बौद्ध और जैन शासन को भारत से जिसने मिटा दिया !!!

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अक्सर कुछ लोग बार बार बताते हैं कि नालंदा विश्वविद्यालय जो कि बौद्ध धार्मिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केन्द्र हुआ करता था उसे एक मुस्लिम आक्रान्ता बख्तियार खिलजी ने 1199 ईस्वी मे नष्ट कर डाला था, वैसे मैं इस बात पर तो जोर नहीं देता कि बख्तियार खिलजी दूध का ही धुला था और उसके द्वारा नालंदा को नष्ट किया जाना बिल्कुल असम्भव ही हो,एक सम्भवना है कि बख्तियार खिलजी इस्लाम की शिक्षाओं पर अमल से ज्यादा अपने राज्य प्रसार को महत्व देता हो …। पर मेरे पास ये बात मानने का कोई कारण नहीं है कि इतिहास के सारे धर्म विद्रोही मुस्लिम ही क्यों बताये जाते हैं, और अन्य धर्म वालों को पाप रहित किस कारण समझ लिया जाता है ??

इस्लामी शरीयत मे युद्ध के समय भी शत्रु पक्ष के स्त्रियों, बच्चों व बूढ़े लोगों, सन्यासियों, खेत खलिहान, फलदार पेड़ों, घरों, पानी के स्रोतों, पालतू जानवरों आदि को जलाने या काटने मारने आदि किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाने की सख्ती से मनाही की गई है (इस्लाम के पहले खलीफा हजरत अबू बक्र रज़ि. के मुस्लिम सेनापतियों को दिए निर्देशों के आधार पर )।
वहीं वेद निन्दक को चीर, फाड़, काट डालने व जला कर भस्म कर डालने की शिक्षा वेद मे दी गई है, तो फिर ये विश्वास कैसे कर लिया जाता है कि ऐसा धार्मिक निर्देश होने के बावजूद हिन्दुओं ने तो नालंदा को नष्ट नहीं किया जो वेद निन्दक बौद्ध लोगों की वेद निन्दक शिक्षा का केन्द्र था,

लेकिन इस्लाम मे धार्मिक निषेध के बावजूद मुस्लिमों ने उसे जला डाला ??
हमें मालूम है कि भारत में ज्ञात इतिहास मे सबसे पहले जो शासक थे वे जैन और बौद्ध थे न कि हिन्दू, । बहुसंख्यक जनता भी हिन्दू की बजाय बौद्ध और जैन ही थी … बौद्ध पांडुलिपियो से ज्ञात होता है उस समय भारत मे हजारों की संख्या मे बौद्ध धर्म स्थल हुआ करते थे असंख्य बौद्ध ग्रंथ पाए जाते थे,।
हमने ये भी पढ़ा है कि बौद्ध और जैन शासन को भारत से जिसने मिटा दिया वो हिन्दू शासक थे, वे मुस्लिम नहीं थे … । 187 ईसा पूर्व मे वैदिक धर्मी पुष्य मित्र शुन्ग ने बौद्ध शासक की हत्या कर के न सिर्फ शासन पर अधिकार कर लिया बल्कि उस ने पूरे राज्य मे बौद्धो की हत्याएं करवाई, और अशोक के बनवाये 84000 बौद्ध स्तूप तुड़वा डाले…. बौद्ध पुस्तकालयों को भी पुष्यमित्र ने बड़ी मात्रा मे जलवा डाला, आज भी बौद्ध पाण्डुलिपियो मे पुष्यमित्र के अत्याचारों की दास्तान लिखी हुई हैं ।

स्वामी दयानंद अपनी किताब “सत्यार्थ प्रकाश” मे लिखते हैं …” दस वर्ष के भीतर सर्वत्र आर्यावर्त देश मे घूम कर जैनियो का खण्डन और वेदो का मण्डन किया गया । परंतु शंकराचार्य के समय मे जैन विध्वंस अर्थात् जितनी मूर्तियां जैनियो की निकलती हैं, वे शंकराचार्य के समय मे टूटी थीं, और जो बिना टूटी निकलती हैं , वे जैनियो ने भूमि मे गाड़ दी थीं कि तोड़ी न जाएं ॥ वे अब तक कहीं कहीं भूमि मे से निकलती हैं ।
[ सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 11, शंकराचार्य का अध्याय ]… सन् 1038 के समय चोल वंश के राजेन्द्र चोल ने हर बौद्ध देश पर आक्रमण कर के उनपर कब्जा कर लिया जिनमें रूहमा (वर्तमान बंगाल) से लेकर जावा, सुमात्रा, मलाया और श्रीलंका तक शामिल थे ।

सबसे महत्वपूर्ण बात कि इसी राजेन्द्र चोल ने मगध के तत्कालीन बौद्ध शासक महीपाल को पराजित कर के उसका राज्य अपने अधीन कर लिया था, नालंदा इसी मगध राज्य मे था फिर आप मुझे नालंदा के सुरक्षित रह जाने का कोई ठोस कारण बता दीजिए न मान्यवर ??

खैर जाने दीजिए, मैं आपको मुस्लिमों के भारत का शासक बनने के समय और बाद तक की स्थिति के बारे मे बताता हूँ …. बौद्ध और जैन धर्मस्थल और साहित्य तो मुस्लिमों के भारत मे आने से बहुत पहले ही नष्टप्राय हो चुके थे, हां हिंदू धार्मिक साहित्य यानी चारों वेद, उपनिषद, रामायण के अनेक संस्करण, महाभारत, और अनेकों पुराण आदि प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध थे , और अनेकों हिन्दू मन्दिर देश भर मे मौजूद थे जिन मन्दिरो और धार्मिक साहित्य को मुस्लिम चाहते तो नष्ट कर के अपने धर्म “इस्लाम” के प्रचार का मार्ग प्रशस्त कर सकते थे .पर मुस्लिमों के उत्तर भारत मे पहले शासक यानि मोहम्मद गौरी के समय से ही मुस्लिम शासकों ने सर्वधर्म समभाव की नीति अपनाई थी और गौरी ने अपने सिक्को पर हिन्दू देवी लक्ष्मी की आकृति उकेरवाई थी

एक भाई साहब कहते हैं कि मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं का तलवार के बल पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाए… देख रहा हूँ कि आगरा की घटना के बाद “जबरन धर्म परिवर्तन” के मामले पर भाई लोग कुछ ज्यादा ही आत्मरक्षात्मक मुद्रा मे आ गए हैं, और मौका बेमौका, मांगे बेमांगे जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर सुने सुनाए, पिटे पिटाए तर्क दिए डाल रहे हैं …।
लेकिन न तो ये भाई लोग इस्लाम को समझते हैं कि जो एकमात्र ऐसा धर्म है जिसमें जबरन धर्मान्तरण की मनाही है … न हिन्दू धर्म त्यागकर मुस्लिम बन गए हमारे पूर्वजों के बारे मे ये भाई कुछ जानते हैं … बस हिसाब बराबर करने को कुछ भी बोल देते हैं । करो बराबर किसने रोका है फिर भी सिमट ही रहे हो ना !!!
खैर आपको इतिहास से इतना तो जानना चाहिए कि भारत के मुस्लिम शासकों की राजनीति क्या हुआ करती थी …. जैसा कि मैंने बताया कि धर्म के प्रचार प्रसार को लेकर इस्लाम कभी धर्मातुर होना नहीं सिखाता, इतिहास के कुछ तथ्यों के गलत अर्थ लगाकर भारतीय मुस्लिम शासकों पर जबरन धर्मान्तरण के आरोप यूं ही गढ़ लिए गए हैं … ।
लेकिन जब भारतीय मुस्लिम शासकों का इतिहास पढ़ें तो पता चलता है कि मुस्लिम शासकों ने किसी भी अन्य धर्म के शासक की अपेक्षा सबसे ज्यादा खुले दिल से दूसरे धर्मों के रीति रिवाजों को न सिर्फ आज़ादी दी बल्कि खुद उन रीति रिवाजों मे खुलकर भाग भी लिया,।

तुगलक ने जमकर होली खेली तो मुगलों ने दीवाली, और पारसी त्योहार नवरोज़ जमकर मनाए… अकबर तो बाकायदा अपने महल मे लक्ष्मी गणेश की पूजा भी करवाता था, और इस्लाम मे अनुमति न होने के बावजूद पूजा मे भाग भी लेता था ..अरे भाई जोधा बाई जैसे आई थी अकबर के महल मे वैसे ही तो रहती थी न ……….एक लल्ला भी जना शेखू !! ……. बहरहाल …!!
मोहम्मद गोरी ने अपने राज्य के सिक्कों पर देवी लक्ष्मी की आकृति उकेरवाई, तो अकबर ने राम और सीता जी की अवध और आन्ध्र के नवाबों, रूहेलखण्ड के शासकों, टीपू सुल्तान व सभी मुगल बादशाहों ने कई हिन्दू मन्दिरो व अन्य धर्मों के धर्मस्थल बनवाने मे भरपूर सहयोग दिया … और मुगलों ने हिंदू धार्मिक साहित्य, जैसे रामायण, महाभारत, गीता आदि का तुर्की और फारसी आदि मे अनुवाद कर के उसे देश विदेश तक पहुंचाया…. कहाँ गया मुस्लिमों का धर्म को लेकर पागलपन ???

आज भारत मे इतनी भारी संख्या मे हिंदू इसीलिए हैं, क्योंकि 800 साल के अपने शासनकाल मे मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं या अन्य धर्मावलम्बियों को धर्मान्तरण के लिए कभी मजबूर नहीं किया …॥हां इसी मुस्लिम शासनकाल मे हम जैसे अनेकों हिन्दुओं ने इस्लाम स्वीकार किया था तो उसके पीछे हिंदू धर्म की जटिल जाति व्यवस्था यानी मनुस्मृति के बरअक्स इस्लाम की वैश्विक बंधुत्व की भावना का सम्मोहन था, मुस्लिम संतों का प्रभाव था, और इस्लाम की व्यावहारिक शिक्षाओं के प्रति आकर्षण था …. न कि किसी तलवार का भय…!!!

मुस्लिमों ने किसी गैरधर्म की पवित्र पुस्तकों को नष्ट किया हो ऐसा कहीं लिखा नहीं मिलता उल्टे इन्हीं मुसलमानों ने दूसरे धर्म (हिन्दू धर्म, क्योंकि बौद्ध साहित्य उस समय भारत मे न के बराबर उपलब्ध था ) की धार्मिक किताबों का विदेशी भाषाओं (फारसी तुर्की आदि) मे अनुवाद कर के भारतीय धर्म के प्रचार प्रसार मे सहयोग ही किया …। मुगलकाल मे ही महाभारत का तुर्की और फारसी मे नकीब खान और बदायूंनी द्वारा अनुवाद किया गया, बदायूंनी ने रामायण का भी फारसी मे अनुवाद किया । हरिवंश पुराण का मौलाना शेरी ने, भगवद् गीता का दारा शिकोह ने, राज तरंगिणी का मुल्ला शेख मुहम्मद ने अनुवाद किया …। इसके अतिरिक्त सिंहासन बत्तीसी, नल दमयंती, पंचतन्त्र और लीलावती का भी तुर्की फारसी आदि मे मुगलकाल मे ही अनुवाद किया गया जिन्होंने विदेशों मे भारतीय संस्कृति का विज्ञापन करने का काम किया था ॥ दूसरी ओर इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि तुलसीदास जी ने रामचरित मानस, और मीराबाई व सूरदास ने कृष्ण भक्ति के पद मुगलकाल व मुस्लिम शासकों के शासन के भीतर ही लिखे, जिनका धार्मिक तानाशाही के दौर मे लिखे जाना और सुरक्षित रह जाना बिल्कुल असम्भव था,…।

फिर मुस्लिमों के आने से पहले के अनेकों मन्दिर जैसे कैलाश मन्दिर, खजुराहो के मन्दिर, कोणार्क का सूर्य मन्दिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर, पुरी के जगन्नाथ मन्दिर आदि जैसे अनेकों मन्दिर आज भी सुरक्षित मिलते हैं । यदि मुस्लिम मन्दिर तोड़ने ही भारत आए थे तो इन्हें तोड़ा क्यों नहीं …. बल्कि इतिहास तो ये बताता है कि उत्तर भारत के तीर्थ नगरों मे सर्वाधिक मन्दिरो का निर्माण तो मुस्लिम शासकों के सहयोग से ही हुआ …. यानी जिन्हें मन्दिर तोड़ने वाला प्रचारित किया गया है उन्होंने ही मन्दिर बनवाए थे ।

….. इसलिए मुस्लिम अपने धर्म का प्रचार और अन्य धर्मों का दमन करने की मानसिकता से भरे हुए थे मुझे इन आरोपों मे सच्चाई नही बल्कि साजिश ज्यादा नजर आती है ।
हां कुछ इतिहासकारों का ये मत जरूर तर्कपूर्ण लगता है कि (यदि बख्तियार खिलजी ने नालंदा को नष्ट किया तो) समाभवत: खिलजी ने नालंदा को सैन्य दुर्ग समझकर नष्ट कर दिया था … ऐसा भी तब हो सकता है जब नालंदा का इस्तेमाल तत्कालीन शासक की सेना किले के तौर पर खिलजी पर आक्रमण करने के लिए कर रही हो … यही तर्क विश्वास योग्य है …. क्योंकि किसी भी तर्क और तथ्य से ये सिद्ध नहीं होता कि मुस्लिमों की प्रवृत्ति दूसरे धर्म का नाश करने की रही हो ॥

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9 thoughts on “बौद्ध और जैन शासन को भारत से जिसने मिटा दिया !!!

  • September 18, 2016 at 5:34 pm
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    बेहतरीन लेख ।।

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  • September 19, 2016 at 7:32 am
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    लेख सोशल मिडिया के हिन्दू कठमुल्लाओ की पर्तिकिर्या में लिखा गया हे और पर्तिकिर्यवाद ही सही नहीं होता हे अगले की गलत गलत बात के जवाब में आप भी काउंटर गलत बात और इतिहास की ऐसी तैसी करते रहते हे कोई फायदा —- ? इससे कोई फायदा नहीं होता हे सिर्फ आपकी भड़ास निकलती हे और कुछ नहीं परिपक्व लोग बात करते हे विचार विमर्श करते हे भड़ास नहीं निकालते हे ये चाइल्डिश लोगो के काम होते हे एक तो मेरी सलाह यही हे नेट हो या फेसबुक कुछ अच्छे लोगो और कुछ अच्छी साइटों को चुन ले सिर्फ उन्हें ही पढ़े या फिर अच्छी किताबे पढ़े सोशल मिडिया पर बहुत ना भटके वहां लोगो ने हद से ज़्यादा गन्द मैच रखी हे मेने पहले ही बताया की तिवारी जैसा अच्छा भला विद्वान अपनी अछि चलती साइट बन्द करवा के फेसबुक पर जम गया और माहौल ही ऐसा हे की अब वो एक विद्वान संपादक और लेखक नहीं एक मामूली दक्षिणपंथी भड़ासिया बन चुका हे मेरी तो यही सलाह हे की सोशल मिडिया पर कम ही समय बिताए या कुछ अच्छे लोगो को ही पढ़े

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  • September 19, 2016 at 7:48 am
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    विनीत कुमार की ये बात सोशल मिडिया पर भी सही हे खासकर हिंदी में कई लोग बेहद गन्द मचा रहे हे इनमे आजतक जैसे चेनेल का एक पत्रकार तक भी हे बदले में इन्हें सिर्फ लाइक शेयर फॉलोअर मिलते हे और कुछ नहीं जिससे फायदा कुछ नहीं हे मगर उस पर ये किसी नशेड़ी की तरह झूम उठते हे ये बहुत ही घटिया खेल ये लोग कर रहे हे . खेर विनीत कुमार ने जो लिखा वो इन पर भी फिट हे लिखते हे ” मीडिया एक समानांतर हिंसा में सक्रिय हैःमुझे टीवी से बेहद प्यार है लेकिन अब न्यूज चैनल देखते हुए डर लगता है. ऐसा लगता है कि उनके हिस्से की हिंसा मेरे दिमाग में न कब्जा जमा लेगी. छोटी-छोटी चीजों पर समझौता करते मीडियाकर्मियों को जब बड़े मुद्दे पर स्टैंड लेते देखता हूं तो घबराहट होती है. बड़े मुद्दे मतलब कश्मीर, पाकिस्तान, अमेरिका..आखिर जीवन के स्तर पर मैनेज होकर जगत के स्तर पर कैसे स्टैंड लेने का कौशल सीख जाते हैं ये ?आप अपने शब्दों के जरिए, काम की बदौलत समाज को साक्षर, बेहतर और पहले से और अधिक मानवीय नहीं कर सकते तो रहने दीजिए न. आपको ये हक किसने दे दिया कि आप उसे पहले से और अधिक हिंसक, अमानवीय, क्रूर और कबाड़ बना दें. ये भी राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी है. इंसान से बड़ा संसाधन इस देश के लिए कुछ भी नहीं है.पानी, हवा, मिट्टी, परिवेश को गंदा करने से जो संकट पैदा हो रहे हैं, उससे कई गुना आप देश के दिमागों को गंदा कर रहे हैं. उनमे अपनी कुंठा, हताशा, बेचैनी इस कदर भर दे रहे हैं कि वो चीजों को बिना समझे डस्टबिन बन जाए.आपको कोई हक नहीं है कि आप लगातार एक समानान्तर युद्ध में, हिंसा में, दंगे में देश की नागरिक-ऑडिएंस को झोंक दें. ” विनीत कुमार

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  • September 20, 2016 at 1:31 pm
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    मुझे एक बात समझ से परे लगती है कि इतिहास के चंद 1-2% शासक वो चाहे हिंदू हो या मुसलमान, पूरे समाज के प्रतिनिधित्व कैसे हो सकते हैं. पृथ्वीराज चौहान की हार, कैसे हिंदुओं की हार हो गयी है. औरंगजेब की जीत कैसे मुसलमानो की जीत हो गयी?

    ग़रीब मुसलमान, नवाबो के दौर मे भी ग़रीब रहा. दलित हिंदू, पृथ्वीराज और शिवाजी के दौर मे भी अछूत ही रहा. रनिवास और हरम अय्याशि के अड्डे रहे, सभी दौर मे रहे तो जनता के विकास कार्य भी हर दौर मे रहे होंगे. इतिहास के किसी एक पुरुष को त्रुटि-रहित महापुरुष, और उसके विरोध मे लड़ने वालो को खलनायक की तरह प्रस्तुत करके, हम इतिहास के साथ भावुकता का तड़का लगा कर उससे छेड़खानी कर रहे है. झूठ की बुनियाद पे खड़ी इमारत ज़्यादा दिन नही टिकती.

    ये बात सही है कि तमाम मुस्लिम, और मुगल शासको, जिनमे औरंगजेब भी शामिल था, ने दूसरे धर्मो के पूजा स्थलो के निर्माण मे सहयता करी. लेकिन दूसरे धर्म के कट्टरपंथियों के झूठ का जवाब देते हुए, इन सत्ता के लालची सुल्तानो को हीरो ना बना बैठे. जैसे आज हमारे पड़ौसी पाकिस्तान ने क़ासिम से लेकर, गौरी ग़ज़नवी को हीरो और पृथ्वीराज, शिवाजी को खलनायक बता कर, तारीख से छेड़छाड़ करी. युद्ध के गुणगान करने वाली कौमे, दूसरी कौमो के लिए तो ख़तरा बनती ही है, खुद के समाज मे भी कभी शांति स्थापित नही करती.
    क्रूर, जालिम शासको के महिमा-मन्डन का नतीजा है कि हिंदुओं के सफ़ाए के बाद भी मुस्लिम बहुल पाकिस्तान, इस्लाम के नाम पे ही मुसलमानो को मार रहा है.

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  • September 20, 2016 at 1:38 pm
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    जहाँ तक बात है, इस्लाम को जानकर उसे अपनाने की तो धर्म-परिवर्तन करने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं पे ये लागू नही होता. जिस देश मे जहाँ आज भी साक्षरता दर इतनी कम है, वहाँ हज़ार साल पहले क़ुरान और हदीसो को जिन्हे अरबी मे लिखा गया है, को पढ़ने और समझने वाले लोग कम ही होंगे.

    धर्म परिवर्तन के लिए अन्याय-पूर्ण जाति व्यवस्था ही ज़िम्मेदार नही थी. अनेक हिंदू राजाओ ने, जिन्होने मुसलमान सुल्तानो से मजबूत राजनैतिक संबंध बनाने के लिए धर्म-परिवर्तन किया, उन्होने ग़रीब मुसलमानो के साथ कभी खाना नही खाया, जबकि राजपूत, और ब्राह्मण उनकी दरबारो की शान बढ़ाते थे.

    अब मुझे लीजिए, मैने महज 3 साल की उम्र मे कलमा पढ़ा (मुसलमान बना), लेकिन उस समय मुझे किसी भी भाषा का 1 भी अक्षर पढ़ना नही आता था.

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  • September 20, 2016 at 1:53 pm
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    बिलकुल खासकर मुग़ल सत्ता के डाउनफॉल के दिनों में तो दिल्ली के ऊँचे हिन्दू मुस्लिमो ने एक जैसी संस्कर्ति मेल मिलाप बना लिया था बाकियो को यानी तथाकथित छोटे हिन्दू मुस्लिमो को तो ये घास ही नहीं डालते थे आपस में मस्त रहते थे जाकिर भाई भाई इतनी मामूली सी समझ इन मूर्खो को नहीं होती हे जो हिन्दू शासन मुस्लिम शासन का राग अलापते रहते हे की 90 -99 % शासक एक जैसे होते हे सभी का मकसद अपनी सत्ता और उसकी सुरक्षा करना होता हे ना की कुछ और अब समझिये ये इतना बेहुदा बेसुरा राग हे जो हर दूसरा मुस्लिम फेसबुकिया गा रहा होता हे की की मुस्लिम शासक चाहते तो सारे मंदिर तोड़ देते चाहते तो सबको मुस्लिम बना लेते —- ? अरे कैसे बना लेते भाई — कैसे ? जब वो ये करने की कोशिश करते तो उसी टाइम कोई दूसरा मुस्लिम शासक या उसका भाई ही हिन्दुओ को सेकुलरिज्म की दुहाई देकर अपनी तरफ करके उस ” गाज़ी ” का तख्ता उल्ट देता

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  • May 4, 2017 at 7:41 am
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    नेट पर मौजूद ऑनलाइन इन्साइक्लोपीडिया ” wikipedia ” और ” bharatdiscovery ” जैसे ज्ञान का खजाना ज्ञान परोस रहे हैं कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5 वीं सदी में गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने की है । हाँ , हाँ , वही कुमारगुप्त प्रथम जिसने ” अश्वमेध महेन्द्र ” की उपाधि धारण की थी और अश्वमेध यज्ञ रचाए थे ।
    कुमारगुप्त प्रथम क्या , उनके पूर्वज राजाओं ने भी बड़े – बड़े अश्वमेध यज्ञ रचाए थे । मुद्राओं पर शंख , चक्र , गदा और पद्म उत्कीर्ण कराए थे। भारत में मंदिरों का जन्म दिए थे तथा उनमें कई देवी – देवता की मूर्तियाँ स्थापित कराए थे ।
    हाँ , हाँ , वहीं गुप्त राजे – महाराजे जिन्होंने संस्कृत को राजभाषा का दर्जा दिए थे , जिनके राजध्वज गरुड़ांकित थे और जिनके अभिलेख शिव , विष्णु आदि की स्तुति से आरंभ होते थे ।
    ऐसे गुप्त राजे – महाराजे जिनकी बौद्ध विचारधारा को भारत और भारत के बाहर फैलाने में सर्वाधिक नगण्य भूमिका रही है , भला वे बौद्ध विचारधारा को सर्वाधिक तेजी से फैलाने वाले प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कैसे कर सकते हैं ?
    वैचारिकी ( जुलाई – अगस्त 2015 ) में एपिग्राफिका इंडिका (20,43 ) का हवाला तो यह बताता है कि बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन ( प्रथम – दूसरी सदी कुषाण काल ) प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के शोधार्थी थे तथा भारत में जब नागार्जुन मौजूद थे , तब कुमारगुप्त प्रथम क्या , उनके बाप – दादों का भी जन्म नहीं हुआ था

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  • July 8, 2017 at 1:09 am
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    एक बार फिर गणित की सहायता से सच ढुंढने का प्रयास करते है……

    भारत ने हिंदु जनसंख्या – ८५ करोड
    भारत मे मुस्लिम जनसंख्या – १७ करोड
    पाक मे मुस्लिम जनसंख्या – १८ करोड
    बांगलादेश मे मुस्लिम जनसंख्या – १४ करोड
    ( ईस जनसंख्या को प्रतीशत मे ऱख कर १७ वि सदी मे परावर्तीत करे )

    यानि की समुचे भारत खंड मे (स्वतंत्रता पुर्व काल) ४०% आबादी ईस्लाम मे परिवर्तीत हुवी. अब ईसमे जबरन या अपनी ईच्छासे देनो ही मार्ग से धर्म परिवर्तन हुवा होगा ईस तथ्य को कोई झुठ नही कह सकता है. जो हुवा वो ईतीहास है, वो बित गया. वही कुरेदना है या खुष रहना है ये हर किसीको तै करना है. ऊत्क्रांती के नियमानुसार हम सब बंदर से ईन्सान तक सफर कर चुके है. जंगलमे नंगे घुमनेसे लेकर जिन्स तक पोहोचे है. खानाबदोश भी रहे थे और अब पक्वान और लजीज जायके खारहे है. आदीमानव से आधुनीक मानव के सफऱ मे हम जानवर भी थे और सोच रखने वाले ईन्सान है.

    ईताहास मे जिन लोगोने जुल्म ढाये वो नही रहे. अब किसीको अच्छा या किसीको बुरा साबित करने से हमारा पेट नही भरने वाला है. चलो मै ही कहदेता हु सभी मुसलमान नेक थे हिंदु बुरे थे. पेट भरगया आपका, क्या पेन्शन मंजुर होगई जिवन भरकी.
    आप अच्छे हो या बुरे, संत हो या आतंकवादी कुदरत जब पाणी बनती है तो सबकी प्यास बुझाती है और जब वही कुदरत आग बनती है तो सबको जलाती है.

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