पर्दे का संबंध चेहरे से नहीं है !

hijab

by — महमूद आलम सिद्दीकी

मैं नाजिया जसीम के साथ सहमत हूँ कि “ज़ालिम इंसान है, इस्लाम नहीं है” (हिंदू, ओपन पेज, 27 मई, 2012)। असल में ये इस्लाम है जिसने महिलाओं को पुरुष प्रधान समाज के अत्याचारी और क्रूर रिवाजों के बंधन से आज़ाद कराया जिसने उनके जीवित रहने के लिए आवश्यक और बुनियादी अधिकार छीन लिए थे। ये इस्लाम है जिसने उन्हें कई अधिकार प्रदान किए- विरासत का अधिकार, संपत्ति रखने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, व्यापार करने का अधिकार, स्वतंत्र रूप से पति के चुनाव करने का अधिकार, पति की मृत्यु हो जाने पर दोबारा शादी करने का अधिकार और तलाक का अधिकार।

ये इस्लाम है जिसने महिलाओं को उस समय बुलंद मर्तबा प्रदान किया जब उन्हें मिल्कियत मानकर वैसा ही बर्ताव किया जाता था और उन्हें पैदा होने के बाद ज़िंदा दफन कर दिया जाता था। ये इस्लाम है जिसने उन्हें खुदा की नेमत के तौर पर लिया और पत्नियों के रूप में पुरुषों के बराबर साझीदार बनाया और माओं के पैरों के नीचे जन्नत रखा और उन्हें हुक्म दिया कि वो अपना चेहरा ढँके बगैर अपनी गरिमा और पवित्रता की रक्षा के लिए हिजाब पहनें और मर्दों को उनका सम्मान करने और उनके साथ अच्छा बर्ताव करने का हुक्म दिया। जैसा कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने साफ तौर पर ऐलान किया है,” तुम में से बेहतरीन इंसान वो है जो अपने परिवार की महिला सदस्यों के साथ अच्छा बर्ताव करता है और तुम्हारे बीच वो इंसान बुरा है जो अपने परिवार की महिला सदस्यों के साथ बदसुलूकी करता है।”(बुखारी)

लेकिन, अफसोस की बात ये है कि मुसलमानों के एक वर्ग ने महिलाओं को उनके आवश्यक और बुनियादी अधिकारों सहित शिक्षा के अधिकार और स्वतंत्र रूप से अपनी पसंद का पति चुनने की स्वतंत्रता और वो दूसरे अधिकार भी जो उन्हें इस्लाम ने प्रदान किए हैं और वो भी जो इस्लामी पर्दा या हिजाब के नाम पर दिया है, से महरूम कर दिया है। मुसलमानों के इस वर्ग ने महिलाओं को सबसे पहले इस्लामी पर्दे के बारे में पुरुष प्रधान समाज के व्याख्या अनुसार उनके चेहरों को ढक कर महरूम किया, फिर उनके मौलिक अधिकारों को छीन लिया! यहां तक ​​कि उन्हें नमाज़ पढ़ने से रोक दिया गया। मौजूदा वक्त में इस धरती पर इस्लाम ऐसा एकमात्र धर्म है जो अपनी पुरुष प्रधान व्याख्या के कारण महिलाओं को मस्जिद में आने से रोकता है। इस तथ्य के बावजूद कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में आने के लिए प्रोत्साहित किया है बल्कि मुसलमान मर्दों को निर्देश दिया है कि उन्हें अपनी पत्नियों को मस्जिद में नमाज़ के लिए जाने से नहीं रोकना चाहिए।” (बुखारी)। ऐसी पुरुष प्रधान विचारधारा के परिणामस्वरूप पर्दे के बारे में इस्लामी शिक्षाओं का गलत रूप सामने आया और जिसका शिकार खुद नाजिया जसीम बनीं और इस बात की वकालत की कि पर्दा (चेहरा ढँकने के लिए) महिलाओं को गुलाम बनाने के लिए मर्दों को प्रोत्साहित करता है। निस्संदेह इस बात ने मुझे यह संक्षिप्त स्पष्टीकरण लिखने की प्रेरणा दी।

वास्तव में, चेहरा पर्दा में शामिल नहीं है, क्योंकि बड़ी संख्या में कुरानी आयात और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के फरमान है जिनसे स्पष्ट रूप से साबित होता है कि इस्लाम में चेहरा छिपाने की जरूरत नहीं है। जैसा कि कुरआन का फरमान है “आप मोमिन मर्दों से फ़रमा दें कि वो अपनी निगाहें नीची रखा और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त किया करें, ये उनके लिए बड़ी पाकीज़ा बात है। बेशक अल्लाह इन कामों से खूब आगाह है जो ये अंजाम दे रहे हैं, और आप मोमिन औरतों से फरमा दें कि वो (भी) अपनी निगाहें नीची रखा करे और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त किया करें और अपनी आराइश व जेबाइश को जाहिर न किया करें सिवाय (उसी हिस्सा) जो उसमें से खुद जाहिर होता है”(24 :30-31)।

ये आयत साफ तौर पर इशारा करती है कि चेहरा ढँकने की ज़रूरत नहीं है, वरना नज़रें नीची रखने का क्या फायदा है? दूसरी और अहम बात कि मध्यकालीन और आधुनिक दौर के कुरान के ज़्यादातर (मुस्तनद मोबस्सिर) प्रमाणिक टिप्पणीकारों ने इस आयत के निम्नलिखित हिस्से ” अपनी आराइश व जेबाइश को जाहिर न किया करें सिवाय (उसी हिस्सा) जो उसमें से खुद जाहिर होता है” का अर्थ चेहरा और पांव लिया है। इनमें से सबसे प्रमुख व्याख्या में “तफ्सीरे जलालैन ” है जो देवबंद के पाठ्यक्रम में शामिल है और देवबंद के शब्बीर उस्मान द्वारा लिखी गई “तफ्सीरे उस्मान” इसमें शामिल है।

पर्दा की इस व्याख्या को नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की पत्नी हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा से मरवी हदीस से भी समर्थन प्राप्त है। उनके अनुसार, “एक बार उनकी बहन हज़रत आस्मा रज़ियल्लाहु अन्हा उनके घर आईं, उन्होंने बहुत महीन कपड़ा पहना हुआ था जिससे उनका शरीर नज़र आ रहा था। जब नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उन्हें देखा तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने चेहरे का रुख दूसरी ओर मोड़ लिया और कहा कि “ऐ अस्मा जब एक औरत बालिग़ हो जाती है, तो उसे चेहरा और पैर छोड़कर अपने शरीर को ढकना चाहिए।”

संक्षेप में, चेहरे को हिजाब से ढँकने की जरूरत नहीं है, ये चौथी शताब्दी में इस्लामी पाठ के पुरुष प्रधान व्याख्या के बाद किया गया जिसने महिलाओं को उनके अपने कर्तव्यों को अंजाम देने से रोक दिया। वास्तव में, नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़माने का समाज एक संयुक्त समाज था जिसमें मर्द और औरतें अपने सामान्य काम, जंग के मैदान में, मस्जिदों में नमाज़ें पढ़ने में, पढ़ाई और शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में अपना बहुमूल्य योगदान देने में भागीदार थे। जब इस्लाम हमसे चेहरा ढँकने की मांग नहीं करता है, तो हम उसके बारे में इतने सख्त क्यों हैं?

महमूद आलम सिद्दीकी, सेंटर ऑफ अरेबिक एंड अफ़्रीकन साइंसेज़, जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी, नई दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर (अतिथि) हैं।

URL for English article:

http://newageislam.com/islam,- women-and-feminism/mahmood-alam-siddiqui/the-veil-was- not-meant-for-the-face/d/7865

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7 thoughts on “पर्दे का संबंध चेहरे से नहीं है !

  • September 7, 2016 at 3:26 pm
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    می اس مضمون سے اتفاق نہیں رکھتا کیوکے اسلام نے پردہ کا حکم دیا ہے یہ مسلمانو کو اور اسلام کو بدنام کرنے کی ساجیش ہے –

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  • September 7, 2016 at 9:10 pm
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    वाहिद साहब मेहरबानी होगी कमेंट हिंदी में डाले क्यों के हमारे अधिकतर पाठक को उर्दू नहीं मालुम है , ऐसे इस कमेंट में वाहिद साहब का कहना है के ये लेख गलत है और इस्लाम मुस्लमान को बदनाम करने की साजिश है !

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  • September 8, 2016 at 4:07 pm
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    महिलाओ की शालीन आज़ादी वहाब साहब की नज़र मे इस्लाम की बदनामी है.

    अगर, इस्लाम की व्याख्या, नारी दमन और काले कम्बलो मे क़ैद करने की होती तो इनकी नज़र मे ये इस्लाम की प्रसिद्धि होती है. आज इस्लाम की हिफ़ाज़त, और रसूल की शान की कसमे खाने वाले ही इस्लाम की बदनामी और रसूल की शान पे बट्टा लगा रखे हैं.

    आज इस्लाम को लेके जो नकारात्मक छवि, अगर गैर मुस्लिम समुदाय मे बनी है तो इसमे वहाब रजा जैसे लोगो की भूमिका (सक्रिय) है.

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  • September 8, 2016 at 5:50 pm
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    लेख की शुरुआत इस वाक्य से होती है ” जालिम इंसान है, इस्लाम नही”. पूरे लेख मे इस बात को रेखांकित करने की कोशिश है कि दुनिया जिस लिबास को औरतो की पहचान और वजूद पे आड़े मानती है, उसका ताल्लुक इस्लाम से नही, बल्कि इंसानी समझ से है.

    अब वाहिद साहब, आप क्या चाहते है, हम यह कहे कि नही आदमी जालिम नही है, इस्लाम जालिम है. आदमी ने नही, इस्लाम ने औरत के वजूद और आज़ादी पे प्रतिबंध लगाए? और ऐसा कह के आप इस्लाम की शान मे चार चाँद लगाएँगे?

    कम से कम महमूद आलम सिद्दीकी ने इस्लाम की नकारात्मक छवि को अपनी लेखनी से दूर करने की कोशिश की. अपने लेख मे वो इस्लाम की महानता के तर्क दे रहे हैं, लेकिन आप उन्हे ही कोस रहे हैं. हद होती है, जाहिलापने की भी?

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  • September 9, 2016 at 11:43 am
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    बुर्के परदे की ही बात नहीं हे बल्कि बात टोटल ” मुल्लागर्दी ” से ही बचने बचाने की हे https://khabarkikhabar.com/archives/1145 भला हो हमारे दसवी फेल किसान फिर ट्रक मालिक और ड्राइवर पापा और पांचवी फेल अम्मी का की जो खासे रिलिजियस रहे, मगर हमारे घर में कठमुल्लावाद मुल्लागर्दी को उन्होंने कभी कोई जगह नहीं दी दोनों का मिजाज लिबरल सेकुलर रहा नतीजा हम दस भाई बहनो के भी खून में ही सेकुलरिज्म रच सा गया और मेने देखा की यही उदारता और सेकुलरिज्म इंसान को अच्छा और सभी से अच्छे सम्बन्ध बनवाती हे हिन्दू सिख शिया सभी से हमारे अच्छे सम्बन्ध रहे गाँव की एक बूढी ब्राहमण या शायद जाट ( शायद जिसकी अपनी औलाद उन्हें नहीं पूछती थी ) तो मेरे पापा को ही अपना बेटे जैसा मानती थी और पापा भी तमाम आर्थिक दिक्कतों के बाद भी जैसे तैसे उसका भी करते थे . मसला ये हे की मुल्लागर्दी से लड़ाई में में सबसे बड़ा रोड़ा जैसा की मेने पूर्व कमेंट में दर्शाया की ये ज़ाहिद साहब या मेरे कज़िन जैसे ( व्यक्ति विशेष नहीं बहुत हे ) क्लीन शेव लोग हे ये क्या करते हे की वैसे तो ये नार्मल होते हे मगर अपनी जन्नत में सीट रिजरवेशन के कन्फर्मेशन की खातिर मुल्लागर्दी कठमुल्लगर्दी का कही इनका सपोर्ट ,इनका बचाव करते हे , कही खुल कर तो कही छुप कर इनका हौसला बढ़ाते हे , परदे की ही बात ले तो ये क्या करते हे इनकी बीवी चाहे पर्दा करे ना करे मगर ये परदे का बड़ा सॉलिड बचाव करते हे , मुस्लिम महफ़िलो में आराम से देखे जा सकते हे पाकिस्तान भी मुल्लाओ ने नहीं बल्कि इन्ही पैसे वाले पढ़े लिखे क्लीन शेव कही उर्दू में माहिर कही अंग्रेजी में कही दोनों में माहिर इन्ही लोगो ने बनवाया था ————— जारी

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  • September 9, 2016 at 1:57 pm
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    डॉ भीमराव अम्बेडकर भारत के सबसे भयंकर नजारों में से एक है सड़कों पर बुर्काधारी महिलाओं का दिखना। भारत की गलियों में आपको ऐसे भयावह दृश्य दिख जाएंगे। यह महिलाओं के शरीर पर गंभीर शारीरिक दुष्परिणाम पैदा करता है। मुसलिम महिलाएं आम तौर पर एनीमिया (खून की कमी), टीबी और पायरिया की रोगी हो जाती हैं। उनका शरीर बिगड़ जाता है। हड्डियों में खराबी आ जाती है, कमर झुक जाती है। हृदय की कमजोरी और घबराहट मुस्लिम औरतों में एक सामान्य बीमारी बन जाती है। इन शारीरिक कमजोरियों के कारण कई बार डिलिवरी के समय महिलाओं की मौत हो जाती है। पर्दा (बुर्का) मुस्लिम महिलाओं को नैतिक और मानसिक रूप से पिछड़ा बना देता है। पर्दा का परिणाम यह होता है कि मुस्लिम महिलाओं की सोच संकीर्ण हो जाती है। उनके सोचने समझने का दायरा सीमित रह जाता है। वे अपने ही समाज की दूसरी बहनों से पिछड़ जाती हैं। पर्दा के कारण उनके भीतर दास मानसिकता और इन्फिरियरिटी कॉम्प्लेक्स भर जाता है। शिक्षा और ज्ञान के प्रति उनके अंदर कोई उत्सुकता नहीं बचती क्योंकि उन्हें सिखाया जाता है कि तुम्हारी दुनिया तो चारदीवारी के भीतर है। बुर्काधारी महिलाएं हमेशा अपने को असहाय समझती हैं। जीवन के संघर्ष में वे अपने आप को कमजोर मानने लगती हैं। भारत में कोई भी आसानी से मुस्लिम महिलाओं में व्याप्त इस पर्दाप्रथा के गंभीर परिणामों को देख सकता है।
    डॉ भीमराव अम्बेडकर

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  • September 9, 2016 at 2:00 pm
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    Nafisul HasanNafisul Hasan अम्बेडकर साहब ने जो कहा वोह उनका विचार है। आदर करता हूँ उनका।
    अब तिवारी जी या कोई और ब्यक्ति चाहे तो बुर्का पहने महिलाओं की भीड़ में चला जाये ( ईद के त्यौहार के समय किसी मार्किट में) और उनसे पूछे क़ि बुर्का उन्होंने अपनी मर्ज़ी से पहना है या उनके परिवार का दबाव है बुर्का पहन ने के लिए। आपको उत्तर मिल जायेगा बल्कि आपका मुस्लिम महिलाओं के प्रति दयाभाव का भृम भी टूट जायेगा जब आपको 95-99% बुर्का पहने महिलाओं का यह उत्तर मिलेगा क़ि ” बुर्का उन्होंने अपनी मर्ज़ी से पहन रखा है क्योंकि उन्हें बुर्का पहनना अच्छा लगता है।यह वस्त्र उनमे हींन भावना नहीं बल्कि विश्वास और confidence पैदा करता है। बुर्का पहने महिला को मनचले न तो छेड़ते है और न ही अश्लील और ललचाई नज़रो से देखते है। जाइए इंटरव्यू करिये। सब भृम दूर हो जायेंगे।
    Sanjay TiwariSanjay Tiwari यह कन्डीशनिंग आफ माइंड है। चार साल की बच्ची पर स्कार्फ बांधकर हिजाबी बनाने की ट्रेनिंग शुरू कर दी जाती है। जाहिर है चौबीस साल की होने के बाद वह लबादे में घुस ही जाएगी। मामला किसी व्यक्ति का नहीं है सर। कंडीशन आफ माइंड का है। यह कंडीशनिंग कौन करता है? राह चलते यह टिप्पणी कौन करता है, “शर्मो हया खत्म हो गयी है। बुर्का घर में छोड़कर निकलती हैं।” जिस दिन आप लोग उम्मीद करना बंद कर देंगे उस दिन वो भी अपनी मर्जी का कपड़ा पहनना शुरू कर देंगी। औरतें स्वभाव से सौंदर्यप्रेमी होती हैं। उन्होंने तो बुर्के में भी बुटिक का काम करवा लिया है। उन्हें अपने नैतिक दबाव से मुक्त करिए। देखिए वह कौनकौन सा परिधान विकसित कर लेती हैं। जीन्स पहनकर ऊपर से बुर्का ओढ़ने का उदाहरण तो आपने भी खूब देखा ही होगा। अगर बुर्के में इतना ही आनंद है तो जीन्स के प्रति यह आकर्षण क्यों है? Sanjay Tiwar

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