महावीर त्यागी जी के बेहतरीन संस्मरण

Mahavir-tyagi

सवतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी ( 1899 – 1980 ) एक अनूठे इंसान थे वे 1919 में जलियावाला बाग़ हत्या कांड के बाद बिर्टिश सेना के इमरजेंसी कमीशन से त्यागपत्र देकर सवतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े जेल जीवन , सविधान सभा , लोकसभा राज्य सभा , में रहते हमेशा अपने आदर्शो पर अडिग रहे . सवतंत्रता सेनानियों में त्यागी जी का व्यक्तित्व बड़ा ही रोचक और चित्ताकर्षक था वे भावुक सच्चे बागी ईमानदार और निडर थे हाज़िर जवाबी में ये माहिर थे उत्तर प्रदेश में देहरादून इलाके में इनका कोई सानी नहीं था सारा जिला त्यागी जी का अपना घर था और ये देहरादून के सुल्तान या डिक्टेटर कहलाते थे महात्मा गांधी मोतीलालनेहरु और रफ़ी अहमद किदवई के अत्यंत प्रिय महावीर त्यागी जी को जो अनुचित लगता उसे निस्वार्थ भाव से विरोध भी करते थे मगर किसी से देष नहीं रखते 1947 – 48 के साम्प्रदायिक दंगो को रोकने में इन्होने ज़बरदस्त भूमिका निभाई थी यु पी इन्होने कुछ स्वयसेवको को एकत्र करके उनके साथ पुलिस की वर्दी धारण की और एक विशेष बल का संघटन किया जो दंगो में अपनी जान की परवाह कियते बिना शांति स्थापित करता था जो त्यागी पुलिस कहलाता था लीग के बड़े नेता खलीकुज्जमा ने पाकिस्तान जाकर इस विषय पर जो संस्मरण लिखे उसमे त्यागी जी की जमकर प्रशंसा की . उनके राज़नीतिक व् सामाजिक जीवन के के कुछ संस्मरण कुछ पात्र पत्रिकाओ में समय समय पर प्रकाशित हुए वे अपने रोचक शैली के कारण इतने लोकप्रिय हुए की पाठको के आग्रह पर उनको 2 पुस्तको के रूप में छपवाया गया क्रांति के वे दिन और मेरी कोन सुनेगा ” पेश हे महावीर त्यागी जी के लाजवाब संस्मरणों के कुछ अंश ” लोगो का ख्याल हे की गहरी मनोकामनाओ की पूर्ति हो जाने पर मनुष्य को असीम आनंद और संतुष्टि मिल जाती हे . एक सीमा तक ये बात ठीक भी हे , पर इसमें प्रशन यह उठता हे की लक्ष्य की प्राप्ति के बाद क्या हो ? या तो कोई दूसरा लक्ष्य ढूँढना पड़ेगा या मेरी तरह अपने नातियों के साथ आँख मिचोली खेल कर ज़ी बहलाना होगा कोठी बंगले और हलवा पूरी जिन किन्ही को प्राप्त हे वो धन्य हे पर संसार का वास्तविक आनंद लूटने के लिए तो कोठी से बहार निकल कर किसी गैर पर आँख टिकानी पड़ेगी और अपनी हलवा पूरी के साझीदार भी ढूंढने पड़ेंगे ”

” पंडित मोती लाल नेहरू को अपने हाथ से सब्ज़ी तरकारी पकाने का और विशेष अनुपात की चाय बनाने का शौक था . सन 1922 की बात हे जब वे लखनऊ जेल की दीवानी बैरक में बंद थे तो में कभी कभी सब्ज़ी आदि छील दिया करता था एक दिन दम आलू बनाने बैठे थे . में किसी दूसरी बैरक में गप शप के लिए चला गया . लौटने पर मेने पूछा सब्ज़ी ठंडी हो रखी हे भाई जी आपने खाई क्यों नहीं बोले ”इतने शौक से बनाई थी तुम हेंचो मटर गश्ती को चले गए क्या में अकेला खाओ क्योकि दाद देने वाले न मिले तो ग़ज़ल सुनाना बेकार हे ” सुख का असली मज़ा तो साझेदारी में ही हे ”

”फटी आस्तीन और नंगे सर तपती धुप में साइकिल पर 14 मील का सफर करके एक घने जंगल से गुजर रहा था की पेड़ो की छाया में एक ठन्डे पानी का झरना दिखाई दिया बस प्यास भड़क उठी उतरा और दोनों हाथो की खिंच भर भर के अपनी थकी आत्मा को ढांढस देने लगा केसा फरिश्ता सा लगता था में . आज मिनिस्ट्री की कुर्सी पर बैठ कर जब कभी शीशे के गिलास में बर्फ का पानी पीता हु तो ठंडी साँस लेकर पुरानी गरीबी के मज़े याद आते -ओक हाथो के ( चुल्लू ) से पिए पानी का मज़ा गिलासों में कहा हे ”
”आजकल की दुनिया इस पर यकीन न करेगी पर मेरे यह निजी अनुभव की बात हे की एक समय ऐसा था जब मेरे जिले देहरादून की सारी जनता एक सामूहिक परिवार की तरह से रहती थी सारे अमीर गरीब हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई एक दूसरे से पूरी अपनावट मानते थे और सच्ची सुहानुभूति रखते थे मकानो और दुकानो पर अधिकतर ताले भी नहीं लगते थे अक्योकि बईमानी चोरी और धोखाधड़ी नहीं होती थी ” ” 1974 सच बात तो ये हे की सवराज होने से हम अधिकांश कांग्रेस वाले बेरोजगार और निठल्ले हो गए हे अब आनंद रुपी मज़दूरी मिलती नहीं हे जिस मालिक ( महात्मा गांधी ) ने हमें पाला वह मर गया उसी चुटकी पर कान खड़े करते और उसी की सीटी पर कूदते फांदते और शिकार करते थे उसी की मुस्कराहट पर पर लट्टू बने घूमते थे . अब हमारे गले का पट्टा निकल गया हे और लावारिस बने इधर उधर पुंछ हिलाते फिर रहे हे अब कोई चुटकी बजाता नहीं और न कोई मुस्कुराता हे गिन गिन कर हर नेता का दरवाज़ा खटखटा चुके की कोई मदद लगावे तो हम भी काम में लग जावे पर नेताओ के पास उपाधिया तो बहुत हे वज़ीफ़े ओहदे परमिट और लाइसेंस आदि भी बहुत हे चाय के प्याले भी हे पर काम नहीं हे ”

” हम खूब बढ़ बढ़ कर बात करते थे और गांधी जी की बात बताते बताते थकते नहीं थे . लेक्चर भी हम इसलिए थोड़े ही देते थे की हम जनसाधारण से अधिक जानते थे बल्कि इसलिए की हम इनमे वही मज़ा आता था जो की कुत्ते को भोकने और में और शोर मचने में आता हे पर अब वह सारी बाते सवपन हो गयी हे . अब हमें सचमुच अंग्रेज़ो की याद सताने लगी हे वह हमसे लड़ता था लाठीचार्ज करता था हथकड़ी डालता था और जेल भेज़ता था था पर जब जेल से छूट कर आते तो बड़े शौक से हाथ मिला लेता था . उसके रहते रहते हमने 29 वर्ष पूर्ण सवराज और स्वछँदता का मज़ा लूटा उसके चले जाने से जैसे बेरे खानसामे बेरोजगार हो गए – वैसे ही कांग्रेस कार्यकर्त्ता भी बेकार हो गए बापू की कमाई तो ख़त्म हो रही हे बेटो को खुद भी तो कुछ कमाई करनी चाहिए ”

बापू की उस दिन की डांट याद करके प्यार उमड़ आता हे . आजकल के गुलाबी लीडर तो आप आप करके बोलते हे माँ बाप गुरु और बड़े भाई की डांट धमकी गली चपतबाज़ी की तह में जितना अपनापन और प्यार हे उसका सोवा हिसा भी आजकल के प्यार दुलार और चुमकार में नहीं मिलता हे ” 1929 महात्मा गांधी देहरादून क्या आये मेरी उम्र 30 वर्ष से घटकर 15 की रह गयी और सर पर स्कूल के बच्चो वाली शैतानी सवार हो गयी मुह आई बकने लगा और मनमानी करने लगा . न जाने किस नशे में चूर था में , मेरी चालढाल बातचीत कहना सुनना और उठना बैठना सब ऐसा बदला मानो औलिया हो गया हु करता भी क्या शहर वालो ने पागल बना रखा था में तो फिर भी एक छोटा सा आदमी था अच्छो अच्छो के दिमाग फिर जाते हे जब चारो और से लोग उनका नाम ले ले कर पुकारने लगते हे मांग बढ़ जाने पर तो मेथी पालक के भी भाव बढ़ जाते हे ” एक दिन जब बापू सेवाग्राम में टहल रहे थे की रास्ते में एक 2 इंच लम्बा एक पूनी ( चरखे काटने की रुई ) का एक टुकड़ा पड़ा दिखाई दे गया बापू ने उसे उठा लिया और आश्रमवासियों से कहा की देश की संपत्ति को इस लापरवाही से नहीं फेकना चाहिए ”

”उन दिनों कांग्रेस संस्था का रूप एक परिवार के जैसा था जिसमे एक दुसरे की डांट डपट भी होती और रूठो हुओ की खुशामद भी होती थी असल में उनदिनों हमारा सपना साझे का था सभी अपनी अपनी शक्ति के अनुसार उसमे रंग भरते थे इसलिए आपस में ईर्ष्या नहीं थी स्पर्धा थी आज की संतति उन दिनों का चित्रण पूरी तरह से नहीं कर सकते हे क्योकि अब वे सपने फूटकर टुकड़े टुकड़े हो गए हे अब तो हम सब व्यक्तिगत सपने देख रहे हे और अपने अपने निजी सपनो में रंग भरने की चिंता करते हे ” महत्मा गांधी ने मुझे मुनादी का काम सौपा सवतंत्रता संग्राम के दिनों में लाखो साथियो ने न जाने किस किस तरह से पेट जून बाँध कर अपने अपने परिवार का गुजारा चलाया था महात्मा गांधी ने कुछ ऐसा जादू सा कर दिया था की हमें अपनी गरीबी में शान और अपनी अमीरी में शर्म लगने लगी थी और हमारे बाल बच्चे भी परिवार की निर्धनता या सादगी पर नाज़ करते थे हममे से कुछ ऐसे भी थे जिन्हे किसी चीज़ की कमी नहीं थी पर वे भी फटे कुर्तो में सीधा सादा जीवन वयतीत करते थे ” ” जब से मेने मुनादी का काम शुरू किया तब से मुनादी के काम में महत्व आ गया हर चौराहे पर एक मूढा कुर्सी और उस पर खड़ा होकर या तो ढोल बजा कर या घंटा बिगुल दुआरा एक भीड़ इकट्ठी कर ली और मातम गांधी के आदर्शो का प्रचार आरम्भ कर दिया जब भीड़ ज़्यादा होने लगी तो एक भोपू खरीद लिया ताकि उसके दुआरा दूर दूर तक आवाज़ पहुंच जाए इस तरह से थोड़े ही दिनों में में शहर के लोग मुझे पहचान गए . आज तो में भारत का रक्षा संघटन मंत्री हु फिर भी दो तीन दिन हुए की में देहरादून में ढोल लेकर जगह जगह ऐलान कर आया हु की जवाहर लाल नेहरू हमारे नगर में पधार रहे हे सभी भाई बहनो को चाहिए की उनका स्वागत और दर्शन करने के लिए पुष्प मलाय लेकर सड़क के दोनों और खड़े हो जाए में उनकी मोटर को धीरे धीरे चलाऊंगा ताकि आप लोग जी भर के दर्शन कर सके ” मेरी धारणा ये हे की मुनादी का काम में जीवन भर करूँगा . मुनादी महात्मा गांधी का दिया हुआ पोर्टफोलियो हे मिनिस्ट्री का पोर्टफोलियो जवाहर लाल जी का अगर दोनों में झगड़ा आएगा तो में नेहरू जी का पोर्टफोलियो छोड़ दूंगा गांधी जी में नही छोडोंगा ”

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8 thoughts on “महावीर त्यागी जी के बेहतरीन संस्मरण

  • May 26, 2016 at 8:31 pm
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    अफ़ज़ल भाई और पाठको ये महावीर त्यागी नहीं हे गूगल में जो पहला फोटो आता हे हे वो हे शायद महावीर त्यागी इनकी किताब आज़ादी का आंदोलन हसते हुए आंसू बहुत ही बेहतरीन किताब हे नेहरू का बेहद सम्मान करते हुए भी इन्होने ही शायद संसद में नेहरू जी दुआरा चीन की कब्जे जमीन को ” वहां तो घास तक नहीं उगती ” कहने पर शायद इन्होने ही कहा था ” उगता तो आपके सर पर भी कुछ नहीं हे ” इससे इनकी और नेहरू जी की महानता और उदारता का ही पता चलता हे क्या आज किसी की मोदी जी को ये कहने की मजाल हो सकती हे—- ? एक बार इनका और नेहरू जी का झगड़ा हुआ तो खेर नेहरू जी ने इन्हे मना लिया तब इन्होने बड़ी करारी बात कही की ” आपने कुरुरता और उदारता दोनों में ही मुझे हरा दिया हे ”

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  • March 26, 2018 at 1:42 pm
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    Devendra Surjan3 hrs · यादों के झरोखे से
    जब एक पूर्व प्रधानमंत्री को फुटपाथ पर डेरा जमाना पड़ा
    1993 की बात है मैं घर से डीटीसी की बस में सवार होकर संसद भवन जा रहा था कि अचानक मेरी सीट के पास बैठे दो व्यक्तियों ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री को पंजाबी में मोटी-मोटी गालियां देनी शुरू कर दी। यह सुनकर मुझे गहरा झटका लगा। यह दोनों सज्जन देश के पूर्व प्रधानमंत्री पर इस बात के लिए नाराज थे कि वह दो दशक तक केन्द्र में मंत्री रहने के बावजूद राजधानी में अपना एक कमरा तक नहीं बना पाया।बातचीत करने पर यह पता चला कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री गुलजारी लाल नन्दा का सामान उनके मकान मालिक ने किराया अदा न करने के कारण फुटपाथ पर फेंक दिया है और नन्दा जी फुटपाथ पर जीवन गुजार रहे हैं। खबर धमाकेदार थी इसलिए मैं तुरन्त दक्षिणी दिल्ली की एक काॅलोनी की ओर रवाना हो गया। जब मैं मौके पर पहुंचा तो खबर सही निकली। फुटपाथ पर नन्दा जी का संक्षिप्त सा सामान रखा हुआ था और नन्दा जी एक चारपाई पर बैठे चाय पी रहे थे। नन्दा जी क्योंकि मुझे व्यक्तिगत रूप से जानते थे इसलिए मैंने बातचीत शुरू कर दी। पता चला कि पैसे न होने के कारण नन्दा जी दो महीने का अपने कमरे का किराया मकान मालिक को नहीं दे पाए थे इसलिए उनका सामान फुटपाथ पर फेंक दिया। देश की राजधानी में इस पूर्व प्रधानमंत्री के सिर छुपाने का कोई अन्य ठिकाना नहीं था इसलिए गत तीन दिन से फुटपाथ पर जीवन काट रहे थे।
    खबर धमाकेदार थी इसलिए मैंने उसे पंजाब केसरी में प्रकाशित करवा दिया। इस सनसनीखेज समाचार को दूसरे दिन कई अन्य अंग्रेजी समाचारपत्रों ने भी जब छापा तो संसद में हलचल मच गई। उस दिन जब मैं घर पहुंचा तो नन्दा जी ने मुझे टेलीफोन करके खूब डांटा और कहा कि मुझे उनकी मुफलिसी का मजाक उड़ाने का क्या हक है? मैं नन्दा जी के प्रति काफी श्रद्धा रखता हूं। इसलिए मैं उनकी डांट को चुपचाप सुनता रहा। संसद में हंगामे के बाद भारत सरकार ने उनके लिए वैकल्पिक आवासीय व्यवस्था करने की पेशकश की जिसे स्वाभिमानी नन्दा जी ने ठुकरा दिया। बाद में उन्होंने अपना सामान किसी दोस्त के घर में रखा और खुद अपनी बेटी के पास अहमदाबाद चले गए।
    इन दिनों केन्द्र में जो जुमलेबाज पार्टी सत्तारूढ़ है उसने कांग्रेस के 70 वर्षीय शासन के खिलाफ दुष्प्रचार का जोरदार अभियान छेड़ रखा है। हालांकि इस पार्टी के कितने ऐसे मंत्री और नेता हैं जिनका दामन भ्रष्टाचार के मामलों से साफ हो। इनमें से अधिकांश ईमानदारी के मामले में नन्दा जी जैसे कांग्रेसियों के पांव की धूल के बराबर भी नहीं है।
    उल्लेखनीय है कि गुलजारी लाल नन्दा मूलतः पंजाबी थे मगर एक श्रमिक नेता के रूप में उनका अधिकांश जीवन गुजरात में गुजरा था। नन्दा जी 2 बार देश के कार्यकारी प्रधानमंत्री रहे और दो दशक तक केन्द्र में मंत्री रहे। मगर आदमी बेहद ईमानदार थे इसलिए अपने लिए वो राजधानी में एक कमरा तक नहीं बना पाए। इसका दुष्परिणाम उन्हें बुढ़ापे में भुगतना पड़ा। कुछ वर्ष पूर्व गुजरात में ही नन्दा जी का निधन गुमनामी की हालत में उनकी पुत्री के घर हुआ। मनमोहन शर्मा———————————
    Narendra Nath added 2 new photos.
    19 hrs ·
    वह भी क्या दिन थे साकी….
    फारूख शेख का आज जन्मदिन है। “स्टार-स्टैट” के पीछे भागने वाले समाज में यह बेहद सामान्य और याद न करने वाली दिन है। ईमानदरी से मेरे लिए भी नहीं। ।लेकिन गूगल-डूडल ने आज उनपर फोकस कर न सिर्फ अपनी क्रिएटिविटी दिखाई बल्कि हम जैसों को आईना भी दिखाया कि कला-हूनर को इज्जत देने में हम कितने दरिद्र हैं।
    बात फारूक शेख की। कभी पायजामा-कमीज तो कभी आधे वक़्त लुंगी पहन पूरी फिल्म कर ली। वह किरदार जीते थे।स्टार कभी नहीं।जबकि कई लोगों को यह पता नहीं कि अद्भुत कलाकार के साथ वह बहुत संपन्न घर के भी थे। लेकिन न उन्हें अपनी स्टारडम न उन्हें अपनी अमीरी का अहंकार था। उनका नाम फोनबुक में था और कोई बड़े मौको पर पहला मुबारक संदेश उनका आ जाता था। अदब वाले अंदाज में। ऑटो-रिक्शा जो मिल जाए,उससे निकल जाते थे। ऐसे समय जब पिछले साल पता चला कि बिग बॉस के तीसरे राउंड से बाहर होने वाली कलाकर बिना बाउंसर-मैनेजर न निकलते हैं,फारूख इस फतांसी दुनिया के अनफिट किरदार लगते थे। मेरे हिसाब से उन्होंने हर किरदार को बेहतरीन तरीके से निभाया।लेकिन स्टार के किरदार में फिट नही खुद कर सके। शायद सितारों ने वक़्त से पहले इसीलिए उन्हें अपने जहां में बुला लिया।
    फारूक साहब को इस जहाँ से जन्म दिन मुबारक।।

    तस्वीर-फारूक शेख के साथ कभी गुजारा वक़्त जो बाद में आगे बढ़ा।

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  • May 27, 2018 at 4:52 pm
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    शंभूनाथ शुक्ल
    20 hrs ·
    चीन भारत की जमीन पर घुसने की फ़िराक़ में था।संसद में बहस पुरज़ोर थी। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा- जहाँ चीन घुसने की कोशिश में है, वहाँ कुछ उगता तो है नहीं! फिर क्या था, हंगामा हो गया। उन्हीं की पार्टी के सांसद महाबीर त्यागी खड़े हुए बोले-“पंडित जी उगता तो आपके सिर पर भी कुछ नहीं है, तो क्या इसे चीनियों को ले जानें दें”। संसद सन्न! पंडित जी बोले- ठीक है।
    शंभूनाथ शुक्ल
    6 hrs ·
    नेहरू को मैने नहीं देखा!
    नेहरू जी जिस दिन मरे उसी दिन मेरा रिजल्ट आया था। मैं पास हो गया था और छठे दरजे के लिए कानपुर में तब के एक बेहतरीन इंटर कालेज नगर महापालिका गांधी स्मारक इंटर कालेज में मुझे प्रवेश मिल गया था। मैं उसके एडमिशन टेस्ट में पास हो गया था और कालेज के सूचना पट पर 40 छात्रों की जो सूची लगी थी उस पर मेरा भी नाम था। यह बताने के लिए मैं घर की तरफ भागा। लेकिन घर आकर देखा कि पिताजी खुद घर पर हैं और उदास-से हैं। मैने उनकी उदासी अनदेखी करते हुए कहा पिताजी मैं पास हो गया। मगर पिताजी कुछ नहीं बोले। मैने फिर कहा लिस्ट में मेरा नाम है, पर पिताजी फिर चुप। तब मैने पूछा क्या हुआ? पिताजी ने बताया कि चाचा नेहरू नहीं रहे। अम्माँ सुबक रही थीं और दादी भी। आसपास के सारे लोग रो रहे थे। वहां पंजाबियों की बस्ती थी मगर वे भी उदास थे। हालांकि पंजाबी नेहरू जी को पसंद नहीं करते थे। बाहर आकर देखा कि नीलम की झाई से लेकर बाबा बस्तीराम तक सब पूछ रहे थे कि रेडियो किस के पास है। पर पूरे छह ब्लाक में किसी के पास रेडियो नहीं। तब हम सब बी ब्लाक स्थित एक शुक्ला जी के घर को भागे । शुक्ला जी वहां एक इंटर कालेज में फिजिक्स के लेक्चरर थे और उनके घर पर रेडियो से लगातार सूचनाएं प्रसारित हो रही थीं। उनके घर के बाहर मेला लगा था। ठठ के ठठ लोग जुटे थे और रो रहे थे। हम वहां शाम तक रहे और सबके सब चुपचाप आंसू बहाते वहां बैठे रहे। सूचना आई कि तमिलनाडु में एक औरत ने आत्मदाह कर लिया। कुछ लोगों को भरोसा ही नहीं हो रहा था कि अब देश का क्या होगा। तब किसी ने नहीं कहा कि उनकी बेटी तो है। सब यह सोच रहे थे कि देश फिर गुलाम हो जाएगा क्योंकि एक ऐसा आदमी चला गया जिसका कोई जोड़ीदार नहीं था। देर रात हम लौटे। मां तब तक जाग रही थीं। पिताजी को छोड़कर किसी ने नेहरू जी को देखा नहीं था लेकिन नेहरू का नाम ही सबको सिहरा देता था। मरे आदमी को जीवन दे सकता था। नेहरू जी मर गए, नेहरू जी मर सकते थे, ऐसा सोचना भी असंभव लग रहा था। इसके बाद नेहरू जी अंत्येष्टि और उनकी अस्थियों का संगम में प्रवाह देखने हेतु लोग इलाहाबाद गए। पिताजी मुझे तब पहली बार संगम ले गए थे। वहां की भीड़ देखकर लगा कि महाकुंभ शायद ऐसा ही होता होगा। आज नेहरू जी को दिवंगत हुए 54 साल हो गए। मगर आज सरकारी स्तर पर किसी ने नेहरू जी को याद नहीं किया। उस विभूति को जो आधुनिक भारत का भाग्यविधाता था।
    शंभूनाथ शुक्ल
    2 hrs ·
    इस प्रचंड धूप में प्रधानमंत्री ने बागपत में रैली को एड्रेस किया. और ईस्टर्न परिफेरल एक्सप्रेस वे को उस ख़ास जनता के लिए खोल दिया गया, जो कारों से चलती है और जिसे जाम से झुंझलाहट होती है. देश में ये नवबढ़ा रईस बढ़ते जा रहे हैं और भाजपा को इन नवबढ़ों की तकलीफों की बड़ी चिंता रहती है. इनके लिए सरकार बड़े-बड़े पुल, आलीशान सड़कें और विशालकाय ठिकाने, दारूखाने और भव्य क्लब बनवाती है. प्रधानमंत्री ने उत्साह से लबालब भाषण दिया और वन्दे मातरम का जयकारा लगवाया. लेकिन इस धूप में उनका भाषण सुनने के लिए गाज़ियाबाद, शामली और मेरठ आदि जिलों से जो गरीब-गुरबा लाये गए, उनको पानी तक के लिए नहीं पूछा. इस सड़क को मैंने भी देखा, अच्छी तो लगी, पर मुझे क्या!
    प्रधानमंत्री उदघाटन यदि 29 को करते तो अच्छा लगता. आज देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बरसी है, बेहतर रहता मोदी जी उनकी समाधि-स्थल पर जाकर मौन व्रत करते. वैसे भी आज सूतक का दिन है. मलमास चल रहा है, हिंदू सनातनी परम्परा में इन दिनों उदघाटन समारोह आदि वर्जित होते हैं. दूसरे कल शामली के कैराना में मतदान है, ऐसे में आज का कार्यक्रम मोदी जी टाल देते तो मोदी जी मेरी नज़रों में और ऊपर चढ़ जाते!
    शंभूनाथ शुक्ल
    22 hrs ·
    इंदिरा गांधी जब विपक्ष में रहने के बाद फिर से प्रधानमंत्री बनीं तब उस समय दो साप्ताहिक हिंदी आकाश में पूरी प्रखरता के साथ चमक रहे थे। संयोग कि दोनों का नाम भी सूर्य का पर्यायवाची था। दिनमान और रविवार।इन दोनों के संपादकों में साहस इतना ज़्यादा था कि ये पूरे 46 डिग्री के साथ प्रधानमंत्री के विरुद्ध सामग्री छापते। लेकिन इंदिरा गाँधी इमर्जेंसी का हश्र देख चुकी थीं, इसलिए इनके ख़िलाफ़ कभी एक शब्द नहीं कहा।
    एक बार रविवार में एक व्यंग्य छपा कि प्रधानमंत्री जहाँ जाती हैं वहीं के अनुरूप परिधान पहनती हैं। बंगाल गईं तो बंगाली साड़ी और जब गुजरात गईं तो गुजराती और महाराष्ट्र में नवगजा साड़ी।उस्ताद यह बता रहा होता है तो जमूरा पूछता है- और जब आदिवासी इलाक़े में गईं, तब? उस्ताद कहता है- चुप बे गोबर गणेश!
    आज के परिवेश में न कोई व्यंग्यकार ऐसा लिख सकता है न कोई संपादक छाप सकता है! ट्रोलर पीछा कर लेंगे, जैसे Ravish Kumar को कर रहे हैं। न सरकार बोल रही है न दिल्ली या ग़ाज़ियाबाद की पुलिस न प्रशासन न जजी। और न ही स्वनामधन्य संपादक गण!

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  • May 28, 2018 at 4:57 pm
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    1962 के युद्ध को लेकर संसद में बहस चल रही थी । जवाहर लाल नेहरू ने संसद में ये बयान दिया कि, अक्साई चिन में तिनके के बराबर भी घास तक नहीं उगती, वो बंजर इलाका है। दरअसल, उन दिनों अक्साई चिन चीन के कब्जे में चले जाने को लेकर विपक्ष ने हंगामा काट रखा था। लेकिन नेहरू को उम्मीद नहीं थी कि उनके विरोध में सबसे बड़ा चेहरा उनके अपने मंत्रिमंडल का होगा, महावीर त्यागी का।
    भरी संसद में महावीर त्यागी ने अपना गंजा सर नेहरू को दिखाया और कहा, यहां भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे कटवा दूं या फिर किसी और को दे दूं। महावीर त्यागी को देश की एक इंच जमीन भी किसी को देना गवारा नहीं था, चाहे वो बंजर ही क्यों ना होI

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  • May 31, 2018 at 11:29 am
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    मेरे भी कुछ लेख व्यंगय दिल्ली प्रेस में प्रकाशित हुए पैसे सही और टाइम पर देते थे ये लोग बाकी हिंदी प्रिंट में तो पेसो का कोई तस्स्वुर ही नहीं था महान देशभक्त राष्ट्रवादी अखबार——— केसरी में तीन व्यंगय छपे थे माहौल कुछ यु था मानो आप दोगे पैसे छपने के , खेर अब अल्लाह की लाठी ऐसी चल रही हे ये सब अब धीरे धीरे दम तोड़ रहे हे
    ‘[‘ Vineet Kumar
    28 May at 14:20 ·
    कभी हम सरिता के लिए भी लिखा करते थे :

    ब्लॉगिंग का हमारे लेखन की दुनिया में सबसे गहरा असर रहा कि लिखने-छपने के लिए हमें कभी किसी अखबार-पत्रिका-प्रकाशन संस्थान के दरवाजे जा-जाकर टीटीएम करने की जरूरत नहीं पड़ी. ये कोई अतिरिक्त गुरूर करने की नहीं, उस दौर को याद करने की बात है जहां लिखते रहने से पहचान की गुजांईश और संभावना बन पातीं.

    एक समय ऐसा भी आया दब देश के तमाम बड़े अखबारों, पत्रिकाओं से फोन-मेल आने लगे- आप हमारे लिए लिखिए. मैं सारी बातें अपने एक्स मेंटॉर से शेयर करता. इसी क्रम में जब सरिता के लिए निरूपम( Satyanand Nirupam) ने जब लिखने का आमंत्रण दिया तो ये बात भी शेयर की. निरूपम अपने तेवर और पैनी निगाह से इस पत्रिका को बहुत ही अलग अंदाज से संवारने में जुटा था. मेरे एक्स मेंटॉर ने कहा- भईया, पाज्ज्ञजन्य को छोड़कर जहां से आमंत्रण आए, जमाकर लिखो.
    मैंने तहलका के लिए लिखना शुरू किया. जनसत्ता के लिए लगातार लिखने लगा. नया ज्ञानोदय, प्रभात खबर के लिए भी. वेब पर तो लिखता ही था. सरिता के लिए भी लिखा.
    सरिता में लिखने का सबसे बड़ा लाभ हुआ कि देश के अलग-अलग शहरों से हाउसवाइफ, आंटी-भाभी के खूब संदेश आए. मैं एक नए पाठक वर्ग के बीच पहुंच रहा था..
    Vineet Kumar
    29 May at 22:57 ·
    कांग्रेस को चाहिए कि अपने लोगों को सिल्वर फ्वॉयल में लपटेकर रखे जिससे कि बाहरी हवा न लगे..
    इस देश में आप चाहे हम जैसे फेसबुकिया लेखक हो जाइए या फिर प्रणव मुखर्जी जैसा राष्ट्रपति, विरोधी पाले में जाकर बोलते ही आपकी नीयत पर शक करने में आपके ही लोगों की स्पीड 4 जी हो जाएगी. आप चाहे जीवन भर अपनी समझ और प्रतिबद्धता के साथ काम करते रहिए. ये हमारे भीतर की वो बंद दुनिया है जो लाख कोशिशों के बाद भी खुल नहीं पाती.

    हम सब अभी जहां हैं, अपने पिता, अपनी मां, घर-परिवार से किसी न किसी तरह असहमत होकर, उनका प्रतिरोध करके अपने मन और सपने के साथ जीने की कोशिश कर रहे हैं. एक समय के बाद इन लोगों को समझ आ जाता है कि ये हमारे बीच, हमारे घर में पैदा होने के बावजूद हमसे बंधा नहीं है. ये वही करेगा जो इसकी आत्मा कहेगी. इस बुनियादी सच के बावजूद लोगबाग चौतरफा डिजिटल पिता ऑब्लिक सास बनने लग जाते हैं.

    प्रणव मुखर्जी की आत्मा ने कहा-जाना चाहिए तो जा रहे हैं. उनका जाना इस बात का भी तो संकेत हो सकता है कि देखो कांग्रेस के लोग सच्चे अर्थों में खुले विचार और दिमाग के लोग होते हैं. वो मंच का छुआछूत नहीं मानते, न फैलाते हैं. इसके बाद वहां जाकर जिस सेकुलर को सिकुलर बताकर मजाक उड़ाया जाता है, उस पर ढंग से बोल आते हैं तो कहना ही क्या ?

    कल को मुझे संघ कोई कार्यक्रम में बोलने बुलाए और मेरे लिए जाना संभव हुआ तो जरूर जाउंगा. उनके बीच मजबूती से शेयर करूंगा- मैं मंच से छूत लगने में यकीं नहीं रखता, हां मन के छू लेने में यकीं जरूर रखता हूं और माफ कीजिएगा- आपकी विचारधारा मेरे मन को कभी नहीं छू सकती.

    बाकी ऐसे ही मौके पर आप आसानी से समझ पाते हैं कि आज कांग्रेस का ये हाल क्यों हुआ है ?
    Vineet Kumar
    13 hrs ·
    सरजी ! मैं डिनर करने के बाद डीएनए देखता हूं. ऐसे में हंसाया न करो प्लीज…

    जो पहले अखबार और चैनलों में थे, अब वो डिजिटल पत्रकारिता में उतर आए हैं. वो हिट जॉब कर रहे हैं. निजी लोगों से पैसे लेकर अपने दुश्मनों पर वार करते हैं. चूंकि ये सरकार और संविधान के दायरे में नहीं आते तो लगातार नकारात्मक माहौल बनाते हैं. वो आपसे कहते हैं कि टीवी, अखबार की खबरों में मिलावट हो चुका है, आप इन पर भरोसा न करो. ऐसा करके वो डिजिटल मीडिया की तरफ आपको आकर्षित करते हैं जिससे कि उनका फायदा हो.

    सरजी ! अपने दर्शकों को इतना भी डफर न बना दो कि वो इस देश के कायदे-कानून की एबीसी भी न जान पाएं. दो लाइन साइबर एक्ट पर भी बांच देते. और जो फ्लैश की शक्ल में स्लग चला रहे हो, आपके ही दर्शक पूछेंगे- तो क्या जी न्यूज कारोबार नहीं कर रहा और वो भी तब जब आपके ही मालिक सुभाष चंद्रा अपनी किताब “जेड फैक्टर” में अपने कारोबारी सपनों के बारे में विस्तार से लिख चुके हैं.
    Vineet Kumar
    11 mins ·
    मेरा सपना था, पीएचडी की डिग्री मुझे मेरी मां के हाथों मिले, किसी और के हाथों नहीं..

    आज सुबह जब मेरी आंखें खुली तो देखा कि मेरे दोस्तों की उन पुरानी तस्वीरों में अब भी चमक बरकरार है. गाढ़े लाल रंग की गाउन में वो खूब दमक रहे हैं. हाथ में पीएचडी की डिग्री है. तत्कालीन वीसी, पीवीसी, सुपरवाइजर के साथ की तस्वीरें हैं. चेहरे पर खास किस्म का उत्साह है.

    मैने जब पीएचडी की थीसिस जमा की, उसके बाद मैं यहां तक भूल जाना चाहता था कि मैंने सच में किसी एक विषय पर पांच साल लगाकर कोई रिसर्च किया है. उस रिसर्च के लिए मुझे महीने में कम से कम दो से तीन बार एक शख्स से मिलना पड़ा था. देश की अलग-अलग लाइब्रेरियों और मीडिया संस्थानों के चक्कर लगाने पड़े थे. कई रातें यूं ही अकेले टाइप करते, नोट्स लेते निकले थे. मेरे लिए पीएचडी जीवन के सबसे अप्रिय प्रसंगों में से एक है जिसे मैं जल्दी याद नहीं करना चाहता.

    मै अक्सर देखता हूं कि नाम के आगे ऐसे लोग जिन्होंने पीएचडी नहीं लगायी है तो वो इस बात का बुरा मान जाते हैं. किसी न किसी रूप में जता भी देते हैं. मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूं कि चलो इन्होंने कम से कम एक अप्रिय प्रसंग याद करने से मुझे रोक लिया.

    भारी दबाव और मानसिक तनाव के बीच जब मैंने थीसिस जमा की थी तो बस एक ही बात दिमाग में थी- किसी तरह उनलोगों के हाथों ये डिग्री न लेनी पड़े जिन्हें मैं बिल्कुल पसंद नहीं करता. मेरा वश चलता तो मैं ये डिग्री मां के हाथों लेना चाहता. वो मुझे इसकी हकदार और योग्य भी लगती है. खैर, आखिर में तय किया कि इस दिन गायब हो जाऊंगा. दिल्ली से दूर कहीं हरिद्वार, आगरा, शिमला..कहीं भी. लेकिन उसकी नौबत नहीं आयी.

    जिस दिन सबों को दीक्षांत समारोह में पीएचडी की उपाधि दी जा रही थी, मैं दिल्ली से बहुत दूर एक एयरपोर्ट पर खड़ा दिल्ली की फ्लाइट का इंतजार कर रहा था. शाम को जब यहां पहुंचा तो सारा तामझाम खत्म हो चुका था. मेरे दोस्तों ने बताया कि हॉल में तुम्हारा भी नाम लिया गया था.

    वो शाम वैसे बड़ी हसीन थी. जैसे ही अपडेट किया कि पहुंच गया दिल्ली, चौतरफा डिनर के लिए बुलावा आने लगे थे. खुश हो रहा था कि चलो आते ही बैचलर्सकिचन में हाथ जलाने नहीं पड़ेंगे. लेकिन कहीं और क्यों जाता, मिहिर ( Mihir- Suman ) के यहां महफिल जमी थी. एयरपोर्ट से आकर बैग रखा. नहाया-धौया और सीधे धम्म-मदाड़ा हो गया उसके घर.

    उस रात हम सब अपनी पीएचडी को लेकर ऐसी-ऐसी बातें कर रहे थे जैसे लंबे समय की रिलेशनशिप के बाद कपल शादी करते हैं और बताते हैं कि इस दरम्यान क्या-क्या बेवकूफियां किसने की और कैसे एक समय पर आकर तय किया- अब बहुत हुआ, हमें जीवनभर के लिए एक-दूसरे का हाथ थाम ही लेना चाहिए.

    मुझे आए दिन लोग पीएचडी को लेकर फोन-मैसेज करते रहते हैं. उन्हें कुछ जानना-समझना होता है. शुरू में तो मैंने कईयों को विषय चुनने से लेकर प्रोपोजल, इंटरव्यू आदि के लिए दिल से मदद की. बाद में लगने लगा, ये इमोशन फूल होने का मामला है. मेरा अब इस मसले पर बात करने का मन नहीं होता. बस अब ये लगता है कि एक समय के बाद यदि आपने थीसिस जमा नहीं की तो जिंदगी बबासीर हो जाती है. रही बात थीसिस की तो ऐसे समय में द बेस्ट थीसिस इज द सबमिटेड थीसिस.

    आज मिहिर दिल्ली में होता तो वही शाम द

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  • June 2, 2018 at 9:53 pm
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    . मुनादी महात्मा गांधी का दिया हुआ पोर्टफोलियो हे मिनिस्ट्री का पोर्टफोलियो जवाहर लाल जी का अगर दोनों में झगड़ा आएगा तो में नेहरू जी का पोर्टफोलियो छोड़ दूंगा गांधी जी में नही छोडूंगा ”—————————————————-Abhijeet कहतें हैं कि किसी भी समाज के किसी कालखंड को समझना हो तो सबसे बेहतर है उस कालखंड को निरुपित करती हुई किसी उपन्यास को पढ़ना. गाँधी की लौकिक स्वीकार्यता कितनी थी और आम-जनमानस में गाँधी को लेकर क्या भाव थे इसे अगर समझना हो तो कम से कम “गिरिराज किशोर” और “फणीश्वरनाथ रेणु” की रचनाओं को तो जरूर पढ़ना चाहिए जिसमें गाँधी के सम्मोहन से अभिभूत पूरे समाज की मनोदशा बड़ी खूबसूरती से पिरोई गई है. “गिरिराज किशोर” अपने उपन्यास “जुगलबंदी” में लिखतें हैं कि उस समय ट्रेन के बिलकुल साधारण डब्बे में बैठा अनपढ़ मजदूर उन्मुक्त भाव से “बिना खड्ग, ‘बिना ढाल हमें दे दी आजादी’ गाता-गुनगुनाता रहता था और गाँव में खेतों में काम करने वाली महिलायें कहतीं थी कि गाँधी बाबा तो “देओता” है, ऊ तो कोनो अवतार है. “फणीश्वरनाथ रेणु” ने गाँधी वध के बाद का चित्र खेंचा हैं कि कैसे उनकी मृत्यु के बाद गाँवों में तरह-तरह की अफवाहें उठती थी मानो बिष्णु का कोई अवतार इस धरा-धाम को अलौकिक तरीके से छोड़ कर चला गया. गिरिराज किशोर अपने उपन्यास “जुगलबंदी” में इसी बात को समझने की कोशिश करते दिखे कि आखिर कैसे एक अदना से इंसान के कहने पर लाखों लोग भूखे-प्यासे सत्याग्रह कर सकतें हैं? कैसे एक दुबले-पतले इंसान का एक केवल एक आह्वान लोगों को बिना प्रतिकार किये लाठी खाने का हौसला दे देता है? कैसे एक अर्धनग्न इंसान की शिक्षा से प्रेरित होकर बड़े-बड़े लोग जेलों में शौचालय साफ़ करने का निकृष्ट काम हँसी-खुशी करने लग जातें हैं?

    गाँधी के साथ आपके या मेरे असहमति के हज़ार बिंदु हो सकते हैं पर सच ये है कि भारत के उस कालखंड का अगर कोई अकेला और सबसे स्वीकार्य नायक था तो वो गाँधी थे. गाँधी की आभा के आगे पंडित मोतीलाल नेहरु, पटेल, जिन्ना, जवाहरलाल नेहरु, विपिनचंद पाल, लाला लाजपतराय, मौलाना अबुल कलाम सबकी आभा मद्दिम थी. अब ये भ्रम-जाल था या जो भी था पर ये सच है कि गाँधी उस पूरे कालखंड में (जो तिलक की मृत्यु के बाद से शुरू होता है और भारत-विभाजन के बाद तक जाता है) एक महामानव के सदृश ही रहे जिसकी मातहती में बिलकुल निचले पायदान पर खड़े इंसान से लेकर भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रपति तक रहा करते थे और जिसके बारे में आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक ने असाधारण टिप्पणियां की थी. गाँधी भारत के गुलामी काल में ही लगभग सारे विश्व में “अहिंसक-प्रतिकार” के “जीवंत-प्रतीक” बन गये थे.

    गाँधी जो तय करते थे वही भारत की भी दिशा मानी जाती थी. बिना गाँधी के मशवरे के अंग्रेज भी कुछ करने से डरते थे. बड़े-बड़े तमाम समझौते और वार्ताओं में गाँधी ने भारत का प्रतिनिधित्व किया और तो और जब देश के सामने विभाजन का प्रश्न आया तो हरेक यही कहता था कि अगर बापू चाहेंगें तो विभाजन टल जायेगा. गाँधी जिस काम को सर्टिफिकेट देते थे उसे देश में स्वीकार्यता मिल जाती थी यहाँ तक कि “गांधीवादी विचार” लगभग एक धर्म की तरह स्थापित हो गया. आजादी के कई-कई दशक बाद तक लोग स-गर्व स्वयं को गांधीवादी लिखते रहे.

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  • October 31, 2018 at 10:28 am
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    Girish Malviya
    9 mins ·
    आज लाखो करोड़ो सिर्फ कपड़ो पर खर्च कर देने वाले प्रधानमंत्री, जो अपना उतारा हुआ सूट दुबारा भी नही पहनते ऐसे मोदी जी आज सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति का अनावरण कर रहे है ऐसे अवसर पर सरदार पटेल का एक संस्मरण याद आया

    महान स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी ने अपनी पुस्तक में सरदार पटेल का एक संस्मरण लिखा है जो हर भारतीय के पढ़ने योग्य है……

    ‘एक बार मणिबेन कुछ दवाई पिला रही थी. मेरे ( महावीर भाई ) के आने-जाने पर तो कोई रोक-टोक थी नहीं, मैंने कमरे में दाखिल होते ही देखा कि मणिबेन की साड़ी में एक बहुत बड़ी थेगली (पैवंद) लगी है.

    मैंने जोर से कहा, ‘मणिबेन, तुम तो अपने आप को बहुत बड़ा आदमी मानती हो, तुम एक ऐसे बाप की बेटी हो कि जिसने साल-भर में इतना बड़ा चक्रवर्ती अखंड राज्य स्थापित कर दिया है कि जितना न रामचंद्र का था, न कृष्ण का, न अशोक का था, न अकबर का और अंगरेज का. ऐसे बड़े राजों-महाराजों के सरदार की बेटी होकर तुम्हें शर्म नहीं आती?

    बहुत मुंह बना कर और बिगड़ कर मणि ने कहा, ‘शर्म आये उनको, जो झूठ बोलते और बेईमानी करते हैं, हमको क्यों शर्म आये?’

    मैंने कहा, ‘हमारे देहरादून शहर में निकल जाओ, तो लोग तुम्हारे हाथ में दो पैसे या इकन्नी रख देंगे, यह समझ कर कि यह एक भिखारिन जा रही है. तुम्हें शर्म नहीं आती कि थेगली लगी धोती पहनती हो!’……मैं तो हंसी कर रहा था.

    सरदार भी खूब हंसे और कहा, ‘बाजार में तो बहुत लोग फिरते हैं. एक-एक आना करके भी शाम तक बहुत रुपया इकट्ठा कर लेगी.

    पर मैं तो शर्म से डूब मरा जब सुशीला नायर ने कहा, ‘त्यागी जी, किससे बात कर रहे हो? मणिबेन दिन-भर सरदार साहब की खड़ी सेवा करती है. फिर डायरी लिखती है और फिर नियम से चरखा कातती है. जो सूत बनता है, उसी से सरदार के कुर्ते-धोती बनते हैं. आपकी तरह सरदार साहब कपड़ा खद्दर भंडार से थोड़े ही खरीदते हैं. जब सरदार साहब के धोती-कुर्ते फट जाते हैं, तब उन्हीं को काट-सीकर मणिबेन अपनी साड़ी-कुर्ती बनाती हैं.’

    ‘मैं उस देवी के सामने अवाक खड़ा रह गया. कितनी पवित्रा आत्मा है, मणिबेन. उनके पैर छूने से हम जैसे पापी पवित्र हो सकते हैं.

    फिर सरदार बोल उठे, ‘गरीब आदमी की लड़की है, अच्छे कपड़े कहां से लाये? उसका बाप कुछ कमाता थोड़े ही है. सरदार ने अपने चश्मे का केस दिखाया. शायद बीस बरस पुराना था. इसी तरह तीसियों बरस पुरानी घड़ी और कमानी का चश्मा देखा, जिसके दूसरी ओर धागा बंधा था. कैसी पवित्र आत्मा थी! कैसा नेता था! उसकी त्याग-तपस्या की कमाई खा रहे हैं, हम सब नयी-नयी घड़ियां बांधनेवाला देशभक्त!

    महावीर त्यागी आखिर में लिखते है ….’आज की राजनीति में हम इन अभूतपूर्व सात्विक व ईमानदार गुणों से संपन्न सरदार पटेल को याद करें. महज रस्म के तौर पर नहीं. उनके गुणों को जीवन में उतारें, तो देश का भला होगा’

    ऐसे व्यक्ति की सच्ची श्रद्धांजलि कम से कम प्रतिमा बनाकर तो नही दी जा सकती
    पुनश्च: ‘है बहारें बाग दुनिया चंद रोज’ सरदार पटेल को यह गीत बहुत पसंद था, एकांत समय मे यह गीत सुना करते थे
    Sadhvi Meenu Jain
    2 hrs ·
    ताकि सनद रहे :

    सरदार वल्लभभाई पटेल की दो संतानें थीं .

    मणिबेन पटेल उनकी बेटी थीं और डाह्याभाई बेटे .

    सरदार पटेल की मृत्यु के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उनके दोनों ही बच्चों को संसद में भेजा .

    मणिबेन पटेल दक्षिण कैरा लोकसभा सीट से १९५२ में और आनंद सीट से १९५७ में कांग्रेस के टिकट पर चुनी गयीं .

    १९६२ में जवाहरलाल ने उनको राज्य सभा की सदस्य के रूप में निर्वाचित करवाया .

    सरदार पटेल की दूसरी संतान डाह्या भाई पटेल भी कांग्रेस के टिकट पर १९५७ और १९६२ में लोक सभा के सदस्य रहे . १९७० में राज्य सभा के सदस्य बने और मृत्युपर्यंत रहे .

    मणिबेन ने इमरजेंसी का विरोध किया और जनता पार्टी की टिकट पर मेहसाना से १९७७ में चुनाव जीतीं .

    मणिबेन के नाम पर ही वह शहर बसा है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विधानसभा क्षेत्र हुआ करता था. .

    यह सूचना उन झूठों के बादशाह लोगों के लिए है जो अक्सर कहते पाए जाते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने सरदार पटेल के बच्चों को अपमानित किया था————————————————————————-Follow

    Ravish Kumar
    8 hrs ·
    मैंने येल यूनिवर्सिटी में पोलिटिकल साइंस की एसोसिएट प्रोफेसर करुणा मंतेना की क्लास की। हार्वर्ड में भी एक क्लास किया था मगर संकोचवश नहीं लिखा कि कहीं प्रदर्शन का भाव न झलके। करुणा मंतेना को जब संदेशा भिजवाया कि मैं उनका क्लास करना चाहता हूं तो उन्होंने इजाज़त दे दी। मुझे भी 24 घंटे पहले बाकी छात्रों की तरह सारे सवाल दिए गए जिन पर छात्रों के साथ चर्चा होनी थी। सवाल तो पढ़ लिया लेकिन समझ नहीं आया कि क्लास में क्या होने वाला है। जब क्लास में पहुंचा तो शाम के छह बज रहे थे। आठ बजे तक क्लास होनी थी। क्लास में कई मुल्कों के, कई रंगों और कई ज़ुबान के छात्र थे। सबके हाथ में एक ही किताब थी। गांधी की किताब- NON-VIOLENT RESISTANCE( SATYAGRAH)। अब मैं करुणा मंतेना के क्लास को समझने का प्रयास करने लगा कि यहां होने क्या वाला है। मुझे ईमेल से सात सवाल मिले थे। सारे सवाल सत्याग्रह को लेकर बनाए गए थे, सवालों का मकसद गांधी का महिमामंडन करना नहीं था बल्कि अलग अलग तरीके से गांधी के सत्याग्रह को समझना था।

    तो सात सवाल थे। मतलब सात छात्रों को उस किताब के आधार पर अपनी प्रस्तुति देनी थी। सबके लैपटाप खुल गए थे। बगल में गांधी की किताब रखी थी। हर सवाल के साथ एक छात्र ने अपनी प्रस्तुति दी। उसकी प्रस्तुति पर दूसरे छात्रों ने सवाल किए और प्रो करुणा मंतेना ने भी सवाल किए और जवाब दिए। जो छात्र प्रसुत्ति दे रहा था उसे अपनी हर बात के साथ किताब का पेज नंबर भी बताना था कि कहां से किस बात के आधार पर उसने अमुक राय बनाई है। इससे यह हुआ कि प्रस्तुति देने वाला छात्र बिना पूरी किताब पढ़े क्लास में आ ही नहीं सकता था। प्रो करुणा मंतेना भी अपने जवाब के साथ पेज नंबर का रेफरेंस लेती थीं और सबको वो अंश पढ़ने के लिए कहती थीं। ख़ुद भी पढ़ती थी। एक पल में छात्र शिक्षक पर भारी पड़ते थे और एक पल में शिक्षक छात्र हो जाती थीं। टेबल टेनिस की तरह क्लास में सत्ता संतुलन बदल रहा था। कई छात्रों ने बहुत अच्छी प्रस्तुति दी। उस क्लास में जितना छात्रों ने गांधी के सत्याग्रह को बेहतर तरीके से समझा, उतना ही प्रोफेसर ने भी। पूरी क्लास एक सतह पर आ गई। उनके बीच एक कॉमन बात यह बन गई कि सबने एक किताब पढ़ी थी और पूरी किताब पढ़ी थी।

    प्रो करुणा मंतेना ने कोई लेक्चर नहीं दिया। सिर्फ एक बार खड़ी हुईं और ब्लैक बोर्ड पर नक्शा बनाया। फिर जल्दी बैठ गईं और छात्रों के बराबर हो गईं। किसी भी प्रस्तुति पर छात्र की अति तारीफ नहीं की और न ही किसी को हतोत्साहित किया। जब क्लास ख़त्म हुई तो छात्र प्रोफेसर बन कर निकलते हुए दिखे और प्रोफेसर छात्र की तरह सिमटी हुई निकलती लगीं। एक दिन का ही क्लास था, मगर बाहर लोगों से मिलने और सेल्फी खींचाने का लोभ छोड़ कर ऐसा करना शानदार रहा। बहुत दिनों के बाद किसी प्रोफेसर की क्लास में बैठा था, दस मिनट लग ध्यान को टिकाने में। लेकिन एक बार जब टिक गया तो मज़ा आने लगा।

    किसी भी प्रोफेसर के लिए असहज ही रहा होगा कि किसी पत्रकार को अपने क्लास में बिठा लें लेकिन जो अपना काम जानते हैं उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता। भारत में भी ऐसे कई प्रोफेसर हुए हैं जिनके क्लास में दूसरे विषय के छात्र जाते थे। प्रो रणधीर सिंह ऐसे ही मशहूर नहीं हुए। लेकिन यह लेख मैंने टीचिंग के एक नए तरीके को सामने लाने के लिए लिखा है। इसे पढ़कर भारत के शिक्षक आहत न हों। जो पढ़ाते हैं वो शानदार हैं। यहां भी शिक्षक छात्रों से अपना फीडबैक लेते हैं। मगर यह सिस्टम के तौर पर हर कालेज में नहीं होता है। मैं बस अपना अनुभव लिख रहा हूं। कालेज में मेरे शिक्षक भी कम शानदार नहीं थे। वे तो घर तक चले आते थे, हौसला बढ़ाने। फिर भी यह सबका अनुभव नहीं है। बहुत कम लोगों का अनुभव है।

    मैंने हार्वर्ड में भी एक क्लास किया था। तीन घंटे की क्लास थी मगर एक घंटे से कम बैठा। प्रोफेसर ने झट से अनुमति दे दी थी। उस क्लास में पहली बार देखा कि कई देशों से आए छात्रों की क्लास कैसी होती है। वैसे येल के ही GENDER AND SEXUALITY STUDIES की प्रोफेसर इंदरपाल ग्रेवाल ने भी न्यौता दिया कि आप मेरी भी क्लास में आ जाइये लेकिन तब समय कम था। प्रोफेसर ग्रेवाल नारीवादी मसलों पर दुनिया की जानीमानी प्रोफेसर हैं। फेमिनिस्ट हैं। मेरी बदकिस्मती।

    यह लिखने का मकसद यही है कि किसी से बेवजह ख़ौफ़ न खाएं। बात करें, प्रयास करें। मैं चार लाइन अंग्रेज़ी ठीक से नहीं बोल सका मगर हर कोई मुझे ग़ौर से सुन रहा था। व्याकरण रहित अंग्रेज़ी से भी वे मतलब निकाल रहे थे। तो अपनी दुनिया को बड़ा कर लीजिए। भाषा न भी आए तो भी कोई बात नहीं। प्रो करुणा की क्लास की तस्वीर नहीं लगा रहा क्योंकि इसकी इजाज़त नहीं ली थी और मैंने ढंग की तस्वीर नहीं ली।

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  • November 2, 2018 at 2:24 pm
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    Jagadishwar Chaturvediसंघियों से महात्मा गांधी की मुठभेड़-
    महात्मा गांधी और कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादियों की वैचारिक भिड़ंत का एक दिलचस्प वाकया पढें। नोआखाली से लौटकर गांधीजी ने “ भज मन प्यारे सीताराम” की बजाय “ भज मन प्यारे राम-रहीम,भज मन प्यारे कृष्ण-करीम” की धुन शुरू की थी। दिल्ली में गांधीजी में बाल्मीकि मंदिर के पास के अहाते में प्रार्थना करते थे वहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सैंकड़ों युवक व्यायाम आदि करते थे। 1 अप्रैल 1947 से लेकर चार दिन तक यह घटनाक्रम चला, महात्मा गांधी जब भी प्रार्थना आरंभ करते आरएसएस वाले उसमें रोज व्यवधान डालते।
    सब जानते हैं वायसराय भवन से देरसे लौटने के कारण कल गांधीजी प्रार्थनामे शामिल नहीं हो सके थे,1अप्रैल 1947 को एशियाई सम्मेलनसे समयपर लौटे और प्रार्थना ठीक समय पर आरंभ हुई,लेकिन कुरान की आयत शुरू होते ही कुछ शोर हुआ और प्रार्थना रोकनी पड़ी।इससे पहले प्रार्थनामें ऐसा कभी नहीं हुआ था। गांधीजी की प्रार्थना-सभा में छःचीजें होती हैं,1.बौद्धधर्मका जापानी भाषाका मंत्र,2.संस्कृतमें भगवद्गीता के श्लोक,3.अरबी भाषामें कुरानसे एक कलमा,4.फारसी भाषामें जरथुश्त धर्मका मंत्र,5.हिंदी या हिंदुस्तानी या किसी भी प्रांतीय-भाषामें भजन, और 6.राम-नाम या नारायण नाम की धुन। आज पहली दोचीजों के बाद कुमारी मनु गांधीके मुँहसे ज्योंही कुरान के पहले कलमेका पहला शब्द निकला कि प्रार्थनामें से एक युवक खड़ा होकर शोर मचाने लगा,“बस-बस,बंद कीजिए,बहुत हो गया। अब हम नहीं बोलने देंगे।बहुत सुन लिया।” प्रार्थनासभाके और लोगों के उसे बैठनेको कहने पर भी वह नहीं बैठा।युवक बढ़ता हुआ बिलकुल गांधीजी के मंचके पास आकर खड़ा हो गया और कहने लगा “ आप यहांसे चले जाइए। यह हिंदू-मंदिर है। यहां मुसलमानोंकी प्रार्थना हम नहीं होने देंगे।आपने बहुत बार यह कह लिया, पर हमारी मां बहिनोंकी हत्या पर हत्या हो रही है। हम अब यह सब सहन नही कर सकते।” जब उसने गांधीजी से चले जाने को कहा तो गांधीजी ने कहा आप जा सकते हैं। आपको प्रार्थना न करनी हो तो दूसरोंको करने दें।यह जगह आपकी नहीं है। यह ठीक तरीका नहीं है।” परन्तु 25-26साल वह लडका चुप नहीं हुआ।तब लोग उसे घेरकर “ चुप हो जाओ” ,“बैठ जाओ” की आवाज लगाने लगे। इस पर गांधीजी माइक्रोफोन नीचे रख आसनसे उठकर मंचके बिकुल किनारे जा खड़े हुए।वह लड़का गांधीजी के बिलकुल पास आ गया । लोग उसे पीछेकी ओर खींच रहे थे और वह डटा हुआ अपनी बात और भी आवेशसे दोहराता जा रहा था। गांधीजी ने उस लड़के को छोड़ देने और शांतिसे बैठ जानेके लिए कहा। इधर मंचपरसे एक महिला गांधीजी की सहायतार्थ उनके और उस लड़केके बीच खड़ी हो गई। गांधीजी ने उनको भी हट जाने के लिए कहा। वे बोले मेरे और इनके बीच कोई न आवे।” इतने परिश्रम से गांधीजी थक-से गये। उनकी आवाज धीमी पड़ गई। उन्होंने अपने सारे विक्षोभ को जो कि प्रार्थनामें विघ्न आने के कारण उनके चेहरेपर दिख रहा था उसे सावधानी से दबा लिया और बहुत शान्ति से इस मामले को निबटाने का प्रयास करने लगे।लेकिन उस लड़के ने तो गांधीजी के साथ बहस ही छेड़ दी। यह देखकर लोगोंको धीरज न रहा और सबने मिलकर उसे प्रार्थना-सभासे बाहर कर दिया। यह देखकर गांधीजी ने कहा “ यह आपने ठीक नहीं किया। उस लड़के को आपने जबर्दस्ती निकाल दिया।ऐसा नहीं करना चाहिएथा। अब वह यही कहेगा कि मैंने विजय पाई है।वह गुस्सेमें था। प्रार्थना नहीं करना चाहता था पर मैं जानता हूँ कि आप सब तो प्रार्थना सुनना चाहते हैं। मैं किसीका विरोध करके प्रार्थना नहीं करना चाहता। अब आज की प्रार्थना मैं छोड़ देना चाहता हूँ। जो प्रार्थना मैं करता हूँ वह आप सब जानते हैं। उसमें इस मुसलमानी प्रार्थना के बाद पारसी प्रार्थना है। बादमें यह आपको मधुर भजन सुनाती और फिर रामधुन होती है। मैं अब रामधुन भी छोड़ता हूँ पारसी प्रार्थना भी छोड़ता हूँ। ´ओज़ बिल्ला´ अरबी भाषामें कुरानके एक मंत्रका पहला शब्द है । इसे कहने से, आप यह समझते हैंकि हिंदू धर्मका अपमान होता है ,पर मैं एक सच्चा सनातनी हिंदू हूँ।मेरा हिंदू धर्म बताता है कि मैं हिंदू प्रार्थना के साथ मुसलमान प्रार्थना भी करूं,पारसी प्रार्थना भी करूँ,ईसाई प्रार्थना भी करूँ,सभी प्रार्थनाएं करने में मेरा हिंदूपन है, क्योंकि वही अच्छा हिन्दू है जो अच्छा मुसलमान भी है और अच्छा पारसी भी है। वह लड़का जो कह रहा था कि यह हिंदू मन्दिर है , यहां ऐसी प्रार्थना नहीं की जा सकती,सो वहशियाना बात है। यह मन्दिर तो भंगियों का मंदिर है। अगर चाहे तो एक अकेला भंगी मुझे यहां से उठाकर फेंक दे सकता है।लेकिन वे मुझसे प्रेम करते हैं,वे जानते हैं मैं हिंदू ही हूँ;इधर जुगलकिशोर बिडला मेरा भाई है। पैसेमे वह बड़ा है;पर वह मुझे अपना बड़ा मानता है।उसने मुझे एक अच्छा हिंदू समझकर यहां टिकाया है। उसने जो बड़ा भारी मंदिर बनवाया है उसमे भी वह मुझे ले जाता है। इतनेपर भी वह लड़का अगर कहता है कि तुम यहांसे चले जाओ,तुम यहाँ प्रार्थना नहीं कर सकते तो यह घमंड है।लेकिन आप लोगोंको उससे प्रेम से जीतना चाहिए था। आपने तो उसे जबर्दस्ती निकाल दिया।ऐसी जबरदस्तीसे प्रार्थना करनेमे क्या फायदा ॽ वह लड़का तो गुस्सेमें था और गुस्से के मारे वहशियाना बात कर रहा था। ऐसी बातोंसे तो पंजाबमें यह सब कुछ हो गया।यह गुस्साही तो दीवानेपन का आरंभ है।”
    जिस युवक ने 1 अप्रैल 1947 को प्रार्थना सभा में व्यवधान डाला ,दूसरे दिन भी उनके संघ के दो सदस्यों ने आकर व्यवधान डाला। 2अप्रैल का वाकया और भी परेशानी पैदा करने वाला और शिक्षाप्रद है। 2अप्रैल को महात्मा गांधी ने प्रार्थना आरंभ होते ही कहा “ भाईयो और बहनो, कलकी तरह प्रार्थना के बीचमे आज भी कोई झगड़ा करनेवाले हों तो अभीसे वे अपना इरादा मुझे बता दें,ताकि मैं शुरूसे ही प्रार्थना स्थगित कर दूँ।किसी का विरोध करके मैं प्रार्थना करना नहीं चाहता।”
    दो व्यक्ति खड़े हुए और बोले,“ आपको यदि प्रार्थना करनी है है तो हिंदू-मंदिरसे बाहर आकर बैठें और इस दूसरे मैदानमें अपनी प्रार्थना करें।” गांधीजी बोले “ यह मंदिर भंगियों का है।मैं भी भंगी हूँ। ट्रस्टी लोग आकर रोकेंगे तब अलग बात है।आप मुझे रोक नहीं सकते। अगर आप लोग करने दोगे तो प्रार्थना यहीं करूँगा। युवक ने कहा – यह मंदिर पब्लिकका है ।हमने देख लिया कि पंजाबमें क्या हुआ ।हम आपको यहां प्रार्थना हरगिज नहीं करने देंगे। गांधीजी बोले- मैं बहस नहीं चाहता। मैं बड़े अदबसे कहना चाहता हूँ कि आप लोग भंगियोंकी तरफ से नहीं बोल सकते। मैं भंगी बना हुआ हूं।मैंने पाखाना उठाया है। अगर मैं कहूँगा तो आप लोगोंमें से कोई भी पाखाना उठाने का काम करने वाला नहीं है ,फिर भी आप रोकेंगे तो मैं रुक जाऊंगा।प्रार्थना नहीं करूँगा। लोगों ने चिल्लाकर कहा –हम प्रार्थना सुनेंगे।हमें प्रार्थना चाहिए। गांधीजी बोले इन हजारों आदमियोंके बीच केवल आप दो ही जने बाधा डाल रहे हैं।यह आपके लिए शोभा की बात नहीं है। मैं जानता हूँ कि आप गुस्सेमे भर गए हैं। आप शांत हो जायेंगे तो अपने आप समझ जाएंगे और तभी मैं प्रार्थना करूँगा। युवक चीखते हुए बोला- आप मसजिदमे जाकर गीताके श्लोक बोलिए।क्या वे बोलने देंगे ॽ हमने पंजाबमे सब कुछ देख लिया। गांधीजीने कहा- चीखने की जरूरत नहीं है। इस तरह आप हिंदूधर्मकी रक्षा नहीं कर रहे,बल्कि उसे मारनेकी कोशिश कर रहे हैं।मैं किसी से डरकर प्रार्थना मुल्तवी नहीं कर रहा हूँ।कोई मुझे बीचमे रोकेगा तो प्रार्थना शुरू करनेके बाद मैं रुकनेवाला नहीं हूं, चाहे कत्ल भी क्यों न हो जाऊं। और उस समय भी आप देखेंगे कि मेरी आखिरी सांस छूटती होगी तब भी मेरे मुँह से ´राम-रहीम´ का जाप चलता होगा। मैंने बता दिया कि मैं भंगी हूं,ईसाई हूं,मुसलमान हूं और हिंदू तो हूँ ही।मेरे साथ यहां बादशाह खान भी तो हैं,मुझको आप रोक कैसे सकते हैं ॽ लेकिन आप रोके। एक बच्चा भी मुझे रोक सकता है। युवक- आप पंजाब जाइ।गांधीजी- मैं वहां जाकर क्या करूँगा ॽ मुझमे तो जितनी शक्ति है वह पंजाब,बिहार और नोआखालीकी सेवामें यहां रहते हुए खर्च कर ही रहा हूँ।” कई लोग उस युवकको हटाने लगे कि प्रार्थना सुनेंगे।गांधीजी बोले “ आप लोग इसे धक्का न दें। शान्ति से काम लें। ” युवक ने कहा – हमलोगों को आप चार मिनट दीजिए,हम आपसे बातें करेंगे। गांधीजी ने कहा “ मेरे पास समय नहीं है और बहसकी जरूरतभी नहीं है। अदबसे मैं इतना ही कहूँगा कि आप मुझे ´हां´ या ´ना´ कह दें। युवक ने कहा-हम आपको प्रार्थना नहीं करने देंगे।इस पर गांधीजी बोले “ सब लोग शान्ति से बैठे रहें। मैं जा रहा हूँ। इन भाईयों को कोई न छेड़ें। ये भले ही अपनी विजय मान लें,पर यह क्या विजय है ॽ कोई पीछे छुरा भोंक दे तो उसमें क्या बहादुरी है । मैं इतना कहूँगा कि यह हिन्दू –धर्मका कत्ल हो रहा है।आप लोग सोचिए और समझिए।कल भी आकर मैं यही प्रश्न करूँगा और आप प्रार्थना करनेको मना करेंगे तो मैं चला जाऊंगा।”
    3 अप्रैल को 1947 को गांधी जी ने कहा “ भाइयोऔर बहनो, कल जो दो-तीन ही आदमी थे जो प्रार्थना में रुकावट डालना चाहते थे, पर आज बात और बढ़ गई है।मेरे पास लिखा हुआ पत्र आया है जो किसी मेहतर यूनियनके प्रेसिडेंटका है। उसमें लिखा है कि मुझको यहां रहना ही नहीं चाहिए। अब आप देखिए कि मेरे जैसे बूढ़े आदमी पर कैसी गुजर रही है। लेकिन यहांकी यूनियनके प्रेसीडेंट तो और ही कोई भाई हैं। मैं भी तो मेहतर हूँ और यहां रहा हूँ और रहूँगा। फिर यहाँ के कर्ता-धर्ता तो जुगलकिशोर बिडला हैं। उन्होंने मुझे यहाँ टिकाया है। जब टिकाने वाले जानेको नहीं कहते तो फिर मेरे जाने की क्या जरूरत ॽ
    मैं आज भी पूछूँगा कि मैं प्रार्थना करूँ या न करूं ॽ पर यह पूछनेसे पहले मैं एक बात और पूछूंगा कि आप कलकी मेरी बात समझे या नहीं ॽ अगर समझे हैं तो आपको पता लग गया होगा कि मैंने प्रार्थना क्यों रोक दी। अगर कोई कहे कि आप प्रार्थना न करें या करें तो कुरानकी न करें तो क्या मैं अपनी जीभ कटवाकर प्रार्थना करूँगा ॽ मेरा सिर भले चला जाय,पर मैं प्रार्थना छोडनेवाला नहीं हूँ। जो इस तरह प्रार्थना रोकते हैं वे हिन्दू धर्म को बढ़ाते नहीं घटाते हैं।ऐसा करने वाले कल दो-तीन ही थे,आज ज्यादा हैं। आज जो बात मैंने सुनी वह मुझे खटक रही है-मैं चाहता हूँ वह बात सही न हो-वह यह कि ये जो अड़चन डालनेवाले लोग हैं वे एक बड़े संघके हैं।( यहाँ इशारा आरएसएस की ओर है,बाल्मीकि मंदिरके पाके अहातेमें नित्यप्रातःकाल संघ के सैंकड़ों युवक व्यायाम आदि करते थे) । परन्तु जो लोग रोज सबेरे यहां कवायद-व्यायाम करते हैं और जो उनके मेम्बर हैं वे तो मुझसे मुहब्बत रखते हैं। अगर वे सब मुझे यहां रहने नहीं देना चाहते तो मेरा रहना फिजूल हो जाता है।मुझे यहां रहना ही नहीं चाहिए, लेकिन उनके नेतासे मेरी बात हुई। उन्होंने कहा कि हम किसीका कुछ बिगाड़ना नहीं चाहते। हमने किसीसे दुश्मनी करने के लिए संघ नहीं बनाया है। यह सही है कि हम लोगोंने आपकी अहिंसा को स्वीकार नहीं किया है, फिर भी हम सब कांग्रेसकी कैदमे रहने वाले हैं। कांग्रेस जब तक अहिंसाका हुक्म करेगी हम शांतिसे रहेंगे। इस तरह उन्होंने बड़ी मुहब्बत से मीठी बातें कीं। इतने पर भी अगर आप मुझे रोक देते हैं तो फिर कलसे आप यहां न आएं। मैं इस तरह की प्रार्थना नहीं करना चाहता। मैं और ही किस्मका बना हूँ। मैं हिन्दू हूँ तो मुसलमान भी हूँ और सिक्ख तो करीब-करीब हिन्दू होता है।”
    इस दिन गांधीजी ने फिर पूछा ´हां´ या ´ना´ में उत्तर दें कि मैं प्रार्थना करूँ ॽ करीब तीस आदमी खड़े हो गए और हवामें हाथ हिलाते हुए बोले –मत कीजिए प्रार्थना। हम नहीं चाहते आपकी प्रार्थना। गांधी ने कहा- अच्छा तो सब मुखालिफ हैं ॽ करीब सौ-दो सौ की आवाज आई नहीं,सब मुखालिफ नहीं हैं। आप प्रार्थना जरूर कीजिए। गांधीजी ने उस दिन भी आरएसएस के लोगों के विरोध के कारण प्रार्थना नहीं।
    4अप्रैल 1947 को गांधीजी पुनःप्रार्थना के लिए उस समय भी एक व्यक्ति ने विरोध किया। गांधीकी प्रतिज्ञा थी कि उनकी प्रार्थना बिना विरोध के हो। लेकिन चौथे दिन भी एक संघी विरोध करने चला आया, उस समय एक पंडित ने हस्तक्षेप किया, वह बोला और उसके बाद वहां एकदम शान्ति लौट आई,पंडित ने गांधीजी से कहा कि अब आप प्रार्थना कीजिए और बोलिए।
    गांधीजी ने फिर पूछा- अब आप सब शान्त हैं ॽ वह भाई चला गया जो प्रार्थना नहीं चाहता था ॽ मैं सबसे यही कहूँगा कि उस भाई को हमारी ओरसे डराना या धमकाना नहीं चाहिए। अगर सिपाही उस बेचारे को ले जाना चाहे तो उस बेचारेका क्या होगा ! वह अपनेको कैसा भी समझे,मैं तो उसको बेचारा ही कहूंगा ! एक आदमी अपने को हिन्दू बताता है या अपनेको मुसलमान बताता है और मुझे प्रार्थना से रोकना चाहता है तो उस पर आक्रमण क्या करना !
    वह कहता है कि आप इस मंदिरमें प्रार्थना मत कीजिए। लेकिन मंदिरतो मेहतरों का है। मेहतर मेरे भाई मेरे पास आकर रोते हैं कि हमारे मंदिरमें आकर ये दूसरे लोग ऐसी बाधा क्यों डालते हैं ॽ इन छोटे भाईयोंको मैं क्या दिलालसा दूँ ॽ मैं उनका बड़ा भाई हूँ। मैं ला भंगी हूँ। मैं बाहरकी सफाई करता हूँ,बाहर के पाखाने उठाता हूँ,लेकिन हमारे सबके दिलमें भी मैला भरा हुआ है। असली भंगीको भीतरकी भी सफाई करनी होती है,जो मैं कर रहा हूँ।अगर इस मैलेको हमने अपने दिलसे नहीं निकाला ,अगर ऊँच-नीचकी यह बात हमममें से नहीं हटी तो हिन्दूधर्म बचनेवाला नहीं है। आजतक बचा हुआ है,क्योंकि यह धर्म बहुत बड़ा है। वह मरते-मरे भी टिका है। फिर भी अगर हमने ऊँच-नीचका भाव न छोड़ा तो यह बड़ा होनेपर भी कमजोर हो जावेगा। मेरी इस बात का डा. मुंजे ने भी समर्थन किया है।उन्होंने चिट्ठी लिखी है कि मैं आपकी और बातें तो मानता नहीं हूँ-मैं तलवार की तालीम मानता हूँ-पर छूआछूत और ऊँच-नीचके भेद को मिटानेमे पूरा-पूरा आपके साथ हूँ। इसलिए जो मेरी प्रार्थनाका विरोध करते हैं,वे हिन्दू धर्मको मार रहे हैं।उन्हें समझना चाहिए कि मैं जितना हिंदू हूँ,उतना ही पारसी हूँ,उतना ही ईसाई हूँ,मुसलमान भी हूँ। ´ओज अबिल्ला´ का अर्थ भी कितना सुंदर है। मैंने तो यजुर्वेद नहीं पढ़ा है,लेकिन एक भाईने लिखा है कि इनमे सारी बातें वे ही हैं जो यजुर्वेद में हैं। फिर आप लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हैं ॽ धर्म की बातें अरबीमें हो,संस्कृतमें हो या चीनी भाषामे हो,,सब अच्छी ही हैं। इसलिए मैं उस भाई से पूछूँगा कि वे इसे समझ गए हैं या नहीं ॽ
    अगर वे हिंदू नहीं हैं, गैर मजहब हैं,तो प्रार्थनामें न आवें।मुसलमान थोड़े ही आते हैं।मुसलमान भी मुझसे कहते हैं कि तुमको क्या हक है कि तुम कुरानकी आयत बोलो। फिर भी नोआखालीमें उन्होंने मुझे नहीं रोका। क्या वे रोक सकते थे ॽ लेकिन हिन्दूधर्ममें किसी को शिकायत नहीं हो सकती। हमारे यहाँ 108 उपनिषद हैं। उनमें एक उपनिषद का नाम है ´अल्लोपनिषद´यही तो हिन्दू धर्म की खूबी है कि वह बाहर आने वाले को अपना लेता है। लेकिन उसमे जो कमी है वह है अस्पृश्यता या ऊँच-नीच का भेद। यह जहर उसमें फैल गया है। उसके निकल जानेसे ही वह बचेगा।ये लोग तलवारसे हिंदू धर्म को बचाने की बात करते हैं।ये तलवार लेकर कवायद करते हैं।यह सब क्यों ॽ मारने के लिए ॽ इस तरह हिन्दू धर्म बढ़नेवाला नहीं है। सत्यसे ही धर्म बढ़ता है और यह बात मैंने हिन्दू-धर्मसे ही सीखी है।

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