मोदी सरकार के दो साल :टूटे वायदे और विघटनकारी एजेंडा!

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मोदी सरकार के दो साल के कार्यकाल की समीक्षा के मुख्यतः दो पैमाने हो सकते हैं। पहला, चुनाव अभियान के दौरान किए गए वायदों में से कितने पूरे हुए और दूसरा, भारतीय संविधान में निहित बहुवाद और विविधता के मूल्यों की रक्षा के संदर्भ में सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा। मोदी सरकार के दिल्ली में सत्ता संभालने के बाद लोगों को यह उम्मीद थी कि अच्छे दिन आएंगे, विदेशों में जमा काला धन वापिस आएगा और रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे। इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं और गरीबों के भोजन ‘रोटी-दाल’ में से दाल इतनी मंहगी हो गई कि मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए भी उसे खरीदना मुश्किल हो गया है। बेरोज़गारी जस की तस है और हम सब के बैंक खातों में जो पंद्रह लाख रूपए आने थे वे कहीं दिखलाई नहीं दे रहे हैं। जहां तक बहुप्रचारित विदेश नीति का प्रश्न है, किसी को यह समझ में नहीं आ रहा है कि भारत सरकार की विदेश नीति आखिर है क्या। हां, प्रधानमंत्री नियमित रूप से विदेश जाते रहते हैं और दूसरे देशों के नेताओं के साथ उनकी तस्वीरें अखबारों की शोभा बढ़ाती रहती हैं। पाकिस्तान के मामले में सरकार कभी बहुत कड़ा रूख अपनाती है तो कभी अत्यधिक नरम। नेपाल, जिसके साथ हमारे दोस्ताना संबंध थे, भी हम से दूर हो गया है।
‘‘अधिकतम शासन-न्यूनतम सरकार’’ (मैक्सिमम गर्वनेंस-मिनिमल गर्वमेंट) का नारा खोखला साबित हुआ है। सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हो गई हैं और उस व्यक्ति में तानाशाह बनने के चिन्ह स्पष्ट नज़र आ रहे हैं। कैबिनेट व्यवस्था की सर्वमान्य परंपराओं को दरकिनार कर, प्रधानमंत्री ने सब कुछ अपने नियंत्रण में ले लिया है। देश में सांप्रदायिक द्वेश बढ़ा है, सौहार्द कम हुआ है और शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्तता में घटी है।

यह पहली बार है कि जब भाजपा, लोकसभा में सामान्य बहुमत के साथ केंद्र में सत्ता में आई है। और यह साफ है कि वह अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को लागू करने पर आमादा है। मोदी के सत्ता संभालते ही संघ परिवार के विभिन्न अनुषांगिक संगठन अतिसक्रिय हो गए। पुणे में मोहसिन शेख नामक एक सूचना प्रोद्योगिकी कर्मी की हिंदू राष्ट्रसेना के कार्यकर्ताओं ने खुलेआम हत्या कर दी। संघ परिवार के सदस्य संगठनों ने हर उस व्यक्ति और संस्थान को निशाना बनाना शुरू कर दिया और उसके खिलाफ घृणा फैलानी शुरू कर दी जो सत्ताधारी दल के एजेंडे से सहमत नहीं था। केंद्र में मंत्री बनने के पहले, गिरिराज सिंह ने कहा कि जो लोग मोदी को वोट देना नहीं चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। पार्टी की एक अन्य नेता साध्वी निरंजन ज्योति ने उन लोगों को हरामजादा बताया जो उनकी पार्टी की नीतियों से सहमत नहीं थे। सत्ताधारी दल और उसके पितृसंगठन आरएसएस से जुड़े सभी व्यक्तियों ने एक स्वर में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध विषवमन करना षुरू कर दिया और हमारे शक्तिशाली प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे। यह कहा गया कि प्रधानमंत्री से आखिर यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे हर छोटी-मोटी घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें। ऐसा लगता है कि उनकी चुप्पी सोची-समझी और आरएसएस के ‘‘श्रम विभाजन’’ का भाग थी। यह बार-बार कहा जाता है कि जो लोग घृणा फैला रहे हैं वे मुट्ठीभर अतिवादी हैं जबकि सच यह है कि वे लोग शासक दल के प्रमुख नेता हैं।

हिंदुत्व की राजनीति, पहचान से जुड़े मुद्दों पर फलती-फूलती है। इस बार गौमाता और गौमांस भक्षण को बड़ा मुद्दा बनाया गया और इसके आसपास एक जुनून खड़ा कर दिया गया। इसी जुनून के चलते, दादरी में मोहम्मद अख़लाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और देश के अन्य कई स्थानों पर हिंसा हुई। उसके पहले, दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या कर दी गई थी। दादरी की घटना ने पूरे देश का ध्यान बढ़ती हुई असहिष्णुता की ओर खींचा और कई जानेमाने लेखकों, वैज्ञानिकों और फिल्म निर्माताओं ने उन्हें मिले पुरस्कार लौटा दिए। इसे गंभीरता से लेकर देश में तनाव को कम करने के प्रयास करने की बजाए, पुरस्कार लौटाने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया गया। यह कहा गया कि वे राजनीति से प्रेरित हैं या पैसे के लिए ऐसा कर रहे हैं।

जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि यह सरकार शैक्षणिक संस्थाओं में घुसपैठ करना चाहती है। प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में चुन-चुनकर ऐसे लोगां की नियुक्तियां की गईं जो भगवा रंग में रंगे हुए थे। गजेन्द्र चौहान को भारतीय फिल्म व टेलीविजन संस्थान का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति का विद्यार्थियों ने कड़ा विरोध किया परंतु उसे नज़रअंदाज कर दिया गया। हैदराबाद केंद्रीय विष्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को निशाना बनाया गया। स्थानीय भाजपा सांसद बंगारू दत्तात्रेय ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री से यह शिकायत की कि विष्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी और जातिवादी गतिविधियां चल रही हैं। मंत्रालय के दबाव में विष्वविद्यालय ने रोहित वेमूला और उनके साथियों को होस्टल से निष्कासित कर दिया और उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी। इसी के कारण रोहित ने आत्महत्या कर ली।

शैक्षणिक संस्थाओं के संबंध में सरकार की नीति का देशव्यापी विरोध हुआ। फिर जेएनयू को निशाना बनाया गया और कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का झूठा आरोप मढ़ दिया गया। जिन लोगों ने राष्ट्रविरोधी नारे लगाए थे उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया। इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया गया कि केवल नारे लगाना देशद्रोह नहीं है। एक छेड़छाड़ की गई सीडी का इस्तेमाल जेएनयू के शोधार्थियों को फंसाने के लिए किया गया। उन पर देशरोह का आरोप लगाए जाने से राष्ट्रवाद की परिभाषा पर पूरे देश में बहस छिड़ गई। आरएसएस के मुखिया ने एक दूसरा भावनात्मक मुद्दा उठाते हुए कहा कि युवाओं को भारत माता की जय का नारा लगाना चाहिए। इसके उत्तर में एमआईएम के असादुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अगर उनके गले पर छुरी भी अड़ा दी जाए तब भी वे यह नारा नहीं लगाएंगे। आरएसएस के एक अन्य साथी बाबा रामदेव ने आग में घी डालते हुए यह कहा कि अगर संविधान नहीं होता तो अब तक लाखों लोगां के गले काट दिए गए होते। यह समझना मुश्किल नहीं है कि यह कितनी भयावह धमकी थी।

कुल मिलाकर, पिछले दो सालों में संघ के प्रचारक मोदी ने देश को हिंदू राष्ट्र बनने की ओर धकेला है और भारतीय राष्ट्रवाद को गंभीर क्षति पहुंचाई है। सच्चा भारतीय राष्ट्रवाद उदार है और उसमें अलग-अलग धर्मों और जातियों व अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों के लिए स्थान है। इसके विपरीत, सांप्रदायिक राजनीति भावनात्मक मुद्दों को उछालने में विष्वास रखती है जिनमें गौमांस, राष्ट्रवाद और भारत माता की जय जैसे मुद्दे शामिल हैं। इस सरकार के कार्यकाल के अभी दो साल बाकी हैं। अभी से यह स्पष्ट दिखलाई पड़ रहा है कि सरकार का एजेंडा विघटनकारी है और इसकी नीतियां आम लोगों के हित में नहीं हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत, समावेशी प्रगति की राह पर चले और लोगों के बीच सद्भाव और प्रेम हो। परंतु ऐसा होता नहीं दिख रहा है।
sources— http://loksangharsha.blogspot.com/

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7 thoughts on “मोदी सरकार के दो साल :टूटे वायदे और विघटनकारी एजेंडा!

  • May 16, 2016 at 12:22 pm
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    Kuldeep Kumar
    10 May at 13:07 ·
    उसने चाय बेचीं लेकिन किसी ने पी नहीं। उसने शादी की लेकिन किसी को बताया नहीं। उसने पढ़ाई की लेकिन कोई साथ नही पढ़ा। उसने डिग्री ली लेकिन कही नही मिल रही। वो अच्छे दिन लाया लेकिन किसी को दिखे नहीं। वो काला धन लाया लेकिन किसी को भनक भी नहीं। उसने पाकिस्तान की ईंट से ईंट बजाई लेकिन किसी को आवाज भी नहीं आई। कृपया उसका नाम मत पूछना।

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  • May 21, 2016 at 4:38 pm
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    फिलहाल असम के लिए अच्छी ख़बर ये है कि अब असम भी मेनस्ट्रीम मीडिया की डेली कवरेज का हिस्सा होगा… पहले बाढ़ की भी खबर नहीं आती थी… अब साइकिल पंचर होने पर भी मुख्यमन्त्री और प्रधानमंत्री जिम्मेदार होंगे.

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    • May 21, 2016 at 7:29 pm
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      बहुत अच्छा हो की असम और नार्थ ईस्ट को अधिक से अधिक कवरेज मिले भारत का बहुत ही सुन्दर और प्यारा इलाका हे वो सारा का सारा . और असम से तो मुझे बेहद प्यार हे वहां के लोग भी बहुत अच्छे हे मुझे बहुत स्वीट लगते हे

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  • June 12, 2016 at 7:41 pm
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    Balendu Swami30 May at 08:25 · Vrindavan · आप लोगों को दिक्कतें क्यों है मोदी सरकार से, पता नही….पर उनकी सरकार की कुछ शानदार उपलब्धियां भी हैं, आईये, ज़मीन का आदमी हूँ….ज़मीन दिखाता हूँ..1. जो रेल किराया पहले लखनऊ से कानपुर के बीच 45 रुपए था, जनता जनार्दन की बेहद मांग पर आज 78 रूपये हो गया है।2. प्लेटफार्म टिकट 3 रूपये था और आज 10 रुपए है।3. 98 रूपये मे अनलिमिटेड आ जाने वाला 2G नैट पैक आता आज 246 रूपये मे आता है, पहले काल रेट 30 पैसे मिनट थी, आज इस सरकार ने 1 रूपये मिनट कर दी।4. जब कच्चा तेल 119 डॉलर बैरल था और पैट्रोल 67रूपये लीटर था आज कच्चा तेल 30 डॉलर बैरल तो भी मैँ पैट्रोल कम से कम 62 रूपये लीटर मे दे रही है ये सरकार।5. पहले दाल 60-70 रूपये किलो थी और आज 130-170 रुपए किलो है।6. सर्विस टैक्स 12.36% था आज इस सरकार ने अधिक विकास करने हेतू 14.5% कर दिया है।7. एक्साइज ड्यूटी 10% थी आज 12.36% है।8. डॉलर का रेट 57.50 था आज 68 है।9. 100 करोड रुपये की गैस सब्सिडी खत्म करवाने के लिए इस सरकार को 250 करोड के विज्ञापन देने पड़े।10. RTI के अनुसआर स्वच्छता अभियान का विज्ञापन 250 करोड़ के दिये, लेकिन सफाईकर्मियों की तनख्वाह के लिए इस सरकार के पास 35 करोड़ नही मिलते हैं।11. किसान टीवी पर सालाना 100 करोड का खर्चा दे रही है ये सरकार क्योंकि इस चैनल के सलाहकार व आधे कर्मचारी आरएसएस के किसी न किसी संगठन से है।12. किसानों की सब्सिडी छीनना इस सरकार की मजबूरी है।13. पिछली सरकारों को योगा के बारे में जानकारी ही नही थी, इस सरकार ने योगा डे के लिए 500 करोड़ जारी किये। रामदेव को हरियाणा स्कूलो मे योगा सिखाने के लिए सालाना 700 करोड़ है।4. स्कूलो के लिए इस सरकार के पास पैसे नहीं होते इसलिये मजबूरन प्राथमिक शिक्षा के बजट में 20% की कटौती करनी पड़ी।15. कॉरपोरेट को 64000 करोड टैक्स छूट देने के लिए तो है मगर आत्महत्या कर रहे किसानों का ऋण चुकाने को 15000 करोड नहीं है।
    16. स्किल इंडिया के लिए 200 करोड़ का विज्ञापन बजट है मगर युवाओंकी छात्रवृति मे 500 करोड़ की कटौती करनी पड़ी क्योंकि वे भारत माता की जय नही बोलते।17. सरकार घाटे में हैं, रेलवे की जमीनें बेचने का टेंडर पास कर दिया है क्योंकि अडानी को 22000 करोड़ देने है18. माल्या को 9000 करोड़ लोन लेकर भाग गया कोई बात नहीं देश के हर किसी का केवल 75 रुपया ही तो गया ।

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  • June 22, 2016 at 1:46 pm
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    Yashwant Singh : आज गुस्सा आ रहा है। टैक्स टैक्स टैक्स। रेल टिकट ऑनलाइन बुक करने पर। बैंक में अकाउंट रखने पर। अकाउंट में पैसा कम रखने पर। रेस्टोरेंट में खाने पर। गूगल से पैसा कमाने पर। सर्वर की सेवा लेने पर। तीर्थ यात्रा के लिए जाने पर। UFFFFFFFF…..
    आज एक टिकट ऑनलाइन बुक किया तो सर्विस टैक्स, सुपरफास्ट चार्ज आदि के बाद दस रुपया ऑनलाइन पेमेंट करते वक्त आनलाइन बैंकिंग के नाम पर काट लिया। ये मोदिया क्या चाहता है कि ऑनलाइन कामकाज बंद कर सब मैनुअल किया जाए? तो फिर डिजिटल इंडिया की नौटंकी क्यों कर रहा है?
    ये मोदिया तो भारतीय मध्यवर्ग को बधिया करके मानेगा। मनमोहना चुप्पी साध कर टेंटुआ दबाता था और ये मुंह का बवासीर लात खा खा के आम भारतीयों को लूट चूस रहा है। कहाँ गए हरामखोर भजपईए जो तेल सब्जी आदि की महंगाई को लेकर जगह जगह रैली धरना प्रदर्शन निकालते थे। लगता है अब सबने अपने मुंह में मोदी की लेमनचूस चांप रखी है जिसके कारन बोल नहीं निकल रहे। चुप्पा मनमोहना से महा घटिया निकला ये बकबकी मोदियाशेम शेम शेम भजपयियों। तुम जैसा दोगला, जन विरोधी और झुठ्ठा कोई दूजा नहीं। अब भी समझ लीजिये कि राज करने में फेल ये ससुरे क्यों बार बार मुल्ला पाकिस्तान पलायन मस्जिद मंदिर करते रहते हैं। इन भजपयियों को मारो चार जूते और गिनो एक, तभी इनका दिमाग दुरुस्त होगा।

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  • June 22, 2016 at 10:20 pm
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    योग दिवस – फिट रहने के लिए कितना अच्छा तरीका हे न योग करो और फिट रहो ? हम जैसे मुर्ख मत बनो की कल मेने फिट रहने के लिए पंद्रह किलोमीटर की दौड़ लगाई हड्डिया तो कीर्तन कर ही रही हे खेर उसकी तो आदत हे मगर दोनों बाहो के ऊपरी हिस्सों पर भी उमस पसीने की रगड़ के कारण जख्म से हो गए हे ज़ाहिर हे की ये” बेवकूफी ” हे फिट रहने के लिए आराम से योग करो और फिट रहो .हे ना . ? हालांकि मोदी की बात से सहमत नहीं हु की वो अपनी फिटनेस का श्रय योग को देते हे मेरे ख्याल से उनकी जबदस्त फिटनेस का राज़ हे उनका पिछले पचीस सालो से लगभग लगातार सत्ताओ में रहना सत्ता बेहद फिट कर देती हे शायद ही कोई नेता हो जब तक सत्ता में हो अपार फिट ना दिखे ? सत्ता से हटने पर ही इनकी हालात बिना मेकप की हीरोइन जैसी हो जाती हे दस साल तक हमने कपिल सिब्ब्लो का हसता मुस्कुराता दमकता चेहरा देखा अब देख लो उनकी उजड़ा चमन जैसी हालात ? खास छोड़ो आम आदमी भी सत्ता में बेहद फिट रहता हे एक हमारी बुजुर्ग लेडी थी 75 की उम्र में भी बेहद फिट चाक चौबंद उसके बाद उनके दो काबिल पचास साला बेटो में से एक की डेथ हो गयी दूसरा बीमार हो गया सत्ता बहुओं के हाथो में चली गयी बरसो से उनके हुकुम के गुलाम आश्रितों रिश्तेदारों ने भी एक दो बार उनकी बात टाल दी थी फिर दो ही सालो में उनकी भी डेथ हो गयी

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  • October 23, 2018 at 10:37 am
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    Nazeer Malik
    2 mins ·
    इतिहास के आइने में प्रयाग और इलाहाबाद
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    भारत में आर्य आ चुके थे। जब वे पंजाब से नीचे उतर कर आगे बढे तो गंगा यमुना का संगम केन्द्र भी उनके हिस्से में आ गया। कालांतर में संगम की महत्ता बढ़ी। शासक वर्ग संगम के जल को महत्वपूर्ण मानने लगा। इसलिए संगम तट के किनारे शासक संरक्षित कुछ खास पुरोहितगण परिवार सहित बस गये। जो शासकों, उनके अधीन सामंतों को कर्मकांड की सुविधाएं उपलब्ध कराते थे। मुस्लिमों के आगमन तक संगम से थोड़ी दूर पर कुछ पुरोहित परिवार ही रहते थे। बहुत बाद में उन पुरोहित परिवारों की बढी तादाद ने एक छोटी बस्ती का रूप ले लिया और उसे प्रयाग के रूप में जाना गया । मुगलकालीन ऐतिहासिक पुस्तके मसलन अकबरनामा, आइने अकबरी से पता चलता है कि अकबर महान ने 1574 ई. के में गंगा के करीब एक किले की नींव डाल कर इलाहाबाद नाम से एक नया नगर बनाने का काम शुरू किया। लेकिन प्रयाग के रूप में बस्ती का वह स्वरूप बना रहा।
    दरअसल सोलहवीं शताब्दी में अकबर के शासनकाल में इलाहाबाद के करीब मैदानी इलाकों में राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र और तत्कालीन बड़े शहर कड़ा मानिकपुर में एक घटना हुई और सम्राट अकबर को कड़ा मानिकपुर आना पड़ा। यहां आकर अकबर को राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से इस क्षे़त्र में किला बनाना अधिक उपयुक्त लगा। फलतः उसने संगम तट पर एक किले का निमार्ण शुरु किया और वहां एक छावनी बनाया। किले से नगर बसाने का यह काम 1574 से 1583 के बीच हुआ। नए शहर का नाम इलाहाबाद रखा गया। यहां यह ध्यान देने की बाद है कि प्रयाग नाम से एक आध दर्जन पुरोहित परिवारों की बस्ती तब भी प्रयाग नाम से जानी जाती रही। मतलब साफ है कि अकबर के काल में प्रयाग और अलाहाबाद का अलग अलग अस्तित्व बना रहा।
    अब सवाल है कि अगर शहंशाह अकबर ने गंगा तट पर नगर बसाया तो प्रयाग कहा गया। मध्यकालीन इतिहासकारों का बहुमत मानता है कि मुमकिन है कि गंगा की बाढ में पुरोहितों की बस्ती उजड़ गई हो, अथवा उन्होंने जगह बदल दी हो। या उसका अकार सिमट गया हो। इसकी पुष्टि इलाहाबाद क्षेत्र में गंगा भूमि के अध्ययन से भी होती है। उस जमाने में बांध नहीं नहीं होते थे। अकबर ने किले और सुरक्षा के लिए पहली बार बांध बनवाया। प्रयाग उस बांध के कमांड एरिया से बाहर था।
    बहरहाल मुगलों के पतन के बाद सन 1801 में प्रयाग और इलाहाबाद पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। तब उन्होंने यमुना तट पर अपनी छावनी बनानी शुरू की। फिर वहां चर्च बनने लगे। छावनियां बनने लगीं। इस दौर में इलाहाबाद बढ़ने लगा और प्रयाग का हिस्सा वैसे ही रह गया। 1857 की जंग के बाद सन 1858 में अंग्रेजों ने इलाहाबाद को संयुक्त प्राविंस की राजधानी बना दिया। लिहाजा यह शहर तेजी से बढ़ने लगा। बिटिश शासन में आबादी इतनी तेजी से बढ़ी के की प्रयाग भूमि और इलाहाबाद मिल कर एक हो गया। आजादी के बाद ही यही स्थिति कायम रही। जो आज भी कायम है।
    सवाल यह है कि अकबर ने तो प्रयाग का नाम बदला नहीं। प्रयाग और इलाहाबाद दोनों का वजूद कायम रहा। अब समय का फेर देखिए आजादी के बाद इलाहाबाद जिला एंवं मंडल मुख्यालय बन गया और प्रचीन प्रयाग के लिए कुछ नहीं हुआ। तत्कालीन सत्ताधारी दल और पिक्ष के संस्कृति रक्षक राष्ट्रवादी संगठन दोनों ही इस दिशा में उदासीन रहे। तो इसमें बेचारा अकबर क्या करे?
    ऐसे में सरकार द्धारा इलाहाबाद का नाम बदलने से बेहतर था कि जहां प्रयाग का वजूद माना गया है, वहां कल कारखाने लगाये, स्कूल और अस्पताल खोलिए। प्रयाग की सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए वहां सांस्कृतिक केन्द्र बनाइये और इलाहाबाद मंडल के बजाये उसे प्रयाग मंडल का नाम दीजिए। तो यह न्याय होगा। लेकिन वोट की राजनीति के आगे न्याय और सांस्कृतिक उत्थान की परवाह ही किसे है?
    ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तांन बहुत ही बकवास फिल्म लग रही हे ऐसा लग रहा हे की क्रांति में किसी vfx जोड़ दिए हे बस , यशराज बैनर ने लगता हे फिर से आमिर को ठग लिया हे इससे पहले भी फना जैसी बेहूदा खेर ये भी हे की आमिर जैसे रचनात्मक आदमी को अमिताभ जैसे बकवास और रचनात्मकता के दुश्मन और कायर आदमी की छाया से भी बचना चाहिए था अफ़सोस आमिर के लिए खेर अजय ब्रह्मताज़ जी का शानदार लेख ——अजय ब्रह्मताज़संडे नवजीवन : राष्ट्रवाद का नवाचार
    संडे नवजीवन
    राष्ट्रवाद का नवाचार
    -अजय ब्रह्मात्मज
    सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ पर हिंदी फिल्म ‘उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक’ का टीजर आया. इस फिल्म में विकी कौशल प्रमुख नायक की भूमिका में है. 1 मिनट 17 सेकंड के टीजर में किसी संय अधिकारी की अनुभवी.आधिकारिक और भारी आवाज़ में वाइस् ओवर है. बताया जाता है कि ‘हिंदुस्तान के आज तक के इतिहास में हम ने किसी भी मुल्क पर पहला वार नहीं किया. 1947,61,75,99… यही मौका है उनके दिल में डरर बिठाने का. एक हिन्दुस्तानी चुप नहीं बैठेगा. यह नया हिंदुस्तान है. यह हिंदुस्तान घर में घुसेगा और मारेगा भी.’ वरिष्ठ अधिकारी की इस अधिकारिक स्वीकारोक्ति और घोषणा के बीच जवान ‘अहिंसा परमो धर्मः’ उद्घोष दोहराते सुनाई पड़ते हैं. सभी जानते हैं कि पाकिस्तान ने 18 सितम्बर 2016 को कश्मीर के उरी बेस कैंप में घुसपैठ की थी और 19 जवानों की हत्या कर दी थी. भारत ने डर बिठाने की भावना से सर्जिकल स्ट्राइक किया था. इस सर्जिकल स्ट्राइक को देश की वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय गर्व और शोर्य की तरह पेश कर अपनी झेंप मिटाई थी. गौर करें तो इस संवाद में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया है,लेकिन युद्ध के सालों से पाकिस्तान का ही संकेत मिलता है.इसमें 196 की ज़िक्र नहीं आता. जिस नया हिंदुस्तान’ की बात की जा रही है,वह सीधे तौर पर वर्तमान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ का अनुवाद है.
    याद करे कभी हिंदी फिल्मों के नायक ‘ ये पूरब है पूरबवाले,हर जान की कीमत जानते हैं’ और ‘है प्रीत जहां की रीत सदा,मैं गीत वहां के गता हूँ. भारत का रहनेवाला हूँ,भारत की बात सुनाता हूँ’ जैसे गीतों से भारत की विशेषताओं का बक्कन किया करते थे. राष्ट्र और राष्ट्रवाद फिल्मों के लिए नयी चिंता या टूल नहीं है. आज़ादी के पहले की मूक और बोलती फिल्मों में कभी प्रछन्न और अप्रत्यक्ष रूप से तो कभी सीधे शब्दों में भारतीय अस्मिता की पहचान और राष्ट्र गौरव का उल्लेख होता था. आज़ादी के पहले स्वतंत्रता की लडाई के दौर में मुक्ति की चेतना और गुलामी के विरुद्ध जागरूकता फैलाने में फ़िल्मों की छोटी-बड़ी भूमिका रही है. विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवाद में फिल्मों की भूमिका और योगदान पर पारंपरिक पर्चे तो लिखे गए हैं,लेकिन फिल्मों का व्यवहारिक और उपयोगी अध्ययन और विश्लेषण नहीं किया गया है. मुग़ल बादशाहों और राजपूत राजाओं की हाथों का मकसद कहीं न कहीं दर्शकों को यह बताना और जाताना रहा है कि गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हिंदुस्तान कभी शांति,समृदधि और संस्कृति का केंद्र था. सत्य,धर्म,अहिंसा और लोकतंत्र की राह पर चल रहे भारत ने कभी पडोसी देशों पर आक्रामण नहीं किया. भारत की भूमि में कदम रखे व्यक्तियों को मेहमान माना और उन्हें बार-बार सत्ता तक सौंप दी. कुछ तो यहीं बस हाय और भारतीय समाज में घुलमिल गए,जिनमें से कुछ को अलगाने और छांटने की कोशिश की जा रही है. और कुछ शासक बन कर लूटते रहे. हिंदी फिल्मों में में इनका यशोगान मिलता है तो साथ ही शासकों के खिलाफ छटपटाहट भी जाहिर होती है.
    हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद कभी मुखर तरीके से व्यक्त नहीं हुआ.आज़ादी के पहले अंग्रेजों के सेंसर का डर रहता था. आज़ादी के बाद राष्ट्र गौरव के बदले राष्ट्र निर्माण पर जोर दिया जाने लगा नेहरु के सपनों के सेक्युलर भारत के चरित्र गधे गए. इन फिल्मों में विविधता में एकता और राष्ट्रीय एकता के संवैधानिक सिद्धांतों को चरित्रों और संवादों में पिरोया जाता था. तब फिल्मों में वर्णित राष्ट्रवाद ‘भारत’ के लिए लक्षित होता था. वह किसी राजनीतिक पार्टी के एजेंडा या किसी नेता के भाषण से निर्दिष्ट या संचालित नहीं होता था.यह शोध और अध्ययन का विषय हो सकता है कि कैसे नेहरु और शास्त्री के आह्वान देश के प्रधानमंत्री के आग्रह के रूप में फ़िल्मकारों ,कलाकारों और नागरिकों तक संप्रेषित होते थे,जबकि आज प्रधानमंत्री का आह्वान किसी राजनीतिक पार्टी के नेता मोदी के आदेश के रूप में सुनाई पड़ता है. यही कारण है कि आज की फिल्मों में राष्ट्रगान,भारतीय तिरंगा या भारत की गौरव गाथा सुन कर राष्ट्रीय भावना का संचार नहीं होता. ‘वन्दे मातरम’ का उद्घोष ‘बोलो वन्दे मातरम’ का आदेश बन जाता है. डर लगता है कि जयघोष नहीं किया या बीच फिल्म में ‘जन गण मन’ सुन कर खड़े नहीं हुए तो कोई अदृश्य हाथ कालर पकड़ कर खींचेगा और ‘मॉब लिंचिंग’ के लिए ‘न्यू इंडिया’ के भक्तों के बीच ड्राप कर देगा. राष्ट्रवाद धीरे से अंधराष्ट्रवाद और फिर फर्जी राष्ट्रवाद में बदल गया है.
    यह अनायास नहीं हुआ है. हम इसी सदी की बात करें तो ‘लगान’ या ‘चक दे इंडिया’ देखते हुए कतई भान नहीं होता कि देशभक्ति की घुट्टी पिलाई जा रही है. भुवन और कबीर खान का संघर्ष और प्रयत्न भारत के लिए है. वे अपे परिवेश और माहौल में गुलामी और क्षेत्रीयता से निकलना चाहते हैं. उनकी एकजुटता उस विजय के लिए है,जो सामूहिक है.’चक दे इंडिया’ और ‘गोल्ड’ को आगे-पीछे देखें तो स्पष्ट हो जायेगा कि फ़िल्मकार किस तरह के दबाव में सृजनात्मक एकांगिता के शिकार हो रहे हैं. ‘चक दे इंडिया’ का कबीर खान भी ‘इंडिया’ के लिए टीम बना रहा है और ‘गोल्ड’ के तपन दास की ‘इंडिया’ की जीत की आकांक्षा में फर्क है. एक खेल में जीत चाहता है तो दूसरा देश के रूप में जीत चाहता है.’हमरी टीम लंदन में ब्रिटेन को हरा कर 200 सालों की गुलामी का बदला लेगी’ या ‘हम अपना झंडा फहराएंगे और राष्ट्र गान गायेंगे’ जैसे संवाद बोलता तपन दास फर्जी देशभक्त जान पड़ता है. यह थोपा गया राष्ट्रवाद है,जो इन दिनों फैशन में है. इसे संयोग कहें या सुनियोजित चुनाव कि अक्षय कुमार ‘न्यू इंडिया’ के भारत कुमार के रूप में उभरे हैं. उनकी फिल्मों ‘एयरलिफ्ट’,‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ और ‘पैडमैन’ में भी राष्ट्रवाद छलकाया गया है है. नीरज पाण्डेय ने ‘बेबी’ में उन्हें देशभक्ति दिखाने का पहला मौका दिया. उसके बाद उनकी फिल्मों में लगातार देशभक्ति और राष्ट्रवाद के सचेत संदेशात्मक संवाद होते हैं. मनोज कुमार और अक्षय कुमार की प्रस्तुति और धरना में बड़ा फर्क है. हम सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर मनोज कुमार ने ‘जय जान जय किसान’ के नारे को लेकर ‘उपकार’ लिखी और निर्देशित की. अभी प्रधानमंत्री ने नहीं कहा है,लेकिन सभी उन्हें सुननाने में लगे हैं. कभी जॉन अब्राहम तो कभी कोई और देशभक्ति के ‘समूह गान’ में शामिल होता दिखता है.अभी का फर्जी राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद से प्रेरित है,जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर रचा जा रहा है.इसकी शुरुवात तो ‘आज़ादी’ के नारे से होती है,लेकिन आखिर में ‘हर हर महादेव’ सुनात्यी पड़ता है. कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ का टीजर आप सभी ने देख ही लिया होगा. समस्या हिन्दू प्रतीकों और जयकारों से नहीं है. समस्या उनके जबरन उपयोग या दुरुपयोग को लेकर है. फिल्म शुरू होने के पहले सिनेमाघरों में राष्ट्र गान कई साल पहले से अनिवार्य हो चुका है,उसके सम्मान में खड़े होने या न हो पाने का विवाद पिछले चार सालों में समाचारों में आने लगा है.’भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह का संघर्ष भारत के एक खिलाडी का संघर्ष ‘सूरमा’ तक आते-आते भिन्न अर्थ ले लेता है.न्यू इंडिया के ‘राष्ट्रवाद’ का दवाब इतना ज्यादा है की सामान्य प्रेम कहानियों एन भी किसी न किसी बहने इसे लेप और थोपा जा रहा है..–
    (श्रोत …… मुगलकालीन भारत, भारत का मध्यकालीन इतिहास, आइने अकबरी, आदि पुस्तकें।)—————–सिकंदर हयात सिकंदर हयात 11 days ago
    कितना शोषण हे कितना टॉर्चर हे कैसे जानवर हो रहे हे लोग , पिछले दिनों इसका नज़ारा देखा मेरे शादी शूदा बच्चे वाले मुस्लिम दोस्त को फ्लेट की जरुरत पड़ गयी उसके मुस्लिम मकान मालिक ने बिना उसे बताये फ्लेट बेच दिया और फ़ौरन खाली करने को परेशान करने लगा वही हम सब भारत के आम शरीफ लोग उसे खाली करने से कोई ऐतराज़ ना था उसे परेशानी थी की करोड़ का फ्लेट बेचने की सोचने फिर बेचने में एकाध साल तो लगा ही होगा उसे पहले बताना चाहिए था ताकि वो शांति से दूसरा फ्लेट देख सके ऐसे रातोरात बेच कर खाली करने का दबाव क्यों — ? वो इसलिए था ताकि मेरा दोस्त पहले ही खाली ना कर दे और फ्लेट बिकने तक उससे भी किराया वसूला जा सके उसे गुस्सा तो बहुत आया मगर आम आदमी भला किस किस से भिड़े खेर एक पंजाबी केपिटलिस्ट मुस्लिम का फ्लेट देखा तो इतनी हरमजदगी की फ्लेट की हालत खराब हुई पड़ी पर पंजाबी का कहना था की हम इसे ना ठीक कराएंगे ना ठीक कराने की कोस्ट किराये में से कटवाएंगे मेने पूछा क्यों भला क्यों नहीं ठीक करवाओगे ऐसे तो तुम्हारा फ्लेट कोई लेगा ही नहीं , तो वो पंजाबी चेहरे पर इतनी शोषणकारी फिटकार बड़े घमंड से बोला की हमारे तो आठ दस फ्लेट हे एक खाली पड़ा रहेगा तो हमे कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे इतना क्रोध आया की कैसे नीच लोग हे की फंडा क्या हे की हम फ्लेट पर पैसा नहीं लगाएंगे क्यों —- ? क्योकि हमारे पास बहुत पैसा हे तो —- ? तो मतलब इतने हरामी लोग की क्योकि हमारे पास बहुत पैसा हे तो उस पैसे से हम बजाए तुम्हे कोई आराम उठाने देने के बल्कि उस पैसे की सहायता से हम तुम्हारा और शोषण करेंगे तुम्हे टॉर्चर करेंगे आखिर बाल बच्चे ले लेकर इन हैवानो से हम कैसे लड़ेंगे ——– ?

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