भगवा अदालतें!

Supreme-Court-of-India

कोई भी मुकदमा हो माननीय उच्चतम न्यायालय की आदत हो गई है मुकदमे से जुड़े कुछ पहलुओं पर अनावश्यक टिप्पणी करने की और यह सब शरारतन और जानबूझकर किया जाता है और किसी उद्देश्य और एजेंडे के तहत किया जाता है या अगर निष्पक्ष भी है तो यह निष्पक्षता एक वर्ग को कचोटती है , उनके फैसलों का सम्मान करना ही चाहिए पर बेवजह की टिप्पणीयों को किस उद्देश्य से कहा जाता है इसपर विवेचना आवश्यक है । जस्टिस एआर दवे और एके गोयल की बेंच ने चीफ़ जस्टिस से कहा है कि “मुस्लिम पर्सनल लॉ कि वजह से महिलाओं का एकतरफ़ा तलाक हो रहा है और मर्द एक से ज़्यादा शादियां कर रहे हैं। विरासत और उत्तराधिकार में भी उनसे भेदभाव हो रहा है। चूंकि शादी और तलाक का मज़हब से कोई रिश्ता नहीं है लिहाज़ा गुज़ारिश है कि अदालत इसे ठीक करे।बेंच ने कहा कि यह सही समय है, जब इस मामले पर विचार करने की जरूरत है। सरकार और विधायिका को इस बारे में विचार करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ नीतिगत मसला नहीं है, बल्कि संविधान में वर्णित मुस्लिम महिलाओं के मूल अधिकारों और सुरक्षा का है।”
जस्टिस दवे कौन हैं बताने की आवश्यकता नहीं है ये वही हैं जिनकी इच्छा है कि “यदि देश के वह तानाशाह होते तो देश में गीता पढ़ना अनिवार्य कर देते” , जस्टिस दवे वही हैं जिन्होंने रात्रि के 3 बजे बेंच लगाकर मनुस्मृति का हवाला देते हुए याकूब मेमन को फांसी देने का हुक्म सुनाया था जैसे अगले सुर्योदय के साथ ही दुनिया समाप्त होने वाली हो और याकूब की फांसी ही दुनिया को बचा सकती है।मेरी कोशिश जस्टिस दवे पर शक करने की बिल्कुल नहीं है बल्कि यह शंका जाहिर करना है कि सरस्वती शिशु मंदिर की बीज हर जगह पहुँच कर विष वृक्ष बन गई है और यह सब उसी का परिणाम हो सकता है।

इस्लाम में यदि पुरुषों को बहुविवाह का अधिकार है तो वह शौक पुरा करने या ऐय्याशी करने के लिए नहीं बल्कि इस्लाम का वह लचीला स्वरूप है कि किसी के जीवन में कोई ऐसी परिस्थिति आ ही जाए कि दूसरा विवाह अनिवार्य ही हो तो वह पहली पत्नी के आपसी रजामंदी से वह ऐसा कर सकता है और इसके लिए भी ऐसी शर्तें हैं कि पुरुषों को पालन करने में नानी याद आजाए क्युँकि ऐसा जीवन में आ गई विसम परिस्थितियों को सुलझाने के लिए है ना कि ऐय्याशी करने के लिए है।

दरअसल यह यदि ऐसी समस्या है तो इसका विरोध तो सर्वप्रथम मुस्लिम महिलाओं की ओर से होना चाहिए था परन्तु उन्हे तो इसे लेकर कोई समस्या नहीं और सारी समस्या एक वर्ग के सोच के लोगों को है ।मेरा दावा है कि आप सभी मित्र जो मुस्लिमों को जानते होंगे उनके वैवाहिक जीवन को देखें और बताएं कि कितने मुसलमानों ने दो पत्नियां एक साथ रखी हैं ? तीन चार पांच तो भूल ही जाईये दो भी नहीं मिलेंगी , एक उदाहरण नहीं मिलेगा , मै अपने समाज में ऐसे केवल एक उदाहरण देखता हूँ और वह मेरे मौसा जी का है जिन्होने संतान ना होने के कारण मेरी मौसी की इजाज़त से दूसरा विवाह किया और आज पूरा परिवार खुश है और दूसरी पत्नी ने अपनी एक औलाद के जन्म लेते ही मौसी जी की गोद में रख दिया कि यह आपका है। बल्कि देखें तो गैर मुस्लिमों के लोगों की नाजायज़ रखैल रखने के उदाहरण अनगिनत हैं और इस कारण से घरेलू कलह के उदाहरण अनगिनत हैं ।आप आसपास के मुसलमानों को छोड़िए देश के प्रतिष्ठित लोगों को ही देख लीजिए जिनका कुछ छिपा नहीं तो आपको संभवतः एक भी प्रतिष्ठित मुस्लिम ऐसा नहीं मिलेगा जिन्होंने दो पत्नियां साथ रखीं हों हाँ अन्य उदाहरण अवश्य मिल जाएँगे जो नाजायज़ संबंधों को बनाकर रखैल रखे हुए हैं या थे , मैं ऐसे 5 उदाहरण देता हूँ रखैल रखने के आप कोई प्रतिष्ठित मुस्लिम के दो विवाह का एक उदाहरण देकर दिखाए ।1 – मुलायम सिंह यादव 2-नारायण दत्त तिवारी 3-रामविलास पासवान 4- धर्मेंद्र 5- राजेश खन्ना । अटलबिहारी वाजपेयी की सर्वाजनिक स्विकरोक्ती की वह विवाहित नहीं इसका मतलब यह नहीं कि कुँवारे हैं भी अनैतिक संबंधों की स्वीकृति ही थी।और संपत्ति के बंटवारे की जो चिंता उच्चतम न्यायालय ने मुस्लिम बहुविवाह को लेकर ज़ाहिर की है दरअसल व्यवहारिक में तो ऐसा कुछ है ही नहीं क्युँकि यदि कोई दूसरी पत्नी है तो वह जायज़ है उसकी संताने जायज़ हैं उसे वैसे ही बराबर का हक है जैसे पहली बीवी के संतानों को ।जायदाद की समस्या तो उपरोक्त 5 दिये गये उदाहरण के संदर्भ में है जिसका ताजा उदाहरण नारायण दत्त तिवारी और रोहित तिवारी के नंगे नाच को दुनिया देख चुकी है।सवाल यह है कि नैतिक और स्विकार्य दूसरा विवाह उचित है कि अनैतिक और अस्वीकार्य दूसरी रखैल ?तो इसपर माननीय न्यायालय क्युँ चुप बैठी रहती है ? ऐसे मुकदमों में ढूँढ ढूँढ कर बिलावजह टिप्पणी देना क्या दर्शाता है ? यदि कोई मुस्लिम महिला बहुविवाह के विरूद्ध अदालत जाती तो आप फैसला देते वह हमेशा की तरह स्वीकार होता पर मुकदमा किसी और विषय का और टिप्पणी संघ के सिद्धांतों वाली होती है तो अधिक समझने की आवश्यकता नहीं कि बाबरी मस्जिद का क्या फैसला होने वाला है ।

जहां तक मुझे जानकारी है तलाक और बहुविवाह जिनके धर्म का विषय है उसके मानने वालों को इससे कोई समस्या नहीं है चाहे महिला हो या पुरुष , सारी समस्याएं उन लोगों को है जो समाज में ज़हर फैलाने के उद्देश्य में लगे हैं अन्यथा इस देश में “हिन्दू अविभाजित परिवार” (HUF) को दिये दिये तमाम छूट के माध्यम से देश में बहुत बड़े पैमाने पर घोटाला घपला किया जा रहा है , इनकम टैक्स से लेकर तमाम टैक्स तक में इस नियम के तहत टैक्स की चोरी होती है और सरकार से लेकर न्यायालय तक चुप रहता है , इस देश में मांगलिक दोष होने के कारण बहन बेटियाँ और लड़के मानसिक रूप से प्रताड़ित होते हैं और बहुत तो जीवन भर इसी कारण अविवाहित हो जाते हैं उसपर कभी न्यायालय विचार नहीं करता , एक पत्नी रहते हुए नाजायज़ रखैल रखना और ऐय्याशी करने पर न्यायालय कुछ नहीं बोलता बल्कि पुरुषों को ऐय्याशी करने की और सुविधा “डांस बार” पर रोक हटाकर मुहैय्या कराता है , कभी यह नहीं संज्ञान लेता कि रूपये 20 हजार में बैंकाक और पटाया जाकर लोग किस तरह वहाँ मसाज और सैंडविच मसाज कराते हैं , आधुनिक वैश्याओं के साथ अपने चरित्र को दफन कर आते हैं और इस कारण से घर में परिवार में कलह पैदा होती है और फिर बहुएं तलाक की लम्बी अदालती प्रक्रिया से बचने के लिए जला दी जाती हैं या पंखे में टांग दी जाती हैं।

देश में बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जो वास्तव में समस्याएं हैं उनपर ध्यान देने की बजाए केवल एक धर्म से कुंठा के कारण ऐसे विषय पर टिप्पणी करना जिसका उदाहरण •001% भी नहीं केवल निष्पक्षता पर संदेह पैदा करता है और हाँ “भँवरी देवी” को याद किये कैसे यह लेख पूरा होगा जिसके बलात्कार और हत्या के आरोपियों को अदालत इस तर्क के साथ बाईज्जत बरी कर देती है कि भंवरी देवी एक अछूत थी तो यह आरोपी उसे कैसे छू सकते हैं ?

माफीनामा :- लेख का उद्देश्य केवल टिप्पणी पर विवेचना है ना कि न्यायालय और न्यायधीश के प्रति असम्मान प्रकट करना , फिर भी यदि ऐसा प्रतीत होता है तो मैं माननीय न्यायलय से क्षमा मांगता हूँ ।

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16 thoughts on “भगवा अदालतें!

  • November 7, 2015 at 10:42 am
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    Ye humare desh main hi hai .. Jahan do do kanoon hain,kayun jab bhi common civil code ki bat hoti hai ,to sare bahane samne ane lagte hain.Secular country to chahiye per common civil code nahi.Musilm ladies ka Jo HAL hai sabko pata hai ,mere Jan pehchan main ek ladki hai Jo aaj talak ke liye pareshan hai or Jo hone wala hai OK kaya milega use pata hai or tabiyat se Muslim board ko kos rahi hai,Putin Sahi kehta hai ,one country ,one law,one language nd one people makes nation strong,
    Or end main kuch aisa hai jisse aap logon ko kisi bat se pare shanu nahi hai ,PM ,CM,Court,Police sabse to tang ho kayun,kabhi kehte hai Hume court main bharosa hai or ab nahi,pareshani ye hai sabhi kanoon Jo man mafik page accept karo or Jo na page use dharam ke nam per court ka dakhal samjho,

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  • November 7, 2015 at 11:35 am
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    ब्लॉग लिखते समय याद रखना चाहिए कि शरीर के सबसे ऊपर वाले भाग मे दिमाग नाम का भी कुछ होता हे जिसे इस्तेमाल करना बेहद जरूरी हे !!
    पहले इस्लाम के नियमो पर आपकी गलतफहमी दूर कर दी जाये….

    आप फरमाते हे कि इस्लाम में यदि पुरुषों को बहुविवाह का अधिकार है तो वह शौक पुरा करने या ऐय्याशी करने के लिए नहीं बल्कि इस्लाम का वह लचीला स्वरूप है कि किसी के जीवन में कोई ऐसी परिस्थिति आ ही जाए कि दूसरा विवाह अनिवार्य ही हो तो वह पहली पत्नी के आपसी रजामंदी से वह ऐसा कर सकता है ……
    सवाल्–तो जनाब अगर किसी मुस्लिम महिला का पति किसी परेशानी कि वजह से बच्चा पैदा कार्वा पाने मे सक्षम नहीं हे तो क्या उस मुस्लिम महिला को दूसरे मर्द से निकाह कि इजाजत इस्लाम देता हे ??

    समान नागरिक संहिता यानि यूनिफ़ोर्म सिविल कोड अपनाने मे आपकी शरीयत क्यो रास्ते का पत्थर बन कर खड़ी हो जाती हे ??

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  • November 7, 2015 at 1:32 pm
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    हमारी सामान्य जानकारी के संग नजर भी कमजोर हो चली है, हम आजकल “द” और “ल” में अंतर नहीं कर पाते, इसलिये लेखक का नाम ठीक से पढ़ नहीं पा रहे.

    वैसे तो अगर अदालतें, भगवा हो गयीं हैं तो बहुत अच्छी बात है, क्योंकि भगवा रंग तो बलिदान, त्याग और समर्पण का प्रतीक है. मोहमाया से दूर, मानवीय कमजोरियों से दूर. वीर शिवाजी के झंडे का रंग भगवा ही था, जो आज भी हमारे लिये गौरव का प्रतीक है.

    अदालत को भगवा ही होना चाहिये, तभी वह भगवान की प्रतिनिधि के तौर पर कार्य कर सकेंगीं. जब शासन प्रशासन से या किसी और कारण से कोई कष्ट पाता है तभी तो अदालत की शरण में आता है. अदालत की टिप्पणी पर टिप्पणी करना भी अनुचित हे, पर अदालत की टिप्पणी (जो फैसले पर प्रभाव ना डाले) को उसी अदालत में तथा शेष सभी टिप्पणियों को अगली उपरी अदालत में चुनौती दी जा सकती है.

    लेखक महोदय, यदि इतने ही बेबाक हैं अपने लेख में अंतिम पंक्ति में क्षमा याचना क्यों? हम तो चाहेंगे कि आलिम लेखक महोदय इंसाफ जेहाद करें “अदालत की टिप्पणी” के विरुद्ध.

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  • November 7, 2015 at 2:10 pm
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    अदालते भगवा है क्योकि रात्रि के 3 बजे बेंच लगाकर याकूब मेमन जो की एक भोलाभाला मुसलमान था, को फांसी देने का हुक्म सुनाया गया
    माफीनामा :- टिप्पणी का उद्देश्य स्वतन्त्रता कि अभिव्यकिति के कारण अपने विचार रखना था ना कि किसी के प्रति असम्मान प्रकट करना , फिर भी यदि ऐसा प्रतीत होता है तो मैं उन माननीय से क्षमा मांगता हूँ ।

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  • November 7, 2015 at 3:13 pm
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    मुहमम्द जि ने जो दर्झन भर् “बिबियो के भन्दार्” बनाये थे वह क्या थे ? बाद मे क्या हुआ उन्के परिवार् मे बहुत जयादा घरेलु कलह थेी तभि कुरान् कि आयत् आ गयि कि हम् तुम्को तलाक् दिल्वा देन्गे ! तभेी सौफिया बिबि ने उन्को धिमा जहर देकर मर्वा दिया था ! इत्नि बिबिय होने के बाद भेी दासेी {लौन्देी } मरिया कुब्तेी से सेक्स क्यो किया था क्या उस्से निकाह् हुअ थ ? अफिर उस्से भेी बच्ह भेी पैदा कर लिया क्या इस्को अय्यशेी नहि कहा जय्वेगा !
    मुहमम्द जेी के नवासे फतिमा जेी के बेते हसन जेी ने तो ९० ” बिबियो केी माला ” पह्न् लेी थेी ! आतेी गयेी, जातेी गयेी एक स्मय मे इस्लाम के अनुसार सिर्फ ४ हेी रह्तेी थेी बाद मे क्या हुआ उन्हेी कि एक बेीबेी ने हसन जेी को जहर देकर मार दाला और् बाद मे किसेी दुसरे से निकाह कर लिया थ !
    भारत मे बहु विवह कि बात् कार्ने वालो चेीन जापान अमेरिका फ्रन्स रुस बित्रेन् स्पेन आदि देशो मे मुस्लिम् कि जुवान् क्यो नहि खुल पति जहा सिर्फ् एक देश् और एक कानुन् होता है !

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  • November 7, 2015 at 3:17 pm
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    हसन जेी कि “बिबियो केी माला ” तस्बेीह कि माला मे कितने दाने होते है ? १०० य १०१ !
    अर्थात हसन जि कि बिबियो कि बदेी माला मे सिरफ् १०-११ कम् थेी !

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  • November 7, 2015 at 8:04 pm
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    जाहिद भाई

    आप ने सच्चाई लिखी है उर सच सब को कड़वी लगती है .अगर पति पत्नी आपस में नहीं बनती है तो आराम से अलग होजाते और दोनों ही शादी कर सकते है . हिन्दू धर्म के अनुसार नहीं के दूसरी शादी करनी है तो पत्नी की हत्या कर दो या धर्म बदल कर शादी कर लो . अदालते भी बेवकुफो से भर गयी है .

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  • November 8, 2015 at 1:12 am
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    दरअसल यह यदि ऐसी समस्या है तो इसका विरोध तो सर्वप्रथम मुस्लिम महिलाओं की ओर से होना चाहिए था परन्तु उन्हे तो इसे लेकर कोई समस्या नहीं और सारी समस्या एक वर्ग के सोच के लोगों को है
    जहां तक मुझे जानकारी है तलाक और बहुविवाह जिनके धर्म का विषय है उसके मानने वालों को इससे कोई समस्या नहीं है चाहे महिला हो या पुरुष

    पहली बात तो आपका लेख भी उन्ही बेबस धर्मरकक्षकों जैसा है जो हर हाल धर्म की हर लकीर की फकीरी के लिए २१ वि सदी में भी न जाने क्यों मजबूर है ? जो धर्म के किसी एक शब्द के भी गलत होने को सिरे से नकार देते हैं ! और गनीमत है की आप जैसी सोच वाले लोग तो कम से कम इस देश में न्यायाधीश नहीं है ! नहीं तो यह सब लिखने लायक भी आप न होते !! अब रही आपके वक्तव्यों की बात ,तो हजरात पहले तो आप दावे से कह रहे हो की बहुविवाह से मुस्लिम महिलाओं को कोई समस्या नहीं है क्यों की उनकी और से कोई विरोध नहीं है !! वाह जनाब अब ये एक लेखक जो खुद एक वर्ग विशेष की संख्यात्मक एवं वैचारिक दादागिरी का सदा स्यापा करते रहता है उसी को यह समझाना पड़ेगा की विरोध करने के लिए विरोधक को ऐसे किसी दादागिरी के डर से मुक्त आजादी का माहौल मिलना जरुरी है !!! जो की उन मुस्लिम महिलाओं की किस्मत से भारत का संविधान उन्हें देता है इसीलिए एक्का दुक्का ही सही इस बहुविवाह के विरोध में आवाज उठती है !! इसीलिए आपके दावे में कितना दम है यह आप खुद तय कर लीजिये ! जारी …

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  • November 8, 2015 at 1:27 am
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    और उससे भी पहले आप खुद एक पुरुष होकर आपको महिलाओं की स्वीकृति ,आपत्ति का निर्णय करने याले होते कौन है भाई ?यह अधिकार आपको किसने दे दिया ?? ऐसे तो हर बात पर महिलाओं के जीवनयापन ,और कुदरती फर्क के अनुसार धर्म नियमों के पुरुषों से सर्वथा अलग होने को सही ठहराने वाले को अब महिलाओं के लिए निर्णायक होने में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा ?? जब स्त्री पुरुष कुदरती तौर पर अलग हैं तो जाहिर है उनकी अपनी अपनी समस्याएं ,तकलीफें भी अलग और उनके उपाय भी अलग होंगे ! क्या आप उनके मासिक धर्म की तकलीफ कभी समझ सकते हैं ? तो फिर इससे उनको कोई समस्या तकलीफ है या नहीं इसका फैसला आप कैसे ले लेंगे भाई ?? जारी …

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  • November 8, 2015 at 1:32 am
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    चलो लेकिन इसके बाद भी आपके दावे सिर्फ आपकी जानकारी के बलबूते ही हैं यह आप खुद कह कर खुद अपने ही दावों को शर्मिंदा कर रहे हो ! ये क्या टाइम पास चल रहा है भाई ? क्या अब इस्लाम भीं जहांतक आपकी जानकारी है वहां तक ही सही माना जाएगा ??

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  • November 8, 2015 at 1:42 am
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    और पुन ः कहता हूँ दूसरा ज्यादा बुरा है इसको दिखाकर खुद की कम बुराइयों को सही साबित नहीं किया जा सकता ! लेकिन यह मैं आपसे क्यों कह रहा हूँ भाई ? यह तो उससे कहा जा सकता है जिसे बुरे को बिना किसी डर के बुरा कहने का कलेजा हो । कम और ज्यादा का फर्क समझना अभी आपके लिए बहुत दूर की कौड़ी है !

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  • November 17, 2015 at 8:20 pm
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    अगर एक टिप्पणी भर से अदालत का रंग भगवा हो जाता है तो इतने मासूमों का जेहाद के नाम पर खून बहाने से आतंकवाद का रंग…?

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    • November 18, 2015 at 12:46 am
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      दो टूक !!

      लगता है मैं बेकार में समझाते बैठता हूँ !

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      • November 18, 2015 at 8:42 am
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        नहीं सचिन भाई, आप बेकार नहीं समझा रहे, पर जिन्हें आप समझा रहे हैं वे ज्यादा समझदार हैं… अब देखिये ना…

        अचानक से हमारे देश से असहिष्णुता गायब हो गयी, बीफ का मुद्दा गायब हो गया. अवार्ड वापसी रुक सी गयी. अचानक सब तरफ अमन शांति छा गयी… क्या सिर्फ इसलिये कि चुनाव खत्म हो गये?

        “किसी सयाने ने जरूर तलाश की है,
        सियासत के लिये जरूरत लाश की है.”

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  • November 20, 2015 at 1:06 am
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    इल्जामों के दौर में वो लाशें भी जवान हो गई
    जिसपर किसी रंग का कफ़न था !

    वो तो लाश थी जिसे आबरू का ख्याल था
    नंगी इबादत भी यहाँ बंदगी हो गई

    वो तो बस आंसू थे जिन्हें रंगों का इल्म न था
    बहे आँखों से तो वो काफिरी हो गई

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  • November 20, 2015 at 1:47 am
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    फितरतों का जो हिस्सा मोहताज न था
    इंसानियत नाम से बदनाम हो गया

    जिन्हें किसी जिंदगी से परहेज न था
    उन साँसों से कोई मजहब लिख गया

    जिंदगी के लिए आयते लिखने वाला
    जब मौत को खुदा का दर बता गया

    यहाँ तेरे दर का हर रास्ता जुदा था
    न कोई चैन से जी पाया न मर पाया

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