रेखा….अनकही कहानी….

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इस बहाने मगर देख ली दुनिया हमने….

कितना मुश्किल है। जिसकी जिन्दगी के पन्नों पर आप लिखने जा रहे है, वह आपसे बात ही ना करे। और उसकी जिन्दगी के पन्नों को जिसने संवारा हो, उससे भी आपकी कोई बात ना हो। फिर भी आप लिखे जा रहे हैं। पहले से कहे-लिखे गये पन्नों को अपनी दृश्टि से नये पन्नो पर उकेर रहे हैं और पढ़ने वाले पढ़े जा रहे हैं। तो ये किताब की सफलता है या फिर उस शख्स की जिसने अपनी जिन्दगी की अहमियत को जब समझा, अपने वजूद का एहसास नये रुप में किया तो खुद को कुछ इस तरह ढक लिया कि आजभी उस शख्स को देखते ही बहुतेरी अनकही कहानियां दिलो– दिमाग में ही जाती है । और उसके बारे में और जानने की चाहत चाहे अनचाहे उसके बारे में लिखे कुछ भी शब्दो में मायने खोजने को मजबूर करती है। जी, उस शख्स का नाम है रेखा। किताब का नाम है रेखा। भगवती चरण वर्मा का उपन्यास रेखा नहीं। बल्कि फिल्म अदाकारा रेखा पर लिखी गई यासिर उस्मान की पुस्तक रेखा। जिसने मना कर दिया कि उसपर लिखी जा रही किताब पर वह कुछ नहीं कहेंगी। जिसकी जिन्दगी में आये तीन शख्स। विनोद मेहरा । किरण कुमार । अमिताभ बच्चन। इनसे भी कोई बात इस किताब को लिखने के दौर में नहीं हुई। और जिस शख्स से विवाह फिर तलाक हुआ, उस शख्स मुकेश अग्रवाल के साथ बिताये बेहद कम दिनो के दौर को लिखते वक्त ही लेखक को हकीकत की जमीन मिली। कयोंकि किताब चाहे रेखा पर हो लेकिन मुकेश अग्रवाल से रेखा ने शादी क्यों कि और फिर शादी क्यों टूटी। उस दौर के किरदार जिन्दा भी हैं और दुनिया के सामने कभी आये भी नहीं ये भी सच हैं। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर रहे नीरज कुमार। बीना रमानी और सुरेन्द्र कौर। तीनों की मौजूदगी । तीनो की रजामंदी । तीनो ने ही उस दौर को देखा ही नहीं बल्कि उन हालातो में बराबर का सहयोग दिया जिसके बाद मुकेश अग्रवाल और रेखा की शादी हुई ।

लेकिन रेखा की जिन्दगी वाकई अनकहे सच को टटोलने की दिसा में बढते कदमो से ज्यादा कुछ नहीं । तो हर शब्द सस्पेंस की घुट्टी में डुबोने का प्रयास होगा। इससे इंकार कौन कर सकता है । मसलन मुकेश अग्रवाल ने खुदकुशी उसी दुप्पटे को गले में बांध कर की जो रेखा का प्रिय दुपट्टा था । तो किताब मुकेश अग्रवाल की जिन्दगी से शुरु होती है । और मुकेश की जिन्दगी पर पडे रेखा के तिलिस्म को धीरे धीरे उठाती है। और रेखा के बारे में एक सोच बनाने को मजबूर करती है । जाहिर है रेखा से कोई बात नहीं तो रेखा को चाहने वाले यासर उस्मान के शब्दो पर भरोसा भी कितना करें । लेकिन स्टारडस्ट से लेकर सिमी ग्रेवाल को दिये इंटरव्यू । 70 के दशक में मीडिया के सामने रेखा के बेलौस बयान । और जया भादुडी से लेकर जया बच्चन बनने के दौर में रेखा की दीदीभाई यानी जया से दोस्ती से लेकर दूरिय़ॉ बनाने-बनने की नकही दास्तन को अपने नजरिये से जिस तरह लेखक ने पन्नों पर उकेरा वह किसी सिनेमायी स्क्रिप्ट से ज्यादा नही तो कम भी नहीं है । क्योंकि जब लेखक से कोई संवाद किसी का नहीं है तो पढने वाले को लेखक की समझ या उसके दिमाग में चल रहे ताने-बाने के भरोसे ही चलना होगा । लेकिन दिलचस्प है रेखा के उन अनझुये पहलुओ को जानना जिसे रेखा खुद कभी जुबां पर ला नहीं पायी ।

कौन जानता है कि जया और रेखा दोनों ही जुहु अपार्टमेंट में रहते थे । कितनों को पता है कि जया को रेखा ने बहन मान कर बेहतीन सुझाव देने वाला माना। लेकिन अमिताभ बच्चन से शादी हुई तो जया ने रेखा को निमंत्रण तक नहीं दिया। कितनों को पता है कि रेखा का अमिताभ बच्चन को लेकर आकर्षण काम के प्रति अमिताभ की प्रतिबद्दता और अनुशासन को लेकर हुआ। फिल्म दो अनजाने की कलकत्ता में शूटिंग के वक्त ही अमिताभ ने अपने पुराने शहर को जीने निकले तो साथ संवाद बनाने के लिये सहयोगी अदाकारा रेखा ही थीं, जो कलकत्ता शहर से अनजान थी। तो संवाद बना । और कितनों को मालूम है कि अमिताभ-रेखा की सिनेमायी पर्दे पर कैमेस्ट्री से गुस्सायी जया ने रेखा के साथ अमिताभ का काम मुकद्दर का सिंदर के बाद बंद तो करवा दिया । लेकिन फिल्म सिलसिला में महज एक डॉयल़ॉग या कहें फिल्म के आखिरी सीन ने जया बच्चन सिलसिला में काम करने पर हामी भरवा दी। वह भी फिल्म की आखिरी सीन/डॉयलॉग, ‘ जया अस्पताल के बेड पर बेहोश लेटी है। डाक्टर-नर्स उसमें जान देने की कोशिश कर रहे है । तभी अमिताभ बच्चन ह़ॉस्पीटल पहुंचे है । कमरे से सभी को बाहर जाने के लिये कहते है और जया का ठंडा पड़ता हाथ अपनी हर्म हथेलियो में लेकर कहते है…शोभा मै वापस आ गया हूं..हमेशा के लिये …और जया धीरे धीरे आंखे खोल कमजोर जुबां से कहती है …मैं जानती थी..तुम वापस जरुर आओगे……और यहां प्यार पर विश्वास की जीत होती है । क्योंकि समूची फिल्म में जब रेखा और जया टकराते है तो संवाद रेखा के इसी डॉयलॉग पर आकर ठहरता है कि….आप अपने विश्वास के साथ रहिये, मुझे मेरे प्यार के साथ रहने दीजिये। ‘ कितने धूप-छांव रेखा की जिन्दगी में कब कैसे टकराये इन हालातो को पढने वाला किताब के रेफरेन्स से जोड कर समझ सकता है क्योकि किताब खुद को रेखा होने से बचाती है । लेकिन रेखा को रेखा होने से नहीं बचा पाती। इसलिये जयपुर में महान की शूटिंग के वक्त रेखा को लेकर कमेंट करने पर एक फैन से ही अमिताभ का उलझना या फिर फिल्म कुली में अमिताभ के घायल होने के बाद पुनीत के ये कहने पर, …..जिसकी सजा तुम हो मैंने वह गुनाह किया है । इस पर रेखा का कमेट…और कितने गुनाह करेंगें आप ।

लेकिन रेखा को बचपन से ना किसी ने संवारा । न किसी ने बचपन जीने दिया । तो किसी पहाडी नदी की तरह रेखा जीवनदायनी नदी के तौर पर देखी भी नही गई । इसलिये जब अमिताभ कुली की शूंटिग से गायल अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे थे । तब रेखा ने अमिताभ के अमिताभ की मदद की सोच फिल्म उमराव-जान का प्रिमियर रखा । खुद ही सारे निमंत्रण पर हस्ताक्षर किये । लेकिन फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं लोगों ने भी इसे अमिताभ के हक में नहीं माना । और प्रीमियर “ डेड और स्टारलैस “ हो गया । यूं रेखा की
जिन्दगी के पन्नो को सिनेमायी डॉयलॉग में खोजने की कोशिश बेमानी है । लेकिन लेखक ने ये हिम्मत दिखायी है । मसलन….खून-पसीना कै डॉयलॉग…तेरा हुस्न मेरी ताकत,तेरी तेजी मेरी हिम्मत…इस संगम से जो औलाद पैदा होगी, वह औलाद नहीं फौलाद होगी । या फिर गीत….तु मेरा हो गया, मै तेरी हो गई….। विनोद मेहरा के साथ फिल्म घर । उसका गीत…आपकी आंखो में कुछ……या आजतक प़ॉव जमीन पर नहीं पडते मेरे …। वैसे गुलजार ने रेखा की अदाकारी को देख कर यही कहा.कि….वह उस किरदार को लिबास की तरह पहन लेती है । शायद इसलिये मुज्जफरअली ने उमराव-जान बनने के बाद रेखा की जिन्दगी से गीत जुडा है तो किसी ने ना नहीं कहा……. , जुस्त-जु जिसकी थी उसको ना पाया हमने/इस तरह से मगर देख ली दुनिया हमने…..तो यासर उस्मान की किताब पढते पढ़ते खत्म हो जाये तो भी ये कुलबुलाहट तो बची ही रहती है कि रेखा क्या कभी खुद के बारे में खुलकर कुछ कह पायेगी…या फिर रेखा की नकही कहानी के नाम पर ऐसी किताब ही छपेगी ।

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11 thoughts on “रेखा….अनकही कहानी….

  • September 15, 2016 at 7:40 pm
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    रेखा को बहुत सुन्दर तो कहा ही जाता हे साथ ही उमरावजान जैसी फिल्म के साथ वो हमेशा के लिए अपनी छाप छोड़ ही चुकी हे उनके टाइम की या बाद की भी कोई हीरोइन कोई उमरावजान नहीं कर सकी हे मदर इण्डिया पाकीजा में नरगिस और मीनाकुमारी के बाद ज़ेहन में रेखा ही आती हे खेर रेखा की जीवनशैली और हावभाव से कुछ कुछ मनोरोग का सा भी आभास होता हे बड़े ही दुःख की बात हे की भारत की काबिल महिलाओ को सुखी पारिवारिक जीवन बहुत ही कम नसीब होता हे जया भादुड़ी की तरह सब छोड़ चढ कर घर संभाल तो ठीक वार्ना अधिकतर को शादी हो चाहे न हो ज़्यादातर इन्हें सुखी पारिवारिक जीवन नहीं मिलता हे थोड़ा बहुत सही जीवन मिलता भी हे तो वो भी दूसरी तीसरी बीवी होने की शर्त पर . इसकी वजह वही भारतीय मर्दो की ईगो हे जिस कारण इन काबिल औरतो की जिंदगी झंड होती हे बहुत दुःख की बात हे एक बेहद काबिल लेडी को में जानता हु मुझ पर उनका बड़ा अहसान हे खेर बेहद बेहद काबिल एजुकेटिड लेडी मगर सूना हे की चालीस आस पास के बाद भी उनकी शादी नहीं हुई हे ( अल्लाह करे जल्द हो जाए आमीन ) कारण सबका केस देखे तो मुझे यही लगता हे की की अपने से नीचे के पुरुष से ये शादी करे तो या वो अहसास ए कमतरी में मुब्तिला हो जाएगा या निकम्मा होकर इनकी क़ाबलियत पर मौज़ करना चाहेगा वही जो काबिल पुरुष होते हे वो भी इनकी क़ाबलियत से घबराते हे सोचते हे की ये काबू से बाहर ही रहेगी एक और बेहद लेडी को में जानता हु एकदम जीनियस लेडी उनकी शादी हो गयी दो बेटिया भी हे इन्हें मेने शादी से पहले 2009 में देखा था तब इतनी सुंदर थी की में देख कर एकबार को डिसबैलेंस हो गया था की भाई इतनी क्यूट और इतनी काबिल लेडी —– ? अब जब इतने सालो बाद देखा तो उनके चेहरे पर मुझे दुःख की परछाई दिखी शायद उन्हें उनके जैसा पति नहीं मिला होगा . लता मीना कुमारी मधुबाला सुरैया आशा जीनत परवीन रेखा प्रत्यषा और सेकड़ो नाम बहुत दिल दुखता हे इन महिलाओ के जीवन की ये ट्रेजडी देख कर

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    • September 17, 2016 at 1:26 pm
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      डॉक्टर से ऊंचा कोई पेशा नहीं होता हे अब सोचिये की डॉक्टर वो भी लेडी डॉक्टर वो भी एम्स जैसे जगह की सोचे कितनी काबिल होगी ? एम्स की एक डॉक्टर ने आज हसबेंड से दुखी होकर खुदखुशी कर लीकुछ दिन पहले भी शायद एम्स की ही एक लेडी डॉक्टर ने भी गे पति से तंग आकर सुसाइड कर ली थी . शायद हो यही रहा हे की भारत की काबिल महिलाओ को अच्छे जीवनसाथी नहीं मिल रहे हे भारत में ही ये समस्या इसलिए भी अधिक हे की इंसान इंसान के बीच जिस कदर दीवारे भारत खड़ी रही हे और आज तो और भी अधिक हे उससे ही शायद सही मैचमेकिंग नहीं हो पा रही हे आपको बहुत छोटे सर्किल में ही अपना साथी ढूँढना होता हे समाज के अलग अलग वर्गों के बीच ना कोई मेलजोल ही रहा हे और न कोई सवांद जाती धर्म इलाके की ही बात नहीं बात बहुत आगे बढ़ चुकी हे हर आय वर्ग के मोहल्ले लोकेशन सड़क स्कूल अस्पताल भाषा टीवी फिल्म संस्कर्ति मिजाज सोच सब कुछ अलग अलग हो चुके हे इतने पार्टिशन दुनिया में कही नहीं होंगे जितने आज भारत में हे इसी का खामियाज़ा शायद ये काबिल महिलाय उठा रही हे —- ?

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      • September 20, 2016 at 11:40 am
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        सुनन्दा पुष्कर जी जैसी सुन्दर और हाईप्रोफाइल लेडी का ही केस देखे तो कितने अरमानो से उन्होंने इस ”रॉकस्टार ” बुद्धजीवी , नेता शशि थुरूर से शादी की थी फिर कहते हे की चार साल उनका घर जंग का मैदान सा रहा उनके केस पर कुछ कमेंट https://khabarkikhabar.com/archives/1755

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      • June 3, 2017 at 6:33 pm
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        Mukesh Tyagi
        5 hrs ·
        हमदर्दी या गुस्सा?
        एक प्रतिभाशाली लड़की IIT में जाती है, पीएचडी करती है, दुनिया में उसके शोध लेख छपते हैं, किताब लिख रही है, दुनिया में भ्रमण किया है|
        पर 24 की उम्र में शादी कुंडली मिला कर करती है| पति बोलता है शोध बंद करो, 20 लाख दहेज़ लाकर मेरा कारोबार शुरू कराओ!
        अलगाव, पर तलाक (ख़ानदानी इज्ज़त का सवाल था!) के बजाय 28 की उम्र में ख़ुदकुशी!
        पिता का बयान है कि बेटी को पढ़ाने के बजाय पैसा दहेज़ के लिए इकठ्ठा करना चाहिए था!
        ऐसे पिता/ख़ानदान के लिए हमदर्दी कैसे हो, जिसके विचारों ने बेटी को संघर्ष की प्रेरणा देने के बजाय खुद को समस्या के लिए जिम्मेदार मानना सिखाया?
        बाकी हमारी महान विश्वगुरु ब्राह्मणवादी संस्कृति और संपत्ति बढ़ाने की हवस पर टिका पूँजीवादी समाज तो है ही|Mukesh Tyagi
        5 hrs ·

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      • August 26, 2017 at 7:24 pm
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        खुदा खेर करे ऊपर कमेंट में जो काबिल महिलाओ की जीवनसाथी की समस्या डिस्कस की , वो भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में हे बी बी सी की रिपोर्ट से पता चला . हमारी भी एक सिस्टर साइंस में पीएचडी कर चुकी हे और साफ़ दिख रहा हे की उसके लिए भी सही लड़का मिलना या ढूंढने में हमें दांतो से पसीना आ रहा हे क्या कर सकते हे . http://www.bbc.com/hindi/science-40515814

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  • September 16, 2016 at 9:16 am
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    सर आपका कोई ब्लॉग भी है क्या?

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  • September 17, 2016 at 11:50 am
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    बलबीर चौधरी जी खबर की खबर में आप का स्वागत है , कोई ब्लॉग नहीं है ! अगर आप कोई लेख भेजना चाहे तो भेज सकते है !

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  • June 4, 2017 at 10:59 pm
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    जब ईन्सान बुढा होता है तो ऊसका पुरा वजुद बदल जाता है. किसी समय मे वो स्वाधीन हुवा करता था तो शरीर के थकने के कारण वो पराधीन होने लगता है. हर वक्त ऊसे सहारे की जरुरत होती है. और एक वक्त ऐसा आता है कि ऊसका खाना पिना पेशाब शौच सब बिस्तर पर होने लगता है. और अंत मे वो मर जाता है. हाल ही विनोद खन्ना कि ऐसे ही बिमारी के कारण मौत हुवी.

    हर घर मै ऐसा कोई बुढा आदमी होता है. किसीके पिताजी, माताजी , दादाजी, दादी, नाना, नानी.

    ये बुढापे का डर हर इन्सान को सताता है. इसी डर के कारण हर कोइ बुढापे के लिये पैसा बचाने कि कोशीश करता रहता है. बुढा होने के बाद जिस पती पत्नी के पास पैसे नही होते है उन्हे उनके बच्चे तक छोड जाते है, पुछते नही है.

    इसी बुढापे के डर के कारण विवाह संस्था यानी शादी जैसी पद्धती का जन्म हुवा. क्युं की शादी के बाद स्त्री पुरुष समागम से जन्मी संतान कि तरफ बुढापे का सहारा ईस द्रिष्टीसे देखा जाता था. जो माता या पिता दोनो की सेवा करे.

    यही बुढापे का डर पती और पत्नी को बांधे रखता था. पती पैसा कमाये और पत्नी घर चलाये. अब उस जमाने मे कोइ यांत्रीक सुख सुविधाये नही हुवा करती थी जिस कारण वर्ष उस समय के लोगोकी दिन भर की खर्च होने वाली उर्जा ( Callory consumption value ) आज के दौर मे जिने वाले इन्सानो की तुलना मे शायद तिन या चार गुना थी. मतलब आज का इन्सान दिन भर जितना काम करता है उस से तिन या चार गुना जादा काम उस समय के मानवो को करना पडता होगा.

    ऊदाहरण के तौरपर दस या बारह किमी रोज पैदल चलना, बिना पंप के हात से कइ घागर पाणी कुवे से निकालना, या फिर पचास किलो वजनी तलवार जिसे हमारे समय के युवा एक हाथ से उठा नही सकते उससे घंटो युद्ध का अभ्यास करना. ये पुरुषो के काम हुवे.
    उस जमाने कि औरतो कि शारीरीक क्षमता आज के दौर के पुरुषोसे दुगनी तिगनी होती होगी. क्युं कि mixer, grinder, gas, washing machine ये काम हाथोसे करने मे बहोत ऊर्जा खर्च होती है.
    ईसी काम के तिन गुना चार गुना बोझ के कारण औरतो के हिस्से घर और पुरुषो के हिस्से पैसा कमाना आया होगा. आप एक साल के लिये प्रायोगिक तौर पर इस जिवन को अपना कर देख सकते हो.
    और इन सब मे बुढापे का डर अलग से.
    संसार आसान नही होता है. हर कोइ बडा आदमी या ओरत नही बन सकता है. दर्द और तकलीफ हर किसी के हिस्से मे होती है.
    यही जिवन है

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  • November 11, 2018 at 5:51 pm
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    पहले भी कई बार और पिछले तीन साल में ही दो बार हो चूका हे ” जो रात हमने गुजारी मरके वो रात तुमने गुजारी होती ” खेर —- तिवारी को सीट खाली पड़नी होंगी राइटिस्ट कम्युनल खेमे का सबसे बड़े विद्वान अब ये हे साला जीनियस हे
    ” Sushobhit Singh Saktawat23 hrs · “हज़ार राहें मुड़के देखीं”________________________________________
    वायलिनों की अंगड़ाइयों से भरा यह गीत क़यामत का इश्तेहार है।
    ये ऐसे मानीख़ेज़ बोलों की लड़ियों से सजा है कि एकबारगी जी करता है, उन ग़मों को ख़ुद गले लगा लें, जो इस गीत में बयान फ़रमाए गए हैं, ताकि इसी बहाने इन बोलों को जी सकें अपने भीतर। कुछ और नहीं तो यही हारा हुआ दिलासा।
    लता-किशोर का यह दोगाना है। गीत गुलज़ार ने लिखा और धुन ख़ैय्याम ने बांधी। साल 1980 में इस एक गीत ने किशोर और गुलज़ार को गायकी और शाइरी के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिलवाया था। और क्यों ना हो?
    परदे पर राजेश खन्ना और शबाना आज़मी। राजेश खन्ना सफ़ेद धुंए के पसेमंज़र यह गीत गाते हैं, शबाना आज़मी ललाई से भरे सांझ के आसमान की पृष्ठभूमि में। दोनों के थ्री-फ़ोर प्रोफ़ाइल और कभी-कभी क्लोज़अप इन धुंओं और रौशनियों के परदों पर हमारे सामने उभरकर आते हैं। दोनों उलाहने की लगभग सिनिकल और कटुतापूर्ण झोंक में एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराते अपनी नाकामियों का बखान करते हैं। कैमरा बार-बार एक से दूसरे के चेहरे की ओर कट होता रहता है।
    राजेश के चेहरे पर आत्ममंथन है। उम्र उनकी ढल गई है, किंतु जब-तब झिपने वाली पलकों में पुराना जादू रह-रहकर जाग उठता है। शबाना के चेहरे पर वही चिरपरिचित कातरता से भरा आत्मदैन्य, जिसने एक कोमल, करुण प्रेयसी के रूप में उनकी प्रतिमा अस्सी के दशक में अमर कर दी थी- “स्पर्श”, “मासूम”, “निशान्त” और “अर्थ” जैसी फ़िल्मों की महान नायिका।
    “जहां से तुम मोड़ मुड़ गए थे
    वो मोड़ अब भी वहीं पड़े हैं”

    राहों और मोड़ों और किनारों और कभी ना रुकने वाले सफ़र के मोटिफ़ का भरपूर दोहन करने वाले गुलज़ार ने इससे ठीक पांच साल पहले फ़िल्म “आंधी” के लिए वे जादुई पंक्तियां लिखी थीं-

    “इन रेशमी राहों में, इक राह तो वो होगी
    तुम तक जो पहुँचती है, इस मोड़ से जाती है।”

    “तुम तक जो पहुंचती है” में उम्मीद का जो दिया है, वो इस गीत में मायूसी के मील के पत्थरों तक पहुंचकर बुझ-सा गया है।

    “वो मोड़ अब भी वहीं पड़े हैं।”

    इस इत्तेला के दो मायने हैं। एक तो ये कि जिस मोड़ पर तुम मुझे छोड़कर आगे बढ़ गई थीं, मैं आज भी वहीं खड़ा हूं। तुम भूल गईं, किंतु मैं नहीं भूला हूं। उलाहने का तंज़ है इसमें। दूसरा यह कि अगर तुम चाहो तो लौटकर फिर आ सकती हो, मैं उसी मोड़ पर तुम्हारा इंतज़ार करता तुम्हें मिलूंगा। अब यहां पर उम्मीद का चराग़ है, जो राह के उस मोड़ पर जलाए रखा गया है।

    अगले ही पल नायिका का प्रत्युत्तर आता है-

    “हम अपने पैरों में जाने कितने
    भंवर लपेटे हुए खड़े हैं।”

    कि तुम तो मोड़ पर खड़े हो, किंतु वो सड़क कहीं जाती नहीं। ठहर जाना तुम्हारे लिए आसान है। मुझे देखो, मेरे पांवों से कितनी भंवरें लिपटी हुई हैं। मुझे जाने कितनी लम्बी दूरियां अपने बिना तय करना हैं। लेकिन तुम्हें इसका अंदाज़ा क्यूं कर हो?
    ग़रज़ ये कि पहली ही कड़ी से रंग जम जाता है।
    इस गीत में किशोर की आवाज़ में एक अनूठा सम्मोहन चला आया है। किशोर ने अपने सबसे अच्छे गीत अपने जीवन की आख़िरी दहाई में गाए। अस्सी के इन सालों में किशोर की आवाज़ में ठहरे हुए सोग़ का जो पर्वत उग आया था, उसे आने वाली अनगिन सदियों की धूप भी पूरा पूरा गला नहीं पाएंगी। वो बस धीरे-धीरे यों ही पिघलता रहेगा अपनी अनुगूंजों के भीतर, जब भी कोई उन गीतों के तवे बजाएगा- गाढ़ी, पुरदर्द, तनहा और क़ायनाती अफ़सोसों से भरी आवाज़ के चन्दोवे तले।

    “कहीं किसी रोज़ यूं भी होता
    हमारी हालत तुम्हारी होती
    जो रात हमने गुज़ारी मरके
    वो रात तुमने गुज़ारी होती।”
    जैसे कि ज़िद ठान ली हो, यह बतलाने की कि किसने ज़्यादा दु:ख झेला। तुम्हें क्या पता मैंने क्या सहा? ख़ूब पता है, लेकिन मैंने तुमसे ज़्यादा झेला है। टूटे दिलों की यह हारी होड़।
    हस्बेमामूल, जितना प्यार, उतने ग़म का यहां हिसाब है। बड़ी अजीब बात है कि प्यार का पैमाना दु:ख होता है। ख़ुशी से आप प्यार को नहीं माप सकते। ख़ुशी तो बड़ी बेमोल सी चीज़ है, जो केवल बाद में दु:ख में याद करने के काम आती है। सोग़ से ही प्यार की सही-सही नापजोख होती है। जितना सोग़, उतनी मोहब्बत। और इस गीत में जब दोनों यह बतलाना चाहते हैं कि मैंने तुमसे ज़्यादा दु:ख सहा, तो वास्तव में वे यह कहना चाह रहे होते हैं, कि मैंने तुम्हें ज़्यादा प्यार किया।
    ये मीठे गिले, ये दिलफ़रेब शिकवे, ये जले हुए अहसास केवल प्रेमियों के नसीब में बदे होते हैं, बाज़ार की ज़बान में ऐसी सिफ़त आपको ढूंढ़े ना मिले।
    “उन्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते
    हमें ये उम्मीद वो पुकारें।”
    कौन पहले पुकारे, कौन पहले बुलाए? प्यार में खटका इस बात का नहीं है कि जो पहले पुकारेगा, वह दूसरे से छोटा हो जाएगा। बड़े-छोटे के भेद से प्यार नहीं डरता। लेकिन वह इस बात से ज़रूर डरता है कि कहीं ऐसा तो ना होगा कि पुकार लौटकर ना आए, कोई जवाब ना मिले?
    क्योंकि तब मैं अपनी अनुत्तरित पुकार के साथ कैसे जीऊंगा। प्यार में सबसे बड़ा दु:स्वप्न यही है कि जवाब ना मिले तो क्या होगा? इसी पसोपेश में कही गई वह बात है।
    गीत की इस तीसरी कड़ी तक आते-आते उम्र दस-पंद्रह साल के फ़ासले को लांघ चुकी होती है। नायक ने मूंछें रख ली हैं और नायिका को चश्मा लग गया है। वही चौकोर फ्रेम का गुलज़ार वाला चश्मा।
    गुलज़ार ने ख़ुद वैसा चश्मा ताउम्र पहना और अपनी फ़िल्म के केंद्रीय नायकों, मुख्यतया जितेंद्र और संजीव कुमार को भी पहनाया। चौकोर फ्रेम के चश्मे और सफ़ेद कुर्ते में तब गुलज़ार की फ़िल्मों के नायक उनकी ही प्रतिकृति दिखाई देने लगते। अति तो तब हो गई, जब उन्होंने अपनी नायिकाओं को भी वैसे चश्मे पहना दिए- “अंगूर” में दीप्ति नवल, “इजाज़त” में रेखा, ग़नीमत है “ख़ुशबू” में हेमा को उन्होंने बख़्श दिया।फ़िल्म “थोड़ी-सी बेवफ़ाई” गुलज़ार ने नहीं बनाई थी, वे केवल इसके गीतकार थे, किंतु शबाना को वैसा ही चश्मा पहने देख एकबारगी हम सोच में डूब जाते हैं कि शायद गुलज़ार इस फ़िल्म के गीतकार से कुछ बढ़कर ही रहे होंगे।
    “उन्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते
    हमें ये उम्मीद वो पुकारें
    है नाम होंठों पे अब भी लेकिन
    आवाज़ में पड़ गई दरारें।”

    अगर मैं हिंदोस्तां का ज़िल्ले-इलाही होता तो मुनादी पिटवा देता कि यह फ़िल्म देखने वाले ख़ाली हाथ ना जाएं, वे अपने साथ सोने की अशर्फ़ियां लेकर जाएं, वे गिन्नियां आपको सिनेमाघर के दरवाज़े पर मुहैया करवा दी जाएंगी। शर्त केवल इतनी है कि फ़िल्म में जब यह गीत बजे तो इन पंक्तियों पर परदे पर आपको सोने के कलदार उछालना होंगे।

    कि लाल-जवाहर में तौला जाए, इससे भी बढ़कर है यह बयान।

    “है नाम होंठों पे अब भी लेकिन
    आवाज़ में पड़ गई दरारें।”

    बालों में चांदी आ गई लेकिन तुम्हारा नाम आज भी मेरे होंठों पर है, मैं आज भी उसी मोड़ पर खड़ा हूं। ये और बात है कि पुकारने की ही सूरत अब नहीं रही। पुकारना चाहता हूं लेकिन पुकार हलक़ में घुटकर रह जाती है। हालात साथ नहीं देते। ज़िंदगी रास्ता रोक लेती है। कि अब आवाज़ में ही दरार पड़ गई है।

    निपट उदासी, तनहाई, लाचारी और मायूसी से निकला गाना है यह। गीत का एक-एक बोल नूर की बूंद है। आवाज़ की एक-एक करवट क़यामत है। ख़ैय्याम साहब ने क्या ही जांलेवा धुन बांधी है कि हीरा चाटकर मर जाने को जी होता है।

    जिनके नसीब में ज़िंदगी ने ऐसे ही हालात लिखे हैं, वे “लूप” में इस गाने को सुनते हैं, चश्मे को पेशानी पर चढ़ाकर, आंखें मूंदे, अंधेरे बंद कमरे में।

    और जो कमनसीब ग़मों के इस लुत्फ़ से महरूम हैं, वो दुआ मांगते हैं कि हमारी ज़िंदगी में वैसा ही गाढ़ा कोई सोग़ आकर ठहर जाए, ताकि और कुछ नहीं तो कम-अज़-कम इस गीत की शिद्दत को तो हम पूरी तरह जी सकें।

    और कुछ नहीं तो इतना तो कर सकें।

    ये चाक-जिगर की बज़्म है साहेबान, यहां ग़मों के मौसम सदाबहार हैं, यहां सोग़ का जश्न मनाया जाता है, यहां यह गाना रूह के सबसे गहरे सुर के साथ गाया-गुनगुनाया जाता है। यह टूटे दिल वालों की मेहफ़िल है, हुज़ूर।

    “हज़ार राहें मुड़के देखीं
    कहीं से कोई सदा ना आई।”

    आमीन, आमीन, आमीन। ”

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  • January 2, 2019 at 11:11 am
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  • January 3, 2019 at 6:50 pm
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    Chandrashekhar Joshi
    2 hrs ·
    इक रेखा थी

    जनाब अद्भुत थी। पहले दुबली-पतली-सीधी थी, दिखने में सुंदर थी, ज्ञान का आधार थी। बाद में नजरों की माफिक टेड़ी हुई, लंबी हुई, मोटी हुई और बंटवारे का हथियार बनी।
    …गणितज्ञ भास्कर द्वितीय ने जब रेखाओं के गणित पर किताब लिखी तो उसका नाम लीलावती रखा। नाम की सुंदरता के अनुरूप इसकी भाषा भी ललित थी। उन्होंने बच्चों को गणित समझाने के लिए किताब में बार-बार हे लीलावती लिखा। कहा तो यह भी जाता है कि उनकी बेटी का नाम लीलावती था, जो भी हो 11वीं शताब्दी के मध्य में छपी इस किताब को आज भी गणित का मूल माना जाता है। रेखा से ही ज्यामिति बनी। ज्यामिति ने भारत में गजब तरक्की की। खगोल विज्ञानी लाप्लास ने कहा था कि हिंदुस्तानियों ने हमें संख्याओं को 10 चिन्हों के जरिए प्रकट करने की युक्ति सिखाई।
    …जब धरती पर निजी संपत्ति जैसी कोई चीज नहीं हुआ करती थी, तब रेखा बहुत काम की चीज थी। इसने मानव को दिशा का ज्ञान कराया। ग्रह-नक्षत्रों की गति, सुबह और शाम, समय और मौसम का अंदाज लगाने के लिए रेखा बड़ी युक्ति थी। गणना का यह तरीका बाद में रेखा गणित कहलाया। कदीम हिंदुस्तानी अजब थे। वह सूक्ष्म बातों पर मंथन किया करते थे। प्राचीन काल में वैदिक वेदियों पर चित्र उकेरने के लिए भी रेखा और बीज गणित का उपयोग किया जाता था। रेखा के शुरुआत के बिंदु को शून्य मानने का आविष्कार भारत में ईसा से दो सौ साल पहले हो गया था। शून्यांक ने गणित को गजब की रफ्तार दी। समकालीन यूनानी गणितज्ञ जब जोड़-घटाने की जटिल विधियों में उलझे थे तब भारत के बुद्धिमानों ने रेखा से त्रिभुज और आयत, वर्ग, मूल, घनमूल की आसान विधियां खोज ली थीं। प्रसिद्ध ज्योतिर्विद आर्य भट्ट 499 ई. में जब महज 23 साल के थे तो उन्होंने ज्योतिष और गणित पर एक किताब लिख डाली। कहा जाता है यही किताब बीज गणित के विकास का आधार बनी। उनके बाद भास्कर प्रथम और ब्रह्मगुप्त ने बीजगणितीय राशियों और समीकरणों पर किताबें लिखीं। 600 ई. के मध्य तक गणित की बारीकियों को समझने के लिए भारत में अथाह मेहनत हुई। उस जमाने की भास्कर द्वितीय की लीलावती किताब मौलिक गणितीय ज्ञान के लिए जानी जाती है।
    …ऐसा बताते हैं कि आठवीं सदी में भारत के कई विद्वान खलीफा अलमंसूर के दरबाद में बगदाद गए। यह लोग अपने साथ गणित और ज्योतिर्विज्ञान की किताबें भी ले गए। इसके बाद आर्य भट्ट की किताब का अरबी तरजुमा सामने आया। अरबों ने इस ज्ञान को बहुत इज्जत दी। अरबी में अंकों को अब भी हिंदसा कहा जाता है। यह माना गया कि अंकों की खोज हिंदुस्तान में हुई थी। अरब देशों से व्यापार के साथ मध्य एशिया और स्पेन तक भारत का गणित पहुंचता चला गया। गणित में भारत की प्रगति लंबे समय तक जारी रही। लंदन के प्रसिद्ध गणितज्ञ प्रो. हार्डी के जमाने में भी एक असाधारण बुद्धि के रामानुजन ने गणित के समीकरणों को आगे बढ़ाया। यह विद्वान युवा न जाने गणित को कितना आगे बढ़ाते पर केवल 33 साल की उम्र में उनकी तपेदिक से मौत हो गई।
    …कालांतर में रेखा के साथ बहुत अभागी परिस्थिति भी पैदा हुई। जब मानव जाति ने निजी संपत्ति बनानी शुरू की तो धरती पर रेखाएं खिंचने लगीं। यह संपत्ति के विभाजन का हथियार बन गई। रेखा पर दीवारें बनीं, दीवारें चारों ओर घिर गईं। घर बने, देश और राज्य बने, दीवारों पर फिर कांटे लगे। रेखा से मानव के बीच भी बंटवारा हो गया। एक मानव दूसरे की संपत्ति बना, रिश्ते भी रेखा से घिर गए। रेखा लांघने पर संघर्ष शुरू हुए। रेखा जीतने के लिए हथियारों का इस्तेमाल बढ़ता चला गया। इस मारकाट में रेखा का ज्ञान से महत्व हटता गया और इसका उपयोग संपत्ति हड़पने में होने लगा। ये कारनामे सदियों से जारी हैं। एक खतरनाक मोड़ तब आया जब धरती के अथाह भूभाग समेटे जाने लगे। प्रकृति और जीवन को अपनी संपत्ति बनाने वालों ने साम्राज्य बना डाले। साम्राज्यवादियों ने फिर से रेखाएं खींचनी शुरू कर दी।
    …अफ्रीकी भूभाग में रेखा खींचकर बंटवारे की खतरनाक वारदातें इतिहास का हिस्सा हैं। यूरोप के पास का यह विशाल महाद्वीप 19वीं सदी से पहले अंध महाद्वीप के नाम से जाना जाता था। यहां रहने वालों का बाहरी दुनिया से संपर्क बहुत कम था। यूरोप के व्यापारी अफ्रीका के समुद्री इलाकों में जाकर हब्शियों को पकड़ लाते और उन्हें बेच दिया करते थे। कुछ समय बाद यूरोप के साम्राज्यवादियों की नजर यहां की उत्पादकता पर टिकने लगी। अफ्रीका के बंटवारे पर कई देशों में हाथापाई शुरू हो गई। आपसी लड़ाई से बचने के लिए लुटेरों के बीच अफ्रीकी संपदा और वहां की मानव जाति को आपस में बांट लेने की कोशिशें कीं। 18वीं सदी से शुरू हुई जंग 1884 में रेखा डाल कर जीत ली गई। बर्लिन सम्मेलन में करीब आधा दर्जन साम्राज्यवादी देशों ने टेबिल पर बैठ कर अफ्रीका के नक्शे पर रेखाएं खींच दीं और ताकत के अनुरूप हिस्से ले लिए। अफ्रीका के उत्तर-पूर्व और उत्तर-दक्षिण के नक्शे पर देशों की सीमाएं एकदम सीधी रेखा हैं। कहा जाता है कि इस कारनामे में लाखों घरों की छत भी दो देशों में बंट गई। मानव जाति को आगे बढऩे की राह दिखाने वाली सुंदर रेखा ऐसी कुरूप बनी कि हर सीमारेखा कंटीले तारों से घिर गई।

    …जमाना ऐसा आएगा, हर लूट की रेखा टूटेगी…

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