पिछड़ा हुआ नहीं हे मुस्लिम समुदाय !

Reservation-for-muslims

राज़ नाथ सिंह सूर्य

( ये लेख कुछ वर्ष पूर्व राज़ नाथ सिंह सूर्य जी वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद दुआरा सच्चर रिपोर्ट के समय अमर उजाला में लिखा गया था साभार )

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कहता हे की हिन्दुओ की उपेक्षा मुस्लिमो की माली हालात बेहतर हे . यह रिपोर्ट सच्चर आयोग के उस आकलन को नकारती हे की मुसलमान यहाँ दोयम दर्ज़े का नागरिक बनकर रह गया हे . ऐसे में किसे सही माना जाए ? सच्चर आयोग एक राज़नीतिक फैसला था जबकि नमूना सर्वेक्षण एक निरंतर प्रशासनिक पर्किर्या हे इसलिए विश्वसनीयता की कसौटी पर आर्थिक नमूनासर्वेक्षण के निष्कर्ष पर उंगली नहीं उठायी जा सकती . पर इसके बावजूद प्रधानमंत्री संसाधनो पर पहला हक़ मुसलमानो का होना की बात करते हे और बजट में उनके लिए 17000 करोड़ रूपये का प्रवाधान किया जाता हे तो क्या ये सोचना बेबुनियाद होगा की मुस्लिम तुष्टिकरण का प्रयास राज़नीतिक दलों का एकमात्र कल्याणकारी कार्यकर्म हो गया हे ?

ऐसे माहोल में मुसलमानो को अलपसंख्यक की श्रेणी से बाहर किये जाने का इलाहबाद उच्च न्यायलय का फैसला जिसे उसी न्यायलय की एक पीठ ने स्थगित कर दिया कैसे हज़म हो सकता हे होना ये चाहिए था की सेकुलर होने का दावा करने वाले अदालत के उस फैसले के परिप्रेक्ष्य में अवसर से लाभान्वित होने वाली साम्प्रदायिक ताकतों को रोकने का प्रयास करते . लेकिन हो रहा हे ठीक उसका उलट . क्या पंथ विशेष के प्रति तुष्टिकरण सेकुलरिज़म की अवधारणा के प्रतिकूल नहीं हे ?

हम शायद यह भूल रहे हे की मुसलमानो ने इस देश पर 700 वर्ष तक राज़ किया . नवाब जागीरदार जिन्हे बड़ी बड़ी जागीरे दी गयी थी . सभी मुसलमान थे उनके उत्तराधिकारी के रूप में उत्तरपदेश बिहार बंगाल गुजरात और आंध्रप्रदेश में आज भी मुस्लिम जागीरदारों का बोलबाला हे . राजस्थान में एक मुस्लिम परिवार के पास औसतन साढ़े तीन हेक्टेयर भूमि हे जबकि हिन्दुओ के पास लगभग पौने तीन हेक्टेयर . गुजरात में एक मुस्लिम परिवार के पास एक हेक्टेयर से ज़्यादा भूमि हे लेकिन सच्चर कमिटी ने अन्य तथ्यों के साथ इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ किया

फिर शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानो क्या सचमुच बहुत पीछे हे ? आंकड़े बताते हे की जहा आंध्र प्रदेश में शिक्षित हिन्दुओ का प्रतिशत 69.5 और मुस्लिमो का 76.5 % वाही गुजरात में यह 83 और 79 % हे . मुसलमानो में नौकरियों की संख्या में कम होने का आकलन जमीनी हकीकत नज़रअंदाज़ किये जाने के कारण हे क्योकि तुलना करते समय हम विभाजन के पूर्व की इस्तिति का संज्ञान लेकर आंकड़े गढ़ते हे विभाजन के पूर्व सेवाओ में मुस्लिमो का प्रतिनिधत्व आबादी के अनुपात में कही अधिक था जिनमे अधिकांश पाकिस्तान चले गए .देश के तमाम सर्वोच्च पद जैसे राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायलय के परधान न्यायाधीश सेना प्रमुख और प्रशासनिक प्रमुख के रूप में मुसलमानो का चयन अन्य वर्ग से अनुपात के अनुसार कही अधिक हुआ हे निश्चय ही यह चयन योग्यता पात्रता के आधार पर हुआ फिर शिक्षित होकर पात्र बनने की आकाँक्षा का यही मुस्लिम समुदाय में यदि अभाव हे तो उसका कारण भेद भाव नहीं कुछ और हे वह कुछ और आर्थिक कारण हे . आज मुस्लिम समुदाय को लगता हे की नौकरी से ज़्यादा लाभ रोजगार में हे . नाई धोबी बढाई मिस्त्री मांस विक्रेता आदि के रूप में काम करने वालो में .से सत्तर प्रतिशत मुसलमान यही कारण हे की या तो मुसलमान उच्च शिक्षा प्राप्त करके बड़ा अधिकारी बनता हे या फिर वह नौकरीपेशा वालो से अधिक धन कमाने के लिए नौकरी के लिए योग्य बनाने वाली पढ़ाई से मुह फेर कर कच्ची उम्र में ही सवरोजगारी बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त करना शुरू कर देता हे . पता नहीं हमारे देश के नेताओ को जमीनी हकीकत के आधार पर सर्वदेशिकता की भावना के साथ सोचने विचारने और आचरण करने की प्रेरणा कब और कैसे मिलेगी ? अभी तो जो सोच विचार और आचरण उसके कारण तो अलगाववाद और आतंक का प्रसार ही बढ़ रहा हे ——–

( प्रस्तुति- सिकंदर हयात )

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29 thoughts on “पिछड़ा हुआ नहीं हे मुस्लिम समुदाय !

  • September 27, 2014 at 5:51 pm
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    मुस्लिमो का अनुपातिक प्रतिनिधित्व हर क्षेत्र मे इतना खराब नही है, जैसा की सिकंदर हयात साहब के लेख मे दिख रहा है, लेकिन कुछ क्षेत्रो मे बेहद खराब है, लेकिन क्या इसके लिये देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज या सरकारी नीतियो को दोष दिया जाना चाहिये, तो इसके लिये हमे मुस्लिमो के अनुपातिक प्रतिनिधित्व को पूरे विश्व के संदर्भ मे देखना चाहिये. 1. भारत मे मुस्लिम 15% के करीब है, जबकि पूरी दुनिया मे ये 20-25% के बीच. जिनमे से अधिकांशतया, मुस्लिम देशो मे ही रह रहे हैं. लेकिन क्रिटिकल थिंकिंग के मुख्य पैमाने यानि साइंस मे इनका प्रतिशत देखे तो 46 ओ आई सी मुल्को से 1.17% साइंस के लेख आते हैं, 20% आबादी के भारत से 1.66%, स्पेन (जहां 800 साल इस्लामी हुकूमत रही 1.48% और इजरायल से 0.8%) इजरायल और स्पेन बहुत छोटे मुल्क है. इनका हवाला इतिहास और भौगोलिक परिस्थितियो की समानता को बताने के लिये की. अगर स्पेन इस्लाम से मुक्त ना होता तो उसकी स्थिति पड़ोसी मुस्लिम मुल्को जैसी होती. इजरायल मध्य पूर्व का ही देश है. 2. अनुपातिक प्रतिनिधित्व को मुस्लिम समुदाय के भी विभिन्न फिरको यानी शीया, सुन्नी, अहमदी आदि या देवबंदी, बरेलवी मे भी बांट के देखो, (ये फिरके जाति-वाद से भिन्न है, ये विचारधारा के अधार पे है) एक अंतर दिखेगा. जो इस बात पे सोचने को मजबूर करता है की मजहब, क्रिटिकल थिंकिंग को प्रभावित करता है. इस बारे मे पाकिस्तान के नामी प्रोफेसर परवेज़ हूदबॉय का कहना है की पाकिस्तानी और अधिकांश मुस्लिम समुदायो मे तालीम का मकसद परलोक को संवरना है, ना की दुनिया मे बेहतरी. साथ ही साथ, मुस्लिम लालन पालन मे किताबो के बिना सवाल अनुपालन पे जोर दिया जाता है ना की समालोचना पे, और यही रवैया उनकी क्रिटिकल थिंकिंग को रोकता है. हिन्दू समाज भी इस मामले मे मुस्लिम समुदाय से कुछ ही बेहतर है, लेकिन इस मानसिक अवरोध को बनाये रखने का हिन्दू समुदाय के पास कोई सैद्धांतिक आधार नही है, जबकि इस्लाम मे यह है या कहे की अधिक स्पष्टता के साथ है. इसलिये अनुपातिक प्रतिनिधित्व या उच्च गुणवत्ता की शिक्षा की तस्वीर, मुस्लिम जगत मे कमोबेश एक जैसी है. हो सकता है, में अपनी बात को ठीक से ना समझा पाया हूँ, लेकिन मुझे संघी या मुस्लिमो से नफरत फैलाने वाला ना समझे. मेरी सोच परवेज़ हूदबॉय, हसन निसार, जावेद अख़्तर, वफ़ा सुल्तान के करीब है

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    • September 27, 2014 at 7:30 pm
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      सुमित साहब लेख मेरा नहीं हे वरिष्ठ लेखक संपादक और शायद की भाजपा के ही सांसद रहे ? राज़नाथ सिंह सूर्य जी का हे

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      • September 27, 2014 at 7:41 pm
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        राज़नाथ सिंह जी से में सहमत नहीं हु मगर सच्चर आयोग भी मुझे शरू से ही अविश्वसनीय लगा मुझे लगता हे की अतिश्योक्ति अलंकार का हम सभी इस्तेमाल करते ही हे अक्सर ही अपनी बात की तरफ विशेष ध्यान खीचने के लिए.तो ऐसे ही सच्चर साहब बहुत अच्छे आदमी हे लेकिन उन्होंने भी शायद अपनी बात में कुछ ज़्यादा ही अतिश्योक्ति अलंकार का इस्तेमाल कर दिया होगा

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        • September 27, 2014 at 7:58 pm
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          sikander hayat
          August 10,2013 at 01:21 AM IST
          पार्ट – 2 सच्चर रिपोर्ट का जहा तक सवाल हे तो भारत में लोकतंत्र हे चुनावी राजनीति हे मुस्लिम वोटो का भारी महत्व हे नेताओ को किसी हालात में चुनाव जितना होता हे इस्तिती बड़ी ही पेचीदा हे सब अपने अपने हिस्से और मतलब का सच देखना चाहते हे खेर जहा तक य बात की हालात दलितों से भी ख़राब—– तो दलित आदिवासी इस देश के सबसे बड़े शोषित हे वो पिछले 2- 3 हज़ार से दबे कुचले रहे वो सत्ता में कभी नहीं रहे उनके पास जमीन कभी नहीं रही जबकि मुस्लिम इस देश पर पिछले ही 1 हज़ार मेसे 700 साल हुकूमत कर चुके हे जमीन का सवामितव बहुत रहा आज भी ठीक ठाक हे फिर दलितों से भी ख़राब हालत केसी हो गयी ? य संभव ही नहीं हे मेरे ख्याल से सच्चर साहब ने अपनी बात कहने के लिए यहाँ ”अतिश्योक्ति अलंकार ‘ का पर्योग किया हे जो की सव्भाविक हे अतिश्योक्ति का पर्योग सभी करते हे फाजिल भाई मुसलमानों की हालात दलितों से ख़राब होती तो हर शहर में मुस्लिम बहुल इलाके हे जिनके बाहरी हिस्सों को छोड़ दे तो इनमे शायद ही कोई गेर मुस्लिम संपत्ति मकान दूकान खरीदता हो अगर की मुसलमानों की हालात दलितों से ख़राब होती तो मुस्लिम बहुल इलाको में मकान दूकान आदि के दाम किराया आदि कम होने चाहिए थे क्योकि बाहर वाला कोई खरीदेगा नहीं और मुस्लिमो की हालात दलितों से भी ख़राब हे तो जाहिर हे फिर पैसा नहीं पैसा नहीं तो फिर खरीदार भी नहीं फिर रेट तो गिरने चाहिए ? तो क्या रेट गिर रहे हे गिरे छोडो क्या रेट रुके हुए है ? जी नहीं बाकि देश की तरह ही मुस्लिम बहुल इलाको में भी आज मकान दूकान सम्पति जमीन के रेट बढ़ते ही जा रहे हे इन्हें कोई गेर मुस्लिम नहीं मुस्लिम ही खरीद रहे हे ? कहा से खरीद रहे हे जब हालात दलितों से भी बदतर हे ? तो मेरे घर में 4 – 4 लोगो की सेलरी 50 हज़ार से ऊपर हे फिर भी हम मुस्लिम इलाके में फ्लेट नहीं ले सकते हे पिछले दिनों एक देखा था डेढ़ सो गजके फ्लेट के डेढ़ करोड़ मांगे गए किराय भी गेर मुस्लिम इलाको जेसे ही बढे हुए ——जारी
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  • September 27, 2014 at 5:53 pm
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    खुदा करे के कयामत हो और तू आये,,,,,,,,,,,,,, अगर यह जानकारी सही है तो अच्छा है………….

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  • October 1, 2014 at 6:06 pm
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    शहरों मे गरीब मुलसमान ही अच्छे कारीगर अधिक मिलते हैं. इसका कारण मेरी समझ मे यह है की वह बचपन से ही घर का खर्च चलाने मे सहयोग करने लगते है क्योंकि गरीबी के कारण उनके पास कोई अन्य उपाय नही होता. इसलिये समय के साथ अपने अनुभव से वह अच्छे कारीगर बन जाते हैं. पर यहाँ पर में एक खतरा मंडराते हुए देख रहा हूँ. चीनी सामान तो उपयोग करो और खराब होने पर फैंक दो वाला होता है. अतः इसतरह के कारीगरों पर रोजी रोटी का खतरा मंडरा रहा है. लगातार बदलती तकनीक से इन कारीगरों को अवगत कराना और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये. फिर एक परेशानी यह है की यह संगठित क्षेत्र के मजदूर नही हैं. इसके लिये एक व्यापक योजना की आवश्यकता है.

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  • December 23, 2016 at 11:26 am
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    ” om Thanvi
    10 hrs ·
    जंग साहब ने केंद्र का हुक्म ख़ूब बजाया। दिल्ली की सरकार को अनवरत तंग करते रहे। हाईकोर्ट के आदेश के बाद तो उनके तेवर आसमान पर थे। फिर भी आख़िर वे आते शिक्षा और कला की दुनिया से हैं। केंद्र उन्हें और न गिरा सका। मगर सुना कि कोशिश की। जंग ने इस दफ़ा शायद अपने ज़मीर की सुनी। पहले सुने होते तो चैन से चले जाते, इस तरह झटके से नहीं। ” ” कुल मिलाकर जंग साहब ने वही सब किया जिस और भारत के सबसे ताकतवर आदमी से टक्कर लेने वाले आई पि एस संजीव भट्ट ने कहा था की” अधिकांश मुस्लिम अफसर निजाम के बेहद वफादार होते हे ये कभी भी व्यवस्था से नहीं टकराते हे ”

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  • February 16, 2017 at 7:02 pm
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    Dilip C Mandal14 February at 16:29 · मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है -3भारतीय राष्ट्र राज्य में मुसलमानों को ख़ास कुछ देने की क्षमता नहीं है।
    नौकरियों और बैंक लोन जैसे आर्थिक समृद्धि के स्रोतों से लगभग वंचित मुसलमानों ने जीने के अपने तरीक़े निकाल लिए हैं। मुसलमान अपनी मेहनत और हुनर के दम पर जी रहा है। वह किसी सरकार के भरोसे नहीं है। वह आपस में ही एक दूसरे की मदद कर रहा है।
    वह अपने अल्लाह और अपने बाज़ू के भरोसे है।
    कोई भी सरकार उन्हें कुछ देकर बहुसंख्यकों को नाराज़ नहीं करेगी। यही भारतीय राजनीति का सच है। मुसलमानों को किसी सरकार से कुछ नहीं मिलने वाला।जो एक चीज़ सरकार उनके लिए कर सकती है वह है क़ानून का राज। यानी अमन चैन। यह तो वैसे भी सरकार का कर्तव्य है और हर नागरिक का अधिकार।क़ानून का राज दे दीजिए। मुसलमान अपनी ख़ुशहाली की इमारत ख़ुद बना लेगा। सरकारी मदद और उदारता के बिना जीना उसने सीख लिया है।Dilip C Mandal

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    • February 17, 2017 at 10:09 am
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      जितने पिछड़ेपन का रोना मुसलमानो के बीच रोया जाता हे अगर हम वो सब एकदम खरा सच मान ले तो समझने की बात हे की पिछड़े यानि की पैसा नहीं जब पैसा नहीं तो ग्राहक नहीं जब ग्राहक नहीं तो फिर मुस्लिम बहुल इलाको में मकान दुकान संपत्ति जमीन आदि के दाम और किराये बनिस्पत कम होने चाहिए थे बढ़ने नहीं चाहिए थे रुके हुए होने चाहिए थे ———–? लेकिन ऐसा कुछ नहीं हे मुस्लिम बहुल इलाको में भी दाम अधिक ही हे और बढ़ते ही जा रहे हे हे इसका या तो यही मतलब हे की मुस्लिम उतने पिछड़े नहीं हे जितना हम जतलाना चाहते हे या फिर बाकी देश की तरह ही मुसलमानो में भी भारी आर्थिक असमानता हे कुछ लोगो के पास बहुत पैसा हे जमीन हे बैंक बेलेन्स हे यही लोग और इनकी खरीद क्षमता इनकी ” जमाखोरी ” ही दाम कम नहीं होने देती हे और यही लोग और इनके लग्गू भग्गू ही सबसे अधिक हल्ला करते हे और सबसे अधिक मलाई भी यही चापते हे और यही लोग अपने ही हित को ” मुस्लिम हित ” कहकर प्रचारित करते हे उसके बाद फिर वही मेरे जीनियस बड़े भाई के शब्दो में की ” अपना घी दुसरो की खिचड़ी में कोई नहीं डालता हे ”

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  • November 11, 2017 at 3:16 pm
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    Mohd Zahid हिन्दू तुष्टीकरण की पराकाष्ठा :-
    कांग्रेस से मेरी तमाम शिकायतों में से एक सबसे बड़ी और प्रमुख शिकायत यह है कि उसने इस देश में मुसलमानों को दलितों से भी बदतर बना दिया।
    उसने पिछले 70 साल में हिन्दुओं का जमकर तुष्टीकरण किया परन्तु तुष्टीकरण के नाम पर मुसलमानों को गाली खिलवाया।
    उसने तुष्टीकरण के नाम पर देश के मुसलमानों को धार्मिक लालीपाप दिए , जैसे कांग्रेस , प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा “अफ्तार का आयोजन” और उसमें “जालीदार गोल टोपी पहनना” या हज के नाम पर सब्सीडी आवंटित करके उसका लाभ “एयर इंडिया” को दे देना परन्तु जो मूलभूत रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले मामले थे उसमें उसने कुछ नहीं किया बल्कि यह कहना सच होगा कि उसने मुसलमानों के लिए बाधाएँ ही खड़ी कीं।
    वह शासन व्यवस्था इस देश के लगभग 70% हिन्दुओं को आरक्षण तो देती है परन्तु मुसलमानों को इससे इस कारण वंचित करती है कि धर्म आधारित आरक्षण नहीं होगा।मेरी समझ में आजतक यह नहीं आया कि इस देश में आरक्षण पाते लोग क्या किसी धर्म के नहीं हैं ? क्या मुसलमान ही केवल इस देश में धर्म आधारित हैं ?ध्यान दीजिए कि मंडल आयोग में मुसलमानों को आरक्षण भी सिर्फ आँख में धूल झोंकने जैसा ही है।
    खैर , इसके अतिरिक्त हिन्दुओं के लिए धार्मिक तुष्टीकरण , आर्थिक तुष्टीकरण , और व्यवस्था में तुष्टीकरण का सारा खेल इस देश में पिछले 70 साल से हो रहा है परन्तु तुष्टीकरण के नाम पर संघ और भगवा लुच्चों से गाली मुसलमान खाता है जो जस्टिस सच्चर आयोग के अनुसार 70 साल की इसी तुष्टीकरण के कारण दलितों से भी बदतर स्थिति में चला गया।हिन्दू लोगों का एक महत्वपुर्ण आर्थिक तुष्टीकरण है “हिन्दू अविभाज्य परिवार” जिसे तकनीकी भाषा में “HUF”” Hindu Undevided Family कहते हैंदेश के तमाम विभागों में धर्म के आधार पर तमाम कर और नियम में यह छूट केवल हिन्दुओं (हिन्दू , सिख , बौध और जैन) को मिली है , और कोई धर्म का व्यक्ति इसका लाभ नहीं ले सकता।संविधान में ऐसी व्यवस्था की गयी कि धार्मिक आधार पर मुसलमानों को आरक्षण नहीं मिले और उसी धार्मिक आधार पर हिन्दुओं के लिए “कर और नियमों” में तमाम छूट और सुविधाएँ दी गयीं और उस नियम का नाम ही रखा “HUF” , हिन्दू के नाम पर , यह देश का शायद ऐसा इकलौता वित्तीय कानून होगा जो किसी धर्म के नाम पर होगा।क्या है HUF ?हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) बनाने के लिए (HUF) के नाम एक बैंक खाता खुलवाना होता है। यह खाता परिवार के मुखिया(कर्ता) के नाम होता है, लेकिन उसके नाम के बाद एचयूएफ शब्द जुड़ा होता है। उसके नाम के साथ एंड कंपनी या ऐंड संस जैसी तब्दीली संभव है जैसे (HUF) के मुखिया संदीप वर्मा हैं तो वह”संदीप वर्मा एंड संस (HUF)”
    के नाम से बैंक खाता खुलवा सकता है , इसके लिए बैंकों के पास अलग से सारी प्रक्रिया होती है। फर्म भी “संदीप वर्मा एंड संस” के नाम से होगी।
    इसके बाद (HUF) मुखिया “संदीप वर्मा” के पैन कार्ड के लिए आवेदन किया जाता है। पैन कार्ड भी परिवार के मुखिया “संदीप वर्मा” के नाम होता है, लेकिन उसके अंत में (HUF) शब्द जुड़ा होता है। यह हर जगह (HUF) सिस्टम को संदेश देने के लिए है कि यह विशेष श्रेणी के लोग हैं और इनको देश में तमाम छूट हासिल है। यह बन गयी एक HUF कंपनी।इनकम टैक्स एक्ट के मुताबिक परिवार में पिता या वरिष्ठ पुरुष सदस्य ही HUF का मुखिया होगा। मुखिया या कर्ता की भूमिका परिवार के मैनेजर की होती है और HUF के सारे सदस्य इसके पार्टनर की तरह होते हैं। कर्ता या मुखिया के लिए परिवार के साथ एक ही छत के नीचे रहना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि वह परिवार के सारे मामलों की देखभाल करता हो। मल्लब सिर्फ कागज पर “संयुक्त”।जो शख्स (HUF) बनाना चाहता है, उसका शादीशुदा होना जरूरी है। कुंवारे लोग (HUF) नहीं बना सकते। (HUF) पर इनकम टैक्स में फायदा लेने के लिए घर में बच्चे का होना जरूरी है। अगर कोई पति-पत्नी मिलकर HUF बनाना चाहते हैं और उनके अभी कोई बच्चा नहीं है तो वे आने वाले बच्चे(?) का जिक्र कर भी एचयूएफ बना सकते हैं। अर्थात जो बच्चा पैदा ही नहीं हुआ उसके नाम पर भी HUF बन जाएगा और वह बिना पैदा हुए उस HUF का सदस्य हो जाएगा।

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  • December 2, 2017 at 6:02 pm
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    Ameeque Jamei
    9 hrs ·
    ऐजाज़ अशरफ़ कह रहे है की मुसलमानों मे जिग्नेश, अल्पेश या हार्दिक क्यों नहीं? क्यों भी हो भला जब मौलवियो ने क़ौम को बंधक बना डरा रखा हो, ऊपर से की नेता होने के लिये मंत्री/संत्री/मौलवी का बेटा या करोड़पति होना ज़रूरी है तो फिर यह उम्मीद क्यों? यूपी के नगर निकाय मे एक एक सीट पर अनगिनत लड़े करोड़ों ख़र्च किये है फिर क्यों हार्दिक चाहिये? वैसे भी तहरीक, दानिशनरी अवाम के लिये लड़ने वालों को यह ग़ुलाम क़ौम ज़लील ही समझती है फिर जिग्नेश क्यों चाहिये जनाब?

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  • December 4, 2017 at 1:05 pm
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    भाजपा को मज़बूत करने में इन ज़ाहिदों का सबसे बड़ा हाथ रहा हे —————————————————————————————————- Mohd Zahid is with Mohd Zahid and 9 others.
    4 hrs ·
    FBP/17-262
    बराक ओबामा के अनकहे बोल :-
    पिछले दिनों अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति “बराक ओबामा” भारत के दौरे पर थे और एक समाचार हाऊस के कार्यक्रम में उन्होंने जो बातें कहीं वह देश और दुनिया को ध्यान से सुनने और समझने की ज़रूरत है।
    उन्होंने कहा कि
    “भारत को अपनी मुस्लिम आबादी की कद्र करनी चाहिए ,उन्होंने राष्ट्रपति रहते हुए निजी तौर पर पीएम नरेंद्र मोदी से कहा था कि धर्म के आधार पर भारत का विभाजन नहीं किया जाना चाहिए।”
    उन्होंने कहा कि “भारत को भारतीय मुसलमानों का ध्यान रखना चाहिए जो खुद को इस देश से जुड़ा हुआ और भारतीय मानते हैं।”
    ओबामा ने कहा, ‘मैंने पीएम मोदी से निजी तौर पर कहा था कि भारत को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यहां मुसलमान अपनी पहचान एक भारतीय के रूप में कर सकें।
    ओबामा ने कहा, “‘खासतौर से भारत जैसे देश में जहां विशाल मुस्लिम आबादी है और जो सफल है, समाज का अविभाज्य अंग है तथा अपने आपको भारतीय मानता है, दुर्भाग्य से ऐसा अन्य देशों में नहीं है जहां अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय को ऐसी अनुभूति होती हो। मुझे लगता है कि यह ऐसा कुछ है जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए, उसे संपोषित व विकसित करने की जरूरत है।”
    दरअसल बराक ओबामा इशारों इशारों में बहुत कुछ कह गये कि शेष देशों के अल्पसंख्यक अपने देश के प्रति वह मुहब्बत और जज़्बा नहीं रखते जो भारत के अल्पसंख्यक मुसलमान अपने देश के लिए रखते हैं।
    उदाहरण के लिए बहुत अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है , अपने पड़ोस के पाकिस्तान और बंग्लादेश के हिन्दू अल्पसंख्कों तथा श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिलों का उदाहरण सबके सामने है।
    एक आँकड़ों के अनुसार भारत में 1 लाख़ 20 हज़ार पाकिस्तानी हिंदू अपना देश छोड़ कर भारत में रहते हैं और औसतन हर साल एक हज़ार हिंदू पाकिस्तान से भारत आते हैं।
    http://www.bbc.com/…/160424_pakistan_hindu_migrants_gallery…
    वहाँ से आए यह पाकिस्तानी अल्पसंख्यक हिन्दू दक्षिण दिल्ली की संजय गांधी कॉलोनी में रहते हैं।
    ऐसे ही , बंग्लादेश के विभाजन के समय पाकिस्तान में रह रहे हिन्दू अल्पसंख्यक अपने देश से भाग कर बंग्लादेश के रास्ते भारत में प्रवेश कर जाते हैं जिनकी अधिकारिक संख्या लाखों में है , इसी कारण पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं की संख्या कम होकर 6% रह गयी , और पाकिस्तानी हिन्दुओं की अपने देश से गद्दारी की यही प्रक्रिया जारी रही तो रही सही संख्या भी समाप्त हो जाएगी।
    श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिलों का अपने देश से गद्दारी का इतिहास कौन नहीं जानता ? प्रभाकरण की अलग देश की माँग और तमिलों का भारत से अधिक निकटता अपने देश से गद्दारी का उदाहरण ही तो है।
    यह है इन तीनों देशों के अल्पसंख्यकों का अपने देश के प्रति प्रेम , जबकि भारत के मुसलमान दो दो पड़ोसी मुस्लिम देशों के रहते उधर जाना तो छोड़िए एक हद तक उनसे नफरत करता है और अपने देश से बेइंतेहा मुहब्बत करता है।
    बराक ओबामा यही कह रहे थे , बस उदाहरण ना दे सके। बराक ओबामा अमेरिका के 8 साल तक राष्ट्रपति रहे हैं और सारी दुनिया के देशों के अलूपसंख्यक समुदाय के उस देश के प्रति भावना को समझते होंगे , मोटी मोटी रिपोर्टें पढ़ी होंगीं , यूँ ही नहीं उन्होंने भारतीय मुसलमानों के संदर्भ में इतनी महत्वपुर्ण बात कह दी।
    और सिर्फ़ बराक ओबामा ही क्युँ ?
    भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बयानों को भी इसी संदर्भ में रख कर देखिए कि भारत में इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी के बावजूद “आईएस” और “अल-कायदा” जैसे संगठन कभी सफल नहीं हुए।
    यह बयान भी यूँ ही नहीं है , क्युँकि भारत का मुसलमान अपने देश के लिए सदैव वफादार रहा है , ना वह “कालाधन” की लिस्ट में शामिल होता है ना “पनामा और पैराडाईज़” लीकेज लिस्ट में और ना भ्रष्टाचार के घालमेल में।
    ऐसा करने के लिए मुसलमानों को “कुरान” से सीख मिली है कि जिस देश में रहो उस देश के लिए वफादार रहो , ईमान की मज़बूती में देशप्रेम शामिल है।
    यही कारण है कि , आज़ादी के बाद तमाम सरकारी जेनोसाईड “हाशिमपुरा , मुरादाबाद ईदगाह , मुंबई , गुजरात , भागलपुर , वाराणसी , कानपुर , मेरठ , मलियाना , मुजफ्फरनगर , सूरत , 1992 मुम्बई , भिवंडी , बाबरी मस्जिद की शहादत ” इत्यादि के बावजूद भारत के मुसलमानों ने कभी देश छोड़कर पड़ोस के मुस्लिम देशों में जाने का सोचा तक नहीं और ना ही किसी “खालिस्तान” की तरह अलग देश की माँग की।
    ध्यान दीजिए कि “पाकिस्तान” भी भारत के मुसलमानों की माँग पर नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में नेहरू-जिन्ना-पटेल की सत्ता की बंदरबाँट में हुई विफलता के कारण बनाया गया।
    बराक ओबामा यही कहना चाह रहे थे जो वह खुल कर नहीं कह सके।
    देश के प्रति वफादारी दुनिया को भारत के अल्पसंख्यक मुसलमानों से सीखना चाहिए और उनको विशेष रूप से सीखना चाहिए जो अपने देश पाकिस्तान से भागकर भारत से वापस नहीं जाते।

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  • December 5, 2017 at 6:46 pm
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    मुसलमानो में सारी सेकुलर आवाज़े या तो अधिकतर शिया हे या बरेलवी बोहरा अहमदी हे नहीं तो फिर कम्युनिस्ट टाइप हे , हमें देवबंदी रिलजियस भी और सेकुलर लिबरल भी दीन और दुनिया को साथ लेकर चलने वाली मुस्लिम सोच बढ़ानी होगी काम लगभग नामुमकिन हे इसलिए इस तरह की लिबरल आवाज़े नहीं हे खेर फिर भी उम्मीद रखनी चाहिए इससे ही बदलाव आएगा वार्ना नहीं हमारी तो यही कोशिश हे —————————————————
    Sheeba Aslam Fehmi42 mins · मेरे कम्युनिस्ट मां -बाप को इंदिरा गाँधी की एक ही बात पसंद थी और हमें बार बार बताई जाती थी की वो हरी सब्ज़ी और दाल शौक़ से खाती हैं. मेरे लिए उनकी यही बात सबसे ज़हर थी की क्यों? और अगर खाती भी हैं तो ये बात बाहर लाने की क्या ज़रुरत थी की मेरे पेरेंट्स तक पहुँच गयी? हमारा तो एक ही लॉजिक रहता था की वैसे तो वो आप लोगों के हिसाब से इतनी ज़ालिम हैं की कभी इमरजेंसी लगवाई थी, लेकिन हमारे मामले में उनको बड़ी इज़्ज़त से, सादा खाना खानेवाली बताया जाता है. अरे हमें नहीं बनना इंदिरा गाँधी बस.

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  • January 10, 2018 at 10:15 am
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    Pawan
    12 hrs ·

    आप शांतिदूत हैं तो आप शान से AMU, जामिया,हमदर्द और तिब्बिया जैसे विश्व विद्यालयों में नाम मात्र की शैक्षिक फीस और कुछ कौड़ियां देकर होस्टल में रहते हुए शान से मांसाहारी भोजन और नाश्ते की सौगात ग्रहण कर सकते हैं ! क्लास में जाएं तो अच्छा ! न जाएं तो और भी अच्छा , क्योकि ‘छात्र और शिक्षक’ ,’नंबर देने वाले और नम्बर मांगने वाले’ दोनों ‘अशरफुल मख़लूक़ात’ अर्थात अल्लाह के बंदे हैं ,यहां कोई फेल नहीं होता !! औसत ‘शांतिदूत’ छात्र भी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से अभियंता, डाक्टर और स्कॉलर बन कर निकलते हैं ! मुस्लिम होना यहां एक योग्यता है,मगर यदि आप कश्मीर , अफगानिस्तान, बांग्लादेश ,बिहार और उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जैसे क्षेत्रों के शांतिदूत हैं तो आपका खास स्वागत है अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में …
    साथियों,देशविभाजन की लकीरें अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में खींची गईं , साम्प्रदयिक हिंसा सहित हर प्रकार के अपराधों का भीषण इतिहास, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की प्रसिद्धि में चार चांद लगाता है ! चूंकि पुलिस यूनिवर्सिटी में घुस नहीं सकती,अतः अनेक अपराधी कैंपस के बाहर और अंदर अपराध कर होस्टलों में छुपे रहते हैं और उन्हें खुल कर पनाह दी जाती है…..
    अब आते हैं,मन्नान वानी,कश्मीरी पीएचडी स्कॉलर की गाथा पर ,वानी पिछले पांच साल से AMU में ‘पढ़’ रहा था ! एम.फिल छात्र के रूप में भारत सरकार रु 16000/- प्रतिमाह का वजीफा 3 साल तक देती रही थी ! पिछले 2 साल से पीएचडी स्कालर के रूप में भारत सरकार मन्नान वानी को रु 25000/- प्रति माह का वजीफा देती आ रही थी ! लांखोँ रु खर्च कर हम अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के मॉध्यम से मन्नान वानी जैसे कश्मीरी आतंकी बना रहे हैं ! मन्नान वानी हिजबुल का Ak-47 लिए हुए जेहादी आतंकवादी बन चुका है ……
    सबक हैं ! मोदी साहेब के लिए कि कम्प्यूटर और आधुनिक सुविधाएं ,समृद्धि और धन रूपी रिश्वत देने के बाद लोग आतंकवादी नहीं बनेंगे– यह ज़रूरी नहीं है ! मोदी साहेब ! आपने कश्मीर में धन और सुविधाओं की नदी बहा रखी है ,खजाना खोल रखा है, मगर आतंक न रुकना था , न रुका !————————————-Pawan
    23 hrs ·
    “हाउ पुअर पीपुल दीस मुस्लिम्स आर !
    माइ गोश् ! होरिबल !
    वी शुड डू समथिंग स्पेशल टू दीस पुअर पीपुल !”

    यह उन कूल डूड लोगों के बीच की बातचीत है जो लंच में ठेले पर छोले-कुलचे खाने के बाद 40 मंजिला बिल्डिंग के नीचे गुनगुनी धूप में खड़े होकर सिगरेट के सुट्टे का मज़ा ले रहे हैं !!
    #हाउ_पुअर’ लोगों की हकीकत जानिए ! पता नहीं वह बंगला है या बांग्लादेशी ! मगर बंगाली मिक्स हिंदी बोलता है नूर उल इस्लाम !अँगूठा छाप है ! पंचर जोड़ने का बिज़निस है भाई का ! 50 रु रेट है मोटर साइकिल का,80 रु रेट कार का ,बड़ी कार मने एसयूवी,वग़ैरा तो रु 125/- प्रति पंचर !! नकली ट्यूब रु 80/- वाला रु 300/- में मोटर साइकिल में,कार में 125 वाला 375 /- में लगाया जाता है यहाँ !! शर्त बस इतनी सी कि मोटर साइकिल-कार मालिक इमरजेंसी,जल्दी में हो और अज्ञानी हो ! जनाब जिन मुस्लिम मज़लूम (?) लोगों की मज़ाक हम #पंचर_वाला’ कह बना रहे हैं उनकी दैनिक आय एनसीआर में रु 1000/- से लेकर रु 5000/- प्रति दिन तक है ! यानि रु 30000/- प्रति महीना कम से कम और अधिकतम की कोई सीमा नहीं !!
    कहानी चालू आहे ! नूर उल इस्लाम TV- कूलर-युक्त ‘झोपड़पट्टी’ में निवास करता है ! कांग्रेस सरकार ने ‘निर्वासन स्कीम’ के अंतर्गत मुआवज़े में उल इस्लाम को एक कमरे का फ्लैट फ्री, NCR में आबंटित किया ! नूर उल इस्लाम ने रु 10000/- में फ्लैट को किराए पर दे दिया और झोपड़पट्टी से सरकारी दामादों को हटा कौन सकता है ! आज नूर उल उल इस्लाम एनसीआर में दो घर,एक कार ,एक मोटर साइकिल और 5 बच्चों का मालिक है और नमाज़ी मुस्लमान तो है ही !!!
    ऊपर अंग्रेज़ी झाड़ते कूल डूड हिंदु हैं ! 12 लाख में बीटेक करने के बाद प्राइवेट कंपनी में कथित इंजीनियर हैं और रु 15000/- महीना कमाते हैं…..

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  • January 23, 2018 at 7:02 pm
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    Ashish
    20 December 2017 ·
    IAS के एग्जाम में अचानक मुस्लिम्स की बाढ़ क्यो आ गयी है….
    कड़वा सच
    पिछले 4-5 सालों से कश्मीरी मुस्लिम युवक UPSC में बहुत सेलेक्ट हो रहें , इसका कारण जानना चाहा , कश्मीरी ही नहीं बल्कि पूरे भारत से मुस्लिम युवक भी बड़ी मात्रा में upsc की बाजी मार रहें पहले इनका चयन % कम था ।।
    आप इसमें एक पैटर्न देखेंगे बस मेरी बात सावधानी से समझने की कोशिश करियेगा
    जो मुस्लिम उर्दू साहित्य mains में रखेगा जाहिर है हिन्दू उर्दू नही पढ़ते उन्हें जाँचने वाला भी मुस्लिम ही होगा और वो चाहेगा उसकी कौम का बन्दा अधिकारी बने ताकि बाद में प्रेशर ग्रुप बना सकें पूरी सरकार पे ।।
    अभी आप देखेंगे तो mains में आप उर्दू ही रख सकते हैं ऐसा तमाम वेबसाइट्स आपको दिखायेंगी लेकिन एक न्यूज़ चैनल पर मैंने कुछ दिन पहले जब रिजल्ट आया था तो उसमे किसी कश्मीरी के बारे में बता रहा था
    उसने विषय बताया था , urdu & islamic studies से इन्होंने upsc दिया है , क्या ऐसा कुछ UPSC में शामिल हुआ है ?
    खोजने का प्रयास कीजियेगा इसमें कितनी सत्यता है ।
    किसी को पता हो तो कमेन्ट सेक्शन में बताइयेगा जरूर
    अगर इस्लामिक स्टडी शामिल हुआ है तो मैं इसका पुरजोर विरोध करता हूँ , लेकिन यह जानकारी केवल उस न्यूज चैनल पर एक झलकी पर आधारित है , इसकी सत्यता मैं बिलकुल नही जानता ।
    अब एक बात और गौर करने वाली है ,
    1.अल अमीन एजुकेशनल सोसाइटी , बैंगलोर
    2. जामिया सल्फ़िया , वाराणसी
    3. अल बरकत इंस्टिट्यूट , अलीगढ
    4. Aliah यूनिवर्सिटी , कोलकाता
    5. अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
    6. अल फलाह यूनिवर्सिटी , फरीदाबाद
    7. अंजुमान हमी ए मुसलमीन , भटकल
    8. अंजुमन ए इस्लाम , मुंबई
    9. अंसार अरेबिक कालेज , मल्लपुरम
    10. अल जामिया अल इस्लामिया , मल्लपुरम
    11. वीमेन इस्लामिया कालेज , मल्लपुरम
    12. चौधरी नियाज मुहम्मद कालेज , बैसूली बदायूँ
    13. दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी
    14. हमदर्द यूनिवर्सिटी दिल्ली
    15. जमाल मोहम्मद कालेज trichy
    16. इब्न सीना अकैडमी
    17. जामिया अर्फ़िया , कौशाम्बी
    18. जामिया मिलिया इस्लामिया
    19. जामिया नूरिया अरबिया
    20. मदरसा अल बकीयत अल सहलात , वेल्लूर
    आदि आदि इत्यादि ये सारे मुस्लिम स्पेशल इंस्टिट्यूट हैं , यहाँ हिन्दू मिलेंगे नही , मिलेंगे भी तो नाम मात्र के वो भी कुछ जगह जो केंद्रीय बड़ी यूनिवर्सिटी हैं जैसे अलीगढ या ओस्मानिया हैदराबाद , बाकी हजारों इंस्टिट्यूट जहाँ हिन्दू झाँकने भी नहीं जाता
    अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी/कालेज के अंतर्गत चल रहे , सरकार से पैसा पाते हैं और पढ़ाते हैं
    इस्लामिक स्टडीज ।।
    एक भी ऐसी यूनिवर्सिटी इस देश में है जहाँ हिंदुत्व या वैदिक कल्चर की पढ़ाई होती हो ?
    जहाँ वेद पढ़ाये जाते हों ?
    पर इस्लामिक स्टडी की हजारों हैं ।।
    एक भी सिक्ख को अब एसपीजी में नौकरी नही मिलती प्राइम मिनिस्टर की सुरक्षा के लिए जब से इंदिरा गाँधी की मौत हुई है , पंजाब में जब स्वर्ण मंदिर में सेना घुसी थी पंजाब रेजिमेंट के कई सैनिकों और अधिकारियों ने विद्रोह कर दिया था सेना में
    अंत में नियम बदला आज महार रेजिमेंट में भी ब्राह्मण अधिकारी/ सैनिक भेज दिया जाता है , सिक्खों को बाँट दिया गया , आज हर रेजिमेंट में ये आपको मिलेंगे।
    ये इस्लामिक स्टडी से , इन्हें आईएएस बनाना मतलब असंतोष और प्रेशर ग्रुप का निर्माण करना ,
    किसी भी कठोर नीति को कश्मीर के विरुद्ध ये बनने नही देंगे ।।
    20 करोड़ की आबादी माइनॉरिटी नही होती है , इनसे सारे अल्पसंख्यक अधिकार लिए जाने चाहिए । ये भारत का मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है । इंडोनेशिया के बाद विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी भारत में है ????
    ताज्जुब यह है कि फिर भी अल्पसंख्यक है ??????
    सबसे पहले इनके मदरसे गिनने चहिए , इन इस्लामिक संस्थाओं में क्या चल रहा , क्या पढ़ाया जा रहा सबकी जाँच हो , इन्हें कोई वित्तिय सहायता नही देनी चाहिए , । यही सच्ची धर्मनिरपेक्षता है , यही secularism है ।
    इनमे गणित , विज्ञान, कंप्यूटर के शिक्षक भर्ती किये जाने चाहिए ????
    Aaryan Silwniya
    सतवीर सिंह की वाल

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  • January 23, 2018 at 8:04 pm
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    Virendra Singh 1. लखनऊ के मदरसे में लड़कियों के बलात्कार के मामले में
    मुसलमानों ने बस यह कह कर चैप्टर क्लोज़ कर दिया कि
    वो मदरसा नहीं, हॉस्टल था और वो हॉस्टल मालिक और किराएदार लड़कियों के बीच का झगड़ा था।
    किसी भी मुस्लिम को यह नहीं दिखा कि वो शख़्स मुसलमान था जो ज़िना कर रहा था, तो उस पर लानत भेजते,
    किसी भी मुस्लिम को यह नहीं दिखा कि ज़िना हुई लड़कियाँ मुस्लिमाँ थीं,
    वो लड़कियाँ पूरी इन्सानी नस्ल की बहनें हुईं, सभी मुस्लिमों की बहनें हुईं,
    आपकी बहनों पर ज़िना हुआ तब भी आपके मुँह से उनके लिए हमदर्दी के दो अल्फ़ाज़ भी न निकले?
    आपने तो बस “वो मदरसा नहीं था” कह कर चैप्टर क्लोज़ कर दिया।
    किसी मुस्लिम द्वारा रेप करना, किसी मुस्लिमां का रेप होना, इस सब पर आप एक शब्द भी न बोले।
    इसलिए आप गाली खाते हैं।
    जबकि हिन्दू बाबाओं के ख़िलाफ़ किसी भी आरोप पर अधिकांश हिन्दू बाबाओं को खुल कर बुरा भला कहते हैं, और पीड़िताओं से हमदर्दी जताते हैं।
    2. दिल्ली सरकार द्वारा कब्रिस्तान के अधिग्रहण के मामले में
    दर्जनों मुसलमानों की पोस्टें दिखीं,
    विशेषकर उस मुद्दे पर कि गोपाल राय से मिलने गई मुस्लिमों की टीम के साथ हाथापाई हुई.
    लेकिन एक भी मुस्लिम ने यह नहीं कहा कि क्योंकि उस ज़मीन पर किसी मुस्लिम का या वक़्फ़ बोर्ड का हक़ नहीं है, इसलिए मुस्लिमों को उस ज़मीन का इस्तेमाल कब्रिस्तान के तौर पर करने का कोई हक़ नहीं है, ऐसा इस्तेमाल वास्तव में मुस्लिमों की फोक्ट्यागिरी है।

    औरगोपाल राय की मीटिंग की वीडियो रिकॉर्डिंग से साबित हुआ कि मुस्लिमों का दल ख़ुद ही वहाँ इरादतन बलवा करने गया था, और उन्होंने ही वहाँ सारी गड़बड़ शुरू की थी।
    उसके बाद से इस मामले पर लम्बी लम्बी पोस्टें करने वाले मुँह में दही जमा कर बैठ गए, किसी ने एक सॉरी भी न बोला कि ग़लत मुद्दे पर ग़लती करने वाले लोगों का समर्थन किया था,
    इसलिए मुस्लिम गाली खाते हैं।
    3. अधिकांश मुस्लिम सिर्फ़ मुस्लिमों से रिलेटेड मुद्दों को पोस्ट करते हैं,
    वो ढूँढ ढूँढ कर किसी मुस्लिम को खोद लाते हैं, जिसने कोई चिन्दी सा अच्छा काम किया हो फिर उसके गुणगान करते रहते हैं, जैसे वो सारा काम उसी एक मुस्लिम के उस चिन्दी से काम की वजह से पूरा हो पाया हो।
    मुस्लिम आज़ादी की लड़ाई या गदर में किसी अनजान मुस्लिम को खोद निकालेंगे कि उसने यह किया, वो किया और गदर उसी मुस्लिम की वजह से उतना फैला या आज़ादी उस एक मुस्लिम के उस एक काम की वजह से मिली, वगैरह…
    किसी मुस्लिम पर कोई ज़रा सा अन्याय हुआ हो, तो मुस्लिम उसके बारे में बहुत पोस्ट करते हैं कि यह पूरी मुस्लिम क़ौम के ख़िलाफ़ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, “दीन ख़तरे में आ गया है।”इस तरह कीअपनी क़ौम में घुसे रहने की क़बीलाई मानसिकताप्रपोर्शन का ख़्याल न रखने
    की वजह से
    Virendra Singh

    Reply
  • January 23, 2018 at 8:20 pm
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    Sarfraz Katihari shared प्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ है’s post.प्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ हैप्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ है
    31 December 2017 at 18:57 ·
    खबर यह आ रही है के मीडिया जिसको मदरसा बता के बदनाम करने के लिएे खबर चालाया वोह दरसल Women PG होस्टल था .

    मदरसों में तो उनको कुछ मिल नही पाता , तुफान मचा नही पा रहा .

    अब यह मीडिया वाले PG को मदरसा क्यूँ बताया ,यह तो अाप समझ ही गयी होंगे . मीडिया का one point agenda दिन रात का एक ही है इस्लाम से नफरत पैदा करना .

    जिस तरह से अाप का कोई नेता नही है वैसा ही कोई बड़ा tv मीडिया अाप के पास नही है जो सच दिखा के इनको बेनकाब कर पाये .

    लोगों ने पहले ही आगाह किया था जिस रफतार से ब्रहामन बाबा लोग अश्रामों में धरा रहे हैं ,बैलन्स बनाने के लिएे किसी ना किसी मुल्ले की गर्दन जल्दी चाहिए ,मदरसा टार्गेट हो सकता है .

    लखनऊ में मुफ़्ती पर इलजाम लगाया गया है पिटायी का , मगर मामला बाबाओं के बराबार करने के लिएे पुरी तरह से यौन शोषन का बना के दिखा दिया गया है , जबकी खाना बनाने वाली औरत जो रोज़ मदरसे में जाती थी साफ कह रही है हमने कभी ऐसा नही देखा . जिन की बच्चियां पढती थीं उनकी माँ कह रही है हमारी बच्चियों ने कभी ऐसी शिकायत नही की .

    SP साहब तिवारी जी बड़े सक्रये हो गये हैं ,मीडिया लिखती है लड़कियों को ‘Rescue ‘ किया गया .काहे का Rescue बे , आश्रम की तरह वहां लठइत ,बन्दुक धारी गुंडे थे जो बंधक बनाये हुए थे लड़कियों को ताक़त से ?

    बाबाओं के आश्रम को तो पुलिस घेर कर कितने दिन रखती थी ,अंदर से गोली चलती थी। यहा तो किसी लड़की ने छत से प्रताड़न होने का खत गिराया (रेप की शिकायत ही नही है , बुरे व्यवहार की शिकायत है ) तो खबर मिलते ही मदरसे के मालिक और अन्य लोक़ल मुस्लिम ने पुलिस बुलाया और मुफती को गिरफ़्तार करवाया .यह बुनियादी फर्क है मानसिकता का ,दूसरा एंगल जो आ रहा है जैसा लखनऊ के लोकल बता रहे हैं के ज़मीन का मामला है, ज़मीन के मालिक को ज़मीन वापस चाहिए थी।

    फिर ‘Rescue ‘ कैसे हुआ बे। शिकायत हुई और होस्टेल को सील कर दिया गया ,सही गलत बाद में पता चलेगा’ पर मुस्लिम पहले लड़कियों के समर्थन में खड़े हुए।
    संदेशवाहक: Aamir Kirmaniबैठ जाईये…. बैठ जाइये….

    सभी को क़ानून की धज्जियां उडाने का मौक़ा मिलेगा, अभी करणी सैना और राजपूतों की बारी है।

    जाटो ने पटरिया उखाड कर आरक्षण निकाल लिया था, मुरथल मे औरतो को बसो से उतार कर ब्लातकार किये थे। कानून खामोश था, इतना खामोश रहा की थानो मे भी रिपोर्ट भी नही हुई थी अगर महिलाओं के अंतवस्त्र सडको के किनारे ना मिले होते तो संज्ञान भी ना लिया जाता।

    कानून जब भी खामोश था जब राम पाल ने शहर को छावनी बना दिया था,कानून जब भी मजबूर था जब पटेलो ने जब कानून और सरकारी संपत्ती को खिलौना समझ लिया था, कानून जब भी अपंग था जब ब्लातकारी राम रहीम के अनूयाई सारे भारते के सामने टीवी पर कह रहै थे “भारत को दुनिया के नक्शे से मिटाने मे एक मिनट लगेगा”

    में कांप उठता हूं ये सोचकर की इनसे अगर एक भी आंदोलन किसी मुसलमान तंज़ीम ने किया होता तो घरो से निकाल कर एंकाउटर कर दिया गया होता, लेकिन जाटो गूजरो और करणी सैना की इतनी आरजकता फैलाने के बाद भी कानून और उसके रखवाले खामोश हैं और वो लोग हीरो बन रहै है जिन्हे जैल मे होना चाहिए था।

    मुसलमानों के प्रदर्शनो को राष्ट्रद्रोह करार दे दिया जाता है कश्मीर मे पैलेट गन से बात की जाती है, बाकी कानून को जूते की नोंक पर रखने वाले जाट गूजर और करणी सैना वाले तो ‘अपने’ लोग हैं।
    ( Shoaib Gazi)
    17 January at 03:27 ·
    आमतौर से इंसान जब किसी चीज़ को हासिल करने की कोशिश करता है या उसके सपने देखता है और उसे हासिल करने में नाकाम हो जाता है तो फरस्ट्रेशन और डिप्रेशन में चला जाता है, ये एक इंडिविजुअल के साथ या किसी व्यक्ति के साथ घटने वाला कोई मामला हो सकता है
    लेकिन जब पूरे समाज में फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन फैल जाए तो इसकी क्या वजह हो सकती है ?
    मेरी समझ से इसका एक बड़ा कारण पिछली सदियों में जन्म लेने वाली विचारधाराएं हैं, जिनमे से ज़्यादातर विचारधाराओं के अंदर आइडियलज़्म ऑब्सेशन था अर्थात आदर्श स्थिति को हासिल करने का जूनून, कोई विचारधारा आदर्श समाज स्थापित करना चाहता है, कोई आदर्श राजनितिक सिस्टम बनाना चाहता है तो कोई आदर्श आर्थिक सिस्टम स्थापित करना चाहता है , कोई जेंडर इक़ुअलिटी के आदर्श वाद के सपने देखता है तो कोई कल्चरल और लिंगुअल इक़ुअलिटी के आदर्श स्थिति को स्थापित करना चाहता है |
    जबकि प्रकृति में तो कोई भी चीज़ इक़ुअलिटी को लेकर आदर्श स्थिति में नहीं पायी जाती है, दो सगे भाई भी एक जैसे नहीं होते हैं उनमें भी बहुत तरह का डिफ़रेंस होता है, दो सगी बहने एक जैसी नहीं होती, बाप-बेटे एक जैसे नहीं होते, माँ-बेटी एक जैसी नहीं होती, औरत मर्द एक जैसे नहीं होते हैं, जब ये प्रकृति ही आदर्श स्थिति में नहीं है तो फिर इसमें आदर्शवाद का जूनून दरअसल प्रकृति के विरुद्ध जाने के जैसा है,
    पिछली सदी में उभरने वाली विचारधाराओं ने दुनिया को आदर्श व्यवस्था स्थापित करने के एक ऐसे काम के पीछे लगा दिया है जो आदर्श स्थिति कभी प्राप्त ही नहीं की जा सकती है , जब लोग आदर्श के पीछे भागते रहे और उसे स्थापित करने में नाकाम रहे तो नतीजे में फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन ने दुनिया को घेर लिया |
    इस्लाम के सिधान्तो के अनुरूप आदर्श समाज इस दुनिया में स्थापित नहीं किया जा सकता बल्कि इस्लाम ने आदर्श समाज को परलोक के जीवन मे बताया है |
    अल्लाह ने आदर्श समाज या आइडियल समाज को आख़िरत के लिए बनाया है जबकि लोग उसे दुनिया में तलाश करते हैं, नतीजे में नाकाम होते हैं |
    1 hr ·
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    प्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ हैLike Page
    21 January at 05:23 ·
    सन 1912 में मशहूर जीवाश्म वैज्ञानिक डॉक्टर चार्ल्स डाउसन ने दावा किया की उन्हें इंग्लैंड के पिल्टडाउन में एक जीवाश्म मिला है जो पांच लाख साल पुराना है, दावा किया गया के बंदर से इन्सान बनने के बीच की ये एक कड़ी अर्थात मिस्सिंग लिंक है, जिससे डार्विन का थ्योरी ऑफ़ एवोलुशन सही साबित होता है
    चालीस साल तक वैज्ञानिक उस जीवाश्म को बंदर और इन्सान के बीच का मिस्सिंग लिंक मानकर शोध करते रहे, उसको थ्योरी ऑफ़ एवोलुशन की एक कड़ी के तौर पर माना और जाना जाता रहा, पांच सौ से ज्यादा लोग उस जीवाश्म के ऊपर डाक्टरेट की थीसिस जमा करके डॉक्टर भी बन गए,

    लेकिन सन 1953 में इस धोखाधड़ी का पर्दाफाश हुआ और पता चला के वो जीवाश्म पांच लाख साल पुराना नहीं है बल्कि कुछ ही सौ साल पुराना है
    साथ ही उस जीवाश्म मे और भी कई धोखाधड़ी की गयी थी जैसे की उस जीवाशम की खोपड़ी पांच सौ साल पहले मरने वाले एक इन्सान की थी जिसमे कुछ साल पहले मरे वानर के जबड़े की हड्डी लगाई गयी थी, उसमे ओरंगुटान के दांत जोड़े गए थे, जबड़े की दाढ़ की सतह को कृत्रिम तरीके से घिसा गया था ताकि वो आदमी जैसा लगे फिर उन सब टुकड़ों को पुराना दिखाने के लिए उन्हें पोटासियम डायाक्रोमेट में डुबाया गया था ताकि वो पुराना दिखाई दे
    इस तरफ फर्जीवाड़ा और धोखधड़ी की सहायता लेकर डार्विन की थ्योरी ऑफ़ एवोलुशन का मिस्सिंग लिंक ढूंढा गया था

    ये सब फर्जीवाड़ा और धोखाधड़ी एवोलुशन वैज्ञानिको ने किया था और उसको सच मानकर चालीस साल तक किताबें लिखी गयी, डिग्रीयां बांटी जाती रही, रिसर्च होता रहा, थ्योरी स्थापित की जाती रही

    विज्ञान की दुनिया में इस घटना को एक बहुत बड़ा फ्रॉड माना जाता है जिसे अंजाम देने वाले पढ़े लिखे लोग थे, लगभग चालीस साल तक लोग इस फ्रॉड को वैज्ञानिक सच मान कर पढ़ते और पढ़ाते रहे

    चूँकि पिछले डेढ़ सौ सालों में डार्विन का थ्योरी ऑफ एवोलुशन नास्तिकों की आस्था का आधार बन चुका है इसलिए नास्तिकों का पूरा जोर लगा रहता है के इस थ्योरी को किसी भी तरह से सही साबित किया जाता रहे और ये गलत साबित न होने पाए
    इसलिए थ्योरी ऑफ़ एवोलुशन को सही साबित करने के लिए नास्तिक लोग एडी चोटी का जोर लगाये रहते हैं
    थ्योरी ऑफ़ एवोलुशन को नास्तिकों की आस्था बन जाने की वजह से इस फिल्ड में इंडिपेंडेंट रिसर्च करके नतीजा निकालना मुश्किल हो चुका हैप्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ हैप्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ है
    18 January at 06:42 ·
    मेरे इस्लाम अपनाने के मामले को इस बात से जोड़कर देख रहे हैं कि मानो मैं किसी खतरनाक मकसद को अंजाम देने वाला हूं। मैं एक अच्छा लड़का हूं। मैंने कभी कोई गलत काम नहीं किया। मैं कभी न जेल गया न अदालत। मैं उन गोरी औरतों की तरफ भी ध्यान नहीं देता जो मुझे आंखों के इशारे करती हैं।
    मैं उन लोगों पर खुद को नहीं थोपता जो मुझे पसंद नहीं करते। जहां मेरा सम्मान नहीं होता, वहां मैं बेचैनी महसूस करता हूं। मैं गोरे लोगों को पसंद करता हूं। मैं अपने लोगों को भी पसंद करता हूं। वे बिना किसी परेशानी के एक साथ रह सकते हैं। अगर कोई शान्तिप्रिय रास्ता अपनाता है तो आप उसे बुरा नहीं कह सकते, अगर फिर भी आप ऐसा करते हैं तो शान्ति का ही विरोध करते हैं।
    .
    – मोहम्मद अली

    (दुनिया के तीन बार हैविवेट चैम्पियन रह चुके अमेरिका के मशहूर बॉक्सर)
    2 January at 23:01 ·
    ‘सभी धर्म बराबार हैं ‘ .
    सेकुलरिज्म का यह स्लोगन सुनने में बहुत अच्छा है . गांधी ने भी यही कहा था .(दरअसल जब अंग्रेजी शासन में मिशनरी ज़ोर शोर से लगी थीं तो गांधी ने दलिल दी के सभी धर्म बराबर हैं ,इसलिये किसी को अपना पैदाइशी धर्म छोड़ने की ज़रूरत नही है .हिन्दू धर्म में मची भगदड़ को रोकने के लिएे उनहोने दलितों को हरि का आदमी (हरीजन ) बनाने की कोशिश की . )

    आज भी अाप कुछ अच्छी नैतिक धार्मिक बात करने लगें तो सिकुलर ,नास्तिक ब्रिगेड आ के अाप को पिछड़ा बता देगा और चर्चा को बंद करने को कहेगा क्यूंकी उसके अनुसार सभी धर्म बराबर हैं संप्रदायिक सदभाव खराब नही करना चाहिए .

    इन सब बातों का प्रभाव व्यवहारिक रुप से क्या होता है यह अाप मोहनदास करम चन्द के प्रदेश गुजरात में देख सकते हैं . दरअसल यह लिबरल, सिकुलर महानुभाव गण भगवा ब्रिगेड का ही काम आसान करते हैं ,एक बार साबित हो गया के हिन्दू धर्म किसी से कम नही है बल्की बराबर है (चुंकी सभी धर्म बराबर हैँ ) तो गांधी का प्रदेश गुजरात सब से पहले हिन्दुत्वा की प्रयोगशाला बन जाता है .

    दरअसल सभी धर्म बराबर है यह कह के वैचारिक परामर्श को ही समाप्त कर दिया जाता है और रह जाती है अंध भक्ती , उन्मादी भीड़ जो बुद्धि से नही आस्था से सोचती है ,जिस से आज का गुजरात बनता है .

    ‘सभी धर्म बराबर हैं ‘ का अर्थ यह भी होता है के जो चाहो करो कोई फर्क नही पैंदा , इस से बाजार वाद भौतिकता को भी आसानी मिलती है .

    जबकी समाजिक सदभाव लाने का सही तरिका यह है के
    हर किसी को धर्म मानने , या ना मानने या किसी भी तरह का धर्म मानने की आजादी हो .

    ईसलाम की बात करें तो वह यह नही कहता के ‘सभी धर्म बराबर है ‘ वोह साफ कहता है के सही और गलत दोनो बराबर नही हैं ,पर अाप क्या चुनना चाहते हैं इसकी अाप को पुरी आजादी है इसमें कोई ज़ोर ज़बर्दस्ती नही है , पर सही क्या है गलत क्या है यह अाप को बताया ज़रूर जायेगा .
    .
    (इस पोस्ट को शादान अहमद के वाल से कॉपी किया गया है)प्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ है shared OnePath Network’s video.
    17 January at 06:35 ·
    न्यूज़ीलैंड के मशहूर रग्बी खिलाडी sonny bill williams ने सन 2009 में इस्लाम धर्म को अपनाया था, कुछ दिनों पहले उन्होंने उमरा किया है, मक्का और मदीना का सफ़र किया है

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  • January 26, 2018 at 9:01 am
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    इमरान परताप गढ़ी की ब्रांडिंग के लिए उनके दोस्त इस तरह के लेख लिख रहे हे ———————————————-”Mohd Zahid is with Abbas Pathan and 10 others.22 mins · मुस्लिम सेना :-
    देश में “करणी सेना” का आतंक चरम पर है , यह भी पीछे से “राष्ट्रीय स्वयं सेवक” द्वारा ही समर्थित संगठन है जिसके सामने सरकारें , उच्चतम न्यायालय और व्यवस्थाएं नपुंसक हो गयी हैं।

    देश में ऐसी ही तमाम सेनाएं हैं जो लोगो ने बना रखी हैं और वह देश की व्यवस्था और यहाँ तक कि संविधान और संसद तक को धमकाते रहते हैं।
    रामलीला मैदान से किसी महिला की सलवार पहन कर भागे रामदेव जब अवतरित हुए तो उन्होंने तो अपनी हथियार बंद फौज ही बनाने का असंवैधानिक ऐलान कर दिया था।
    करणी सेना कोई अकेली सेना हो देश मे ऐसा नही है , इस देश में दलितों की भीम सेना तो ठाकुरों की रणवीर सेना , ऐसे ही गुर्जरों , जाटों , पटेलों की एक बड़ी तादात सेना बन कर ही देश की व्यवस्था से सदैव टकराती रही हैं और अपने हित के लिए देश और देश के संसाधन का नुकसान करती रही हैं।
    कभी कभी सोचता हूं कि आज़ादी के बाद भी क्या मुसलमानों में कोई ऐसी शख्सियत पैदा नहीं हुई जो “मुस्लिम सेना” बना सके ?
    हुई हैं , एक से एक और शानदार हुई हैं परन्तु उन्होंने देश की व्यवस्थाओं का सदैव सम्मान और आदर किया है।
    आईए देखते हैं
    दो कौड़ी के ऐक्टर परेश रावल और अन्य अभिनेता आज जब भगवा रंग में रंग कर ज़हर भर रहे हैं वहीं फिल्मी दुनिया के लीजेन्ड और अभिनय की यूनिवर्सिटी माने जाने वाले “यूसुफ खान” उर्फ दिलीप कुमार हों , बेताज बादशाह शाहरुख खान हों , सलमान खान , मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान और नवाब सैफ अली खान हों इन सबने कभी भी देश में बिखराव पैदा करने और देश की व्यवस्था से लड़ने जैसा एक बयान भी नहीं दिया।मुस्लिम सेना बनाने की बात तो बहुत दूर की बात है , हालांकि यह उनके लिए एक सेकेन्ड का काम है।
    खेलों में अजहरुद्दीन से लेकर कैफ , इरफान , यूसुफ , समी और टाईगर तक का नाम सदैव चमकता रहा है परन्तु अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल करके इन्होंने कोई मुस्लिम सेना नहीं बनाया , देश में आपसी भाईचारे और अमन की बात करते रहे।
    राजनीति की ही बात करें तो मुलायम सिंह यादव ने एक समय आज़म खान की उंगली पकड़ कर ही एम-वाई समीकरण को स्थापित किया और उस समय आजमखान का ऐसा क्रेज था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सीटी के कनेडी हाल में हो रहे एक प्रोग्राम में जब समयाभाव के कारण आजम खान को बोले बगैर मुलायम सिंह बोलने खड़े हुए तो खचाखच भरे हाल ने मुलायम सिंह यादव को सुनने से मना कर दिया।
    यह मेरी आँखो देखी घटना है , आज़मखान ने भी किसी सेना का गठन नहीं किया , मैं कांग्रेस या भाजपा के अन्य मुस्लिम नेताओं की बात नहीं करूंगा क्युंकि यह लोग पार्टी लाइन से हट कर कुछ नहीं करते।
    असदुद्दीन ओवैसी को ही देखिएआज की तारीख में मुस्लिम मसलों पर सबसे शानदार जवाब देने के लिए इनको जाना जाता है , हजारों करोड़ की संपत्ती है , लाखों लाख चाहने वाले हैं , जब चाहे मुसलमानों की एक ऐसी ही सेना बना लें परन्तु मुझे याद है कि पिछले उत्तर प्रदेश के चुनाव के पूर्व बिना प्रशासन की अनुमति के ओवैसी ने एक रैली तक नहीं कि , यहाँ तक कि अनुमति मिलने के बाद कैन्सिल हुए आर्डर के बाद उन्होंने एक दो दिन पहले अपनी रैली तक निरस्त कर दी परन्तु उन्होंने देश का एक मामुली सा कानून नहीं तोड़ा सेना बनाना तो दूर की बात है।
    आसाम के सांसद बदरुद्दीन अजमल को देखिए , लाखों करोड़ की संपत्ती वाला यह इंड्रलियलिस्ट करणी सेना जैसे 100 संगठन 2 मिनट में बना सकता है पर नहीं , उनको भी देश की तीन सेना ही सिर्फ़ चाहिए।
    ज़मीनी स्तर पर जहाँ स्टेज लग जाए वहाँ उनके नाम पर लाखों लाख की भीड़ पूरे देश में दिवानावार उनको सुनने के लिए इक्ट्ठा हो जाए उस “इमरान प्रतापगढ़ी” के एक ऐलान पर करणी सेना जैसी 50 सेनाएं एक सेकेन्ड में बन जाए परन्तु देश की तीनों सेनाओं को आदर और सम्मान देने वाले इमरान कहते हैं कि देश को किसी और सेना नहीं बल्कि सिर्फ जल , थल और वायु सेना की जरूरत है।
    सोचिएगा कि इनमें से कोई आज “करणी सेना” जैसी कोई “मुस्लिम सेना” बना ले तो आज क्या होगा ?
    उसे आईएसआई , आईएस और पाकिस्तान से जोड़ दिया जाएगा और सबको जेल में यही आज नपुंसक बनी संस्थाएं ठूस देंगी।
    परन्तु इंशाअल्लाह देश का मुसलमान ऐसा कभी नहीं करेगा।
    उसके लिए देश की “जल थल और वायु सेना” ही बहुत है।
    सभी को देश के “गणतन्त्र दिवस” की बधाई और शुभकानाएं , आज लागू हुए देश के संविधान का सम्मान और स्वाभिमान बना और बचा रहे ऐसी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। ” ———————————————————————————-उसे आईएसआई , आईएस और पाकिस्तान से जोड़ दिया जाएगा और सबको जेल में यही आज नपुंसक बनी संस्थाएं ठूस देंगी। सवाल ये हे की जब हर मुस्लिम रहनुमा छोटा हो या बड़ा आप सबके पास करोडो से लेकर अरबो तक हे तो कैसे
    तो फिर कैसे बेगुनाह लोग को वयवस्था जेल में सड़ाने में कामयाब क्यों हो जाती हे आप कहा झक मार रहे थे जब एक अकेला मुंबई का एक नौजवान वकील जिसकी बाद में हत्या कर दी गयी फिल्म भी बनी जिस पर वो अकेला ही कई muslim बेगुनाहो को जेल से निकाल लेता हे तो ये सेकड़ो अरबपति मुस्लिम रहनुमा कहा झक मार रहे थे फिर बेकार की बात की मुस्लिम ऐसा करते तो पाकिस्तान के साथ जोड़ देते हे हे कोई तुक ——– ? क्या कश्मीर का पूरा आंदोलन पाकिस्तान के साथ नहीं जुड़ा हुआ रहा फिर सोचिये की अगर इन राजपूतो मराठो दलितों पटेलों जाटो का किसी किसी का भारत की बगल में भी कोई देश होता तो क्या उसका नाम इनके आंदोलनों और उपद्रवों राजनीति के साथ नहीं जुड़ता ———- ? मुसलमानो को चाहिए की वो इन बदमिजाज मुस्लिम रहनुमाओ से दूर हटे और सेकुलर लोगो और सेकुलर आंदोलनो से जुड़े कुछ लोग हाल ही में कब्रिस्तान वक्फ आदि का नाम लेकर केजरीवाल और आप से भिड़कर है मुसलमानो के दुश्मन कहकर अपनी राजनीति चमकाने लगे क्यों ——– ? आज अगर आप और मनीष सिसोदिया ने दिल्ली के सरकारी सकूल अस्पताल क्लिनिक अच्छे किये हे तो क्या ये सब मुसलमानो के लिए नहीं हे उन्हें फायदा नहीं होगा ——— ? मुसलमानो को बदलना होगा ———— जारी इमरान सेकुलर लिबरल प्रोग्रेसिव नहीं हे उससे भी दूर रहो अगर वो बदलता हे जैसे अगर वो उस बेगुनाह मुस्लिम प्रेगनेट लड़की जिसे दलित से शादी करने पर घर वालो ने मार डाला था अगर इमरान उसके लिए भी रोयेगा ( और नोट नहीं जूते खायेगा ) तो हम उसे भी मानेगे वार्ना नहीं

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  • February 9, 2018 at 6:55 pm
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    ” Rahul VT
    5 hrs ·
    “सूर्पणखा ने प्रेम निवेदन किया था तो उसकी नाक काट दी!
    तू तो बीवी छोड़ के भागा है भड़वे, तेरा क्या काटना चाहिये?” #मरेंद्र_नोदी
    राहुल व्ही. टी ” .———————————– दलित अब हिन्दू कम्युनल राजनीति के नए मुसलमान हे ( मुसलमान पहले सेकुलर राजनीति के नाक के बाल थे ) जैसे मुसलमान पहले दबंगई सी करते से दीखते हे वैसे ही आज दलित इस सरकार की नाक का बाल हे मुसलमान भले ही खुद को दलितों से पिछड़ा बताये पर ये गलत हे मुसलमान सातसौ साल तक हुकूमत करते रहे जमीन का स्वामित्व काफी रहा ठीक ठाक आज भी हे जबकि दलित हज़ारो सालो से दलित हे खेर जो भी हे दलितों को इस इस्तिति का अधिक से अधिक फायदा ले लेना चाहिए मुसलमानो को भी दलितों का खूब साथ देना चाहिए

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  • February 11, 2018 at 9:02 pm
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    कश्मीर से लेकर आसाम तक मुसलमानो के सारे धार्मिक राजनीतिक रहनुमा अरबपति हे यहाँ तक की एक मामूली शायर भी मुस्लिम विक्टिमहुड सेल कर कर के करोड़पति तो बन ही चुका हे शायद , तो ये हे और एक अकेला लड़का अकेले ही कई बेगुनाहो को बचा लेता हे और ये सब अरबपति सिर्फ सेल करते रहते हे ————— ? और इनके छुटभय्ये ad चंदा लाइक आदि पीट रहे हे ———————Salman Faheem9 hrs · किसी मुसलमान की ज़िंदगी तबाह करनी है तो उसके घर में सुतली बम फोड़ आइये, पुलिस आकर उसे गिरफ़्तार करेगी, 15-20 साल केस चलेगा, उसका घर सड़क पर आ जाएगा और अंत में अदालत उसे बाइज़्ज़त बरी कर देगी। 10 साल लगेंगे ये साबित करते कि वो बम सुतली बम था और 10 और साल लगेंगे ये साबित करते हुए कि वो सुतली बम किसी और ने फोड़ा था।
    इस बीच काली कोट वाले ऐंकर उसे चीख-चीखकर आतंकी घोषित कर चुके होंगे और उसके बाइज़्ज़त बरी होने की ख़बर चैनल के किसी टिकर में आएगी, फ़्लैश की तरह या वेबसाइट के उस हिस्से में जहाँ कोई जाता ही नहीं है।
    मैं ये सबकुछ इसलिए लिख रहा हूँ क्यूँकि आज ही के दिन हिंदुस्तान ने एक ऐसे वकील को खोया था, जो ऐसे मुसलमानों का केस लड़ता थे और साबित करता थे कि वो आतंकी नहीं हैं। शाहिद आज़मी बस एक वकील नहीं थे, कम से कम उन बेकसूर लोगों के लिए नहीं, जिन्हें वो इंसाफ दिलाते थे।
    कायदे से देखा जाए तो शाहिद आज़मी को मुसलमानों का हीरो होना था, हर मुसलमान के घर में उनके किस्से सुनाए जाने चाहिए थे, हर मुसलमान को उनके बारे में पता होना चाहिए था। पर अफ़सोस ऐसा नहीं है, लिखने वाले को भी वो याद आए जब उनकी शहादत का दिन आया है वरना वो भी भूल ही जाता है। हमें शाहिद आज़मी को इसलिए भी याद रखना चाहिए क्यूँकि इस मुल्क में वो बात कही जाती है ना–हर मुसलमान आतंकवादी नहीं, पर हर आतंकवादी मुसलमान होता है। मतलब हम पहले ही शक के दायरे में हैं, बस वो सुतली बम फूटने की देरी है। शाहिद आज़मी को इसलिए याद रखना है ताकि आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों की ज़िंदगी बर्बाद ना हो।
    मुम्बई के गोवंडी में पले-बढ़े शाहिद की जड़ें उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले में जाकर मिलती हैं, वो शहर जिसे काली कोट वाले ऐंकर किसी वक़्त में आतंकगढ़ बुलाते थे।
    बम्बई में हिन्दू-मुस्लिम दंगों के बाद शाहिद को भी बिना किसी सबूत, या गवाह के पुलिस ने उठा लिया था, उनपर टाडा लगाया गया और आर्थर रोड जेल से होते हुए तिहाड़ भेजा गया। इस दौरान उनके साथ ज़ुल्म की इन्तेहाँ हुई पर इसके बावजूद उन्होंने हिंदुस्तान और उसके कानून से मोहब्बत नहीं छोड़ी।

    जेल से बाहर आने के बाद शाहिद ने वकालत को अपना हथियार बनाया और अपने जैसे बेकसूर नौजवानों का केस लड़ने लगे। बहुत कम वक़्त में ही शाहिद ने 17 बेकसूर लोगों को बरी करवाया, जिसमें आतंकवाद के आरोप में गिरफ़्तार लोग भी थे।
    11 फरवरी, 2010 को शाहिद को उन्हीं की ऑफिस में गोली मार कर हत्या कर दी गई। शाहिद की मौत के बाद, उनके भाई खालिद अब शाहिद के रास्ते पर चल रहे हैं। शाहिद को अपना रोल मॉडल मानकर कई मुस्लिम नौजवान भी वकालत के पेशे में उतर रहे हैं। शाहिद की ज़िंदगी पर साल 2013 में एक फ़िल्म भी आई, जिसके लिए एक्टर राजकुमार राव को नेशनल अवार्ड भी मिला।
    इसे विडंबना ही कहेंगे कि सबको इंसाफ़ दिलाने वाले वक़ील की हत्या हुए आज 8 साल हो जाएंगे और अभी तक इस केस का ट्रायल ही नहीं शुरू हुआ है।
    वैसे इस मुल्क में जहाँ एक जज की हत्या पर सालों तक सन्नाटा पसरा रहता है, वहाँ एक वक़ील की हत्या पर कोई आवाज़ उठे, सोचना ही बेमानी है।
    शाहिद आज़मी की पुण्यतिथि पर पूरे मुल्क की ओर से उनको सलाम।

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  • July 12, 2018 at 4:12 pm
    Permalink

    Ashok Kumar Pandey
    7 hrs ·
    भारत में मुसलमानों की संख्या 14 प्रतिशत के आसपास रही है, लेकिन सरकारी, न्यायिक, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं में उनकी भागीदारी कभी 10 प्रतिशत भी नहीं रही। कोई प्रधानमंत्री मुसलमान नहीं हुआ। 3 मुस्लिम राष्ट्रपति हुए। फिर भी हम सेक्युलर देश हैं, आरोप मुस्लिम तुष्टिकरण के लगते रहे।

    जम्मू और कश्मीर में 1871 की पहली जनगणना के बाद से ही कश्मीरी पंडितों की संख्या 4 प्रतिशत की रही। सरकारी, न्यायिक, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं में 1947 के पहले नब्बे फ़ीसद कब्ज़ा रहा। उसके बाद से आज तक भी 50 फ़ीसद से ज़्यादा पदों पर कब्ज़ा रहा/है। उच्चतर पदों पर तो इससे कहीं अधिक। सारे राज्यपाल हिन्दू रहे। फिर भी वह इस्लामिक राज्य है!

    भारत माता की जय

    #कश्मीरीपंडित
    #जोघरछोड़करनहींगए
    Ashok Kumar Pandey
    10 July at 18:55 ·
    जियो मरो यूनिवर्सिटी के छात्र का एक दिन

    7 बजे उठ कर शाखा जाना
    8 बजे नाश्ता विथ गाँजा
    9 से 11 व्हाट्सएप पर गाली गलौज़
    11 से 2 बजे फोटोशॉप ट्रेनिंग
    2 बजे लंच
    3 से 5 फोटोशॉप प्रैक्टिकल
    5 से 7 पोर्न वाचिंग
    7 से 10 बजे फेसबुक गाली गलौज़
    10 बजे डिनर विथ चरस
    11 से 3 बजे सुबह तक ट्विटर/व्हाट्सएप/ट्विटर पर चरस बोना।

    (अविश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त)

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  • August 6, 2018 at 4:55 pm
    Permalink

    मुसलमानो के मुद्दे हे सही हे अपनी जगह हे मगर मुसलमान ना दलित हे ना आदिवासी हे ना एक दो या पांच प्रतिशत की माइनोरिटी हे और ना पूरी तरह बर्बाद ही हे इसलिए ये अलग मसले हे समय पर लिखेंगे ———————Follow
    Mohd Zahid
    17 hrs ·
    मुसलमानों की बर्बादी का जिम्मेदार कौन ?:-

    फेसबुक पर मुसलमानों का एक वर्ग इस देश में मुसलमानों की बदहाली का ज़िक्र होते ही कांग्रेस को बुरा भला कहना शुरु कर देता है और भाजपा को कांग्रेस से बेहतर बताने के अपने शीर्ष नेतृत्व के लिए सुपाड़ी को अंजाम देने लगता है।

    दरअसल ऐसा करके वह वर्ग अपने नेता के मुसलमानों के बिखेरने की संघी साजिश को अंजाम देने में साथ देता है।

    कांग्रेस ने इस देश में सबसे अधिक समय हुकूमत की है तो अच्छे और बुरे हर परिणाम के लिए उसे दोष देना एक हद तक तो ठीक है परन्तु उसको भाजपा और संघ से बदतर कहना किसी भी तरह से उचित नहीं।

    संघ और भाजपा जहाँ विधानसभा और लोकसभा में मुसलमानों को एक टिकट नहीं देने की नीति पर चलती है वहीं कांग्रेस का इतिहास यदि आप देखेंगे तो आज़ादी के बाद मुसलमानों की बदहाली के लिए कांग्रेस से अधिक ज़िम्मेदार उन कांग्रेसी मुस्लिम नेताओं को पाएँगे जिन्होंने कांग्रेस और सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए अपनी कौम के लिए कुछ नहीं किया।

    बहुधर्म और बहुसमाज का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी अपनी सरकार में किसी भी समाज की भागेदारी इसीलिए देती है कि अमुक समाज का व्यक्ति देश के महत्वपूर्ण पद पर बैठ कर अपने समाज के लिए कुछ बेहतर कर सके।

    भाजपा जहाँ एक मुस्लिम विधायक और सांसद बनने पर प्रतिबंध लगाती है वहीं आईए देखते हैं कि आजादी के बाद कांग्रेस ने कितने मुसलमानों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी पर वह अपने समाज के लिए कुछ ना कर सके।

    • भारत के इतिहास में पहली बार 1967 को पहला मुस्लिम मुख्यमंत्री जो बना वह कश्मीर से नहीं था उनका नाम एम. ओ. हसन फारुख मारीकर एम. ओ. हसन फारुख मारीकर पहले मुस्लिम ही नहीं बल्कि पांडिचेरी के भी पहले मुख्यमंत्री थे।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    • अब्दुल रहमान अंतुले महाराष्ट्र के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री बने इनका कार्यकाल 9 जून 1980 से 12 जनवरी 1982 तक था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में लंबे समय तक महत्वपूर्ण नेता रहे।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    बरकतुल्लाह खान राजस्थान के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री थे उनका कार्यकाल 9 जुलाई 1971 से 11 अगस्त 1973 रहा था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में लंबे समय तक महत्वपूर्ण नेता रहे बरकतुल्लाह खान का कार्यकाल कार्यकाल 25 महीनो का था जो कि किसी गैर जम्मू-कश्मीर से बनने वाले मुस्लिम मुख्यमंत्री का सबसे लंबा कार्यकाल है।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    • कश्मीर के अलावा सी.एच. मोहम्मद कोया को छोड़कर सभी मुस्लिम मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी से बने हैं । जबकि गैर कांग्रेसी सी. एच. मोहम्मद कोया केरला के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री बने. उनका कार्यकाल 12 नवंबर 1979 से 21 दिसंबर 1979 तक मात्र 54 दिनों का रहा था।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    • असम के मुख्यमंत्री रहे सैयदा अनवरा तैमूर का कार्यकाल कार्यकाल 6 दिसंबर 1980 से 30 जून 1981 तक रहा है।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    • अब्दुल गफूर बिहार के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री बने उनका कार्यकाल 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक रहा था। उन्हीं के कार्यकाल में संपूर्ण क्रांति की शुरुआत हुई थी।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    सी के जाफर शरीफ़ 1991 से 1995 तक रेल मंत्री रहे। चार साल में रेलवे भर्ती बोर्ड के माध्यम से ही देश के सभी शिक्षित मुसलमानों को रेलवे में भर सकते थे। पर उन्होंने तो उर्दू नाम की एक ट्रेन भी नहीं चलाई।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    मौलाना अबुल कलाम आज़ाद तो नेहरू-गाँधी के बेहद करीबी थे और देश के पहले शिक्षा मंत्री थे , जिन्होंने इस देश की शिक्षा व्यवस्था का ढांचा खड़ा किया। वह तो इस स्थीति में थे कि जो चाहते मुसलमानों के लिए करा सकते थे।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    अहमद पटेल से पूछे बिना सोनिया गाँधी कुछ नहीं करतीं , 10 साल के यूपीए शासन में उनकी तूती बोलती थी जो चाहे कौम के लिए करा सकते थे।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    सलमान खुर्शीद , गुलाम नबी आजाद , तारिक अनवर इत्यादि इत्यादि जैसे लोग कांग्रेस की ही हुकूमत में बेहद महत्वपूर्ण पद पर रहे।

    मुसलमानों के लिए क्या किया उन्होंने ? कुछ नहीं

    तो क्युं नहीं ?

    पतंगी लाल के समर्थकों के समझ के बाहर की चीज़ है।

    वजह मैं समझाऊँगा अगली पोस्ट पर

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    • August 12, 2018 at 3:22 pm
      Permalink

      उपर नेहरू को विभाजन के लिए जिम्मेदार बताने वाले विक्टिमहुड सेलर करोड़पति शायर छोटे इकबाल के दोस्त मुसलमानो के पिछड़ेपन का राग अलापनने वाले ज़ाहिद ( व्यक्ति विशेष नहीं ) अपनी खुद की बेमिसाल तरक्की के बारे में बता रहे हे पढ़े और समझे ये सब क्या खेल हे
      ” Mohd Zahid10 August at 22:07 · Short Post/18-50117 साल की उम्र से मात्र ₹2000/= की पूँजी से व्यापार प्रारंभ करके 25 साल संघर्ष करते हुए आगे बढ़ा तो उसके परिणाम यूँ आये कि ₹22000 करोड़ की दुनिया की नं•1 कंपनी जर्मनी से मेरे पास चल कर आती है तो लगा कि मैने अपने जीवन में कुछ उपलब्धि हासिल किया है।मात्र 10 महीने के अल्प समय में नार्थ इंडिया के 366 चैनल पार्टनर को पछाड़ कर आज मुझे नार्थ इंडिया में प्रथम और सर्वश्रेष्ठ होने का सम्मान प्राप्त हुआ।
      अगला गोल आल इंडिया नं•1 है।आशिर्वाद बनाए रखिए। ” —————————————————————————————— तो एकतरफ पिछड़ेपन का राग दूसरी तरफ अपना विकास —- ? और ये बात आम मुसलमानो से छुपा ली की इनकी खुद सिर्फ एक ही औलाद हे बच्चे कम तो पेसो की बचत ज़्यादा और दिमाग की खपत कम और वही बचत और खपत बिज़नेस में लगाकर ये अमीर बन गए दुनिया में कही भी विकास बिना परिवार नियोजन के आया ही नहीं हे और ये बात ये लोग ( ज़ाहिद व्यक्ति विशेष नहीं ) आम मुस्लिम से छुपाए हे उससे ये चाहते हे की वो परिवार नियोजन की धज़्ज़िया उड़ाए ताकि बड़ी मार्किट हो सस्ती लेबर हो वोट हो दूसरी बात ये विभाजन जैसी बड़ी गलती के लिए तक नेहरू को जिम्मेदार बताते हे वो इसलिए ताकि मुसलमानो में ये और इनका दोस्त छोटा इकबाल ये बताये की ना तुम्हारी कोई गलती हे और ना इस सम्बन्ध में मेरी कोई जिम्मेदारी हे ताकि बिना किसी जिम्मेदारी और जवाबदेही के और बिना किसी आत्मनिरीक्षण की सरदर्दी और गैरलोकप्रियता के मौज़ उड़ाई जाए

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  • August 11, 2018 at 9:42 am
    Permalink

    K Pandey
    17 hrs ·
    कभी हिंदू दलित बस्तियों में दोपहर में जाइए, गंदगी मिलेगी, जहां तहां जमा हुआ पानी और कचरा मिल जाएगा, बच्चे नंग-धड़ंग मिट्टी में खेलते और बुजुर्ग शराब के नशे में धुत्त पड़े नजर आ जाएंगे!

    बस्ती के एक छोर पर आधा कच्चा आधा पक्का 6 से 10 वर्गफुट में अर्धनिर्मित एक मंदिर भी संभवत: दिख जाए।

    युवा दंपत्ति मजदूरी करने जाते हैं, शाम को वे लौटकर शराब की थोड़ी खुराक थकान मिटाने के लिए हलक में उतार लेते हैं!

    कुछ लोग नशे में लड़ झगड़कर दिनभर की खुन्नस भी निकाल लेते हैं, सुबह फिर सब सामान्य और दिनचर्या शुरू हो जाती है।

    कम ही बच्चे स्कूल जाते हैं, क्योंकि मां बाप मजदूरी करने निकल जाते हैं पीछे बच्चे क्या करते हैं क्या नहीं, उन्हे सोचने की फुर्सत नहीं होती।
    और इस तरह मजदूरों की नई पीढ़ी तैयार होने लगती है।

    25 वर्षों से सरकारें हर साल अनूसूचित जातियों के कल्याण के लिए 15 हजार करोड़ से लेकर 40-45 हजार करोड़ रूपये आवंटित करती आई है!

    यूपीए सरकार में 2013-14 में 41561 करोड़ था, वहीं मोदी सरकार में 2017-18 में 52393 करोड़ आवंटित हुए।

    लेकिन मैंने किसी बस्ती को अबतक संवरते नहीं देखा, हां उन बस्तियों में एकाध नेता हर पांच दस साल में उभरा और वही एक संपन्न हो पाया!

    कहां जाता है यह पैसा भगवान जाने!

    *******

    फिर किसी दोपहर पसमांदा मुसलमान की बस्ती में जाइए।
    अधिकांश बुजुर्ग कुछ न कुछ कास्तकारी में लगे होंगे, बच्चे मदरसा और गैराजों में मिलेंगे!

    गलियों में घरो का गंदा पानी बहता रहेगा, और लगातार मांस बनाने खाने के कारण एक दुर्गंध व्याप्त रहेगा।

    बस्ती के किनारे चमचमाता मस्जिद, मदरसा और सरकारी फंड से रंगीन बाउंड्री से घिरा कब्रिस्तान जरूर मिलेगा।

    अल्पसंख्यक हितों से जुड़े अधिकांश फंड मुसलमानों में लग जाता है, क्योंकि सिख, जैन और पारसी समुदाय संपन्न होने के कारण इस फंड का शायद ही उपयोग करते हैं!

    हर साल बस्ती से दस पंद्रह जायरीन हवाई जहाज से हज करने जरूर जाते हैं!

    *******

    आखिर हिंदू दलित और पशमांदा मुसलमानों में अंतर क्यों है?
    जहां हिंदू दलित मजदूरी के अलावा कोई काम नहीं जानता, वहीं पशमांदा मुसलमान देश के सारे लघु उत्पादन क्षेत्र में लगा हुआ है!

    अगरबत्ती, पतंग, खिलौने बनाने से लेकर रेडिमेड कपड़े बनाने और कबाड़ चुनने से लेकर ब्रेड पाव बनाने तक सभी काम पर मुसलमानों का एकाधिकार हो चुका है।

    किसी भी शहर के फुटपाथी रेहड़ी बाजार का सर्वे कर लें 80% दुकानें मुसलमानों की मिलेंगी!

    हर शुक्रवार को सारे मुसलमान दुकान बंद करके मस्जिद जाना नहीं भूलता!

    *******

    1951 की जनगणना से लेकर 2011 की जनगणना तक मुसलमानों की आबादी में आधिकारिक रूप से 5% की वृद्धि हुई, जबकि हिंदू आबादी में 5% कमी आई है।
    मतदान करते समय दलितों में 24 घंटा पहले तय नहीं रहता किसे वोट करना है, लेकिन मुसलमानों में चुनाव घोषित होते ही तय रहता है।

    जगिए, बहुत कुछ परखने की जरूरत है, इसाईयों की संख्या भी 1951 की तुलना में दुगुनी हो चुकी है!कर्ण सिंह
    कर्ण सिंह बिल्कुल सर, हथकरधा उद्योग कढ़ाई सिलाई बुनाई , जेवरों पर मीनाकारी पोलिस पेकिंग, से लेकर नाइ, कसाई, , पँचर, कबाड़, रेहड़ी, फुटकर किराना, ज्यूस कॉर्नर, लगभग हर जगह पर इनका कब्जा है,
    ये लोग मजदूरी का काम नही करते या बहुत कम करते है

    Ki Pandey
    K Pandey यही देखकर मैं अचंभित हूं

    Reply
  • November 20, 2018 at 11:23 am
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    राकेश गुहा is with Sanjiv Lovepreet and 6 others.
    #20_साल_बाद_भारत.. (जनसँख्या नियंत्रण कानून क्यों जरूरी है )
    रोज की तरह आज भी लगभग सुबह पौने पाँच बजे, तेज शोर से अचानक नींद खुल गई!!.. अजान हो रही थी !!..

    अब मस्जिदे बहुत ज्यादा दूरी पर नही रह गई थी। हर मोहल्ले में मिलने वाले पार्क अब मस्जिदों का रूप ले चुके है !!.. अजान ही अब अलार्म बन चुकी थी !!..

    हमने नित्य कर्म किया और सुबह की सैर को चल पड़े !!..

    अब सड़के 20 साल पहले वाली सड़के नही रह गई थी, स्वच्छ !.. अब सड़को पर जगह जगह अंडों के छिलके पड़े रहना आम बात थी !.. छिलकों से बचते हुए सड़क पार करने में ही, योग हो जाया करता था !!..
    योग सिर्फ कहावतों और कहानी किस्सों में बचा था !.. संविधान में नए कानून के तहत योग को ‘हराम’ घोषित किया जा चुका था !..
    योग अब बैन था !!..

    हम घर पहुंचे !. बच्चे स्कूल जाने को तैयार हो चुके थे !..
    कुर्ता पजामा और जालीदार टोपी !..
    अब स्कूलों की यही यूनिफॉर्म थी !!.. हम बच्चों को कुर्ता पजामा और टोपी पहनाकर स्कूल छोड़ने चले गए !!..

    वापिस आये तो श्रीमती जी ने कहा, जाइये सब्जी ले आइये !..
    अब सब्जियों के मार्केट काफी कम हो गए थे !..
    जहां तहाँ, सिर्फ मछली,मटन,अंडों की दुकानें। बीच मे एक दो सब्जी के ठेले !!..

    अब एक ही ठेले पे मछली,अंडे,सब्जी सब साथ होती थी !.
    एक ही तराजू पे मछली भी तुलती थी, और सब्जी भी !!.. मन पक्का कर हम ले आये सब्जी !!..
    श्रीमती जी ने खाना बनाया और हम खाकर, दफ्तर की और चल दिये !!..

    अब दफ्तर वो 20 साल पहले वाले दफ्तर नही थे !!.. जब दफ्तर की शुरुआत में राष्ट्रगान होता था और समापन पर राष्ट्रीय गीत !!..
    दफ्तर की शुरुआत अजान से हुई !!..
    हमने अजान पढ़ी और काम मे लग गए !.. दफ्तर का समय खत्म हुआ !.. नियमानुसार नमाज हुई !…
    हमने नमाज पढ़ी और घर आ गए !!..

    तब तक बच्चे भी स्कूल से आ चुके थे !.. कोचिंग क्लासेस जाने की तैयारी कर रहे थे !!.. #उर्दू_स्पोकन_क्लासेस !!.. जी अब सारे मार्केट की दुकानों के नाम और सूचना पट उर्दू में ही लिखे जाते थे !!..
    उर्दू सीखना अब जरूरी भी था और मजबूरी भी !!..

    बच्चे कोचिंग चले गए !.. हम श्रीमती जी के साथ tv देखने लगे.. सीरियल के नाम भी बदल गए थे !.. खाला हो तो ऐसी, आपकी आपा, बकरा किश्तों पे और नमाज पढ़ने के तरीके जैसे !..
    अब इन्हें ही देखना हमारी नियति बन चुकी थी !..

    बच्चे कोचिंग से आ गए !.. खाना खाकर अजीब सी जिद करने लगे !..

    पापा पापा बहुत दिन हो गए मन्दिर गए हुए !!..

    अब नेपाल कब जाएंगे ??..

    जी अब सबसे नजदीक में मन्दिर नेपाल में ही थे !!..
    देश के मंदिर तो गोल गुम्बद बन चुके थे !..

    हां हां जाएंगे बेटा जरूर जाएंगे मन्दिर। पर गर्मी की छुठियो में !!.
    ये सुन बच्चे नाराज होकर चले गए !!..
    बच्चों की ये हालत देखकर श्रीमतीजी की आंखों से आँसू बहने लगे !!..

    हम दोनों 20 साल पहले के अतीत में खो गए !..
    ************************
    किस तरह हम आज से 20 साल पहले कालेज की पार्किंग में ‘स्वामी यति नरसिंहानंद जी’ को गालिया दे रहे थे !!.. उन्हें बांटने वाला कहकर भला बुरा कह रहे थे !!..

    फिर वो कालेज की कैंटीन , जहाँ चाय पी पीकर स्वामी यति नरसिंहानंद को गरिया रहे थे !!.. टेबल पर बैठे मुस्लिम दोस्तो से ज्यादा, स्वामी जी पर खून हमारा का खौल रहा था !!..
    हम ऐसे गरियाते जैसे अपने मुस्लिम दोस्तो को खुद के #सेक्युलर और #लिबरल होने का प्रमाण पत्र दे रहे हो !!..

    कुछ हिन्दू मित्रो ने हमे समझाया भी था !!.. पर उस समय हमारे ऊपर #खुली_सोच,#मॉर्डनाइजेशन और #लिब्रिज्म का नशा छाया हुआ था !!..
    किस तरह हमने उन हिन्दू मित्रो को पूरे कालेज के सामने अपमानित किया !!..

    #साम्प्रदायिक कहकर उन्हें बदनाम किया। हमेशा उनसे घ्रणा की !!..

    ये सब सोचते सोचते अचानक हमारे मुँह से निकल पड़ा !..

    श्रीमती जी काश उस समय कालेज में हमें #सेक्युरिज्म का कीड़ा ना काटा होता और आप #लिब्रिज्म की चादर ओढ़े ना बैठी होती !!.. तो आज ये दिन ना देखने पड़ते !..
    आज हमारे बच्चों की इस हालत के जिम्मेदार कोई और नही, सिर्फ हम है !..
    गर स्वामी नरसिंहानंद जी का साथ जनसँख्या नियंत्रण कानून के वक्त दिया होता तो #हिंदुत्व मरा ना होता !!..
    ***********************
    दोस्तो ये तो सिर्फ एक कल्पना थी ..हक़ीक़त भी बन सकती है.. अतः ये हक़ीक़त ना बने हम सबको स्वामी जी का साथ देना होगा.. छद्म सेक्युरिज्म और ढोंगी लिब्रिज्म से बाहर आना होगा !!.. जनसँख्या नियंत्रण क़ानून पर खुलकर समर्थन करना ही होगा …

    वरना आने वाली पीढ़ियां हमे कभी माफ नही करेंगी !!..

    #राकेश_गुहा …

    #I_Stand_with_svamiji …—————————————————————————————————————————–
    Mohd Zahid
    Yesterday at 08:10 ·
    FBP/18-183

    मुझमें और दिल्ली में एक तीख़ी बहस :-

    विचार की लड़ाई तलवार से नहीं होती , विचार की लड़ाई विचारधारा से होती है , विचार की लड़ाई में विरोधी विचार वाले को कत्ल नहीं किया जाता बल्कि उसे तर्क वितर्क करके अपनी विचारधारा से सहमत कराया जाता है।

    विचारधारा के युद्ध में यही हार या पराजय होती है।

    सिस्टम यदि पक्षपाती रहा है तो सिस्टम को ध्वस्त नहीं किया जाता बल्कि सिस्टम में घुस कर आमने सामने बैठ कर सिस्टम को अपने पक्ष में किया जाता है , सिस्टम किसी का नहीं होता , सिस्टम एक मोम है जिसे जिस आकार में चाहे बनाया जा सकता है।

    मुसलमानों को सिस्टम को अपने पक्ष में करने की कला “आरएसएस” से सीखना चाहिए , संघ में सिर्फ बुराई ही नहीं अच्छाई भी है। उससे कुछ सीखना भी चाहिए।

    दिल्ली जब भी जाता हूँ दिल्ली से सवाल पूछता हूँ , दिल्ली के लिए मेरे पास बहुत तल्ख़ सवाल होते हैं , हर बार ही होते हैं , सत्ता के गलियारे समेटे दिल्ली सदैव ही मेरे सवालों पर मुस्कुराती रही है , तंजिया मुस्कुराहट

    मेरे सवाल तीखे तो दिल्ली के जवाब सिर्फ़ तंजिया मुस्कुराहट।

    इस बार मेरे सवालों से दिल्ली भी फट पड़ी , उसका सब्र भी टूट ही गया।

    मेरे सवाल कुछ तीखे ही थे

    1947 से आजतक इस दिल्ली ने मुसलमानों को क्या दिया ? दंगे ? लूटमार ? पक्षपात ? बाबरी मस्जिद ? गुजरात ? मुजफ्फरनगर ? हाशिमपुरा ? मेरठ ? मुरादाबाद ? 1% से भी कम नौकरी ? मीडिया और व्यवस्था का मुस्लिम विरोध ? अखलाक ? पहलूखान ? जुनैद ? मिनहाज ? उमर ? रकबर ? अलीमुद्दीन ? इत्यादि इत्यादि और जो ज़िन्दा हैं उनके लिए पंचर हुए टायर ? पेन्ट के ब्रश और फर्नीचर के औजार ? और दलितों से भी बदतर ज़िन्दगी ?

    वह कलम कहाँ है जिसके इशारे पर दिल्ली नाचती है , गाती है , चलती है , बोलती है ?

    दिल्ली बोली , बस-बस , तुम्हारे सवाल मुझसे नहीं खुद से होने चाहिए , मैं किसी को नहीं चुनती , मुझे लोग चुनते हैं तो सवाल अपने लोगों से करो

    1947 में मेरी ही छाती पर मौलाना आजाद और रफी अहमद किदवई कलम लिए फैसले कर रहे थे तो यही सवाल उनसे पूछो कि अपनी कौम के लिए क्या किया ?

    जब नौकरियाँ घट रही थीं तब केन्द्र की कैबिनेट में मौजूद मुस्लिम मंत्रियों ने क्या किया ? जब बाबरी मस्जिद शहीद की जा रही थी तब मंत्री बने सी के जाफर शरीफ और गुलाम नबी आजाद ने क्या किया ? और क्या किया उस वक्त संसद में मौजूद 25 मुस्लिम सांसदों ने ? गुजरात हुआ तो क्या कर रहे थे संसद में मौजूद 31 मुस्लिम सांसद ? मुजफ्फरनगर से हाशिमपुरा तक के लिए क्या किया तुम्हारे कौम के नुमाइंदों ने ? सब तो सत्ता में बैठे मलाई खा रहे थे और सवाल मुझसे ?

    कितनों ने इस सबके विरोध में एक साथ इस्तीफा दिया ? दिल्ली ही नहीं पूरे देश में एक उदाहरण बता दो कि किसी ने कौम के लिए पार्टी या सरकार से अपना इस्तीफा दिया हो ?

    एक ने भी नहीं और सवाल मुझसे ? पूछो उनसे कि कितनों ने एक होकर सरकारों से कहा कि हमें हमारा हक दो नहीं तो सरकार की चूलें हिला देंगे ? बताओ कि अपने हक के लिए किसने कितने आंदोलन किसने किए ? कितनों ने सत्ता और सरकार की कालर पकड़ कर घसीट लिया ?

    और सवाल मुझसे ?

    दिल्ली कुछ नहीं करती , सिस्टम करता है , सिस्टम के ऊपर या बैठ जाओ या सिस्टम में घुस जाओ , सिर्फ़ 70 साल के इतिहास को गाली देने से कुछ नहीं होगा। जाओ मियाँ फिरका फिरका खेलो और चाय की दुकान पर देर रात गपबाजी करो।

    मैं चुपचाप अपना लटका मुँह लेकर वापस आ गया “इलाहाबाद”

    Reply
  • November 23, 2018 at 8:45 am
    Permalink

    भारत के आम लोगो को बड़ी खफ्त होती हे शादी शादी शादी की और खाली शादी से भी ये समाज जीने नहीं देता हे रिज़ल्ट भी दिखाओ यानि बच्चे भी हो एक बात समझ लीजिए की कोई किसी के लिए कुछ नहीं करने वाला हे न सरकार न कोई और ,भारत के पैसे वाले लोग भी बेहद छोटी और संकीर्ण सोच के होते हे वो अपने पैसे को भले ही जला देंगे गला देंगे फूंक देंगे सड़ा देंगे पर किसी के काम नहीं आने देंगे कोई किसी के लिए कुछ नहीं करने वाला और अगर जो कुछ करेगा यानि अच्छा बनेगा फौरन लोग ही उसे नोच लेंगे उसकी अच्छाइयों से इतना फायदा उठाएंगे उसके अच्छे स्वभाव की वजह से उस पर इतना लोड होगा की जल्द ही उसका दम घुट जाएंगे , यानी कोई कुछ नहीं करने वाला हे आम आदमी के सामने सिर्फ एक रास्ता हे की वो शादी देर से करे यानि कम से कम पैतीस चालीस पचास में तब तक शांति से खुद ही खुद की नीव धीरे धीरे मज़बूत करे इसके आलावा फ़िलहाल दूर दूर तक आम आदमी की भलाई का कोई रास्ता नहीं हे
    सिकंदर हयात सिकंदर हयात • 2 days ago
    समाजवाद पूंजीवाद ब्राह्मणवाद बहुजनवाद सेकुलरवाद साम्प्रदायिकता डाइवर्सिटी आरक्षण पाकिस्तान पर हमला गमला मोदी अम्बानी अडानी राम मंदिर शरीयत देवबंद बरेली शिया सुन्नी संघी बजरंगी सबका साथ सबका विकास सड़क , ये वो सब कुछ लिख लीजिये किसी से भी आम आदमी को कुछ नहीं मिलने वाला हे अगर उसे गुलामी से बचना हे तो वो शादी और बच्चो से दूर रहे पता हे की ये सम्भव नहीं हे मगर अगर 10 % लोग भी अगर इस बात को समझ जाए – अविवाहित लोग सलमान खान टाइप लोग समाज के लिए वरदान की तरह होते हे 10 % भी ऐसे लोग हो तो ही वार्ना बात हिन्दू मुस्लिम की नहीं हे पुरे भारतीय उपमहाद्वीप की जनता गुलामी की कगार पर हे गुलामी से बचना हे तो क्रांति चाहिए होगी और भारत में खुनी क्रांति या रातोरात क्रांति सम्भव नहीं हे यही एक पर्किर्या हे जिससे गुलामी से बचाने वाला बदलाव आ सकता हे

    Reply
  • November 28, 2019 at 8:51 pm
    Permalink

    Shadab Salim
    3 hrs
    कल बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि खजराना अवैध गतिविधियों का अड्डा है और मिनी पाकिस्तान है।

    मैं इंदौर के मुसलमानों के बसाए घेट्टो खजराना में रहता हूँ मैं यहीं पैदा हुआ हूँ।पहले हम शहर के बीच में रहते थे पर शहर के बीच में रहकर हम दंगा पीड़ित ही रहे है।हम जैसे ही लोगो ने भेला होकर इंदौर में यह एक इलाका बसा लिया।धीरे धीरे देशभर के मुस्लिम यहाँ आकर रहने लगे,बिहार,उत्तर प्रदेश और लगभग मध्यप्रदेश के हर जिले और तहसील के मुस्लिम यहाँ रहते है।जब हम शहर के बीच रहते तो लोग हमें रहने नहीं देते थे,जहां अकेला देखते पीट डालते थे,न दुकान चलाने दी जाती थी न सुकून से रहने दिया जाता था।यहां तक स्टूडेंट्स को भी मकान किराए से नहीं मिलता था।कोई नहीं माने तो मुसलमान नाम का आधार कार्ड लेकर साकेत से लेकर रंजीत हनुमान तक भटक कर देख ले।

    खजराना गोया रोड पर मेरी एक बिल्डिंग है जिसमे पी एस सी और नीट की परीक्षा की तैयारी करने वाले बच्चे रहते है।वह पढ़ने भावरकुआँ जाते है और रहते नो किलोमीटर दूर खजराना है,उसका कारण आप समझ सकते है,उनके पास रहने के लिए आज़ाद नगर है या खजराना।वह मज़बूरी में खजराना रहते है क्योंकि पूरे विष्णुपूरी,टॉवर चौराहा,सपना संगीता में एक छत नहीं है जो आसरा दे सकें।सोचिए एक ग़रीब स्टूडेंट का क्या दोष है,वह क्या जाने हिन्दू मुस्लिम, उसे तो बस इतना याद है कि नीट पास करनी है,डॉक्टर बनना है,किसी सरकारी दफ्तर में बाबू बनना है।हमारी नफरतों में स्टूडेंट्स तक पिस गए जो घर से पिता से वादा करके निकला है-कुछ दिन और खेतों में मज़दूरी कर लीजिए मैं जल्द अफसर बन जाऊंगा।

    आख़िर यहाँ घेट्टो में बसकर हमे सुकून मिल गया, चारो तरफ बुरखे नज़र आते और टोपियां।यक़ीन मानिये हम कोई भी इस तरह से इलाका बसाकर रहना नहीं चाहते थे यह हमारी मज़बूरी है,यहां हम मूल इंसानी सुविधाओं से महरूम है,हम सिर्फ जान बचाकर यहां रह रहे है।मैं हमेशा घेट्टो विरोधी रहा हूँ,मेरी ख्वाहिश है कि इस देश मुसलमान हिन्दुओ के साथ उनकी बस्तियों में रहे,धर्म के आधार पर कोई इलाका नहीं हो,घेट्टो इस आज़ाद भारत के माथे पर कलंक है।

    कैलाश जी बिल्कुल ठीक कह रहे है,अवैध गतिविधियां होती है मैं इस बात को तस्लीम करता हूँ,उन अवैध गतिविधियों का कारण मुसलमान नहीं है उसका कारण उनकी गरीबी,भुखमरी और अशिक्षा है।किसी भी गरीबी भुखमरी और बुनियादी सुविधाओं से तरसते इलाके में ऐसी ही अवैध गतिविधियां होती है।अब भले खजराना हो या फिर परदेशीपुरा,वही परदेशीपुरा जिसने आपको बीजेपी राष्ट्रीय महासचिव के पद तक भेजा है।

    कैलाश जी हम शहर के बीच रहते थे तो रहने नहीं दिया था।किसी बाहर से आए मुस्लिम को हिन्दू का मकान किराये पर नहीं मिलता था।आप मुझे बताइये आदमी जाए तो कहां जाए?यह हालात क्यों पैदा हुए?यह हालत की वजह वह ज़हर है कैलाश जी जो रात दिन हिन्दुओ में भरा गया है,उन्हें मुसलमानो का शत्रु बना दिया गया।

    हम जहां बस जाते है वह इलाका आप संवेदनशील कर देते है।मुंबई का मुंब्रा और नागपाड़ा भोपाल का काज़ी कैम्प और टीला जमालपुरा इंदौर खजराना और आज़ाद नगर यह सब कब संवेदनशील कर दिए जाते है महसूस भी नहीं होता।

    शहर में हमे धंधा नहीं करने दिया जाता,किराये तक पर नहीं रहने दिया जाता, जब हम अपने इलाके बसाते है तो आप मिनी पाकिस्तान कह देते है संवेदनशील कहते है।पाकिस्तान ही क्यों टर्की क्यों नहीं?

    इस अन्याय के बीच आप कहते है शादाब सलीम आप कहिये मत,शब्दों को बांध के रखिए।

    मुझ जैसो की लड़ाई है कैलाश जी,मैं आपके सामने बहुत छोटा सा आदमी हूँ और मुझ जैसा हर लड़का आपके आगे छोटा ही है,मैं घेट्टो खत्म करूँगा,एक दिन फासले मिटेंगे।फ़िक़्र मत कीजिए सूरज निकलेगा,एक दिन ज़हर ज़रूर खत्म होगा।

    अमीर मीनाई का शेर है-

    वो बेदर्दी से सर काटें ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से
    हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता

    शादाब सलीम~———————————————————————————————————————————————————————————————————————-
    Pawan Saxena
    2 November at 14:25 ·
    मोहल्ले का वह 600 मीटर का मकान… जिसमे 200 मीटर का तो सिर्फ आंगन था… कौड़ियों के दाम बिक गया !… हाँ… हमारा आखिरी नामोनिशां भी मिट गया,उस मोहल्ले से !.. होली तो पिछले साल ही जलनी बन्द हो गई थी…. मकान बेंचने वालों ने शहर से दूर एक कालोनी में किराए के मकानों में रहना… मंजूर किया… !
    कहाँ जाएगा तू… कब तक भागेगा ? … भागना… पलायन… बेइज़्ज़ती और रुसवाई तो है ही तेरी किस्मत में ! जहां एक मन्दिर था… वहाँ एक मस्जिद और एक नई नई दरगाह खुद अपनी आंखों से तामीर होती देखी है… मैंने !
    सच कहूँ… भागने की शुरुआत करने वाले लोगों में पहला शख्स शायद मैं खुद हूँ !…. मगर तब बहाना मैंने… यह बनाया था कि पुराने शहर में भीड़ भाड़ बहुत है… सुबह की अज़ान से नींद में खलल होता है ! कार में तोड़-फोड़ का डर रहता है.. दंगों का इमकान हमेशा बना रहता है !
    मगर अब यही नौबत जब इस कालोनी में भी आन पहुचीं है तो अब मैं कहाँ जाऊं… कौन सा शहर ढूँढू ? शहर के बाद क्या मुल्क बदलूंगा ? मगर इंग्लैंड… फ्रांस… कनाडा और स्वीडन भी तो इसी आग में जल रहे हैं !
    अंतिम सच यह है कि कायर का कोई मोहल्ला… कालोनी…. शहर और मुल्क नहीं होता… उसका अंतिम सत्य… लगातार पलायन और भागना होता है !!

    Reply
  • January 15, 2020 at 6:07 pm
    Permalink

    Pawan S
    9 hrs ·
    Prof Kapil Kumar जी… आपकी वीडियो से 99 % सहमत हूँ… लेकिन आपका यह कथन कि ” भारत मे मुसलमान पिछड़ा,गरीब,अशिक्षित और बगैर नौकरियों के है”… इससे मैं पूर्णतया असहमत हूँ !सच्चाई यह है कि ‘आम मुसलमान’…. ‘आम हिन्दू’ से कहीं ज़्यादा समृद्ध और सबल है ! मुसलमान शिक्षा में भी पिछड़ा नहीं रहा.. बल्कि अशिक्षित मुसलमान कार और मोटर मैकेनिक.. एक बीटेक इंजीनियर से ज़्यादा कमाता है..
    सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है… देश की सभी राज्य सरकारें और केंद्र सरकार भी मुसलमानों को इफरात में नौकरियां दशकों से बांटती आ रही हैं ! कश्मीर से चलिये और केरल तक जाइये… सभी सरकारों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के तहत मुस्लिमों पर सरकारी, कोऑपरेटिव और स्थानीय म्युनिसिपल नौकरियों में मुस्लिमों को कम योग्यता के बाबजूद खूब सरकारी नौकरियां बांटी हैं ! AMU, जामिया जैसी यूनिवर्सिटियों में साल भर टाटा,इंफोसिस और अडानी की कम्पनियां प्लेसमेंट कैम्पस क्यों लगती हैं ? यहाँ के अभ्यर्थियों की प्लेसमेंट दर 100 % है !
    पिछले कई सालों से आईएएस और राज्यों के PCS में मुस्लिमों की नियुक्ति की बाढ़ सी गई है ! सभी राज्य सरकारें मुस्लिमों को आईएएस/PCS और अन्य सरकारी/बैंकिंग नौकरियों में नियुक्ति के लिए निशुल्क प्रशिक्षण,होस्टल और अनुदान दे रही हैं… फलतः आईएएस में प्रति वर्ष 55-55 मुस्लिम आईएएस सेलेक्ट हो रहे हैं…आप उन्हें पिछड़ा बता रहे हैं !
    नौकरियां छोड़िये… सभी व्यवसायों पर मुस्लिम कब्ज़ा हो गया है… फल, सब्ज़ी, ट्रांसपोर्ट, सभी तरह के मकैनिकल ट्रेड पर मुस्लिम कब्ज़ा हो चुका है… प्रापर्टी डीलिंग,कांस्ट्रक्शन व्यापार… व बिल्डिंग मटेरियल और ईंट भट्ठों पर मुस्लिम होल्ड हमेशा से है !
    आपका ध्यान नहीं गया… नगर पालिका अध्यक्षों,नगर पालिका सदस्यों,ग्रामपंचायतों पर पूरे देश मे मुसलमानों का होल्ड है… एक बहुत बड़ा व्यापार है… ‘ठेकेदारी’…. यहां… मुसलमानों की उपस्थिति 60 % से भी ज़्यादा होगी ! देश की भू संपदा पर कानूनी और गैर कानूनी कब्ज़ा शायद 60-70% से भी ज़्यादा होगा ! आपका ध्यान नहीं गया… मुसलमानों के पास खेती की खूब ज़मीनें हैं… हिन्दू 22 मंजिला फ्लैटों में रह लेता है,लेकिन मुसलमान सेपरेट अपने मकानों में ही रहता है !… 3 लाख मस्जिदों, 75 हज़ार मदरसों,60 हज़ार कब्रिस्तानों और लाखों वक्फ संपत्तियों ने देश की कितनी ज़मीन पर कब्ज़ा किया हुआ… किसी का इस ओर ध्यान नहीं जाता !
    मुस्लिम… कितना भी समृद्ध हो जाये… कितना भी राजनैतिक रूप से सक्षम हो चुका हो… वह दीन-हीन होने का अभिनय पिछले 100 बरस से कर रहा है और सदैव करता रहेगा ! सदैव विक्टिम कार्ड खेलते रहने में उसे बड़ा फायदा है… क्योंकि इस अभिनय से मिले फल बहुत मीठे होते हैं… अगर मुस्लिमों को इस देश मे अवसर नहीं मिलते तो करोड़ों बांगलादेशी, अफगानी, पाकिस्तानी, रोहिंग्या और नाइजीरिया के मुस्लिम घुसपैठिये… भारत मे क्यों अपना ठिकाना बनाते ?

    Reply
  • January 28, 2020 at 1:49 pm
    Permalink

    अपूर्व भारद्वाज
    24 January at 15:48 ·
    इंडिया ने एक——पाला

    मुझे किसी ने एक निहायती भद्दा औऱ बेहूदा वीडियो भेजा है जिसमें मोदी जी के विरुद बहुत ही घटिया भाषा में कविता एक बहुत ही प्यारी और मासूम बच्ची द्वारा गायी जा रही है औऱ दूसरे मासूम बच्चे उस पर ताली बजा रहे है मुझे नही पता यह बच्ची कौन है औऱ कौन यह जहर इन बच्चों के दिमाग में भर रहा है लेकिन तालिबानी और चरम मानसिकता लोग इस मुल्क के सबसे बड़े दुश्मन है जो इस मुल्क को मजहब के आधार पर एक बार फिर तोड़ने चाहते है

    इस सबके पीछे एक कठमुल्ला सोच है जो मुसलमान को अच्छी तालीम और प्रोगेसिव होने से रोकती है मुस्लिमों में ही सामंतवादी सोच के लोग है जो इस्लाम को खतरे में बताकर मुसलिम बच्चों को मदरसों से बाहर भेजने से मना करता है मुसलिमों में बच्चों की ड्राप आऊट रेट सबसे ज्यादा है बच्चे पढ़ेंगे नही तो वो कट्टरपंथी सोच से कैसे लड़ेंगे???

    भारत के मुसलमानों की दशा पर मैं बहुत दिनों से डाटा विश्लेषण कर रहा हूँ भारत का मुसलमान सबसे गंदी और सुविधाहीन बस्तियों में रहता है दलितों से बदतर हालातो में वो जीवन व्यापन कर रहा है 2050 तक भारत में मुसलमान की जनसंख्या पूरे विश्व में सबसे ज्यादा (11%) हो जायेगी अभी भारत मे मुसलमान उनकी आबादी के अनुपात में, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की तुलना में भी बदतर हालात में है मुसलमानों में भारत की आबादी का 14% है, लेकिन उच्च शिक्षा में छात्रों का प्रतिशत केवल 4.4% है

    भारत में केवल 3 % मुसलमान एक्जक्यूटिव स्तर की नौकरी कर रहा है सरकारी नौकरी में आंकड़ा गिरकर और कम हो जाता है स्वरोजगार के मामले में भी मुस्लिम वो ही पुराना घिसा पीटा काम कर रहा है पिछले 10 साल में एक भी बड़ा स्टार्टअप किसी मुस्लिम युवा ने खड़ा नही किया है क्या कारण है कि भारत का मुसलमान अपने इस अधिकार की लड़ाई सड़कों पर नही लड़ता है

    बहुत समय पहले में अपने एक कट्टर हिंदूवादी कलीग के साथ एक कालेज में कैम्पस प्लेसमेंट में इंटरव्यू लेने गया था एक मुस्लिम लड़के ने सभी राउंड क्लियर कर लिए थे जब वो मुझे इंटरव्यू दे रहा था तो मैंने पूछा आपके पिता क्या करते है तो वो बोला सर सायकल के पंक्चर सुधारते है मैंने बोला शाबास मुझे आपके पिता पर फक्र है 👍👍👍

    मैंने उसे सिलेक्ट कर लिया था इस पर मेरा दोस्त बोला यह लोग सॉफ्टवेयर कम बनायेगे बम ज्यादा बनाएंगे इन्हें पंक्चर ही सुधारने दो सॉफ्टवेयर इनके बस का नही है मैंने बोला “बाबू” यही सोच एक दिन इस मुल्क को डुबायेंगी देखना एक दिन यह युवा तुम्हे गलत साबित करेगा आज वो युवा IBM जैसी कंपनी में टीम लीडर है और मेरा दोस्त उसी कंपनी में प्रोजेक्ट.मेनेजर है

    वक़्त आ गया है कि अब भारत के मुसलमानों को अपने समाज के अंदर घुसे इन तालिबानीयो औऱ मुसंघीयो को खोजकर बाहर निकालना होगा, में चाहता हूँ कि देश के हर शहर में एक “शाहीन बाग” शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए भी हो .. जिस दिन भारत का हर मुसलमान पिता अपने बच्चों को टायर पंचर जोड़ने के लिए मना कर देगा उस दिन यह देश विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बन जायेगा जय हिंद जय भारत 🇮🇳🇮🇳

    अपूर्व भारद्वाज

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