पुरुषो की मानसिकता पे चोट करती एक कविता!

heroin

अफ़ज़ल ख़ान

पुरुषो के मानसिकता पे चोट करती उर्दू की मशहूर कवित्री आज़रा अब्बास की एक नज्म आप सभी के लिये—–

गरूर- ( घमंड )

अगर तुम मुझे एक बुर्का पहना कर मुझे ढाँपना चाहो तो

क्या मेरी छातियों का गरूर
तुम्हारी आँखों से छुप जाएगा
अगर तुम मुझे दो बुर्के पहना दो
यह गरूर फिर भी तुम्हारी नज़रों से छुप नहीं सकेगा
चलो पहनते जाओ मुझे नीचे से उपर कई लबादे
छोड़ दो मेरी आँखें केवल देखने के लिए
कि तुम्हारी आँखें अब कया दीख रही हैं
मुझे विश्वास है
तुम मेरी छातियों के के गरूर को दूंढ़ रहे हो गे
उपर से नीचे लदे हुए
मेरा शरीर छुपाने वाले कपड़ों के ऊपर
तुम्हारी दृष्टि के स्क्रीन विंड पर पानी की बूँदें
छिपाके मार रहे होंगे
और मेरे गरूर से भरी छातियाँ
तुम्हारी हार पर
कभी ना खत्म होने वाले गरूर
से भरी मुस्कुरा रही होंगी

(Visited 10 times, 1 visits today)

3 thoughts on “पुरुषो की मानसिकता पे चोट करती एक कविता!

  • May 27, 2014 at 6:49 am
    Permalink

    अफजल भाई, इतना बेबाक मत लिखा कीजिये, अब आप बुर्का/ पर्दा समर्थको के कोप का तो शिकार बनेगे ही और हो सकता है कि आपके कुछ साथी ब्लोगेर्स एक बार फिर से आपको गैर मुस्लिम घोषित कर दे. और मजबूरन आपको फिर से यह वकालत करनी पड़ेगी कि- “नारी को सम्मान देने के लिये सभी धर्मो/ वर्गो को इस्लाम की राह अपनानी चाहिये” बहरहाल पुरुषवादी मानसिकता को उजागर करने के लिये मेरी और से बधाई.

    Reply
  • May 30, 2014 at 5:21 am
    Permalink

    Sir wot mean of garoor nd ur them like a manto fiction

    Reply
  • July 1, 2014 at 12:01 am
    Permalink

    अफज़ल सर आपने इतनी बेबाक राय पेस की इसके लिए सुक्रिया ये दर्द उन सभी औरतों का ह जिन्हे जबरदस्ती काले लिबास यानि कहनियों के भूत भूतनी का लिबास पहनने पर मजबूर किया जाता ह पर पुरुष परधान समाज अपनी सोच और मानसिकता बदलने को तैयार नहीं लेकिन अगर कल को किसी कंठ मुल्ला का फतवा आप पर लग जाये तो घबराना नहीं याद रखो Kisi की दुकान बंद होने का खतरा हो तो वो नीच और घटिया हरकत पर उत्तर आता है

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *