मैं भगोड़ी नहीं हूं !

taslima

by — तस्लीमा नसरीन

वायरस की तरह यह खबर पूरी दुनिया में फैल गई है कि मैं भारत छोड़कर अमेरिका चली गई हूं। क्यों? अंसारुल्लाह बांग्ला टीम के जिन हत्यारों ने अभिजीत-वाशिकुर-अनंत की हत्या कर दी है, वे मुझे भी मार डालेंगे, इस डर से। अगर मैं इतनी ही भयभीत होती, तो यूरोपीय नागरिक होते हुए, अमेरिका की स्थायी नागरिकता हासिल कर चुकने के बाद भी बांग्लादेश लौटने की इतनी कोशिश क्यों कर रही हूं? फिर क्यों मैं भारत में इतने साल न सिर्फ रहती रही, बल्कि वहां रहने के लिए लड़ती भी रही? इन्‍हीं दो देशों में तो जीवन पर खतरा सर्वाधिक है, इन्‍हीं दो देशों में मेरे खिलाफ जुलूस निकले हैं, मुझ पर शारीरिक हमले हुए हैं, और मेरे खिलाफ फतवा जारी हुआ है, मेरे सिर की कीमत लगाई गई है, और इन देशों में कट्टरवादी मुझे मार डालने के लिए तैयार रहते हैं। इतने समय तक जीवन का खतरा मोल लेकर जिंदा रहने की अभ्यस्त मैं अब भला डरकर भागूंगी? भगोड़ी मैं कभी थी नहीं।

पिछले करीब 21 वर्ष से मैं निर्वासन में हूं। पहले जब मेरी चर्चा थी, और कट्टरवादी मेरी जान लेने पर तुले हुए थे, तब यूरोप की सरकारों से लेकर गैरसरकारी संगठन तक मुझसे पूछते थे-आपकी किस तरह सहायता करूं। मैंने उन सबको कहा था, मेरी नहीं, बांग्लादेश की गरीब लड़कियों की मदद कीजिए। मुझे जब देश निकाला दे दिया गया, तब कुछ दानदाता देशों ने कहा था कि वे बांग्लादेश का अनुदान बंद कर देंगे। तब मैंने कहा था, ऐसा न करें। आपकी मदद बांग्लादेश की गरीब लड़कियों को जीवित रखेगी।

नहीं, मैं अपने लिए नहीं सोच रही। इस बार मैं अमेरिका आई हूं, तो उसकी कई वजहों में से एक वजह है, सेक्यूलर ह्यूमनिस्ट कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेश के लेखकों की भयभीत मानसिकता पर बोलना और उनकी जान बचाने के लिए यूरोप-अमेरिका की सरकारों-संगठनों से गुजारिश करना। अमेरिका में मेरे लिए जो फंड तैयार हो रहा है, वह बांग्लादेश के लेखकों को विदेश ले आने और उनके रहने-खाने पर खर्च होगा।

बीती सदी के आखिरी दशक में मैंने कट्टरवादियों के अनेक जुलूस देखे हैं, जिनमें मुझे फांसी देने की मांग की जाती थी। उन्हीं कट्टरवादियों के बेटे आज बांग्लादेश के प्रतिभाशाली लेखकों की हत्या करते हैं, पीछे से उनकी गर्दन पर वार करते हैं। बांग्लादेश में कट्टरवादियों के निशाने पर आज अनेक ऐसे लेखक हैं, जो धर्म में नहीं, विज्ञान में विश्वास करते हैं, जो शरिया पर नहीं, औरतों को बराबरी का अधिकार देने पर यकीन करते हैं। पर डर के मारे उन लेखकों ने आज लिखना बंद कर दिया है, वे घरों में छिप गए हैं, भय से देश छोड़ना चाहते हैं, हेल्मेट लगाकर घर से निकल रहे हैं। डरे हुए कुछ लेखक शहर छोड़कर गांवों में चले गए हैं, चेहरा बदलकर वे लोगों की भीड़ में मिल गए हैं।

बांग्लादेश में लगभग हर महीने एक आदमी कट्टरवादियों का निशाना बन रहा है। धमकियों के बाद कुछ लेखक पुलिस के पास गए, लेकिन उनकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। उन्हें कहा जा रहा है, जिंदा रहना है, तो देश से बाहर जाओ। हत्यारों की गिरफ्तारी नहीं हो रही। पूछने पर बताया जाता है, ऊपर से निर्देश नहीं है। यह दुर्दशा केवल लेखकों या ब्लॉगरों की नहीं है। राजशाही विश्वविद्यालय के अध्यापक शफीउल इस्लाम को कट्टरवादियों ने पिछले दिनों मार डाला। उनका जुर्म यह था कि उन्होंने छात्राओं को बुर्के में आने से मना किया था। उनका कहना था, बुर्के से मुंह ढके रहने से पढ़ाने में असुविधा होती है।

दुनिया भर के प्रचार माध्यमों में मेरे अमेरिका आने से भी बड़ी खबर यह है कि मैंने भारत छोड़ दिया है। भारत छोड़कर मैं कहां जाऊंगी? भारत के उस घर में अब भी मेरी किताब-कॉपियां, कपड़े, असंख्य चीजें और पालतू बिल्ली है। दिल्ली से मैं एक छोटे-से सूटकेस में दो जींस, दो शर्ट और कुछ टी-शर्ट लेकर निकली हूं। लैपटॉप और आईपैड तो हाथ में ही रहते हैं, मैं चाहे जहां भी जाऊं।

मेरा भारत छोड़ना निस्संदेह कोई अच्छी खबर नहीं है। लेकिन मेरे बारे में क्या कभी कोई अच्छी खबर आती है! दो दशक से भी अधिक समय से यूरोप और अमेरिका की विभिन्न सरकारें, विभिन्न विश्वविद्यालय, मानवाधिकार संगठन और नारीवादी संगठन मुझे भाषण देने के लिए जिस तरह बुलाते हैं, इन देशों से मुझे जो इतने सम्मान मिले हैं-इतने पुरस्कार, डॉक्टरेट-उपमहाद्वीप में क्या कभी किसी ने इन सबके बारे में बताया? इसके बजाय यही लिखा जाता है कि कितने पुरुषों से मेरी निकटता रही है, मैंने कितनी शादियां की हैं, किस देश ने मुझे भगाया है, किस राज्य ने मुझे अपने यहां से बाहर किया है, किस राज्य ने अपने यहां मेरी किताब, टीवी सीरियल पर प्रतिबंध लगाया है, कितने लोग मुझसे घृणा करते हैं। मेरे नाम के साथ एक शब्द जोड़ दिया गया है-विवादास्पद। दोनों बंगाल मुझे सिर्फ भगाकर ही चुप नहीं रहे, उन्होंने ऐसी कोशिशें कीं कि मेरी पहचान एक अवांछित नाम, एक निषिद्ध लेखिका के तौर पर हो। इतने दिनों तक जिन लोगों ने मुझसे नहीं पूछा कि मैं कहां हूं, आज वही लोग सवाल कर रहे हैं कि मैंने भारत क्यों छोड़ा। भारत में तुष्टिकरण की राजनीति और लड़कियों की असुरक्षा पर मैं मुंह खोलती थी, तो पुरुषवर्चस्ववादी मानसिकता के लोग मुझे निशाना बनाते थे, भारत छोड़कर बांग्लादेश लौट जाने के लिए कहते थे। बहुतों को आश्चर्य होता था कि भारत में पैदा न होने के बावजूद मैं वहां की अव्यवस्था पर इतनी चिंतित क्यों होती थी।

लेकिन इनसे अलग लोग भी हैं, जो मुझसे प्यार करते हैं। भारत के कितने ही शहरों में कितने ही लोग मेरे पास दौड़े चले आते हैं मेरा ऑटोग्राफ लेने, मेरी तस्वीर लेने, मुझसे लिपटने, मुझे स्पर्श करने, रोने। वह प्यार और सम्मान फिर से पाने के लिए मैं लौटकर जाऊंगी ही। मेरा सब्जीवाला जयंत मेरे लिए प्रतीक्षा करता है। मछली बेचने वाला बनमाली मेरा इंतजार करता है। इसी तरह प्रतीक्षा करता है साड़ी की दुकान का मालिक मजुमदार। यह प्यार ही मेरी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

Source:http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/columns/i-am-not-runaway-hindi/

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19 thoughts on “मैं भगोड़ी नहीं हूं !

  • June 18, 2015 at 11:21 am
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    मेरा हमेशा से मानना है कि जिस दिन हम तसलीमा, रुश्दी जैसे लोगो की हत्या के फ़तवे के खिलाफ आवाज़ नही उठाते हैं, हम कट्टरपंथियो के आगे कम से कम एक हथियार तो डाल ही देते हैं. उसी के परिणाम स्वरूप, आज वशीकूर्रहमान और अविजित रॉय जैसे लोगो की हत्याए होती है. जब हम कहते हैं कि हम एक इंच भी किसी कट्टरपंथी को समाज मे जगह नही बनाने देंगे. उसी समय, हम धर्म की जगह, विज्ञान मे यकीन ना रखने वाले लोगो की अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए भी नही लड़ते.

    ये नास्तिक ग़लत है, नास्तिकता अव्यावहारिक है. मनुष्य को अपने दुख-दर्दो से निजात के लिए ईश्वर की परिकल्पना की ज़रूरत है. विज्ञान कई रहस्य नही सुलझा पाया. सही बिल्कुल सही. तो रखिए ना धर्म मे आस्था. मैं भी रखता हूँ, धर्म मे आस्था. मस्जिद भी जाता हूँ, ईद भी मनाता हूँ. लेकिन किसी नास्तिक ने मेरे मस्जिद जाने पे तो रोक नही लगाई. मुझे बताइए की अविजित, राजिब हैदर या ऐसे किसी भी तथाकथित नास्तिक ने क्या किसी मुसलमान पे इसलिए हमला किया की वो दाढ़ी रखे हुए है, या क़ुरान मे आस्था रखता है?

    किसी नास्तिक अगर सवाल खड़े करता है, इसी से अगर आपका मज़हब ख़तरे मे पड़ गया. तो यक़ीनन आपका मज़हब बहुत ही कमजोर है. मेरा मज़हब तो कमजोर नही, इसलिए, मुझे किसी आलोचना से फ़र्क नही पड़ता.

    जिस सत्य को सिद्ध करने के लिए, हिंसा का सहारा लेना पड़े, वो परम सत्य हो ही नही सकता. परम सत्य, निर्विवादित होता है, जैसा की सूर्य का पूर्व से उदय होना.

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    • June 19, 2015 at 1:07 pm
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      असल बात ये हे की न तो इस्लाम में ईशनिंदा के लिए कोई दुनियावी सजा हे ना ही पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब ने अपना अपमान करने वालो कोई सजा दी थी फिर भी इन मुद्दो पर जम कर हिंसा कराइ जाती हे ये हिंसा मज़हब नहीं मज़हब की आड़ में अपना हित साध रहे लोगो दुआरा कराइ जाती हे लोगो की कोई भावनाय आहत नहीं होती हे बल्कि ये नीच लोग और इनके लग्गू भग्गू आम आदमी को जाकर बताते हे की ”अरे तुम्हारी भावनाय आहत हो रही हे बात समझो हो रही हे ” तब ही कुछ असामाजिक तत्व या कुछ भावुक लोग या कुछ जिंदगी से परेशान बेजार लोग इन पर हिंसा करके अपना परलोक सुधारने की सोचते हे खेर जहा तक हमारा सवाल हे ना हम कभी भी किसी की भी भावनाव का अपमान करते हे और ना ही किसी से भी डरते हे न हम कोई बड़े लेखक हे न हम कोई रश्दी तस्लीमा हे न हम इनसे सहमत हे मगर फिर भी कुछ लोग हमारे भी पीछे से पड़ गए थे ये गुरु घंटाल पहचान गए की कल को हम इनके हितो को नुक्सान पंहुचा सकते हे खेर हम तो पहले से ही जानते हे की हम कांटो भरी राह का रास्ता ले चुके सो हमने पहले ही तैय्यारी शुरू कर दी थी हम अगर कलम के पक्के हे तो जिस्म के भी मज़बूत हे हम गारंटी देते हे की अगर हमारे साथ कल को कुछ हुआ तो हमलावर को भी साबुत नहीं जाने देंगे वो भी अपने पेरो पर नहीं जाएगा हमारा चाहे जो हो लेकिन दोषियों को भी हमारे साथ ही बहुत तकलीफ उठानी पड़ेगी ये तय हे दो बार हमारे साथ भी यही हरकत की गई की हमारे ऊपर झूठे सफ़ेद झूठ इलज़ाम लगाय गए इरादा यही था की मानो कल को कोई जिंदगी से परेशान कोई मुर्ख आकर हम पर हमला कर दे खेर हमने उन्हें झूठा साबित कर दिया इलज़ाम इतने झूठ थे की मानहानि का मुकदमा किया जा सकताथा मगर कर नहीं सके क्योकि पहले ही काफी परेशानियों से घिरे हे खेर इन मूर्खो को तो हम छोड़ देंगे मगर इन मूर्खो को और मुर्ख बना रहे चतुर खोपड़ियों को हम कल को नहीं छोड़ेंगे इंशाल्लाह

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      • June 19, 2015 at 1:25 pm
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        इतने नीच और कायर होते हे ये साम्प्रदायिक और कटरपन्ति लोग की इनकी कोई सीमा नहीं होती हे जो भी हो तस्लीमा एक महिला हे और प्रेमचंद के शब्दों में ” वीर पुरुष दयालु होते हे और औरतो बच्चो और असहायों को हाथ लगाना भी अपनी शान के खिलाफ समझते हे ” याद आता हे वो कायरो की टोली का हैदराबाद में तस्लीमा पर हमला जब ढेर सारे कायर एक महिला पर चढ़ दौड़े थे और गौर करे की ये लोग तस्लीमा के इतने पास थे की चाहते तो गला भी घोट सकते थे मगर नहीं ये चतुर खोपड़ी ऐसा करके अपने को जेल में नहीं सड़ाते इसके लिए तो ये आगे करते हे जो लोग तस्लीमा के खिलाफ मारने का फ़तवा जारी करते हे उनसे पूछा जाना चाहिए की अरे अपने बच्चे पोतो के चारो तरफ बम बंद कर क्यों नहीं भेज देते उस को मारने के लिए ?

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  • June 18, 2015 at 12:11 pm
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    रमज़ान के मौके पे विवादस्पद लेखिका का लेख छापने का क्या अर्थ ? . ऐसे लोगो के लेख प्रकाशित नही करने चाहिये जिस ने लज्जा जैसी इस्लाम के विरुद्ध किताबे लिखे. हयात और अफ़ज़ल साहब आप लोग गलत कर रहे है .

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    • June 18, 2015 at 1:26 pm
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      असल मे वहाब साहब जैसे लोगो के साथ एक समस्या या है के सिर्फ सुनी सुनाई बात पे यकीन करते है . जैसा उन्हो ने तस्लीमा नसरीन की किताब लज्जा के बारे मे सुन रखा है . लज्जा एक फालतू सी किताब है जो 140 पेज का है उस मे बाबरी मस्जिद के विघ्वंश के बार बांग्ला देश मे जो अल्पसंख्यको पे जुल्म हुए और मंदिर तोड़े गये उस के बारे मे लिखा है यू काहे के दैनिक समाचर पात्रो की कुत्टिग को एक जगह कर दिया है. खुशवंत सिंह ने सही लिखा था के मौलनाओ और उलेमाओ ने एक दोयम दर्जे लेखिका को एक महान लेखिका बना दिया .

      वेहॅब साहब कुछ पड़ा कीजिये और अपनी अक़्ल लगाये सिर्फ सुनी सुनाई बातो पे न जाये.

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      • June 19, 2015 at 1:24 pm
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        अफ़ज़ल साहब, हयात भाई, ज़ाकिर साहब, चिश्ती साहब और सभी पाठको को रमज़ान के मौके पर हमारी शुभकामनाये !!

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      • June 19, 2015 at 11:58 pm
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        सच मुच लज्जा एक वाहियात किताब है जो किसी भी छोटे मोटे बुक स्टाल पर देखी जा सकती है. मैं ने भी ऐसे ही एक मर्तबा थोड़ा पलट कर देखा तो एक फ़ुज़ूल सी डोकुमएंट्री टाइप लगि.सच मे अख़बार की कटिंगही है वो. जाने क्यों उस पर इतना हंगामा हो गया .उस को अगर नज़र अंदाज़ किया जाता तो आज तसलीमा नसरीन को कोई जानता भी नहीं. इसी तरह सलमान रुश्दी का भी साहित्य मे कोई मक़ाम नहीं उनको भी हम लोगों ने बड़ा साहित्यकार बना दिया . आप तो जानते ही होंगे की एक अच्छा साहित्यकार बनने के लिए क्या जतन करना पड़ते हैं और ये लोग रातों रात बड़े साहित्यकार बन गये .. मशहूर होने के लिए अच्छा साहित्यकार होना ज़रूरी नहीं हाँ कॉंट्रोवर्सी क्रियेट करना आना चाहिए. और ये ख़ासियत तसलीमा और रुश्दी जैसे लोगों मे खूब है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी बकवास लिख दो और मशहूर हो जाओ.

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        • June 20, 2015 at 12:39 am
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          मुजफ़्फ़र साहब बहुत दिनो बाद ? कहा है आप उम्मीद है के अब आप के कॉमेंट बराबर आते रहे गे.

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          • June 21, 2015 at 12:01 am
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            अफ़ज़ल भाई थोड़ी मसरूफ़ियत रहती है वैसे आपका पोर्टल बराबर पलटता रहता हूँ. आपकी तहरीरों से फैzयाब होता रहता हूँ. कोमेंट्स लिखने के मामले मे मे थोड़ा आराम तलब हूँ और कुछ वक़्त की तंगी भी. मज़हबी मामलों मे कोमेंट्स लिखने से बचना भी चाहता हूँ. बहर हाल आप का न्यूज़ पोर्टल हाउस फुल जा रहा है. खुदा करे ये और भी तरक़्क़ी करे ..सचिन परदेसी साहब को संपादक मंडली मे देख कर दिली खुशी होती है. आपकी तहरीरों का इंतेख़ाब लाजवाब है. आप अपना सफ़र ऐसे ही जारी रखिए हम और हमारे जैसे बहुत से लोगों की दिली दुआएँ आप लोगों के साथ हैं…

  • June 18, 2015 at 11:22 pm
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    भारत में ना जाने कितने अवेध विदेशी पिस्सू पल रहे हे। जो खाते भारत का गाते विदेश का । जिनका विश्वाश सनातन संस्क्रती में नहीं हे । उन सब से अलग हट कर तस्लीमा जी हे । जिनके क्रांतिकारी विचारो से सनातन जीवन शैली को बल, दिशा, दृष्टी मिली हे । वे भारत में अभिननंदन की हकदार हे। महिलाओ को कुए से निकाल आजादी की सांस के उनकी जंग जारी हे । महिला सशक्तिकरण का वे विश्व विद्यालय हे ।

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    • June 21, 2015 at 12:45 am
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      सबको एक तराजू में तौलिये ! जो भारत को ही खा रहे हैं क्या वो सनातन संस्कृति में विश्वास रखने वाले माने जाएँ ? जो देश में रहकर भी अपनी पीढ़ियों की व्यवस्था स्विस बैंक में सुरक्षित रखने को मजबूर हैं क्या वो सनातन संस्कृति में विश्वास रखने वाले माने जाएँ ? अब कृपा करके उन्हें कांग्रेसी या अन्य किसी पार्टी का बताकर सनातन संस्कृति का बचाने का बचकाना प्रयास मत करना ! जब हम दूसरों से धर्म के पैमाने पर ही सीधा जवाब माँगते है तो खुद भी बिना दायें बाएं के जवाब दो ! और ” महिलाओ को कुए से निकाल आजादी की सांस की जंग ? ” बाप रे !! ऐसा सोचने की भी इजाजत है सनातन संस्कृति में ?? फिर महात्मा ज्योतिबा फुले से पहले ये महिला सशक्तिकरण किस खेत में उगता था ???

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  • June 19, 2015 at 11:25 am
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    वहाब साहब आप चाह्ते क्या है ? भाई हम तो समझ रहे थे की आप को देख पाठक सच्चे इस्लाम को समझ पाएंगे ! लेकिन आप तो ये मत प्रकाशित करो , इसको रोको आदि आदि डरे हुवे से जो कहते रहते हो उससे तो लगता है आप अपना अलग ही परिचय दे रहे हो ! अब क्या करे ? आप को देख इस्लाम की अच्छाइयों पे यकीं करें या इस्लाम को देख आपको खारिज करें ??

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  • June 19, 2015 at 12:43 pm
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    she is entitled to remain / live respectfully in india…i welcome her to stay with our family at kanpur.

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    • June 21, 2015 at 12:34 am
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      वाह ! क्या बात है ! तिवारी साहब क्या आप किसी हिन्दू धर्म के ,धर्म ग्रंथो के आलोचक को, टिकाकर को भी ऐसी पनाह देना चाहेंगे ? आपकी स सन्मान पनाह के लिए हिन्दुओं का ऐसा ही पूरा एक समाज सदियों से लेकर आज तक आप जैसों की और ताक रहा है !

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  • June 19, 2015 at 12:47 pm
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    ایک مولوی امریکہ کی مسجد مین کہہ رہا تھا۔۔امریکہ میں ایمانداری ہے۔ ایمان نہیں ہے۔ ہمارے پاس ایمان ہے اور ایمان داری نہیں ہے۔۔۔کاش امریکہ والے ایمان بھی لے لیں۔ اس مولوی کو پتا نہیں۔ یا دھوکہ دے رہا ہے۔ کہ ایمان کا ایمان داری سے کوئی تعلق ہی نہیں ہوتا۔ اگر ان کا آپس میں کوئی تعلق ہوتا ، تو ایمان اور ایمانداری دونوں لازمی فطری طور پر اکٹھے ہوتے۔ ہم دیکھتے ہیں، جن کو ایمان کا دعوی ہے۔ وہ دنیا کی پس ماندہ ترین، زلت آمیز، اور کریکڑ سے عاری قومیں ہیں۔ اور جن کے پاس ان کے بقول ایمان نہیں ہے۔۔۔ وہ ایمان داری کی نہائت بہتر مثال ہیں۔ یہ نہیں ہے، کہ ایمان سے ایمانداری کہیں روٹھ کرچلی گئی ہے۔۔ بلکہ یہ ہے، کہ ایمان کا ایمانداری سے کوئی تعلق ہی نہیں ہوتا۔آپ ہندو، عیسائی، یہودی، بدھ مت یا ملحد ہو سکتے ہیں۔۔ لیکن آپ ایمان دار بھی ہو سکتے ہیں۔ مسلمانوں کے پاس سوائے خود ساختہ ‘ایمان’ کے دعوے کے اور کچھ نہیں۔ نہ کریکڑ ہے، نہ عقل ہے۔ نہ سائنس ہے، نہ تعلیم ہے۔ نہ تہذیب انسانی میں کوئی شراکت داری ہے۔ اہل ایمان مسلم صرف صارف ہیں۔۔۔خرچ اور استعمال کرنے والے ہیں۔ جو یہودونصارا انسانی فلاح اور سہلوت کے لئے چیزیں بنا دیتے ہیں۔۔ اگر ان کے پاس بھی مسلمانوں والا ‘ایمان’ آ گیا ، تو ان سے بھی انسانیت، علم، تعلیم، سائنس، ٹیکنالوجی، تہذیب سب چھن جائے گی۔۔۔ جیسے مسلم ان سب صفات سے محروم ہیں۔ لہذا ایمان داری کسی ایمان کی کوئی محتاج نہیں

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  • June 19, 2015 at 4:38 pm
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    मेरा मानना है की तसलीमा ने इस्लाम को पढ़ा ही होगा, लेकिन उसकी इस्लामी समझ सही नही है, इसलिए वो इस्लाम की उसी व्याख्या के मुताबिक, उसकी मुख़ालफ़त करती है. लेकिन उसको दोष देने से क्या?

    उसने इस्लाम का जो अर्थ निकाला, उस व्याख्या पे चलने वाले हज़ारो लाखो लोग है. जो इस्लाम के नाम पे लोगो की हत्या कर रहे हैं, बच्चो, औरतो का कत्ल कर रहे हैं.

    उन लोगो पे तो वहाब चिश्ती जैसे लोगो का बस चलता नही, और तसलीमा जैसे सॉफ्ट टारगेट को धमकियाँ देके या उनपे हिंसा करके, ये सोचते हैं की इन्होने इस्लाम की सेवा कर दी.

    पहले, उन कट्टरपंथियो की हरकतों पे लगाम लगाओ, तसलीमा जैसे . आप चुप हो जाएँगे. बुजदिलो की तरह बर्ताब ना करो, वहाब मियाँ, हिम्मत है तो, अपने आप को मुसलमान कहने वाले, हैवानो से भीड़ो. नही है हिम्मत, तो कमजोरो पे अपनी बहादुरी मत दिखाओ.

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  • June 19, 2015 at 9:05 pm
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    तस्लिमा जि के अगर कोइ विचार गलत भि है तो उन्को अप्नि बात रख्ने का अधिकार होना चाहिये जब इस्लाम का प्रचार किया जा सक्ता है तो तस्लेीम जि अपना प्रचार क्यो नहि हो सक्ता है १
    कहा जाता है कि मुहमम्द जि का भेी कुच लोग विरोध मक्का मे करतेथे ! हिजरत करने के पहले क्या मुहम्मद् जेी के शगिर्दो ने उन् सब्केी हत्या केी थेी ?
    और यह भि कहा जाता है कि एक बुधिया मुहमम्द जि के ऊपर कुदा फेन्क तेी थेी फिर भि मुह्म्मद जि उस्के बिमार होने पर उस्कि तबियत पुचने गाये थे तब वहि कार्य् आज के मुस्लिम तस्लिमा जि के साथ क्यो नहि करते है ! तस्लिमा जि को मुस्लिमो से दर क्यो लग्ता है ! मुस्लिम लोग उन्से मत्भेद रख्ते हुय उन्कि जान कि रक्शा कर्ने का दायित्व् निभाने का फर्ज क्यो नहि अदा कर सक्ते है !
    तस्लिमा जि भेी अप्ने मुस्लिम बन्धुओन् के ऊपर गर्व कर सके! या तो कहियेकि उस बुधिया केी कहानेी गलत है , य यह कहिये तब मुहमद जि कम्जोर थे इस्लिये मुहमम्द जि ने ऐसा कार्य् किया था जब मुहमम्द जेी ताकत्वर् हो गये तो मक्का से सभेी अपने विरोधियो को बाहर निकाल दिया था वहि कार्य आजके मुस्लिम् भि करेन्गे१
    तस्लेीम जि एक् नारि है वह मुस्लिम पुरुशो के बहुबल से मुकाबला नहि कर सक्ति है !आज अनेक सालो से चेीन मे रोजे पर रोक चेीन सर्कारलगातेी है १ बुर्के पर रोक लगातेी है , फ्रान्स मे बुर्के पर रोक लगेी है लेीबिया के बगल मे चाद एक देश है वहान्भि कल से बुर्के पर रोक लग दि गयि है क्या हमरे मुस्लिम् उन सभेी देशो का मुकब्ला करेन्गे ! क्य इन् सभि देशो से मुस्लिम देशअप्ने दौत्य सम्बन्ध तोदेन्गे १
    कभेी नहि
    फिर उस बेचारेी तस्लिमा का विरोध क्यो ? उस्कि जान के भुखे क्यो ? तस्लिमा जेी कि जान मुस्लिम बचाये और साथ मे इसलाम का सहेी ग्यान भि उन्को दिजिये ! ताकेी वह भि अपनेी आदतो मे सुधार कर ले !
    बतलऐये उन्से बात्चेीत होनेी चहिये कि या उन्केी चिप्कर हत्या होनि चाहिये

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    • June 19, 2015 at 9:16 pm
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      अगर तस्लिमा जि गलत हैतो मुसलिम उन्के विरोध मे अदालत क्यो नहेी जाते है कानुन् अप्ने हाथो मे लेने कि इच्ह क्यो करते है लज्जा किताब लिखे हुये २० साल् से ज्यादा का समय हो चुका है १अब् तक् वहआदालत क्यो नहेी गये ?
      अब चले जाये ?
      दुर्भाग्य से बन्ग्ला देश ने उन्कि रक्शा नहि केी और यहि हाल भारत सर्कार का भेी रहा है तभि उन्को इस देश को मज्बुरन त्यागना पदा ! इन देशो से अच्हे तो तस्लिमा जेी के लिये अमेरिका अदि देश है !,

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