फिल्म ‘हैदर’ की समीक्षा !

haidar

आज सचमुच हिन्दी की एक एपिक राजनीतिक फिल्म देखी – हैदर। राजनीतिक यथार्थ और व्यक्तिगत त्रासदियों के अंतरसंबंधों की जटिलताओं की एक अनोखी कहानी। हिन्दी फिल्मों की हदों के बारे हमारी अवधारणा को पूरी तरह से धराशायी करती एक जबर्दस्त कृति। राष्ट्रवादी उन्माद की राजनीति की भारी-भरकम चट्टानों के नीचे दबे जीवन के अंदर ईर्ष्या, द्वेष, डर, आतंक, साजिशों, हत्याओं और लगातार हिंसा से विकृत हो रहे मानवीय रिश्तों का ऐसा सुगठित आख्यान, हिन्दी फिल्मों की मुख्यधारा में मुमकिन है, हम सोच नहीं सकते थे। ‘हैमलेट’ का अवलंब और कश्मीर की अंतहीन त्रासदी – मानवीय त्रासदी के महाख्यान को रचने का शायद इससे सुंदर दूसरा कोई मेल नहीं हो सकता था। विशाल भारद्वाज की इस फिल्म को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है।

जब हम यह फिल्म देखने गये, उसके पहले ही सुन रखा था कि यह शेक्सपियर के ‘हैमलेट’ पर अवलंबित एक कश्मीरी नौजवान की कहानी है। हैमलेट और कश्मीर का नौजवान – इन दोनों के बारे में सोच-सोच कर ही काफी रोमांचित था। कितना सादृश्य है दोनों में! कश्मीर खुद ही हैमलेट से किस मायने में कम है ! अपनी दुविधाओं में, प्रतिशोध की धधकती आग, षड़यंत्रों और अतार्किक हिंसा में, महाविनाशकारी त्रासद दुखांत में!

‘हैमलेट’ में क्लाडियस अपने भाई, हैमलेट के पिता की हत्या करके डेनमार्क का राजा बनता है और हैमलेट की मां उसके चाचा की रानी। राज-दरबार में मौत का शोक और शादी का उत्सव – दोनों साथ-साथ होते हैं। अति-संवेदनशील और कुशाग्र हैमलेट यह सब देख कर बदहवास है। क्लाडियस उसे समझाता है – जीवन-मृत्यु तो शाश्वत सत्य है। ‘‘यही होना था – व्यर्थ शोक को मिट्टी में फेंको।’’ तुम्हारे आगे सारा जीवन पड़ा है। शोक से निकलो, तुम्हें धरती के सारे सुख दूंगा। लेकिन हैमलेट ! ‘‘मेरे भीतर जो चल रहा है, वह मातम के दिखावे से परे है।…काश यह पत्थर जिस्म पिघल सकता और ढल जाता ओस की एक बूंद जैसा, या फिर उस अविनाशी ने आत्मघात की मनाही न की होती।’’

पिता की प्रेतात्मा ने हैमलेट को बता दिया था कि उसकी हत्या क्लाडियस ने ही की थी और हैमलेट को इसका बदला लेना है। राजा का मिथ्याचार, मां की कमजोरियां और पोलोनियस जैसे राज्याधिकारियों की राजा के प्रति अंध निष्ठा – इन सबको देख कर प्रतिशोध की आग और आत्मघात की गहरी घुटन से भरा बेचैन और दुविधाग्रस्त हैमलेट पिता की हत्या के दृश्य को नाटक के रूप में पेश करके क्लाडियस को बेनकाब करता है। हैमलेट क्लाडियस को मार डालने की फिराक में और क्लाडियस हैमलेट को। मौका पाकर भी अपने संस्कारों के कारण हैमलेट प्रार्थना कर रहे क्लाडियस को मार कर स्वर्ग में नहीं भेजना चाहता, चूक जाता है। अंत में, पोलोनियस के बेटे लेयर्टीज के साथ तलवारबाजी में जहर बुझी तलवार और जहरीली शराब से क्लाडियस, रानी, हैमलेट सब मारे जाते हैं। पीछे छूट जाते हैं – लाशों का ढेर और उनकी कहानियां। मरते वक्त भी अविश्वास से भरा हुआ हैमलेट होरेशियो से फरियाद करता है, ‘‘ अगर तूने कभी मुझको अपने दिल में जगह दी हो तो छोड़ दे अपनी खुशी थोड़ी देर के लिए और इस जालिम दुनिया में अपनी दर्द की सांसे गिनता हुआ मेरी कहानी कहने के लिए जिन्दा रह।’’

‘हैमलेट’ की इस कथा के संदर्भ में कश्मीर की कहानी की कल्पना कर रहा था। वहां जितने प्रकट मिथ्याचार, प्रतिशोध, साजिश, हत्या और अन्तहीन हिंसा के रूप में शासन और राजनीति के नाम पर जो सबकुछ चलता रहा है और आज भी चल रहा है, उसका अंत ऐसी ही विभत्स विध्वंसक त्रासदियों के अलावा और किसी में नहीं हो सकता। सोच रहा था क्या विशाल भारद्वाज में इतना साहस और शक्ति है कि कश्मीर में हर रोज रची जारही इन त्रासदियों की पीछे छूट रही कथाओं को फिल्म में उतार पायेंगे? कश्मीर की पृष्ठभूमि पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं। इसीलिये कब कोई फिल्म मुख्यधारा की फिल्म के अपने तर्क पर चलने लगेगी और सब मटियामेट हो जायेगा, इसका खतरा हमेशा बना हुआ था।

लेकिन यह देखकर बेहद सुखद आश्चर्य हुआ कि विशाल भारद्वाज ने हैमलेट और कश्मीर के जख्मों की कहानी, दोनों का ही इस फिल्म में बखूबी निर्वाह किया है। शेक्सपियर के नाटक हमेशा से उनके प्रिय विषय रहे हैं। इसके पहले ‘मैकबेथ’ पर ‘मकबूल’ और ‘ओथेलो’ पर ‘ओमकारा’ बना चुके हैं। हमने वे दोनों फिल्में ही नहीं देखी, इसलिये उनपर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। वैसे अखबारों में उनकी भी काफी प्रशंसा पढ़ी थी। लेकिन ‘हैमलेट’ एक ऐसा विषय है, जिसके सारी दुनिया में न जाने कितने फिल्म और नाट्य रूपांतरण हुए होंगे। हैमलेट का ‘होने, न होने’ की दुविधाओं में फंसे, प्रतिशोध के नर्क की आग में जलते चरित्र का आकर्षण कभी खत्म नहीं हो सकता। ‘हैमलेट’ नाटक भी कोई व्यक्तिगत त्रासदी मात्र नहीं था। उसके साथ अविभाज्य तौर पर तख्तो-ताज का सवाल, राजनीति का सवाल, डेनमार्क का सवाल जुड़ा हुआ था। ‘हैदर’ की भी विशेषता यह है कि इसमें सिर्फ चरित्र नहीं, पूरा परिवेश ही ‘हैमलेट’ की त्रासदी की कहानी बयान कर रहा है। इसीलिये हम समझते हैं कि यह जरूर ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ से कुछ अलग है।

शाहिद कपूर और तब्बू के असाधारण अभिनय, पंकज कुमार की सिनेमेटोग्राफी ने इसे फिल्मांकन के उच्चतम अन्तरराष्ट्रीय मानकों के समकक्ष ला दिया है। विशाल भारद्वाज सचमुच साधुवाद के पात्र है। भारतीय फिल्म के इतिहास में ‘हैदर’ को मैं एक महत्वपूर्ण योगदान मानूंगा।

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7 thoughts on “फिल्म ‘हैदर’ की समीक्षा !

  • October 8, 2014 at 10:38 am
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    कश्मीरी हद से ज़्यादा अलगाववादी हे ये न भारत में कोई दिलचस्पी या मिलना चाहते हे न पाकिस्तान में इनके नेताओ ने इनमे शरू से ही स्विट्ज़रलैंड जैसा देश बनने का सपना दिखाया जो फ़्रांस इटलियन और जर्मन जनता के होते हुए भी तीनो ही देशो से हमेशा अलग रहा यहाँ तक की सेकेण्ड वर्ल्ड वॉर में भी . आज़ादी बटवारे के बाद महाराजा हरी सिंह तक इसी सपने में खोये रहे जब तक की कबायली उनकी बगल में नहीं आ गए कश्मीरी अलगववादी साइकि का राज़ क्या हे ? ‘मेरी रिसर्च’ कहती हे की इसकी वजह हे की पहले य सभी हिन्दू थे तब इन पर कभी कोई तो कभी कोई मुस्लिम शासक सुल्तान जागीरदार अत्याचार करता रहा कभी पडोसी अफ़ग़ान इन्हे लूटते रहे धीरे धीरे पंडितो को छोड़ कर सभी कश्मीरी मुस्लमान हो गए – की तभी यहाँ पर अंग्रेज़ो के सहयोग और के एक बहुत ही ज़बरदस्त सेनापति जनरल जोरावर सिंह के कारण डोगरा राज़ आगया जो की हिन्दू थे फिर इन शासको ने इन कश्मीरी मुसलमानो को बहुत दबा और तरसा कर रखा नेहरू जी ने इन्हे डोगरा जमींदारो के अत्याचारों से छुटकारा तो दिलवाया ही शेख अब्दुल्ला को भी कश्मीर पर सेकुलर निस्पक्ष शासन को प्रेरित किया मगर फिर शीतयुद्ध की राज़नीति में अमेरिका दुआरा ललचाय जाने के कारण शायद शेख अब्दुल्ला साहब को स्विट्ज़रलैंड बंनने की चाह जागने लगी मगर रफ़ी अहमद किदवई ने उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया

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  • October 8, 2014 at 10:43 am
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    विषय से अलग कुछ कॉमेंट -sikander hayat
    October 06,2014 at 10:24 AM IST
    बहुत से गैर मुस्लिम बकरीद को इस नज़र से देखते हे की मानो एक तो ये कोई अलग से बकरो या दूसरे जानवरो का कत्ले आम हे इससे जानवरो की बहुत कमी हो जाती होगी दूसरा की मानो हर मुस्लिम बकरा काटता हो दोनों ही सोच गलत हे बकरीद पर अलग से कुछ नहीं होता क्योकि बकरीद के बाद हफ्ता- दसियो दिन कमेले बंद रहते हे यानी साल का औसत वही का वही होता हे बस फर्क ये होता की कमेलो की जगह जानवर कही और कटते हे लेकिन काटता उन्हें सिर्फ कसाई ही हे 99 % आम मुस्लिम नहीं दूसरा की ये आहार आधा गरीबो को दिया जाता हे गैर मुस्लिम भी खूब लेते हे प्रोटीन ही होता हे जो शरीर को काम आता हे दूसरा की बकरो आदि के व्यापारी अधिकतर गरीब ( मुस्लिम गैर मुस्लिम सभी ) होते हे जिन्हे बकरीद पर अपने जानवरो की शायद डबल ही कीमत मिल जाती हे उनका भला होता हे बाकी एक जेन ब्लॉगर हंसराज साहब से बहस हुई तो वो कहने की मांसाहारी जीवन लेते हे जो गलत हे मेने कहा की इन बातो का कोई हल नहीं है क्योकि किसी भी मटन चिकन वाले व्यापारी से पूछेंगे तो वो कह सकता हे की में जीवन ले नहीं बल्कि दे रहा हु मांस के लिए करोड़ो जानवरो की ब्रीडिंग कराई जाती हे दुनिया मे लाकर् पाल कर उन्हें ये सुन्दर दुनिया दिखलायी जाती हे सो जिसे खाने हो खाए नहीं खाना मत खाय मुझे खुद मटन मांस मछली का कोई खास शोक नहीं हे थोड़ा बहुत चिकन ही खाता हे बस सो इल्तज़ा हे की इन मुद्दो पर बहस ताने तिश्ने ना किये जाए समय की बर्बादी हे हा य जरूर है की बकरीद पर लाखो लाखो रुपयो के बकरे खरीदने की कोई तुक नही है बकरा दस बीस का भी लेकर आप बाकी पेसो से गरीबो की मदद भी कर सकते है य अधिक बेहतर होगा लेकिन जेसा की पूरे भारत मे हो ही रहा है की आएसा वेसा करके या बिना मेहनत के धन दोलत के ढेर पर बेठे लोग अपने धन के पारदर्शन के लिये य सब कर ही रहे है मेरे यहा चार चार बंदो की सेलरी पचास हज़ार से लाख के आस पास है फिर भी बकरे को कोई सात- दस हज़ार से आगे नही बढ़ता है सीधी से बात है क्योकि हमारे पास सिर्फ खून पसीने का पेसा है

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  • October 8, 2014 at 10:44 am
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    Ravi Raj (Delhi, India)
    October 06,2014 at 04:30 PM IST
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    अपनी जुबां के सवाद के लिए किसी पशु की कुर्बानी देना कँहा तक उचित है.?(Ravi Raj को जवाब )- sikander hayat
    October 06,2014 at 10:20 PM IST
    अपनी जुबा के स्वाद के लिये आदमी नॉर्मल दिनो के मुकाबिल डबल पेसा खर्च करके कुर्बानी का जानवर नही खरीदता है बड़े आराम से सीधे मार्किट से खरीद कर पूरा कर सकता है अपनी जुबा का स्वाद तो ? कुर्बानी का आधा तिहाई मांस जो जरूरी प्रोटीन होता है वो गरीबो को दिया जाता है सभी गरीब हिन्दू मुस्लिम सभी आज खुश होते है की इतनी महगाई मे आज ही के दिन उन्हे भी मटन ( 400 रुपये किलो ) खाने को मिल जाता है हमारा धोबी कार वाशर फूटबॉल ग्राउंड का माली आदि आदि सभी गेर मुस्लिम एक दिन पहले ही बोल कर ले जाते है

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  • October 8, 2014 at 10:45 am
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    sikander hayat
    October 06,2014 at 10:26 PM IST
    विष्य से अलग एक बात की अब तो पहले के मुकाबिल फिर भी खेलो मे पेसा प्रोत्साहन काफी आ गया है तब भी भारत का पदर्शन एशियाड मे गिर गया है कोरिया जापान चीन ही नही ताज़ुब है की ईरान कज़ाकिस्तान कतर जेसे देश भी भारत से आगे या बराबर रहे खेलो मे भारत के इस कदर घटिया परदर्शन की ज़ड और सब बातो के साथ य भी है की भारत मे सर्वाधिक पेसा कुछ शाकाहारी समाजो के पास ही है आगे और क्या कहू – ?
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    (sikander hayat को जवाब )- Varun Kulshrestha (Gwalior)
    October 07,2014 at 09:38 PM IST
    1 F
    क्यों भई….भारत में तुम्हारी आबादी भी तो 25 करोड़ है देश में फिर तुम में से कोई क्यों नही ला पाया एक भी मेडल या सिर्फ खाने के लिये ही जिंदा हो

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    • October 8, 2014 at 10:46 am
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      sikander hayat
      October 06,2014 at 10:37 PM IST
      विषय से इतर एक बात की अब जबकि खेलो में पहले के मुकाबिल फिर भी पैसा आ गया हे और भारत में पैसे वाले लोगो की कोई कमी भी नहीं हे जिन्हे सुविधाओ की कोई खास कमी भी नहीं हे संपन्न परिवार के बिंद्रा ने अपनी जेब से भी खर्च करके तैयारी करके ओलम्पिक में गोल्ड जीता था लेकिन फिर भी आश्चर्य हे की एशियाड में भारत का प्रदर्शन बेहतर या स्टेबल तो क्या होता बल्कि गिर गया और गोर करिये की ईरान और कज़ाकिस्तान जैसे देश भी भारत से ऊपर हे ईरान जहा कई कठमुल्लवादी पाबंदिया हे कज़ाकिस्तान जिसकी आबादी दिल्ली से भी बहुत कम हे क़तर जो दिल्ली मुंबई से भी छोटा हे आप अंदाज़ा लगाइये की खेलो में हम किस कदर पिछड़े हुए हे इसके लिए और बहुत से कारण तो हम जानते ही हे मगर एक महत्वपूर्ण कारण भारत की आर्थिक असामनता भी हे देखे की सबसे अधिक पैसा कुछ शाकाहारी समाजो के पास ही हे अब और क्या कहु — ? खुद ही समझ जाइये की आने वाले सालो मे जबरदस्तलगातार बढ़ता दमखम मांग रहे खेलो मे हमारा केसा उज्ज्वल भविष्य है ?

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  • October 8, 2014 at 12:19 pm
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    मैंने भी देखा एक बेहतरीन पिक्चर।

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  • October 8, 2014 at 5:52 pm
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    Really its a good film and shahid kapoor actingis very impressive.

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