बच्चे’ जो पैद हो गये उन्हें तो बचाओ पहले !

bache

नई सरकार इंडिया फर्स्ट के नारे पर आई थी, सुशासन, और विकास के नाम पर आई थी, मगर बयानों का ऐसा सिलसिला शुरु हुआ है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। महीने भर से जो बयान सुनने को व देखने को मिले हैं वे किसी सभ्यसमाज होने के दावे को निरस्त कर देते हैं। पहले साक्षी महाराज ने कहा था कि हिंदुओ को चार बच्चे पैदा करने चाहिये। उसके बाद साध्वी प्राची ने इस संख्या में एक और इजाफ किया और चार की बजाय पांच बच्चे पैदा करने की सलाह दे डाली, बात यहीं खत्म हो जाती तो ठीक थी मगर जोशीमठ उत्तराखंड के जगद्गुरु स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने कह दिया कि हिंदुओं को पांच नहीं बल्कि दस बच्चे पैदा करने चाहिये। बयान बेतुका जरूर है मगर उसका दूसरा पहलू यह भी है कि अब तक इन तीनों बयानों में एक समानता यह भी है कि यह तीनों बयान ऐसे लोगों द्वारा दिये गये हैं जो धर्मगुरु होने का दंभ भरते हैं। अगर बच्चे पैदा करना ही खुद को हिंदुत्वादी साबित करना है तो फिर दवाई की कमी, या कुपोषड़ की वजह से मर जाने वाले बच्चों के कातिल कौन हैं ? वो डाक्टर जिन्होंने फीस की वजह से उनका उपचार नहीं किया या फिर उनके मां बाप ? अगर बच्चों की इतनी ही चिंता है तो पहले जो बच्चे मर रहे हैं उनको बचाया जाये। सितंबर 2014 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया में सबसे ज्यादा बच्चे भारत में मरते हैं केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल सात लाख 60 हजार बच्चे 28 दिन की उम्र से पहले ही दम तोड़ देते हैं। यह संख्या दुनिया भर में नवजात बच्चों की होने वाली मौत का 27 प्रतिशत है। पिछले 24 साल के दौरान नवजात बच्चों की मौत का आंकड़ा लगभग आधा करने के बावजूद अभी इस दिशा में काफी कुछ किया जाना बाकी है। वर्ष 1990 में जहां देश भर में 13 लाख नवजात बच्चों की मौत हो जाती थी वहीं वर्ष 2०12 में यह संख्या घटकर सात लाख 60 हजार पर आ गई। इसके बावजूद यह संख्या दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है।

जन्म के पहले चार सप्ताह के दौरान मरने वाले सात लाख 60 हजार बच्चों में 72.9 प्रतिशत तो जन्म के पहले सप्ताह में ही दम तोड़ देते हैं जबकि 13.5 प्रतिशत दूसरे सप्ताह में और शेष 13.5 प्रतिशत तीसरे तथा चौथे सप्ताह मे काल के शिकार हो जाते हैं। देश में बाल मृत्यु (पांच साल तक के बच्चों की मौत) की दर 52 प्रति हजार है। इसमें 56 प्रतिशत (या 29 प्रति हजार) बच्चे 28 दिन की उम्र से पहले ही दम तोड़ देते हैं। इसके अलावा हर एक हजार प्रसव में 22 बच्चे मरे हुए पैदा होते हैं। आंकड़ों के मुताबिक देश के अलग-अलग राज्यों में नवजात मृत्युदर में काफी भिन्नता है। सबसे अच्छी स्थिति केरल में है जहां यह दर सात प्रति हजार है। वहीं सबसे खराब स्थिति ओडिशा और मध्य प्रदेश में है जहां नवजात मृत्यु दर 39 प्रति हजार है।
इनके अलावा उत्तर प्रदेश (37), राजस्थान (35), छत्तीसगढ़ (31) और जम्मू-कश्मीर (3०) ऐसे राज्य हैं जहां नवजात मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। वहीं केरल के अलावा तमिलनाडु (15), दिल्ली (16), पंजाब (17) और महाराष्ट्र 18 ऐसे राज्य हैं जहां यह दर 20 से कम है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी नवजात मृत्यु दर में बड़ा अंतर देखने को मिला है। शहरी क्षेत्रों में यह दर 16 प्रति हजार है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 33 प्रति हजार है। संख्या के आधार पर सात लाख 60 हजार नवजात मौतों में उत्तर प्रदेश में 27 प्रतिशत, मध्य प्रदेश और बिहार में 10-10 प्रतिशत, राजस्थान में आठ प्रतिशत और आंध्र प्रदेश तथा गुजरात में पांच-पांच प्रतिशत मौतें होती हैं। इतना सबकुछ घटित हो रहा है और प्रतिवर्ष होता है बजाय इसके कि सरकार से यह सवाल किया जाये कि बच्चे मर क्यों रहे हैं उल्टे इसके बरअक्स फतवाबाजी हो रही है। क्या यह एक सभ्य समाज की पहचान है ? क्या विकास का रास्ता इन्हीं बच्चों की कब्र से होकर गुजरता है ? यह सच है कि ऐसे फतवों पर लोग ध्यान नहीं देते मगर क्या एक धर्मगुरु को इस तरह की भौंडी सलाह देनी चाहिये जिससे असभ्य होने का ढ़िंढोरा सारी दुनिया में पिट जाये ?

(Visited 32 times, 1 visits today)

3 thoughts on “बच्चे’ जो पैद हो गये उन्हें तो बचाओ पहले !

  • January 19, 2015 at 6:23 pm
    Permalink

    सरकार ने कोई ऐसी बात नही की है वो अपने काम से काम रख रही है जनता यदि कोई बात उठाती है तो सकारात्‍म सभी धर्म व जातीयों पर लागू होनी चाहिए खबर नवीस इस सम्‍बन्‍ध में सरकार पर कानून बनने का विचार क्‍यो नही रखते क्‍रूा उनको किसी के फतवे से भय नजर आ रहा है

    Reply
  • January 20, 2015 at 12:18 am
    Permalink

    चलो आपने यह तो माना कि ज्यादा बच्चे पैदा करना या वैसि सलाह देना दुनिया के लिये असभ्यता कि पेहचान है ! और मै आपाकि इस आपत्ति से सेहमत होते हुवे अब आपसे ये जानना चाहुन्गा कि क्या अब ऐसा कानुन भि बना लेना चाहिये ?
    आपके लेख मे हिन्दु धर्मगुरुओ के यानि कि किसेी धर्म विशेश का सन्दर्भ है इसिलिए सन्ख्यात्मक सबुतो के लिये जब आपने इतनि मेहनत कि हि थि तो बेहतर् होता कि अपने आगे के विश्लेशन मे आप कुपोशित एवम मरने वाले बच्चो कि सन्ख्या मे हिन्दु मुस्लिम के बच्चो कि सन्ख्या भि अलग से दर्शाते ! तो किसे आपकि सलाह को आधिक गम्भितरता से लेना चाहिये ये भि साफ हो जाता जो कुल मिलाकर हमारे देश के हि हित मे होता !

    Reply
    • January 20, 2015 at 12:28 am
      Permalink

      एक बड़े मुस्लिम ब्लॉगर वो भी डॉक्टर खुलेआम एक धार्मिक सामाजिक पत्रिका में लेख और नेट पर ब्लॉग लिख चुके हे जिसमे वो मुसलमानो से परिवार नियोजन से दूर रहने की सलाह देते हे जाकिर साहब का भी शायद यही किस्सा हे ये तो डॉक्टर हे फिर सोचिये की आगे आगे और क्या क्या हो सकता हे उस पर भी तो वासिम साहब कुछ लिखिए मुस्लिम नेता रात दिन पिछड़ेपन की बात करते हे मगर परिवार नियोजन का जिक्र भी नहीं करते जबकि ये उपमहादीप के मुस्लिमो की भी एक बड़ी समस्या हे

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *