मोदी सरकार: एक साल के दावे और हक़ीक़त

 

 modi-1-yearअरुण कुमार त्रिपाठी

नरेंद्र मोदी ने एक साल पहले मनमोहन सिंह की जिस लुंजपुंज और भ्रष्ट यूपीए सरकार को बुरी तरह हरा कर सत्ता हासिल की थी उसकी तुलना में उनकी सरकार का आगाज ऊर्जावान और गतिशील रहा है। मोदी सरकार न सिर्फ अतिरिक्त आत्मविश्वास के साथ अपने कदम बढ़ा रही है, बल्कि बार-बार अपनी यात्रा पर इठला भी रही है। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार के आखिरी दिनों से मोदी सरकार के पहले साल की जब भी तुलना की जाएगी तो मौजूदा सरकार बेहतर काम करती हुई और अच्छी उम्मीद जगाती हुई नजर आएगी। लेकिन सरकार का यह मूल्यांकन औद्योगिक प्रतिष्ठानों के आर्थिक नजरिए से निर्धारित किया जा रहा है।

अगर मोदी सरकार के पहले साल की तुलना मनमोहन सरकार के पहले साल (2009-10) से करेंगे तो दोनों की उपलब्धियों में ज्यादा अंतर नहीं दिखेगा। कहीं पर मनमोहन सरकार के अच्छे काम दिखेंगे तो कहीं पर मोदी सरकार के। औद्योगिक उत्पादन, अक्षय ऊर्जा और जीडीपी की वृद्धि दर के मोर्चे पर मनमोहन सरकार मोदी सरकार की तुलना में बहुत बेहतर प्रदर्शन कर रही थी। अगर आज औद्योगिक उत्पादन की विकास दर 3.5 प्रतिशत है तो मनमोहन सरकार के समय में 10.4 प्रतिशत थी। इसी तरह जीडीपी की दर आज अगर 7.56 प्रतिशत है तो उस समय 8.59 प्रतिशत थी। बिजली उत्पादन और कोयला उत्पादन में मनमोहन सरकार ने क्रमश: 7.7 प्रतिशत और 8.1 प्रतिशत की दर हासिल की थी तो मोदी सरकार ने 10 प्रतिशत और 8.2 प्रतिशत की दर।

नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में मोदी ने निश्चित तौर पर मनमोहन सिंह के 10.6 प्रतिशत के मुकाबले बीस प्रतिशत की दोगुनी दर प्राप्त की है, जो कि मनमोहन सिंह की ही मेहनत और जोखिम का परिणाम है। भले ही उसमें मोदी की अपनी मेहनत भी शामिल है, लेकिन उसकी नींव तो मनमोहन सिंह ने ही अपनी सरकार को दांव पर रख कर डाली थी। उस समय वैश्विक आर्थिक मंदी से देश को संभाल ले जाने वाले मनमोहन सिंह सिंग इज किंग थे। और आज मोदी इज किंग हैं।

यूपीए सरकार और मोदी सरकार का फर्क यही है कि पार्टी और सरकार की विचित्र संरचना के कारण मनमोहन सिंह उन उपलब्धियों का श्रेय ले नहीं सकते थे, जबकि मोदी इन उपलब्धियों का श्रेय किसी और को पाने नहीं देंगे। वे देश, दुनिया, कॉरपोरेट, किसान, मजदूर और मध्यवर्ग सभी को यही आभास दे रहे हैं कि सारा काम वही कर रहे हैं। हालांकि भाजपा समर्थक बौद्धिक और राजनेता अरुण शौरी ने इसका श्रेय उनके साथ अमित शाह और अरुण जेटली को भी देने की कोशिश की है, पर उनकी यह बात भी मोदी को शायद ही अच्छी लगी हो। विदेश नीति से लेकर किसान नीति तक हर चीज को अपने ढंग से चलाना मोदी की आदत है और पिछली सरकार से इस सरकार का यही फर्क उन्हें चर्चा में रखे हुए है और यही उनकी आलोचना करवा रहा है।

अगर पुराने राजनीतिक अर्थों में कहें तो मोदी ने इंदिरा गांधी की तरह सर्वशक्तिमान नेता का चोला पहन लिया है। अगर नवउदारवादी भाषा में कहें तो वे आज की तारीख में इस देश के सबसे सफल ब्रांड बन गए हैं। वे ब्रांड इंडिया भी हैं और ब्रांड भाजपा भी। लेकिन इन सबसे ऊपर वे ब्रांड मोदी हैं। वे इस ब्रांड से इतने अभिभूत हैं कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सामने अपने नाम लिखे हुए सूट को पहन कर उपस्थित होते हैं तो भी पार्टी, सरकार या संघ की ओर से उन्हें कोई टोकने वाला नहीं होता। भले ही बाद में विवाद पर विराम लगाने के लिए वे उसे गंगा मैया के नाम पर नीलाम कर देते हैं।

इस एक साल में मोदी सरकार ने अपनी जो सबसे बड़ी ताकत महसूस की है वह है बाहर-भीतर विपक्ष की कमजोर उपस्थिति। उसके सामने न तो यूपीए-एक की तरह न्यूनतम साझा कार्यक्रम है और न ही माकपा-भाकपा जैसा ब्रेक लगाने वाला सहयोगी संगठन और न ही यूपीए-दो की तरह उसके भीतर विरोध करने वाली कोई राष्ट्रीय सलाहकार समिति। सारा मैदान खाली है और मोदी सरकार आर्थिक सुधारों के मार्ग पर अपनी गति से बढ़ रही है। उसके सामने अगर कोई चुनौती है तो राज्यसभा में ज्यादा संख्याबल के साथ उपस्थित विपक्ष और उसके बाहर स्थित गांव, देहात, किसानों और मजदूरों की बड़ी आबादी। मीडिया की बड़ी उपस्थिति भी मोदी सरकार के लिए कोई अड़चन नहीं है, क्योंकि मीडिया भी उसी दिशा में जाना चाहता है जिस दिशा में मोदी जा रहे हैं।

सवाल सिर्फ गति का है। यही वजह है कि बीमा क्षेत्र, रक्षा क्षेत्र, खनन और रेलवे में विदेशी निवेश और आर्थिक सुधारों की राह प्रशस्त करने वाली मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण के 2013 के कानून में संसद से संशोधन नहीं करवा पा रही है और बार-बार अध्यादेश ला रही है। संविधानविद भी यह बात बार-बार कह रहे हैं कि ऐसा करना एक कमजोर सरकार की निशानी है। मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि श्रम सुधारों के लिए कानून पास करना रही है और अभी वह उद्योग अधिनियम, परिवीक्षा अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम और ठेका मजदूर अधिनियम में संशोधन करने की तैयारी में है।

लेकिन आर्थिक सुधारों पर बहुत तेजी से बढ़ने का परिणाम यह हुआ है कि मोदी की छवि गरीब विरोधी और उद्योगपतियों के समर्थक की बन गई है। इसीलिए यह महज संयोग नहीं कि तकरीबन दो महीने के अज्ञातवास से लौटे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी न सिर्फ उनकी सरकार को सूट-बूट वाली सरकार बताने लगे हैं, बल्कि खुल कर कहने लगे हैं कि यह पूंजीपतियों की सरकार है और उनके लिए गरीबों की जमीन छीन रही है। याराना पूंजीवाद का आरोप लगातार चस्पां हो रहा है और मोदी सरकार जैसे-तैसे अपनी छवि को दुरुस्त करने मे लगी है। घर वापसी, लव जेहाद, सांप्रदायिक और स्त्रियों संबंधी तमाम दकियानूसी बातों का परिणाम वे दिल्ली विधानसभा चुनावों में मध्यवर्ग की नाराजगी के रूप में देख चुके हैं। अब वे इस बात से भयभीत हैं कि कहीं किसान-विरोधी, गरीब-विरोधी छवि चस्पां हो गई तो इसका नुकसान उन्हें पहले बिहार और फिर बाद में उत्तर प्रदेश के चुनावों में उठाना पड़ सकता है।

साल भर और चौबीसों घंटे सक्रिय दिखने वाले मोदी जिन तीन चीजों से घिरे दिखते हैं वे हैं एक तरफ पार्टी के कुछ नेताओं और संघ परिवार के आक्रामक हिंदूवादी कार्यक्रम, दूसरी तरफ, पूंजीपतियों की तीव्र आर्थिक सुधार की अपेक्षाएं, और तीसरी ओर, सामान्य जनता की अच्छे दिनों की उम्मीद। इन तीनों के बीच संतुलन बिठाने में लगे मोदी कहीं एक मोर्चे को ठीक करते हैं तो दूसरे मोर्चे पर घिर जाते हैं और दूसरे को ठीक करते हैं तो तीसरे में फंस जाते हैं।

इन तीनों से ऊब कर या इनके तात्कालिक समाधान के रूप में वे विदेश की ओर भागते हैं और विकास, सामरिक शक्ति और आर्थिक ताकत के रूप में कभी चीन, कभी दक्षिण कोरिया, कभी जर्मनी, कभी फ्रांस तो कभी जापान के मॉडल को देखते और उससे सीखने की कोशिश करते हैं। इसमें वे विश्वबंधुत्व दिखाने की भी कोशिश करते हैं, जो कई बार विश्वयारी से ज्यादा दिखती नहीं। इसीलिए जब वे कहते हैं कि मैं सीख रहा हूं तो उनकी बात ज्यादा सही और चिंताजनक भी लगती है। क्योंकि विदेश संबंधों में नेहरू के नौसिखिएपन ने ही चीन से भारत के संबंध बिगाड़े थे और राजीव गांधी के नौसिखिएपन ने श्रीलंका में खतरनाक प्रयोग कर डाला। आज उस तरह का खतरा उस समय भी उपस्थित होता है, जब मोदी चीन के साथ संवाद के आग्रही दिखते हैं।

चीन किसी भी भारतीय बौद्धिक और नीतिकार के लिए एक पहेली है। जहां हमारे समाजवादी और दक्षिणपंथी नेताओं ने चीन को सदैव शंका की नजर से देखा है, वहीं वामपंथियों ने चीन की हर आक्रामकता में भारत का ही दोष माना है। देखना है कि क्या भारत चीन का भरोसा जीत कर दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में अपनी विशेष जगह बना पाता है या उसकी यही जल्दबाजी चीन से मनमुटाव का कारण बनती है।

भारत जानता है कि पाकिस्तान को चीन से भारत-विरोध के लिए हमेशा से बल मिलता रहा है और आज उसकी अहमियत अमेरिका से ज्यादा हो गई है। पर यहां भी वह सवाल बना रहता है कि क्या पाकिस्तान को नाभिकीय प्रौद्योगिकी देने वाला और उसकी तमाम सामरिक और भूराजनीतिक हितों से जुड़ चुका चीन उससे हाथ खींचेगा?मोदी सरकार की दिक्कत यह भी है कि एक तरफ तमाम घरेलू उद्योगपति उनसे उदास और निराश दिखते हैं तो दूसरी तरफ तमाम विदेशी दौरों के बावजूद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उस गति से आता नहीं दिखता, जिसकी उम्मीद जताई जाती है।

जहां कई उद्योगपतियों ने यह साफ शिकायत की है कि मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री होते हुए जितनी आसानी से मिलते थे, अब प्रधानमंत्री बनने के बाद उनसे मिलना उतना ही कठिन हो गया है, वहीं पेट्रोलियम मंत्रालय की जासूसी पर कार्रवाई को लेकर भी औद्योगिक घरानों में बेचैनी है। सीआइआइ की एक बैठक में प्रधानमंत्री से ज्यादा उम्मीद जताने पर उसे पीएमओ की झाड़ भी पड़ गई। दूसरी तरफ उत्पादन में काम आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, जो जनवरी 2015 में 468.7 करोड़ डॉलर का था, फरवरी में घट कर 308.9 करोड़ डॉलर पर आ गया।

मोदी सरकार इन दिनों जिस बात की सबसे ज्यादा डुगडुगी बजा रही है वह है साल भर में कोई घोटाला न होना। कोयले की नीलामी को उसके उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या घोटालों को उजागर करने वाली सीएजी, सीबीआइ या सीवीसी जैसी संस्थाएं सक्रिय हैं। सीएजी ने नितिन गडकरी की पूर्ति कंपनी की धांधली के बारे में जो कुछ कहा है उसे सरकार स्वीकार करने को तैयार नहीं है और दूसरी तरफ सीवीसी के प्रमुख की नियुक्ति अभी तक नहीं हो पाई है।

लोकपाल, जिसके लिए दिल्ली में इतना बड़ा आंदोलन हुआ और जिसके लिए कानून पिछली सरकार ने पास किया, आज तक उस आधार पर वह संस्था गठित ही नहीं हो पाई। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के माध्यम से न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण में लाने की जो कोशिश चल रही है, उसके कारण न्यायिक स्वायत्तता कमजोर होकर रह जाएगी। ऐसे में यह सवाल बरकरार है कि क्या मोदी सरकार अगले पांच सालों में विकास, न्याय और अमन की कोई बड़ी जंग जीत पाएगी?

– See more at: http://www.jansatta.com/politics/jansatta-editorial-narendra-modi-govt-one-year/27644/#sthash.SRjXO8Ha.dpuf

(Visited 7 times, 1 visits today)

5 thoughts on “मोदी सरकार: एक साल के दावे और हक़ीक़त

  • May 28, 2015 at 9:20 am
    Permalink

    Modi Government one year achievement!!
    1. Pak soldiers killed our soldier in border, more than 100 soldier in one year
    2. Love Jihad

    3. Ghar Wapsi
    4. Farmers Suicide
    5. Pakistan enter Indian territories
    6. China enter Indian territories
    7. Dollars going stronger than Rupees
    8. Sri Lanka arrest Indian fisher
    9. Beef Ban
    10. Waving of Pakistani flags in J&K again and again, in rule of BJP+PDP Govt. no action taken .
    11. Slogans in support of Pakistan in J&K again and again, in rule of BJP+PDP Govt. no action taken.
    12. No appointment in CIC & CVC last one year
    13. Allocation fund for smart cities project but no proposal has taken till date, it’s not a corruption for Modi
    14. Allocation Crore of fund for Swach Bharat but situation is same nothing change it’s not a corruption for Modi
    15. Cut off subsidy in health sector, which directly affected to poor people.
    16. Cut off subsidy in education systems, which directly affected to poor people.
    17. Hike tax for common people, and reduced tax for corporate sector
    18. Child labour new amendment.
    19. New land acquisition bill for anti-farmers
    20. Decontrol the petroleum sector, which directly affected to poor people.
    21. Hike price of petroleum product day by day
    22. Donate crore of rupees to other country, but not for own far

    Reply
  • May 28, 2015 at 9:49 am
    Permalink

    बंदे में है दम!
    कुछ भी कहा जाए मगर जो कमाल अरविंद केजरीवाल दिखा सकते हैं वह भारतीय राजनय में और किसी के वश की बात नहीं। अरविंद जिस सधे, मँजे और निर्मम तरीके से केंद्र सरकार पर हमला करते हैं उस अंदाज में न राहुल गांधी कर सकते हैं न तीसरे मोर्चे का कोई जनता दली नेता। अक्सर तो कांग्रेसी नेता और भाजपा के नेता कई मामलों में एक साथ खड़े नजर आते हैं। लेकिन अरविंद दोनों को एक साथ धो डालते हैं। नीतिश, लालू, मुलायम, ममता के आगे अरविंद कहीं ज्यादा दबंग और धाकड़ नजर आते हैं। अब लगता है कि अगर वाराणसी में कांग्रेस अजय राय को लड़ाने की बजाय अरविंद को ही सपोर्ट देती तो शायद मोदी पीएम न बन पाते। अरविंद को देखकर लगता है कि भविष्य में शायद केजरीवाल ही मोदी को चैलेंज दे पाएं।

    FROM THW WALL OF SHAMBHU NATH SHUKLA

    Reply
    • May 28, 2015 at 7:29 pm
      Permalink

      सही कहा वहाब भाई केजरीवाल नितीश और वाम मोर्चे का गठबंधन ही भारत में आम आदमी को कुछ राहत दे सकता हे वार्ना नहीं मगर दुःख हुआ की बजाय इन तीनो के गठबंधन के नितीश- लालू मुलायम देवगौड़ा जी के साथ लग गए ये भूल हे इन परिवारवादियों और जातीवादियों के लिए अब राज़नीति में कोई खास स्पेस नहीं बचने वाला हे मुसलमानो को भी सेकुलरसम् के नाम पर लालू मुलायम देवगौड़ा आदि का साथ अब बिलकुल नहीं देना चाहिए वास्तव में मुलायम और सपा के कारन ही मोदी जी को अकेले बहुमत मिला हे इसके लिया मुलायम को कभी माफ़ नहीं किया जाएगा

      Reply
  • May 28, 2015 at 12:37 pm
    Permalink

    मोदी और मनमोहन सरकार में महज़ इतना फर्क हे की मनमोहन सरकार में डाइरेक्ट लूट थी और मोदी सरकार में इनडाइरेक्ट लूट हे और होगी . बाकी दोनों ही ईमानदार हे और अपना हाथ साफ़ रखते हे लेकिन ऐसी ईमानदारी का कोई भी लाभ नहीं हे

    Reply
    • May 31, 2015 at 11:45 am
      Permalink

      ” Yashwant Singh : नरेंद्र मोदी ने केजरीवाल पर तरह तरह से नकेल कस कर खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर दिया है. दिल्ली सरकार के प्रति मोदी जी की चीप किस्म की हरकतों से एक तो खुद मोदी और दूसरे भाजपाई एक्सपोज हो रहे हैं. इस कारण अरविंद केजरीवाल को भारी मात्रा में जन सुहानभूति प्राप्त हो रही है. हाल के दिनों में केजरीवाल ने मोदी के लगाए अवरोधों और उसका डटकर कर रहे प्रतिरोध के कारण जो सिंपैथी गेन की है उससे योगेंद्र यादव -प्रशांत भूषण निष्कासन प्रकरण के घाव भुलाकर लोग फिर से केजरी के साथ खड़े होने लगे हैं. उनमें से एक मैं भी हूं. ” यशवंत भाई कहते हे की वो फिर से केजरीवाल के खेमे में आ गए हे पहले वो योगेंदर प्रशांत भूषण कांड से नाराज़ थे अब उन्हें भी लगा हे की मोदी जी नाम की मुसीबत से छुटकारा दिलवाने में केजरीवाल की महत्वपूर्ण भूमिका होगी शायद सबसे महत्वपूर्ण सही भी हे ऐसा लगता हे की योगेंदर प्रशांत जी ने पद पैसा के लालच में तो नहीं लेकिन कद के लालच में बेमतलब में शुद्ध आदर्शवाद की टर्र टर्र करके केजरीवाल से पंगा लिया था खेर उनको और सभी को बात समझनी चाहिए जो सरदार पटेल ने नेहरू के लिए कही थी की कुछ भी हो जाए नेहरू को मत छोड़ना वही हाल आज हे कुछ भी हो जाए हमने केजरीवाल हो नहीं छोड़ना हे जो भी हो केजरीवाल मोदी जी जैसे लोगो से बहुत बेहतर साबित हे पढ़े लिखे हे लिबरल हे अपने दम पर आगे बढे हे घर परिवार की जिम्मेदारी निभाई जबकि मोदी जी घर परिवार की जिम्मेदारियों से बच कर खिसक लिए थे इसके अलावा उन्हें बढ़ाया भी पूंजीवादी पिशाचों ने ही

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *