मकबूल फिदा हुसैन को गूगल की श्रद्धांजलि !

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आज आप गुगल पर कुछ सर्च करने जाएंगे तो आपको मकबूल फिदा हुसैन दिखाई देंगें ।क्युँकि गुगल ने आज अपने सर्च इंजन के मुख्य पेज पर मकबूल फिदा हुसैन को जगह देकर उनको सम्मानित किया है और उसका कारण यह है कि आज 17 सितंबर को मकबूल फिदा हुसैन का जन्मदिन है ,पंढरपुर महाराष्ट्र में आज ही के दिन 1913 में उनका जन्म हुआ था , विवादों के साथ जीवन जीने वाले फिदा हुसैन सिनेमा की होर्डिंग्स बनाते बनाते उस स्तर को छू लिये जहाँ पूरे विश्व में माडर्न आर्ट के सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ चित्रकार पिकासो के समकक्ष आज तक का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार माना जाता है ।और विवाद भी कैसे कि भारत जैसे देश में जहाँ कुरान की आयतों की गलत व्याख्या करके “शैतानी आयतें” नाम की पुस्तक लिखने वाले सलमान रुश्दी का सम्मान होता हो , बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय उल्टी सीधी कहानी किस्से लिखकर चर्चित हुईं तसलीमा नसरीन को वर्षों वर्ष तक इसी भारत में शरण दी गई हो ,शार्ली आब्दो मैगजीन में छपे हजरत मुहम्मद साहब के अश्लील चित्रों को चित्र समझ कर उसका समर्थन करने वाले और शार्ली आब्दो की हत्याकांड का विरोध करने वाले उसी भारत से विश्व का सबसे बड़ा चित्रकार मुम्बई के आतंकवादी ठाकरे के डर से अपनी जन्मस्थली कर्मस्थली भारत को छोड़कर ब्रिटेन में जाकर बस जाता है जहाँ 9 जून 2013 को उनकी मृत्यु हो जाती है ।

मैंने कई बार कई जगहों पर पढ़ा और सुना है कि मकबूल फिदा हुसैन ने हिंदू देवी-देवताओं की कई अश्लील पेंटिंग बनाई थी। इसी कड़ी में सरस्वती और सीता और हनुमान की नग्न तस्वीर भी थी। अगर एम. एफ. हुसैन का विरोध इसी मुद्दे पर कट्टर हिंदू कर रहे थे तो मुझे लगता है कि मकबूल फिदा हुसैन वाकई हिंदू जनमानस को बहुत करीब से समझते थे। क्योंकि सिर्फ इसी बात को मुद्दा बना कर विरोध करने वालों के भीतर बसी सरस्वती वाकई नंगी है ?, वरना उन्हें यह समझ होती कि चंद लकीरों से उकेरी गई कोई नंगी तस्वीर मां सरस्वती की कैसे हो सकती है ? जैसे शार्ली आब्दो में छपे नग्न चित्र पर मुहम्मद लिख देने से वह चित्र हजरत मुहम्मद साहब के नहीं हो जाते परन्तु जैसे आतंकवादी शार्ली आब्दो के हत्यारे थे वैसे ही आतंकवादी मुम्बई का ठाकरे था जिसके डर से उनको भारत छोड़कर जाना पड़ा ।

मां सरस्वती के जिस रूप को हम और आप बचपन से जानते रहे हैं वह तो धवल वस्त्रों में लिपटी हुई हंसवाहिनी और वीणावादिनी वाली मुद्रा है। उनके चेहरे पर गरिमामयी मुस्कान है, ओज है..। यानी, उक्त गुणों में से कोई भी एक गुण जिस तस्वीर में हमें न दिखे, वह मां सरस्वती की तस्वीर हो नहीं सकती, भले ही कोई लाख चीख-चीख कर क्यों न बोले कि यह माँ सरस्वती हैं। क्या आप किसी ऐसी तस्वीर को मां सरस्वती की तस्वीर के रूप में स्वीकार करना चाहेंगे जो हंस के बदले कौवे पर बैठी हो ? जाहिर है नहीं। तो फिर बगैर कपड़े वाली तस्वीर में आपको मां सरस्वती कहां से दिख गई ?

कहना यह चाहता हूं कि भले ही हुसैन ने उस तस्वीर पर लिख दिया हो सरस्वती, पर वह आपकी ‘मां सरस्वती’ नहीं है। फर्ज कीजिए सरस्वती की जगह उसने लाली लिखा होता, तब भी क्या आप इसी तरह विऱोध करते ? या फिर काली लिखा होता तो क्या करते ? ऐसे क्योंकि यह तो कड़वा सच है कि कपड़ों के संग तो काली की कोई तस्वीर अभी तक नहीं दिखी , हां, हर तस्वीर में कलाकार यह कमाल जरूर दिखाता है कि मुंडमालाओं से उनके अंग विशेष लगभग ढक जाते हैं। ऐसे ही किसी बंदर और किसी महिला का जंगल में चित्र सीता और हनुमान का चित्र नहीं हो सकता जिसमें नग्न सीता को नग्न रावण के जंघे पर बैठे कह कर आलोचना की जाती है ।

आपके इस विरोध के क्रम में आपको एक घाटा यह जरूर हुआ कि आप हुसैन की एक लाजवाब पेंटिंग को निहारने से चूक गए। उनके सधे ब्रश स्ट्रोक्स और कलर कॉम्बिनेशन की तारीफ करने का अवसर आपके हाथ से फिसल गया। इतना ही नहीं विरोध के दौरान आपने अपनी एनर्जी जाया की। यही एनर्जी अगर बचा कर रखी जाये, अपने आक्रोश को अगर आप तरतीब देना सीख जायें तो शायद इस समाज में हर दिन उतर रहे किसी काली, किसी दुर्गा, किसी सरस्वती, किसी लक्ष्मी, किसी राधा, किसी सीता, किसी द्रौपदी के वस्त्र की रक्षा कर सकेंगे।

इस तरह, उनकी बनाई तस्वीर अश्लील नहीं थी। मकबूल जैसे कलाकार को हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई जैसी श्रेणी में बांटना, मुस्लिम होने के नाम पर उनका विरोध करना और उनकी बनाई किसी न्यूड स्त्री की तस्वीर में मां सरस्वती का रूप देखना वाकई अश्लील है।
शब्दों से भी तस्वीर बनाई जाती है। रीतिकाल के कवियों ने नायक और नायिका के कार्य-व्यापारों का वर्णन पूरे मनोयोग से किया है। उनकी रचनाएं हिंदी साहित्य के कोर्स का हिस्सा तो हैं ही, हिंदी साहित्य के इतिहास में उनका स्थान बहुत ऊंचा भी है। पर इस देश में यह भी मुमकिन है कि अचानक कोई स्वयंभू ठाकरे जैसा आलोचक पैदा हो जाये और कहे कि ये रीतिकालीन कवि तो बेहद कमबख्त थे। बड़ा ही अश्लील साहित्य रचते थे।
ये लोकतांत्रिक देश है ? कहीं मैने पढ़ा था कि मेरे देश का प्रजातंत्र मालगोदाम में लटकी बाल्टी की तरह है जिस पर लिखा होता है आग और भरा होता है बालू और पानी …। तो इस देश के लोकतंत्र ने उस लेखक की इन पंक्तियों को खारिज करते हुए बताया कि बालू और पानी नहीं भरा होता है, हममें आग ही भरा है। यह लीजिए जिस प्रेमचंद को आप सम्मान देते हैं, उसे तो लिखने का भी शऊर नहीं था। जाति-विशेष के लिए असम्मानजनक टिप्पणी लिखने का दुस्साहस किया था उसने, सो देखिए उसकी किताबों का हश्र। कैसे धू-धू करके आग में जल रही हैं।

मित्रो, बताएं आप कि प्रेमचंद का लिखना अश्लील था या उनकी किताबों को जलाना या फिर जलती किताबों को देख कर भी हमारा चुप बैठना?

दोगलापन केवल यह था कि मकबूल फिदा हुसैन मुस्लिम नाम के थे ।यही कोई मिश्रा चतुर्वेदी शुक्ला होते तो आज इसी भारत में उन पर डाक टिकट जारी हो रहे होते ।फिर भी भारतीय सुन्दर पिचाई के नेतृत्व में गुगल ने मकबूल फिदा हुसैन को सम्मान दिया यह भारत के लिए सम्मान की बात है ।

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6 thoughts on “मकबूल फिदा हुसैन को गूगल की श्रद्धांजलि !

  • September 19, 2015 at 10:07 am
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    किस कदर कायर इंसान निकले थे मकबूल फ़िदा हुसेन की न्ब्बे – सौ की उम्र में भी मौत के डर से लंदन क़तर बैठे रहे मगर अपने पुरखो के पास पंढरपुर दफ़न होने को नहीं आये लानत हे हमने तो हुसेन से एक तिहाई ही जिंदगी जी होगी और पैसा ऐशो आराम नाम तो एक लाख गुना कम ही होगा मगर फिर भी अगर अगले ही घंटे अपने विचारो उसूलो के लिए मरना भी पड़े तो भी हमें कोई डर नहीं हे तीन चार कटटरपन्ति हम पर भी इस कदर झूठे आरोप लगा चुके हे की इनका मकसद था की मानो कोई मदरसे का पढ़ा लड़का आकर हमें छुरा मार दे एक बार एक मोदी दीवाना जान को आ रहा था और ये तो सिर्फ शुरुआत हे अभी से ही बज़रंगी और काटरपन्ति हमारे खून के प्यासे से हो चुके हे मगर चाहे जो हो जाये हम अपने विचारो उसूलो आदर्शो इरादो से एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे और उधर ये मकबूल थे इन्होने तो सब अपनी आँखों से देखा होगा की कैसे गांधी नेहरू आज़ाद लोहिया आदि लोगो ने अपनी जान पर खेल कर एक सेकुलर लिबरल सहअस्तित्व वाला भारत और वो माहोल बनाया जिसमे फलफूल कर हुसेन इस कदर बड़े चित्रकार बने जिनके एक एक चित्र करोड़ो में बिकते थे मुझे नहीं पता की हुसेन ने हिन्दू धर्म का अपमान किया था या नहीं नग्न चित्र वगेरह क्या मसला था मगर जो भी था या तो हुसेन अपने चित्र वापस लेते या फिर पूरी ताकत से अपनी लड़ाई कोर्ट और जनता बुद्धजीवियों के बीच लड़ते हो सकता हे की बज़रंगी उन्हें मार देते मगर नब्बे की उम्र में भी मौत कर डर कायरता की मिसाल ही कहा जाएगा मारे जाते तो शहीद कहलाते और गांधी जी की तरह उनकी भी शहादत बज़रंगियो संघियो को बुरी तरह कमजोर कर देती और हुसेन अमर हो जाते मगर हुसेन ने कायरता का रास्ता चुना पलायन किया जिसेसे हिन्दूतालिबानों का हौसला और बढ़ा ही इसलिए अगर कभी कोई सही सरकार बनेगी नितीश कुमार के नेत्र्तव में तो हम उससे अपील करेंगे की मकबूल साहब को दिए गए सभी अलंकरण वापस लिए जाए

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  • September 19, 2015 at 10:53 am
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    ज़ाहिद साहब अच्छे आदमी हे मगर उन पर उर्दू अखबारों का बेहद प्रभाव हे और अधिकांश उर्दू अखबार भड़काऊ लेखन को ही अपनी आक्सीजन समझते हे इसलिए कहावत भी हे की ” उर्दू अखबारों ने पहले भारत का बटवारा करवाया फिर पाकिस्तान का ” अब भला बताइये की क्या तुक हे की भारत ने भला कब रश्दी का सम्मान किया या कब शर्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों का समर्थन किया कब ? क्या आप संघियो बज़रंगियो को ही भारत समझ रहे हे क्या ? और रही बात तस्लीमा की तो जो भी हो वो एक महिला हे उन्होंने शरण मांगी और दी गयी क्या करे ? जो शरण में आएगा उसकी तो रक्षा करनी ही होगी प्रेमचंद की स्पेन के अरब बूढ़े पर लिखी कहानी ” क्षमा ” तो पढ़ी ही होगी और आगे भी तुफैलचतुर्वेदी की तरह ही गलत बयानबाज़ी की गयी हे की ” भारत से विश्व का सबसे बड़ा चित्रकार मुम्बई के आतंकवादी ठाकरे के डर से अपनी जन्मस्थली कर्मस्थली भारत को छोड़कर ब्रिटेन में जाकर बस जाता है ” जहा तक मुझे याद हे ठाकरे इस केस में तो थे ही नहीं बज़रंग दल था ठाकरे ने तो महाराष्ट्र के हुसेन को वापस आने को कहा था इसी तरह ठाकरे ने शायद कभी भी महाराष्ट्र जाकिर नाइक के खिलाफ भी कोई तोड़ फोड़ नहीं मचाई याद रहे में ठाकरे का समर्थन नहीं कर रहा तथ्यों को करेक्ट कर रहा हु

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  • September 19, 2015 at 11:54 am
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    सिकंदर हयात

    आप से पूरी तरह सहमत हु . मक़बूल फ़िदा हसन को जो शोहरत और नाम भारत में मिला और किसी देश में होते तो मिलता ही नहीं . विदेश जाने का फैसला उन का गलत था . दर कर भागना कायरता की निशानी है .

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  • September 19, 2015 at 11:39 pm
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    मिश्रा जी मकबूल फ़िदा हुसेन को हम कभी माफ़ माफ़ नहीं करेंगे इसलिए नहीं की उन्होंने नग्न चित्र बनाय थे नहीं बल्कि इसलिए की उन्होंने नंगी कायरता दिखाई थी और उस सेकुलर निजाम का अपमान किया था जिसने उन्हें वो सानस्कर्तिक माहोल दिया जिसमे वो इतने बड़े चित्रकार बने थे

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  • October 9, 2015 at 10:36 am
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    अब देखिये की एक अख़लाक़ की शहादत ने कैसे मोदी सरकार और हिन्दू कठमुल्लवाद का असली चेहरा सारी दुनिया के सामने लाकर रख दिया हे इन्हे कमजोर कर दिया हे और देखे की अभी तक बिहार में भाजपा लीड कर रही थी मगर अब अचानक से नितीश छा रहे हे ये भी अख़लाक़ की शहादत का कुछ इफेक्ट लग रहा हे क्योकि हिन्दू का एक बड़ा वर्ग ये सब कतई नहीं चाहता अब वो खुल कर भाजपा विरोध करेगा सोचिये अगर हुसेन 9० की उम्र में हिम्मत करके हिन्दू कठमुल्लाओं के हाथो शहीद हो जाते तो शायद मोदी सरकार बनती ही न और हुसेन साहब हिम्मत ना करके कौन से अमर हो गए थे ? मौत तो फिर भी आई ही न हुसेन के सारे सम्मान और सारी सम्पत्ति एक दिन जब्त की जायेगी आमीन

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    • January 25, 2018 at 10:28 pm
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      अगर अखलाख को मारने वाले हिन्दू थे और इस हिसाब से सभी हिन्दू दोषी हैं तो फिर हुसैन मुसलमान था और नग्न चित्र बनाने के लिए सारे मुसलमान दोषी हैं

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