भारत के पहले दलित क्रिकेटर – बालू पालवंकर !

By- vikram singh chauhan

भारतीय क्रिकेट के पहले महान और सुपरस्टार क्रिकेटर कौन सीके नायडू! भारतीय क्रिकेट के भगवान कौन सचिन तेंदुलकर! भारत में सीरीज़ व बड़ी ट्राफी किसके नाम पर महाराजा रणजीत सिंह के नाम से ‘रणजी’ ट्रॉफी .रणजीत सिंह आजीवन इंग्लैंड के लिए खेला ,खुद को कभी इंडियन क्रिकेट प्लेयर नहीं माना.दूसरी ट्राफी है ‘दिलीप ट्राफी’ ये दुलीप सिंह के नाम पर है,ये महाराजा रणजीत सिंह के ही भतीजे हैं,आजीवन इंग्लैंड के ससेक्स के लिए खेला. मगर भारत गर्व के साथ इनके नाम पर ट्राफी करवाता है.इन्हीं चंद नामों पर स्टेडियम, पुरस्कार सब है.अब ऐसे में कोई सुरेश रैना आकर कहता है मुझे ब्राम्हण होने की वजह से चेन्नई की ओर से आईपीएल खेलने में कोई दिक्कत नहीं आई तो ये भाई साहब बिल्कुल सही कह रहे हैं.ये इस देश का इतिहास है यहां आपके खेल से ज्यादा आपकी जाति महत्वपूर्ण है.क्रिकेट के अभी के भगवान तय है,आगे के भगवान ,महान सुपरस्टार खिलाड़ी और भारत रत्न सब तय है.किनके नाम पर फ़िल्म बनेगी ये भी तय है.ऐसे में मेरे जैसा कोई आदमी आकर कहेगा कि भारत के पहले महानतम खिलाड़ी और सुपरस्टार क्रिकेटर पालवंकर बालू थे तो आप चौंक जाएंगे! गूगल करेंगे ,पर ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि इनके बारे में लिखा ही कम गया है.क्योंकि जाति से दलित थे.

तो सुनिए इतिहास पर नजर डाले तो भारत के पहले दलित क्रिकेटर जिन्होंने जातिवाद की बेड़ियों को तोड़कर क्रिकेट के मैदान पर अपना परचम लहराया, वह थे पालवंकर बालू.आमिर खान ने अपनी फिल्म में जो पात्र ‘कचरा’ नाम से गढ़ा था वे यही हैं.आमिर खान ने भी गजब किया इन्हें कचरा बना दिया लेकिन ‘भुवन’ नामक एक फर्जी पात्र भी गढ़ दिया जबकि इस जैसा कोई इतिहास में है ही नहीं.बहरहाल 19वीं सदी में जब देश में जातिवाद और अंग्रेजी हुकूमत का राज दोनों अपने चरम पर था. ऐसे वक्त में कर्नाटक के धारवाड़ में दलित परिवार में बालू का जन्म हुआ.1892 में वह पुणे चले आए, जहां यूरोपियन क्रिकेट क्लब के लिए प्रैक्टिस नेट लगाने से लेकर पिच साफ करने का काम उन्हें मिला.पूना क्लब में उस वक्त सिर्फ अंग्रेज ही क्रिकेट खेला करते थे. वहां काम के दौरान अंग्रेज खिलाड़ियों ने बालू को बॉलिंग करने के लिए प्रेरित किया.इस क्लब में बैटिंग केवल अंग्रेज कर सकते थे इसलिए बालू को सिर्फ बॉलिंग का मौका मिलता.पूना क्लब में लगातार प्रैक्टिस करते हुए बालू ने स्पिन बॉलिंग में महारत हासिल कर ली.ब्रिटिश राज में धर्म के आधार पर क्लब हुआ करते थे जैसे हिन्दू जिमखाना, मुस्लिम जिमखाना, पारसी जिमखाना इत्यादि.उस वक्त हिंदुओ ने भी पूना में अपना एक नया क्लब खोला, अब उन्हें अंग्रेजों को हराने के लिए बालू की जरूरत थी.लेकिन दलित होने के कारण टीम में बालू को खिलाने को लेकर हिंदुओ के सामने समस्या खड़ी हो गई. आखिरकार बालू के खेल को देखते हुए उन्हें क्लब की टीम में शामिल किया गया.जिसके बाद क्लब ने बालू की शानदार बॉलिंग और निचले क्रम में बल्लेबाजी की बदौलत कई मैच जीते.इन सब के दौरान बालू के साथ जातिगत भेदभाव होता रहा उन्हे खाने पीने की चीजे बाकी खिलाड़ियों से अलग कर दी जाती.1896 में पुणे में प्लेग बीमारी फेल गई, ऐसे वक्त में मुंबई में क्रिकेट फल फूल रहा था, बालू काम की तलाश में मुंबई आ गए. उन्हें नए बने हिंदू जिमखाना टीम में शामिल कर लिया गया. 1906 में बालू के शानदार प्रदर्शन की वजह से हिंदू जिमखाना ने पहली बार अंग्रेज टीम को हराने में सफलता पाई.आजादी के आंदोलन के इस दौर में अंग्रेज क्रिकेट टीम की हार ने भारतीयों में जोश भरने का काम किया.

1911 में भारत के कई क्लबों को मिला कर एक टीम बनी, जो खेलने इंग्लैंड गयी, बालू इस टीम का हिस्सा थे. इस दौरे में पर इस टीम को भले ही हार का सामना करना पड़ा लेकिन पालवंकर बालू अपने प्रदर्शन की छाप छोड़ने में कामयाब रहे.यह टीम 10 मैच हारी और मात्र दो जीती. लेकिन पालवंकर ने निजी तौर पर शानदार प्रदर्शन किया. उन्होंने 114 विकेट (कहीं यह आंकड़ा 87 भी है) लिए और 376 रन भी बनाये. उनके प्रदर्शन को पूरे भारत में सराहा गया. कई इंग्लिश काउंटी टीमों ने बालू को इंग्लैंड में खेलने के लिए ऑफर किया लेकिन बालू भारत में खेलने के लिए प्रतिबद्ध थे.संविधान निर्माता बाबासाहेब अंबेडकर भी पालवंकर बालू से खासे प्रभावित थे. वे पालवंकर बालू को दलित समाज के आदर्श बताया करते थे. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी अपनी किताब ‘ए कॉर्नर ऑफ़ फॉरेन फील्ड’ में पालवंकर बालू की जिंदगी पर विस्तार से लिखा है. रामचन्द्र गुहा का मानना है की भारतीय क्रिकेट के पहले महान और सुपरस्टार क्रिकेटर सीके नायडू नहीं, पालवंकर बालू थे. लेकिन क्रिकेट इतिहासकारों ने उनकी अनदेखी की.पालवंकर ने प्रथम श्रेणी के 33 मैचों में 15 की औसत से 179 विकेट लिए. इसमें 17 बार पांच विकेट थे. अपनी प्रतिभा और प्रदर्शन के बावजूद पालवंकर बालू कभी भारतीय टीम के कप्तान नहीं बन पाए क्योंकि वो दलित समाज से आते थे.तो सोचिए जो देशभक्त थे,देश के लिए ही खेला.अंग्रेजों को धूल चटाया,खून पसीना बहाया उनका नाम कही नहीं है,और जो अंग्रेजों की ओर से खेले उनके नाम पर ट्राफी हो रही है.वे महान कहे जाते हैं.लेकिन भारत की मिट्टी को अपने सपूत पालवंकर बालू पर गर्व था,गर्व रहेगा.

संदर्भ-‘ए कॉर्नर ऑफ़ फॉरेन फील्ड’, दिप्रिन्ट,लोकमत

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