मौलानाओ के कम- अक़्ली के कारण इस्लाम बदनाम हो रहा है !

Maulana_Abulhassan

इस लेख को पढ़ते समय इस बात का अवश्य धयान रखें की यह सिर्फ वर्त्तमान में मुसलमानो के आचरण से सम्बंधित है न की ”इस्लाम ‘ से . इस्लाम जहाँ से निकला और जिस रूप में निकला जैसा तब था वैसा अब है । ..हाँ इस्लाम के मानने वालों का चरित्र इस्लामिक नहीं रह गया है .। .अब आप इन बातों का सबूत मांगेगे तो हम आपको यही कह सकेंगे की अल्लाह आपको सद्बुद्धि दे और कम से कम अपने शरीर की खुशबू या बदबू को एहसास के दायरे में महसूस करने की सलाहियत दे ।

मुसलमानों की सामाजिक सरंचना धर्म और कुरआन के निर्देशों पर आधारित है, इस्लाम जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है. और यह बतलाता है की जन्म, वंश और स्थान के आधार पर सभी मुसलमान बराबर हैं. और मुसलमानों में हिन्दुओ जैसी कोई बंद जाति व्यवस्था नहीं है। यह एक सैधांतिक बात है. परन्तु जब हम मुसलमानों को व्यवहार की द्रष्टि से देखते हैं तो पता चलता है कि किसी ना किसी रूप में मुस्लिम समाज में भी इस्लाम के विरुद्ध जाति व्यवस्था कि जड़ें गहरे तक पायी जाती है. और सभी मुसलमान खुद को एक नहीं मानते हैं। केवल इतना ही नहीं, विवाह इत्यादी में भी एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करने में भी कुछ सामजिक और जातीय नियमों का पालन करते हैं। जबकि हाफिज़ -ए – कुरान , मौलाना , मुफ़्ती ,और आलिम और भी न जाने कितने !! फिर भी मुसलमानो का चरित्र क्या से क्या हो गया ? अभी हाल ही मे एक उलेमा का ब्यान पढ़ा , मुझे यह नहीं समझ मे आता की ऐसे लोग इस धरती पर बोझ क्यों बने हैं ??
ऐसे ही और भी तमाम मौलाना है जो अक्सर अपनी कम अक्ली का पैजमा पहन कर मैला बुहारते रहते हैं । शिरमाल और बोटी जहां कहि भी मिले !!

जहां तक धर्म के उन सिद्धांतों का सवाल है जो कुरान के मुताबिक बुनियादी या शाश्वत हैं और सभी धार्मिक परंपराओं में एक समान हैं उनमें बदलाव की न तो कोई आवश्यकता है और न ही ऐसा करना जरूरी है. कुरान कहता है, ‘अल्लाह ने तुम्हारे लिए वही दीन (धर्म) मुकर्रर किया है जिसका उसने नूह (पैगंबर) को हुक्म दिया था और जिसकी वाही (आकाशवाणी) हमने तुम्हारी तरफ की है, और जिसका हुक्म हमने इब्राहिम (पैगंबर), मूसा (पैगंबर और यहूदी धर्म के प्रवर्तक) और ईसा (पैगंबर और ईसाई धर्म के प्रवर्तक) को दिया था कि दीन को कायम रखो और उसमें बिखराव न डालो.’ (कुरान 42.13)
धर्म की इस कल्पना के बारे में मौलाना आजाद अपनी किताब ‘तर्जुमानुल कुरान’ में लिखते हैं, ‘सत्य एक है और सभी परंपराओं में समान है. परंतु उसके आवरण अलग-अलग हैं. हमारा दुर्भाग्य यह है कि दुनिया शब्दों की पुजारी है और अर्थ को अनदेखा कर देती है. सभी लोग एक परमेश्वर की उपासना करते हैं लेकिन उस परमेश्वर के अलग-अलग नामों को लेकर झगड़ते हैं.’ मौलाना आजाद इस साझी आध्यात्मिकता को मुश्तरक हक (साझा सत्य) कहते हैं. वे कहते हैं कि धर्म का उद्देश्य ऐसा मानस निर्मित करना है जिससे दैविक करुणा और सुंदरता प्रतिबिंबित हो सके. वे इस बात पर अफसोस जाहिर करते हैं कि धर्म, जो कि मानवीय एकता पैदा करने का माध्यम है उसका इस्तेमाल एकता को तोड़ने के लिए किया जाता रहा है. मौलाना आजाद जिस साझा सत्य और धर्म के उद्देश्य की बात करते हैं उन्हें कैसे बदला जा सकता है?
इन बुनियादी सिद्धांतों के बाद जो दूसरी बातें हैं उनका संबंध समय से है जोकि निरंतर बदल रहा है. कुरान निरंतर होने वाले परिवर्तनों-जैसे रात और दिन का बदलना, समंदर के ज्वार-भाटे, नदियों का सैलाब, बढ़ती हुई उम्र, इंसानों के अलग-अलग रंग और भाषाएं, विभिन्न सभ्यताओं के उत्कर्ष और पतन आदि – को अल्लाह की निशानियां कह कर पुकारता है और इनका गंभीर अध्ययन करने का आह्वान करता है.।
परिवर्तनों के अध्ययन के इस आह्वान से एक बात स्पष्ट होती है. कुरान यह चाहता है कि हमें न सिर्फ परिवर्तनों का बोध रहे बल्कि हम इनके कारण पैदा हुई नई परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करने के लायक भी बन सकें. कुरान की आयत है- ‘अगर तुम आगे नहीं बढ़ोगे तो अल्लाह तुम्हें दर्दनाक सजा देगा और तुम्हारी जगह दूसरे लोगों को ले आएगा.’ (कुरान 9.39)।
निरंतर परिवर्तन हमारे जीवन की सच्चाई है. अगर किसी बेजान वस्तु जैसे किसी पत्थर को पर्यावरण के प्रभावों से बचाकर सुरक्षित रख दिया जाए तो संभव है कि वह हजार साल बाद भी वैसी ही मिल जाए. लेकिन कोई भी ऐसी वस्तु जिसमें जीवन है, वह चाहे मानव हो या पशु या पेड़-पौधे, वह हर दिन के साथ या तो बढ़ेगी या घटेगी. वह एक सी हालत में रह ही नहीं सकती. प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान इब्ने खल्दून ने अपनी किताब ‘मुकद्दिमा’ में लिखा है, ‘दुनिया के हालात और विभिन्न देशों की आदतें हमेशा एक जैसी नहीं रहती हैं. दुनिया परिवर्तन और संक्रांतियों की कहानी का नाम है. जिस तरह से ये परिवर्तन व्यक्तियों, समय और शहरों में होते हैं, उसी तरह दुनिया के तमाम हिस्सों, अलग-अलग दौर और हुकूमतों में होते रहते हैं. खुदा का यही तरीका है जो उसके बंदों में हमेशा से जारी है.’।
इस्लामी कानून के विशेषज्ञ डॉ. सिबही मेहमसानी ने इब्ने खल्दून के विचारों के आधार पर अपनी किताब ‘फलसफा शरियते इस्लाम’ में लिखा है, ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि दुनिया की इस परिवर्तनशीलता का नतीजा यह है कि मानव समाज का जीवन स्तर बदलने से उसके कल्याण के पैमाने भी बदल जाते हैं. चूंकि मानव की बेहतरी ही कानून की बुनियाद है, इसलिए अक्ल का फतवा यही है कि समय और समाज में तब्दीलियों के साथ-साथ कानून में भी मुनासिब और जरूरी परिवर्तन होते रहें और वह अपने पास-पड़ोस से भी प्रभावित होता रहे.’
एक अन्य इस्लामी विद्वान इब्ने कय्यिम अल जौज़ी ने जोरदार शब्दों में इस बात को रेखांकित किया है, ‘कानून की तब्दीली, समय और काल के परिवर्तन, बदलते हुए हालात और इंसानों के बदलते हुए व्यवहार के साथ जुड़ी है.’ इसी बात को इब्ने कय्यिम ने आगे बढ़ाते हुए कहा है कि मानव समाज और कानून का एक रिश्ता है और इस रिश्ते को न जानने के कारण एक गलतफहमी पैदा हो गई है. इसने इस्लामी कानूनों के क्षेत्र को सीमित कर दिया है.।
इस्लामी कानूनों के दायरे को सीमित करने वालों के बारे में इब्ने कय्यिम लिखते हैं कि जिस कानून में मसालेह इंसानी (लोक कल्याण) का सबसे ज्यादा लिहाज रखा गया हो उसमें ऐसे तंग नजरियों की कोई गुंजाइश नहीं है. यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है कि आज से 800साल पहले इब्ने खल्दून ने और 400 साल पहले इब्ने कय्यिम ने इस बात को स्पष्ट कर दिया था कि कानून का उद्देश्य केवल और केवल लोक कल्याण है.। इस स्थिति को मुजल्लातुल अहकामुल अदालिया (इस्लामी कानून नियमावली) के अनुच्छेद 39 में और ज्यादा साफ कर दिया गया है. वहां कहा गया है, ‘ला युंकिर तघइय्युरिल अहकाम बित तघाय्युरुज्जमन’, अर्थात इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि जमाना बदलने के साथ-साथ कानून भी बदल जाते हैं. इस संदर्भ में मौलाना अलाई की बात भी बहुत महत्वपूर्ण है, ‘कानून का प्रावधान किसी विशेष कारक पर आधारित होता है. उस कारक के समाप्त हो जाने पर वह प्रावधान भी स्वतः समाप्त हो जाता है.’
जब हम इस्लामी कानून के इतिहास पर नजर डालते हैं तो हमें ऐसे अनेक मामले मिलते हैं जहां विभिन्न कारकों के परिवर्तनों के साथ कानून के प्रावधानों में भी जरूरी परिवर्तन किए गए हैं. इसकी कुछ मोटी-मोटी मिसालें हैंः जैसे खिराज वह टैक्स है जो खेती करने वालों को देना होता था. इसकी दरें हजरत उमर (इस्लाम धर्म के दूसरे खलीफा या शासक) के जमाने में तय कर दी गई थीं, लेकिन इमाम अबू यूसुफ ने समय बदलने के साथ इन दरों को कम कर दिया.। इमाम शाफई उन चार इमामों में से हैं जिनके नाम चारों सुन्नी न्याय व्यवस्थाओं के साथ जुड़े हैं. उन्होंने बहुत-सी यात्राएं कीं और वे अपनी विद्वता के लिए प्रसिद्ध हैं. अपनी यात्राओं के बाद इमाम शाफई ने अपनी बहुत -सी मान्यताओं, जिनको इतिहास में इराकी मजहब कहा गया है, को छोड़कर नया मिस्री मजहब इख्तियार कर लिया.
मुस्लिम हुकूमत के पहले दौर में स्कूल में पढ़ाने वाले उलेमा के लिए बड़े-बड़े वजीफे मुकर्रर थे. इस आधार पर इमाम अबू हनीफा और उनके साथियों ने कुरान और दूसरे धार्मिक ग्रंथों को पढ़ाने के लिए उन्हें मेहनताने देने पर पाबंदी लगा दी थी. बाद में जब वजीफे बंद हो गए तो उस समय के उलेमा ने फतवे देकर इस प्रकार की तनख्वाह को जायज करार दे दिया। .काल और समय के परिवर्तन के साथ कानून में परिवर्तन के सिद्धांत को इस्लामी न्यायसंहिता में पूरी मान्यता है. लेकिन ऊपर जितने उदाहरण दिए गए हैं वे उन कानूनों से संबंधित हैं जो मुस्लिम विधि शास्त्रियों की राय और फतवों के आधार पर बनाए गए थे. इनके अतिरिक्त वे कानून भी हैं जिनका आधार कुरान और सुन्नत (परंपराएं) है. इनकी महत्ता इस्लामी कानूनों में सबसे ज्यादा है. हालांकि यह माना जाता है कि कुरान और सुन्नत पर आधारित किसी भी कानून को बदला नहीं जा सकता, लेकिन इतिहास में ऐसी कई मिसालें मिलती हैं. खास तौर से हजरत उमर की खिलाफत के दौर में जहां उन्होंने समय और परिस्थितियों में बदलाव के कारण उन कानूनों और नियमों में परिवर्तन किए जिनका संबंध सीधे कुरान और सुन्नत से था. ऐसे कुछ उदाहरण हैं:
कुरान में खैरात और सदकात (दान-दक्षिणा) के लिए स्पष्ट प्रावधान है: “सदकात दरअसल फकीरों और मिसकीनों (वंचितों) के लिए है, नेक काम में लगे लोगों के लिए, उनके लिए जिनको तकलीफ-ए-कल्ब (दिल भराई) की जरूरत है, गुलामों को आजाद कराने और दूसरों के कर्जे अदा करने के लिए और अल्लाह के रास्ते पर चलने वाले मुसाफिरों की मदद के लिए. (कुरान 9.60)यहां दिल भराई से मतलब वे लोग या नए मुसलमान थे जिनको पैगंबर साहब कुछ रकम दिया करते थे. इस्लामी टीकाकार बैहक्की ने लिखा है कि कुरान के इस प्रावधान के बावजूद हजरत उमर ने दिल भराई वालों का हिस्सा देना बंद कर दिया और कहा कि पैगंबर साहब यह रकम तुम्हें इसलिए दिया करते थे कि तुम्हारी दिल भराई करके तुम्हें इस्लाम पर कायम रख सकें. लेकिन अब ऐसा करने की जरूरत नहीं है.।
हदीस (हजरत मुहम्मद साहब के वचनों का संकलन) की प्रसिद्द किताब ‘सही मुस्लिम’ के मुताबिक पैगंबर साहब, हजरत अबू बक्र (इस्लाम धर्म के पहले खलीफा) और हजरत उमर की खिलाफत के आरंभिक दौर में एक साथ तीन बार कहे गए तलाक को एक ही माना जाता था बाद में जब लोग तलाक में जल्दी करने लगे तो हजरत उमर ने उन्हें एक ही बार में तीन तलाक देने की इजाजत दे दी. (मुस्लिम किताब 009, हदीस नंबर 3493)हजरत उमर ने अपने जमाने के लिहाज से जिस राय को बेहतर समझा उसको लागू किया लेकिन यह भी सही है कि बहुत-से उलमा ने हजरत उमर की इस राय से सहमत नहीं थे और आज भी इस्लामी कानून की कई धाराओं में एक वक्त के तीन तलाक को एक तलाक ही माना जाता है. शेख अहमद मोहम्मद शाकिर ने अपनी किताब ‘निजामे तलाक फी इस्लाम’ में लिखा है कि हजरत उमर का यह फैसला एक हंगामी हुकुम की हैसियत रखता है जो उन्होंने सियासती जरूरत के चलते दिया था.।
* इस्लामी कानून में चोरी की सजा हाथ काटना है और इसका प्रावधान कुरान में है – ‘और चोर मर्द और चोर औरत दोनों के हाथ काट दो, यह उनकी कमाई का बदला है’ (कुरान 5.38)खुद पैगंबर साहब ने इस प्रावधान के तहत चोरी करने वालों को यही सजा दी थी, लेकिन हजरत उमर ने अकाल के समय जनहित में इस सजा को निलंबित कर दिया और इस को आम तौर पर स्वीकार कर लिया गया.। किसी अविवाहित व्यक्ति द्वारा अवैध यौन संबंध की सजा इस्लामी कानून के अनुसार 100 कोड़े और एक साल के लिए उस स्थान से बाहर भेज देना है. लेकिन हजरत उमर के बारे में आया है कि जब उन्होंने राबिया बिन उमय्या को शहर से निकाला तो वह जा कर रोमन लोगों से मिल गया जिनके साथ उस समय जंग चल रही थी. इस पर हजरत उमर ने कहा कि अब मैं कभी किसी को शहर से बाहर नहीं निकालूंगा. हजरत उमर का यह फैसला भी वक्त और हालात के हिसाब से राज्य के हित में लिया गया फैसला था जो साफ तौर पर इस्लामी कानून के प्रावधानों से अलग था.।
**इस्लामी कानून उन अपराधों के मामले में शासक को सजा तय करने का अधिकार देते हैं जहां साफ तौर पर किसी सजा का प्रावधान नहीं है. लेकिन एक हदीस में यह साफ कर दिया गया है कि यह सजा 10 कोड़ों से ज्यादा नहीं हो सकती. मगर हजरत उमर ने एक मामले में, जहां एक आदमी ने सरकारी खजाने की जाली मोहर बना ली थी, 100 कोड़ों की सजा सुनाई. इमाम मालिक जो हदीस के पहले संकलनकर्ता हैं उन्होंने इस मामले में कहा है कि 10 कोड़ों की सजा पैगंबर साहब के समय के हिसाब से सही थी. यह हर दौर में लागू नहीं होती है.।
*हत्या के मामले में इस्लामी कानून में ‘खून बहा’ का प्रावधान है. इसके अनुसार हत्या करने वाले या उसके कबीले पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह एक निर्धारित रकम मारे गए व्यक्ति के परिजनों को दे. लेकिन हजरत उमर ने इस तरीके को बदल दिया. इसका कारण यह था कि उन्होंने पहली बार शासन और फौज को संगठित किया तो सामूहिक सत्ता कबीलों के हाथ से निकलकर सरकार के पास आ गई ।
*इमाम सरखासी ने इस फैसले की तारीफ करते हुए कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि हजरत उमर का यह फैसला पैगंबर साहब की परंपरा से हट जाना था. वास्तव में यह उसी परंपरा के अनुसार था क्योंकि वे यह जानते थे कि पैगंबर साहब ने यह जिम्मेदारी कबीले पर इसलिए डाली थी कि उनके समय कबीला ही शासन और सत्ता की बुनियादी इकाई था. लेकिन सरकारी फौज के संगठित होने के बाद सत्ता फौज के हाथ में आ गई और बहुत बार फौजी होने के नाते आदमी कभी-कभी अपने ही कबीले के खिलाफ जंग करने के लिए मजबूर होता था. दूसरी तरफ इमाम शाफई ने इस तर्क को पैगंबरी परंपरा के खिलाफ कह कर रद्द कर दिया.।
इस बहस से इतना तो साफ है कि इस्लामी परंपरा में कानून कोई जड़ संस्था नहीं है बल्कि हर प्रसंग के प्रति अत्यंत संवेदनशील है. ऐतिहासिक दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि इस्लामी कानून में इतनी जीवंतता और लोच है कि यह बदलते हुए वक्त के हर तकाजों और चुनौतियों का सकारात्मक उत्तर दे सके. इस सिलसिले में सबसे मजबूत और दिलचस्प तर्क सर सैयद अहमद खान (1817-1898) ने दिया है. उन्होंने कहा कि कुरान खुदा का शब्द है और जो कुछ हम दुनिया में देखते हैं वह खुदा का कर्म है. उन्होंने कहा कि यह असंभव है कि खुदा की कथनी और करनी में विरोधाभास हो. अगर हमें दोनों में अंतर नजर आता है तो इसका एक ही मतलब है कि हमने खुदा के कहे को सही तरह से समझा नहीं है. इसलिए हमें उस प्रावधान विशेष के बारे में अपनी समझ की पुनर्समीक्षा करनी होगी और शब्द और कर्म के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा.।
सामंजस्य स्थापित करने और नई परिस्थितियों व चुनौतियों के बीच रास्ता तलाश करने के प्रयासों को कुरान बहुत प्रशंसनीय निगाहों से देखता है और कहता है, ‘और जो हमारे लिए अथक प्रयास करेंगे उन्हें हम अपने रास्ते दिखाएंगे. निस्संदेह अल्लाह अच्छे काम करने वालों के साथ है.’ (कुरान 30.69)।
दुनिया का सबसे विकसित और आधुनिक मजहब पर फिर कट्टरपंथ का भ्रम क्यों?इसे समझना बहुत आवश्यक है !! मैंने अपने लेख में जितने उदाहरण दिए हैं वे सब पहली सदी हिजरी अर्थात सातवीं शताब्दी से लेकर दसवीं शताब्दी तक के हैं. इन्हीं में वे तीन शताब्दियां भी हैं जिनको इस्लाम का स्वर्णिम काल कहा जाता है, खास तौर से आठवीं और नौवीं शताब्दी जब भारतीय और यूनानी किताबों के अनुवाद किए गए. पहली भारतीय पुस्तक ‘सूर्य सिद्धांत’ का अनुवाद फजारी ने 771 में अरबी में किया जिसको “सिंधहिंद” का नाम दिया गया. यह पुस्तक बाद में स्पेन के जरिए पूरे यूरोप में गई और फजारी को अरब खगोलशास्त्र के पिता के तौर पर जाना गया.।
लेकिन यह भी सत्य है कि दसवीं शताब्दी से ऐसी प्रवृत्तियां खड़ी हो गईं विशेषकर अशअरी आंदोलन के नतीजे में जिनकी वजह से बौद्धिक वातावरण पर कुप्रभाव पड़ा और नई सोच व अनुसंधान एक तरह से गंदे शब्द बन गए. *यह माहौल बगदाद पर मंगोल आक्रमण* के बाद और अधिक संकुचित हो गया और सिर्फ पुरानी परंपराओं के पालन को धार्मिक आस्थाओं का अभिन्न अंग मान लिया गया. जस्टिस अमीर अली ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘स्पिरिट ऑफ इस्लाम’ में एक अरब संपादक की टिप्पणी उद्धृत की है, **‘अगर अशअरी और गजाली न हुए होते तो अरबों का समाज गेलिलियो, केल्पेर और न्यूटन का समाज होता.** उन्होंने विज्ञान और दर्शन के अध्ययन की निंदा की और यह आह्वान किया कि धर्मशास्त्र और धार्मिक कानून के अध्ययन के अलावा किसी और विषय की पढ़ाई समय की बर्बादी है.’ अरब संपादक के अनुसार इस आह्वान से मुस्लिम दुनिया का विकास अवरुद्ध हो गया और अज्ञानता और रूढ़िवाद की जड़ें गहरी होती चली गई, । .’
लेकिन यह नहीं मानना चाहिए कि गतिशीलता पूरी तरह समाप्त हो गई है. पूरी दुनिया में जो प्रगति और परिवर्तन हो रहे हैं मुस्लिम उससे कटे हुए नहीं हंै. मगर वे ज्यादातर उस परिवर्तन का लाभ उठाने वालों में शामिल हैं परिवर्तन लाने वालों में नहीं. शैक्षिक विकास के साथ यह स्थिति बदल रही है. मगर उलमा (पेशेवर धर्मगुरु) का एक वर्ग अब भी पुरानी लीक पर जमा हुआ है. इससे इस तर्क को बल मिल जाता है कि पूरा मुस्लिम समाज कट्टरपंथी है.
मुस्लिम उलमा में हमेशा से दो वर्ग रहे हैं. एक, जिनको उलमा-ए-हक कहा गया है जिनमें वे महान सूफी भी हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी किसी संप्रदाय विशेष के लिए नहीं बल्कि अल्लाह की इबादत के लिए समर्पित कर दी. उसी के साथ दूसरा वर्ग भी रहा है जिन्होंने दीन को पेशे के तौर पर इस्तेमाल किया. उन्होंने बादशाहों और हुकूमतों की नौकरियां की और उनकी मर्जी के अनुसार ठकुर-सुहाती फतवे देकर बादशाहों के हर सही और गलत काम को जायज ठहराया. इन्हीं उलमा के फतवों के नतीजे में सरमद जैसे अल्लाह के बंदे को फांसी की सजा दी गई, हजरत निजामुद्दीन औलिया पर दिल्ली के दरबार में मुकदमा चलाया गया. यह भी छोडिए, कर्बला के मामले में जहां पैगंबर साहब के पूरे परिवार को बेदर्दी के साथ शहीद किया गया था – सिर्फ इस जुर्म में कि उन्होंने खानदानी बादशाहत को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था – फतवे देकर इस जुल्म को जायज ठहराया गया. मौलाना आजाद ने अपने एक इंटरव्यू में इन्हीं उलमा के लिए कहा है, ‘इस्लाम की पूरी तारीख उन उलमा से भरी पड़ी है जिनके कारण इस्लाम हर दौर में सिसकियां लेता रहा है.’।
मुसलमान और इस्लाम की छवि हिंदुस्तान में अगर आज ऐसी बन गई है कि यह अतीत में ठहरा हुआ है, तो इसे समझने के लिए हिंदुस्तान के राजनीतिक पक्ष को भी समझना होगा. यहां जो लोग मुसलमानों का नेता होने का दावा करते हैं उनकी व्यक्तिगत आस्था तो कुछ और होती है लेकिन अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की वजह से वे इसके बिल्कुल विपरीत आचरण करते हैं. इसके चलते कई कट्टरपंथी आम लोगों की आस्थाओं को भड़काने में कामयाब हो जाते हैं. एक जमाने से ऐसे लोग बहुत व्यवस्थित तरीके से यह काम कर रहे हैं.। कई आधुनिक मुस्लिम राजनेताओं ने कट्टरपंथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और हमारी राजनीतिक व्यवस्था ने उन्हें इसके लिए जमकर पुरस्कृत किया. ऐसे में मुस्लिम समाज किस तरफ बढ़ेगा और इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा? व्यवस्था बार-बार एक ही संदेश दे रही है कि अगर किसी मुसलमान को हिंदुस्तान की राजनीति में आगे बढ़ना है तो आप कट्टरपंथियों के साथ खड़े होइए, बंद दिमागों को आगे बढ़ाइए. जब यह संदेश एक पढ़े-लिखे मुसलमान को मिलेगा तो हालात कैसे बदलेंगे. 1986 में शाहबानो के मामले के बाद से ही तो इस देश की राजनीति में कट्टरपंथियों का असर बढ़ा है, उसके पहले कहां था यह. यह स्थिति इसलिए भी पैदा हुई क्योंकि आम आदमी को अशिक्षित रखा गया, और इस हद तक कि उसे कुरान को अनुवाद के साथ पढ़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई. जबकि इस्लाम में हर मर्द और औरत को इल्म हासिल करना जरूरी है. अगर हम शिक्षा का विस्तार करने में सफल हो सकें और साधारण व्यक्ति शिक्षित होकर अपने फैसले खुद करने की स्थिति में आ सके तो पेशेवर उलमा पर उनकी निर्भरता ख़त्म हो जाएगी और स्थितियां खुद-ब-खुद सुधरने लगेंगी. यह काम हो रहा है क्योंकि मुसलमानों में शिक्षा का विस्तार बहुत तेज़ी से हो रहा है, खास तौर से महिलाओं में। .
भारत के पृदृश्य मे एक और बात जो वर्तमान मे कश्मीर के मुफ्ती-ए-आजम और ओवैसी जैसी राजनीति को समझने का है । जहां तक अकबरुद्दीन ओवैसी के भाषण से जुड़ा विवाद है तो उस पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. ओवैसी का संबंध मजलिस से है जो पुराने हैदराबाद के रजाकार संगठन का राजनीतिक मंच था. यह वही संगठन है जो हैदराबाद के भारत में विलय के विरुद्ध था, जिसके नतीजे में पुलिस एक्शन हुआ और हैदराबाद के लोगों को एक बड़ी त्रासदी से गुजरना पड़ा. जिस पार्टी का लीडर कासिम रिजवी हैदराबाद के नौजवानों को कलमा पढ़ कर भारतीय टैंकों के सामने कूदने का आह्वान करके खुद कराची भागने में संकोच महसूस नहीं करता, उस पार्टी का एक नातजुर्बेकार कारकुन अगर अपने भाषणों में दूसरी धार्मिक परम्पराओं का अपमान करता है तो मुझे कोई ताज्जुब नहीं है. इस मामले में सवाल ओवैसी से नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी से पूछा जाना चाहिए कि आखिर उन्होंने मजलिस को यूपीए में शामिल क्यों किया. ओवैैसी को तो शायद यह भी नहीं मालूम है कि कुरान हकीम सख्ती के साथ यह कहता है , ‘और जो लोग अल्लाह के सिवा किसी और को पूजते हैं उन्हें गाली न दो वर्ना वे लोग अज्ञानता की बुनियाद पर अल्लाह को गाली देने लगेंगे. ऐसा करने से उनके कर्म लोगों को जायज लगने लगेंगे.’ (कुरान 6.10
यह बात भी सही है कि संगीत के संदर्भ में उलमा के बीच शुरू से मतभेद रहा है. हज़रत निजामुद्दीन पर चलने वाले जिस मुक़दमे का जिक्र मैंने किया है उसका संबंध संगीत ही से था. उलमा के एक वर्ग की मजबूत राय रही है कि संगीत जायज़ नहीं है. वहीं दूसरी तरफ हमें वे उलमा नजर आते हैं (खास तौर से सूफी परंपरा से संबंध रखने वाले) जो संगीत को आध्यात्मिक विकास का माध्यम मानते थे. हमारी अपनी परम्परा में अमीर खुसरो न सिर्फ कवि थे बल्कि संगीत के कई आले (वाद्ययंत्र) खुद उनकी अपनी ईजाद हैं.।
इस्लामी अरब में गाने और संगीत का इतिहास प्रसिद्ध किताब ‘किताबुल अगना’ में मिलता है जो अबुल फराज इस्फहानी (897-966) ने लिखी है. इस किताब में विस्तार से पुरुष और महिला संगीतकारों का विवरण दिया गया है. महिला संगीतकारों में प्रमुख नाम ‘अज्जा अल्मैला’ और ‘जमीला’ के हैं. ये दोनों महिला संगीतकार अपनी कला में निपुण थीं और मदीने में रहती थीं.।
कश्मीर के मुफ्ती-ए-आजम बशीरुद्दीन अहमद के फतवे के संदर्भ में इतना ही कहा जा सकता है कि यह फतवा मुसलमानों के एक हिस्से की राय तो हो सकता है लेकिन इसे इस्लामी नहीं कहा जा सकता. कश्मीर, जो मशहूर सूफी लल्ला आरिफा और शेख नूरुद्दीन (नन्द ऋषि) की सरजमीन है वहां से अगर ऐसा फतवा आता है तो यह अपने आप में विरोधाभास है. पूरी दुनिया में कहीं भी किसी भी मस्जिद में इबादत के समय स्थानीय भाषा में सामूहिक गान नहीं होता है लेकिन कश्मीर की मस्जिदों में नमाज़ के बाद ‘औरादे फतहिया’ का सामूहिक गान होता है. यह गाना कश्मीरियों की इबादत का हिस्सा है. ऐसे कश्मीर में लड़कियों के गाने पर पाबंदी दुर्भाग्यपूर्ण है.।

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20 thoughts on “मौलानाओ के कम- अक़्ली के कारण इस्लाम बदनाम हो रहा है !

  • February 24, 2015 at 9:31 pm
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    बहुत काविश , तह्केीक मेहनत और जांफिंशानेी से लिखा हुआ आर्टिकल , बधाइ !

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  • February 25, 2015 at 9:59 am
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    जैसे आपने इस्लाम् के नियमो मे बदलाव केी बात् केी है और उस्से सहमति व्यक्त केी है ! वैसे हेी कुरान् मे भेी बदलाव् होना चाहिये स्वयम कुरान मे हेी सिर्फ २३ साल के दौरान कुरान् केी आयतो बदलाव् कि शक्ल मे आई हैवह इस बात का सन्देश देतेी है कि आगे भेी बद्लाव् समभव् है कुरान किताब कि शक्ल मे मुहम्मद जेी केमरने के करेीब २०-२५ साल बाद हजरत् उस्मान जेी के जमाने मे पेश केी गयेी थेी ! मुहम्मद जेी केी सब्से प्यारेी और सब से चोतेी पत्नेीआयशा जेी कहा था केी मुहमम्द जेी अय्याम् { समय } मे सुरत अहजाब केी २०० आयते पद्ते थे , देखे तफ्सेीर इत्तेकान् पेज १६१ लेखक्– अल्लामा सियुतेी ! अब इस सुरत मे सिर्फ ७३ आयते है !
    ऐस हेी सुरत बकर का भेी हाल था उसमे भि ७२ आयते होतेी थि जो आज् २८६ आयते है! हमारे पास भेी कुरान केी २ आयते है जो पुरेी कुरान मे कहि नहेी है ऐसा कुरान् के व्याख्याकार दावा करते है ! पहले के शिया मुस्लिम विद्वान कुरान मे ११६ सुरते मान्ते थे जो आज कुरान् मे ११४ है ,यनि दो अध्याय कुरान् मे कम है, इसतरह से सबित होत है कि कुरन भेी अपुर्न है

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    • February 27, 2015 at 8:43 pm
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      आपसे किसने कह दिया जनाब rjk जी !!!! पूरी पोस्ट को हौवा कर पढ़ने से ज्ञान नहीं आता । पूर्वाग्रह से ग्रसित पाठक के लिए यहाँ नहीं मैं कुछ नहीं कह सकता !!!!

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      • February 28, 2015 at 5:58 pm
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        हमने जो भेी धारना बनायेी है वह् कुरान् और अन्य इस्लामिक साहित्य पध् कर् बनायि है

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  • February 25, 2015 at 10:04 am
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    कुरान केी आयते शाने नजुल {आयत् पेश कर्ने का कारन्} है यानेी समय काल परिस्थिति कि गुलाम थेी कोइ सार्व् भौमिक सत्य कुरान् मे बहुत कम है और समय हमेशा बदलता रहता हैफिर कुरान् से क्यो चिप्का जाये

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  • February 25, 2015 at 10:05 am
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    आपके साथ समस्या यह है आंसारी साहब की आप इस्लाम के आदर्शवाद को प्रमाणित करने के लिये दूसरे धर्मो की कमियां निकालते नजर आते हैं. बी गलत है इसलिये सी सही है का तर्क, अतार्किक है. में यहाँ इस्लाम मे कमियां निकालने के लिये नही आया हूँ. लेकिन मेरा मानना है की गैर मुस्लिम लोगो के सामने इस्लाम के पक्ष मे दलील देने की बजाय, हम बहस उन मौलनाओ से करें, जो आपकी नजर मे कम अक्ल है. आज के दौर मे अगर कुछ मुस्लिम संगठनो की कम अकल की वजह से अगर कुछ गैर मुस्लिमो मे इस्लाम के प्रति नफरत नजर आई है, तो वो तभी कम होगी, जब हम कम अक्ल मौलानाओं से ज्यादा बहस करेंगे, ना की वेदो और पुराणो मे कमियां निकालते फिरेंगे. जब खुद के घर मे आग लगी हो तो पहले उसे संभालो.

    इस्लाम मे हिंसा के बहिष्कार को शीशे की तरह साफ बता कर चादर ओढ कर सोने से कुछ नही होगा. अगर इतना ही शीशे की तरह साफ होता तो वो शान्ती स्वत ही आ गयी होती. ये चीज शीशे की तरह साफ नही है. इसलिये गैर मुस्लिमो को छोडो, और असल मैदान मे आओ, उन कम अकल मौलनाओ से दो-दो हाथ करने के लिये. हिन्दुओं मे तो वेदो के नस्‍लवाद और स्त्री-विरोध से लड़ने के लिये उनके खुद के समाज मे ही बगावती लोग उतर आये हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय मे अभी भी भीतर झांकने वाले लोग उतनी प्रचुरता मे नही है. आप भी उसी बीमारी से पीड़ित नजर आ रहे हैं जिससे ये कठमुल्ला पीड़ित है. यानी आपकी इस्लाम की व्याख्या सही, और बाकी लोग भटके हुये या कम अक्ल.

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    • February 27, 2015 at 8:47 pm
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      अब कमी है तो है । आप साबित कर दीजिये की आपका धर्म पूर्ण है ?? दुधे के दाँत से मक्का नहीं चबाया जाता !!!!!! आपके कमेंट को देख कर लगता है की जो शब्द लिखे जा रहे हैं वो भी आपकी समझ से शर्मा रहे होंगे …… ??

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  • February 25, 2015 at 12:38 pm
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    जाकिर जी आप ठीक फरमा रहें हैँ, दूसरे पर दोस निकालने से कटुता घटेगी नहीं बल्कि और बढ़ेगी। सबसे पहले तो फतवों पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि फतवे ही इस्लाम के उन्नति की सबसे बड़ी रुकावट है।

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  • February 25, 2015 at 12:46 pm
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    वैसे अपने कमी को छुपाने के लिए दूसरों की कमी बताने वाले शब्दों को यदि निकाल दिया जाय तो लायंस हन्नान अंसारी जी का लेख तारीफे काबिल है। ऐसा लिखना और सोचना सबके बस की बात नहीं, खासकर इस्लाम में।

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  • February 25, 2015 at 2:06 pm
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    आंसारी साहब हालांकि हिन्दुओं की जातिवादी व्यवस्था से अपने लेख की शुरुआत करके आपने अनेक नामी ऐतिहासिक मुसलमानो की इस्लाम पे राय रखी. लेकिन सवाल यह उठता है की ये नामी मुसलमानो के विचारो या किताबो को इस्लाम की समझ का आधार कैसे बनाया जाये? आप इतिहास के किसी एक आलिम का नाम उठा लीजिये, उसकी आलोचना करने वाले अनेक लोग हो जायेंगे. नामी से नामी सूफ़ी, या शिक्षाविद या प्रोफेशनल. इनके द्वारा लिखित किताब भी इस्लाम के किसी सिद्धांत पे उठे विवाद के समय प्रमाणिक नही मानी जाती. तो फिर इन बड़े बड़े नामो का नाम देने से कुछ हासिल नही होने वाला.
    अंत मे जाके हम इस्लाम की सबसे बेसिक किताबें कुरान और हदीसो मे ही जाना पड़ता है. हमे अपनी तस्कर मे भी इन्ही किताबो से तीर बनाने पडेंगे. कट्टरपंथियो के प्रसार का कारण यही है की वो बेसिक किताबो को ही ढाल बनाते हैं. हमे उन सिद्धांतो से रू-ब-रू होना पड़ेगा, जो इन बेसिक किताबो से उपजे हैं, लेकिन उनकी व्याख्या का इस दुनिया की दूसरी सोच से टकराव हो रहा है. हम . इन सवालो से कअत्राते है

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  • February 27, 2015 at 8:54 pm
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    इस लेख को पढ़ते समय इस बात का अवश्य धयान रखें की यह सिर्फ वर्त्तमान में मुसलमानो के आचरण से सम्बंधित है न की ”इस्लाम ‘ से . इस्लाम जहाँ से निकला और जिस रूप में निकला जैसा तब था वैसा अब है । ..हाँ इस्लाम के मानने वालों का चरित्र इस्लामिक नहीं रह गया है ……”. आपलोग इस लेख के पहले ही लाइन मे पढ़ा होगा … ??? मगर जो किटाणु ब्रेन मे घुसा है वो जब तक नहीं निकलेंगे तबतक ” लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर ” वाली बात ही सच होगी खास कर ………………………….

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  • March 14, 2017 at 9:39 pm
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    जिन लोगो को इस्लाम की बुनियाद यानी कलमा का अर्थ तक नही पता, वो सारी आलिम, मौलाना, मौलवी बने घूमते हैं. एक आम मुस्लिम, मौलानाओ की अक्सरीयत से ही मुसलमान या ईमान की परिभाषा का फ़ैसला करता है, जबकि सत्य कभी बहुमत से निर्धारित नही होता.

    आख़िरी पैगबर मुहम्मद साहब के मुताबिक, समय के साथ, मुस्लिम कहे जाने वाले समुदाय 72 फिरको (इस्लाम की व्याख्याओ) मे बँट जाएगा, और उनमे से 1 को छोड़, बाकी सब शैतान के रास्ते पे चलके जहन्नुम मे जाएँगे. ये भी बात गौर करने की है, कि इस्लाम का कोई भी फिरका, क़ुरान, एकेश्वरवाद पे दोराय नही रखता, फिर भी अधिकांश व्याख्याए शैतान की राह पे तथाकथित मुस्लिमो को लेके जाएगी. यहाँ मैं तथाकथित मुस्लिम इसलिए प्रयोग कर रहा हूँ, क्यूंकी 71 फिरके जो शैतान के रास्ते पे चल के जहन्नुम मे जाएँगे, वो मुस्लिम नही होंगे.

    अब उसी बुनियाद यानी कलमा.

    “ला इलाहा, इलल्लाह, मुहम्मदुर रसूल अल्लाह” ये दो भागो मे विभाजित है. दोनो भागो पे अलग अलग चर्चा करके, फिर मैं क़ुरान और हदीसो के माध्यम से भी इस चर्चा को आगे बढाउन्गा.

    और कैसे कलमा की ग़लत समझ, पूरी क़ुरान और हदीसो को रट डालने के बाद भी शैतान के रास्ते पे इंसान को धकेल देती है, इस्पे चर्चा करूँगा.

    अगले हफ्ते, कुछ फ़ुर्सत मिलेगी, तब विस्तार से चर्चा करूँगा. और उससे पहले भी समय मिला तो, बात को धीरे धीरे आगे बढ़ाऊँगा.

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  • May 11, 2017 at 11:19 pm
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    हम लोग कहते हैं, मुसलमान वो है, जो सिर्फ़ एक अल्लाह को माने. “ला इलाहा इलल्लाह”. मेरे कॉलेज के और यहाँ ओफिस मे जितने भी करीबी दोस्त हैं, वो किसी बहू-ईश्वरवाद मे यकीन नही रखते. जबकि सभी का जन्म मुश्रिक परिवारो मे हुआ है. ये सोच और यकीन, उनका इल्म से आया है. जिसके लिए, मुहम्मद की हदीस है कि, इल्म के लिए, चीन भी जाना पड़े तो जाओ. यानी इल्म से ईमान बढ़ता है, और इसके गवाह, ये अच्छी तालीमशुदा मेरे दोस्त ही नही, दुनिया का लगभग हर बुद्धिजीवी ना मूर्तीपूजा मे यकीन रखता है, ना बहुइश्वर्वाद मे.

    ये ज़रूर है, ईश्वर या ये कहे, इस तंत्र के प्रति उनकी जिग्यासाये बहुत बाकी है. वो प्रकृति के कई ग़ूढ रहस्यो के प्रति अनिश्चित है. ये अनिश्चितता, ईश्वर की उनकी कल्पनाओ को अपार दर्शाती है. जिग्यासा से मुक्त, खुदाई की समझ मे ईश्वर की सीमित परिकल्पना है.

    मैं, और मेरे दोस्त, होली, दीवाली, गणेश विसर्जन, क्रिसमस वग़ैरह मे भाग लेते हैं. लेकिन इन सबको हममे से सभी, कोई धार्मिक नही, बल्कि उत्सावप्रिय सांस्कृतिक कार्यक्रमो की तरह देखते हैं.

    इनमे से कई दोस्त, अपने आप को नास्तिक कहते हैं, लेकिन उनको करीब से जानो, तो पता लगता है, वो बेसिकली दुनिया मे प्रचलित रिलीज़न्स मे भरोसा नही रखते. कठिन समय मे, दोस्तो के लिए शुभकामना या दुआए करते रहते हैं. वो अपने लाभ के लिए, दूसरे से छल के अवसरों का लाभ नही लेते, जो उनके ईमान और, उनके अंतर्मन मे छुपे, ईश्वर के प्रति विश्वास को भी दर्शाता है.

    मेरा प्रश्न यह है कि, तथाकथित मौलानाओ की उम्मा की परिकल्पना मे ये तबका शामिल है? जवाब है नही.

    इसीलिए, मैं जीतने भी हनीफी, मलिकी, शफ़ी, हनबलि, जाफ़री, ज़ैदी, इन सारे स्कूलों की तमाम किताबो और साहित्य को जहालत मानता हूँ.

    अगर हमको इस्लाम की बुनियाद, यानी कलमे का सही अर्थ ही नही पता होगा, तो उसके आगे तो हम हर पहलू पे ग़लत समझ से भर जाएँगे.
    फिर मुसलमान, काफ़िर, उम्मा, खिलाफत, शरीयत, जेहाद हर चीज़ की हम ग़लत समझेंगे. इसी वजह से हम नित नये फ़साद, फित्ना आदि मे फँस रहे हैं. जिस मज़हब की बुनियाद, शांति है, उसका हिंसक स्वरूप सामने आ रहा है.
    हम इस दहशहतगर्दी को तो ग़लत मान लेते हैं. लेकिन इसकी जड़ को नही ढूँढ पाते. क्यूंकी, ये सब उन स्कूलों या शाखाओ से पढ़ कर आए हैं, जिन्हे हम आदर्श मानते हैं.

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    • May 13, 2017 at 9:07 am
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      श्री जाकिर जी दहशत गर्दी की जड़ कुरान ८/६५-६६ है जो काफिरों से जेहाद का आदेश देती है
      केवल इश्वर को मानना ही काफी है किसी भी मनुष्य की १००% बात क्यों मणि जाये?
      उन सभी मनुष्यों कि बातो में गुन्वत्ता की छानबीन होनी चाहिए

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      • May 13, 2017 at 11:09 pm
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        मुहम्मद साहब ने कोई अलग मज़हब चलाया ही नही. इस्लाम एकेश्वरवाद है, एक्व्यक्तिवाद नही. आज कल, ज़्यादातर तथाकथित आलिम, एकेश्वरवाद से ज़्यादा, एक-व्यक्तिवाद के चक्कर मे पड़े हुए हैं. मैने लौकी और कद्दू के हवाले से भी इस एक व्यक्तिवाद पे सवाल, मुसलमानो से किए. वो मिसाल समझाने के लिए मैने दी. इसके अतिरिक्त मैने कई बार, ये दलील भी दी है, कि मुहम्मद साहब इंजीनियर नही थे, डॉक्टर नही थे, सिंगर, कलाकार नही थे. उन्हे तो पढ़ना भी नही आता था, तो हम सुन्नत के तौर पे इनसे भी दूर रहे, क्या? वैसे, इस एक व्यक्तिवाद ने तथाकथित मुसलमानो को इन क्षेत्रो मे फिसड्डी रख दिया है.

        काफ़िर से युद्ध की बात है, तो जिस जमात को कलमा का ही सही अर्थ नही पता, वो तो ग़लत समझ से फ़साद की ओर ही जाएगा.

        आप से मैं इसलिए बहस नही करता, क्यूंकी मुझे पता है, आप जैसे लोग भी उस दिन इस्लाम और क़ुरान पे सवाल उठाना छोड़ देंगे, जिस दिन, अपने को मुसलमान कहने वाला समाज, शांति के पथ को अपना लेगा.

        आप जिस इस्लाम की आलोचना कर रहे हैं, वो सही इस्लाम है ही नही. इसलिए, आप पे गुस्सा या नाराज़ होने का कोई कारण नही. हम दोनो का मकसद एक ही है. जितना, इस फोरम पे आपकी टिप्पणियों से मैं समझ पाया.

        Reply
        • May 14, 2017 at 7:12 pm
          Permalink

          जब मुहमम्द जी अनपढ़ थे
          तो
          कुरान की पहलि आयत
          ९६/१
          पढो , रब के नाम के साथ …
          ऐसा संबोधन क्यों हुआ
          सुनो रब के नामसे …
          ऐसा होना चाहिए था
          अगर अनपढ़ों ने इस्लाम को हाईजेक कर रखा है
          तो फिर इस्लाम में क्यों रहा जाये ?

          Reply
          • May 14, 2017 at 7:17 pm
            Permalink

            जब मुहमम्द जी अनपढ़ थे
            तो
            कुरान की पहली आयत
            ९६/१
            पढो , रब के नाम के साथ …..
            ऐसा संबोधन क्यों हुआ
            सुनो, रब के नाम के साथ ….
            ऐसा होना चाहिए था
            अगर अनपढ़ों ने इस्लाम को हाइजेक कर रखा है
            तो फिर इस्लाम में क्यों रहा जाये

          • May 17, 2017 at 6:50 pm
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            कोई ग़लत इस्लाम को फॉलो कर रहा है, तो उसे इस्लाम से निकलने की ज़रूरत क्या है, वो वैसे ही इस्लाम के बाहर है?
            अब जैसे, किसी दूसरी पोस्ट मे, इस्लाम को शांति का मज़हब बताने वाली, मेरी दलीलो के बाद, हाशिम साहब ने कहा कि मैं तो इब्लिस की चपेट मे आ गया हूँ. यानी मैं, इस्लाम के बाहर हूँ, अब बताओ, जो इंसान इस्लाम के पहले से ही बाहर है, वो और बाहर कैसे आए?

  • May 13, 2017 at 1:39 am
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    अच्छाई, बुराई या इश्वर, शैतान या शांती, युद्ध … अगर हमेशा इसमे उलझे रहोगो तो संसार का कोई भी घर्म जो सर्वोत्तम हुवा तब भी वो आधा ग्यान देगा. बद किस्मतीसे हर इन्सान जो कुछ अच्छे कर्म करने पर बुरे कर्म करने वालो की निंदा करने लगता है. मै खुद मुझमे कई बुराइया देखता हु. ईसी कारण किसी की सोच या जीनेका तरीका या उसके कर्मो को सही या गलत ठहराना मेरे आघीकारो मे नही आता है.
    मैने कुरान नही पढा है पर भगवतगिता पढी है और यकीनसे कह सकता हु की कुरान या बायबल या बुद्ध संहीता या गिता हर घर्म हमे सिखाता है की सिर्फ खुद के अंदर देखो और खुदसे ही लढो, बाहरी दुनीया को काबु करना ऊसमे बदलाव लाना हमारे बस मे नही है. ईस दुनीया को हम ईश्वर या अल्लाह पर छोडदे. ये वो तै करेगा ईस दुनीया का क्या करना है.
    अच्छाई बुराई से परे होती है जींदा रहने की दौड. इसी दौडके कारन हम कइ बार बुरे काम कर जातै है. भुख हर धर्म के ग्यान को पिछे छोड देती है. खाली पेट की जरुरत खाना है, अच्छाई बुराई या मानवतावाद का ग्यान नही.

    मैने कुछ गलत कहा हो ऐसा अगर आपको लगता है तो मुझे माफ करदो.

    Reply
  • May 18, 2017 at 8:21 pm
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    श्रेी जाकिर् जि
    वह तो दुसरो का अरोप है
    यह फैस्ला आप्का तो नहि हो सका है

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