‘ रश्दी- तस्लीमा का रास्ता गलत इसलिए हे !

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पाठको हिंदी नेट के बड़े ही विद्वान लेखक और पत्रकार संजय तिवारी जी ने एक बहस में हमसे सवाल किया हे की तस्लीमा और रुश्दी का रास्ता गलत कैसे है? हम अपना जवाब यहाँ दाखिल कर रहे हे – देखिये जितना हम जानते हे तस्लीमा रश्दी गैर पारिवारिक अराजक जीवन जीने वाले शराबी कवाबी लोग हे ठीक हे अब इन्हे इस्लाम पसंद नहीं हे तो फिर में कोई जाकिर नाइक साहब नहीं हु जो इस्लाम छोड़ने की सजा मौत बताऊ नहीं तुम्हारी मर्जी क्योकि जितना हमने समझा हे की इस्लाम में सब कुछ नीयत पर हे की आपकी नीयत क्या हे ? नीयत सही तो बस सही अगर आप एक एक एक सिर्फ एक निराकार अल्लाह -ईश्वर को मानते हे तो ठीक हे नहीं मानते तो बस बात खत्म अगर तस्लीमा रश्दी को इस्लाम पसंद नहीं था तो फिर इस्लाम त्याग कर ये कोई और धर्म – विचार अपनाते एक आदर्श या ठीक ठाक पारिवारिक जीवन जीते ( क्योकि बात आम आदमी को ही समझानी हे आम आदमी यानी एक सामान्य बीवी बच्चो परिवार वाला आदमी ) फिर अपनी कलम से बिना किसी की दिलाजारी के ये बताते की इस्लाम में हमें ये ये ये बात सही नहीं लगी थी और तब तो हमारा जीवन ऐसा ऐसा ऐसा था और अब देखो हम कितना बेहतर इंसानियत वाला जीवन जी रहे हे ? ऐसा करते तब भी एक बात थी लेकिन नहीं जाहिर हे की आप भी जानते होंगे की ये गैर पारिवारिक अराजक लोग हे यानी लब्बो लुआब ये हुआ की न धर्म फेथ को ही मानते हे न कोई ज़रा भी आदर्श पारिवारिक सामाजिक जीवन जीते हे तो हम इन्हे इनके रास्ते को आम लोगो को कैसे कोई आदर्श या कुछ सही ही बता दे ? बता ही नहीं सकते हे भई . और फ़र्ज़ करे किसी के लिए ये आदर्श हो भी तो खास लोगो या अमीर लोगो के या गैर पारिवारिक लोगो के हो भी सकते हे ? उनकी बात उनका जीवन अलग होता ही हे मगर हमारे लिए आम बिलकुल आम आदमी ही महत्वपूर्ण हे हम तो उसे ही अपनी बात समझाना चाहते हे उसी की समस्याएं उसी की बेहतरी के लिए सुलझाना चाहते हे इसलिए तो हम कहते हे की तसलीमा हो रश्दी हो या अब हमारे ये ताबिश भाई हो ये थोड़े ही न कटटरपन्तियो को कोई कमजोर कर पाएंगे नहीं बल्कि इनसे तो उल्टा कटटरपन्ति मज़बूत ही होंगे क्यों ?

देखिये पुराना जमाना अलग था मगर अब आधुनिक जीवन में काफी सालो से ये हो रहा हे की बहुत ही ज़्यादा महत्वपूर्ण होती हे फंडिंग फंडिंग पैसा पैसा कितना किसे कहा से किसलिए कब कितना आ रहा हे आज हर सांस जीने को पैसा लगता हे अब देखे की उपमहादीप में सारा तालिबान कटट्रपंथ उलजुलूल धर्मप्रचारकों भारत में बाबाओ की फ़ौज़ पाकिस्तान कश्मीर पंजाब में आतंकवाद पैदा होने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पेसो की रही हे ऐसे ही अगर अरब देशो में तेल न निकला होता तो ना इज़राइल बनाया जाता न कभी बेमतलब इराक पर हमला होता न तालिबान ना मुस्लिम कटटरपन्तियो की फ़ौज़ पैदा होती ( इसीलिए मेने ये बात भी रखी की बहुत जरुरत होते हुए भी एक शुद्ध सेकुलर भारतीय मुस्लिम वर्ग सबसे कमजोर रहा हे क्योकि उसे कही से भी फंडिंग या सपोर्ट के कोई आसार ही नहीं दीखते आये हे ) अब तस्लीमा रश्दी और ताबिश साहब के लेखन से क्या होगा ? ऐसे लेखो को तो दिखा दिखा कर पेट्रो डॉलर के ढेर ( ढेर – भविष्य में भी अभी कई साल ) पर बैठे अरब शेखो से और ज़्यादा फंड लिया जा सकता हे ये कहकर की ”देखो देखो इस्लाम पर कैसे हमले हो रहे हे कैसे ताबिश साहब जैसे मुस्लिम नौजवानो का ईमान डांवाडोल हो रहा हे हमें इनसे टक्कर लेनी हे इस्लाम खतरे में हे लाओ लाओ हमें और फंड दो हम अपनी गतिविधिया और तेज़ करेंगे ” पैसे के बाद चाहिए होती हे मेंन पावर ( लोग ) उसमे भी सोने पर सुहागा की अगर तमाम मुश्किलें झेल रहे लोग हो तो .

आबादी जिसकी की इस एशिया और दक्षिण एशिया में जरा भी कमी हे भी नहीं हे ना फ़िलहाल भविष्य में ही दिख रही हे और बात ये हे की तस्लीमा रश्दी हो या कोई और ये नास्तिक लोग हे ईश्वर को नहीं मानते ठीक हे मत मानो हमें भी इनपर समय नहीं खराब करना हे लेकिन हम इनके रास्ते को सही भला कैसे बता सकते हे ? अगर ये इस्लाम को नहीं मानते ईश्वर को नहीं मानते तो ईश्वर नहीं हे तो बस तो फिर तो यही दुनिया सब कुछ हे सब कुछ यही हे जब सब कुछ यही हे तो फिर बस यही हे की बस भोगो और भागो क्योकि बस यही दुनिया हे फिर सब खत्म हे भोग सको तो भोग अब जब ऐश आराम विलास भोगना ही हे तो केसा परिवार ? केसा समाज ? कैसी जिम्मेदारिया ? कैसे बुजुर्ग क्यों भला उनकी सेवा में समय खराब ? कैसे पुरखे कैसे उनकी यादे उनकी कब्र उनकी बात उनकी याद उनका श्राद्ध सब बेमतलब सब बेमानी तो मतलब फिर तो अराजकता हे भोगो भागो यही जीवन तो हुआ फिर . तो हम भला कैसे इस रास्ते को सही और आदर्श बता सकते हे कभी भी नहीं बता सकते हे इसलिए हम तो अल्लाह ईश्वर पर पूर्ण आस्था रखते हे कठमुल्लशाही कटरपंथ साम्प्रदायिकता जंग लड़ाई दंगे पंगे के हम भी सख्त खिलाफ हे मगर कठमुल्लशाही कटरपंथ साम्प्रदायिकता की खरपतवार को काटते काटते हम ये नहीं करेंगे की आस्था के सुन्दर शीतल छाया देने वाले वर्क्ष पर या उसकी जड़ो पर ही कुल्हाड़ी चलाना शुरू कर दे नहीं हम ये नहीं होने देंगे पेड़ का भी पूरा ध्यान रखेंगे और खरपतवार भी काटेंगे हो सकता हे की आप कहे की जैसा मेने ही ऊपर कहा हे की वेस्ट या श्वेत समाज में हर जगह फेथ की जड़े कुछ हिला सी दी गयी हे फिर भी वहा तो अराजकता नहीं हे सही हे लेकिन पहली बात तो फेथ की जड़े हिलने से वहा भी परिवार और समाज की जड़े हिली ही हे व्यक्तिवाद बेहद बढ़ा हे टूटे बिखरे परिवार शराबखोरी आदि की समस्या का कोई समाधान क़िसी को नहीं सूझ रहा हे लेकिन वहा इतना बुरा हाल इसलिए नहीं हे की एक तो पैसा बहुत हे फिर वहा आबादी कम हे तो इस कारण उनका तो काम चल रहा हे आबादी काम होने से उन्हें फायदा हे वो लोगो का काफी ध्यान रख सकते हे आबादी कई देशो की जमुना पार की दिल्ली से भी कम हे तो उनका तो ये हे लेकिन अगर वही हमने किया तो तो यहाँ तो पैसा भी कम हे आबादी बहुत ज़्यादा हे यहाँ तो अराजकता आ जायेगी कम्युनिसम का प्रयोग भी इसीलिए असफल हुआ की इस्लामिक कटटरपन्तियो की हिंसा से कई गुना अधिक हिंसा के बाद जब दुनिया में कम्युनिस्ट समाज तो अस्तित्व में आया जिसमे कुछ बराबरी भी थी शोषण भी कम था मगर ये प्रयोग फेल हो गया क्यों की ना तो जनता को आर्थिक विकास का भोग मिला ना ही आध्यात्मिक विकास पूजा पद्धति की शांति और आनद मिला नतीजा कम्युनिसम भी उखड गया तो इन्ही सब बातो को देखते हुए हम मुस्लिम समाज के लिए रश्दी तस्लीमा के विचारो को ख़ारिज करते हे एक ऐसा समाज बनाने की चाहत रखते हे जिसमे फेथ भी हो लॉजिक भी हो विकास भी हो जितनी बिना हिंसा के अधिकतम हो सके बराबरी भी हो ईश्वर पर आस्था भी हो भोग विलास के लिए पागलपन भी ना हो यानी आद्यात्मिक विकास भी हो जीवन का आनंद भी आख़िरत की तैयारी भी हो यही चाहते हे आमीन

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24 thoughts on “‘ रश्दी- तस्लीमा का रास्ता गलत इसलिए हे !

  • December 30, 2014 at 7:07 pm
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    वहाब साहब

    आप के इस लेख ने आप की छवि सुधरने में जरूर मदद करे गई नहीं तो ऐसा लगता था के आप और अफज़ल साहब सिर्फ इस्लाम और मुसल्मान्न के खिलाफ लिखते है . अच्छा लेख है और अच्छी कोशिश है .

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    • December 31, 2014 at 10:00 am
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      क्या बात हे हमने कुछ लिखा और वहाब साहब से जूते भी नहीं खाय आज तो जीवन सफल हो गया

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  • December 30, 2014 at 8:39 pm
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    बहुत से कवि आदि भि नशा करके सहेी बात कह देते है तस्लेीमा जेी और रुश्देी जेी ने क्या बात गल्त कहेी वह भेी आप्को बतलानेी चहिये थेी ! निरर्थक अलोचना से कोइ लाभ नहेी !

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  • December 31, 2014 at 9:30 am
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    I have not read any book of these writer and not sure , why the Muslim clerics issued the Fatva against them. Can you one , please enlighten me on this topic

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    • December 31, 2014 at 9:59 am
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      मेने ये लेख रश्दीतस्लीमा से अधिक बल्कि ताबिश साहब और संजय तिवारीसाहब के लिए लिखा था और जैसा की वहा बहस में मेने बताया भी था वैसा ही हुआ हमारे लेखन से तड़प उठने वाले कटटरपन्तियो ने ताबिश साहब को कुछ भी तो नहीं कहा एक भी कॉमेंट नहीं लिखा गया मतलब साफ़ हे उन्हें ऐसे ” धर्मविरोधी ” लेखो से नहीं बल्कि हमारे ”सेकुलर ” लेखो से ज़्यादा खतरा महसूस होता हे http://visfot.com/index.php/current-affairs/11698-sambhal-jao-e-musalmano.html

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  • January 8, 2015 at 2:26 pm
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    इस हमले की फ़्रांस के भी कई मुस्लिम संघटनो की निंदा की हे में भी निंदा करते हुए ही कहूँगा की हमें अराजक नहीं समझदार होना चाहिए कटट्रपंथ से लड़िये बगदादी का कार्टून बनाइये अरबो देशो के निरंकुश शासको के कार्टून बनाइये कठमुल्लाओं के बनाइये मुस्लिम नेताओ के बनाइये मगर पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब हो या हज़रत ईसामसीह हो इनका अपमान करने की क्या तुक हे भला ? ये ना कीजिये कभी भी नहीं प्लीज़ इस कार्टून पत्रिका में ननो को हस्तमैथुन करते पोप को कंडोम के साथ दिखाया जाता था ये अराजकता क्यों ? आप क्या चाहते हे नने न हो चर्च न हो ? पोर्नस्टार हो स्ट्रिप क्लुब हो मगर नने न हो क्या भाई ? धर्म के नाम पर कुछ गलत हो रहा हे तो उसका ये मतलब नहीं हे की धर्म पर अराजक हमले हो अराजकता किसी समस्या का हल नहीं हे आपके लिए धर्म समस्या हे वैसे ही देखे की बाबा ओशो कहते थे की सेक्स बहुत बड़ी समस्या और दुःख का मूल हे इसीलिए उन्होंने अराजक फ्री सेक्स की सुविधा और प्रचार दिया तो क्या इस अराजकता से समस्या हल हो गयी नहीं ना और बढ़ गयी अब ओशो के चेले चेलिया आश्रम में बलात्कार गर्भपात तेरी मेरी का स्यापा करते हुए किताबे लिख रहे हे समस्या का हल अराजकता से नहीं जिम्मेदारियों का बोझ सर पर लेने से होगा हमने शुरुआत भी की हे हरिप्रकाश जी लिखते हे ” . मुस्लिम समाज में यह काम आपलोग कर रहे हैं । बहुत ही गहरी जानकारी , समझ और विवेक के साथ ।सतही पोस्टें तो हजारों देखी है पर प्रभावित आप ही लोगों ने किया है ।आपलोगों के कुछ विचारों से मतभिन्नता के बावजूद आपलोगों की सकारात्मकता की सराहना करता हूँ और शुभकामना देता हूँ कि आप लोगों का दायरा बढे और आपलोगों के विचार मुस्लिम समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे ।अपना यह काम जारी रखें । इसी में मुस्लिम समाज और देश का भला है ।
    हरि प्रकाश लाटा ”

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    • January 9, 2015 at 9:10 am
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      sikander hayat
      January 09,2015 at 03:26 AM CST
      अमित भाई ने लिखा ”इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद साहब को किसी चिन्ह, तस्वीर या मूर्ति के जरिए दिखाने की मनाही है। यह मेरे लिए इस धर्म से जुड़ा थंब रूल है। इसके पीछे क्या लॉजिक है न मुझे पता है और न जानने की इच्छा है। मेरा तार्किक दिमाग मुझसे यही कहता है कि इससे किसी खास धर्म से जुड़े लोगों की भावनाएं आहत होती हैं।” इसलिये है भाई की पेगेम्बर हज़रत मोहम्मद साहब ताईद करके गये है की भाइयो मेरे साथ वो ना करना जो हज़रत ईसा के साथ किया गया की हज़रत ईसा को ही ईश्वर सा बना दिया अगर पेगेम्बर हज़रत मोहम्मद साहब की तस्वीर बनाने की इज़ाज़त होती तो इंसान का सवभाव ही आएसा है की लोग उन्ही का चित्र बनाकर उन्ही की पूजा शुरू कर देते इसलिये य मनाही है तो इस बात को पॉजिटिव ही लेना चाहिये वेद परताप वेदिक जी जेसे लोग लेते भी है जो मायवतो जी के अपनी ही मूर्तिया लगवाने पर अरबो का खर्च पर लिखते है की ”मायावती पेगेम्बरमोहम्मद और इमामहुसेन से सीख लो जिनकी एक भी मूर्ति या चित्र नही है फिर भी वो अपने चाहने वालो के दिल मे हमेशा रहते है ”

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  • January 29, 2015 at 4:25 pm
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    आपने कहा की नास्तिक होने से ख़तरा यह है की वो परलोक मे विश्वास नही करता, और सिर्फ़ इस धरती को भोगना चाहता है, ऐश, आराम, भोग विलास, कोई परिवार नही, कोई समाज नही. तसलीमा और रुश्दी के लिए ये आपने ज़िक्र किया, लेकिन मुझे बताइए की क्या तसलीमा, अपने परिवार के साथ नही रहना चाहती थी? या नही रह रही थी? उसे खदेड़ा गया, और उसके जीवन को हरने की कोशिश की वजह से वो संगीनो के साए मे एकाकी जीवन जी रही है.
    अगर नास्तिकवाद, समाज से सहानुभूति और संवेदना को समाप्त कर देता तो सोवियत रूस मे ग़रीबो को लेके न्याय की चेतना नही जागती. आपको पता हो तो साम्यवाद की लहर ने धार्मिक अस्थाओ को हिलाया था, आज भी रूस मे 50% से अधिक और चीन मे 60% से अधिक लोग नास्तिक है. नास्तिकता अपने मे पूर्ण नही है, लेकिन मानवता को हासिल करने मे अवरोधक भी नही.
    हरिशंकर परसाई जो नास्तिक थे, ने अपनी कलम मे ग़रीब और नारी की आज़ादी के लिए धर्म पे व्यंग्य किए, वो घोषित नास्तिक थे. एक और घोषित नास्तिक, जावेद अख़्तर, अपने लेखो और विचारो मे वंचित लोगो के लिए हमदर्दी जताते आए हैं.
    एश और आराम से क्यूँ चीड़, ईश्वर ने हमे ये खूबसूरत दुनिया और इसके सुख दिए हैं, इन्हे क्यूँ ना भोगे, जवानी मे मदमाती कम वासना और उसे पूर्ण करने के लिए जवान साथी दिए हैं, इसमे कोई अपराध तो नही, जब तक की हम किसी को ठेस नही पहुँचा रहे.
    और फिर क्या श्री कृष्ण और मुहम्मद ने अनेक कमसिन उम्र की लड़कियो को नही भोगा. एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति द्वारा कमसिन लड़कियो को अपने हरम और रनिवसो मे पर्दे मे रखकर उनको भोग कर उन्हे चारदीवारी मे धर्म के नाम पे क़ैद करना क्या भोग विलास नही है.
    धर्म, भोग विलास को स्त्री की आज़ादी दबा के इजाज़त देता है. क्या चीन की नास्तिक सरकार के क़ानून, उनकी जो भी समझ हो, लेकिन क्या समाज के विकास को ध्यान मे रख कर नही बनाए गये हैं?
    अगर आप तसलीमा, रुश्दी या जावेद अख़्तर जैसे लोगो के निजी जीवन के प्रति उनके रवैये मे खामी ढूँढ के, उनकी लोगो की आज़ादी के प्रति जज़्बे को नज़रअंदाज कर, कुछ तथाकथित धार्मिक चरित्रो के द्वारा भोग विलास को मेनुपीलेट करोगे तो आप भी पूर्वाग्रही हुए.
    कुछ बाबा या मौलवियो को धर्म की दुकान कहोगे, लेकिन इनके स्रोतो को दूध का धुला मानोगे, उनपे उठी हर उंगली को धर्म पे मारा गया पत्थर और बदतमीज़ी कहोगे तो कैसे चलेगा.

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  • January 29, 2015 at 5:14 pm
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    आपका इस साइट पर बहुत बहुत स्वागत हे अमित भाई थोड़ा टाइम दे में जवाब लिखता हु

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  • February 22, 2015 at 11:16 pm
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    भालचंद्र नेमाडे जी ने इन सलमान रश्दीयो— नायपालो की सही पोल खोली हे ये बिलकुल मामूली लेखक और उससे भी मामूली इंसान हे वास्तव में अगर फतवा ना जारी किया जाता तो रश्दी कब के इतिहास के कूड़ेदान में होते मगर फतवे की मेहरबानी से वो अब तक—- खेर भालचंद्र जी लिखते हे ” रुश्दी यह दावा तो करते हैं कि वह कश्मीरी हैं, लेकिन लिखते अंग्रेज़ी में हैं. उधर के लोगों को ख़ुश करने के लिए अपने लोगों का मज़ाक़ उड़ाते हैं.”
    भारतीय मूल के अंग्रेज़ी लेखकों के बारे में उनके विचार पर रुश्दी की तीखी प्रतिक्रिया के बारे में पूछे जाने पर नेमाड़े ने रुश्दी पर अपना वार और तेज़ किया.
    उन्होंने कहा, “उसने वही किया जो उसकी संस्कृति है. उसको यही शोभा देता है. हमें शोभा नहीं देता. हमारी संस्कृति अलग है. हम ऐसा नहीं कर सकते. एक लेखक दूसरे लेखक के बारे में क्या कहेगा, इसकी एक संस्कृति है.”
    रुश्दी के इस आरोप के बारे में कि उन्होंने उनका लेख शायद पढ़ा ही नहीं है, नेमाड़े ने पहले तो ठहाके लगाए और फिर कहा, “उसे पता नहीं है कि मैंने उसकी किताबों को पढ़ाया है. ‘मिडनाइट चिल्ड्रन’ से लेकर ‘द इनविज़िबल आइलैंड’ तक उसकी हर किताबे मैंने पढ़ी है.”

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    • February 22, 2015 at 11:17 pm
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      मराठी साहित्य के इस मशहूर साहित्यकार ने भारतीय मूल के दूसरे बड़े लेखक वी एस नायपॉल को भी नहीं बख़्शा.
      वी एस नायपॉल
      “एक आदमी आता है, कहता है कि भारत एक ‘एरिया ऑफ़ डार्कनेस’ (अंधेरा इलाक़ा) है. फिर 15 साल बाद आता है और कहता है कि यह ‘वूंडेड सिविलाइज़ेशन’ (घायल सभ्यता) है. लिखता है कि मुसलामानों ने इसे घायल किया. अंग्रेज़ों का नाम नहीं लेता क्योंकि वहां उसे तकलीफ़ होगी. और 15 साल बाद फिर वापस आता है तो उसे ‘मिलियन म्युटिनीज़’ (करोड़ों बग़ावत) दिखाई देती हैं. पहले जब आया था उस समय बग़ावत नहीं चल रही थी क्या?”

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  • October 16, 2016 at 7:44 pm
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    Shamshad Elahee Shams14 October at 12:18 · ‘बस ऐवैई’ का यूं ठुस हो जाना स्वाभाविक था, तुम इस काबिल नहीं थे कि इस झिलझिली सोच के साथ तुम नास्तिक सम्मलेन कर लोगो, बिना यह समझे कि इर्द गिर्द वातावरण में एक भी चीज ऐसी नहीं जो अराजनैतिक हो फिर बिना राजनीति किये तुम अपना नास्तिक झंडा भला कैसे बुलंद कर सकते हो?बावजूद इसके कि बालेन्दु साहब से मेरे गहरे वैचारिक मतभेद थे जिसके चलते मैंने उनसे दूरी बना ली लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें उनके मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया जाए, मैं संविधान की बात नहीं कर रहा. उन्हें और उनके तमाम मित्रों को देश-दुनिया में कही भी जब चाहे एकत्र होने का, मौज मस्ती करने का अधिकार है. लेकिन भारत जैसे सऊदी अरब को समझने के लिए जिस राजनीतिक समझ की जरुरत है वह और उनके मित्रगण इस ठोस वास्तविकता से आज खुद रु ब रु हो गए.खालिस नास्तिकता जहनी बंजरपन है, मैं न उसका वकील हूँ न अनुयाई, छोड़ दीजिये स्वामी शब्द, जय सियाराम, आश्रम, उजड़ी खुजडी भंगडी साधू कट दाढी या पहनावा जो सभी दोयम दर्जे वाले घटिया अतीत के २१वी सदी में परोसे जा रहे प्रतीक हैं, मैं उन्हें सिरे से ख़ारिज करता हू. साथ में सिर्फ नास्तिक होने का ढोल पीटकर समाज को अराजनीतिक करने की मंशा किसी तवज्जो के काबिल भी नहीं लेकिन फिर भी वृन्दावन में नास्तिक सम्मलेन के विरोध में हरे- भगवे सामाजिक कीड़े मकौड़े सभी एक घाट पर आ कर जिस तरह हू हू किये हैं, वह देखने योग्य है.भारतीय राज्य के मर्म में हिन्दू राज्य है जिसका फासीवादी चरित्र दिन ब दिन स्पष्ट हो रहा है इस खतरे को समझने की कोशिश पहले हो, तब ही इसके विरुद्ध कोई संघर्ष संभव है. जाहिर है नास्तिक तबके के बस का यह कार्यभार नहीं. यदि इस काण्ड में कोई जान चली गयी होती तो उसके नतीजे में जयसियाराम-आश्रम दुकान तत्काल भंग कर दी गयी होती. तुम बिना प्रतिक्रिया समझे क्रिया करोगे तो सवाल पैदा ही होंगे? क्या वास्तविक मंशा क्रिया की थी या सिर्फ प्रतिक्रिया देखने की?अगर कुछ अभी भी करने का मद्दा या कूव्वत बाक़ी है तो ऐसा समाज-राज्य बनाने के लिए संघर्ष करो जिसमे नास्तिक सहित सभी सम्मान से रह सके. और भोले बंधुओं- यह काम समाज, राज्य के ढाँचे को पलटे बिना संभव नहीं. डाकिंस-सैम हैरिस और भगत सिंह में बुनियादी फर्क है, मैं दूसरे का पक्षधर हूँ.

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  • October 16, 2016 at 7:55 pm
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    अच्छा कमाल ये हे की खुद जीरो स्प्रिचुअल नीड का होते हुए भी दुसरो की और अच्छे इंसानो की भी आध्यात्मिक आवश्यकताओं और उसके पॉजिटिव पक्षो , नतीज़ों को देखते हुए ही हमने ये लेख लिखा था खुद मुझे किसी भी धार्मिक गतिविधि में रूचि नहीं हे वजह ये भी हो सकती हे की जीवन में बहुत ज़्यादा मुसीबतो का सामना कर करके में तो फिजिकली मेंटली बहुत टफ हो चुका हे मगर दुसरो के लिए स्प्रिचुअल एक्टिविटीज़ जरुरी हो सकती हे इसलिए में दुसरो की आस्था का में संम्मान अहतराम करता हु अब खेर जिस तिवारी ने जो की अब बीमारी में तब्दील हो गए हे जिन्होंने हमें ये लेख लिखने पर मज़बूर किया था खुद उन पर मुसीबतो के इतने पहाड़ टूटे की अब वो रात दिन आध्यतामिकता की हिंदुत्व की माला जपने लगे हे जिससे हमें ऐतराज़ नहीं हे मगर उनकी या किसी की भी साम्प्रदायिकता का हम हर हाल में विरोध करेंगे ही

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  • October 23, 2017 at 9:18 pm
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    Sarfraz Katihari
    21 October at 22:12 ·
    ये ग्राफिकल आंकड़ा 1901 से 2000 तक के नोबल विजेताओं का है। इस आंकड़े में खास बात ये है कि ये उन विजेताओं के धर्म, ईश्वर पे विश्वास और अविश्वास को आधार बना कर तैयार किया गया है। इस आंकड़े मे आप देखेंगे कि ज़्यादातर नोबल विजेता जिनका ईश्वर पर विश्वास नही है, उन्हें साहित्य में नोबल लगभग 35%मिला है उसके बाद जितनी कैटेगरी है उसमें सभी का प्रतिशत 10 से कम है। तातपर्य यह है कि 90% विज्ञान कैटेगरी नोबल विजेता धर्मिक और ईश्वर पे विश्वास करने वाले हैं। यानी 90% वैज्ञानिक सोच के बुद्धिजीवी जिन्होंने विज्ञान की जटिलताओं, ब्रह्माण्ड की गुत्थियों को समझा है वो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारते हैं चाहे उसका कोई भी वैज्ञानिक नाम उन्होंने रखा हो।
    सबसे आश्चर्यजनक तो ये है कि शांति का नोबल पाने 96.4% व्यक्ति आस्तिक समुदाय यानी ईश्वरीय सत्ता के मानने वाले हैं। धर्म पर दुनिया की शांति भंग करने का आरोप लगाया जाता है, लेकिन ये उत्साहवर्धक है कि शांति फैलाने वाले भी धर्मिक परिवृति के ही लोग हैं।
    इससे अंदाज़ा लगाइये वैज्ञानिक वैचारिक पद्धति और तर्क की दुहाई देने वाले ये साहित्यकार खुद कितने अवैज्ञानिक हैं। जीवन की उत्पत्ति और उसकी जटिलताओं भरी रचना को केवल एक घटना समझने वाली साहित्यकार बुद्धिजीवी वर्ग ने बिना वैज्ञानिक ज्ञान के केवल धर्मिक लोगों के कर्म को देख कर परिकल्पनाओं के आधार पर नास्तिकता का आवरण चढ़ाया हुआ है और अपने साहित्य के बल पर युवा वर्ग और ज़्यादातर सामाजिक विज्ञान से संबंधित वर्ग को अभिभूत कर रखा है, जो वैज्ञानिक शोध की कसौटी पर एक भ्रम के अतिरिक्त कुछ भी नही है।
    .
    – ( ये पोस्ट Rumman Faridi के वाल से लिया गया है )
    नोट: सोर्स मतलब reference मेरा है
    https://books.google.com.br/books…Sarfraz Katihari

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  • October 25, 2017 at 9:32 pm
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    Vineet Kumar
    3 hrs ·
    एक लेखक के तौर पर समाज को तार्किक, सोच के स्तर पर प्रगतिशील बनाने की जिम्मेदारी अगर आपके उपर है तो संवेदनशील और भावनाओं का सम्मान करने की कला विकसित करना भी आपका ही काम है. लोगों को प्रोग्रेसिव बनाने के नाम पर लोगों की भावना तार-तार कर देने का काम आपका नहीं है.
    आप उनकी जड़ता पर, अज्ञानता पर जरूर चोट कीजिए लेकिन साथ ही भावनात्मक स्तर पर समृद्ध भी बनाइए. ये चोट ऐसी हो जैसे एक कुम्हार उपर से तो घडे को पीटता है लेकिन भीतर से एक हाथ लगाए रखता है जिससे कि अंदाजा मिलता रहे कि कितनी जोर से चोट करनी है कि घडा सह पाएगा.
    आप समाज को समझे बिना सिर्फ चोट करते हैं तो वो समाज तार्किक होने के नाम पर फूहड़ और बर्बर हो जाएगा. ऐसे समाज में तर्क के बचे रहने के बावजूद मनुष्यता नहीं बचेगी. लेखक का मूल काम मनुष्यता बचाने का है.Vineet Kumar
    Yesterday at 20:27 ·
    उतना ही क्रांतिकारी और प्रतिरोधी स्वर लेखन में रखना चाहिए जितना कि हम असल जिंदगी में भी एफोर्ड कर सकते हैं. क्रांति की हाइ पिच पर जाकर लिखने और लो पिच पर जीने से लिखा हुआ झूठ लगने लगता है. अभी हम पाठक उस स्टेज तक नहीं पहुंचे हैं कि लिखी हुई चीज को लेखक के जीवन से पूरी तरह अलग करके देख सकें. कहें कि भईया ये लेखक के सांस्कृतिक उत्पाद हैं, विचार नहीं..लिहाजा उसे लेखक के जीवन से जोडकर देखना सही नहीं होगा.
    आप लिखते हैं और आपको कोई लेस्स क्रांतिकारी करार देता है तो सुन लीजिए क्योंकि आप उन लेखकों से फिर भी बेहतर है जो बेहतर लिखकर भी मोहभंग की स्थिति पैदा कर देते हैं. ऐसा कि हमारा पढने से ही भरोसा उठ जाए.

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  • November 8, 2017 at 4:23 pm
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    https://www.youtube.com/watch?v=FpL_kSEHOco जावेद अख्तर ने जो कहा , गुरुुओ अंधविश्वासों कटटरपंथ कम्युनलिज्म के हम भी जानी दुश्मन हे जावेद अख्तर जो बाते कर रहे हे वो हम भी कर सकते हे बाए हाथ से कर सकते हे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा मगर मुझे नहीं लगता हे की उससे हि में कोई बेहतर इंसान बन पाऊंगा अपने तमाम तर्कों के बाद भी मुझे जावेद भी कोई बहुत अच्छे इंसान नहीं मालूम होते हे बहुत बाते हे जीवन के अनुभवों और अपनी सीमित प्रतिभा के आधार पर आगे और लिखने की कोशिश रहेगी

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  • November 14, 2017 at 9:03 am
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    Devanshu Jha
    23 hrs ·
    जावेद अख्तर साहब मजहब का परचम लहराने आए थे
    कितना फर्क होता है उर्दू के कथित बड़े शायर, पटकथा लेखक और हिन्दी के कवि, समालोचक में । साहित्य आजतक के मंच पर जावेद अख्तर भी थे और अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडेय, अनामिका जैसी हस्तियां भी । जावेद अख्तर पूरे समय सिर्फ यह जताने में जुटे रहे कि अकबर महान था, टीपू महान था, ताजमहल दुनिया की अनमोल कलाकृति है । पूरी बहस के दौरान उन्होंने मुगलिया इतिहासकार की भूमिका निभाई । ऐसा लगा जैसे अकबर की रूह से सीधे संवाद कर आए हों । बाकी सैकड़ों सालों से लिखे पढ़े जा रहे इतिहास, दूसरी धारा के विचार, काउंटर नैरेटिव को हम जैसे धर्मांधों के हिस्से में डाल डिया । इतने दुराग्रही और प्रतिक्रियावादी विचार अपेक्षित नहीं थे । ये अलग बात है कि उनसे प्रतिप्रश्न भी नहीं किए गए ।
    पीछे जो जनता खड़ी थी वो उनकी कथित महान शायरी की मुरीद थी और अख्तर साहब उन्हें अपनी नज्म सुनाते रहे । यही स्थिति सबसे घातक होती है क्योंकि मुसलमानों का जो कथित पढ़ा-लिखा तबका है वो कभी आत्मावलोकन नहीं करता है बल्कि वह उन कट्टर घोर मजहबी लोगों के विचारों पर अपना संस्कारी ठप्पा लगाता है ताकि ताजमहल पर सैकड़ों सालों से उठाए जा रहे प्रश्नों या अकबर-टीपू के काले इतिहासों पर सवाल उठाने वालों का अस्तित्व ही ना रहे । ऐसा करते हुए वो न सिर्फ अपने मजहब के प्रति बेईमान ईमानदारी निबाहते हैं बल्कि सेक्यूलरिज्म का झंडा भी बुलंद किये रहते हैं । जबकि हिन्दी के कवि लेखक ऐसी कोई बात नहीं करते ।
    आजतक के मंच पर अशोक वाजपेयी ने स्थल और दूसरी सीमाओं का ध्यान रखते हुए भी हिन्दी कविता और लेखन की मौजूदा परिस्थितियों को रेखांकित किया । पागलपन की हदें तोड़ने वाले, मूढ़, आत्मरत कवि-लेखकों और दो कौड़ी के गीतकारों का संकट बताया । पुराने साहित्यकारों की चर्चा की..। यही फर्क है दोनों के वैचारिक धरातल का । सेक्यूलर तो अशोक जी भी हैं लेकिन उनकी दृष्टि इन कथित शायरों और गीतकारों से कितनी वृहद है, उनका अध्ययन कितना व्यापक है । और एक जावेद अख्तर हैं जो साहित्य के मंच पर अकबर और टीपू के तराने गाते हैं ।

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  • November 23, 2017 at 7:00 pm
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    Sanjay Shraman Jothe
    1 hr ·
    एक बार एक सुशिक्षित मित्र से चर्चा हो रही थी. बात दलितों द्वारा बौद्ध धर्म में धर्मांतरण की निकली. मैंने पूछा कि दलितों के बौद्ध बन जाने पर आपका क्या विचार है? वे तपाक से बोले कि ये राजनीति है धर्म नहीं. मैंने प्रतिप्रश्न किया कि अगर ये राजनीति है तो शोषक धर्म में उन्हें रोके रखना और धर्मांतरण पर प्रतिबन्ध लगाना क्या राजनीति नहीं है? वे सीधे सीधे कुछ न बोल सके और कहने लगे लगे कि असली धर्म तो एक ही है और धर्म आतंरिक जगत का मुद्दा है उसका राजनीति से क्या संबंध, ये भी कहा उन्होंने कि धर्म बदलने से एक गड्ढे से निकलकर दुसरे गड्ढे में गिरता है आदमी.
    ये बहुत सामान्य से तर्क हैं जो धर्म परिवर्तन के खिलाफ अक्सर दिए जाते हैं. और बहुत हद तक ये बात भी सही है कि धर्म परिवर्तन से बहुत कुछ हल नहीं हो जाने वाला है. लेकिन ऐसे तर्क देने वाले लोग ये नहीं समझते कि दलितों को धर्म परिवर्तन से जो नयी पहचान और नया आत्मविश्वास मिलता है वो एक बहुत ताकतवर चीज होती है और उसमे बहुत बड़ी संभावनाएं छुपी होती है. इस बात का अनुभव गैर दलित या गैर शोषित लोग नहीं कर सकते.
    शोषक धर्म से आजाद होते ही दलितों ओबीसी और आदिवासियों की व्यक्तिगत चेतना में एक अनिवार्य अंतराल पैदा होता है. इस अंतराल में अगर वे अंबेडकर और बुद्ध को ठीक से अपने साथ बनाये रखें तो वे अपने पारिवारिक और सामाजिक अतीत के हजारों सालों से एक ही दशक या पीढ़ी में आजाद हो सकते हैं. ये हकीकत में हो भी रहा है और इसकी सफलता के लाखों प्रमाण मिल रहे हैं.
    जो लोग इन सफलताओं से घबराते हैं और दलितों के दुश्मन हैं वे इन केस स्टडीज को सामने नहीं आने देते. नवबौद्धों पर जितनी रिसर्च हुई है उसमे साबित होता है कि उनके सोशियो इकोनोमिक इंडीकेटर्स सुधरे हैं. इससे से भी कहीं आगे बढ़कर उनके सोचने के ढंग में व्यापक बदलाव आया है. पहली पीढी के नवबौद्धों के बाद उन्ही के घर में जो दुसरी तीसरी पीढी आ रही है उसके मन में मानसिक गुलामी और हीन भावना सहित पूजा पाठ, कर्मकांड और अंधविश्वास बहुत तेजी से खत्म हो रहा है. ये लोग इंग्लिश मीडियम स्कूलों में शिक्षित हो रहे हैं और आत्मविश्वास से भरे हैं.
    ये एक बड़ा बदलाव है. जो लोग धर्मांतरण की निंदा करते हैं या आलोचना करते हैं वे नास्तिक होने का सुझाव देते हैं. ये सैद्धांतिक रूप से भी सही नहीं है, व्यवहार में तो एकदम गलत ही है. ऐसे मित्रों को एक प्रयोग करके देखना चाहिए.
    नास्तिकता या सभी धर्मों को छोड़ देने का सुझाव देने वाले मित्र एक काम करें, अपने मूर्तिपूजक और कर्मकांडी परिवार या रिश्तेदारों या मित्रों में से कम से कम दस लोगों को चुनकर उन लोगों को अगले छः महीने या एक साल में नास्तिक बनाने का प्रयास करें. एक डायरी बनाकर अपने अनुभव लिखते जाएँ और साल भर बाद उसे पढ़ें. आपको पता चल जाएगा कि हकीकत क्या है.
    अक्सर नास्तिकता की या सभी धर्मों से बाहर निकलने की सलाह देने वाले मित्र नैतिक रूप से इमानदार या गंभीर नहीं होते. वे गरीब और अशिक्षित दलित आदिवासी या ओबीसी समाज की वास्तविकताओं से परिचित नहीं होते.
    किसी भी समाज को एकदम से नास्तिक नहीं बनाया जा सकता. बौद्ध धर्म नास्तिकता की दिशा में एक अनिवार्य और सबसे सुरक्षित पड़ाव है क्योंकि बौद्ध धर्म आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म को मानता ही नहीं है. यही तो नास्तिकता है, नास्तिकता और क्या होती है? बौद्ध धर्म में जो ब्राह्मणी कर्मकांड घुस आये हैं उन्हें बड़ी आसानी से बुहारकर दूर फेंका जा सकता है. उसके लिए नयी पीढ़ी तैयार हो चुकी है.
    इसलिए सभी मुक्तिकामियों और दलित, आदिवासी ओबीसी मित्रों को भारत में विराट धर्मान्तरण आन्दोलन की आवश्यकता है. ये ऐसा ठोस और पक्का काम है कि अगले बीस से पचास सालोंमें भारत के समाज से शोषण और अपमान को पूरी तरह से मिटाया जा सकता है.
    जो दलित आदिवासी ओबीसी मित्र इन बातों से सहमत हो पा रहे हैं उनसे निवेदन है कि वे अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं और बौद्ध धर्म को जल्द से जल्द जीवन में उतार लें. आधिकारिक धर्मांतरण की कोई आवश्यकता नहीं, विचार और व्यवहार में तुरंत बौद्ध बन जाइए और दूसरों की भी मदद कीजिये. आपको किसी बिकाऊ दलित राजनेता या पार्टी की कोई जरूरत नहीं है. आपके अंबेडकर और बुद्ध पर्याप्त हैं.Sanjay Shraman Jothe

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  • February 28, 2018 at 10:46 pm
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    मेरा इरादा ये था की हम चिंतामुक्त होकर फुल टाइम लेखन और समाजसेवा से जुडी गतिविधिया करेंगे मेरे चारो तरफ एक से बढ़कर एक काबिल लोग थे मगर किसी ने भी मेरे लिए मेरे नेक इरादों के लिए कुछ हेल्प की बात तो छोड़ो बल्कि एक से बढ़ कर एक तनाव दिए जिसमे बेहद समय और ऊर्जा नष्ट हुई लगभग सब कुछ बर्बाद कर दिया गया -एक से बढ़ कर एक इंसानी फ़ितरतो की मक्कारिया ग़द्दारिया पीठ में छुरा कमजोरिया मुर्खताये स्वार्थ जलन देखने को मिली और ये हाल तो उन लोगो का था जो बाकी दुनिया से फिर भी बहुत बेहतर हे तब ये हाल था वास्तव में इस दुनिया में इतना अन्याय हे की ईश्वर के भरोसे ही छोड़ा जा सकता हे वार्ना जाने क्या हो सभ्य समाज के लिए ईश्वर का होना अनिवार्य हे ————————————————————————————-Abhishek Srivastava
    8 hrs · New Delhi ·
    काफी देर से मुझे कैब के ड्राइवर साहब चुनौती दिए जा रहे थे कि इस वक़्त जाम, वो भी साउथ दिल्ली में? मिल ही नहीं सकता। भीकाजी कामा पर आकर गाड़ी जाम में फंस गई। थोड़ी देर तक जब हिलने के आसार नहीं बने तो ड्राइवर साहब को भयंकर जम्हाई आ गई।

    काफी इत्मीनान से और लगभग पूरी देह से ली हुई जम्हाई खत्म करने से ठीक पहले उन्होंने समापन नोट को थोड़ा इम्प्रोवाइज़ करते हुए सहजता से कहा, “हे राम, उठा ले पड़ोसियों को… हम तो तेरे अपने हैं, जब चाहे उठा लियो!”

    मुझे पक्का विश्वास हो गया कि अगर भगवान में लोगों का विश्वास नहीं होता तो वे खुद ही पड़ोसियों को निपटा देते। भगवान सत्ता के लिए हिंसा का औज़ार होगा लेकिन जनता के लिए हिंसा का इंसुलेटर है। जनता के पास उसका भगवान न रहे तो जाने कितना खून-खराबा हो! हमें अवाम और निज़ाम के भगवान का फ़र्क़ समझना चाहिए।

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  • March 28, 2018 at 10:29 pm
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    Satyapal Chahar4 March at 19:32 · सीरिया या फिलिस्तीन में होते हुये अमानवीय व्यवहार पर यदि किसी मुसलमान की आखें नम होती हैं तो उसकी मात्र एक बजह है और वो है ब्रदरहुड। जिस विश्व बंधुत्व की दुहाई सनातन देता है, व्यवहार में कोसों तक नजर नहीं आता। कबीलों और राष्ट्र की सीमाओं को लांघते हुये ब्रदरहुड को अमली जामा पहनाने का एकमात्र श्रेय नबी सल्ल को जाता है।विभिन्न पंथों और विभिन्न परंपराओं से आये लोग भले ही रीति रिवाज और तौर तरीकों के लिहाज से संतरे की फांक के समान अलग अलग हों लेकिन उनके ऊपर चढा हुआ ईमान रुपी छिलका उन्हें एकजुट बनाता है।विश्व के किसी भी पंथ या संप्रदाय में मैंने आज तक अपने पंथी भाईयों के प्रति हो रहे सही या गलत बर्ताब के लिए चिंतित होते नहीं देखा जितना कि मुसलमानों को और यही नबी के विचारों की जीत है।Satyapal Chahar9 March at 21:36 · सुबह दूध वाली अपना हिसाब करने आयी थी। बातों ही बातों में बताने लगी कि किस प्रकार वो अपने जवान बेटे की आत्महत्या के बाद टूट कर बिखर गयी थी। संयोगवश एक धार्मिक गुरू के सानिध्य में आयी और सब कुछ अच्छा होता चला गया। पति की नशे की लत और घरेलू झगड़ा सब कुछ छूट गया। बेटे की मौत के सदमें से भी उबर चुकी है।
    बाबूजी उसकी बातें सुनकर काफी भावुक हो उठे। मन ही मन उस गुरू को धन्यवाद भी दे रहे थे और शायद इसी उत्कंठा में बाबूजी उस गुरू का नाम पूछ बैठे। जैसे ही उस महिला ने गुरू रामपाल का नाम लिया, बाबूजी के तेवर बदल गये। वो बस इतना ही कह पाये, ” वो पाखंडी? ” इससे कि पहले कि वो कुछ और बोल पाते, मैंने उन्हें रोकते हुये बोला, ” बाबूजी, किसी की आस्था पर कुठाराघात कभी मत करना, चाहे वो आदमी कुछ भी हो पर चूंकि उसने इस औरत को पुनर्जीवन दिया है, यह उन्हें भगवान मानती है। अब उसकी कमियों पर नहीं, उसकी अच्छाईयों पर ही इसकी नजर है। वो भी एक इंसान ही है, पैसा पद रुतबा बढने पर उसके साइड इफैक्टस होना लाज़मी है लेकिन इससे उसके ज्ञान का पहलू कम तो नहीं हो जायेगा ?
    आशाराम यदि सैक्स के मामले में अनियंत्रित निकला, इसका मतलब ये तो नहीं कि वह आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक शिक्षक के तौर पर भी असफल है? एक इंसान एक ही वार में कई भूमिकाऐं निभाता है। यदि उसका कोई एक पक्ष कमजोर है तो क्या उसका संपूर्ण व्यक्तित्व खत्म हो जाएगा?
    क्या विश्वामित्र , वशिष्ठ और पाराशर जैसे ऋषि भी इसी श्रेणी में न आयेंगे? क्या राम अपनी पत्नी और पुत्र के अलावा शंभुक और बाली के दोषी नहीं है? क्या कृष्ण को भी आप इंसानी बुराईयों से मुक्ति दे पायेंगे? उनकी हजार गलतियों को आपने सिर्फ इस बजह से नजर अंदाज कर दिया कि वो आपके पुरुखे हैं या आपके भगवान हैं? यदि कोई राम और कृष्ण को भला बुरा बोले तो आपका जी दुखेगा न? तो फिर किसी गरीब दुखियारी का दिल क्यूं दुखाया जाय? रही बात रामपाल की तो उसकी करनी का फल उसे कानून दे रहा है। मेरा मन कहता है कि हमें किसी की आस्था पर चोट नहीं करनी चाहिए।”बाबूजी बस इतना ही बोले, ” तू ये छोड दे, फिलौसफर हो चला है। मुझे डर है कि कहीं बच्चों को छोड बाबा सत्यपाल न बन जाय। “

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  • June 10, 2018 at 9:49 am
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    Chandra Bhushan
    9 June 2017 · Ghaziabad ·
    कम्युनिस्ट होने के लिए नास्तिक होना जरूरी है, ऐसा कोई शास्त्रीय संदर्भ खोजने की कोशिश बेकार है। ऐसी शर्त रखने वाला कोई भी व्यक्ति या दल दुनिया में कहीं राजनीति नहीं कर पाएगा। नास्तिकता एक व्यक्तिगत बौद्धिक आग्रह है और मनुष्य की ज्ञान मीमांसा (एपिस्टेमोलॉजी) में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसे एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में प्रतिष्ठित करने की एक समकालीन जर्मन प्रवृत्ति के खिला‌फ एंगेल्स का एक लंबा लेख मैंने कहीं पढ़ा है। अभी तुरंत इसका लिंक मांगेंगे तो मैं नहीं दे पाऊंगा।

    कम्युनिस्ट व्यक्तिगत रूप से नास्तिक हों, ऐसी अपेक्षा की जाती है क्योंकि इसके अभाव में बनने वाली ज्ञान मीमांसा उन्हें भटका सकती है। यह भटकाव इहलौकिक समस्याओं का पारलौकिक समाधान खोजने के रूप में सामने आ सकता है, या फिर किसी एक धर्म को दूसरे की तुलना में श्रेष्ठ मानने के रूप में। निकारागुआ में प्रसिद्ध कवि और सैंडिनिस्टा सरकार में मंत्री अर्नेस्तो कार्दिनाल के साथ बाद में ऐसा ही हुआ, हालांकि आस्तिक वामपंथी के रूप में हम आज भी उनकी मिसाल देते नहीं थकते।

    कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े जनसंगठनों से भी नास्तिकता की न सही, धार्मिक कर्मकांड से दूर रहने की उम्मीद तो की ही जाती है। हां, इस बात को किसी कार्यकर्ता की घेरेबंदी या उसे संगठन से निकालने का आधार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि जनसंगठनों से जुड़े लोगों को भी किसी अवसर विशेष पर कर्मकांडी लोगों के संपर्क में आना पड़ सकता है। एक कार्यकर्ता की कोशिश रस्मी आयोजनों का कंटेंट बदलने की होनी चाहिए, लेकिन वह अलग विषय है।

    इस सिलसिले में अपनी तरफ से अकेली बात मुझे यह कहनी है कि मैं अपने मन के भीतर क्या हूं, मेरा अवचेतन मुझे कब कहां धकेल सकता है, यह कम्युनिस्ट आंदोलन की चिंता से बाहर का विषय है। वहां मेरी भूमिका मेरे सामाजिक, और उससे कहीं ज्यादा राजनीतिक व्यवहार से तय होती है। अगर मैं अपनी राजनीतिक विचारधारा को अपने अंतर्तम पर राज करने की इजाजत देता हूं तो अंतत: उसे तानाशाही की ओर ही उन्मुख करता हूं। मेरे मन के भीतर मेरा राज है और मेरे घर के भीतर मेरे परिवार के हर सदस्य का बराबर का राज है। यहां बाहरी शक्ति के रूप में मैं किसी को नहीं घुसने दूंगा, चाहे वह कम्युनिज्म हो या कुछ और।
    Chandra Bhushan
    Yesterday at 07:37 ·
    ग्लोबल वार्मिंग का इलाज

    बढ़ती कार्बन डायॉक्साइड अगले कुछ ही वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग को बेकाबू बना सकती है। पेरिस सम्मेलन में सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने देने के लिए यह तय किया गया कि तब तक कार्बन डायॉक्साइड का उत्सर्जन बिल्कुल रोक दिया जाए और फिर इस गैस को सिस्टम से बाहर करने के प्रयास चलाए जाएं।

    लेकिन यह बात कहने में जितनी सटीक थी, व्यवहार में उतनी ही बोगस साबित हो रही है। दुनिया में हर जगह अंधाधुंध गाड़ियां बिक रही हैं और कार्बन का उत्सर्जन दिनोंदिन तेज ही होता जा रहा है। इसके सोख्ते के तौर पर खूब सारे पेड़ लगाने की बात और भी बोगस है क्योंकि इसके नाम पर हर जगह सिर्फ सरकारी पैसे खाए जा रहे हैं।

    ऐसे में वातावरण से कार्बन डायॉक्साइड हटाने का एक ही रास्ता बचता है कि किसी तरह इसे सीधे ही चूस लिया जाए। ‘डायरेक्ट एयर कैप्चर’ नाम की इस मुहिम में हवा को बड़े-बड़े पंखों से खींचकर किसी ऐसे केमिकल से गुजारा जाता है, जो कार्बन डायॉक्साइड सोख ले। फिर उससे यह गैस निकालकर केमिकल को दोबारा काम पर लगा दिया जाए।

    हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के भौतिकशास्त्री डेविड कीथ ने कनाडा में ऐसा एक पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया, जिसकी लागत पिछले कुछ सालों में 600 डॉलर से घटकर 100 डॉलर प्रति टन कार्बन डायॉक्साइड तक आ गई है। आगे इससे 1 डॉलर प्रति लीटर का ईंधन भी बनाया जा सकेगा। सरकारें पर्यावरण को लेकर गंभीर हों तो 2030 तक इस प्रयास से कुछ ठोस उम्मीद बांधी जा सकती है।
    Chandra Bhushan
    11 hrs ·
    खत्म हो पहचान और विचार का घालमेल

    बचपन से लहाकर उपन्यास पढ़ने की लत मुझे किसी साहित्यिक अभिरुचि के चलते नहीं, अपनी स्थितियों से पलायन की चिंता में ही लगी। यह पलायन बहुत सारी चीजों से था, जिनमें एक अपनी जाति, गांव, टोले की दमघोंटू बाड़ेबंदी भी थी। मेरी जाति और गांव दोनों रुतबेदार थे, लेकिन जिस तरह सस्ते उपन्यासों का नायक राजेश किसी राधिका से प्रेम कर सकता था, वह मेरी जगह और वक्त में क्या किसी राजेश यादव और राधिका पांडे के लिए सम्भव था?

    हममें से ज्यादातर लोगों की वैचारिकी ऐसे ही बनी है। हम अपनी बाड़ेबंदियों को तोड़ते हुए ही शब्दों से जुड़े, फिर शब्द हमें विचार और प्रतिबद्धता की ओर ले गए। लेकिन अभी का दौर उन्हीं पुरानी बाड़ेबंदियों की ओर वापसी का और अक्सर उन्हें ही विचार और प्रतिबद्धता की तरह पेश करने का है।

    खुद को हिंदू, मुसलमान, अगड़ा, पिछड़ा, दलित, ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, कुर्मी की तरह देखने की कई सारी वजहें हो सकती हैं। इन पहचानों पर आप गर्व करना चाहते हैं, करें। इस आधार पर आपका उत्पीड़न हो रहा हो तो और जमकर करें। समस्या तब होती है, जब आप इस गर्व का इस्तेमाल किसी और पहचान को दबाने, कुचलने में करते हैं।

    ऐसे लोगों के साथ मैं एक मिनट भी नहीं रहना चाहूंगा, भले ही वे मेरे कितने भी करीबी क्यों न हों। लेकिन इस दौर के साथ मेरी एक अतिरिक्त समस्या भी जुड़ी है, जिसपर यहां बात करने का मन है। पहचान पर गर्व करने या सार्वजनिक दायरे में इसे धारण करने का कारण चाहे कुछ भी क्यों न हो, आखिर इसे विचार का स्थानापन्न कैसे बनाया जा सकता है?

    किसी भी वैचारिक विमर्श की बुनियाद यह होती है कि विचार सही या गलत हो सकते हैं और समय के साथ ये बदले जा सकते हैं। इसके विपरीत जो पहचानें आजकल चलन में हैं, वे जन्म के साथ आती हैं और मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं होतीं। उन्हें बदलने का तो कहीं कोई सवाल ही नहीं पैदा होता।

    इसलिए काफी सोच-विचार के बाद मैंने फैसला किया है कि जन्मना पहचानों को विचार की तरह पेश करने वालों से कभी कोई बहस नहीं करूंगा। कुछ विशेष स्थितियों में वे मेरी मित्र सूची में बने रह सकते हैं लेकिन मुझपर या मेरे किसी भी मित्र पर एक भी बिलो द बेल्ट हमला उन्हें तत्काल मेरी मित्रता के बोझ से आज़ाद कर देगा।

    बहरहाल, यह पोस्ट सोशल मीडिया से जुड़ी मेरी चिंताओं की पैदावार नहीं है। मुझे लगता है कि आक्रामक दक्षिणपंथी हिंदुत्व से जूझते हुए हम बहुत सारी गलत चीजों को भी बर्दाश्त करने लगे हैं। समय आ गया है कि हम टुच्चे स्वार्थों और दलाली की बुनियाद बन चुकी पहचानों की राजनीति को दलालों के लिए ही छोड़ दें और न्याय की धारणा पर आधारित विचारों के विमर्श पर वापस लौटें।

    इस क्रम में अपने से अलग विचारों को भी ध्यान से सुनें। कोई आपकी पहचान को निशाना बनाए तो भी उसपर तुरंत पलटवार करने के बजाय यह जानने का प्रयास करें कि दूसरी तरफ कहीं कोई ज्यादा गहरी बात तो मौजूद नहीं है, जो किसी पूर्वाग्रह के चलते हमारी समझ में आने से रह जा रही है। देर भले हो पर रास्ता यहीं से निकलेगा।
    Chandra Bhushan
    16 mins ·
    प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश जैसे अत्यंत संवेदनशील मसले को लेकर वरिष्ठ पत्रकार श्री विष्णु राजगढ़िया की इस अपील पर सभी सम्बन्धित पक्ष ध्यान दें।

    महात्मा गांधी की हत्या हुई, उसकी साजिश का किसी को पता ही नहीं चला.

    प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की भी हत्या हुई, साजिश का कोई पत्र नहीं मिला.

    सामाजिक कार्यकर्ता कुलबर्गी, पत्रकार गौरी लंकेश, मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी, माले नेता महेंद्र सिंह, झामुमो नेता सुनील महतो की हत्या के पहले भी कोई भनक नहीं मिली.

    गुजरात के मंत्री हरेन पंड्या की हत्या की भी साजिश का पता नहीं चला.

    माओवादी जब जेल पर हमला करके अपने साथियों को छुड़ा लाते हैं या थानों पर हमला करते हैं, तब भी साजिश गोपनीय रहती है.

    गनीमत है कि गुजरात का सीएम होने से लेकर अब पीएम होने तक मोदी जी के खिलाफ कई बार ऐसी साजिश का खुलासा हो गया.

    ईश्वर उनपर कृपा बनाए रखे, लंबी उम्र दे.

    हर साजिशकर्ता अपने प्लान की पूरी जानकारी A-4 शीट पर प्रिंट करके जगह-जगह रख दे और ई-मेल कर दिया करे ताकि साजिश विफल हो.

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  • July 3, 2018 at 8:32 am
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    Jagadishwar Chaturvedi21 hrs · पिता के अंतिम संस्कार से उठे सवाल
    मेरे पिता की अकस्मात हृदयगति रूक जाने से 17जून 2018 को मौत हो गई। उनकी मृत्यु मेरे लिए बेहद गहरा कष्ट छोड़ गई है,अनेक ऐसी समस्याएं हैं जिनके बारे में अभी साझा करना संभव नहीं है।
    असल बात यह कि इस दुख की घड़ी में अधिकांश परिचितों और नाते-रिश्तेदारों की दिलचस्पी मृत्युजनित दुख में कम और इसमें ज्यादा कि मैं पिता का अंतिम संस्कार कैसे करता हूं, मथुरा से लेकर मुंबई तक एक बड़ा वर्ग है जो कम्युनिस्टों और जेएनयू के बारे में स्टीरियोटाइप प्रचार से गहरे प्रभावित है और उसके चश्मे से मुझे और दूसरे मार्क्सवादियों को देखता है।जबकि हमारे लिए मार्क्सवाद तो ज्ञान का एक साधन है,साध्य नहीं। मैं कईबार पहले भी कह चुका हूं कि मार्क्सवादियों को स्टीरियोटाइप के जरिए समझा नहीं जा सकता।
    मेरे पिता वेद और तंत्रशास्त्र के विलक्षण विद्वान् थे, उनके पास शास्त्रों की नयी समझ भी थी,वे शास्त्रों के उपयोग को लेकर लचीला रूख रखते थे,मसलन्, वे वैदिक पद्धति से तीन दिन से लेकर आधा घंटे की अवधि में शादी कराने की कला जानते थे, उन्होंने अपनी युवावस्था में सैंकड़ों यज्ञ कराए,हजारों यज्ञोपवीत कराए,हजारों शादियां कराईं,अनेकों मंदिरों में देव-प्रतिष्ठा कराई,इसके बावजूद वे संस्कारों के गुलाम नहीं थे, उनके लिए मंत्र, संस्कार,वेद, शास्त्र साधन थे,साध्य था ज्ञान और ईमानदारी।ज्ञान और ईमानदारी के साथ उनका गहरा संबंध था।जो उनके सुख-दुख में शामिल होता उसे वे प्यार करते थे,जो उनके दुख में शामिल नहीं होता उससे संपर्क नहीं रखते थे।मृत्यु से कुछ महिने पूर्व एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी मृत्यु पर क्या पास-पड़ोस के लोग आएंगे ? मैंने कहा आएंगे,वे बोले मेरा तो सबसे संबंध नहीं है,मैंने कहा सब आएंगे,वास्तव में यह हुआ,सभी पड़ोसी आए, उन्होंने ही अंतिम संस्कार की समस्त जिम्मेदारी निभायी, इनमें अनेक वे लोग भी आए जिनसे उनके झगडे हो चुके थे। सबके मन में एक ही सवाल था कि मैं अंतिम संस्कार किस तरह करता हूं,मैंने पिता की इच्छा के अनुसार वैदिक विधि विधान से सब संस्कार किए,मेरे मामा मधुसूदन लाल चतुर्वेदी और मित्र वामनजी चतुर्वेदी ने नैतिक तौर पर मेरा मनोबल बढाने में मदद की। लेकिन सबसे बड़ी मदद की अतुल चतुर्वेदी और रंजना चतुर्वेदी ने,इन दोनों की मदद का मैं हमेशा ऋणी रहूंगा।खासकर ,रंजना ने जिस कौशल और क्षमता का परिचय दिया वह काबिलेतारिफ है,वह न होती तो मैं तेरह दिन के संस्कार नहीं कर पाता,चौबों के मृतक संस्कारों में कर्मकांड से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रतिदिन का विभिन्न किस्म का वैविध्य पूर्ण भोजन,दैनिक कर्मकांड की जिम्मेदारी आचार्य दिनेश जी ने निभायी,उनके कारण समस्त कर्मकांड शुद्ध विधि विधान और वैदिक मंत्रों के द्वारा संपन्न हुए।
    मंत्र,मंदिर,धर्म, कर्मकांड आदि को लेकर मेरी और मेरे पिता की निजी समझ रही है,उसका मार्क्सवाद से मतभेद नहीं है, उपरोक्त मसलों पर जो लोग बहिष्कारवादी नजरिए का प्रदर्शन करते हैं उनसे मैं कभी सहमत नहीं हुआ,असल में ये चीजें व्यक्तिगत हैं।इनको निजी और सामाजिक संबंधों को नष्ट करने के औजार के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

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  • October 23, 2018 at 10:41 am
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    सिकंदर हयात सिकंदर हयात • 24 days ago
    इस्लामिक आस्था से कुछ लोग यही अंदाज़ा लगाते हे की दाढ़ी बुर्का पर्दा कई बच्चे कटटरता बकरा आतंकवाद बस यही सब इस्लामिक आस्था हे बस यही लेकिन ये बहुत गहरी चीज़ हे बाकी आस्थाओ से बहुत अलग और डीप हे इसलिए लोग इसकी गहराई का अंदाज़ा बिलकुल नहीं लगा पाते इसी कारण ये भी सच हे की गैर मुस्लिम चिढ़ते भी हे वही ये भी सच हे की सम्मान भी करते हे ( रविश – व्यक्ति विशेष नहीं ) ( इसी ”सम्मान ” से संघी बजरंगी बेहद खफा होते हे ) मेरा कज़िन हे डॉक्टर गरीबो को मुफ्त दवाई बड़े अस्पताल मरीज़ भेजने पर कमीशन की पेशकश करते हे तो कहता हे की जो मेरा कमीशन हे उसकी छूट दे देना पेशंट के बिल में , बच्चे दो , बीवी ना बुर्का ना पर्दा खुद क्लीन शेव , खाली जुमे का नमाज़ी ये हाल , तो उसका भी हाल सुनिए उसने मुझे बताया की एक बार डॉक्टरी के काम से हरिद्वार में एक ऐसी जगह रहा जहा उसे कई दिन तक अज़ान नहीं सुनाई दी उसका कहना था की वो इस वजह से बुरी तरह बेचैन हो गया था कहने का आशय ये हे की ताबिश जैसे लाखो ” सरमद ” भी या कोई भी मैदान में आ जाए तो भी इस्लामिक आस्था पर या मुस्लिमो के कानो पर जू नहीं रेंगने वाली , लोग इस ”लग्ज़री” को कभी नहीं छोड़ेंगे इस्लाम कभी ईसाइयत की तरह नहीं होगा , आप इस आस्था को और इसके सुकून को नहीं समझते हे ये किस हद तक लोगो के दिलो में उनके वज़ूद में बावस्ता हे आप नहीं समझते हे में आपकी या किसी की भी आस्था का सम्मान करता हु पर अलग हे ये बात में कह रहा हु में एक जीरो स्प्रिचुअल नीड का आदमी मेरी खुद कोई धार्मिक गतिविधि नहीं हे ना कोई अध्ययन हे न मेरा मन लगता हे में ताबिश की तरह महाविद्वान नहीं हु मगर जीवन के अनुभव हमारे पास बहुत ज़्यादा हे में ऐसा कह रहा हु . मुसलमानो की आस्था तो हाशिम भाई ने सही फ़रमाया कयामत तक कायम रहेगी हां क्लेश नहीं होना चाहिए नेताओ और धर्म के दलालो को निहित स्वार्थी तत्वों को फायदा नहीं उठाने देना उनसे जंग करनी हे इसकी कोशिश रहेगी ———- जारीसिकंदर हयात • 23 days ago
    खुद जीरो स्प्रिचुअल नीड होते हुए भी कोई भी धार्मिक गतिविधि या धार्मिक अध्ययन ना होते हुए भी तार्किक होते हुए भी कठमुल्लाशाही कटटरपंथ कम्युनल का जानी दुश्मन होते हुए भी , में धर्म और ईश्वर के खिलाफ नहीं बोल पाता हु में पॉजिटिव आदमी हु ” पॉजिटिव ” सोचता हु अगर ईश्वर नहीं हे तो इंसानो के लिए इससे बुरी बात नहीं हो सकती हे अगर ईश्वर हे तो इससे अच्छी बात नहीं हो सकती हे भले ही वो ईश्वर कठमुल्लाओ की ही बात मानकर मुझे नर्क में डाल दे , डाल दे में चाहता हु की ईश्वर हे आधुनिक सभ्यता की नीव- फ़्रांस की क्रांति- की नीव – रूसो ने कहा था ” सभ्य समाज के लिए ईश्वर का होना अनिवार्य हे अगर ईश्वर नहीं हे तो उसे बनाना होगा ” में निगेटिव नहीं ”पॉजिटिव ” बात पर यकीन करता हु अगर ईश्वर हे तो जीवन हे इससे अच्छी बात नहीं हो सकती हे में अच्छी बात के साथ हु इंसान असल में मर्त्यु से डरता हे ईश्वर की आड़ में असल में हम अपने मर्त्यु पर भय पर काबू पाते हे अब ये मर्त्यु का भय भी असल में ऐसा हे की हम अपनी मृत्यु से नहीं घबराते हे नहीं नहीं -हम घबराते हे अपने प्रियजनों से बिछड़ने से वो हमे अकेला छोड़ दे या वो हमारे बिना अकेले रह जाए हम इससे घबराते हे और बहुत ही ज़्यादा घबराते हे आस्था और ईश्वर हमारी इस घबराहट को कंट्रोल करते हे आस्था और ईश्वर हमारे पुरखो को या उन प्रियजनों को जो अब हमारे साथ नहीं हे उन्हें हमारे साथ साथ रखते हे में ईश्वर पर विश्वास करता हु भले ही वो ईश्वर कठमुल्लाओ की ही बात मानकर मुझे नर्क में डाल दे यही सही , ईश्वर पर विशवास करो

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    सिकंदर हयात सिकंदर हयात • 23 days ago
    अफ़ज़ल भाई के ब्लॉग पर एक वासी भाई आते थे शुद्ध कटटरपंथी और तार्किक भी थे यु समझ लीजिये एक मुसलमान जितना कटटरपंथी हो सकता हे उतने ही थे और एक मुसलमान जितना सेकुलर हो सकता हे उतना हम थे ही तो हमारी और उनकी अफ़ज़ल भाई के ब्लॉग पर महीनो बहस चली वो एक तरह से कहते थे हम जैसे सेकुलरो से की या तो तुम कह दो की तुम मुसलमान नहीं हो और दफा हो जाओ या अगर कहते हो की हो तो तुम्हारी जिम्मेदरी हे की तुम शिर्क से लड़ो उसे खत्म करो यही तुम्हारी ड्यूटी हे खेर महीनो बहस चली बहस के अंत में अपनी जीवन के गहरे अनुभवों से मेने उन्हें घेर लिया मेने कहा की फिर तो इसका मतलब ये हुआ की हमारी जिम्मेदारी हे की हम इतने अच्छे बने इतने अच्छे बने की अगला हमसे इम्प्रेस होकर हमारी बात मान ले और शिर्क करना छोड़ दे ये हमारी ड्यूटी हुई लेकिन में पहले ही अपने हाथ खड़े कर रहा हु इसके जो सजा होगी मुझे क़बूल होगी अब तुम वासी भाई तुम लोग इतने अच्छे बनो की दुनिया तुम्हारी बात मान ले और शिर्क करना छोड़ दे और याद रखो जो अच्छा बनेगा उसकी दुर्गत हो जायेगी जो आदर्शो पर चलेगा दुनिया उसे लूट लेगी खा जायेगी इसी अच्छा होना की वजह से मेरे घर में दो मौते और करोड़ का नुक्सान हो चूका हे तीसरा मरते मरते बाल बाल बचा हे तो में तो नहीं बन सकता मगर वासी भाई तुम और तुम्हारे साथी तुम इतने अच्छे बन सको तो बन के दिखाओ यही अल्लाह का दिया काम हे बन सको तो बनो में तुम्हारे साथ हु फिर अल्लाह जाने उन्हें बात समझ आयी या नहीं मगर वो फिर कभी हम सेकुलरो को समझाने या धमकाने नहीं आयेShare ›
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    हाशिम- to सिकंदर हयात • 22 days ago
    सिकंदर हयात भाई, अल्लाह को मुन्किर लोग पसंद नहीं| कट्टरपंथी या सेक्युलर नहीं, मुसलमान तो मुसलमान होता है| पूरे का पूरा| अच्छा मुसलमान बन कर दिखाओ का क्या मतलब? आप बुरे मुसलमान हैं क्या? अगर आप डर के मारे या अपना नुक्सान बचाने ले लिए इस्लाम की सही व्याख्या नहीं करे पा रहे हैं तो गलत और घुमावदार बातें भी मत करिये| ऐसा न हो कि “माया मिली ना राम”|

    दुनिया के लोगों की नज़रों में अच्छा कहलाना कोई कामयाबी नहीं ये आप भी जानते हैं| दो मौतें और करोड़ का नुक्सान आप बार-बार लिखते हैं…इतना होने पर आप मुन्किर और नकली मुसलमान बनने को तैयार हो चुके हैं| हज़रत हमजा याद नहीं? कर्बला याद नहीं?

    अच्छा-बुरा मुसलमान होने की मनगढंत परिभाषाएं ना गढे| अगर अल्लाह ने लिखने का इल्म दिया है तो उसे दीन के कामों में भी लगाइए| यहाँ ब्लोगरों के बीच वाह-वाही लूटने से आप को कुछ नहीं मिलेगा| जब वक्त आएगा तो आपकी गिनती ये दुनिया मियाँ में ही करेगी| दुनिया की नज़र में….अल्लाह की नज़र में नहीं|

    और अब बहस नहीं करिये भाई….हमें पता है आप बहुत बड़े लिखबाज़ हैं| अल्लाह मुझे, आपको और सबको तौफीक दे| यही दुआ है|

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    सिकंदर हयात- to हाशिम • 21 days ago
    ”अच्छा मुसलमान बन कर दिखाओ का क्या मतलब ” ये मेने कब कहा —- ? बहस ये थी की बहुत ही ज़्यादा जाकिर नायको से भी बहुत ज़्यादा कटटरपंथी वासी भाई कहते थे की अगर तुम मुसलमान हो तो तुम्हारी जिम्मेदारी हे की शिर्क खत्म करने की , मेने कहा की इसका मतलब ये हुआ जिम्मेदारी हे की हम इतने अच्छे बने की अगला हमारी बात मान ले और शिर्क ना करे तो हमारी जिम्मेदारी हे वासी भाई की आपकी इतने अच्छे बने की अगला आपसे इम्प्रेस होकर आपकी बात मान ले और शिर्क ना करे तो मेने वासी भाई से कहा की आप इतने अच्छे बनो की अगला आपकी बात मानकर शिर्क छोड़ दे तो आपकी ड्यूटी हे अच्छा बनना उसके बाद भी अगर अगला इम्प्रेस नहीं होता हे या शिर्क करना नहीं छोड़ता हे तो ये बात आप अल्लाह पर छोड़ो आप तो अपनी ड्यूटी करो इस तरह से मुस्लमान अपनी आस्था पर भी रहेंगे और गैर मुस्लिमो से या किसी से भी क्लेश भी नहीं होगा लेकिन लेकिन लेकिन जो अच्छा बनेगा उसकी दुर्गत हो जायेगी , हे तैयार ——— ?

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    हाशिम सिकंदर हयात • 20 days ago
    दुर्गति और सुगति सब अल्लाह के हाथ में है..बेशक|

    हम नेक और सच्चे मुसलमान बनने की कोशिश करें वो भी किसी को दिखाने या दूसरों को सुधारने के लिए नहीं, सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए| बाकि अल्लाह के भरोसे छोड़ दें| हमारे हाथ में बस इतना ही तो करना है|

    बस अब दीन में कोई बहस नहीं भाई| अल्लाह मुझे और आप को सही सोच अता फरमायें, आमीन| मैं तो बिलकुल मुकम्मल नहीं, बस कोशिश और दुआ करता हूँ की अल्लाह मुझे दीन की सही समझ अता फरमाए..अमीन, आदाब भाई|

    आप फिर भी तारीफ़ के काबिल हैं मेरे भाई| आप सही और अच्छा लिखते हैं और सबको साथ लेकर चलते हैं| सलामत रहो|

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  • October 23, 2018 at 11:56 pm
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    स सिंह
    18 October at 08:18 ·
    बात ब्राजील की अमांडा नामक महिला की है जो प्रसव पीड़ा के बाद हॉस्पिटल में एडमिट थी !
    केस की जटिलता के कारण अमांडा कोमा में चले गईं ! डॉक्टर्स ने सूझबूझ से कोमा में ही
    सीजेरियन कर बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया !
    बेटा भी जीवन से संघर्ष करता हुआ बाहर निकला तो उसे माँ का सुरक्षित आँचल नही मिल पाया ! उसकी हालत बिगड़ने लगी लिहाजा उसे ICU में रखना पड़ा जहाँ 20 दिन के संघर्ष के बाद से बचा लिया गया !

    इधर माँ अमांडा 23 दिनों से कोमा में ही थी , और आगे उसके होश में आने के आसार भी नजर नही आ रहे थे ! और उधर बच्चा भी बिन माँ के जीवन को खोज रहा था !

    एक दिन एक डॉक्टर ने बच्चे को न जाने क्या सोच कर कोमा में गई हुई अमांडा के सीने पर लिटा दिया ! थोड़ी देर बाद उसे यह देख कर हैरानी हुई की मॉनिटर पर अमांडा की हार्ट बीट बढ़ी हुई आ रही थी ! बच्चे के स्पर्श से अमांडा के शरीर मे हलचल होने लगी और उसकी बंद आँखों से आँसू टपकने लगे !
    हैरान डॉक्टर्स ने अमांडा का नए सिरे से ईलाज शुरू किया और दो दिन बाद अमांडा को पूरी तरह होश आया गया और उसे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज भी कर दिया गया ,अपने नवजात बेटे विक्टर संग !

    अमांडा के केस को एक संयोग भर चमत्कार माना जा सकता है लेकिन फिर भी इसे पढ़ने के बाद माँ की ममता के प्रति आस्था बढ़ती ही है ! आस्था ऐसे ही बनते और फलते फूलते आई है ! इसके लिए मन मे संवेदना होना जरूरी होता है ! आप हर बात में सिर्फ लॉजिक ही देखना चाहोगे तो फिर आपके लिए यह मात्र संयोग भरी कहानी है और मानवीय संवेदना भरी है तो यह माँ की ममता के आस्था की बात है ! वह आस्था जो किसी भी पेड़ पौधे, पशु,नदी,पहाड़ ,स्थान या मूर्ति में रखी जा सकती है !

    दो तीन दिन पहले मैंने पोस्ट की थी कि सिर्फ प्रतिमा में ही नही ,प्रति माँ में देवी का वास होता है !
    लेकिन यह बात उन्हें कैसे समझाई जा सकती हैं जो देवी माँ पर ही सवाल करते है !

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