भारत की भांड और दलाल मीडिया !

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फिल्म निर्देशकों में प्रकाश झा मेरे कुछ पसंदीदा फिल्म निर्देशकों में से एक हैं। इसका कारण यह है कि ये समाज के सच को सिल्वर स्क्रीन पर दिखाने का साहस करते हैं। प्रकाश झा की फिल्म “गंगाजल” मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है।

समाचार क्या है ? समाचार , समाज में घट रही घटनाओं की सूचना को कहते हैं। अर्थात जैसी घटना घटी उसे इमानदारी से लोगों को यथावत सूचित कर देना ही समाचार है। घर और रिश्ते नातेदारों के यहाँ का हालचाल मिलना भी एक तरह से समाचार ही है। इसमें झूठ की कोई जगह नहीं। समाचार का अंग्रेजी पूरक शब्द “NEWS” N = North , E= Eest , W= West , S= South. अर्थात चारों दिशाओं की सूचना , सूचना को केवल यथा रूप में बिना अपनी सोच और झूठ को मिलाए सूचित करना ही “समाचार” होता है। सूचना देने वाले को ही पत्रकार कहते हैं और उनके इस कार्य को पत्रकारिता। और तब उस पत्रकार की छवि सहसा ही मनमस्तिष्क में उभर जाती है , चश्मा लगाए , खद्दर कुर्ता और पैजामा पहने कंधे पर झोला टाँगे , हवाई चप्पलों पर चलता सूचनाओं को ढूँढता एक पत्रकार।

उसकी ऐसी छवि इसलिए कि समाज में घटती घटनाओं में खलनायक सदैव या तो सत्ता प्रतिष्ठान(सरकार) रहता है या गुंडे या धन्नासेठ पूँजीपति। और इन दोनों के बिना किसी पत्रकार या व्यक्ति की समृद्धि छवि असंभव है। इसीलिए पत्रकारिता सदैव से एक समाज सेवा होती रही है दरअसल पत्रकारिता का मूल और असली रूप देखना है तो फिल्म “गंगाजल” के “तेज़पुर एक्सप्रेस” को देखिए जो तेज़पुर में साधू यादव के आतंक को अपने समाचार पत्र में प्रमुखता से छापते हुए वहाँ के एसपी अमित कुमार के साथ खड़ा होता है परन्तु जैसे ही अमित कुमार के नीचे कार्यरत पुलिस अधिकारी “तेज़ाब” से आरोपियों की आखें फोड़ते हैं तो “तेज़पुर एक्सप्रेस” उस समाचार को भी प्रमुखता छापता है। क्युँकि पत्रकारिता का पहला धर्म “सत्यता की खोज” है , दूसरा धर्म उसे “सत्यता के साथ सूचित” करना है तो तीसरा धर्म “निर्भीकता” के साथ समाज में घटने वाली खबरों का सबके सामने लाना है।

परन्तु क्या आज देश की पत्रकारिता ऐसी है जो “समाचार” के मूल सिद्धांत पर 100% खरी उतरती है ? संभवतः बिलकुल नहीं।

देश के लगभग सभी “समाचार संस्थानों” पर आज हर सूचना के केन्द्र में रहे तीनों खलनायकों का कब्ज़ा हो चुका है। और खद्दर पहनकर झोला टांगे सूचना को ढूँढता पत्रकार अब लाखों लाख के पैकेज पर “बीएमडब्लू” पर चलता है ( आजतक के संजय सिन्हा की स्विकरोक्ती कि उनके पास बीएमडब्लू है)। पत्रकारिता के माध्यम से समाजसेवा करना अब इतिहास की बातें हो गयी हैं।

भारत में पूँजीवाद के बढ़ते प्रभाव का जो सबसे अधिक असर पड़ा है वह इसी क्षेत्र में पड़ा है और समाजसेवा का कार्य कर रहे समाचार प्रतिष्ठान साबुन बनाने वाली किसी व्यवसायिक कंपनी की तरह समाचार बेचने के कार्य में लग गयी हैं , समाचार का आधार अब सच्ची सूचना ना होकर तेजी से बिकने वाला “मसाला” बन गया है।प्रिन्ट मीडिया की बात करें तो लगभग सभी समाचार पत्र , समाचारों के कभी खलनायक रहे धन्नासेठों के स्वामित्व में चल रहे हैं तो उसमें कार्य करने वाले पत्रकार अपराधी मानसिकता के हैं जो सरकार के साथ खड़े होकर समाचार की मूल भावना की चिता जलाते हुए अपने स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं और विज्ञापन से आने वाला धन उसमें प्रेरक का काम कर रहा है।समाचार को साबुन तेल की तरह बेचने का कार्य धन्नासेठों (बनिया समुदाय) ने ही सर्वसप्रथम सबसे पहले किया और “समाचार तंत्र” पर कब्जा किया। और फिर देश के धन्नासेठ बनियों के प्रभुत्व वाले संगठन “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” ने इन सभी धन्नासेठों को अपना शुभचिन्तक बना कर सत्ता और अपनी राजनैतिक पार्टी का हितैषी बना दिया। खुद उदाहरण देखिए देश के प्रमुख प्रिन्ट मीडिया के मालिकों की स्थिति।

1- टाईम्स आफ इंडिया ( जैन , बनिया)
2- हिन्दुस्तान टाईम्स ( बिरला ग्रुप , बनिया)
3- दी हिन्दू ( अयंगार , ब्राह्मण )
4- इंडियन एक्सप्रेस ( गोयनका , बनिया )
5- दैनिक जागरण ( गुप्ता , बनिया )
6- दैनिक भाष्कर ( अग्रवाल , बनिया)
7- गुजरात समाचार ( शहा , बनिया)
8- लोकमत ( दर्डा , बनिया )
9- राजस्थान पत्रिका (कोठारी , बनिया)
10-नवभारत ( जैन , बनिया)
11- अमर उजाला ( माहेश्वरी , बनिया)

यह सभी समाचारपत्र , समाचार को सूचना के अनुरूप नहीं बल्कि अपने मालिकों द्वारा दिये गये दिशा निर्देशों के अनुरूप समाचारों को अपने पत्र में जगह देते हैं और यह आदेश किसी को लाभ या हानि पहुँचाने की रणनीति के तहत होते हैं। किस समाचार को प्रमुखता देने से किसका हित और अहित होगा उसके मालिकों का निर्णय इसी पर निर्भर रहता है। निश्चित ही अपने आका “संघ” के विरुद्ध कोई समाचार इनके लिए प्रमुख समाचार नहीं होता अन्यथा एक अपंजीकृत संगठन का देश में इस प्रकार फैलना असंभव हो जाता।

लाखों रूपये प्रति कालम प्रति सेन्टीमीटर पर मिलने वाले प्रचार उद्योगपतियों के विरुद्ध लिखने से लाचार कर देते हैं , धन्नासेठ मालिकों उद्धोगपतियों के गठजोड़ तथा संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा के राजनीतिज्ञों से संबंध उनको सत्तारुढ़ दल और सरकार के विरुद्ध लिखने वाली कलम को लकवाग्रस्त कर देता है और कर चुका है।

इन सभी समाचार पत्रों में बहुत अधिक संघ से प्रभावित हैं और उसके समर्थक हैं और समर्थक ना भी हों तो कम से कम सभी के सभी संघ के आलोचक तो बिलकुल नहीं हैं जो संघ विरोधी किसी भी खबर को प्रमुखता से छापने का साहस कर सकें। सब अपने अपने तरह से घोषित और अघोषित रूप से उसके द्वारा ही नियंत्रित हैं। अर्थात सत्ता के चाटुकार ।

● इंडिया टुडे के अरुण पूरी के स्वामित्व वाली टीवी टुडे के ग्रुप में , आजतक , हेडलाईन टुडे , तेज़ , बिजनेस टुडे , दिल्ली आजतक और अब इंडिया टुडे चैनल। यह चैनल घोर चाटुकारता के स्तर को पार कर चुका है और संघ तथा सरकार को प्रसन्न करने के लिए ऐन्टिक इस्लामिक बहस और खबर चलाने में तत्पर रहता है , डाक्टर ज़ाकिर नाईक प्रकरण पर यह उनके टाईम्स नाऊ को ₹500/= करोड़ की मानहानि का नोटिस दिये जाने तक लगभग 15 दिन प्राईमटाईम पर उनपर बहस चलाता रहा और गालीगलौज कराता रहा। संघ और उसके आतंकवादी कार्यक्रम पर खबरें इसे नहीं मिलतीं। सरकार के विरुद्ध बोलने की हिम्मत नहीं क्युँकि फिर “पतांजली” के प्रचार मिलना बंद हो जाएँगे।

● ₹3404/= करोड़ के व्यापार के साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाला टीवी-18 ग्रुप के पास सीएनबीसी- टीवी18 , सीएनबीसी-टीवी-18 प्राईम एचडी , सीएनबीसी-आवाज , सीएनबीसी-बाज़ार , सीएनएन-न्यूज-18 , आईबीएन-7 , आईबीएन लोकमत , इटीवी उर्दू, इटीवी-हरियाणा हिमाचल प्रदेश , इटीवी मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ , इटीवी-बिहार झारखंड , इटीवी- बंगला , इटीवी-उड़ीसा ,इटीवी न्यूज-कन्नड़ , इटीवी न्यूज-केरला , इटीवी न्यूज-तमिलनाडु , इटीवी न्यूज-आसाम , इटीवी न्यूज- गोवा , न्यूज-18 पंजाब , न्यूज-18 जे•के•। इसके अतिरिक्त मनोरंजन के , तमाम चैनल जैसे कलर टीवी , कलर एचडी , रिश्ते , रिश्ते- सिनेप्लेक्स , एमटीवी इंडिया , एमटीवी-एचडी जैसे कम से कम 50 क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल हैं।

भारत के प्रधानमंत्री की पीठ पर देश का यह एकमात्र उद्धोगपति जब हाथ रखता है तो इसकी पत्नी का हाथ प्रधानमंत्री के हाथों में होता है। संघ भाजपा और सरकार का एजेंडा चलाने का कार्य कर रहे इस मीडिया समूह के बारे में इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करते इसकी 6 बजे से 9 बजे तक चलने वाली बहसें और उसके पैनल में बैठे लोग अंबानी के प्रधानमंत्री के पीठ पर रखे हाथ को चरितार्थ करते हैं।

●सुभाष चंद्रा के स्वामित्व और सूधीर चौधरी के सीइओ वाली ₹ 551 करोड़ के व्यापार वाले ज़ी समूह के अंतर्गत , ज़ी न्यूज-हिंदी , ज़ी न्यूज-इंग्लिश , ज़ी बिजनेस-हिंदी , ज़ी बिजनेस-इंग्लिश , इसके अतिरिक्त ज़ी न्यूज प्रादेशिक के अंतर्गत 18 चैनल अलग अलग प्रदेशों के नाम से हैं। इसके अतिरिक्त तमाम मनोरंजन चैनल जिनकी संख्या कम से कम 25 है।

संघ का घोषित समर्थक यह चैनल । इसका मालिक भाजपा का राज्यसभा सदस्य है , इसका सीईओ और तिहाड़ी पत्रकार सुधीर चौधरी सरकार की चाटुकारता के लिए किसी परिचय का मोहताज नहीं। खबरों को चलाने और ना चलाने की ₹100/= करोड़ की डील करते इन्हें दुनिया ने देखा है। इसी कारण अपराधिक मुकदमा के आरोप में तिहाड़ जेल की हवा खाए इस सीईओ महोदय को मोदी सरकार वाई श्रेणी की सुरक्षा दे रही है।

● नोएडा के सेक्टर 85 में 2•9 एकड़ में फैले रजत शर्मा के स्वामित्व वाले इंडिया टीवी का वार्षिक व्यापार ₹700/= करोड़ का है।

रजत शर्मा घोषित रूप से पतांजली और बाबा रामदेव के हाथों बिके हुए हैं और उनके कृपापात्र रहे हैं। उनके प्रसारण किसके उद्देश्य को पूरा करते हैं यह भी बताने की आवश्यकता नहीं। कभी निष्पक्षता का प्रतीक रहा “आपकी अदालत” दर्शकों की तालियाँ बजाकर महिमामंडन करने के लिए अपने आकाओं को कटघरे में बुलाता है। मोदी सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत यह पत्रकार अपने चैनल पर पत्रकारिता धर्म का प्रतिदिन बलात्कार करता है।

●टाइम्स नाऊ , अंग्रेजी समाचार चैनल है जिसमें अरनब गोस्वामी टाइम्स नाऊ के मुख्य संपादक हैं और सुनील लुल्ला वर्तमान सीईओ हैं जो कि एक फिल्म निर्माता हैं।

प्रधानमंत्री और सरकार की चापलूसी करते सभी सीमाओं को पार कर गये पत्रकार अर्नब गोस्वामी “राज ठाकरे” जैसे लोगों से ठीक रहते हैं क्युँकि इनका हेडक्वार्टर मुम्बई में है। सरकार और संघ के उद्देश्यों को पूरा करता टाम्स नाऊ किस तरह ओछेपन का प्रदर्शन करता है यह डाक्टर ज़ाकिर नाईक प्रकरण से समझिए जब कि उनको लगातार आतंकवादी बता रहे अर्नब गोस्वामी की पत्रकारिता ₹500/= करोड़ के मानहानि की नोटिस मिलते ही डाक्टर ज़ाकिर नाईक की प्रशंसा में उबल पड़ती है। फट्टू

● न्यू डेलही टेलीविजन नेटवर्क अर्थात एनडीटीवी , मार्क्सवादी नेता प्रकाश करात के साढ़ू और पत्रकार प्रनव राय और उनकी पत्नी राधिका राय के स्वामित्व वाली कंपनी है जिसके सीईओ विक्रम चंद्रा हैं। पिछले वर्ष इस चैनल ग्रुप की शुद्ध कमाई ₹576/= करोड़ की थी। इस ग्रुप में एनडीटीवी-24×7 , एनडीटीवी-इंडिया , एनडीटीवी- प्राफिट , एनडीटीवी-गुड टाईम , एटीएन-एनडीटीवी-24×8 , एनडीटीवी-वर्ड वाईड।

कुछ हद तक पत्रकारिता के मापदंडों पर चलता यह मीडिया ग्रुप सरकार के डर से बहुत से विषयों और समाचारों को खा जाता है। और हर चैनलों की तरह संघ तथा सरकार की सीधी आलोचना से बचते हुए शेष मुद्दों पर इमानदार रहता है। मुस्लिमों से संबंधित समाचार कितना भी महत्वपूर्ण हो यह मीडिया समूह भी दोगलापन दिखाता है। प्रचार के लिए इसे भी कंपनियों की कृपा चाहिए तो यह भी उनके काले कारनामों पर चुप ही रहता है।

● न्यूज़ 24 , अनुराधा प्रसाद के स्वामित्व वाला न्यूज चैनल है जो कि केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद की बहन हैं। पूर्व पत्रकार सांसद और आईपीएल के चेयरमैन तथा कांग्रेस के नेता राजीव शुक्ला अनुराधा प्रसाद के पति हैं। इस चैनल के शाम 7:30 बजे से नियमित प्रसारित कार्यक्रम संघ प्रायोजित होते हैं। शेष सभी प्रसारण भी संघ द्वारा निर्धारित मुद्दे पर ही होती है और समाज में कटुता फैलाना , इस्लाम को बदनाम करना इस चैनल का प्रमुख कार्य है। पत्रकारिता के मूल सिद्धांत से बहुत दूर इस चैनल पर आप अंधविश्वास को फैलाते तमाम कार्यक्रम देख सकते हैं। कभी कभी तो “रामसे” की हारर फिल्मों से भी अधिक हारर रिपोर्टिंग।

● एबीपी (न्यूज) का पूरा अर्थ है आनंद बाजार पत्रिका , जो भारत का एक बड़ा समाचार पत्र समूह है , अंग्रेजी का प्रसिद्ध अखबार “द टेलीग्राफ” भी इसी समूह का समाचार पत्र है। इसके मालिक अवीक सरकार हैं तथा इन्हीं अवीक सरकार की बेटी चिकी सरकार देश की पहली फोन पब्लिशर हैं। उनकी नई कंपनी जैगरनट है। जिसमें इंफोसिस के पूर्व सीईओ नंदन निलेकणी, फैब इंडिया के एमडी विलियम बिसेल समेत कई अरबपतियों ने पैसा लगाया है। एबीपी न्यूज के भी तमाम प्रादेशिक चैनल हैं।

यह चैनल भी शुद्ध रूप से संघ नियंत्रित चैनल है जो सरकार तथा मोदी की आलोचना से बचता है। बेटी उद्योगपति जो है। अनजान पत्रकारों का झुंड पैनल डिबेट में बुलाकर यह चैनल भाजपा के लिए चुनाव से पहले सर्वे कराकर माहौल बनाने के लिए बदनाम रहा है। इसी लिए अभी ₹100/= की डील भी इस चैनल के लिए चर्चा में रही है जिसमें ₹45/= करोड़ के साथ इसी चैनल के एक अधिकारी को गिरफ्तार किया गया था । इस खबर को सरकारी एजेंसियों द्वारा ही दबा दिया गया।

● सुदर्शन न्यूज के मालिक सुरेश चव्हाणे हैं और यह और इनका चैनल क्या समाचार प्रसारित करता है यह किसी से छिपा नहीं है। अपने कार्यक्रम “चलते-चलते” में देश के सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान पाए एक सांसद और अपनी पार्टी के प्रमुख को “कुत्ता” बोलता यह सुरेश चव्हाणे मीडिया में भगवा आतंकवाद का एक प्रतीक है जो खुलेआम “आन एयर” अपने को संघ का कार्यकर्ता बोलता है और विश्व हिन्दू परिषद के जहरीले कार्यक्रम को आगे बढ़ाता है। ज़रा सोचिएगा कि घोषित रूप से संघ और विश्व हिन्दू परिषद का घोर समर्थक यह चैनल खुलेआम मोदी और सरकार का समर्थक खुद को कहता है , मोदी विरोधियों को आन एयर गाली देता है । रात दिन समाज में ज़हर फैलाने में लगा यह चैनल किस पत्रकारिता के सिद्धांत पर चलता है आप स्वयं समझिए। क्या देश में ऐसे ही जमायत ए इस्लामी या अन्य मुस्लिम संगठन को चैनल के लिए यह सरकार अनुमति देगी ? डाक्टर ज़ाकिर नाईक का उदाहरण सबके सामने है।

और भी तमाम चैनल और समाचारपत्र हैं जो कमोबेश उपरोक्त सिद्धांत पर ही अपना कर्म निभाते हैं। दरअसल सरकार और संघ के लिए सभी चैनल खेल कैसे खेलते हैं यह इस तरह समझिए।

न्यूज़ चैनलों की बहस में आरएसएस का कोई प्रवक्ता आमतौर पर मौजूद रहता है अधिकतर राकेश सिन्हा , क्युँ उपस्थित रहता है जबकि संघ का राजनीति से लेना देना नहीं यह विचारणीय सवाल है। साथ में संघ संप्रदाय की किसी और शाखा का प्रतिनिधि भी होता है विशेषकर विश्व हिन्दू परिषद के विजय शंकर तिवारी। इसके अलावा बीजेपी का प्रवक्ता तथा उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले एंकर जो किसे बोलने का समय देना है किसे बोलने से रोकना है यह निर्धारित करते हैं। सब कुछ प्रायोजित और निर्देशित होता है कि बहस के अंत में क्या संदेश जाना चाहिए।

इस तरह कुल चार लोग एक सुर में बोलते हुए बाकी बचे एक या दो टुटपुजिया प्रतिनिधि की बहस में धुलाई करते हैं। यह सब अनायास नहीं है। यह सब मीडिया की चाल है और सोची समझी साजिश है और संघ विरोधी को आन एयर गलत साबित करने की रणनीति होती है। क्युँ ना हो ? जबकि पत्रकारिता धनपशुओं के बेडरूम तक पहुँच गयी हो। सरकार और एक राजनीतिक दल के निर्देश और पूँजीपति मालिकों के इशारे पर पत्रकारिता कर रहे समाचार समूहों को “भाँड़” ना कहूँ तो क्या कहूँ ? जहाँ निष्पक्षता दलालों के बेड पर सोती है। अब वह समय भूल जाईये कि जब समाचार पत्र में छपी एक खबर से सरकारें हिल जाया करती थीं।

पत्रकारिता के कुछ एथिक्स होते हैं और वह किसी धर्म , किसी सरकार , किसी व्यक्ति , किसी समाज , किसी भी व्यवस्था , किसी भी औद्योगिक घराने और यहाँ तक कि खुद के देश के प्रति भी निरपेक्ष रहना , जो आज के दौर में टीआरपी , चाटुकारता और अधिक से अधिक स्लाट बेचने की आपाधापी में उसी एथिक्स की चिता जला कर खुद का पेट भर रहे हैं। किसी भी संस्थान को चलाने के लिए धन भी आज आवश्यक है परन्तु पत्रकारिता के मूल एथिक्स को बेचकर ही धन प्राप्त करना आज सभी मीडिया समूहों का मुख्य उद्देश्य है।

तो वह “तेज़पुर एक्सप्रेस” केवल फिल्म में ही दिखेगा और दिखेगा तेज़पुर एक्सप्रेस का वह ईमानदार पत्रकार। देखते रहिए और गर्व करते रहिए।

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4 thoughts on “भारत की भांड और दलाल मीडिया !

  • August 31, 2016 at 10:45 am
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    Deepak Sharma
    24 August at 23:32 ·
    उनके घर के हर कमरे किताबों से भरे थे. फर्श से लेकर छत तक. किताबें ही किताबें. दुनिया का शायद ही कोई ऐसा स्थापित लेखक हो जिसको उन्होंने पढ़ा न हो. और ऐसा कोई नामी अखबार हो जिसे उनकी नज़रों ने मथा न हो. उनका नाम सर शाम लाल था. 1934 में उन्होंने हिन्दुस्ताम टाइम्स से अपनी पत्रकारिता का सफर शुरू किया था और 2007 में अपनी सांस थमने तक वो टेलीग्राफ में लिखते रहे थे. उन्हें इस देश का सर्वाधिक विद्वान, चिन्तनशील संपादक माना गया है.शामलाल की तरह चेलापति राव भी जब अपने संपादकीय लिखते थे तो उन्हें प्रधानमंत्री नेहरू पढ़ते थे और टिप्पणी करते थे. हिंदी में प्रभाष जोशी, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय या राजेंद्र माथुर भी कम विद्वान संपादक नही रहे. इन संपादकों की विचारधारा कुछ भी रही हो लेकिन इनकी विद्वता, इनकी भाषा, इनकी शैली पर आप ऊँगली नही उठा सकते हैं. इनकी सत्यनिष्ठा और सादगी, सवालों से सर्वदा परे रही है.1947 के दंगे हो या आज़ादी का पहर या फिर 1975 का आपातकाल हो या 1977 का सत्ता संग्राम, इन संपादकों ने हमेशा एक ऐसा दर्पण देश को दिखाया था जिसमे रंचमात्र भी खरोंच नही थी.इनके प्रताप को प्रणाम. इनकी निष्पक्षता को नमन.लेकिन दुर्भाग्य इस दौर का है. इस पीढ़ी का है….जिसे कोई शाम लाल नही मिला कोई प्रभाष जोशी नही दिखा.आज देश के किसी भी समाचार पत्र समूह के पास शाम लाल का बोन्साई रूप वाला संपादक भी नही है. विद्वान, तटस्थ, समर्पित, पारदर्शी संपादकों की पीढ़ी खत्म हो गयी है. आज राज्यसभा वाले या सैनिक फार्म में 50 -50 करोड़ के बंगले वाले संपादक आपको अखबार और चैनल के दफ्तरों में मिलेंगे. और अनायास हमने ऐसे छद्म संपादकों को मान्यता भी दे दी है.हमने उनकी छद्म विद्वता को, छद्म निष्पक्षता को प्रमाण दे दिया है, मौन स्वीकृति दे दी है. मित्रों, संपादक के नाम पर जिस देश में शाम लालों को भुलाकर राजीव शुक्लाओं को महिमामण्डित किया जाता हो वहां अगर नई पीढ़ी अब पत्रकारों को प्रेस्टिट्यूट कहने लगी है तो आप विचलित क्यों हो रहे हैं.कब तक आप गेंदे को गुलाब मानकर आत्मछल से ग्रसित रहेंगे. क्यों नही आप स्वीकार करते …कि पाप में भीगे कागज़ पर पुण्य अक्षर कभी नही उभर सकते. देीपक शर्मा

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  • September 2, 2016 at 3:02 pm
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    लेख अपनी जगह सही हे मगर वैसे बता दू की ज़ाहिद साहब जैसे लोग और उनकी मानसिकता बहुत ही बड़ी समस्या हे जैसा की हम कई बार बता चुके हे की ज़ाहिद साहब ( व्यक्ति विशेष की बात नहीं हे बहुत लोग हे ) जैसे पढ़े लिखे पैसे वाले ऊँचे जो समाज पर असर रखने वाले मुस्लिम हे वो बेहद गलत रवैया रखते हे ये कभी मुस्लिम कठमुल्लाशाही कट्टरपंथ के खिलाफ चु भी नहीं करते हे एक लफ्ज़ नहीं बोलते बुरका पर्दा हिज़ाब का महिमांडन करते हे ये डरते हे की अगर मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ कुछ बोला तो पता नहीं आसमान से कौन सी बिजली आकर सीधे इन पर गिरेगी मुस्लिम कट्टरपंथ का तो ये वज़ूद ही नहीं मानते हे अभी मेरा यु पि में ऊँची पोस्ट पर बैठा डॉक्टर कज़िन भी सेम ऐसी ही बकवास कर करके गया हे ये यु बाते करते हे मानो सारी गलती हिन्दू कट्टरपंथ की हे अमेरिका की हे यहूदियो की हे उसकी हे इसकी हे मुसलमानो की कही भी कोई गलती हे ही नहीं —- ? इसलिए ये बड़े आराम से बांग्लादेश के हत्यारो के हिन्दू नाम तक प्रचारित कर रहे हे थे आजकल ओवेसी इनकी आँखों का तारा बना हुआ हे ये लोग खुद अच्छे बने रहते हे और हम जैसे अफ़ज़ल भाई में जाकिर हुसेन सैफुल्लाह खान भाई यानी हम जैसे लोग जो लगातार मुसलमानो की गलतिया बताते ये हमें विलेन बनवा देते हे ————– जारी

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  • September 2, 2016 at 7:25 pm
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    इनकी खुदगर्जी देखिये की दुनिया और आख़िरत दोनों में ये सेल्फिश बने रहते हे ये एक तरफ भारत की भारतीय सविधान की बात करते हे जिसके तहत ये पढ़ा लिखा पैसा वाला भारतीय मुस्लिम ज़ाहिद साहब और मेरे कज़िन टाइप लोग अपने लिए हर हक़ हर अधिकार की मांग करते हे और गाँधी नेहरू सविधान का बनाया निजाम उन्हें देता भी हे जिंदगी में ये लोग तरक्की करते हे ज़ाहिद साहब पैसे वाले हे तो उधर मेरे कज़िन कुल छह कज़िन भाई हे सब के पास अछि सरकारी नौकरियां रहि हे इसके अलावा भी अगर कोई नाइंसाफी हुई हे तो उसके खिलाफ खुल कर लड़ने बोलने का अधिकार सविधान देता हे और आप लेते भी हे ठीक अब अधिकार के बाद जब कर्तव्य की बात आती हे तो ये लोग पीठ दिखा देते हे जब जाकिर नायक या कोई भी मुस्लिम कट्टरपंथी उसी सविधान की धज़्ज़िया उड़ाता हे सेकुलरिज्म को पैरो के निचे कुचलता हे तब ये कुछ नहीं बोलते बल्कि सौ किन्तु परंतु करके उनका बचाव करते हे यहाँ भी इनकी खुदगर्ज़ी की ये सोचते हे की ”जाकिर नायको ” का बचाव करके ये और कुछ नहीं जन्नत में अपनी सीट पर” रिजर्व्ड ” का बोर्ड लगवा रहे हे जैसा की मेने पहले भी बताया था की इसी रवैये के कारण भी संघियो को बहुमत मिला इसी रवैये के कारण भी संजय तिवारी जैसा महाविद्वान दक्षिणपंथी खेमे में चला गया हे अभी तिवारी ने दक्षिणपंथियों के शायद सबसे बड़े फंडिंग समाज पर एक टिपण्णी लिखी थी उसके बाद शायद दक्षिणपंथियों का कोई दबाव आया होगा तो तिवारी ने वो बेहद जरुरी पोस्ट हटा डाली क्योकि दिल अब उसका दक्षिणपंथियों के साथ ही हे इसके लिए दोषी ये ज़ाहिद साहब ( कोई आदमी नहीं साइकि ) जेसो की मानसिकता भि हे जो मुस्लिम कट्टरपंथ को छोड़ कर बाकी हर मुद्दे पर अपनी चोंच खुली रखती हे मुस्लिम कट्टरपंथ का तो ये वज़ूद ही मानने से इनकार करते हे ताकि इनके ऊपर उससे लड़ने की सरदर्दी भी ना आये अब भारतीय और दुनिया भर का लोकतंत्र इन्हें जो बराबरी के अधिकार देता हे उसका ये फायदा लेते हे दुनिया में मज़े फिर कटटरपन्तियो का जबानी सपोर्ट या बचाव कर करके सोचते हे कि आख़िरत सवरेंगी यानि इनके तो मज़े ही मज़े और हम —–? हमारी दुनिया भी ख़राब हमारी आख़िरत भी ख़राब , सारी मुसीबते गालिया गोलिया ताने तिश्ने सरदर्दी सब हमारे हिस्से में हे ना ———?

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  • September 9, 2016 at 10:28 pm
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    Mohd Zahid लाल सलाम :-भारत की राजनीति में सिद्धांत की राजनीति जो यदि कोई करता है तो वह कम्युनिस्ट पार्टियाँ हैं, यदि सिद्धांत और अनुशासन ना होता तो ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ गये होते ,उस समय देश की सभी पार्टियों को स्वीकार्य ज्योति बसु को उनकी पार्टी की पोलित ब्युरो ने प्रधानमंत्री बनने से मना कर दिया तो वह प्रधानमंत्री नहीं बने , यद्यपि वह अपनी पार्टी में इतने सशक्त थे कि पार्टी के निर्णय के विरुद्ध जाकर और पार्टी तोड़कर अथवा विद्रोह करके प्रधानमंत्री बन सकते थे , प्रधानमंत्री बनने के लिए तमाम नेताओं ने ऐसा कियाहीहैपरन्तुमार्क्सवादी लोगों के सिद्धांत के आगे प्रधानमंत्री का पद बहुत छोटा होता है। यह ज्योति बसु ने सिद्ध किया।देश के किसी भी संगठन की तुलना में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विरुद्ध हिंसा , साजिश ,और हथियार इकट्ठा करने के इतने अधिक साक्ष्य हैं कि इसकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना ही देश हित में है।देश की सत्ता पर कब्ज़ा कर चुके संघ पर आज की किसी सरकार ने प्रतिबंध नहीं लगाया , गुजरात के मंदिर में संघ द्वारा इकट्ठा भारी हथियारों की बरामदी हो या ——————– के पूर्व आईजी आईपीएस मुशरिफ ने तो कम से कम 100 से अधिक उदाहरण सबूतों के साथ दिये हैं जिसमें संघ और उसके स्वयंसेवक शामिल रहे हैं । पर सभी सरकारों ने संघ के विरुद्ध कार्यवाही पर सन्नाटा खींच लिया।केरल की सीपीएम सरकार ने वह हिम्मत दिखाई और मंदिरों में संघ द्वारा हथियार जमा करने के प्रमाण मिलने पर संघ की शाखाओं के मंदिरों में लगने पर प्रतिबंध लगा दिया। मंदिरों में पूजा करने तो जाया जा सकता है पर कोई षड्यंत्रकारी संगठन मंदिर में शाखा कैसे लगा सकता है ? और जैसे संघ की हर शाखा में होता है वैसे ही वहाँ हथियार जमा करने की इजाजत कैसे दी जा सकती है ?मंदिर का उपयोग संघ कैसे घटिया तरह से करता है यह देखकर सीपीएम की सरकार ने उसकी शाखाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। यही है सिद्धांत की राजनीति , और मुझे विश्वास है कि यही सीपीएम की सरकार एक दिन संघ पर प्रतिबंध लगा कर देश को राह दिखाएगी। बाकी के लोगों के बक बक पर मुझे बिलकुल यकीन नहीं ।सच में दिल लाल सलाम करने को कह रहा है “लाल सलाम”Mohd Zahid

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