बाजारू भगवान और भारत रत्न

Tendulkar

क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर से भारत रत्न वापस लेने के लिए जबलपुर हाईकोर्ट में दायर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली गई है। याचिका कर्ता का कहना है कि वे अपनी प्रसिद्धि का उपयोग विज्ञापनों में काम करके व्यवसायिक लाभ के लिए कर रहे हैं जो भारत रत्न की गरिमा के खिलाफ है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट इस याचिका में सचिन तेंदुुलकर के खिलाफ फैसला सुना सकता है।

सचिन तेंदुलकर के खिलाफ यह कार्रवाई ऐसे समय सामने आई है जब क्रिकेट की दुनिया के एक और किंग आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी की मदद सरकार में बैठे लोगों द्वारा करने की वजह से राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। मोदी गेट के नाम से चर्चित हो चुके इस मामले में आज प्रधानमंत्री से सहमति लेकर गोवा के मुख्यमंत्री ने राज्य के पुलिस कमिश्नर का जवाब तलब किया है। उनसे अंतरंग संबंध के नाते राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद नाराज हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जब उन्हें मुलाकात देने का समय देने से इनकार कर दिया था तब तो यह तक अफवाह फैल गई थी कि राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन किया जाएगा लेकिन बाद में संघ का दबाव पड़ा तो मोदी को उन्हें अभयदान देना पड़ा। अगर ललित मोदी की बिनाह पर वसुंधरा राजे को हटाया जाता तो फिर शायद सुषमा स्वराज की भी केेंद्रीय मंत्रिमंडल से विदाई तय करनी पड़ती। संयोग से दोनों को ही लेकर प्रधानमंत्री शुरू से ही सहज नहीं हैं। वसुंधरा राजे पर एक ओर तो राजनाथ सिंह का ठप्पा लगा हुआ है तो दूसरी ओर उन्होंने शुरू में मोदी को नजरअंदाज करने की कोशिश की थी इसलिए मोदी को उनसे अपना हिसाब चुकता करने का अवसर मिला तो राजनाथ आड़े आ गए। इस समय संघ भी मोदी के पार्टी और सरकार में निरंकुश वर्चस्व को भविष्य के लिए ठीक नहीं मान रहा और राजनाथ की ट्यूनिंग संघ प्रमुख से बहुत अच्छी है इसलिए संभव है कि संघ प्रमुख ने भी वसुंधरा राजे के लिए वीटो लगा दिया हो। इस समय सरकार की उपलब्धियों के चर्चे एक कोने में पड़ गए हैं जबकि चर्चाओं के केेंद्रबिंदु में भाजपा की अंदरूनी उठापटक छाई हुई है जिसका नुकसान मोदी को अपनी लोकप्रियता के क्षरण के रूप में देखने को मिल रहा है।

बहरहाल असल मुद्दा यह है कि कांग्रेस तो आधुनिकों की पार्टी होने की वजह से करने से रही थी लेकिन परंपरा और संस्कृति की बात करने वाली भाजपा का नेतृत्व भी क्रिकेट को बदनाम खेल के रूप में संज्ञान में लेने के लिए तैयार नहीं है जबकि हकीकत यही है। क्रिकेट का खेल राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए कलंक है क्योंकि यह केवल उन देशों में खेला जाता है जो कभी न कभी इंगलैंड के गुलाम रहे। इस मनोवैज्ञानिक नफरत को छोड़ भी दिया जाए तो देश की जलवायु की दृष्टि से यह खेल भारत के लिए अनुपयुक्त है। इस खेल में दस साल के अंदर सौ से भी कम खिलाड़ी ऐसे तैयार होते हैं जो अरबपति और खरबपति बनने की कोटि में पहुंच जाएं लेकिन करोड़ों किशोर जो उनका अनुकरण करते हैं क्रिकेट के खेल में गर्म मुल्क होने की वजह से अपनी बहुमूल्य ऊर्जा बर्बाद कर देते हैं। चिकित्सक और स्वास्थ्य विज्ञानियों का मत इस बारे में लिया जा सकता है। चतुर देश ऐसे खेल को अपनाते हैं जो पेशेवर खिलाडिय़ों के कैरियर को चमकदार बनाए लेकिन साधारण लोग ऐसे खेलों के लिए प्रेरित होकर बेहतर तंदरुस्ती की नैमत हासिल कर सकेें। चीन ने एथलीट और जिमनास्ट पर जोर देकर खेलों के चुनाव में एक उदाहरण स्थापित किया है जिससे नशे की लत में गर्क वहां के नौजवानों का स्तर सुधरा और उन्होंने नशे से छुटकारा पाकर अपनी ऊर्जा व प्रतिभा का भारी लाभ उस देश के विकास में दिया। दूसरी ओर भारत है जिसको आजादी के समय विरासत में राष्ट्रीय खेल के रूप में हाकी मिली थी जिससे यहां के नौजवानों में भारी स्फूर्ति का संचार होता था लेकिन देश की जलवायु के अनुकूल फुटबाल, कुश्ती, दौड़ आदि खेलों से मुंह मोड़कर यहां क्रिकेट के प्रति जिस तरह का मोह दिखाया गया वह आश्चर्यजनक है।

क्रिकेट कुछ लोगों के फायदे की चीज है। इसने यह साबित कर दिया कि इस देश में आम आदमी बाजार के खिलवाड़ की कठपुतली भर है। क्रिकेट के जरिए सट्टेबाजी गांव गांव तक पहुंची और युवा पीढ़ी को इसने पूरी तरह से अपने में ग्रसित कर लिया है जिसकी वजह से नैतिक संस्कार छिन्नभिन्न होकर रह गए हैं। जाहिर है कि इस सट्टेबाजी से किंग बनने वाले ललित मोदी जैसे लोग अपनी जीवनशैली से लेकर देशप्रेम तक में उच्छृंखल रवैए का प्रदर्शन करते हैं। क्रिकेट लंपट पूंजी को बढ़ावा देती है जिससे दूरगामी तौर पर मूल्यों पर आधारित मानव सभ्यता का विगलन हो रहा है। दूसरी ओर क्रिकेटरों के भी जीवन का एक ही ध्येय है कि वे इसके इंद्रजालिक तानेबाने के कारण लोगों में अपने प्रति बुने गए सम्मोहन को कैसे कैश कराएं। इसके लिए वे उनकी अपने प्रति आस्था का दोहन तमाम कंपनियों के बेजा प्रोडक्ट को बिकवाने में करें। क्रिकेटरों को मौका मिला है तो वे ज्यादा पैसे के लिए देश की टीम छोड़कर प्रतिद्वंद्वी विदेशी टीम में शामिल होने से भी नहीं हिचके। इनका सामाजिक सरोकारों से कोई लेनादेना नहीं है। सिर्फ अपने ऐश्वर्य के लिए जीने वाले लोगों को इस देश की परंपरागत व्यवस्था में वे कितने भी समृद्ध क्यों न हो जाएं कभी सम्मान नहीं मिला लेकिन आज उसी कोटि में आने वाले क्रिकेटर भगवान का दर्जा हासिल कर रहे हैं। भगवान का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है। सचिन तेंदुलकर के मंदिर बन गए और उन्हें भगवान का खिताब मिल गया। रही सही कसर उनको भारत रत्न देकर पूरी की गई। हालांकि यह काम मोदी सरकार ने नहीं मनमोहन सरकार ने अपनी राजनीतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया था लेकिन जब आप सांस्कृतिक आक्रमण के प्रभाव को दूर करने और देश की गौरवमयी मान्यताओं को बहाल करने की शपथ लेकर सत्ता तक पहुंचे हैं तब आपको तो दृढ़ता दिखानी चाहिए लेकिन यह तब हो सकता है जब आप में अंदर अपनी चीजों को लेकर नाज हो। जिस वैभव को पश्चिमी प्रतिमानों के तहत श्रेष्ठता के रूप में स्थापित किया गया है उसके आगे नतमस्तक होकर अपनी शपथ भूल जाना आंतरिक दरिद्रता और हीनभावना का परिचायक है। इस देश ने उन्हें अलंकृत किया है जो समाज के लिए जिए हैं और जिनका जीवन त्याग का दूसरा रूप है। गांधी के लिए महात्मा और जयप्रकाश जी के लिए लोकनाायक के अलंकरण पर कोई सरकार मोहर नहीं है लेकिन यह अलंकरण भारत रत्न से नहीं नोबेल पुरस्कार से भी ऊंचे हैं और रहेंगे।

इन महापुरुषों को समाज द्वारा दी गई स्वत: स्फूर्त उपाधियां जो महिमा की एवरेस्ट साबित हुई उनसे कुछ सीखा जाना चाहिए कि उपाधियों का हकदार भारत जैसे देश में किस आचरण के लोग हैं। जबलपुर हाईकोर्ट सचिन तेंदुलकर के बारे में जो भी फैसला करे लेकिन भारत सरकार को इससे पहले ही सचिन से पूछ लेना चाहिए कि वे वेंडरगीरी बंद करने को तैयार हैं या नहीं और अगर उच्च स्तर की मर्यादा का वरण करने का ताव उनमें नहीं है तो उनसे सर्वोच्च नागरिक अलंकरण क्यों न छीन लिया जाए। साथ ही क्रिकेट के खेल के महिमा मंडन पर मोदी सरकार को उसी तरह विराम लगाने की शुरूआत कर देनी चाहिए जैसे विदेशी फंडिग से देश के अंदर हस्तक्षेप बढ़ाने वाले गैर सरकारी संगठनों के प्रति उसने सख्ती की है। क्रिकेट को भगवान के दर्जे से नीचे लाने का काम केवल एक औपनिवेशिक खेल को उसकी औकात तक सीमित करने का ही काम नहीं होगा बल्कि यह प्रस्थान बिंदु है जिससे सारे संसार और भारतीय समाज को यह संदेश देने की शुरूआत होनी चाहिए कि हिंदुस्तान बाजारवाद का मोहरा भर नहीं है। वह तरक्की करेगा लेकिन बुनियादी नैतिक मान्यताओं और मर्यादाओं की परिधि के अंदर। समाज में जो सचमुच सत्यम शिवम सुंदरम है उसे बनाए रखते हुए प्रगति की लीक गढऩे का काम भारत को करना है। मायावी बाजार के सम्मोहन में अंधे हो जाना भारत को शोभा नहीं देता। इस दुनिया के निकृष्ट होते जा रहे प्रतिमानों को बदलना चाहिए और यह काम भारत को करना है। खासकर संस्कृतिवादी सरकार के युग में इस लक्ष्य से कोई समझौता गवारा नहीं होना चाहिए।

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7 thoughts on “बाजारू भगवान और भारत रत्न

  • June 22, 2015 at 2:27 am
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    सचिन को भारत रत्न सम्मान मिलना ही भारत रत्न की अहमियत खत्म कर देता है ! आखिर उन के किस योगदान के लिये भारत रत्न दिया गया समझ मे नही आ रहा है . अगर खेल के लिये देना है तो होकक्य के जादूगर धयान चन्द ही सिर्फ इस कसौटी पे उतारते है. सचिन ने सिर्फ अपने लिये खेला है और अपने रेकॉर्ड को बनाया है.

    भारत रत्न वापस लेना चाहिये ताके इस का सम्मान बना रहे. अटल बिहारी बाजपेयी को भी भारत रत्न नही मिलना चाहिये था.

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    • June 22, 2015 at 11:36 am
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      देश के किसी भी प्रधानमंत्री को भारत रत्न नही मिलना चाहिये था नेहरू ,इंद्रा ,राजीव शास्त्री, वाजपेयी सभी के सभी असफल रहे है

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      • June 22, 2015 at 11:39 am
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        सच यह है की कांगेस ने भारत रत्न का दुरपयोग किया जिसे बजप ने आगे बड़ाया

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  • June 22, 2015 at 11:13 am
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    जिनकी सोच , फैसला और वजह से सचिन को “भारत रत्न” पुरस्कार ( स्व. ध्यान चंद की फाइल को दबाकर ) आनेवाले दिनों में उनकी चलने लगी तो

    कोई आश्चर्य नही होगा अगर ” भारत रत्न ” पुरस्कार की नीलामी लगाने लगे ,
    जैसे आईपीएल के खिलाडियों की नीलामी होती है ।

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  • July 6, 2015 at 8:02 pm
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    कुछ दिनों पहले जब सलमान को सजा हुई तो एक वर्ग खुद को ये दिखाने के लिए वो पूरी तरह निष्पक्ष हे जबरदस्ती में सलमान की समाजसेवा को किसी गिनती में नहीं रख रहा था इसलिए नीरेंदर नागर जी के ब्लॉग पर इस विषय में लाबी बहस हुई थी मेने तभी कहा था की भारत में हालात इतने कठिन हे की सच्ची समाजसेवा बहुत कठिन हे इसलिए अरबो कमा रहे सेलिब्रेटी समाजसेवा से दूर ही रहते हे सिर्फ सलमान ही ये सिरदर्दी लेते हे तो हमें उन्हें सपोर्ट करना ही चाहिए लेकिन सपोर्ट तो दूर बल्कि तहलका और इंडिया टुडे के शेखर गुप्ता टाइप लोग सलमान के पीछे ऐसे पंजे झाड़ कर पड़े की अभिजीत और एक जोकर टाइप अभिनेता के बेहूदा ब्यानो को भी ऐसे पेश किया मानो ये सलमान ने ही कहा हो खेर जो हमने कहा था वो अब सलमान भी कह रहे हे वो कहते हे ” हालांकि सलमान कहते हैं कि उनके लिए ये पता लगाना कई बार मुश्किल होता है कि सामने वाला कहीं उन्हें बेवक़ूफ तो नहीं समझ रहा है.
    सलमान बताते हैं, “कई लोगो ने तो हमें बेवकूफ समझ ही लिया है. सोचते हैं कि चलो सलमान पैसे बाँट रहा है, इससे ले लो.”
    उनके मुताबिक़, “मुझे पता चला कि कई लोग कमीशन लेते हैं और कहते हैं, हम सलमान से तुम्हे पैसे दिला देंगे लेकिन बदले में मुझे दस परसेंट देना.”

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  • October 31, 2017 at 3:55 pm
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    Devanshu JhaYesterday at 13:32 · महान सचिन बनाम बड़े कोहलीकल कोहली ने जब एक दिवसीय मैच में अपना बत्तीसवां शतक जड़ दिया तब मैंने दो लाइन की पोस्ट लिखी कि इसी रफ्तार से कोहली खेलते रहे तो तेंदुलकर की नरक चतुर्दशी तय । यानी उनका रिकॉर्ड टूटना तय । इसके बाद तो महानतम तेंदलुकर के अन्यतम प्रशंसक पिल पड़े। जिनमें से कुछ अकाट्य तर्कशास्त्री भी शामिल थे । सबने कालगणना की । तेंदुलकर के समय के महान गेंदबाजों को गिनाया, क्रिकेट के नियम में आने वाले बदलाव बताए । और कोहली को उनके सामने बहुत छोटा ठहरा दिया ।इस पोस्ट पर आगे बढ़ने से पहले मैं साफ कर दूं कि सचिन तेंदुलकर का बहुत बड़ा प्रशंसक मैं भी रहा हूं । भला कौन सा भारतीय न रहा होगा ? पचासों बार मैंने उनके आउट होते ही मैच देखना बंद किया है । लेकिन सचिन के कमजोर पक्ष पर मैंने पहले भी बहस की है आज भी करूंगा । सचिन के समय के जिन महान गेंदबाजों को उन्होंने कथित तौर पर खेला, उनके नाम देखिए…वॉल्श…ब्रेट ली.. अकरम.. वकार.. मैक्ग्रा..शेन वॉर्न.. पोलाक…एलन डोनाल्ड वगैरह, वगैरह ।कर्टनी वॉल्श ने 2001 में अलविदा कह दिया था । सचिन ने वेस्ट इंडीज के खिलाफ 21 मैचों में 54 की औसत से 1630 रन बनाए । तीन शतक हैं । वॉल्श के समय में खेलते हुए उन्होंने नागपुर में 179 रनों की पारी खेली थी । उसके बाद कोई शतक नहीं है । दो तीन मर्तबा अस्सी पार तक गए हैं । वेस्ट इंडीज में नब्बे के दशक से ही महान गेंदबाजों का अकाल पड़ने लगा था । एम्ब्रोज़ और वॉल्श उन महान गेंदबाजों की अंतिम पीढ़ी के गेंदबाज थे और रफ्तार में मार्शल.. होल्डिंग, क्राफ्ट, गार्नर से बहुत कम थे ।पाकिस्तान के साथ सचिन ने 18 टेस्ट में 42 की औसत से 1057 रन बनाए हैं जिसमें दो ही शतक हैं और सात अर्धशतक । ये हाल तब है जब उन्होंने वसीम अकरम और वकार को उनके तूफानी दिनों में बिलकुल नहीं खेला । 1989 से 1999 तक भारत पाकिस्तान में कोई टेस्ट सीरीज नहीं हुई थी । ये वसीम और वकार का श्रेष्ठ समय था ।दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सचिन ने पच्चीस टेस्ट में 1741 रन बनाए हैं । औसत बयालीस का है । सात शतक हैं और पांच अर्धशतक हैं । दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ उनकी दो पारियां .यादगार हैं ।ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सचिन का रिकॉर्ड सबसे अच्छा है । 39 मैचों में 3600 से ज्यादा रन हैं । 11 शतक और 16 अर्धशतक शामिल हैं । इंग्लैंड, और श्रीलंका के खिलाफ भी उनका रिकॉर्ड अच्छा है । बांग्लादेश जैसी महान टीम के खिलाफ उनका औसत 136 का है । यहां उन्होंने नौ टेस्ट में पांच शतक भी ज़ड़ दिये हैं । इसी तरह से जिम्बाब्वे के खिलाफ उनका 76 का औसत है । ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ इतना अच्छा रिकॉर्ड होने के बावजूद वहां के तेज गेंदबाज वीवी एस लक्ष्मण को आउट करने की चिंता ज्यादा करते थे। क्योंकि वीवीएस लक्ष्मण ने मगर के जबड़े से शिकार छीना था । वहां के सभी बड़े गेंदबाज लक्ष्मण के आगे नतमस्तक रहे हैं ।खैर, सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि सचिन एक संपूर्ण खिलाड़ी होकर भी भरोसे की परीक्षा पास नहीं कर सके । उनके सुदीर्घ करियर में अनगिनत मौकों पर नाकाम होने के उदाहरण हैं । दर्जनों बड़े मौकों पर वे उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सके । दूसरी पारी में पीछा करते हुए उनका रिकॉर्ड खराब रहा है । तकनीकी तौर पर मजबूत होने और सब तरह के शॉट्स खेलने में निपुण होने के बाद भी सचिन को क्रीज पर देख कर दीवार जैसा एहसास नहीं होता था । यह डर हमेशा उनके साथ बना रहा कि अगली बाल पर चौका मारने की कोशिश में सचिन आउट हो सकते हैं या डोनाल्ड और अख्तर उनका मिड्ल स्टंप उखाड़ कर फेंक सकते हैं ।याद रहे, सचिन और कोहली के दौर में कोई बहुत फर्क नहीं है । गेंदबाजों की दुर्दशा का दौर तो नब्बे के दशक से ही शुरू हो गया था । सन दो हजार पांच में वेस्ट इंडीज के महान गेंदबाज एंडी रॉबर्ट्स ने कहा था कि फास्ट बॉलर खत्म हो गए । सचिन ने भी बल्लेबाजों के प्रभुत्व वाले दौर में खेला और दबदबा बना कर रखा ।सचिन और विराट में बड़ा फर्क ये है कि विराट चुनौतियों पर अदम्य हठ के साथ खड़े होने वाले अक्खड़ बल्लेबाज हैं । पीछा करते हुए बड़े बड़े स्कोरों को पछाड़ देना उनकी आदत है । और सचिन चुनौतियों के आगे कई मौकों पर विफल होने वाले बल्लेबाज रहे । ये बात क्रिकेट के सभी महान खिलाड़ी और पूर्व आलोचक मानते हैं । अगर सचिन ने अपनी इस कमी को पार पा लिया होता तो वे महानतम होते ।
    विराट कोहली ने अपने दौर के बेहतरीन गेंदबाजों, जैसे कि डेल स्टेन, एंडरसन, मुहम्मद आमिर, मिशेल स्टार्क, स्टुअर्ट ब्रॉड, जोश हेजलवुड, रवाडा और टिम सउदी को शानदार तरीके से खेला है । उनके पास हर तरह के शॉट्स हैं । मानसिक रूप से गजब की दृढ़ता है और दुनिया के दिग्गज बल्लेबाज मानते हैं कि कोहली असाधाऱण हैं ।इन सब दलीलों में कोई दम नहीं होता कि तब ऐसा क्रिकेट था, अब ऐसा है । इन्ही दलीलों के साथ लोगों ने सचिन को ब्रैड़मैन से बड़ा बताने की कोशिश की लेकिन ब्रैडमैन इकलौते रहे ।सचिन में अपार क्षमता होने के बावजूद किलर इंस्टिंक्ट नहीं था । जो भरोसा रिकी पॉन्टिंग और इंजमाम उल हक अपनी टीमों और देश को दे सके वो सचिन इतने लंबे और अविश्वसनीय रूप से महान करियर के बाद भी नहीं दे पाए ।
    सचिन की महानता से कोई इन्कार नहीं कर सकता । जो करे वो मूरख लेकिन सचिन अपराजेय नहीं थे। बल्कि सहज ही पराजेय थे । उनके खिलाफ विरोधी टीमों की छोटी-छोटी रणनीतियां कारगर होती थीं । जैसे कि दक्षिण अफ्रीका के हैन्सी क्रोनिए या फैने डीविलियर्स के पास सचिन को आउट करने की चाभी थी । वैसी ही चाभी पाकिस्तान के अति साधारण गेंदबाज अब्दुल रज्जाक के पास थी ।अकरम उन्हें जब-तब छका देते थे । यहां तक कि पाकिस्तान के खिलाफ विश्वकप में उनकी 98 रनों की यादगार पारी में भी 35 रनों पर अकरम ने उन्हें छका दिया था लेकिन सौभाग्य सचिन का कि रज्जाक ने कैच गिरा दी ।
    हैरत की बात य़े है कि इतने शतक जड़ने वाले सचिन और इतनी लंबी पारी खेलने वाले सचिन की एक पारी तक को विज़डन ने सर्वकालीन सौ पारियों में नहीं रखा है, जबकि उसमें वीवी एस लक्ष्मण की 281, राहुल द्रविड़ की पारी, गावस्कर की तीन पारियां शामिल हैं । उनके समकालीनों में लारा और पॉन्टिंग की पारियां शामिल हैं ।जिस रिकॉर्ड के नाम पर कल मुझे ज्ञान दिया गया । वो रिकॉर्ड ही सचिन की थाती है । जबकि मैट्ल की बात करूं तो उनमें बड़ी और जुझारू पारियों का माद्दा नहीं था । इतने लंबे करियर में वो दर्जनों बार बेहतरीन खेले, भारत को जीत दिलाई या हार से बचाया लेकिन दर्जनों बार बहुत शर्मनाक रूप से परास्त हुए ।कोहली अभी अपने जीवन के सबसे सुनहरे दौर से गुजर रहे हैं । उनका स्थैर्य ही आभूषण है और युद्ध में स्थिर रह कर सामने वाली टीम को पस्त कर देने का दम उनमें अद्वितीय है । नायकत्व के गुण उनमें सचिन से बड़े हैं, भले ही क्रिकेट की कला या खूबसूरत शॉट्स खेलने में वो सचिन से कमतर हों ।

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  • January 21, 2018 at 1:25 pm
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    एकतरफ भाउ के साथ मिलकर हँसते खेलते भीखू महात्राओ को निपटा देने वाले कल्लू मामा ने बीस किलो वजन कम कर लिया हे वही उंगुलियों पर गिने जा सकने वाले आज के सही पत्रकारों में से एक अभिषेक श्रीवास्तव की बढ़ते वजन के साथ तबियत चिंताजनक लग रही हे अपना ध्यान रखे Abhishek Srivastava
    Yesterday at 19:16 ·
    (दो महीने की मोहलत के वास्ते मित्रों के नाम एक ख़त)
    जितना याद पड़ता है, नवम्बर के आखिरी हफ्ते से मुझे नींद नहीं आ रही थी. औसतन पांच घंटे सोने के मेरे अभ्यास में कम से कम चार बार खलल पड़ रहा था. इस पर ध्यान नहीं गया था. हाँ, एक चीज़ लगातार बढती गयी- नींद में बोलना. इधर बीच उसका चरम दिखा जब खुद अपने ही बोले को सुनकर मैं नींद से जग जा रहा था. जब ध्यान गया तो पत्नी जी से कहा कि पता करो क्या बोलता हूँ. उन्होंने रिकॉर्डिंग शुरू की. एक दिन मैं चिल्ला रहा था कि रैली की परमीशन नहीं मिली. एक दिन फोन पर किसी को जस्टिस लोया का केस समझा रहा था विस्तार से. अधिकतर बातचीत अस्पष्ट ही होती थी. फिर एक दिन पत्नी जी को लेकर डॉक्टर के यहाँ गया तो लगे हाथ अपना बीपी भी नपवा लिया. सारा बखेड़ा यहीं शुरू हुआ.
    न कोई लक्षण, न दर्द, न अहसास, लेकिन बीपी 200 की तरफ दौड़ लगाता हुआ. पता चला इसे malignant hypertension कहते हैं जो silent stress से पैदा होता है. चुपचाप सफेद गोली लेकर आ गया. समस्या दो दिन बाद बिलकुल सामने आ गयी… खून आँखों में उतर आया! दो दिन आँख लाल रही, पानी झरता रहा. इस दौरान की एक रीडिंग 191/145 सुनकर एक डॉक्टर भड़क गए. बोले, तुम्हें ICU में होना चाहिए. आनन फानन में उन्होंने अस्पताल तीसरे डॉक्टर के पास भेजा. उसने भर्ती नहीं किया. इन्टरनेट पर पढ़ा तो अंदाजा लगा कि यह वाकई जानलेवा स्थिति थी: या तो किडनी बोल जाती, आँख की रौशनी चली जाती या फिर चुपके से ब्रेन हैमरेज हो जाता! फिर भी गोली खाता रहा.
    अंततः परिवार के दबाव में बाज़ार की शरण जा पहुंचा. तमाम टेस्ट हुए. एकाध विटामिनों को छोड़ दें तो सारे अंग दुरुस्त. किसी का बीपी से कोई लेना देना नहीं. डॉक्टर बोले मामला रहस्यमय है और दर्जन भर दवा लिख दिए. पूरी तरह जेब साफ़ करने और सबको पैनिक में डालने के बाद मुख्यधारा के डॉक्टरों ने भी वही कहा- silent stress है. जो बात मैं फ़ोकट में समझ रहा हा था, जो बात होमियोपैथी के मेरे डॉक्टर देख कर समझ गए थे, वही बात सारे कर्मकांड के बाद जानकार विद्वानों ने कह दी. इस देश में डॉक्टरी पढने लिखने का कोई मतलब है या नहीं? बवाल अगर खोपड़ी में था तो पूरे देह की जांच क्यों करवाई? किसी ने प्यार से दिमाग को सहलाया तक नहीं?अब दो दिन से जनता की बारी है. वजन कम करो, खाना कम खाओ, साइकेट्रिस्ट को दिखाओ, सोचो मत, फेसबुक मत करो…. डेढ़ सौ सलाह मिल चुकी है. कोई नहीं बता रहा कि ये silent stress और anxiety आया कहाँ से? सिर्फ मैं जानता हूँ इसका जवाब, लेकिन मैं मने क्या? कुछ नहीं. तो मित्रो, इतने लम्बे अपडेट के बाद एक विनम्र निवेदन है सबसे. जब तक बहुत ज़रूरी न हो, फोन न करें. मिलने घर आ जायें, गप कर लेंगे आधा घंटा. कार्यक्रमों में मेरे आने की उम्मीद न करें. फोन पर बात को संक्षिप्त रखें क्योंकि कल से दो बार दीवार पर फोन मार चुका हूँ और इसमें मेरा कोई दोष नहीं. चिडचिडाहट और उत्तेजना उत्कर्ष पर है इस वक़्त. कोई आपात स्थिति होगी तो सूचना अपने आप पहुँच जाएगी. कम से कम दो महीने की मोहलत चाहता हूँ सार्वजनिक रायते से. रहूँगा यहीं, सारे मंचों पर. दिखूंगा कम. लिखूंगा कम.मुझे थोडा वक़्त चाहिए खुद के लिए. उम्मीद है आप सब समझेंगे. बहुत सोच समझ कर लिख रहा हूँ. सबको अलग अलग जवाब देते थक गया हूँ. सबका शुक्रिया. प्लीज, कमेंट में सुझाव मत दीजियेगा. सहानुभूति पर्याप्त रहेगी.अभिषेक श्रीवास्तव ” ———————– बात ये हे की कल्लू मामा तो पूरी उमंग में हे इनका हद से ज़्यादा अच्छा समय चल रहा हे जो ये चाह रहे हे अल्लाह का करना की सब वही हो जाता हे इसी कारण कल्लू मामा का वजन भी घट गया होता यही हे की लाइफ जब स्मूथ चल रही हो जैसा आप चाह रहे हो वैसा ही हो रहा हो तो उतेज़ना में भूख भी कम हो जाती हे खाने पर कंट्रोल हो जाता he एक्सरसाइज़ में भी मन लगता हे लेकिन जब हम तनाव में होते हे तो व्यायाम भी नहीं होता भूख ज़्यादा लगती हे हम खाने चाय वाय को स्ट्रेस बस्टर की तरह यूज़ करते हे और वजन बढ़ता जाता हे हां ये जरूर हे की अत्यधिक हद से ज़्यादा तनाव में भूख मर जाती हे मगर सामान्य तनाव में लगातार रहने पर भूख बहुत लगती हे हम बहुत खाते हे एक्सरसाइज़ का जोश नहीं रहता हे यही वजह हे की मोटापा सभी का बढ़ रहा हे सात मई से पहले मेने ज़बर्दस्त फिटनेट हासिल कर ली थी पंद्रह साल की मेहनत के बाद दुनिया का सबसे मुश्किल काम आँख खुलते मुँह अँधेरे बिस्तर छोड़ देना ये भी सिख लिया था मेराथन फुटबॉल स्लम के बच्चो की पानी की बीस बीस लीटर की केन उठाकर दोसो तीन सौ मीटर चल कर पहुंचना और भी कई एक्ससरसाइज खबर की खबर भी ग्रोथ कर रहा था जब अफ़ज़ल भाई ने बताया की राजस्थान से एक बिज़नेसमेन ने खुद फोन करके सपोर्ट और एड देने को कहा हे तब तो में बेहद जोश में था भूख लगना कम हो गया था गज़ब की ताकत और फिटनेस महसूस कर रहा था फुल मेराथन की तैयारी थी तभी 7 मई को जस्टिस लाया से भी बहुत छोटे बड़े भाई को भी गल्फ में ही संदिग्द हालात में अटेक आ गया चार दिन कोमा में रहे नहीं बचे उसके बाद से दुखो तकलीफो समसयाओ के अम्बार लग गए lekh लिखना व्यायाम दौड़ना सब छूट गया एक महीने तक अत्यधिक तनाव से कुछ नहीं खाया गया मगर उसके बाद जैसे ही तनाव सामान्य होता हे उस तनाव में भूख ज़्यादा लगती हे आप खाने पिने को स्ट्रेस बस्टर की तरह इस्तेमाल करते हे और वजन बढ़ रहा हे ये हे फिटनेस का चक्रव्यूह इसी तनाव में फंस कर सारा समाज मोटापे का शिकार हो रहा हे https://www.youtube.com/watch?v=wFqX7W1FzQs

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