने लिखा था के हिन्दू और मुसल्मान्न धरती के भोज है . में ने लिखा था के हम लोग हक़ीक़त से आँख मोड़ लेते है सच्चाई की तरफ नहीं देखना चाहते है अभी भिो दोनों क़ौम को शिक्षा की बहुत जरुरत है अगर नहीं तो हम इस में पिछड़े रहे ग . खास तौर से मुस्लमान का तो बहुत बुरा हाल है .

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      • January 13, 2015 at 10:14 pm
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        वसतुल्लाह खान साहब का लेख और आपके द्वारा किया गया अनुवाद दोनो ही काबिले तारीफ है !! हम ख़ान साहब को भी नही जानते और उर्दू भी कभी नही पढी पर आपकी मेहनत से ही उनका लेख पढ पाये है …. पर क्या किया जाये अधिकतर मौको पर मुसलमानो के रुप मे हमे वहाब चिश्ती जैसे जान्कार् इन्सानो की नॉलेज पर ही डिस्कसन करना पड़ता है !!

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  • January 14, 2015 at 12:06 pm
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    अफजल जी, विज्ञान और धर्म में विरोध होता है चूंकि विज्ञान अनुभूति की बात करता है और धर्म श्राद्ध की | यह बात आप इस्लाम और ईसाई धर्म के संदर्भ में तो लगा सकते हो लेकिन हिन्दू धर्म के संदर्भ में नहीं लगा सकते | हिन्दू धर्म में अनुभूति का स्थान प्रथम है और श्रद्धा का बाद में | वेद को सत्य माना गया है लेकिन लेकिन सावधान किया गया है कि जहाँ पर अनुभूति और वेद वाक्य में अंतर अथवा विरोध हो वहां अनुभूति को ही प्रमाण माना जाए | इसके अनुसार श्रद्धा तो अनुभूति से उत्पन्न होती है न कि अनुभूति श्रद्धा से | यही कारण है कि हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान का उदय बहुत पहले हो गया | गुप्त लालीन लोह संतंभ इसका जीता जागता उदाहरण है जिसे आठवें आश्चर्य में रखा जा सकता है कि इसमें जंग नहीं लगता | न केवल जंग नहीं लगता अपितु 100 वर्ष पहले तक दुनियाँ की ऐसी कोई भट्टी नहीं बनी थी जिसमें इतने बड़े सतंभ को ढाला जा सके | अब बात करते है ईसाई और इस्लाम की | पश्चिम में विज्ञान का विकास तभी संभव हो पाया जब धर्म को न केवल विज्ञान से अपितु राजनीति से भी अलग कर दिया गया | ऐसा होने पर ही स्वातमत्र सोच पैदा हुई | जहाँ तक इस्लाम की बात है इसमें आज तक धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई है | बीच में एक दौर आया था और तभी इसमें विज्ञान का कुछ विकास हुआ था लेकिन फिर से बादल घिर गए और प्रगती रुक गई | ऐसा भी नहीं है कि धर्म केवल विरोध की भूमिका ही अदा करता है | कल्पना का श्रेय धर्म ग्रंथों को ही जाता है जिसे विज्ञान साकार करता है | इस रूप में हम दोनो को पूरक भी मान सकते है |

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  • January 14, 2015 at 12:07 pm
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    विज्ञान और मज़हब को अलग ही रखे तो बेहतर है. मज़हब बदलता नही है, उसकी कुछ किताबे है और उन्ही के अनुसार मज़हब चलेगा. इसके उलट विज्ञान हमेशा बदलता रहता है और नई नई जानकारी इसमे जुडती रहती है. कभी कभी नई जानकारी मिलने से पुरानी बाते गलत साबित होती है और हटा दी जाती है.

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  • January 14, 2015 at 12:11 pm
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    .’#तुम_लोग’ कहते हो की धरती है चपटी और सूरज लगाता है धरती के चक्कर , लेकिन सूर्य के मकर रेखा में प्रवेश करने की सूचना का ‘ वैज्ञानिक त्यौहार’ हम हजारों साल से मना रहे है , और ये उस समय से भी हजारों साल पहले की बात है जब तुम्हारा मजहब अस्तित्व में भी नहीं आया था …..!!

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  • January 15, 2015 at 2:09 pm
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    साईंस एक नजरिया है, जिसका मिजाज इस्लाम से मेल नही खाता. कम से कम आज के साईन्सदानो पे तो यही कहा जा सकता है. दुनिया के अधिकांश साईंस्दानो का झुकाव रिलिजन के प्रति बेहद कम है. अगर साईंस का मतलब सत्य की खोज ही है तो बड़े साईन्सदानो को भले ही वो किसी भी मजहब मे पैदा हुये हो, मुसलमान हो जाना चाहिये था, लेकिन ऐसा होता दिख नही रहा. इसलिये मुस्लिमो को अपने बच्चो को साईंस पढ़ाने से पहले दीनी तालीम पे जोर देना चाहिये, उनके ईमान को मजबूत करना चाहिये. पढने के लिये दीनी किताबे ही इतनी है की उसको ढंग से पढने मे ही जिंदगी गुजर जाये. साइंस के अलावा भी बहुत से सब्जेक्ट है, जिनसे दीन को कोई खतरा नही. वैसे भी आखिरत पे न्यूटन के नियम या डार्विन की थ्योरी नही ईमान ही काम आयेगा. ये साईंस इस दुनिया मे इंसान के मकसद को बयान नही कर सकती, बल्कि उसे अपने मकसद से दूर कर रही है. साईंस के मामले मे हमे ज्यादा खबरदार रहने की जरूरत है.

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  • January 15, 2015 at 2:22 pm
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    दो बाते थोड़ा खुल कर बताएंगे …..
    1-आखिर साइन्स से दीन (मजहब) को क्या खतरा है ??
    2-इस्लाम को मानने वालो को हर समय 24 घंटे अपने मजहब पर खतरा मंडराता क्यो नज़र आता है…
    तस्लीमा या रश्दी कुछ लिख दे तो इस्लाम खतरे मे….
    कोई रंग लगा दे तो इस्लाम खतरे मे….
    गैर मुस्लिम अपने हिसाब से पूजा इबादत करे तो इस्लाम खतरे मे….
    मलाला जैसी बच्चिया पढ़ना चाहे तो इस्लाम खतरे मे….
    आतंकवादियो को मारने की बात की जाये तो इस्लाम खतरे मे……..

    कही हवा से कुछ पत्तिया भी हिल जाये तो इस्लाम खतरे मे कैसे आ जाता है ?? आखिर मसला क्या है 🙂
    क्यो इतना असुरक्षित रहने का वहम पाल रखा है ??

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  • January 19, 2015 at 6:23 pm
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    देखिए इस्लाम का अर्थ है पूर्ण समर्पण. मुसलमान जब क़ुरान को पढ़ता है तो उससे पहले अपने दिल से ये स्वीकार करता है की वो ईश्वर की वाणी है, आदर्श है, त्रुटिमुक्त है. जबकि साईंसदानो का मिज़ाज, हर चीज़ पे सवाल खड़े करना है, वो हर अवधारणा पे सवाल उठाते है, ऐसे मे वो कैसे ईमान लाएँगे? उनके किसी भी साईंसदान ने तो आख़िरत की पुष्टि नही की, इसलिए वो आख़िरत पे ईमान नही लाते, सत्य से दूर है.

    इसीलिए आप देखो, दुनिया मे साईंसदानो की दुनिया मे बहुत कम मुसलमान है. और जो मुसलमान दिखते हैं, वो हैं या नही अल्लाह जाने. वो दीन से दूर है, कारण की साईंस इस दुनिया मे हमारा मकसद क्या है, नही बता पाती. साईंस का आदमी इसी दुनिया का होके रह जाता है, जो इसी दुनिया का होके रह गया, वो आख़िरत मे नाकाम है. ये दुनिया चंद दिनो की है, और आख़िरत हमेशा के लिए है.

    एक साजिश के तहत मुनफिको को महान मुस्लिम बता के प्रचारित करा जा रहा है, ताकि दीन पे चलने वाला मुसलमान भी भटक जाए. तुसी, इब्ने सिना जैसे लोगो के मुस्लिम होने का कोई पक्का सबूत नही है. साईन्सदनो की आज की जमात को देखते हुए कोई ताज्जुब नही की वो मुनफिक हो या मुर्तिद.
    रसूल और सहाबा को हमे आदर्श मानना चाहिए, वो साईंसदान नही थे, ना उनके जमाने मे इन्हे हीरो बनाया गया था. आज यहूदी और पश्चिम जगत ने इन्हे बतौर हीरो प्रदर्शित किया है, इन्ही की किताबो मे इनके ज़िक्र हो रहे हैं, जिससे की मुसलमान रसूल के बताए रास्ते पे ना चलके इनके रास्ते पे चले.

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    • January 19, 2015 at 8:05 pm
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      वासी साहब ए किस्तो वाला सच्चा मुसलमान हमारी समझ से बाहर है, सच्चा मुसलमान होने के नाते विग्यान पढ़ना नही चाहता मगर सच्चा मुसलमान होने के नाते विग्यान और टेक्नोलॉजी का हर प्रॉडक्ट सबसे पहले इस्तेमाल करने मे फख्र महसूस करता है :)……कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, बाइक, कार, ए के-47, रॉकेट लॉंचर…..कुछ भी इस्तेमाल करने मे परहेज नही :)…

      विग्यान और टेक्नोलॉजी से अगर समस्या है तो इस्तेमाल भी मत कीजिये पर वैसा आप कर नही सकते क्योकि दोहरापन ना हो तो मुसलमान कैसा ??

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  • January 19, 2015 at 6:29 pm
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    क्या साईन्स आखिरत और उसकि कसौटि को बता सकति है? कितने साईन्स्दान ऐसे है, जो इस्लाम तो छोडो, किसि और रिलिजन और किताबो को सच मान्ते है इस्लम् साईन्स के खिलाफ नहेी, लेकिन इससे एहतियात बरतने कि जरुरत है. मेरा सिर्फ इतना कहना है. पहले अपने ईमान और देीन को मजबुत करो.

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    • January 19, 2015 at 6:43 pm
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      आपका खबर की खबर बहुत बहुत इस्तकबाल हे वासी भाई मेने काफी लोगो से आपकी बातो की चर्चा की इसमें कोई शक नहीं की आप एक ” आइडियोलॉजिकल कटटरपंथी ” हे जिन्हे में उन लोगो से बहुत बेहतर ही मानता हु जो इस्लाम की आड़ में सत्ता और चंदे चखने की लड़ाई लड़ रहे होते हे आपका शुक्रिया आपकी हमारी डेढ़ साल से चल रही चख चख से मुझे भी काफी सारी बाते पता चली कटट्रपंथ को गहराई से समझने में मदद मिली जो बहुत जरुरी थी आते रहिये में थोड़ी देर में आपकी बातो पर अपने विचार रखूँगा

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    • January 19, 2015 at 8:07 pm
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      क्या है ये आखिरात ?? क्या आप इसको साबित कर सकते हो ??

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      • January 20, 2015 at 10:22 am
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        टेक्नॉलॉजी को अपनाने मे कोई गुरेज़ नही, मैं खुद कम्यूटर का इस्तेमाल कर रहा हूँ, लेकिन मैं साईंस के नज़रिए की बात कर रहा हूँ, मैं साईंसदानो की अक्सरीयत के नज़रिए से इत्तेफ़ाक नही रखता. दिमाग़ मे ज़्यादा खुराफात सही नही.
        आख़िरत है, इंसाफ़ का वो दिन, जिसका सामना हम सब को करना है, उस दिन अल्लाह और रसूल पे ईमान लाने वाले, काफिरो का हश्र ऊँचे स्थानो से देखेंगे.
        जहाँ तक आख़िरत को साबित करने की बात है, तो हर चीज़ साबित नही की जा सकती, ये यकीन होता है, भरोसा होता है, इसे ही ईमान कहते हैं, यही आख़िरत पे कामयाबी और नाकामी का पैमाना है. ये जिंदगी एक परीक्षा है, अगली जिंदगी के लिए. आप क़ुरान पढ़े, उसपे ईमान लाए, सब समझ आ जाएगा.
        http://www.quranhindi.com

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        • January 20, 2015 at 11:02 am
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          वासी साहब

          आखरत सिर्फ मस्जिद में बैठ कर नहीं बनता . अल्लाह ने दुनिया इसी लिए बनायीं है के आप दुनिया में जा कर वह सभी हक़ूक़ पूरा करे अपने सभी फर्ज अदा करे . तभी आप की आखरत बने गी.

          मुझे समझ में नहीं आता के मुस्लमान खुद तो कुछ नहीं करते मगर विज्ञान की तरक्की और टेक्नोलॉजी का लाभ सब से पहले ुयहते है , अगर इतना ही विज्ञान से चीड़ है तो क्यों जहाज , रेल से सफर करते है घोडा और खच्चर से सवारी कीजिये . शिक्षा की कमी के कारन आज मुस्लमान पुरे दुनिया में पिछड़े हुए है उस की तरफ धयान देना हो गए .

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          • January 20, 2015 at 1:27 pm
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            वासी साहब गुस्ताखी माफ मगर साबित होने और हर बार वही परिणाम देने वाली साइन्स पर आप उस आखिरात को उपर रख रहे है जिसके होने का ही कोई सुबूत नही है ?? सब कुछ आस्था है !!….हम विग्यान के छात्र है और ना साबित होने वाली बातो को 100% सत्य मान कर साबित होने वाली बातो से उपर रखना हमारे लिये मुमकिन नही है….इस विषय पर हमारे राश्ते पहले कदम से ही अलग दिशाओ मे है:)…..

            वैसे क़ुरान पढ कर लोग क्या कर रहे है उस पर एक नज़र आप भी डाल लीजिये ….लिन्क अगले मेसेज मे दे रहे हे …..

            अगर क़ुरान की यही शिक्शा है तो हमे खुशी है की हमने उसे पढ़ा नही है….अगर आई एस ने क़ुरान का गलत तरीके से इस्तेमाल किया है तो क्यो दुनिया भर के मुसलमान क़ुरान की तौहीन पर खामोश है ?? दो बाते एकसाथ नही हो सकती !!

          • January 21, 2015 at 10:24 am
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            हम तो कह ही रहे हैं की तालीम का प्रसार करो, रसूल्लाह ने फरमाया है की तालीम के लिए चीन भी जाना पड़े तो जाओ. लेकिन तालीम की क्वालिटी होनी चाहिए, एक मकसद होना चाहिए. इस दुनिया मे हमारा मकसद क्या है, उसे कैसे पाए, इसे ध्यान मे रखते हुए सिलेबस होना चाहिए. आप 24 घंटे मस्जिद मे मत रहिए, अपने घर मे दोस्तो, रिश्तेदारो के बीच रह कर तालीम हासिल करो, और उसे बाँटो. आप आज के साईंसदानो की जमात देखिए, अक्सरीयत दोजख की आग मे जलने वाली है, तो ऐसी शिक्षा का क्या लाभ, जो बुद्धि भ्रष्ट करे? ये दुनिया इसी विवेक की तो परीक्षा है, साईंसदान तो इसमे पूरी तरह नाकाम हो गये हैं.

            जहाँ तक टेक्नॉलॉजी और दौलत की बात है तो ये हलाल या हराम नही होती, इसको पाने का तरीका हलाल या हराम होता है. यहूदी लोग ब्याज पे पैसा कमाते थे, जो की हराम है, लेकिन जिहाद मे जब वो दौलत ईमान वालो को मिली तो वो हलाल हुई, क्यूंकी उसको पाने का तरीका हलाल था. यही बात टेक्नॉलॉजी पे भी लागू होती है. ये टेक्नॉलॉजी, बनी तो इस खुदाई से ही है, अल्लाह की नेमत है, कैसे हासिल कर रहे हो मायने रखता है.
            कुफ्र और शिर्क मे अगर आप हो तो सारी पढ़ाई लिखाई बेकार है.

  • January 20, 2015 at 1:32 pm
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    नवभारत टाइम्स का वह लिन्क यहा पोस्त नहेी हो पा रहा हे इसलिये वहा तक पहुचने का रास्ता बता रहे हे

    नवभारत टाइम्स होम –> फोटो –> देश-दुनिया–>आई एस आतंकियों की क्रूरताः आपको हिला देंगी ये तस्वीरें

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  • January 21, 2015 at 10:54 am
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    वासेी सहब् आखिर चीन की किस शिक्षा से रसूलल्लाह इतना प्रभावित थे ?…

    वैसे अभी तक आपने हमारी बात पर अपनी राय नही दी कि क़ुरान को पढ कर मुसलमान लोग आतंकवाद क्यो पाना रहे है निर्दोषो का कत्ल कर रहे है ??
    1-अगर आतंकवादी क़ुरान के नाम का गलत इस्तेमाल कर रहे है तो अपनी धार्मिक किताब की बदनामी रोकने के लिये मुस्लिम समाज उन आतंकवादियो की मुखालफत (विरोध) क्यो नही करता ??
    2-अगर क़ुरान की शिक्षा पाये आतंकवादियो द्वारा निर्दोषो की हत्या जायज है तो फिर आप क़ुरान को अमन की किताब कैसे कहना चाहते है ??…..
    किसी भी एंगल से सोच लीजिये क़ुरान अगर एक ही है तो उपर वाले दोनो पॉइंट मे से एक ही बात संभव है मतलब क़ुरान पढने वाला या तो अमनपसंद होगा या बेगुनाहो का खून बहाने वाला आतंकवादी …..आपके जवाब का इंतजार रहेगा (बाकी मुस्लिम पाठक चाहे तो बेबाक होकर अपनी राय रख सकते है क्योकि यह डिस्कसन सभी के लिये ओपन है

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    • January 21, 2015 at 1:25 pm
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      बेगुनाहो का क़त्ले आम इस्लाम मे सख़्त मना है, लेकिन बेगुनाह कौन है, और गुनाहगार कौन, इसको इस्लामी नज़रिए से समझिये. मैने आपको क़ुरान के हिन्दी अनुवाद का लिंक भेजा, इसे पढ़िए, आपको सत्य का ज्ञान होगा, अगर आप विवेकशील है.
      कुफ्र और शिर्क, इस दुनिया के जघन्यतम अपराध है, और इस मामले मे ही इस्लाम निर्विवादित तौर पे स्पष्ट है की आख़िरत पे इसकी कोई माफी नही, बाकी अन्य गुनाह चाहे तो अल्लाह माफ़ कर सकता है, ये उसकी मर्ज़ी पे है.
      शिर्क और कुफ्र ऐसी बीमारी है, जिससे लड़ना मानवता के हित मे है, क्यूंकी आख़िरत मे इस गुनाह की कोई माफी नही, और इंसान हमेशा उस सज़ा को भोगेगा. जन्नत भी स्थाई है, और दोजख भी.
      मैं अपनी बात शायद समझा नही पा रहा हूँ, इसके लिए मैने आपको लिंक दिया है, जिसमे आपको हर चीज़ एकदम स्पष्ट हो जाएगी. इस्लाम अमन और ईमान का मज़हब है, बिना ईमान के भी अमन, अस्थाई ही होगा. इसलिए दोनो ज़रूरी है.
      कोई भी सच्चा मुसलमान किसी भी बेगुनाह का कत्ल तो क्या उसकी वकालत भी नही करेगा.
      http://www.quranhindi.com

      आज के दौर मे मुनफिक भी बहुत हो गये हैं, हर मुसलमान नाम का इंसान, मुसलमान हो ज़रूरी नही. इसलिए इस्लाम को समझना हो तो मुसलमान को नही, इस्लाम को पढ़िए.

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      • January 21, 2015 at 1:48 pm
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        वासी भाई ने लिखा ”—————————-कुफ्र और शिर्क, इस दुनिया के जघन्यतम अपराध है, और इस मामले मे ही इस्लाम निर्विवादित तौर पे स्पष्ट है की आख़िरत पे इसकी कोई माफी नही, बाकी अन्य गुनाह चाहे तो अल्लाह माफ़ कर सकता है, ये उसकी मर्ज़ी पे है.
        शिर्क और कुफ्र ऐसी बीमारी है, जिससे लड़ना मानवता के हित मे है, क्यूंकी आख़िरत मे इस गुनाह की कोई माफी नही, और इंसान हमेशा उस सज़ा को भोगेगा. जन्नत भी स्थाई है, और दोजख भी—————–. ” वासी भाई की इस लाइन की मेने कई पढ़े लिखे मुस्लिमो से चर्चा की अब ज़ाहिर हे इससे कटटरपंथी व्याख्या तो कोई नहीं होगी लेकिन अगर ये भी हे तो भी इसका मतलब यही तो हे की हम मुस्लिम ही इतने अच्छे इतने अच्छे बने की अगला हमसे प्रभावित होकर हमारी बात मानकर ” शिर्क ” करना छोड़ दे तो ये वासी भाई हो या जाकिर या इमाम बुखारी या ओवेसी या कोई भी हो बनिए इतने अच्छे और मिटा दीजिये दुनिया से शिर्क मोस्ट वेलकम हे लेकिन याद रहे की अच्छा बनना बहुत मुश्किल काम हे यु ही नहीं शरुआती चार में से तीन खलीफा और गांधी और मार्टिन लूथर लिंकन क़त्ल हुए थे ? जो अच्छा बनेगा उसकी जिंदगी नरक भी ( या ही ) हो सकती हे यही तो अल्लाह की दी हुई परीक्षा हे बनिए अच्छे और मिटवा दीजिये शिर्क . अब रही बात मेरी तो वो भी लिखता हु —- जारी

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        • January 21, 2015 at 2:02 pm
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          में पहले ही हाथ खड़े कर रहा हु की में इतना अच्छा नहीं बन सकता ? क्यों नहीं बन सकता क्योकि आदर्श कोई भी हो उन पर चलना बेहद मुश्किल होता हे मेरे पापा इतने अच्छे थे बचपन में उनकी डेथ हो गयी अब बीस साल हो चुके हे अब तक भी उनकी अच्छाइयों नेकियों नर्मदिली की वजह से हुए नुकसानों की भरपाई नहीं हो पायी हे संघर्ष कर कर के मेरा पहले ही भुर्ता बन चूका हे में और अच्छाइयाँ और अच्छाइयों से आने वाली जिम्मेदारिया नहीं ले सकता हु अभी भी लम्बा संघर्ष सामने हे जीवन की पाठशाला से हज़ारो किस्से मेरे पास हे मुझे उमीद हे की अल्लाह मेरी हालात समझेगा ये तो मेरी बात रही लेकिन अगर वासी भाई या वासी भाई की बात मानकर कोई और मुस्लिम इतना अच्छा बनना चाहे बनकर दिखाय तो बहुत अच्छी बात हे बनिए देर किस बात की हे ? फिलहाल तो ना भारत ना पाकिस्तान ना कही भी १० % भी ये काम होता नहीं दिख रहा हे हालात उल्ट हे इस्लाम कहता हे की सब लोग ऐसे बराबर हे जैसे कंघी के दाने मगर जितना भेदभाव अरब देशो में हे सऊदी अरब में हे वो दुनिया में कही नहीं हे और इन्ही अरब देशो के चंदे पर जाने कितने इस्लाम के प्रचारक भागे फिरते हे मगर जिनसे पैसा लेते हे उनके सामने चु करने की मजाल नहीं हे ये हे आदर्श और जमीनी सच्चाई के बीच फर्क

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          • January 21, 2015 at 2:26 pm
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            हालात उलट हे जाकिर साहब तो सूना हे की गल्फ में ही हे क्या कभी ये मुद्दा उठाया https://www.youtube.com/watch?v=v6_RR5omrao

        • January 22, 2015 at 2:08 pm
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          1. गाँधी और मार्टिन लूथर लोग बिना ईमान के मरे हैं, जबकि इस्लाम से ये वाकिफ थे, यानि ये जघन्यतम अपराध के दोषी है, जो अक्षम्य है, इन्हे आप कैसे अच्छा इंसान बता रहे हो? अबू तालिब जैसे व्यक्ति तक को रसूल की सिफारिश के बाद जन्नत नही नसीब हुई, क्यूंकि वो बिना ईमान के ही मरा. मैने पहले भी कहा की ये पैमाना निर्विवादित है.
          2. तीन खलीफ़ाओ की हत्या के लिये यहूदी साजिश थी.
          3. अगर किसी को देख के कोई ईमान ले आता तो बद्र और खैबर की लड़ाई ही नही होती. उस समय तो रसुल्लाह खुद मौजूद थे. हालांकि कई लोग सत्य जान कर दावत भी कबूल करते हैं और कर रहे हैं.
          4. जिसे आप कट्टरपंथि व्याख्या कह रहे हैं, वो बिना मिलावट की है, और कुरान की है ना ही हदीस की. कुरान की हर आयत निर्विवादित है. और मेरे नजदीक कुरान की आयत उसकी तफ़सीर से ज्यादा मायने रखती है, तफ़सीर तो इंसान करता है, और मुनाफिक अपने हिसाब से इसके अर्थो को बदलने का प्रयास करते रहते हैं.

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          • January 22, 2015 at 3:29 pm
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            वासी भाइ आपने बताया नहीं की शिर्क खत्म करने करने की कोशिश के लिए जो व्याख्या हमने की हे उससे आप सहमत हे या नहीं ? नहीं हे तो क्यों नहीं हे ? देखे की दुनिया में प्रतिशत में सबसे अधिक ” शिर्क ” शुरूआती खलीफाओं के दौर में खत्म हुआ था क्योकि इन्होने बेमिसाल अच्छाइयाँ ईमानदारी सादगी दिखाई दी थी वही सब दिखाने को आज भी मुस्लिमो को और शासको को पैसे वालो को किसने रोका हे ? इस सम्बन्ध में आप क्या कह या कर रहे हे ? दूसरी बात की आप शिर्क का खात्मा चाहते हे और बरेलवियो और शियाओ को भी शिर्क का दोषी मानते हे क्या यहाँ कोई और मुस्लिम हे ( फ़र्ज़ करे वहाब साहब ) जो वासी भाई से सहमत हो ? तीसरा मेरा पुराना सवाल हे की शिर्क खत्म करने के लिए आप क्या चाहते हे की ( १ )सारे गैर मुस्लिम इस्लाम अपना ले ( २ ) या अपने मज़हब में ऐसा चेंज ले आये की एक सिर्फ एक ईश्वर की इबादत हो जवाब दे

      • January 21, 2015 at 3:14 pm
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        वासी साहब ये तजुर्बा हमे हमेशा हैरान करता रहा है कि आपसे पहले भी जितने मुसलमानो से डिस्कसन हुआ उनमे से कोई भी क़ुरान पर डिस्कसन की बात आते ही अजीबोगरीब तरीके से सामने से हट जाता है ?? हम आज तक नही समझ पाये कि आखिर मुसलमानो ने क़ुरान मे ऐसा क्या पढ़ा है जिसकी पढ़ाई का नाम लेकर वे हर जगह दूसरो पर (गैर मुस्लिम धर्मो, उनके धार्मिक ग्रंथो और साइन्स) सवाल उठाने की शुरुआत तो कर देते है मगर जब बात क़ुरान पर डिस्कसन की आती है तो …..खुदा खैर करे 🙂

        1-बेगुनाहो का क़त्ले आम इस्लाम मे सख़्त मना है…”किन्तु” लगा दिया

        2-“लेकिन” बेगुनाह कौन है, और गुनाहगार कौन, इसको इस्लामी नज़रिए से समझिये…..क्यो भाई हम क्या मुसलमान है जो हर बात को आपके नज़रिये से समझे ? आप बातो को बाकी दुनिया के हिसाब से क्यो नही समझते ??

        3-मैने आपको क़ुरान के हिन्दी अनुवाद का लिंक भेजा, इसे पढ़िए, आपको सत्य का ज्ञान होगा…..आपको आज तक नही हो पाया तो हमारा हश्र हमे मालूम है 🙂

        4-अगर आप विवेकशील है तो…..”अगर” का मतलब 🙂

        मिया क्यो सब अग्यानियो के साथ डिस्कसन मे अपना वक़्त जाया करते हो 🙂

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  • January 22, 2015 at 6:26 pm
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    1. इंसानियत के लिये, हमे लोगो को जागरूक करना पड़ेगा की, इस्लाम का कोई विकल्प नही है. आखिरत की अवधारणा के बिना ऐसा संभव नही है. अगर हम शिर्क या कुफ़्र को एक गंभीर मसला नही मानेंगे, और दूसरे नैतिक मूल्यों को ही समाज की अवश्यकता समझेंगे, तो ऐसा संभव नही होगा. क्यूंकि फिर आप जैसे लोग गाँधी, मदर टेरेसा जैसे लोगो को महान और अच्छा इंसान बता के इस्लाम की जरूरत को ही खत्म कर देंगे.
    इस नेक कार्य मे अनेक लोग लगे हैं, हो सकता है उनमे कुछ कमिया हो, आखिर वो इंसान है, फ़रिश्ते तो नही. लेकिन आप जैसे लोग उनको नफरत फैलाने वाला बताते हैं की वो दूसरे धर्मो का अपमान कर रहे हैं. जबकि दूसरे धर्मो को मानने वाले लोग बेहद कष्ट की अवस्था से अगले जीवन मे गुजरने वाले हैं.
    इसके लिये प्रभावशाली मिशनरीज की आवश्यकता है, और उसके लिये चंदा इकट्ठा करके शिक्षण संस्थान खोलने या तंजीमे बनाने मे कोई बुराई मुझे नजर नही आती. लेकिन हमे ध्यान रखना चाहिये की हमारी वफादारी इस्लाम से हो ना की इन तंजीमो या तालिबानो से. ज़ाकिर नायक, जावेद अहमद गामिदि, तालिबान या इस्लामिक स्टेट, जब तक वो इस्लाम के मुताबिक बात करे या आचरण करे, तब तक इनका साथ दे, वर्ना विरोध करे.

    2. दूसरे धर्म के लोग शिर्क को खत्म करके अल्लाह और रसूल पे ईमान ले आये, तो वो एक तरह से इस्लाम मे ही आ गये, इसलिये आपका सवाल अटपटा है.

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  • January 22, 2015 at 6:34 pm
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    सिकंदर हयत साहब, आपसे बहस करने से पहले मैं यह जानना चाहता हूँ की आखिरत की कसौटी आपकी नजर मे क्या है? क्या गैर मुस्लिम जन्नत मे जा सकते हैं? शिर्क की परिभाषा आपकी नजर मे क्या है? सारा कन्फ़जयूजन इन्ही सवालो के इर्द-गिर्द है, इस्लाम की बुनियाद भी इसी मुद्दे पे है, इसलिये ये मसला स्पष्ट होना चाहिये. में अपनी समझ के पीछे, कुरान का हवाला देने के लिये तैयार हूँ. आप भी इसी हवाले से बात करें.

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  • January 22, 2015 at 7:08 pm
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    जवाब के लिए शुक्रिया ये बहस लम्बी चलेगी मगर बहुत सार्थक होगी खेर कमाल हे की आप बार बार वही बात कर रहे हे ? में कह तो रहा हु की में आपकी इस्लाम की व्याख्या सही मान भी लू की हमे शिर्क खत्म करवाना चाहिए . ठीक हे सही हे आगे तो इसके लिए सबसे सबसे सबसे अच्छे बन कर नेक बनकर अगले का दिल जीत कर ये काम क्यों ना किया जाए ? अच्छे से अच्छे बनने को आप इस्लाम से हटना क्यों समझ रहे हे ? अच्छे बनने का मतलब हे सादगी ईमानदारी बराबरी भाईचारा ( आपस में ही सही ) इसमें क्या गलत हे ? इस्लाम भी तो यही कहता हे मगर यहाँ तक की कुछ लोग ये भी कर रहे – करवा रहे हे की जैसे झारखण्ड में एक ” लड़कियों का दलाल ” एक हिन्दू लड़की से शादी करके उसे इस्लाम अपनाने के लिए टॉर्चर करता हे अपनी कुकर्म जारी रखता हे अपने घिनोने अमाल जारी रखता हे . क्या उसकी कोशिशो से भी आप सहमत थे ? और में वेट कर रहा हु इस बात का की ”दूसरी बात की आप शिर्क का खात्मा चाहते हे और बरेलवियो और शियाओ को भी शिर्क का दोषी मानते हे क्या यहाँ कोई और मुस्लिम हे ( फ़र्ज़ करे वहाब साहब ) जो वासी भाई से सहमत हो ? ” देखे क्या कोई आपकी बात का सपोर्ट करता हे और एक ये भी बताइये की वासी भाई क्या यहूदी शिर्क करता हे ?

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  • January 22, 2015 at 7:17 pm
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    वासीभाई ने लिखा ”आप जैसे लोग गाँधी, मदर टेरेसा जैसे लोगो को महान और अच्छा इंसान बता के इस्लाम की जरूरत को ही खत्म कर देंगे. ” इसी विषय पर एक घटना याद आई की खिलाफत आंदोलन के एक नेता ( एम जे अकबर लिखते हे की खिलाफत फंड का इस्तेमाल अपनी जाती जरुरतो पर खूब खर्च हुआ उधर गांधी पाई पाई का हिसाब रखते थे ) वासी भाई आप ही की तरह कहते थे की वो एक ”बुरे बदमाश मुस्लिम को भी वो गांधी से बेहतर मानते हे क्योकि वो मुस्लिम हे ” अब वासी भाई मुझे इस पर ऐतराज़ यही हे की गांधी का ही नाम क्यों लिया था ? ब्रिटेन के किंग जॉर्ज भारत के वायसराय या जनरल डायर का नाम क्यों नहीं लिया ? की उन्हें भी एक बुरे मुस्लिम से कमतर मानते हे ? क्या वो साहब अंग्रेज़ो से डरते थे ? —- जारी

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  • January 22, 2015 at 7:47 pm
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    वासी भाई ने लिखा ”सिकंदर हयत साहब, आपसे बहस करने से पहले मैं यह जानना चाहता हूँ की आखिरत की कसौटी आपकी नजर मे क्या है? क्या गैर मुस्लिम जन्नत मे जा सकते हैं? शिर्क की परिभाषा आपकी नजर मे क्या है? ” आख़िरत की मेरी कसौटी हे की आदमी धार्मिक भी हो और अच्छा नेक ईमानदार भी हो एक से काम नहीं चलेगा अफ़सोस की आप लोग बिना सोचे समझे एक पर ही जोर दे रहे है . बुराइयो से आँख मूंदे रखते हे आपने पूछा ” क्या गैर मुस्लिम जन्नत मे जा सकते हैं? ” पहले आप बताइये की क्या शिया और बरेलवी जन्नत में जाएंगे हां या ना ? मेने भी देखा हे आपने भी शायद देखा होगा की मुसलमानो में भी एक से बुरे बईमान हक़तल्फ़ी करने वाले ज़ालिम शोषक मुस्लिम भी पड़े हुए हे मगर वो शिर्क नहीं करते नमाज़ रोजा करते हे तो क्या वो जन्नत में जाएंगे ? पिछले दिनों दिल्ली में एक ईमानदार मुल्ला जी के नाम से मश्हूर एम सी दी इन्स्पेक्टर की उसके इलाके के मुस्लिमो ने ही अवैध निर्माण रोकने पर हड्डी पसली एक कर दी दोनों में से कौन जन्नत जाएगा ? आप क्या कहते हे — जारी

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  • January 22, 2015 at 11:09 pm
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    वासी भाई की समस्या ये हे की ये जीवन भर एक किसी सुरक्षित कम्फर्ट जोन में ही रहे हे इन्होने दुनिया देखि नहीं हे इसी कारण इनको जमीनी सच्चाइयो का इंसानो की फ़ितरतो मुल्क और दुनिया के हाल का ठीक से पता नहीं हे अच्छा सेम यही बात में अपने अलीगढ़ जामिया के पढ़े लिखे डॉक्टरों इंजिनियर कज़िन्स से भी कहता हु की तुमने दुनिया नहीं देखि हे अब सुनिए वो कहते हे की नहीं हम तो भारत के इतने शहरो में गए हे हम यहाँ गए वहा गए जबकि में सिकंदर हयात सिर्फ दिल्ली के ही 200 – 300 किलोमीटर के दायरे में ही भागदौड़ करता रहा हु फिर भी में कहता हु की मेने दुनिया देखि हे तुमने नहीं सवाल हे की कैसे ? वो ऐसे की मेरे तो पैदा होने से पहले ही मेरे माँ बाप ने गाव का पुश्तैनी इलाका छोड़ दिया था मेरे पैदा होने के बाद ननिहाल में नाना का सुरक्षित क़स्बा भी छोड़ दिया मुजफरनगर आ गए कई घरो में रहे जबकि मेरे कज़िन्स ने अपना पुश्तैनी इलाका कभी नहीं छोड़ा जहा सभी सैयद साहब की बेहद इज़्ज़त करते हे हम मुज्जफरनगर रहे जहा सैयद साहब को कौन पूछता भला ? मेरे कज़िन के घर के कई लोग पाकिस्तान चले गए नतीजा सम्पत्ति पर से दबाव कम हुआ मेरे यहाँ से कोई पाकिस्तान नहीं गया था नतीजा हमारी सम्पत्ति पर काफी दबाव था बरसो मुझे भी कचहरी के धक्के खाने पड़े जहा कोई कितना भी बड़ा मुसलमान हो या कोई भी हो आपका शोषण जरूर ही करता हे मेरे कज़िन ने जीवन में भी कभी कोर्ट का मुह नहीं देखा मेरे कज़िन्स पुश्तैनी इलाके से अकेले मतलब परिवार नहीं निकले भी तो यूनिवर्सिटी चले गए वहा से निकले नहीं . दूसरे ने डॉक्टर बनकर कुछ दिन बाद फिर से पुश्तैनी इलाके में क्लीनिक खोल लिया जबकि में कभी किसी यूनिवर्सिटी नहीं गया बड़ी मुश्किल में मुज्जफरनगर में कुछ सेट हुए ही थे की पढ़ाई लिखाई को देखते हुए पुरे परिवार ने दिल्ली हिज़रत कर दी यहाँ भी कई जगह रहे तो इन्ही हिज़रतो ने और मुश्किल हालातो ने हमें बहुत कुछ सिखाया मेरे कज़िन्स के सर पर उसके दो अच्छी सरकारी नौकरी वाले कज़िन का हाथ जबकि हमारे साथ कोई भी नहीं था कोई भी नहीं मेरे दो बड़े और काबिल भाई थे मगर वो साथ नहीं रहते थे घर में अकेला और मुश्किलो के अम्बार खेर बात ये हे की यही होता हे दुनिया देखना जब आप कम्फर्ट जोन से बाहर रहते हे लोगो को आज़माने वाले मुद्दे सामने आते हे तभी बहुत कुछ पता चलता हे शायद की एक हदीस भी सुनी हे की हे की भाई कौन कैसा हे कैसा नहीं हे ये आज़माने पर ही तो पता चलता हे अब जैसा की हमने जाकिर साहब , तब्लीगी जमात वाले लेखो में बहसों में समझाया की कुछ लोग सिर्फ बड़ी बड़ी बाते करके और कुछ उनका सपोर्ट करके सोचते हे की समाज में बड़ी सच्चाई नेकी इस्लामी मूल्ये उन्होंने फैला दिए हे जबकि जमीनी हालात उन्हें पता ही नहीं होते यही मसला वासी भाई और मेरे कज़िन्स का हे ये क्योकि अपने कम्फर्ट ज़ोन से कभी बाहर ही नहीं निकले इसलिए इन्हे प्रेक्टिकल हालात पता नहीं हे

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  • January 23, 2015 at 10:51 am
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    1. शिया, अहमदी, बराएलवी फितना फैला रहे हैं, मुनाफिक, जो इस्लाम के दुशामन है, जन्नत जाने का सवाल नही.
    2. जिन लोगो को आप चंदे से चलने वाले लोग कह रहेहैं, क्या वो लोग दूसरे धर्मो के लोगो को इस्लाम मे नही ला रहे?
    3. गाँधी, मार्टिन लूथर को छोड़िये, अबू तालिब जैसा व्यक्ति, जिसने अनाथ बच्चे का बड़े प्रेम से पालन पोषन किया, जिसने रसुल्लाह के खिलाफ दुश्मनो का साथ भी नही दिया, उस तक तो अल्लाह ने दोज़ख का भागी बताया है. बुरे से बुरा मुसलमान, गैर मुस्लिम से बेहतर है. सही है.
    मुस्लिम, अपने गुनाहो की सजा पाके, जन्नत मे जायेंगे. अल्लाह बड़ा दयालु है, वो शिर्क को छोड़, दूसरे गुनाहो को माफ भी कर सकता है. उनके गुनाह माफ भी हो सकते हैं.

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  • January 23, 2015 at 11:53 am
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    आप फरमाते हे कि बुरे से बुरा मुसलमान, गैर मुस्लिम से बेहतर है !!….

    हमे ना हेी ऐसेी जननत केी जरुरत हे और ना हेी ऐसे किसि अल्लाह केी जो अच्चे इन्सान और बुरे इन्सान का चुनाव उन्केी अच्चाईयो पर नहेी बल्कि उन्का धरम देख कर करता हो….आप्का अल्लाह आपको हेी मुबारक हम हमारे भग्वान से हेी खुश हे जो अच्चे और बुरे क फर्क तो जानता हे ः)

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    • January 23, 2015 at 12:04 pm
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      हमारा कॉमेंट वासी साहब के लिये था

      Reply
  • January 23, 2015 at 12:03 pm
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    1. जाकिर नायक को मैने ज़्यादा सुना या देखा नही है, लेकिन अगर वो दूसरे मज़हब के लोगो को इस्लाम मे लाके, उन्हे दोजख की आग से बचा रहे हैं, तो क्या ग़लत कर रहे हैं, अगर वो इस्लाम के विपरीत कुछ बोलते हैं, तो हमे इसका विरोध करना चाहिए, उन्हे किसी देश से या संस्था से पैसा मिलता है, तो इसमे कोई बुराई तो नही.
    2. किसी केस के तफ़सील मे जाए बिना बताना ग़लत होगा की कहाँ ज़्याददती है, कहाँ नही, लेकिन अगर कोई मुस्लिम लड़का, किसी दूसरे मज़हब की लड़की को इस्लाम मे लाके, उससे निकाह कर, उसे और उसके बच्चो को बाद की जिंदगी की पीड़ा से बचाता है, तो इसमे क्या ग़लत है? ज़बरदस्ती नही होनी चाहिए. अगर मुस्लिम लड़की भी किसी गैर मुस्लिम को इस्लाम के दायरे मे लाके निकाह करे तो भी ये सबाब का काम है.

    ज़ोर ज़बरदस्ती से तो धर्म परिवर्तन विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन प्रेम से इस्लाम के दायरे मे लाना भी ग़लत ही है क्या?

    वैसे भी क़ुरान इस मामले मे स्पष्ट है की अगर तुम्हारे घर वाले भी अगर ईमान ना लाए तो उनसे मित्रता और प्रेम नही रखा जाना चाहिए. कोई लड़की या लड़का अपनी मर्ज़ी से इस्लाम मे जाता है, उसके घर वाले इसके खिलाफ है, तो ये घर वालो का दोष है.

    Reply
    • January 23, 2015 at 12:08 pm
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      यानि आप सहमत हे कि ज़ोर ज़बरदस्ती से मुसल्मानो का धर्म परिवर्तन विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन प्रेम से “घर्-वाप्सेी” कर इस्लाम से बाहर आना सहेी हेः)

      Reply
      • January 23, 2015 at 2:11 pm
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        अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति, इस्लाम छोड़ता है तो वो मुर्तिद हो जाता है, जिसकी इस्लाम मे सख़्त मनाही है, और शरीयत के मुताबिक, उसे मृत्युदंड दिया जाना चाहिए. प्यार से या ज़बरदस्ती कोई मायने नही रखता. जो व्यक्ति, गैर मुस्लिम है, उसे भी अपने रिलीज़न के पालन का अधिकार है, उन्हे बस अपनी सुरक्षा के लिए हुकूमत को जजिया देना होता है. मुस्लिमो के लिए ज़कात का प्रावधान है.
        मुनाफिको से लड़ने की ज़रूरत है, क्यूंकी ये अपने आप को मुस्लिम बताते हैं, लेकिन इस्लाम मे मिलावट की कोशिश कर, फित्ना (भ्रम) फैलाते हैं, जो एक गंभीर अपराध है.
        आपका और मेरा अल्लाह (ईश्वर) अलग नही है, हम सभी को एक ही ईश्वर ने पैदा किया है, इसलिए हमारे और तुम्हारे ईश्वर की बात जहलत के सिवा कुछ नही. आप मैने जो क़ुरान का लिंक दिया है, उसका अध्ययन करे, सब स्पष्ट हो जाएगा. दावत के बाद भी नही कर रहे, तो इस दुनिया मे रुसवाई और बाद की दुनिया की सज़ा के लिए आप ईश्वर को दोष नही दे सकते.

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        • January 23, 2015 at 2:51 pm
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          हमे मालूम है हमारे सामने चीन की दीवार है…..उफफ्फ सर मे दर्द हो रहा है कोई डिस्प्रिन देगा…..नही नही मुसलमान दूर रहे वर्ना एक गैर मुस्लिम को सरदर्द की दवा देने पर अल्लाह उसकी जन्नत का टिकट काट देंगे :)…. वैसे वासी भाईजान, इतनी मस्त कॉमेडी कर कैसे लेते हो:)

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        • January 23, 2015 at 10:39 pm
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          दावत ?? कैसेी दावत ?? जिसमे आप अपने मेहमान केी पसनद के बजाय अप्नेी मरजेी केी डिश परोस रहे है ??…..
          क्या 24 घंटे “इस्लाम कुबूल करने की दावत” का रट्टा लगाये रहते हो ??
          कौन सा भाईचारा है इस्लाम मे ??
          कितनी बार मुसलमानो को अपने मुस्लिम भाइयो के लिये राहत-शिविर, दवाइया, सर छुपाने की जगह , मरने वालो के आश्रितो की रोजी-रोटी का इंतजाम करते देखा है ?? कभी नही !! हा, मरने-मारने और मार-काट के लिये हमेशा तैयार !! ….
          अनगिनत हिन्दू और जैन लोग शाकाहार मे यकीन रखते है और जीव-हत्या नही करते मगर आपका इस्लाम साल मे अनिवार्य रूप से बकरीद के नाम पर लाखो बेज़ुबां बकरे काट डालता है…तो जनाब शान्ति का मजहब कौन सा हुआ ??
          दूसरो की जान लेने वाला या दूसरो की जान बख्शने वाला !!…..माफ करना वासी साहब आपकी किताब मे कितनी अच्छी बाते लिखी हो मगर असलियत मे जो इस्लाम को मानने वालो का रवैया दिखता है उससे इस्लाम के बारे मे कोई जयदा अच्छी राय नही बन पाती ….इसलिये गैर मुस्लिमो की छोड़िये और अपने भूखे नंगे मुसलमानो की हालत सुधारने पर काम करना शुरु कीजिये जिनकी तादात करोड़ो और अरबो मे है….ये जिंदगी सुधार नही पा रहे और चले है परलोक सुधारने 🙂

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  • January 23, 2015 at 3:27 pm
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    वासी भाई जवाब तफ्सील से लिखता हु लेकिन बार बार बार पूछने पर भी आपने मेरे कई सवालो का जवाब नहीं दिया की जैसे शिर्क खत्म करने के लिए अच्छे भलाई सादगी ईमानदारी बराबरी का रास्ता क्यों ना अख्तियार किया जाए क्यों नहीं ? क्या आप अपनी व्याख्या में इस रास्ते को गलत समझते हे ? अगर आप मानते हे तो इस सम्बन्ध में आपने क्या किया हे ? या आपकी जानकारी में किसने कब कहा क्या किया हे जाकिर हो बुखारी हो या कोई भी हो किसने क्या किया हे ? क्या जो बाते इस्लाम की जो व्याख्या आप कर रहे हे वो बरेलवी शिया तो खेर छोड़ो देवबंद ने भी की हे कही दिखाइए ? देवबंद ने तो हिन्दुओ को काफ़िर भी ना कहने को कहा हे पिछले दिनों शायद ? और यहूदी शिर्क करता हे या नहीं ये भी बताय और बहुत बाते हे ———— जारी

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  • January 23, 2015 at 3:58 pm
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    वासी भाई कहते हे की ” जिसकी इस्लाम मे सख़्त मनाही है, और शरीयत के मुताबिक, उसे मृत्युदंड दिया जाना चाहिए. ” फ़ित्नों की जड़ यही मानसिकता हे तारिक फ़तेह फरीद जकारिया सुलतान शाहीन जैसे विद्वान कहते हे की ये सही नहीं हे सुलतान साहब लिखते हे ” सभी मसलक के उलेमा शरीयत को अल्लाह के हुक्म का दर्जा देते। वास्तव में यह पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वेसाल के एक सदी से अधिक के बाद विभिन्न विद्वानों द्वारा संकलित नियमों की एक इंसानी संरचना है जिसमें हमेशा परिवर्तन होता रहता है। उनके आदेश के परमात्मा की वाणी होने की कोई संभावना नहीं है। ” फरीद जकारिया का लेख पढ़े http://www.newageislam.com/hindi-section/quran-does-not-punish-blasphemy–%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%88%E0%A4%B6%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82/d/100999—————– जारि

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  • January 23, 2015 at 4:06 pm
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    वासी भाई जैसे हादसे पेट्रो डॉलर पीने वाले चंदा खोर कठमुल्लाओं के कारण हुए हे जब पैसा पेट में जाता हे तो इन्हे खुराफात सूझती हे पैसे की तासीर ही यही होती हे जब आप किसी से पैसा लोगे तो आपको कुछ ना कुछ रिजल्ट दिखाना ही होगा भले ही पैसा देने वाला रिजल्ट मांग भी ना रहा हो तब भी ? पैसा और वो भी बिना मेहनत का पसीने का पैसा कोई अच्छा नतीजा दे ही नहीं सकता में ना इस्लाम के प्रचार के खिलाफ हु ना पैसा लेने के भी क्योकि आखिरकार तो हर काम को पैसा चाहिए ही होता हे मगर मेने कहा ना की अगर ये पैसा अरब शेखो की मेहनत खून पसीने का होता और वो उसे देते तब जरूर वो अछा रिजल्ट देता लेकिन क्योकि ये मेहनत का नहीं हे बैठे बिठाए हे इसी कारण इस पैसे ने बहुत तबाही मुसलमानो के बीच फैलाई हे

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    • January 23, 2015 at 4:38 pm
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      यहाँ में दोष वासी भाई को नहीं दे रहा हु उसको दे रहा हु जिसने वासी भाई का ब्रेनवाश किया या फिर जिसने किया उसका किसने किया ? फिर उसका किसने किया जड़ में आपको पैसा ही मिलेगा ? ये पैसा अगर मेहनत का होता खून पसीने का होता तो यक़ीनन बढ़िया रिज़ल्ट देता मगर क्योकि आराम के हराम का हे इस कारण —- जारी

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      • January 25, 2015 at 2:18 pm
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        वासी भाई आप कहा हे खेर देखिये में फिर आपसे रिक्वेस्ट कर रहा हु की छोड़ दीजिये ये कठमुल्लाओं का दिखाया हुआ रास्ता इस रास्ते पर चल कर या तो आप बुरा करेंगे या कोई आपके साथ बुरा करेगा मतलब या तो आप शोषक बनेगे या शोषित मेरे ख्याल से दोनों ही मत बनिए हमारी बात मान लीजिये नार्मल हो जाइए निकाल दीजिये दिल से सारा मैल सही हे की आप में हम शिर्क को मेन मसला मानते हे ठीक हे लेकिन बात यही तो हे की इसका मतलब यही तो निकलता हे की मुसलमान ही इतना अच्छे बने की लोग उनसे इम्प्रेस होकर शिर्क करना छोड़ दे यही तो अल्लाह की दी हुई जिम्मेदारी हे यही तो परीक्षा हे लेकिन इस परीक्षा में आप खुद चलिए किसी को भी धमकी या उपदेश मत दीजिये आप खुद से अच्छे बनिए इस्लाम भी यही तो कहता हे की शराब ब्याज लूट दुनियादारी की हवस से दूर रहो सबको बराबर समझो यही तो हे आओ इस रास्ते पर चलिए आप अपना फ़र्ज़ निभाइए बाकी अल्लाह पर छोड़ दीजिये किसी के ठेकेदार मत बनिए फिर देखिये दुनिया और आख़िरत दोनों संवरेगी एक आपसे रिक्वेस्ट थी की आपने कहा था की आपने अपने भाई को जो पढ़ाई में अच्छा था उससे पढाई से उचटवा कर छोटा मोटा जाकिर नाइक साहब टाइप बनाने पर लगा दिया तो प्लीज़ उसे फिर से पढ़ाई में लगवा दीजिये साल दो साल पांच साल छूट भी गए तो कोई नी जब जागो तभी सवेरा . उमीद हे की आप बात समझेंगे मुझे आपकी फ़िक्र हे इसलिए कह रहा हु

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  • January 23, 2015 at 6:41 pm
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    वासी भाईजान कुरान पढ़ने से पहले मैं आपसे कुछ सवाल पूछना चाहता हूँ और उम्मीद करूँगा की आप पॉइंट बाय पॉइंट जवाब देंगे न की गोल मोल जवाब दे कर जवाब दे भी दिया और और सवाल ज्यूँ का त्यूं रह गया वाला रवैया अपनायेंगे जैसा की आपने शरद भाई और सिकंदर भाई के सवालों के साथ किया.

    > कुरान का प्रादुर्भाव कब हुआ और इसे किस ने किया.?
    > इस्लाम कब आस्तित्व में आया.?
    > इस्लाम के अस्तित्व में आने से पहले जो लोग पैदा हुए थे क्या उन्हें अल्लाह ने पैदा नहीं किया था.? अगर किया था तो उन्हें क्रूफ और शिर्क से कैसे बचाया.?
    > क्या अल्लाह सर्वशक्तिमान है.? अगर हाँ, तो वो क्रूफ और शिर्क करने वालो को इसका ख्याल ही उनके दिमाग में क्यों आने देता है.?
    > क्या ये अल्लाह की सिख है की बुरे मुसलमानो को अच्छे दूसरे धर्म वालों से अच्छा मनो.?
    > अगर अल्लाह इतना ही पावरफुल है तो वो बुरे मुसलमानो को अव्वल तो बुरा होने ही क्यों देता है और अगर हो भी गए तो उन्हें अच्छा क्यों नहीं बना देता.?
    > अगर कुरान में कुछ बदलाव नहीं किया जा सकता क्यूंकि वो अल्लाह का बनाया हुआ है तो अल्लाह के ही बनाये हुए इस दुनिया में इतना बदलाव क्यों आ गया और आप जैसे सच्चे मुस्लिमों ने उसे कुबूल कैसे कर लिया.?

    वैसे तो सवाल और भी बहुत सारे हैं, लेकिन इतने का ही जवाब आप दे दें तो मैं कम से कम इस्लाम और कुरान को समझना तो शुरू कर ही दूँ.

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  • January 23, 2015 at 10:52 pm
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    वासेी साहब जब क़ुरान का मूल ही स्पष्ट नही है तो फिर डिस्कसन आगे कैसे बढेगा ?

    क़ुरान को ईश्वर ने लिखा है ये कैसे मालूम होता है ….

    न हेी वासेी साहब 1,20,000 इस्लामी फ़रिशतो / पेगंबरो के बारे मे कुछ बता पाये….धयान दीजिये कि आपके लंबे-2 मेसेज मे कलम इस्लाम से जयदा दूसरे धर्मो के बारे मे चली है मतलब इस्लाम के बारे मे आपके पास मे बताने लायक जैसा कुछ भी नही है और सारी कोशिश सामने वाले की बड़ी लाइन को मिला कर अपनी चोटी लाइन को बड़ा साबित करने पर है ?? …..

    पहला ग्रंथ और अंतिम ग्रंथ की कल्पना का आधार क्या है “फिलहाल” आप इस पर रोशनी डालने मे नाकामयाब साबित हुए है ??….

    जब आप कहते है इस्लाम का शुध रूप 14 वी सदी पूर्व आरंभ हुआ पर जनाब इस्लाम के उस दौर से पहले वाले इस्लाम के दर्शन इतिहास के पन्नो पर दर्ज क्यो नही है ??

    काश वासेी साहब दिसकसन और अदियलपन का फरक समज्ह पातेः)…….

    ना हेी वे जन्नत और दोजख मे जाने केी योग्यता को हेी जस्तिफाई कर पाये ?? मुसलमान को जन्नत और गैर मुसलमान को दोजख्…मस्त लोजिक हेः)

    वासेी साहब अब आप “जियो और जेीने दो” वाले रासते पर चलने पर विचार शुरु केीजिये …

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