पाकिस्तान : यह माजरा क्या है?

Indo-Pak-Relations-and-Trust-deficit-with-Pakistan

पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान ने जैश-ए-मुहम्मद के ख़िलाफ़ तेज़ी से शुरुआती कार्रवाई की है. पाकिस्तान के रुख़ में यह आश्चर्यजनक बदलाव पहली बार देखा जा रहा है. इसका मतलब क्या है? क्या भारत से रिश्तों को लेकर पाकिस्तान में, उसकी सरकार और सेना में सोच बदल रही है? क्या पाकिस्तान पर इस बार भरोसा किया जा सकता है?

क्या पाकिस्तान बदल रहा है? पठानकोट के बाद पाकिस्तान की पहेली में यह नया सवाल जुड़ा है. लोग थोड़ा चकित हैं. कुछ-कुछ अजीब-सा लगता है. आशंकाएँ भी हैं, और कुछ-कुछ आशाएँ भी! यह हो क्या रहा है पाकिस्तान में? मसूद अज़हर को पकड़ लिया, जैश पर धावा बोल दिया, सेना और सरकार एक स्वर में बोलते दिख रहे हैं, पाकिस्तान अपनी जाँच टीम भारत भेजना चाहता है, और चाहता है कि रिश्ते (Indo-Pak Relations) सुधारने की बातचीत जारी रहे. ऐसा माहौल तो इससे पहले कभी पाकिस्तान में दिखा नहीं! तो क्या वाक़ई पाकिस्तान में सोच बदल रही है? क्या अब तक वह आतंकवादियों के ज़रिये भारत से जो जंग लड़ रहा था, उसे उसने बेनतीजा मान कर बन्द करने का फ़ैसला कर लिया है? क्या वहाँ की सेना भी उस जंग से थक चुकी है? क्या पाकिस्तान इस बार वाक़ई आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगा या फिर वह बस दिखावा कर रहा है? क्या उस पर भरोसा करना चाहिए? टेढ़े सवाल हैं.

Indo-Pak Relations : Are we seeing a Change in Thinking of Pakistan?
पठानकोट के बाद बदली हुई लीक!
अब तक पाकिस्तान का रोडमैप कुछ और हुआ करता था. वहाँ की सरकार बात करती थी, और सेना और आइएसआइ उसमें छल कबड्डी कर ख़लल डालते थे. कभी करगिल के ज़रिये, और अकसर आतंकवादियों के ज़रिये. चाहे बेनज़ीर हों, नवाज़ शरीफ़ हों या परवेज़ मुशर्रफ़ हों, हर बार यही होता था. इसलिए इस बार भी जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर यात्रा के तुरन्त बाद पठानकोट हमला हुआ, तो यही लगा कि पाकिस्तान तो अपनी उसी पुरानी लीक पर चला है. कोई नयी बात नहीं.

Does Pak and its Army really want to re-define Indo-Pak Relations?
पाकिस्तान : कई-कई सरकारों का देश
लेकिन नयी बात तो अब हो रही है. इसीलिए यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान सचमुच भारत से रिश्तों को अब नयी तरह से परिभाषित करना चाहता है? या फिर इसके बाद हमें किसी नये छलावे के लिए तैयार रहना चाहिए. जो लोग बरसों से पाकिस्तान को जानते हैं, वह जानते हैं कि पाकिस्तान किस तरह एक अटका हुआ सवाल है. वहाँ कैसे एक साथ कई-कई सरकारें चलती हैं. एक सरकार वह जो मुखौटे के रूप में चलती है, लेकिन असली सरकार परदे के पीछे से सेना और आइएसआइ की चलती है, जो न केवल कश्मीर के मामले में बल्कि पाकिस्तान की समूची विदेश नीति और काफ़ी हद तक महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर घरेलू फ़ैसलों को प्रभावित करती है. फिर एक सरकार कट्टरपंथी मुसलिम उलेमाओं की चलती है, जिसे अनदेखा कर पाना वहाँ किसी सत्ता प्रतिष्ठान के बूते की बात नहीं. और इस सबसे अलग एक सरकार तरह-तरह के आतंकवादियों की चलती है, जिनमें अल क़ायदा, तालिबान, जैश, लश्कर और तमाम ऐसे छोटे-बड़े आतंकवादी समूह रहे हैं.

दोस्ती से ऊपर आतंकवाद के ‘इसलामी लक्ष्य’
इन सभी आतंकवादी समूहों के राजनीतिक और भौगोलिक लक्ष्य भले अलग-अलग रहे हों, लेकिन सबका वैचारिक धरातल हमेशा एक ही रहा है, और वह है कट्टरपंथी इसलाम और इसलामी प्रभाव और साम्राज्य का विस्तार. इसलिए इन सभी को कट्टरपंथी इसलामी इदारों की सरपरस्ती मिली. मुशर्रफ़ के ज़माने में लाल मसजिद पर चलाये गये अभियान के बाद यह भंडाफोड़ हुआ कि वहाँ चीन के उईघर आतंकवादियों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा था, हालाँकि चीन को पाकिस्तान अपना सबसे गहरा दोस्त मानता है. साफ़ है कि इन चीनी आतंकवादियों को लाल मसजिद के कट्टरपंथी उलेमा ‘इसलामी लक्ष्यों’ के लिए ही अपने ‘मित्र देश’ चीन के ख़िलाफ़ सिखा-पढ़ा रहे थे.

Pak Army, ISI, Islamic Fundamentalist and Terrorist Nexus
पाकिस्तान में सेना और आइएसआइ का इन ‘इसलामी लक्ष्यों’ से जुड़ाव हमेशा से रहा है और जनरल ज़िया-उल-हक़ के दौर में चले ‘इसलामीकरण’ अभियान से कट्टरपंथी तत्व उनमें लगातार हावी होते गये. इस वैचारिक गोंद ने सेना-आइएसआइ-मुल्ला-आतंकवादी गँठजोड़ को आपस में मज़बूती से जोड़े रखा है. राजनीतिक मोहरों के तौर पर आतंकवादियों के इस्तेमाल तो सबको मालूम है, लेकिन सेना और आइएसआइ द्वारा चलाये जा रहे अवैध हथियारों और हेरोइन तस्करी के विशाल और कुख्यात नेटवर्क में भी ये सारे आतंकवादी गिरोह एक महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं. ऐसे में पाकिस्तान से आतंकवादियों के ‘सफ़ाये’ की बात कभी सोची जा सकती है क्या? और ऐसे में क्या यह सोचा जा सकता है कि Indo-Pak Relations सुधारने के लिए आतंकवाद के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में कभी वास्तविक अभियान शुरू हो सकता है?

आतंकवाद : पाक राजनीति का अटूट हिस्सा
वरना ऐसा क्यों होता कि अल क़ायदा के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए अमेरिका से अरबों डालर वसूलने के बावजूद पाकिस्तानी सेना अपनी छावनी में ओसामा बिन लादेन को छिपाये रहती! और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ पर दो-दो बार हमला करने के बावजूद जैश-ए-मुहम्मद का सारा तामझाम वहाँ अब तक खुलेआम चल रहा है. और बेनज़ीर भुट्टो की हत्या में तालिबानियों का हाथ होने के शक के बावजूद उनके पति आसिफ़ अली ज़रदारी की सरकार तालिबान के ख़िलाफ़ कुछ ठोस क़दम नहीं उठा सकी. और दिलचस्प बात यह है कि बेनज़ीर हत्याकांड में मुशर्रफ़ की भूमिका भी सन्देह से परे नहीं पायी गयी! यानी साफ़ है कि आतंकवादी तत्व पाकिस्तान की राजनीति और सत्ता का अटूट हिस्सा बन चुके हैं.

Indo-Pak Relations have suffered major trust deficit in past
इसलिए पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान अगर मसूद अज़हर समेत जैश के कुछ लोगों को हिरासत में लेता है, तो इसके कुछ ज़्यादा बड़े अर्थ नहीं निकाले जाने चाहिए. इसका बस सीमित महत्त्व इतना ही है कि पाकिस्तान यह जताना चाहता है कि वह भारत के साथ बातचीत के सिलसिले को क़तई तोड़ना नहीं चाहता. समझ लीजिए कि Indo-Pak Relations को लेकर यह उसका एक कूटनीतिक क़दम है. लेकिन सवाल यह है कि क्यों ऐसा पहली बार हो रहा है कि पाकिस्तान बातचीत को जारी रखने के लिए इतनी ज़हमत उठाने को तैयार है? क्या ऐसा वह महज़ अन्तरराष्ट्रीय दबावों के कारण कर रहा है? या फिर क्या यह उस लाँछन को धोने की कोशिश है जो पाकिस्तान पर हमेशा लगता है कि जब-जब भारत की ओर से दोस्ती की बड़ी पहल होती है, तब-तब पाकिस्तान की तरफ़ से पीठ में छुरा घोंप दिया जाता है और बातचीत लटक जाती है. या फिर वाक़ई पाकिस्तान की सोच बदल रही है?

क्या इन शिकंजों से मुक्त हो सकता है पाकिस्तान?
इन सवालों के निश्चित जवाब तो कहीं नहीं हैं. सब अटकलें हैं. अगले कुछ दिन बता देंगे कि वाक़ई माजरा क्या है? यह तय है कि भारत-पाक रिश्तों यानी Indo-Pak Relations में सबसे बड़ी बाधा वे आतंकवादी ही हैं, जो पाकिस्तान की ही उपज हैं, जिन्हें पाकिस्तान अब तक ‘कश्मीर की आज़ादी के लड़ाके’ कह कर पालता रहा है. और पठानकोट हमले तक में इन आतंकवादियों को आइएसआइ के समर्थन मिलने के पक्के सबूत मिल चुके हैं! इन आतंकवादियों से पाकिस्तान का रिश्ता तभी टूट सकता है, जब दो बातें हों. एक पाकिस्तान अन्तत: यह मान ले कि आतंकवाद के ‘छाया युद्ध’ से वह कश्मीर नहीं जीत सकता और दूसरी यह कि वह इसलामी कट्टरपंथ के शिकंजे से अपने को मुक्त कर ले? क्या ये दोनों बातें इतनी आसान हैं?
http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi

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9 thoughts on “पाकिस्तान : यह माजरा क्या है?

  • January 19, 2016 at 8:40 am
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    एक बात समझ लीजिये अफज़ल भाई की इस तरह के लेखो से ” टी आर पि ” नहीं आती हे नकवो हो या पुण्य वाजपेयी ये बहुत बड़े पत्रकार हे रहे हे मगर इनका लेखन स्वाद हीन हे स्वाद हीन खाना वैसे सेहत के लिए अच्छा ही होता हे मगर जिसे ऐसा खाना हो वो अपने घर खायगा ही यानि इनके ब्लॉग पर खाय लेकिन आपकी साइट रेस्टोरेंट की तरह हे यहाँ तो इंसान थोड़ा स्वादिष्ट खाना ही चाहेगा स्वादिष्ट खाने के लिए जरुरी होता हे मसाले और ये मसाले होते हे लेख और लेख पर तगड़ी बहस लेखक के जवाब पक्ष विपक्ष कॉमेंट आदि . कॉमेंट जरुरी हे लेकिन सिर्फ कॉमेंट से बात नहीं बनती कॉमेंट भी वैचारिक होने चाहिए तभी साइट पर टी आर पि आती हे इसलिए किसी भी साइट के लिय सबसे बड़ी टी आर पि हे जाकिर भाई शरद भाई रंजन सर परदेसी जी जैसे पाठक बहसबाज़ जो हां में हां नहीं मिलाते हे जिस बात से सहमत ना हो उस पर तो विचार रखते ही हे जिस बात से सहमत हे उस पर भी अपने विविध विचार अनुभव पक्ष रखते हे तो में समझता हु की सबसे अधिक टी आर पि इसी बहस से आती हे अब यही देख लीजिये की नागर जी के यहाँ कॉमेंट की कोई कमी कभी नहीं रहती हे लेकिन बहस सिर्फ तभी हो रही होती हे जब हम लोग वहा मौजूद होते हे हमारी उपस्तिति के बिना वहा एक भी वैचारिक बहस नहीं हो रही होती हे लोग आते हे बहुत आते हे हां में हां मिलाते हे गाली गलोच करते हे तू तू में में करते हे मगर वैचारिक बहस कॉमेंट जीवन के अनुभव विचार बहस का कही नामोनिशां तक नहीं दीखता हे हमारे पीछे कभी भी नहीं ? तो नेट की टी आर पी का कोड ये वैचारिक बहस करने वाले लोग ही हे हे

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  • January 19, 2016 at 9:48 am
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    इसका एक कारण यह भी है कि इस फोरम की जानकारी बहुत लोगो को नही है. ये फोरम और उसके लेखक या लेखो का चयन वाकई मे बहुत अच्छा है, लेकिन इनको पढ़ने वाले बहुत कम.

    इसको आगे बढ़ाने के लिए कमेंट करना बहुत ज़रूरी होता है. लोग उन लेखो पे अधिक कमेंट करते हैं, जो इस फोरम से जुड़े लोगो के होते हैं, जैसे आप हो या अफ़ज़ल ख़ान, या रंजन परदेसी.

    आप लोगो की इस साइट पे बौद्धिक बहस को जीवंत रखने की कोशिश क़ाबिले तारीफ़ है. क्यूंकी मुझे लगता है, इतना लंबा समय तो शायद मैं नही दे पाऊँ.

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  • January 19, 2016 at 5:10 pm
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    मेरा कहना यही हे की लेख से ही बात नहीं बनती हे वो चाहे जितना बढ़िया हो या न हो बात बनती हे लेख पर होने वाली बहस से विविधतापूर्ण कॉमेंट से उनमे आने वाले नए नए विचारो से इनसे ही बात बनती हे यही नेट पर सबसे जरुरी हे लेकिन आगे ऐसा हो पायेगा मुश्किल हे आपके पास समय नहीं हे और में पिछले पांच साल से लगातार लिखता आ रहा हु कोई भला कब तक ” भूखे पेट भजन ” कर सकता हे वो भी में किसी तरह कर लेता पर जीवन में समस्याओ के अम्बर अलग लगे हे आगे शायद लेखन को विराम देना पड़ेगा

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  • January 20, 2016 at 9:51 am
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    लिखना या इसी फोरम पे लिखना शायद मेरा या आपका कम या बंद हो जाएगा, लेकिन हम अपने आस पास की दुनिया को तो झकझोर करते ही रहेंगे. मैं इस लड़ाई के लिए बड़ा आशावान हूँ. क्यूंकी समझदार लोग, हर जगह मौजूद हैं.
    मुस्लिम समुदाय मे भले ही पढ़े लिखे लोगो की कमी हो, लेकिन आज के 10-15 वर्ष पहले की तुलना मे, सवाल उठाने वालो की तादात बढ़ी है. हालाँकि कट्टरपन भी बढ़ा है.
    लेकिन इससे पहले कट्टरपंथी कम थे, लेकिन आम जनता मे भी चरमपंथ के कारणो की गहरी जानकारी नही थी. इंटरनेट का दौर है, तो अनुसंधान इससे आगे ही बढ़ेगा, और आज विचार को ख़त्म नही किया जा सकेगा. हर चीज़, रिकॉर्ड मे रहेगी. हर दलील जिंदा रहेगी.

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  • January 20, 2016 at 11:35 am
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    लेकिन में पूरी तरह निराश हु जिन समझदार लोगो की आप बात कर रहे हे उन ”समझदारो ” को में खूब जानता हु मेरे आस पास अनगिनत हे इनकी सारी समझदारी उदारता की बाते सिर्फ गैर मुस्लिमो की मौजूदगी में ही होती हे वहा ये खुद को बड़ा आधुनिक लिबरल प्रोग्रसिव दर्शाते हे किसी शुद्ध मुस्लिम महफ़िल में यकिसी कठमुल्ला के सामने इनकी चोंच नहीं खुलती हे इन्हे पता हे की दस मिनट में वो कठमुल्ला ब्लासफेमी या कुछ भी ऐसा ही इलज़ाम लगा देगा जिसकी सफाई उस कठमुल्ला को नहीं जिस पर इलज़ाम लगे उसे ही देनी होती हे नेट और असल जीवन में मेरे साथ ऐसा सेकड़ो बार हो चूका हे ये लड़ाई बेहद जोखिम भरी होगी क्योकि एक शुद्ध सेकुलर भारतीय मुस्लिम बिलकुल अकेला और थकेला हे आपको अनुभव शायद ना हो मगर मुझे हे की एक शुद्ध खालिस सेकुलर हिन्दू तक आपका साथ नहीं देगा इसलिए की एक तो इस्लाम और हिन्दू बिलकुल विलोम आस्थाय हे तो उसे मुस्लिम काटरपंथ की कोई खास समझ नहीं हे दूसरा की वो खुद पूरी तरह से हिन्दू कठमुल्लाओं से झुझ रहा हे फिर भारत में दुनिया में जितनी भी ताकते हे स्वार्थ हे किसी के भी हित शुद्ध सेकुलर भारतीय मुस्लिम वर्ग के उठान से नहीं सधते हे काम बेहद जोखिम भरा हे ऊपर से ये ऐसा अजीब लेखन होगा जिसमे आप जितने काम्यंब होंगे आपको इनाम में सिर्फ जूते मिलेंगे में ना किसी जूते से ना किसी चाक़ू से न किसी के बाप से डरता हु मगर बिना किसी के भी ” सपोर्ट ” के इतनी सारी व्यक्तिग्त समस्याओं चिन्ताओ के साथ कोई भला कब तक टिक सकता हे ? खेर फिर भी सरेंडर का तो सवाल नहीं हे मगर युद्ध विराम करना पड़ सकता हे

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  • January 20, 2016 at 12:18 pm
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    सबसे सबसे जरुरी होता हे पैसा पैसे के बिना कुछ भी नहीं मुस्लिम काटरपंथ कभी नहीं फैलता अगर पेट्रो डॉलर की बरसात न होती खालिस्तान आंदोलन फैला क्योकि विदेशी आमिर सिखो ने पैसा दिया जिन्ना आंदोलन फैला क्योकि मुस्लिम व्यापारियों ने गैर बनिया देश को पैसा दिया हिन्दू काटरपंथ फैला क्योकि इन आर आई हिन्दुओ ने वि एच पि को पैसा दिया फिर कोई चेहरा कोई भिंडरावाले कोई जिन्ना कोई अशोक सिंघल आडवाणी आजकल देश में हिन्दू कठमुल्लवाद इस कदर मज़बूत क्यों हे ? क्योकि पैसा भी खूब हे और इनके पास एक सर्वमान्य चेहरा भी हे मोदी का जबकि शुद्ध सेकुलर मुस्लिम आंदोलन बिलकुल अनाथ हे इसी कोई सपोर्ट नहीं हे इसका कोई चेहरा नहीं हे शाहरुख़ आमिर को देखिये विभाजन के बाद भी जिस गांधी नेहरू निजाम ने इन्हे खरबपति स्टार बनाया उसी पर अब खतरा मंडरा रहा हे क्या किया इन्होने एक दो बयान दिए फिर डर कर अपने बिल में घुस गए शाहरुख़ ने तो माफ़ी तक मांग ली खरबो की सम्पत्ति बनाकर उस पर ताला जड़ देंगे मगर ये नहीं कहेंगे की शुद्ध सेकुलर लेखको संघटनो में इतने इतने लाख दूंगा जावेद अख्तर इतने लटके झटके देते हे जावेद शबाना को इण्डिया की फर्स्ट सेकुलर फेमली कहा जाता हे ये भारत के अकेले मिया बीवी हे जिन्हे गांधी नेहरू निजाम ने रज़यसभा भेजा कभी सुना हे की इन्होने अलीगढ़ जामिया के चक्कर लगाय हो की मुस्लिम एजुकेटिड लोगो को कठमुल्लशाही के खिलाफ जागरूक करेंगे कभी नहीं यानी सेकुलरिज़म की मलाई खूब खायी मगर सरदर्दी से बचेंगे

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  • January 20, 2016 at 3:42 pm
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    फिर भी जाकिर भाई जो थोड़ी बहुत पॉजिटिविटी की लहर पैदा हो भी रही होगी तो उस पर पानी फेरने के लिए और मुस्लिम काटरपंथ को और बढ़ाने के लिए ये मोदी मुलायम आज़म जैसे लोग पूरी तरह से तैयार हे ये पढ़िएदेखिये हमारे इलाके में किस कदर गंद फैलाई जा रही हे http://tehelkahindi.com/arms-training-is-being-given-to-youth-by-hindu-radicals-in-western-uttar-pradesh/

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    • January 20, 2016 at 8:49 pm
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      ये भी शायद मोदी जी के लाये फैलाये हिन्दू कठमुल्लवाद का असरात हे की लाइब्रेरी में तुलसी राम आदि दलित लेखको की रचनाय ढूंढते तंग आ गया हु उधर अब हर शेल्फ से हर बार कोई नयी संघियो के प्रिय लेखक एन आर आई लेखक वीएस नायपाल की कोई न कोई बकवास किताब झांक रही हे वो भी गैर भारतीय संदर्भ की भी

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    • January 21, 2016 at 8:42 am
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      अपनी पूरी जिंदगी मुझे एक ऐसा मुस्लिम काटरपन्ति नहीं मिला जिसने मुझे कोई छोटा बड़ा मध्यम” घाव ” न दिया हो ? अब वो बेचारे सीधे साधे हिन्दू जिन्हे इन बातो से कोई लेना देना नहीं इस ” ट्रेनिंग ”’ का असर वही भुगतेंगे ये ट्रेनिंग वैसे तो मुसलमानो के विरुद्ध दी जा रही हे लेकिन मुसलमानो के विरुद्ध तो यह तब काम आएगी जब साल दो साल पांच साल में दंगे होंगे तब न बाकी पुरे साल ये शूरवीर आम शरीफ हिन्दू का खून पिएंगे क्यों पिएंगे ? क्योकि हिंदुस्तान इतना घिच पिच हे इतने अधिक मुद्दे मसले यहाँ हर जगह हज़ारो में हे और खासकर हमारे वेस्ट यु पि का तो पूछो इतना कंजेस्टिड हे इतनी असमानता हे इतने मसले हे

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