मुस्लिम समाज में गतिशीलता की ज़रूरत …

muslims

भारत के विभाजन के बाद से ही हमारे यहां ऐसी बहसें चलती रही हैं कि मुसलमान यहां सुरक्षित हैं या नहीं. उनके धर्म, भाषा, संस्कृति, पहचान और जीविका संबंधी उनके अधिकार स्वतंत्रता की हद तक सुरक्षित हैं या नहीं. यदि नहीं, तो इसका जिम्मेदार कौन है? यदि हां, तो इसके बाद भी मुसलमान पिछड़े क्यों है? प्रस्तुत है इन्हीं मुद्दों पर वरिष्ठ साहित्यकार *असगर वजाहत * का नजरिया……….

भारत में अल्पसंख्यकों के पिछड़े होने का कारण है कि उन्होंने खुद अपने साथ बुरा किया. उन्होंने अपनी मूल समस्याओं को नजरअंदाज किया. चाहे वह पश्चिमी शिक्षा का विरोध हो, खिलाफत आंदोलन हो या फिर भारत का विभाजन.
आज भी उनकी सबसे बड़ी मुश्किलें यही हैं कि वे अपनी मूल समस्याओं को समस्या मानने से इनकार करते हैं. वे यह स्वीकार नहीं करते कि हम शैक्षिक तौर पर पिछड़े हैं…
अपनी समस्याओं का इनकार ही अल्पसंख्यकों की सबसे बड़ी समस्या है. नेताओं ने धर्म के नाम पर ऐसी चाबी भर दी है कि वह एक भावनात्मक मुद्दा बन गया है जिसके नाम पर मुसलमान जान देने को तैयार है. उनको आगे लाने के लिए समुचित नीतियों की जरूरत है. पिछले पचास-साठ साल मुसलिम समाज के अंतमुर्खी होने के वर्ष कहे जा सकते हैं. मुसलिम समाज कई कारणों से सिमटता चला गया है. केवल सांप्रदायिक दंगों या हिंदू सांप्रदायिक शक्तियों के आतंक के कारण ही नहीं बल्कि कोई अग्रगामी एजेंडा न हो पाने के कारण मुसलमान इतना अधिक बचाव की मुद्रा में आ गये हैं कि वे भारतीय लोकतंत्र में अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं और न अपना हिस्सा ही ले पा रहे हैं.

आरक्षण इस दिशा में एक अहम उपाय हो सकता है. जिन समुदायों को अवसर मिलता रहा है वे आगे हैं. अब जरूरत है कि जो पीछे रह गये हैं उन्हें अवसर देकर आगे लाया जाये. जो समुदाय विकास की धारा में पीछे छूट गया हो उसे साथ लिये बिना आगे चलना संभव नहीं होगा. बशर्ते इसे लेकर समुचित नीति हो और लागू करने में ईमानदारी बरती जाय. मुसलमानों के संदर्भ में स्थिति थोड़ी सी उलट है. उन्हें आरक्षण की नहीं, प्रेरणा की जरूरत है. मुसलमानों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे शिक्षा आदि विषयों में, जो उनकी स्थिति सुधारने में मदद कर सकती हैं, उसमें रुचि दिखाएं. जामिया जैसे विश्वविद्यालय में आप देख सकते हैं कि सभी प्रोफेशनल और अच्छे कोर्सेस के टापर गैर-मुस्लिम विद्यार्थी हैं. वहां तो उनको पढ़ने और आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक रहा. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का भी हाल जैसा है सब जानते हैं. आज जितनी भी मुस्लिम संस्थाएं हैं, वे सब गुणवत्ता के मामले में सबसे निकृष्ट कोटि की हैं. सही मायने में मुसलमानों में आज समाजसुधार की सख्त जरूरत है. अन्य समुदायों की भांति मुस्लिम समाज में क्रीमी लेयर है. यह और बात है कि यह बेहद छोटा है. किसी भी तरह के आरक्षण का फायदा यही तबका उठाता है. आरक्षण आदि से गरीब मुसलमान को कोई फायदा नहीं होता. इन मसलों को लेकर कोई मुसलमान नेता आगे नहीं आता. मुसलिम समाज में कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन नहीं दिखाई पड़ता. लगता है सर सैयद के आंदोलन के बाद मुसलिम समाज में कोई आंदोलन नहीं चला. यहीं नहीं, मुसलिम समाज में धर्म, संस्कृति, भाषा, सामाजिक समस्याओं आदि को लेकर कोई विमर्श भी नहीं दिखाई पड़ता. यह जड़ समाजों का लक्षण है और मुसलमान को गतिशील होने की आवश्यकता है. यदि देखा जाये तो भारतीय अर्थव्यवस्था, प्रशासनिक संरचना और उद्योग जगत में मुसलमानों की भागीदारी नगण्य है. मुसलिम बुद्घिजीवी अपने समाज और परिवेश का अध्ययन करने तथा दिशा-निर्देश तय करने में भी बहुत सफल नहीं हुए हैं. ऐसी स्थिति में धर्म और धर्म की आड़ में तथाथित ’धार्मिक मूल्यों’ ने मुसलमानों को बड़े भारतीय समाज से अलग कर दिया है. कहने को मुसलमानों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है लेकिन यह सब कवायदें मात्र राजनीतिक औपचारिकताएं हैं. देश में नीतियां ऐसी बनायी जानी चाहिए कि जो वर्ग कमजोर है उसे अपने आप फायदा हो. अगर ऐसा नहीं होता तो इसका अर्थ है कि नीतियों में खोट है. हमारे यहां इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जो पढ़ाई पूरी कर ले उसे नौकरी भी मिलेगी. नागरिकों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार की गारंटी नहीं है. अलबत्ता इन चीजों का इस्तेमाल वोट लेने के लिए होता है.

दरअसल, मुसलमानों का इतिहास एक सामंती और पतनशील मूल्यों से निकला इतिहास है. यह सामंतशाही 1857 में खत्म हो गई. उसके पतन का कारण भी वह खुद था क्योंकि उसमें दूरर्शिता का अभाव था. उसके बाद का समय सर सैयद अहमद का था. वे मुसलमानों को शिक्षा के जरिये आगे लाना चाहते थे. सर सैयद अहमद को इस बात का अंदाजा था कि आने वाला समय अंग्रेजों का है. हालांकि, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने विभाजन में बड़ी भूमिका निभाई. अगर अलीगढ़ आंदोलन में मुसलमानों की बौद्धिक तैयारी धर्मनिरपेक्षता की रक्षा कर पाने में सक्षम होती तो शायद आम मुसलमान पाकिस्तान का समर्थन नहीं करता. अगर उस समय का मुसलमानों का बौद्धिक तबका सही भूमिका निभा पाने के लिए सक्षम होता तो खिलाफत आंदोलन नहीं चला होता, जिसकी भारत में कोई जरूरत नहीं थी. तुर्की की जनता वहां के खलीफा को हटाना चाहती थी तो भारत में इसके विरोध का औचित्य समझ से परे है. महात्मा गांधी ने इसका समर्थन किया था जो कि उनके समस्त योगदान पर काले धब्बे की तरह अंकित है. कांग्रेस की राजनीति मुसलमानों के प्रति कभी बहुत स्पष्ट नहीं रही. मतलब कांग्रेस ने कभी तय नहीं किया कि मुसलिम समाज के केवल उसी तबके से हाथ मिलाया जायेगा जो धर्मनिरपेक्ष, उदार, सहिष्णु और लोकतंत्र की मर्यादा को समझता है. कांग्रेस ने एक ओर जहां मौलाना आजाद, डा जाकिर हुसैन, रफीक अहमद किदवई, रफीक जकारिया, प्रो. नूरुल हसन जैसे लोगों को मान्यता दी तो दूसरी ओर तब्लीगी जमात और दूसरे ऐसे मुसलिम संगठनों से भी हाथ मिलाया जो अपनी प्रकृति में कांग्रेस से भिन्न थे. इसका कारण शायद यही था कि बड़ा मुसलिम समाज इन्हीं कट्टरपंथी शक्तियों के हाथ में है और वोट लेने के लिए कांग्रेस को कट्टरपंथियों के पास जाने की आवश्यकता पड़ती है. कांग्रेस ने मुसलिम वोट के लिए हर प्रकार की मुसलिम जड़ता को समर्थन दिया. यहां तक कि शाहबानो केस में कांग्रेस ने ’यूटर्न’ ले लिया. कांग्रेस की यह रणनीति दूसरे दलों को इतनी पसंद आयी कि मुसलिम वोटों के आधार पर मुख्यमंत्री बनते रहे पर उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की वही हालत रही, जो थी.

समस्या यह है कि मुसलमान खुद अपनी समस्याओं को लेकर चिंतित नहीं है. ऐसे में सरकारी प्रयासों से क्या होने वाला है. कहने को अल्पसंख्यक आयोग बना है, कई सारी योजनाएं भी रेवड़ी की तरह बंट रही हैं मगर इन औपचारिकताओं से अल्पसंख्यको को फायदे की जगह नुकसान ही है. सवाल है कि इसका विरोध कौन करे. क्योंकि जो मठाधीश इसका लाभ ले रहे हैं वे न इसका विरोध करेंगे और न ही करने देंगे. संख्या के आधार पर किसी समुदाय को अल्पसंख्यक मानने से भी क्या होगा. असल समस्या तो आर्थिक और सामाजिक है. जब तक इन बातों को आधार नहीं बनाया जाता तबतक अल्पसंख्यक समुदाय की समस्याएं बनी रहेंगी. वस्तुतः हमारा पूरा समाज यथास्थितिवादी है. समस्याओं का फौरी समाधान भी इसी यथास्थितिवाद का नतीजा है. यथास्थितिवादी नेता वर्तमान स्थिति को बदलना नहीं चाहते क्योंकि बदलाव से उन्हें मिलने वाले छोटे-छोटे फायदे बंद हो सकते हैं.

मुसलमानों को पिछड़ा रखने की साजिश अंग्रेजी हुकूमत ने तो की ही, आजादी के बाद पिछले साठ सालों से भी यह जारी है. क्योंकि अगर यह स्थिति बदल गयी तो जिन नेताओं का मुसलमानों पर प्रभुत्त्व है वह खत्म हो जायेगा. समस्या यह भी है कि आज मुसलमान केवल उन्हें अपना नेता मानता है जो उसके मत से पूरी तरह सहमत हों. किसी भी सामाजिक रीति जैसे पर्दा आदि के बारे में कोई व्यापक बहस मुसलिम समाज के अंदर नहीं चलती. मुसलिम समाज की बड़ी समस्ययाएं तो वही हैं जो इस देश के गरीब, शोषित और पीड़ित समाज की हैं. लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष उन्हें कुछ और जटिल बना देता है.

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16 thoughts on “मुस्लिम समाज में गतिशीलता की ज़रूरत …

  • July 2, 2014 at 7:37 pm
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    ” आज मुसलमान केवल उन्हें अपना नेता मानता है जो उसके मत से पूरी तरह सहमत हों. किसी भी सामाजिक रीति जैसे पर्दा आदि के बारे में कोई व्यापक बहस ” कहना तो नहीं चाहिए लेकिन इसमें सबसे बड़ा दोष शायद ”अलीगेडियन्स ” का भी हे अफज़ल खान भाई जैसे अपवादों को छोड़ दे तो अधिकांश अलीगेडियन्स मेने बहुत देखा हे की पढ़ लिख कर खुद तरर्की करते हे मॉडर्न रहते हे लेकिन आम मुस्लिम महफ़िल में बैठ कर कठमुल्लशाही कटट्रपंथ का समर्थन ही करते हे या फिर समर्थन न करे तो चुप ही रहते हे कोई ताजुब नहीं की ऐसा हो रहा हे जैसा एरम आगा ने बताया हे http://navbharattimes.indiatimes.com/state/uttar-pradesh/others/dont-turn-amu-into-a-madrassa-students/articleshow/31713334.cm

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    • July 3, 2014 at 1:23 pm
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      हयत जी
      लीजिये अब और कोई बग़दादी खलीफ़ा बन गया है, समझ मे नही आता के आखिर ए क्या संदेश देना चाहते है दुनिया को, अलकायदा भी खिलाफत लाना चाहता था और भी जितने मुस्लिम ग्रुप पैदा हुए है सब इस्लाम का सहारा ले कर गद्दी हासिल करना चाहते है….. अब मुसलमानो का कुछ नही हो सकता, इसी तरह कट मर जाये गे—– अब सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है……
      अफ्जल खान्

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      • July 3, 2014 at 4:59 pm
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        एक और दुःख की बात अफज़ल भाई इस बार की तहलका में आप और केजरीवाल के डाउन फल की स्टोरी हे इसमें भी मुस्लिम बुद्धिजीवियों और नेताओ का भी हाथ रहा बेमतलब में आप और केजरीवाल को भरषटाचार गैरबराबरी से हटाकर साम्प्रदायिकता की तरफ मोड़ा बेमतलब में मोदी से भिड़े देश में कॉंग्रेस्स विरोधी लहर चल रही थी आप भी उसका फायदा उठाकर २० सीट ले सकती थी केजरीवाल को भी संसद में होना था मगर मुस्लिम वोटो के चक्कर में गड़बड़झाला हो गया मुस्लिम बुद्धिजीवी हमेशा की तरह अपना फ़र्ज़ निभाने में असफल हुए

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  • July 2, 2014 at 7:46 pm
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    अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और मुस्लिम बहुल इलाको में क्या बदलाव हो रहे हे हम सोचते हे की हिन्दू अंधे हे उन्हें कुछ दिखाई नहीं देगा लेकिन पता सबको हे नतीजा सब लोग सब कुछ भूल कर सिर्फ ”हिन्दू ” ही बन गए और बी जे पी को यु पी 73 सीट मिल गयी हो सकता हे यही सब बिहार में भी हो रहा हो यानी यहाँ से बी जे पी को 100 सीट मिल गयी में तो कहता हु की बी जे पी को एक अभिनन्दन समारोह जगह जगह घूम रहे मुस्लिम कटटरपन्तियो का भी करना चाहिए इन्होने भी बी जे पी के लिए खूब फ़िज़ा बनायीं

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  • July 2, 2014 at 7:49 pm
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    मेरे मुस्लिम ही दोस्त का क्लीनिक हे एक दिन उसमे एक छुटभय्ये कटटरपन्ति आये जैसे ही उन्हें पता चला की मेरे दोस्त का कम्पाउडर गैर मुस्लिम हे उस पर क्लीनिक में ही इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाने लगे मेरा दोस्त मुझसे बोला की अच्छा हुआ की मेरा कम्पाउडर बहुत सीधा हे उसे इन बातो की समझ नहीं उसने कुछ नहीं कहा तो मेने कहा की चाहे उसे कुछ समझ हो न हो ये तो समझ ही गया होगा की ” मोदी को वोट देना हे ”

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  • July 2, 2014 at 8:20 pm
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    मुस्लिम बुद्धजीवियों का हाल ये हे शामुस्ल इस्लाम जी हे बुद्धिजीवी हे एक्टिविस्ट हे दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलिज में प्रिंसिपल हे ये बड़ी मेहनत से संघ के खिलाफ लिखते रहते हे बड़ी अच्छी बात हे लेकिन लेखन में इनकी कोई खास मेहनत मुझे मुस्लिम कटटरपन्तियो के खिलाफ नहीं दिखती हे मुझे तो लगता हे की ये और दूसरे कई मुस्लिम बुद्धिजीवी जीवन में कभी किसी मुस्लिम बहुल इलाके की अंदरुनी गलियो में रहे भी हो ? ( में 15 साल रहा हु ) एक बहस http://mohallalive.com/2013/07/24/an-open-letter-to-hindu-nationalist-narendra-modi/

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  • July 3, 2014 at 12:26 pm
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    मुसलमानों को पिछड़ा रखने की साजिश अंग्रेजी हुकूमत ने तो की ही, आजादी के बाद पिछले साठ सालों से भी यह जारी है. “” इतने अच्छे लेख की असर कम करने के लिये काफी है.. भारत मे पारसी 1% भी नही है.. लेकिन पूरी मुस्लिम आबादी को खिला सकते है.. उनको भी ईरान से मुसलमानो द्वारा प्रताडित कर के भगाया था.. भारत को अपना माना और देश और अपनी जात की तरक्की की.. जैन 2% से ज्यादा नही है.. लेकिन 100% पढ़े लिखे है.. देश मे हजारो स्कूल और अस्पताल बनाई है.. सीख भी 100% पढ़े लिखे है और पैसेवाले है.. ईसाई, बौद्ध भी मुसलमानो से कम है.. फिर भी इस तरह का रोना नही रोते है… जब की मुसलमान देश पर बोज़ बने हुए है.. कई करोड़ रुपैये सिर्फ कश्मीर के पीछे खर्च हो रहे है.. और आंतकवाद को रोकने के लिये खर्च हो रहे है.. जहा पर पढ़ाई लिखाई कम होगी, अपने धर्म से ज्यादा देश की चिंता होगी.. वहा खुशाली अपने आप आयेगी.. चुकी देश सलामत होगा तो धर्म भी सलामत होगा.. इतना तो कोई भी अनपढ और गवार भी समजता है..

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    • July 3, 2014 at 4:53 pm
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      ये नॉनसेंस बाते इनका भला क्या मतलब हे ? पारसी मुट्ठी भर हे जैन एक् रोड़ भी नहीं सिख 3 करोड़ भी नहीं हे न ये भारत के शासक कभी रहे इन लोगो के हाल और हालात मन मानस की भला उपमहादीप के 60 करोड़ मुस्लिमो से केसी तुलना ?

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  • July 3, 2014 at 12:27 pm
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    हम लोग पाकिस्तान आ कर जीरो से शुरु कर के डॉक्टर आदि बन गये पर दुख है की य्हाँ भारत के मुसलमान वही के वही रह गये . शिक्षा के शेत्र मे कोई उप्लब्दी नही की. क्यों ?

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  • July 3, 2014 at 1:56 pm
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    हिन्दुओँ को मुसलमानो का डर दिखाकर अपनेी राजनेीति मजबोूत करने का प्रयास आरएसएस करता रहा है. वह सफल नहेी हुआ. उसेी तरह हिन्दुओ क डर दिखाकर साम्प्रदायिक मुस्लिम नेता मुसलमानो के बेीच अपनेी जड मजबोूत करते हैँ और वे सफल रहे है जिस दिन हिन्दुओ का डर मुस्लिम दिमाग से निकलेगा, उसके साम्प्रदायिक नेताओ केी राजनेीति समाप्त होगेी और मुसलमान अपनेी मोूल समस्या केी ओर देखेगे. इसलिए असगर वजाहत जैसे लोगो को कोशिश करनेी चाहिए कि वे मुसलमानो के मन से हिन्दुओ के डर को निकाले.

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    • July 3, 2014 at 4:50 pm
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      असगर वजाहत ( शायद एक शिया ) हो या दूसरे बड़े बड़े मुस्लिम नाम मुझे तो आम या एजुकेटिड मुस्लिम मानस पर इनकी कोई पकड़ कोई गतिविधि इनके दुआरा कोई छेड़ी बहस मुझे तो नहीं दिखती हे

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  • July 4, 2014 at 12:48 am
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    धार्मिक कट्टरपन या फिर शिक्षा (समाज की मुख्य धारा से जुड़ कर) और तरक्की. यह विकल्प तो सभी के लिये खुला है. आज हर छोटे परिवार (चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम) की आर्थिक दशा संतोषजनक है, लेकिन फिर भी समझ में नही आता तो क्या किया जाये?

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  • July 5, 2014 at 1:54 am
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    आदरणीया अफजल खान जी औरन्जेब और टीपू सुल्तान के समय आपके पूर्वज मौत के डर से कन्वर्टेड मुस्लिम जो की पहले हिन्दू ही थे एक बिहारी बाबू जी ही थे जैसे की आप जानते है बिहार एक पूज्य स्टेट है जहा महात्मा बुध का जन्म हुआ जिस समय महात्मा बुध का जन्म हुआ उस समय सारा नेपाल और लुंबनी गांव बिहार राज्य के ही अंदर आता था इसलिये महात्मा बुध को हमलोग और सारे बिहारी लोग बिहारी ही कहते है और महात्मा बुध को ज्ञान बिहार के गया नगर मे ही मिली थी जहा सम्राट अशोक का जन्म हुआ जहा महावीर जी का जन्म हुआ जहा चाणक्य जैसे प्रथम विस्व् अर्थशास्त्री जी को भी आना पड़ा था जहा शील भद्र गौतम नालन्दा विस्व् विश्व विद्यालया के प्रथम कुलपति का जन्म हुआ था जिसने दुनिया का सबसे पहले प्रख्यात विस्वा विध्यालय की रचना की थी जहा चंद्र गुप्त मौर्या जी का जन्म हुआ जिसने सिकंदर जैसे वीर की से सेना की भी धूल चटा दी थी चंद्र गुट द्वितीय का भी आपको शाशन काल याद होगा या उसका इतिहास आपने पढ़ा होगा जिस समय मे बिहार और बिहार के पाटलिपुत्र राजधानी को स्वर्ण युग कहा गया था समुद्रा गुप्त का भी इतिहास पढ़ा होगा जिस समय अखंड हिन्दू रास्ट्रा था और समुद्र गुप्त के समय ही सारा अरब देश बिहार और अभी का हिन्दुतान के अंदर ही था और आज के समय 21वी सदी मे भी अगर देखा जाय तो आज भी बिहारी आइ. ए. एस आइ. पी. एस और दुनिया की सर्वोच पध जो भी होता है और सरकारी नौकरी उसपर वो सबसे ज्यादा काबिज है यानी की आज भी बिहारी मे इतना दम है वो नुम्बर 1 है की वो कुछ भी कर सकता है जब एक बिहारी महतमा बुध बोध धर्म चला सकता है और अंतिम तीर्थानकर महावीर जी एक नया धर्म चला सकते है और गुरु गोबिन्द सिंह जी भी एक बिहारी ही थे जिनका जन्म पटना साहिब मे हुआ था वो एक नया धर्म सिक्ख चला सकते है तो आप भी तो एक बिहारी ही है आपको भी बिहार पे गर्व होना चाइये और सारे मुस्लिमो को उसके ओरिजनल धर्म हिन्दुत्व के तरफ लाना चाइये जैसे महिंदर पाल आर्या जी ला रहे है ये आप भी कर सकते है और महिंदर पाल आर्या जी से आप ज्यादा पॉवर फूल होंगे किऊँकी आप एक बिहारी है और एक बिहारी मे दम होता है और एक बिहारी सौ पे भारी होता है ये कहावत तो आपने सुनी ही होगी इसलिये आप दुनिया या मौत का परवाह ना करे और आप अपने विच्चार का लेख लिखते रहे या हिदू धर्म मे वापस आ जाये

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    • July 5, 2014 at 9:09 am
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      इस्लाम में आने के बाद एकाध आदमी नास्तिकता की तरफ तो जा सकता हे ( जैसे वर्ल्ड कप विजेता फ़्रांस फुटबॉलर ज़िनेदिन जिदान ) मगर कोई मुस्लिम किसी और आस्था के प्रति ज़रा भी आकर्षित नहीं होता हे इसकी वजह हे की लोग बहुदेववाद से ही एकेशवरवाद की और जाते हे एकेश्वरवाद से बहुदेववाद की और नहीं जाते हे

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      • July 6, 2014 at 3:36 pm
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        यहाँ ये बात कहना का मेरा ये मतलब बिलकुल नहीं हे की में किसी इस्लामिक सुप्रियॉरिटी या मुस्लिम सुप्रियॉरिटी में विश्वास करता हु नहीं में किसी सुप्रियॉरिटी की नहीं बल्कि मानव सवभाव की ही बात कर रहा हु आकर्षित न होने से भी मेरा मतलब अपमान करना नहीं हे

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