राष्ट्रवाद और सेना के नाम पर कुछ भी ठेले जाओगे क्या?भुज और शेरशाह टिप्पणियां!

 सुरेश  चिपलूनकर

भुज द कूड़ा कल रात बड़ी उम्मीदों से “भुज” फिल्म देखी.शुरुआती आधे घंटे में ही फिल्म “”अन-झेलेबल” हो चुकी थी. फिर भी इस उम्मीद में बैठा रहा कि शायद आगे कुछ अच्छी कहानी, अच्छी पटकथा देखने को मिल जाए..लेकिन नसीब फूटा ही रहा… = संजय दत्त एक छोटी सी कुल्हाड़ी से 200-250 पाकिस्तानी सैनिकों को ऐसे काट रहे जितनी तेज तो हम धनिया-मिर्ची भी नहीं काट सकते… = VFX से पैदा किए हुए चीते को शानदार मेकअप वाली सोनाक्षी सिन्हा एक ही झटके में जैसे मार गिराती हैं, उसे देखकर मुझे कई बार अजय देवगन के निर्माण कार्य पर शक हुआ. फिर वही सोनाक्षी सिन्हा “मोटिवेशनल स्पीकर” बन्ने का घोर असफल प्रयास करती दिखती है… जब दर्शक उसकी इस घटिया एक्टिंग को भूलने का प्रयास कर ही रहे होते हैं… उतनी देर में वो दो गाने और नृत्य भी झिला डालती है… = उसके बाद अंत में उस समय दर्शकों पर कहर बरपाया गया

. जब एक मालवाहक विमान का पहिया टूट जाने पर उसे एक ट्रक के पिछले हिस्से में लैण्ड करवाया गया… फिर वह ट्रक और वह भारीभरकम जहाज, अजय देवगन साहब अपने जलते पहियों के साथ इतनी दूर ले जाते हैं, जितनी दूर आप अपनी पंचर बाईक को पैदल भी नहीं ले जा सकते… = फिर जैसे ही पाकिस्तानी सैनिकों ने बड़े ही बचकाने और फूहड़ तरीके से पीछे हटना शुरू किया… वैसे ही मैंने भी सोफे पर अपनी पोजीशन को समेटना शुरू कर दिया… इस तरह 15 अगस्त शुरू होने से पहले ही ख़त्म करना पड़ा… पता नहीं इतनी शानदार “असली घटना” को किस लेखक ने, किस निर्देशक ने इतना कूड़ा किस्म का बना दिया??  माना कि फिल्म थिएटरों की बजाय मजबूरी में OTT पर रिलीज हुई है, लेकिन हमें उसके भी पैसे तो लगते हैं ना?? अगर ये फिल्म टॉकीज़ में लगती, और हमारी जवानी के दिन होते, तो सीटें निश्चित फाड़ी जातीं, और आगे की सीट पर बैठने वाले को दो-चार लात जरूर लगती… यानी अब राष्ट्रवाद और सेना के नाम पर कुछ भी ठेले जाओगे क्या?? 

  अभिषेक  श्रीवास्तव 

देशभक्ति का सौंदर्य चला गया है। ऐसा सब हो हो हो हो किए हैं कि देशभक्ति की फ़िल्म बनाने वाले भी नकली माल परोसने लगे हैं। ‘शेरशाह’ देख के एकदम मन खराब हो गया है। अब कोई पूछ ही देगा- देखे क्यूँ? अव्वल तो किआरा अडवानी के लिए देखे थे। ईमानदारी से। कुछ नहीं दिखा। बाकी जो कुछ था ऐसा अद्भुत घटिया, नकली और भोंडा था कि क्या कहें। देशभक्ति की फ़िल्म आदमी को देशद्रोही बना दे, ऐसी है ‘शेरशाह’! अब ‘भुज’ आ रही है, वो भी निपटानी पड़ेगी। इतना काम है कि कोई काम नहीं हो रहा और आदमी पिक्चर देख के ही दुखी हो जा रहा है। 

अभिषेक  श्रीवास्तव नाकाबिल-ए-बर्दाश्त किसे कहते हैं, जानना हो तो ‘भुज’ देखिए। शुरू के दस मिनट 1971 के युद्ध का जो वीडियो गेम दिखाया है उसे आप झेल गए, तब घटिया फिल्में देखने में मुझसे बाज़ी लगा सकते हैं। मतलब, ज़रूरत क्या थी इसे बनाने की? राजनाथ सिंह के साथ तो ऐसे ही फोटो खिंचवा सकते थे ज़ुबां केसरी? पहले वीडियो देखें, फिर दो तीन सवालों पर सोचें।क्या नापाम (napalm) बम में सुतरी लगा के माचिस से उसे उड़ाया जाना संभव है? क्या फुल स्पीड में उड़ रहे फाइटर प्लेन को एक सामान्य ट्रक के पिछवाड़े में लैंड करवाना संभव है? क्या 1971 में पाकिस्तान में किसी भारतीय जासूस को आधा ज़मीन में गाड़ कर पत्थर से मारा जाता था? क्या पूरी सजावटी वर्दी में एयर फोर्स का सीओ रैंक का अधिकारी किसी hideout पर छापा मार के अकेले दस लोगों का कत्लेआम कर सकता है? क्या रणछोड़ रबारी ने वाकई एक कुल्हाड़ी से अंत तक पाकिस्तानी फौजियों को मारा काटा था जबकि सारे भारतीय सिपाही मारे जा चुके थे? क्या कच्छ में जैसलमेर जैसी नरम रेत वाला रेगिस्तान होता है? क्या बिना किसी किरदार को एस्टेब्लिश किये बगैर हवा में दो घंटे की फ़िल्म बनायी जा सकती है? क्या हो रहा है देशभक्ति के नाम पर? ऐसे कैसे बनाएंगे लोगों को देशभक्त? ऐसा भी क्या फौजी अनुशासन कि बम धमाका होने, प्रकाश होने, आवाज़ होने के कुछ सेकंड बाद एक साथ तीन लोग बिल्कुल सिंक्रोनिक स्पीड  से चौंकें? फिर से वीडियो देखिए और सोचिए! और बाई द वे, ओटीटी प्लेटफार्म पर ये नूरा फतेही वाला गाना क्यों गड़प कर दिया गया जिसका इतना प्रचार हुआ था? 

  सिकंदर हयात   – अंदाज़ा यही होता हैं की भाजपाई माइंडसेट का ही आसानी से दोहन करने के चक्कर  में बिना  किसी मेहनत  के ये फिल्मे बनायीं गयी——–?  .  मगर भाजपाई आई टी सेल सोशल मिडिया के लोगो  में ही दोनों फिल्मो के प्रति  ज़रा  भी उत्साह देखने को नहीं मिला  ————-?  बनाने वाले ये भी भूल गए ज़रा  ध्यान रखे की ये  भाजपा का  नया हैं  भाजपाई दर्शक   .   

 बीजेपी की गंदी राजनीती     गोदी  मिडिया आई टी सेल  wtsup yuniversiti की मेहनत के कारण  भाजपाई दर्शक आज  चीन पाकिस्तान से भी अधिक  भारतीय मुस्लिम के विरोधी  हो चुके हैं  ,  उन्हें  अब सभी विपक्षी दल  कांग्रेस वाम  tmc सपा वगैरह    और ndtv  या   कोई भी  ऐसा मीडिया जो वास्तव  में मीडिया ही हो  , और मानवाधिकार कार्यकर्त्ता लेखक बुद्धिजीवी   ,    भारतीय  मुस्लिम और ईसाई ( और  किसान आंदोलन की खीज  में अब  कही कही दबी जुबान से सिख भी   ) ये सब देश के  पहले   दुश्मन लगने लगे हैं     यानी पूरा भाजपा माइंड  ये ऐसे फुटबॉलर  बन चुके हैं  जो   विरोधी के बजाये अपने ही गोल पोस्ट  में गोल कर कर के फुटबॉल का  चैम्पियन  खिलाडी खुद को दिखाना  यही सब अब पुरे  भाजपाई सिस्टम को अब अधिक सटीक और किफायती  लगने लगा हैं  .  उन्हें गोल से मतलब हैं चाहे अपने ही गोल में  ही सही गोल तो गोल हैं ऐसी उनकी  सोच सेट हो चुकी हैं .   उधर भाजपा ने भी एक पूरा लोकसभा  चुनाव जो हारा हुआ लग रहा था ———–? उसे पुलवामा पाकिस्तान के नाम पर जीत लिया  था अब लगता  नहीं हैं की  वो भी अगले चुनाव में पाकिस्तान की ही  बासी दाल  बासी कढ़ी  ही अपने वोटरों को परोसेगी —————?   सो   दक्षिणपंथी  दर्शको को आसानी से  आकर्षित करके पानी में पकोड़े तलने  के लिए बनायीं गयी  दोनों  फिल्मो    ने शायद पहले ही दिन दम तोड़ दिया हैं —————?

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