मिथालांचल का सिनेमा तरक्की कर नहीं सका

Maithili-Films

सैयद एस.तौहीद

सिनेमा मनोरंजन का एक लोकप्रिय साधन है। संचार जगत की पिछली एक शदी सिनेमा व टेलीविजन जैसे विजुअल माध्यमों के नाम थी। मिथिलांचल की साहि्त्यिक व सांस्कृतिक समृधि को राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय पहचान देने में आंचलिक सिनेमा का भी योगदान रहा है। मिथिला और मैथिली की अस्मिता निर्माण में स्थानीय फिल्में प्रमुख कारक मानी जानी चाहिए। लेकिन क्वालिटी में पतन की वजह से मिथिला की फिल्मों के ऊपर बात नहीं की जाती ।

बहुत कम फिल्में बनना एक दूसरी वजह हो सकती है। बीता बरस भारतीय सिनेमा का शताब्दी वर्ष था । पहली फिल्म की मुहुर्त तारीख को आधार मान कर अगर चला जाए तो मिथिलांचल का सिनेमा भी पचास वर्ष के मुकाम पर खडा है। महंत मदनमोहन-उदयभानु एवं केदारनाथ चौधरी द्वारा निर्मित ‘ममता गबाए गीत’ मैथिली भाषा की पहली फिल्म थी। शैलेन्द्र की ‘तीसरी कसम’ भी मैथिली के संदर्भ में खास है। यहां मैथिली संवाद का पहला प्रयोग देखने को मिला था।

यह मैथिली का पहला सिने अवतार था। कहा जाता है कि निर्देशक परमानंद को ‘ममता गबाए गीत’ पर काम करने की प्रेरणा यहीं से मिली थी। प्यारे मोहन सहाय एवं अजरा अभिनीत इस फिल्म से गायक महेन्द्र कपूर भी जुडे थे। दुख की बात है कि मुहुर्त के बाद रिलीज होने में एक दशक से भी अधिक वक्त बरबाद हो गया । फिर आम लोगों तक आते –आते और वक्त गुजरा। इसे आम लोगों तक पहुंचाने में सुनील दत्त व राजेन्द्र कुमार का दस्तखत सराहनीय रहा था ।

मिथिलांचल सिनेमा का सफर उदासीन राहों पर मर-मर चलता रहा,आज के हालात भी बहुत ठीक नहीं। लेकिन मुश्किलें खत्म होने के बजाए बरकरार चल रही हैं।
पहली फिल्म के बाद का एक दशक गतिविधि विहीन होकर अंधकारमय सा हो गया । सिनेमा क्षेत्र का सफर पडाव पर आकर थम चुका था। गाडी को फिर से पटरी पर
लाने में मिथिलांचल से बालकृष्ण एवं मुरलीधर ने जोरदार कोशिश की। मैथिली सिनेमा के आज के हालात को देखकर उस पर इत्मिनान नहीं किया जा सकता । मैथिली सिनेमा में रंगीन फिल्मों का निर्माण उसी के आसपास शुरू हुआ । मिथिला समाज में दहेज व्यवस्था का पुरजोर विरोध करने वाली ‘सस्ता जिनगी महग सिंनुर’ इस सिलसिले में खास थी। लेकिन इस फिल्म के बाद मुरलीधर व बालकृष्ण में टकराव हो जाने से यहां का सिनेमा फिर से ख्स्ताहाल हो गया । मिथिला के सिनेमा का एक बार फिर इंटरवल हुआ। मुरलीधर-बालकृष्ण की फिल्म से मैथिली फिल्मों का दूसरा दौर शुरु हुआ था। तरक्की की राह में बार-बार अंधकार आ जाने से मिथिलांचल का सिनेमा का सफर ठहर सा गया था। कह सकते हैं कि इंटरवल की बारंबारता ने कहानी को आगे बढने से रोक दिया।

मुरलीधर ने वापसी की जोरदार कोशिश की लेकिन नाकामी ने उदास कर दिया। मिथिलांचल सिनेमा के उत्थान के नजरिए से बीता आधा दशक उल्लेखनीय रहा। इस दरम्यान वहां फिल्म फेस्टीवल कायम किए गए जोकि बहुत काम आए। कल तक किसी ने नहीं सोंचा होगा कि मैथिली फिल्मों का फेस्टीवल का आयोजन कभी कायम किया जाएगा। फिर बीस से अधिक नए प्रोजेक्ट की घोषणा होना भी सुखद खबर थी। भोजपुरी की तुलना में मैथिली फिल्मों का विस्तार कम है। मैथिली को जरिया बनाकर सिनेमा को कायम करने की कोशिश में कामयाबी जरूर मिली लेकिन क्या क्वालिटी पर भी सोंचा गया? भोजपुरी फिल्मों से मुक़ाबला के फेर में मिथिलांचल की फिल्में राह से भटक गयी।

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