मुसलमानो का शानदार अतीत और उस की सच्चाई !

1001-inventions

प्रस्तुत है मुसलमानों के इतिहास के कुछ ऐसे काले पन्नों जो उनकी आधुनिकता दुश्मनी, असहिष्णुता और हिंसा प्रकट करने के लिए पर्याप्त हैं। आज जिन मुस्लिम दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का उल्लेख बड़े ही गर्व से किया जाता है और गौरवशाली अतीत के किस्सों से मुस्लिम दौर को एक सुनहरा दौर देख्या जाता है आइये आज हम आप को इतिहास के पन्ने में ले चलते है जहां आप को पता लगे गा के इन महान मुस्लिम दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का हश्र किया हुआ.उन का हश्र देख कर आप की आँखे खुली रह जाए गी.

• याकूब अलकुण्डी नाम से हर मुसलमान अच्छी तरह परिचित है। दर्शन, भौतिकी, गणित, चिकित्सा, संगीत, रसायन, खगोल विज्ञान आदि अध्ययन में इस विद्वान ने बहुमूल्य सेवा अंजाम दी। कुछ खलीफा के दौर में कंदी को सरकारी संरक्षण मिली लेकिन खलीफा मुस्तासमबिल्ला के सत्ता आते ही कट्टरपंथियों ने उसका जीना मुश्किल कर दिया। खलीफा ने कंदी के पुस्तकालय कब्जे में ले लेने का आदेश जारी कर दिया। यही नहीं बल्कि इस महान विचारक को साठ साल की उम्र में बगदाद की सड़कों पर सरे आम पचास कोड़े मारे गए और हर कोड के साथ भीड़ खुशी से तालियां बजाते और नारे लगाता था।

• मुसलमानों के इतिहास का एक और दरख़शां सितारा इब्ने रुश्द है जो के बहुत बड़ा दार्शनिक था और उस की थ्योरी सच्चाई और खुदा बहुत मशहूर हुई थी और उस की थ्योरी से यूरोप समाज ने बहुत लाभ उठाया , लेकिन यह महान व्यक्ति भी बारहवें सदी के अंत में इमाम अबू यूसुफ के दरबार में सत्तारूढ़ होते ही लोग इस के खिलाफ हो गए । स्पेन की जामा मस्जिद में एक बड़ा सभा आयोजित किया गया। उस समय के काजी, उच्च पदाधिकारियों और बड़े उलेमा और धर्मशास्त्रियों ने इस सभा में भाग लिया। इब्ने रुश्द अपने चेलों के साथ उपस्थित हुआ। लंबी बहस और के बाद-विवाद के बाद खतीब मस्जिद ने फतवा दिया कि इब्ने रुश्द नास्तिक हो चुका है। सजा के रूप में इब्ने रुश्द और उसके चेलों को पास के एक बस्ती में नजरबंद कर दिया गया। सिवाय कुछ पुस्तकों के इब्ने रुश्द सभी किताबें जला कर राख कर दी गईं। इतिहासकारों ने यह भी लिखा है कि जब इब्ने रुश्द अपनी नजरबंदी को तोड़कर भागने की कोशिश की तो उसे पकड़ कर जामा मस्जिद के खंभे के साथ बांध दिया और हर आने जाने वाले से कहा गया के इस के मुंह पर थूके , इस तरह इब्ने रुश्द जलील हो कर पूरी जिंदगी यु ही घूमता रहा .

• इब्न सिना का नाम हमारे अतीत समलैंगिक के शीर्ष व्यक्तियों में से एक है। आधुनिक मेडिकल का नीव इब्ने सिंह के ही नाम है आज भी इस दौर में ह्यूमन बॉडी एनाटोमी की पुस्तक मेडिकल कॉलेज में सब्जेक्ट में है हमदान मंत्री ने इब्न सिना को अपना मंत्री नियुक्त कर रखा था। कट्टरपंथियों के साथ मतभेद की वजह से उसे छुपना पड़ा इस को खोजने में सेना ने उसका घर तबाह कर डाला और अमीर ने उसका सर काट करने का आदेश जारी कर दिया। इब्न सिना ने चिकित्सा पर अपनी सब से मशहूर किताब इसी प्ोशि के बीच लिखी थी। पूरी जिंदगी ये कट्टरपंथियों से छुप कर भागता रहा और उसे सर छुपाने की जगह नहीं मिली, ऐसे चिकित्सक को सम्मान मिलना चाहिए था मगर जिंदगी भर दर बदर की ठोकरे खता रहा !

* मोहम्मद ज़करिया अलराजि इतिहास में महानतम मुस्लिम चिकित्सक के रूप में जाना जाता है। अलराजि ने इतिहास में पहली बार खसरा और चेचक के अंतर को स्पष्ट किया, प्रक्रिया गढ़ने में सुधार और शायद इतिहास में पहली बार उसने मेडिकल एथिक्स की अवधारणा शुरू की। कहा जाता है कि अमीर समय अलराजि के पुस्तक में प्रस्तुत किए गए विचारों से इतना गंभीर मतभेद था कि वह आदेश जारी किया कि अलराजि की यह किताब लेखक के सिर पर तब तक जोर से मारी जाए जब तक कि किताब या सिर दोनों कोई एक फट न जाए। बुजुर्ग वैद्य ने यह सजा सहन कर ली लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वृद्धावस्था में इस दृष्टि चले जाने के कारण इसी घटना से लगने वाली सिर और मस्तिष्क की चोटें थीं।

• इब्ने -खलदून को ज्ञान इतिहास संस्थापक माना जाता है। हालांकि इसके साथ किसी दुर्व्यवहार के कोई सबूत तो नहीं मिलते लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उन्नीसवीं सदी तक दुनिया में इस नाम से कोई परिचित भी न था। मुस्लिम समाज ने सदियों तक इसकी परवाह नहीं की लेकिन भला हो पश्चिम कफारों और मूर्तिपूजक का कि उन्होंने इस्लाम के इस महान सपूत को गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकाला और दुनिया से परिचय। माशााललह अब मुसलमान इसका उल्लेख करते हुए भी फूल कर कपा जाते हैं।

(Visited 17 times, 1 visits today)

23 thoughts on “मुसलमानो का शानदार अतीत और उस की सच्चाई !

  • April 20, 2016 at 5:29 pm
    Permalink

    हम सभी,कुछ बिरलों और अपवादों को छोड़ कर, अपने मज़हब अपनी संस्कृति अपनी जीवन शैली की गिरफ्त में इतनी बुरी तरह जकड़े हुए रहते हैं कि एक मौलिक बात पूरी तरह भुला देते हैं या जानबूझ कर दरकिनार करते हैं और भर्त्सना करते हैं।और वो बात है किसी भी इन्सान का अपनी स्वतंत्र सोच, अलहड़ मिजाज़ व स्वतंत्र सृजन क्षमता।आज तक कोई ऐसा मज़हब,पन्थ,धर्म जीवन पद्धति नहीं हुई जो इन्सान के अपने मन मुताबिक सोचने की प्रवृत्ति या सृजन क्षमता का दमन कर पाई हो।जिन महानुभावों के बारे में आपने पोस्ट में बताया है, निश्चय ही वो सभी ऐसे ही बिरले इन्सान हैं।

    Reply
  • April 21, 2016 at 11:07 am
    Permalink

    ये तो वो लोग है, जिनको कट्टरपंथियो की नफ़रत का शिकार होना पड़ा. लेकिन जिन महान वैज्ञानिको के साथ ऐसा नही हुआ, वो मुस्लिम समुदाय के बहुमत की धार्मिक व्याख्या मे यकीन रखते थे, या उसके प्रति रुझान रखते थे, इसका कोई प्रमाण नही मिलता.
    इन वैज्ञानिको ने अपनी प्रेरणा, इस्लाम या रसूल-अल्लाह को बताया हो, इसका ज़िक्र भी नही मिलता.
    अब चूँकि, मुसलमान एक मानसिक स्थिति है, कोई आनुवांशिक पहचान नही, इसलिए ऐसी सूरत मे इस्लाम के प्रति आस्था व्यक्त करने के प्रमाण की स्थिति मे इन महान बुद्धिजीवियो की पहचान को मुसलमान बताना, कतई तर्क-संगत नही.

    मैं ये दलील बार-बार इसलिए देता हूँ कि मुस्लिम समुदाय के विज्ञान मे पिछड़ेपन को तो हम लोग स्वीकार कर पाते हैं, लेकिन धार्मिक दकियानूसी विचारो की वजह से हम इस स्थिति मे पहुँचे, इस तर्क को हम नकार देते हैं. बल्कि अतीत के इस गौरवशाली इतिहास को मुसलमान पहचान से जोड़के, हम आत्म-मंथन का रास्ता भी बंद कर देते हैं.
    इसलिए, अरब के इस शानदार दौर और उसके महान बुद्दीजीवियो को मुसलमान पहचान से जोड़ने की दलील के खोखलेपन को हमे उजागर करना ही पड़ेगा.
    बाकी जिन लोगो की नज़र मे, ये विज्ञान बकवास है, और इसका परलोक की सफलता से कोई लेना देना नही, वो तो भयंकर बीमारी की अवस्था मे पहुँच गये है, उनका इलाज मुश्किल है. बाकि अधिकांश लोग, आज भी पढ़ाई-लिखाई, ज्ञान-विज्ञान को सम्मान से देखते हैं, उनके लिए इस कुतर्क की हवा निकालनी ज़रूरी है.

    Reply
  • April 21, 2016 at 2:40 pm
    Permalink

    मज़हब इस्लाम की मुखालिफत सिर्फ आप लोग ही नही कर रहे जनाब आप जैसे बहुत लोग करते आये हैं जिनको सस्ती शोहरत और मनुवादियों की वाह वाही पाने खुद को बुद्धजीवी कहलाने का शौक़ होता है ! आप जैसे लोगों के लिये अखिरी सच्चाई यही है कि इस्लाम को जिस हद त हो सके बदनाम किया जाये मुस्लिमों को एह्सास कमतरी का शिकार बनाया जाय !
    पहले तो इन लोगों को कोई मुस्लिम साईसदान ही नही मिलता था अब इन्हे मिले हैं तो उन को इस्लाम से दूर कर के कहना अहम झिम्मेदारी है ! जितने भी लोगों का नाम लिखा गया है उसमें कुछ हद तक ही सच्ची हैं बाकी बकवास हैं लेकिन सपोर्ट करने वाले भी दानिश्वर यहां मौजूद हैं कलम लिये बैठे हैं ! और ज़ाकिर साहेब उजागर क्या करना है आप जैसे महान आत्माओं का कह देने ही हर्फे आखिर है आखिर आप भी तो सर्वश्रेष्ट बुद्ध जिवी हैं इस्लाम मुखालिफ लोगों का साथ भी है !

    Reply
    • April 22, 2016 at 11:11 pm
      Permalink

      इस्लाम कि गलत बतो का विरोध क्यो न् किया जाये

      Reply
    • May 2, 2016 at 5:41 pm
      Permalink

      शादाब साहब, वैसे मेरे जवाब मे किसी वैज्ञानिक की सफलता को उसके मज़हब से क्यूँ जोड़ा जाए, सवाल है, मज़हब या इस्लाम की बुराई, मेरे इस कमेंट मे कहाँ है?

      Reply
    • May 7, 2016 at 7:56 pm
      Permalink

      आज ये शादाब साहब जैसे लोग, हमे इस्लाम की मुख़ालफ़त करने वाला कह रहे हैं, लेकिन कल अल्लाह की दया से हमारा साइंस मे नाम हो जाए तो हम मुस्लिम साइन्स्दान हो जाएँगे, जैसे ये हो गये. सब अपनी सहूलियत के मुताबिक है.

      वैसे कई लोग, न्यूटन और आइंस्टीन तक को कलाम पढ़वा चुके हैं. ज़्यादा सबूत मांगोगे और आज के दौर मे पूछोगे तो फिर ये दुनिया दो कौड़ी की है, वो दुनिया असली है, वो हमे ही मिलेगी की दलील तो है ही.

      Reply
  • April 22, 2016 at 12:13 pm
    Permalink

    इस्लमिक विद्वान जरा सा मत्भेद भेी स्वेीकार करने को तैय्यार नहेी हो पाते है ! ताकत का दुरुप्योग किया जाता है उस ताकत से कम्जोर विचारो केी रक्शा नहेी केी जातेी है !

    Reply
  • April 23, 2016 at 1:13 am
    Permalink

    पता नही आप किस अतीत और उस की सच्चाई की बात कर रहे है मुझे तो पिछडेपन और जाहिलता की तरफ जाने वाला अतीत दिखायी देरहा है

    Reply
  • April 25, 2016 at 4:19 pm
    Permalink

    Afzal kh. Sahb ke post me na kisi pustak ka koi hawala na hi nam maloom hota he ye inki khud ki hi likhi manghadat kahaniyan kuki islamic history ka is admi ko itna gyaan bhi nhi jitna kisi jahil ko ho islam क khilaaf manghadat kahaani likhkar inhone apna nam bhi munafiqon ki list me shamil kr diya he …islam me ek shabd he” munaafiq” jo in jese logo par satik bethtaa he .islam me sirf ek asmaani kitaab he quran jiske har १० aayaton me se ek aayat ye hoti he ke tum ghor q nahi karte is kainat pe jise hmne banaaya he?..ghor karne se muraad kisi jahil se nahi paripakv or budhi jivion se hi ghor krne ki bat kahi gaee he.shayd QURAAN dunya ki ek akeli kitaab jisme luqmaan k nam se pura ek chapter mojood he kon the luqmaan ye wo physicist the jinke paas mot ke siwae har marz ki dawa thi ..islam ne qabil loGon ke wo jagah di jo dunya kekisi dhrm ne nahi di ….jange badr me bhut se dushmano ko girftaar kar lya gya or unhe jb ap mohammd sallallahu Alehi wasallm ke samne pesh kiya gaya apne kaha in qedio me se kitne padhe likhe he or unme jo log pade likhe the unse kaha ki me tumhe azaad kr dunga agar tum mere sathion kopadha do…..nam afzal rakhne se kuch nahi hota kaam afzal hona chahiye ….iraaq ilm ka dunya me sabse bada center tha ajbhi agarwaha ke musium ka dora kareto hamara sunehra Ateet pta lag jaega…

    Reply
    • May 2, 2016 at 5:38 pm
      Permalink

      जनाब तो इन साइन्स्दानो ने इस्लाम को अपनी प्रेरणा बताया हो, इसका भी कोई सबूत नही.

      मुसलमान एक मानसिक अवस्था है, कोई आनुवांशिक पहचान नही, ऐसी सूरत मे इन महान वैज्ञानिको की सफलता को इस्लाम के शानदार अतीत से जोड़ने के लिए, इस्लाम के प्रति इनके रुझान को स्पष्ट करने वाला प्रमाण अति-आवश्यक है.

      आप भी इस बात को जानते है कि मुसलमान बनना पड़ता है, पैदा नही होता.

      Reply
  • May 2, 2016 at 7:50 pm
    Permalink

    आज के दौर मे परवेज़ हूद्बोय को ही देख लें, बंदा, दुनिया की नंबर 1 यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट है, नोबल पुरूस्कार विजेता के साथ काम कर चुका है. लेकिन लगभग सभी तथाकथित मौलाना, उस नोबल पुरूस्कार वैज्ञानिक और परवेज़ हूदभोय दोनो को ही जाहिल मानते हैं.

    इन अरबी नाम के मुसलमानो के उपर भी मुसलमान का ठप्पा, सिर्फ़ इसीलिए लगाया जा रहा है, जिससे ये हीन भावना को दबा सके.
    वरना स्वतंत्र विचारो को जाहिल लोगो ने कभी पसंद नही किया. आज ये वैज्ञानिक, मज़हब के प्रति अपने विचारो को प्रकट नही कर सकते, इसलिए इनको मुसलमान बना दो. मुसलमान के ठप्पे पे ज़ोर इसलिए है कि मज़हब की दुकान चलती रहे.

    जैसे आजकल दूसरी तरफ के लोग भी, सरदार पटेल, अंबेडकर, गाँधी को भी इसी तरह अपनी तरफ का बता रहे हैं. सफलता के कई रिश्तेदार होते हैं.

    Reply
    • May 2, 2016 at 11:56 pm
      Permalink

      Islam ko kisi vegyanik ki uplabdhion ko apne nan we jodne ki zarurat nhi balki wo khud bhi science ki kitaab na vote hue bhi uski bar dsween आayat science se related hoti he han yadi quraan par dunya Me budhijivi ghor kare to awashye he dunya ke samne se or jane kitne parde hath jaenge or islaamku ki satyta jagzaahir ho jaegi …Aoki ghalti ye he ki ap islam ko nahi musalman ko dekhkr apni rae dete ho or chnd khas tabqe ke logon ke choti se tareef hasil krne ke lye apne eeman ko bechne tak se nahi peeche nahi hat te…net o’er chek karo professor keithmor and islaam dunya ke leading gynochiligisत quraan ki chand aayaat kuch muslimo ne unhe diye jisme insaan ki takhleeq(creation ) ko steप by step btaya gaya he jab unhone in aayaat pr ghor ki to paya ki jo baate srf ३० sal pehle koi nhi janta tha quraan ne use १४०० sal pehle ese explain kese kiya nateeja unhe kalma padhne me zara bhi der na lagi …hindostaan me musalmano ne ८०० sal hukumat ki kislye dawat e deen ke lye nhi apni khugharzi kelye apni gaddi ke lye ….akbar ne deen ए ilaahi dhrm chalaya ti islaam ghalat ho gya ya uska kuch bigdaa ?? Bas me phir kahunga agar dekhna he ti islam ko dekge padho or phr koi post dallo

      Reply
  • May 3, 2016 at 10:12 am
    Permalink

    मैने सिर्फ़ इतना लिखा था कि इन अरबी नाम के साइन्स्दानो का मुसलमान होने का कोई स्पष्ट प्रमाण मौजूद नही है. और आज के दौर मे मुस्लिम दुनिया मे अब्दुस सलाम को छोड़ बड़ा नाम नही. लेकिन आप उसको मुसलमान नही मानते, जो खुद को मुसलमान कहते हैं.

    इस्लाम और साइंस दो अलग अलग विधा है, ये बात सही है. क़ुरान, परलोक की सफलता की कुंजी है, जबकि साइंस, दुनिया के रहस्यो की पड़ताल की कोशिश. इन दोनो को हम अलग अलग ही देख सकते हैं.

    साइंस, क़ुरान को ना सत्य सिद्ध कर सकती है, ना ही ग़लत, क्यूंकी जन्नत के नज़ारे, और दोजख की आग किसी ने नही देखी.

    Reply
  • May 3, 2016 at 11:18 am
    Permalink

    जाकिर भाई और पाठको एक ये ताबिश सिद्द्की हे शायद लखनऊ के हे ये लिखते हे ताबिश सिद्द्की ”इस्लाम में एक दौर आया जहाँ साइंस की कमी बहुत ज़ोर शोर से महसूस की जाने लगी थी.. लोग मज़हबी पढ़ाई पर अधिक ध्यान दे रहे थे मगर बढ़ता हुवा साइंस उनको आकर्षित करने लगा था.. “इमाम मालिक”, जो इस्लाम के चार इमामों में से एक हैं, ने इस ज़रूरत को भांपा और अपनी किताब में कहा “ये मज़हब (इस्लाम) एक साइंस है, इसलिए जो भी तुम्हे ये (मज़हब) सिखाता है उस पर विशेष ध्यान दो”वहीँ से ये साइंस और मज़हब को एक करने की जद्दोजहद शुरू हुई.. ये एक ऐसा सिद्धांत था जिस के द्वारा सिर्फ और सिर्फ आने वाले समय में परेशानी ही खड़ी होनी थीमज़हब और साइंस का दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता है.. दोनों बिलकुल विपरीत ध्रुव होते हैं.. और मज़हब को साइंस बताने की कोशिश ही सही नहीं है.. रूहानियत/आध्यात्म का साइंस से क्या लेना?

    Reply
    • May 4, 2016 at 9:25 am
      Permalink

      अज़ीज़ सिकंदर सर आपने लिखा कि धर्म और साइंस दोनों विपरीत ध्रुव है आप दीन और मज़हब में अंतर बताएं और आपकी नज़र में इस्लाम की क्या परिभाषा हे इसे स्पष्ट करे
      आपके जवाब का मुन्तज़िर रहूँगा
      रज़ा दायम

      Reply
  • May 3, 2016 at 11:18 am
    Permalink

    ताबिश सिद्द्की ”मज़हब आस्था और स्वयं के भीतर की यात्रा का नाम है.. साइंस “जानना” और “बाहर” की यात्रा है.. दोनों विपरीत ध्रुव हैं.. इनका कोई मेल नहीं है.. इसलिए मुझ से कोई कहता है कि क्या क़ुरआन में विज्ञान है? मैं कहता हूँ “नहीं”.. क़ुरआन में कोई विज्ञान नहीं है क्यूंकि क़ुरान कोई विज्ञान की किताब नहीं है.. क़ुरआन को को समझना है तो उस समय के समाजिक परिवेश और अध्यात्म की दृष्टि से समझिये.. वहां विज्ञान मत ढूंढिए.. भले उसको मानने वाले कितना भी ये दावा करें कि वहां विज्ञान भरा हुवा है”सबसे पहले मज़हब से साइंस हटाया जाय और लोगों को ये समझ आना शुरू हो कि हमारा धर्म कोई विज्ञान नहीं है.. जब ये समझ आने लगेगा तो फिर लोगों को ये समझ आना शुरू होगा कि धर्म दरअसल है क्या.. क्या बुद्ध का धर्म बिना साइंस से अधूरा है? वहां बिना किसी विज्ञान के और बिना किसी ऐसे दावे के भी लोग अपनी मर्ज़ी से जाते हैं.. भीतरी सुकून और एक ऐसे विषय को समझने के लिए जिन्हें वो समझते हैं कि विज्ञान द्वारा नहीं समझा जा सकताजितने भी दूसरे धर्म के लोग आपको इस्लाम की किसी विधा के दीवाने मिलेंगे वो आपके साइंस के दावे पर नहीं दीवाने होते हैं.. वो रूमी की “मसनवी” के दीवाने होते हैं.. वो ग़ज़ाली की बातों के दीवाने होते हैं.. वो मंसूर और सरमद से लेकर बुल्ले शाह के रहस्यवाद के दीवाने होते हैं.. लोग मज़हब में क्या ढूंढते हैं ये समझिये.. जो आप समझते हैं और जो मान बैठे हैं उसे ज़बरदस्ती लोगों को मत समझाइये मज़हब को ख़लीफाओं की नज़र से नहीं बल्कि उन रहस्यवादियों की नज़र से समझने का प्रयत्न कीजिये जो ख़लीफाओं की नज़र में हमेशा दोषी थे और रहेंगे.. आप अपनी नज़र विकसित कीजिये.. धीरे धीरे ही सही.. कोशिश तो कीजिये
    ~ताबिश

    Reply
  • May 3, 2016 at 11:42 am
    Permalink

    ताबिश साहब और शमशाद इलाही शम्स साहब दोनों अच्छे लेखक हे मगर शायद दोनों ही शिया हे कभी कभी ताजुब होता हे की लगभग सारे भारतीय सेकुलर मुस्लिम विचारक शिया ही क्यों हे ? बाकी जो हे वो भी सूफी सूफी दरगाह क्रांति आदि बाते करते हे कभी कभी तो मुझे ये शक होता हे की क्या शुद्ध सेकुलर सुन्नी देवबंदी भारतीय मुस्लिम लेखकों विचारको में . अफ़ज़ल भाई जाकिर भाई और में ही हे क्या बस ?

    Reply
  • May 3, 2016 at 10:51 pm
    Permalink

    देखिए मैं सुन्नी-मुस्लिम परिवार मे पैदा हुआ हूँ, किसी इमाम या पीर-फकीर की इबादत नही करता, किसी दरगाह पे नही जाता, एक और निराकार ईश्वर मे यकीन रखता हूँ. इस वजह से मुझे कोई मुसलमान समझे तो मुझे कोई दिक्कत नही, लेकिन कुछ लोगो की वजह से मुसलमान होने के लिए इतना कुछ ही काफ़ी नही, और मेरे अन्य विचारो से मुझे काफ़िर या मुनफिक समझे तो मैं उसका भी विरोध नही करता.

    मैं शिया, बरेलवी तो नही ही हूँ, फिर भी सिकंदर भाई ने जिस ओर इशारा किया है, उसपे गहराई से सोचने की बात करता हूँ. जिस प्रकार सच्चर कमेटी ने मुसलमानो की बदहाली और पिछड़ेपन के आँकड़े दिए हैं. उसी प्रकार हमे मुसलमानो के विभिन्न क्षेत्रो मे आनुपातिक प्रतिनिधित्व, और मुसलमानो के भीतर विभिन्न तबको की तुलनात्मक स्थिति देखनी चाहिए.

    1. आप ये पाएँगे कि मुसलमनो का आनुपातिक प्रतिनिधित्व, भारत मे जितना खराब है, उससे भी अधिक खराब, वैश्विक पटल पे है. जबकि दुनिया के अधिकांश मुस्लिम, अल्प-संख्यक नही है, बल्कि मुस्लिम देशो मे ही रहते हैं.

    2. शिया, बरेलवी, अहमदी फिरके के लोग शिक्षा और कला के क्षेत्र मे अपने अनुपात से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं.

    उदाहरण के तौर पे हमारी फिल्म इंडस्ट्री मे मुस्लिम नामो की भरमार है, लेकिन कादर ख़ान को छोड़ कर, देवबंदी पृष्ठभूमि से शायद ही कोई नाम सुनने को मिलता हो.

    मेरा मकसद किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचना नही है, लेकिन मुझे इमाम-वाद, या मज़ारो-दरगाहो के व्यापार ज़्यादा आडंबर और पाखंड से घिरे लगते हैं. हिंदू समुदाय मे भी धार्मिक पाखण्डो का बोलबाला है. उसके विपरीत देवबंदी व्याख्या, अधिक तर्क-संगत लगती है.

    लेकिन समाज की तरक्की के लिए, जिस रवैये की ज़रूरत होती है, वो है, बहुलतवाद, और सहिष्णुता. देवबंदी व्याख्या मे इस चीज़ की कमी नज़र आती है, अगर इस चीज़ को हम सुधार लें, तो मुझे लगता है, ये भी तरक्की की पायदान पे तेज़ी से आगे बढ़ सकते हैं.

    Reply
    • June 15, 2018 at 1:18 pm
      Permalink

      So sweet.Really aggreed .Everybody ought to take his own responsibility.It does not matter what is written in Gita ,Kuran etc.If I KNOW what I am doing is RIGHT then it does not matter for me it is right or wrong according to Gita or Kuran.If Gita or KUran are witnessing my word then it is OK for me If not then it is all in vain for me.

      Conclusion is take the accountability and discover yourself

      Reply
  • May 6, 2016 at 7:44 pm
    Permalink

    वैसे मुझे मज़हब, दीन इन लफ्जो के प्रति मैने कभी दिलचस्पी नही ली. मज़हबी ग्रंथों, और मशहूर आलिमो की किताबो, विडिओ वग़ैरह को पढ़ता, देखता और सुनता हूँ. सिर्फ़ इस वजह से कि अपनी क़ौम को समझ सकूँ. कौनसा व्यक्ति, उलझने की बात कर रहा है, कौन सा सुलझने की, किस के विचार, लोगो को बाँट रहे हैं, किस के जोड़ रहे हैं, रोशन ख्यालात किसके हैं, दकियानूसी किसके.
    सही-ग़लत की मेरी कसौटी कभी क़ुरान या इस्लाम-सम्मत नही रही, ना ही कभी दूसरी दुनिया रही. किसी विचार का इस दुनिया और इस दुनिया के लोगो पे क्या प्रभाव पड़ रहा है, उसीके आधार पे मैने विचारो के प्रति सम्मान या नकारात्मक राय रखी है.

    जितना मैने मज़हब की बाते करने वाले लोगो को सुना, उससे ये आभास हुआ कि दीन एक-व्यक्ति वादी विचार है. एक व्यक्ति यानि पैगंबर मुहम्मद. दीन पे ज़ोर देने वाले व्यक्ति, उनकी नकल करने को दुनिया का सबसे पवित्र काम मानते हैं. क्यूंकी उनकी नज़र मे, वो इस दुनिया मे भेजे गये अंतिम मार्ग-दर्शक है, और त्रुटि रहित है.

    ये सिद्धांत, इस्लाम को सिर्फ़ एक और निराकार ईश्वर की अवधारणा तक सीमित नही रखता, बल्कि एक-व्यक्तिवाद पे अधिक ज़ोर देता है. एक-व्यक्तिवाद की अतिरंजन यहाँ तक होती है कि उसकी जैसे कपड़े, दाढ़ी-मूँछ, उठने, बैठने, चलने के अंदाज को अपनाने की कोशिश तक को पवित्र और आवश्यक कार्य मान लिया जाता है.

    और ईमानदारी से कहूँ तो अल्लाह मे अटूट आस्था के बावजूद भी उसके सार को एक व्यक्ति या एक किताब मे समाहित होने के सिद्धांत को मैं दिल से स्वीकार नही कर पाता. हालाँकि उस व्यक्ति को लेके अनेक बाते बचपन से सुनता आया हूँ, और प्रभावित भी हुआ हूँ.

    Reply
  • May 6, 2016 at 7:45 pm
    Permalink

    इसके पीछे शायद, मेरा बहुलतावाद के प्रति आकर्षण है. दुनिया मुझे रंगीन ही अच्छी लगती है. एक भाषा, एक हुलिया, एक जैसी सोच, एक मज़हब, एक रंग, एक राष्ट्र जैसे विचार मुझे प्रतिकर्षित करते हैं.

    वैसे भी ये कहा जाता है कि मूर्ख लोग, व्यक्तियो की बाते करते हैं, समझदार विचारों की.

    उस एक व्यक्ति के प्रति अगाध सम्मान रखने के बाद भी, हम यह सोचे कि हम सिर्फ़ एक ही व्यक्तित्व का अनुसरण करेंगे, तो वो व्यक्ति लेखक नही है, इंजीनियर नही है, डॉक्टर नही है, कवि नही है, बहुत कुछ होते भी बहुत कुछ नही है.

    तो क्या, विभिन्न क्षेत्रो मे अपनी उपस्थिति और कामयाबी के लिए, क्या हमे एक व्यक्ति नही अनेको व्यक्तियो से प्रेरणा नही लेनी पड़ेगी. यहाँ मैं उनका संपूर्ण अनुसरण करने के लिए नही कह रहा हूँ. इतिहास के एक खास हिस्से और मोड़ पे ही तो हम अपनी जिंदगी की सुई को नही अटका सकते.

    Reply
  • June 6, 2016 at 9:08 pm
    Permalink

    इस विषय पे चर्चा करते वक्त, कुछ लोग ये भी दलील देते हैं कि विज्ञान मे मुसलमान, इस्लाम से दूर होने की वजह से पिछड़ा.

    हो सकता है, ये बात सही हो, तो इस दलील के साथ, ये भी स्वीकारना पड़ेगा कि अधिकांश मुसलमान और तथाकथित इस्लामी विद्वान भी इस्लाम से दूर हैं. और जो चोटी के साइन्स्दान हैं, वो इस्लाम के रास्ते पे हैं.

    हो सकता है, लेकिन फिर इस्लाम, लेबल नही है. इस्लाम की पहचान, फिर ग़ूढ है. जिस प्रकार कोई अहमदी या किसी अन्य फिरके को ये कह देता हो कि भले ही वो अपने को मुसलमान कहे, लेकिन वो मुसलमान नही. ठीक उसी प्रकार, ये साइन्स्दान, जिन्हें, हम यहूदी, ईसाई, नास्तिक आदि संबोधन दे रहे हैं, वो मुसलमान हो.

    क्यूंकी इस्लाम सत्य है, तो साइंसादानों से अधिक सत्य का प्यासा कौन है? उनकी इसी प्यास ने तो अल्लाह की बनाई दुनिया के कई राज हमे बताए, अल्लाह ने उन्हे इल्म से नवाजा.

    और हो सकता है, जो आडंबरों को इस्लाम समझ के दिल से लगाए बैठे हैं, उनकी इबादत, सिर्फ़ अल्फ़ाज़ ही हो, दिल का भेद वो समझ ही नही पा रहे हो.

    जब मैने ये लिखा कि 9वी सदी के इन वैज्ञानिको का मुसलमान होने का कोई प्रमाण नही मिलता, तो मेरा तात्पर्य यही था कि जिसे अधिकांश लोग, इस्लाम समझ रहे हैं, या अपने आप को मुसलमान कहने वाले लोग, इस्लाम की जो परिभाषा दे रहे हैं, उसके मुताबिक उनका मुसलमान होना साबित नही है.

    बाकी सत्य की खोज, और सत्य को सर्वोपरि रखने को ही अगर इस्लाम माना जाए, तो तमाम बड़े वैज्ञानिक अविवादित रूप से मुसलमान है. क्यूंकी साइंस की दुनिया की बुनियाद ही सत्य की खोज है.

    Reply
  • January 3, 2018 at 7:08 pm
    Permalink

    इसमें कोई शक नहीं हे की शिया पंथ , ईरानियों और यहूदियों का इस्लाम और अरब से बदला था खेर काफी बाते जायज़ हे मगर जैसा ये संघी अभिजीत चाह रहा हे वैसा होगा नहीं Abhijeet Singh
    21 hrs ·
    आतिश-परस्तों के महलों के कंगूरें उठ रहे हैं….
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    अरब-भूमि में जब नया मजहब आकार ले रहा था लगभग उसी दौरान उस समय के दो बड़े हूकूमत रोम और फ़ारस के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया जिसमें फ़ारस वाले रुमियों पर ग़ालिब आये. फ़ारस वाले मजूस यानि अग्निपूजक थे और उधर रोम वाले ईसाई थे. ये खबर जब हुज़ूर तक पहुँची तो आपने रोमनों के हक़ में ये कहते हुये दुआ की कि ये अग्नि-पूजक मज़ूस तो काफ़िर हैं जबकि ये ईसाई अहले-किताब हैं इसलिये अल्लाह भविष्य में रुमियों को इन मजूसियों पर ग़ालिब करेगा.

    उनके इस दुआ की खबर मजूसियों तक भी पहुँची. ये बद्दुआ सुनकर वो आग-बबूला हो गये. इधर रसूल साहब ने अपने आस-पास के कई मुल्कों के बादशाहों को दावती खतूत भेजे, एक ख़त ईरान के शाह खुसरो-परवेज को भी भेजा गया. वो तो इन अरब वालों से पहले से जला-भुना बैठा था इसलिये जैसे ही उसे दावती ख़त मिला उसने उसे टुकड़े-टुकड़े कर जमीन पर फेंक दिया और ख़त लाने वाले को अपने दरबार से भगा दिया.

    इस घटना के बाद से ही अरब में जन्में नये मजहब वालों ने ये ठान लिया कि इन अग्नि-पूजकों के गुरूर को मिट्टी में मिला देना है. मौका मिला पहले खलीफा हजरत अबू-बकर के समय. उन्होंने हज़रत ख़ालिद बिन वलीद को कमांडर बनाकर ईरान फ़तह करने भेजा. ईरानी सेनाओं और वलीद की टुकड़ी के बीच दज़ला और फ़ुरात नदियों के बीच जंग हुई पर दुर्भाग्य से मजूसी हार गये मगर इधर हजरत अबू-बकर का देहान्त हो गया और अरब ईरान पर कब्ज़ा नहीं कर सके.

    ईरान को जीतने की मंशा लिये अरबों ने हज़रत ऊमर के खिलाफ़त के दौर में ईरान पर लगातार आक्रमण किये. रुस्तम, जाबान और नरसी जैसे मजूस वीर लगातार इन उन्मादियों से अपने वतन की रक्षा करते रहे, हजारों ईरानी सैनिक बलिदान हुये और आहिस्ता-आहिस्ता ईरान पर अरबों का कब्ज़ा हो गया. ईस्वी सन 643 में अग्निपूजकों के राज्य का सूर्य पूरी तरह डूब गया. अग्नि-पूजक मज़ूस जिनको अपने आहुर-मज़्दा से सच्चा प्रेम था वो समंदर के रास्ते जान बचाते हुये वहां से निकल गये और जो वहां रह गये उन्होंनें प्राण-रक्षा के लिये मजहब-परिवर्तन को नियति का लेखा मानकर स्वीकार कर लिया. कहतें हैं कि जब आख़िरी फतह हो चुकी थी तो एक ईरानी सेनापति से किसी अरब ने कहा – “अब समझ में आया कुफ्र और तौहीद का फ़र्क? हम अरब तुम्हें अब सच्चे दीन की तालीम देंगें”. इस पर उस ईरानी सेनापति ने उससे कहा,

    “रेगिस्तान के जाहिल लालची बद्दू… तुमलोग सिर्फ और सिर्फ हमारे माल और दौलत के लिये आये हो इसे दीन या मजहब का नाम न दो”.

    फिर गुलामी के लंबे कालखंड ने उनसे उनका सब छीन लिया पर प्रतिशोध की ज्वाला उनके मन में सुलगती रही. अरब से दुश्मनी का जरिया उन्होंने शिया मत को बना लिया और शिया पंथ का आश्रय लेकर अरबों से जंग करते रहे. इस्लाम में जितने भी फितने उठे सब ईरानियों ने उठाये. हज़रत उस्मान से लेकर अली की खिलाफ़त के दौरान हुये तमाम साजिशों के पीछे यही लोग थे. शिया-पंथ के नाम पर इन्होंनें हमेशा अरबों को अपने से कमतर ही माना. काबे के मुक़ाबिल पर इन्होनें नजफ़ और कर्बला को खड़ा कर दिया. अपनी अलग किताबें बना ली. प्रथम तीन खिलाफत और अरबों की लिखी हदीसों का इंकार कर दिया.

    इन आतिश-परस्तों के सीने में ये हमेशा चुभता था कि महान ‘किसरा राज्य’ की संततियां किन जाहिलों की गुलामी कर रही है? इस ईरान में फिर रजा शाह पहलवी पैदा हुये, बेशक मुस्लिम थे पर अरब सभ्यता के गुलाम नहीं थे. उन्हें ये एहसास हो गया था कि सिर्फ फितने खड़े करने और अरब से बदला लेने भर से मजूसी सीने में जल रही आग नहीं बुझेगी. उन्हें ये भी एहसास हो गया था कि उनके मुल्क को अरब ने या इस्लाम ने नहीं गढ़ा, उनको सभ्यता जाहिल बद्दुओं ने नहीं सिखाई बल्कि ये तो तब से वजूद में है जब इस्लाम का उद्भव भी नहीं हुआ था, कुरान तो 1300 पहले नाजिल हुई किताब है पर हम भी जाहिल नहीं थे, हमारे पास भी एक आसमानी किताब थी जिसका कलाम शायद दुनिया में वेदों के बाद सबसे सशक्त और मुकद्दस है. हमारे अपने पूर्वज भी थे जो पैदा तो इस्लाम से पूर्व हुए थे पर जिनकी कीर्ति-पताका सारी दुनिया में फ़ैली हुई थी और सारे दुनिया में हमारे उन पूर्वजों के किसरा साम्राज्य की धूम मची हुई थी. हमारे उन पूर्वजों की तलवार से रोमन शासन पनाह मांगता था. हमारे पूर्वज हमारे ऊपर थोपे गये इस गुलामी चिन्ह को मिटाने की कोशिश में बलिदान हुये थे.

    इस गौरवबोध को लेकर नवजागृत रजा शाह ने ईरान में एक इंकलाब बरपा कर दिया, खुद को उन्होंने मुस्लिम से पहले एक आर्य कहा और इसलिए सदियों से चले आ रहे अपने मुल्क का नाम फारस से बदलकर ईरान कर दिया क्योंकि ईरान (या एरान) शब्द आर्य मूल के लोगों के लिए प्रयुक्त शब्द एर्यनम से निकला है, जिसका अर्थ है आर्यों की भूमि. यानि रजा शाह ने ईरान को इस्लाम की भूमि नहीं बल्कि आर्यों की भूमि घोषित किया.

    1930 का उसका पूरा दशक ईरान में इसी गौरव-बोध को जागृत करने में गुजरा. उसने शिक्षा में अभूतपूर्व सुधार किये, उन्मादी मजहबी शिक्षा को कड़ाई से रोका और कट्टरपंथी उलेमाओं को या तो जेल में डाल दिया या फिर देश से निकाल दिया. समाज और राष्ट्र जीवन के हर काम से उसने इस्लाम को अलग कर ईरान को बिलकुल पश्चिमी मुल्कों की तर्ज़ पर संवारा.अतीत का गौरव जागृत करने और पूर्वजों की स्मृति सहेजने और संजोने के लिए उसने स्कूल, कॉलेज, सड़क और अस्पतालों के नाम रुस्तम, सोहराब, जमशेद जैसे अपने महान पारसी पूर्वजों के नाम पर रखवाए, पुरानी गौरवशाली सभ्यता के चिन्ह खोजे जाने लगे पर दुर्भाग्य से किसी कारणवश ईरान फिर से खुमैनी जैसे मजहबी उन्मादियों की गिरफ़्त में आ गया.

    आज नये साल की पूर्व-संध्या से ही ईरान के लोगों में रजा शाह पहलवी की आत्मा जाग्रत हो गई है. जरथुस्त्र कहते थे कि झूठ (बातिल) से जंग बिना नारीशक्ति को साथ लिये नहीं लड़ी जा सकती. जरथुस्त्र ये भी कहते थे कि स्वर्ग का पिता अग्नि-परीक्षा के जरिये से अंतिम-निर्णय देगा कि कौन अच्छा है कौन बुरा है और फिर वह पापियों को दण्डित करेगा.

    इसी आशा और विश्वास को लिये ईरान की शक्तियाँ (नारी) आज सड़कों पर हैं गुलामी के हर चिन्ह को फेंक देने के लिये, अपने पूर्वज रुस्तम और जमशेद को उनका खोया सम्मान दिलाने के लिये, अपने घर में फिर से अनवरण अग्नि जलाने के लिये, अपने जेंदा-अवेस्ता के पुनर्स्थापन के लिये, अपने आहुर-मज़्दा की स्तुति गीत गाने के लिये और अपने आर्य-गौरव को पुनः धारण करने के लिये.

    सीरत लिखने वाले सुन्नी इतिहासकार कहतें हैं जब मक्का-मुकर्रमा में हुज़ूर की विलादत हुई थी तो ‘किसरा राज’ के अग्नि-पूजक शहंशाह के महलों के कंगूरे गिर गये थे……आज वही कंगूरे उठ-उठ के खड़े हो रहें हैं.

    प्रकृति बैक-ग्राउंड में अपना काम बड़े सलीके से करती है…..इसलिये कभी-कभी हम जैसों को उस सृष्टा के कामों के मधुर संगीत को खामोश होकर सुनना चाहिये…..स्वर्गिक आनंद आता है.

    अटल जी होते तो कहते…दुनिया का इतिहास देखता…रोम नहीं,यूनान नहीं है पर घर-घर में सुबह अग्नि जलाता वह उन्नत ईरान यही हैं….वह उन्नत ईरान यही हैं.

    ~ अभिजीत

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *