बदलाव परिवर्तन में ”फायदा ” नहीं होता हैं —–?

By-  सिकंदर हयात     

50 हज़ार फॉलोअर  वाले ज़ाहिद साहब ने जंतर मंतर काण्ड पर  लिखा    ” काटे जाएँगे” वाला नारा लगाने वाले बुज़दिल होते हैं। इनकी औकात नहीं कि यह उसी हुलिए में एक मुस्लिम बहुल इलाके से गुज़र जाएँ ,”    तो हमारा कहना ये हैं उनसे    (  व्यक्ति विशेष ही ना समझे  मुद्दा कुछ और हैं  , तो  व्यक्ति नहीं  मुद्दा समझे )   हमारा कहना ये हैं की    बात सही हैं ये आपकी बेहद कायर होते हैं ये कटटरपंथी मगर . ——    मगर आप तो वीर हैं ,  इनको छोड़िये ना ,   आप क्यों नहीं अपने विचारो को लेकर सोशल मिडिया के हिन्दू कटटरपंथी जैसे संजय तिवारी सुशोभित वगैरह   सेकड़ो   भाजपा समर्थक  नाम की वाल पर जाकर अपने विचार क्यों नहीं रखते हैं———–?     

उनके विचारो उनके फेक  न्यूज़  इंडस्ट्री  प्रोपेगेंडा  etc की काट अपने विचार तर्क और तथ्यों से क्यों नहीं करते हैं ——————? क्या आप   भी उनकी सोशल  मीडिया   गलियों से गुजरने से डरते हैं वहाँ ऐसे भी तो बहुत से पाठक होंगे जो अभी सेकुलरिज़्म  के पक्ष विपक्ष  में डांवाडोल होंगे तो आपने उन्हें क्यों नहीं टारगेट करके उन्हें गैर  भाजपा खेमे  में पहुंचाने का काम क्यों नहीं करते हैं ————-?  ———-? .            

 इस मामले में सिद्धार्थ ताबिश भाई की तारीफ करनी होगी की हालांकि इस्लाम छोड़ चुके हैं , मगर फिर भी एक बहुत खतरनाक कटटरपंथी a सिंह की वाल पर जहाँ ”मुसलमानो की घर वापसी कैसे हो ” विषय पर सेमिनार चल रहा था . ताबिश भाई वहाँ पहुंच गए बहस की और उन्हें समझाया की ” मूर्खो मुसलमानो की घर वापसी   छोड़ो पहले तुम दलितों आदिवासियों की फ़िक्र करके उन्हें अपने धर्म में रोक लो तो   वही बहुत हैं etc  ”                                         

 इस तरह से बहस करके आप   आम जनता को हिंदुत्ववादी कटटरपंथियो के खेमे से निकाल कर , देश को भाजपा और भाजपाइयों के शोषण से बचा सकते हैं . मेने आज तक आपको कही ये काम करते नहीं देखा हैं————-? आप रोज अपने समर्थको से ही बात करके खुश होते रहते हैं अच्छा हैं खुश रहने में बुराई नहीं हैं , मगर उससे कोई चेंज नहीं होने वाला हैं .       

  जहाँ तक हमारे सवाल हैं हमने तो 2010 से 2015 तक ये काम बहुत किया बहुत बहुत लोगो को तर्कों तथ्यों विचारो बहस से बहला फुसला कर उनका ”धर्मपरिवर्तन ”   किया याने उन्हें    कांक्रीट           सेकुलर बनाया .  मगर 2015 के बाद हमने ये काम छोड़ दिया क्योकि तब देखा की  एक       खास तरह के      कटटरपंथियो को  सरकारी संरक्षण प्राप्त हो गया हैं उससे भी हम नहीं डरते हैं मगर कोई ढाल भी तो हो ——–? बिना किसी ढाल के लड़ना ——? वीरता नहीं मूर्खता होती हैं सो हमने मूर्खता नहीं की

बात असली ये हैं की    गेम समझ रहे हैं ये ———? क्या होता हैं ये ———–? ( व्यक्ति विशेष की बात नहीं हैं व्यक्ति विशेष की तरफ ना समझे )   फंडा ये होता हैं की किसी को बदलना नहीं हैं , किसी को किसी के विचारो को बेहतर नहीं बनाना हैं , नहीं वो सरदर्दी नहीं लेनी हैं – वो मेहनत और ज़हमत नहीं लेनी हैं    फिर पता नहीं अगला बदलने ना बदले हमारी सालो की ज़हमत और   इन्वेस्टमेंट  बर्बाद हो . बल्कि जो हैं जैसा हैं उसे वैसा ही माल पेश करके उसे अपने पीछे लगाकर उसे अपनी भीड़ अपनी मार्किट बनाना हैं .(  भाजपा  मानसिकता के लोगो की भी   पूरी  राजनीति यही हैं  )  .     

 अच्छा हम भी बरसो से साफ़  शुद्ध  सेकुलरिज़्म के लिए एक्टिव हैं तो उसमे हमारा कोई फायदा नहीं होता हैं , क्योकि धीरे धीरे  हम  जब आदमी को बदलते हैं तो वो बदल जाता हैं धीरे धीरे           कई बार देखा की हां बदलता हैं ,      मगर बदलता हैं तो बदलता हैं मेहनत और ज़हमत बहुत लगती हैं ,  लेकिन  उसमे हमारा कोई फायदा नहीं हैं . ,  वो इस   ” पर्किर्या  ” में हमारा अनुयायी नहीं बनता हैं कोई क्रेडिट तक नहीं देता हैं वो हमे नहीं पूछता हैं ————-?   

जबकि जो जैसा था ही तो उसे और वैसा ही माल पेश करो तो उस सूरत में वो वो  ‘ आपका      ‘ ‘  दीवाना  प्रशंसक दर्शक अनुयायी फॉलोअर फेन पंखा टेबिल फेन  हार्डकोर फैन   etc  etc  ” कुछ ना कुछ तो बनता ही हैं मगर ” बदलो ” तो उसमे कुछ नहीं बनता हैं  ————-?

sikander hayat .

                      

 

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