पर्दा : इस्लाम ने नारी का सिर ऊँचा किया ॥

parda

सामूहिक जीवन में औरत और मर्द का संबंध किस तरह होना चाहिए, यह इंसानी सभ्यता की सब से अधिक पेचीदा और सब से अहम समस्या रही है, जिसके समाधान में बहुत पुराने ज़माने से आज तक दुनिया के सोचने-समझने वाले और विद्वान लोग परेशान हैं,। जबकि इसके सही और कामयाब हल पर इंसान की भलाई और तरक्क़ी टिकी हुई है। पुरुष प्रधान समाज ने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए स्वयम के नियम गढ़ लिए ना की धर्म मेँ उकेरी गयी वास्तविक बातों को ग्रहण किया ? इतिहास का पन्ना पलटने से पता चलता है कि प्राचीन काल की सभ्याताओं से लेकर आज के आधुनिक पश्चिमी सभ्यता तक किसी ने भी नारी के साथ सम्मान और और न्याय का बर्ताव नहीं किया है! वह सदैव दो अतियों के पाटन के बीच पिसती रही है। इस घोर अंधेरे में उसको रौशनी एक मात्र इस्लाम ने प्रदान किया है, जो सर्व संसार के रचयिता का एक प्राकृतिक धर्म है, जिस ने आकर नारी का सिर ऊँचा किया, उसे जीवन के सभी अधिकार प्रदान किये, समाज में उसका एक स्थान निर्धारित किया और उसके सतीत्व की सुरक्षा की…… .

तसलीमा नसरीन के कथित लेख पर कर्नाटक में मचे बवाल के बाद बुर्का, हिजाब और पर्देदारी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इसमे कोई दो राय नहीं कि बुर्का आम मुसलमान औरत की पहचान बन गया है। इसी को बहाना बना कर कुछ जाहिल गंवार इसे इस्लाम से जोड़ अनर्गल बहस बाजी मे लगे हैं । यही नहीं इसी बहाने इस्लाम में औरतों के दोयम दर्जे की बात भी उठाई जा रही है । सवाल ये है कि क्या इस्लाम में बुर्का सचमुच अनिवार्य है, या फिर इसे जानबूझ कर मुसलमानो के जरिये औरतों पर लादा जा रहा है?

दरअसल यह भी एक नजरिया है। इस नजरिए में सच की झलक सिर्फ और सिर्फ मुसलमानो की उपज है ना की इस्लाम की। अगर ये सच है तो क्या यही बात बुर्के और हिजाब पर नहीं लागू होती। लेकिन एक अखबार में बुर्के के बारे छपा एक लेख दंगों की वजह बन जाता है। कर्नाटक के हासन और शिमोगा ने इसकी तपिश झेली है। आखिर बुर्के के पीछे का नजरिया क्या है। ये नजरिया क्या औरत की आजादी में बाधा नहीं है। लेकिन सच्चा इस्लाम तो औरत की आजादी का हामी है।

बुर्क़ा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है ,लेकिन इस्लाम का एक हिस्सा नहीं है । असल मेँ यह भेद, ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी है। आजकल बुर्क़ा या पर्दा खबरों में छाया हुआ है। सामान्यत: हर मुसलमान इसे इस्लाम का अनिवार्य अंग समझा जाता है । लेकिन ऐसा है नहीं । वास्तव में, बुर्क़ा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है। इस्लामी शिक्षा का हिस्सा नहीं । मुसलमानों का वर्तमान किरदार और इस्लाम के बीच एक बड़ा अंतर है। अग़र यह दावा किया जाता है कि बुर्का या पर्दा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है तो हां यह बात सच्च है । ,लेकिन अग़र यह दावा किया जाता है कि इसे पहनना क़ुरानी शिक्षा का एक हिस्सा है तो तमाम जानकारी लेने के बाद यह कहा जा सकता है की ” नहीं ” ।आप अच्छी तरह जान लें की इस्लाम का स्रोत मुस्लिम संस्कृति नहीं,” क़ुरान” है। मुस्लिम संस्कृति एक सामाजिक तथ्य है भौगोलिक आधार है । जबकि क़ुरान एक ईश्वरीय पुस्तक है जो इस्लाम के पैग़म्बर के समक्ष प्रकट की गयी थी। भाषिक इतिहास के अनुसार बुर्क़ा शब्द का अर्थ कपड़े का एक टुकड़ा था जिसे, विशेषकर सर्दियों में, हिफ़ाजत के लिये इस्तेमाल किया जाता था। प्रसिद्ध अरबी शब्दकोश लिसान अल-अरब हमें इस्लाम पूर्व काल में इसके इस्तेमाल के दो उदाहरण देता है:…. पहला,सर्दी के मौसम में जानवरों को ओढ़ाने की और दूसरा गांव की औरतों के लिया शाल की तरह ओढ़ने की चादर का । यद्यपि अरबी शब्दावली में ‘बुर्क़ा’ शब्द मौजूद था,जबकि क़ुरान में बुर्क़ा शब्द का इस्तेमाल औरतों के पर्दे के लिये नहीं किया गया है। इतिहास बताता है कि पर्दा या ‘बुर्क़े’ के इस्तेमाल की शुरुआत फारस (ईरान) से हुई। फारस में जब इस्लाम का प्रवेश हुआ तब वहां एक संस्कृति पहले से ही मौजूद थी। इस्लामी संस्कृति में अनेक चीज़े फारसी संस्कृति से ही आईं हैं। उदाहरण के लिये अल्लाह की जगह ”ख़ुदा”,… सलात की जगह ”नमाज़” जैसे शब्द । इसी तरह ईरानी संस्कृति के प्रभाव में मुसलमानों ने बुर्क़ा अपना लिया। क्रमश: शने – शने इसका इस्लामीकरण खुद ही इनहि मुसलमानो के जरिये हो गया और यह इस्लामी संस्कृति हिस्सा बन गया । जबकि ऐसा नहीं है । आजकल मुसलमान ‘हिजाब’ शब्द का इस्तेमाल बुर्क़े की तरह करते हैं, लेकिन ‘हिजाब’ शब्द का इस्तेमाल क़ुरानी अर्थोँ में नहीं किया जाता है। हिजाब का शाब्दिक अर्थ है ”पर्दा”। क़ुरान मे हिजाब शब्द का इस्तेमाल सात बार किया गया है, लेकिन उस अर्थ में नहीं जो आज मुसलमानों के बीच में प्रचलित है। औरतों के पर्दे के बारे में क़ुरान में दो शब्दों का इस्तेमाल किया गया है ”जिलबाब”(33:59 ) और ”ख़िमर”। लेकिन इन शब्दों का इस्तेमाल भी इनके वर्तमान अर्थों मे नहीं किया गया है। यह एक तथ्य है कि दोनों शब्दों का अर्थ समान है,यानी एक औरत के चेहरे नहीं बदन को ढ़ाँकने वाली एक चादर या दुपट्टा । इससे यह स्पष्ट है कि वर्तमान ”बुर्क़ा” या ‘हिजाब’ कुरानी शब्द नही हैं। दोनों मुस्लिम संस्कृति का हिस्सा हैं क़ुरान के आदेशों का हिस्सा तो एकदम नहीं । फिक्ह के(इस्लामी धर्म शास्त्र) हनफी और मालिकि संप्रदाय के अनुसार औरत के बदन के तीन हिस्से ”सतर”(बदन को ढ़ाकने वाला वस्त्र) के बाहर हैं – ”वजाह”(चेहरा),”कफाईन”(हाथ) और ”क़दमाईन”(पैर)। शरिया के अनुसार औरतों को अपने बदन को ऐसे कपड़ों से ढ़ंकना चाहिये जो चुस्त और दूसरों को आकर्षित करने वाले ना हों।(अध्याय 24,सूरा 31,तसफीर उसमानी)। यह ग़ौर करने की बात है कि मशहूर अरबी विद्वान शेख़ मुहम्मद नासिरुद्दीन अल-अलबानी ने अपनी किताब हिजाब अल-माराह अल-मुसलमिह -फिल किताब(एक मुसलमान औरत का पर्दा) में ऊपर चर्चा किये गये शरिया के द्दष्टिकोण का अनुमोदन किया है। उन्होने यह भी लिखा है कि क़ुरान,हदीस और (पैग़म्बर मोहम्मद के) साथियो तथा ताबियून( पैग़म्बर के साथियों के साथी) के व्यवहार से यह साफ है कि जब भी एक औरत घर के बाहर पैर रखती है तब उसका फर्ज है कि वह अपने बदन को इस तरह ढाँके कि चेहरे और हाथों के अलावा और कुछ न दिखाई दे। इसमें कोई दोराए नहीं की इस्लाम धर्म स्वरूप के बजाय आत्मा पर केंद्रित है। यह धर्मनिष्ठ सोच और मूल्यों पर आधारित चरित्र पर बल देता है। मुसलमानों और तमाम इन्सानो को नैतिक रूप से अपने को शुद्ध करना चाहिये। मुसलमान औरतों को अपने को अध्यात्मिक रुप से विकसित करना चाहिये, आदमियों का अनुकरण करने के बजाय उन्हे अपने नारी-सुलभ व्यक्तित्व को विकसित करना चाहिये और मनोरंजन की वस्तु बनने के बजाय समाज में एक सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। पैग़म्बर के समय मुसलमान औरतें खेती,बाग़बानी और सामाजिक कार्य जैसे क्षेत्रों में सक्रिय थीं ।

क्या इसे मुसलमान झुठला सकते हैं ? लेकिन इसके साथ ही वे अपने नारी-सुलभ चरित्र को बरक़रार रखतीं थीं। इस्लाम के आरंभिक इतिहास में अनेक ऐसी घटनायें हैं जो दिखातीं है कि एक औरत को एक आदमी के समान आज़ादी प्राप्त थी । इस मामले में दोनों के बीच कोई भेद नहीं है और ना था । इस्लाम में एक औरत को वही आज़ादी मिली है जो एक आदमी को। इस्लामी साहित्य कुछ धर्मनिष्ठ औरतों का ज़िक्र करता है जिन्होने अपने समाजों में एक अत्यंत सकारात्मक भूमिका अदा की थी,जैसे पैग़म्बर इब्राहीम की पत्नी हाजिरा,ईसा मसीह की मां मरियम,इस्लाम के पैग़म्बर की पत्नी खदीजा, इस्लाम के पैग़म्बर की पत्नी आयशा। इन औरतों को मुस्लिम समाज में आदर्श की तरह देखा जाता है और वे आज की औरतों के लिये अच्छी उदाहरण हैं। निष्कर्ष के रूप में दो को जोड़कर देखिये …. : एक क़ुरान से और दूसरा हदीस(पैग़म्बर की उक्तियां) से है। क़ुरान में आदमियों और औरतों का उल्लेख इन शब्दों में किया गया है, ”तुम दोनों एक दूसरे का अंग हो” (3:195)। इसका मतलब है कि आदमी और औरत लैंगिक रूप से भिन्न तरह से रचे जाने के बावजूद एक दूसरे के पूरक हैं। अब दूसरा संदर्भ लेते हैं। इस्लाम के पैग़म्बर ने कहा,” आदमी और औरत एक इकाई के दो बराबर के हिस्से हैं”।(मसनाद अहमद)लैंगिक समता की यह सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है। वर्तमान समय में मुस्लिम समाज में हिजाब के प्रचलन को समझने के लिये यह बात ध्यान में रखनी ज़रूरी है कि इस्लाम और मुसलमानों के बीच एक भेद है। इस्लाम एक विचारधारा का नाम है जबकि मुसलमान एक समुदाय हैं जिसकी अपनी संस्कृति है जो अनेक परिस्थितियों के कारण बदलती रहती है।ऐसी स्थिति में मुस्लिम परंपरा को इस्लाम की मूल शिक्षाओं के आधार पर आंका जायेगा ना कि मुसलमानों की संस्कृति के आधार पर ।याद रखिये कई बार लोग इस्लाम के बारे में सिर्फ कुरआन पड़कर जानते हैं या फिर गैर मुस्लिम हम मुसलमानो को देखकर इस्लाम के बारे में तसव्वुर बांधते हैं इसलिए हम सबको दूसरो के लिए एक अच्छी मिसाल होना चाहिए और हमेशा अपने मामलात में सच्चे और खरे भी उतरना चाहिए मुसलमानो के मामलात ही गैर मुस्लिमो के सामने इस्लाम की कोई अवधारणा बनाने में अहम किरदार अदा करते हैं ।….

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30 thoughts on “पर्दा : इस्लाम ने नारी का सिर ऊँचा किया ॥

  • May 4, 2016 at 1:21 pm
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    आपकी बाते अपनी जगह हे लेकिन हमारा फ़र्ज़ होना चाहिए की एक भी मुस्लिम औरत इस दुनिया में ऐसी न हो जो अपनी मर्ज़ी से नहीं बल्कि किसी भी मर्द के दबाव में बुरका पर्दा हिज़ाब आदि करे में तो बुरका बिकनी दोनों के खिलाफ हु मगर आख़िरकार फैसला औरतो का ही होना चाहिए हम क्या हे हमें क्या हक़ हे ? वैसे बुर्के के पेरोकार चाहे जो कहे मगर अधिकतर औरते ये मर्दो के दबाव में ही करती हे मेरी मदर हे पांच बहने हे 7 भांजी भतीजी हे कोई भी न करती हे न करेगी क्योकि हम कुछ नहीं कहते हे ना कहेंगे चाहे इसका नतीजा जो हो असल में बहुत से लोग घबराते हे की अगर औरतो को बुर्के से दूसरी बातो से आज़ादी दी तो वो मनमर्ज़ी करेगी प्रेम करेगी प्रेम विवाह करेगी प्रेम में जात तो देखि जाती नहीं हे तो जात बाहर शादी होगी तो इससे ही अधिकतर लोगो के पसीने आते हे उन लोगो के भी जो रात दिन राग अलापते हे की इस्लाम में सब बराबर हे

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    • May 4, 2016 at 7:13 pm
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      Kucch bhi anaap shanaap bakte ho sharm nahi aati
      Allah se darr insaano darr kar kya milega
      Dunya aur kuch nahi

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  • May 4, 2016 at 2:20 pm
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    कुछ हिस्सो से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन लेख अच्छा है.

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  • May 4, 2016 at 3:10 pm
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    एक नया चलन में देख रहा हु की चलो औरतो लड़कियों का हिज़ाब पर्दा अलग बात हे उसे छोड़े मगर ये एक नया चलन देखने को मिल रहा हे की दो चार साल की बच्चियों को हिज़ाब करवाया जा रहा हे ये क्या हे भाई ? मुझे नहीं पता की ऐसे क्यों हे लेकिन मेरी समझ में इसकी वजह समाज में बढ़ते जा रहे ” जाकिर नायकों ” की फौज ही हे एक तो मेरी अपनी कज़िन सिस्टर ही हे उनकी भी ” दूकान ” अच्छी चल रही हे अच्छा कमाल ये हे पैसे वाले लोग हे तो ज़ाहिर हे की बच्चे कांवेंट में ही पढ़ रहे हे और में उनके घर गया तो अपनी भांजी को देख कर मुझे नहीं लगा की वो कल को पर्दा हिज़ाब आदि करने वाली हे उधर मेरी सिस्टर के उपदेश जारी हे हालांकि मेरा अंदाज़ा हे की अब ये ” फौज ” कुछ कमजोर पड़ने वाली हे क्योकि तेल के दाम बेहद कम से खाड़ी देश खुद ही संकट में उपमहाद्वीप में आने वाला भारी चंदा काफी कम हुआ ही होगा मगर हम तो इससे भी खुश नहीं हो सकते हे क्योकि की जैसा की बताया की एक सेकुलर भारतीय मुस्लिम सबसे कठिन काम में फंसा हे खुश हो कैसे क्योकि जानते ही हे की अगर गल्फ देशो की इकोनॉमी डूबी तो लाखो भारतीय परिवार बर्बाद हो जाएंगे और इधर मोदी सरकार तेल के दाम कम होने पर भी कोई फायदा जनता को नहीं होने देगी इधर कुआ उधर खाई यही हे एक सेकुलर मुस्लिम की नियति

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  • May 4, 2016 at 5:23 pm
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    बहुत हि सतिक लेख् पर्दा मुसल्मानो का इमान है. औरअतओ के साथ साथ मर्दो के लिये भि लाजिम है

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  • May 4, 2016 at 5:30 pm
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    घूंघट हो या नक़ाब परदे मैं स्त्री ही एडवांटेज में रहती है, मर्द उसको नहीं देख सकते लेकिन वोह सबको देख भी सकती है और समझ भी सकती है.
    दरअसल परदे का विरोध आम भारतीय महिला कर भी नहीं रही, यह महिलाओं की आज़ादी के नाम पर अपनी दूकान चलाने वाले कुछ पुरुष या तस्लीमा नसरीन टाइप की चंद महिलायें ही कर रही हैं, जबकि उनसे कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं कर रहा. पर्दा करना है तो करो नहीं करना तो मत करो लेकिन अपना फैसला दूसरों पर थोपने वाले यह होते कौन हैं.??

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    • May 4, 2016 at 5:44 pm
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      बिलकुल सही कहा वहीद साहब चार साल की लड़की ने ”अपनी मर्जी और ख़ुशी ” से हिज़ाब धारण कर रखा हे सही कहा

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  • May 4, 2016 at 5:32 pm
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    FROM THE FACEBOOK COMMENT -AIJAZ AHMAD

    नंगे पुंगे चलने वाले
    हाल क्या जाने परदे की

    गर आधुनिकता कम कपडे या बिना कपडे के रहना होता तब तो आदिकाल के मानव सब से आधुनिक होते …. दर असल लोगों को इस्लाम में हिजाब का मतलब बिलकुल पता नहीं …. और लिबास का मतलब भी उन्हों ने नहीं समझा …. लिबास इंसानो का कांसेप्ट इंसान के मस्तिष्क में इंसानी Revolution के साथ ही पनपा और बढ़ा जब उन्हों ने लाखों साल के सतत चलने वाली CIVILISATION के दौर से गुज़रते हुए शरीर के उन अंगों को ढकना और छुपाना अनिवार्य समझा जिस से उन्हें सुगठित समाज में एक भटकाव और बुराई से बचने और दूसरों के मन में बुरे ख्यालात से बचने के लिए वस्त्र का कांसेप्ट जागृत हुआ जो वस्त्र उन्हें वातावरण की उंच नीच और बुराई के साथ साथ मन में उठने वाले उंच नीच और बुराई जो विपरीत लिंग के BIOLOGICAL और PHYSICAL सूरतों को देख मन में पैदा होती है से किसी हद तक बचाता है , और इसी CONCEPT को और भी MODIFIED रूप हिजाब है …. परदे के नाम पर मुसलमानो को ताना देने वाले उन्हें आदिकाल के कहने वाले कुछ खप्त दिमाग के गैर मुस्लिमों को ये पता ही नहीं के इस्लाम में मर्दों के लिए भी हिजाब है और इस में मरदो को नाभ से लेकर घुटने के थोड़े नीचे तक का ढकना अनिवार्य है । जो गैर मुस्लिम मित्र यहां पर मुस्लिम विरोधी बातें कर रहे हैं उन्हें हिजाब की अज़मत के बारे में क्या पता और औरत या मर्द के लिए मॉडेस्टी किस तरह कायम रहे और बुराई से बचे रहे उन्हें इन सब चीज़ों से क्या मतलब बल्कि ये वही लोग होते हैं जो अपने बहन बेटियों को शरीर के शेप से ऐसे चिपके हुए कपडे पहना कर सड़क पर भेजते हैं जो उनके बदन के पूरे शेप को बिलकुल नंगे रहने के बराबर नज़र आते हैं और फिर आवारा और ऐय्याश मिज़ाज लोग उन्हें देख कर अपनी सेक्स कुंठा आँखों से शांत करते हैं और मज़े लेते हैं …. और याद रहे मुसलमानो के घरों की औरतें जबरन पर्दा नहीं करतीं बल्कि वो उनके ट्रेडिशन में होता है और शौक से पहनती हैं और आप खुद ही तय कर लो के तुम्हारी बहन बेटियां किस लिबास में सुन्दर, बेहतर और मॉडेस्ट दिखेंगीं .

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  • May 4, 2016 at 6:26 pm
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    जब भी बुर्क़े या घूँघट की आलोचना मे कुछ लिखो, दूसरा पक्ष नंगेपने की बात करने लग जाता है.

    बाकी जाकिर नायक साहब जैसे लोग, समाज मे इस्लाम को लेके ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं, और ये ध्रुवीकरण, मुस्लिम-गैर मुस्लिम ही नही, मुस्लिम समुदाय के भीतर भी पनप रहा है.
    इस्लाम की नकारात्मक छवि, के लिए आज के दौर मे ऐसे लोग ही ज़िम्मेदार है.

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  • May 4, 2016 at 7:32 pm
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    सही कहा जाकिर भाई कुछ लोगो को बुरका पर्दा हिज़ाब और फिर सीधे बिकनी बिकनी या शार्टस के आलावा लड़कियों की कोई और ड्रेस दिखाई ही नहीं देती हे असल में अवचेतन मन में ये बात होती हे की लड़कियों को दबाकर रखना हे जिससे न वो किसी को देखे न कोई उन्हें देखे न आँखे चार हो ना प्यार हो न जात बाहर शादी हो इस जात बाहर से शादी से जितने गेर मुस्लिम ठेकेदार घबराते हे उतने ही” इस्लाम में सब बराबर ” की बात करने वाले भी घबराते हे और बहुत घबराते हे ये सोचते हे की लड़कियों को दबाकर कर रखो उन्हें बीस पचीस से पहले पहले अपनी जात में शादी और दो बच्चे की माँ बनवा ( कम से कम ) वही इन्हे बेस्ट लगता हे बहुत से लोग घबराते हे की लड़कियों को भी लड़को की तरह बराबरी दी तो कुछ ऊंच नीच हो जायेगी में तो साफ़ कहता हु की हां हो जायेगी कुछ ऊंच नीच हो जायेगी क्योंकि लड़कियों को फुल बराबरी और आज़ादी एक आदर्श हे आदर्श पर चलना मतलब सरदर्दी मोल लेना में बता ही चूका हु की मेरे दसवीं फेल बाप और पांचवी फेल अम्मी ने अपने बच्चों में कोई भेद भाव कसम खाने को भी नहीं किया और मेरे फादर अस्सी के दशक में ही जब लड़को को भी अच्छी घड़िया शादी पर ही नसीब होती तब ही दोनों सबसे बड़ी बहनो को अच्छी घड़िया दिलवाई तो ये था और इसी आदर्श का ये नतीजा निकला की आज हमारी अर्थवयवस्था कई गुणा बेहतर होने से रह गयी में फिर से वो किस्सा बयान कर देता हु की आदर्श मतलब सरदर्दी और संकीर्णता मतलब आराम फिर भी चलना हो तो चलिए —– जारी

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    • May 4, 2016 at 8:23 pm
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      अब दो परिवार थे एक हमारा और एक दूसरा , अब दो परिवारों के बीच जितने बढ़िया रिश्तों की आप कल्पना कर सकते हे उतने थे हमारे और उनके पेरेंट्स की बहुत ही गाढ़ी दोस्ती बहुत ही गाढ़ी जब उनकी इकोनॉमी बेहद कमजोर थे तो हमारे माँ बाप ने उनका किया फिर नाबे के दशक में ददिहाली झगड़ो से और बड़े परिवार से हमारी इकोनॉमी डाउन हो गयी उसी समय गल्फ की नौकरी से उनकी इकोनॉमी बेहद मज़बूत हो गयी इसी दौरान पापा के डेथ हो गयी डेथ से कुछ समय पहले वो परिवार चाहता था की उनके लड़के की शादी हमारी बड़ी सिस्टर से हो कोई हर्ज़ नहीं बहुत ही बढ़िया रिश्ता मगर हमारी सिस्टर उस समय 18 बीस साल की थी पढाई में अच्छी थी फुल ऑफ़ लाइफ थी तो ज़ाहिर हे की कोई जरुरी नहीं हे की हर लड़की की तमन्ना एकमात्र ही हो की बीस में शादी कर ले पचीस तक दो बच्चे हो जाए कोई जरुरी नहीं की हर लड़की यही चाहे तो उन्होंने इंकार कर दिया और लड़कियों को दबाने का उन पर अपनी मर्ज़ी थोपने का स्वभाव तो गाव के ठेठ और ट्रक मालिक और चालक पापा का तक नहीं था तो भला कोई और क्या दबाव डालता तो एक तो रिश्ते से इंकार फिर मेरे बड़े भाई बहनो दुअरा सिस्टर पर कोई रिश्ते के लिए दबाव भी न डालने से वो परिवार बेहद नाराज़ हुआ और उसने हमारे बुरे दिनों में हमारी कोई मदद नहीं की अब समझिए के मेरे घर में मुझे छोड़ कर सारे भाई बहन काबिल थे और बिना किसी के भी कैसे भी सपोर्ट के बिना ही अपने दम पर काफी आगे बढ़ गए तो सोचिये की इतने काबिल लोगो को सही समय पर कुछ सपोर्ट मिला होता तो आज हमारी इकोनॉमी कई गुणा बेहतर हो सकती थी यानि करोड़ का नुक्सान हुआ इसलिए की हमारे यहाँ लड़का लड़की बराबर हे हमारे यहाँ लड़कियों को दबाया नहीं जाता आदर्शो से हुआ ये नुक्सान हमें कबूल हे क्योकि हमें पता हे की आदर्श मतलब घाटा ही घाटा और संकीर्णता मतलब आराम तो आप सोच लीजिए की आपको आर्दर्श पर चलना हे या संकीर्णता पर

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      • May 4, 2016 at 8:50 pm
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        आपकी हिम्मत के लिए सलाम.

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        • May 4, 2016 at 9:06 pm
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          जाकिर भाई और पाठको लड़कियों को दबाया इसलिए जाता हे क्योकि उपमहाद्वीप में विभिन्न धर्मो समाजो और जातियों के ठेकेदार यही चाहते हे की लड़कियों पर कड़ा दबाव रखो हमेशा रेड अलर्ट रखो कोशिश ये करो की इनकी बीस में शादी और पचीस तक वो दो बच्चों की माँ तो बन ही जाए फिर हम खुद को सुरक्षित और इज़्ज़तदार समझते हे ऐसा न हो तो हमें बताया जाता हे की हमारी इज़्ज़त का भाजी पाला हो जाएगा शादी ना हो या जात बाहर शादी हो जाए तो ये ठेकदार इससे आम आदमी को बेहद डराते हे ये ठेकेदार जानते हे की इससे ही उनकी वो जाती समाज आदि की किलबन्दिया सुरक्षित और मज़बूत रहेगी जिनसे ये अपना सरकार राज़ चलाते हे इस सरकार राज़ से और तो नुक्सान हे ही साथ ये भी हुआ की उपमहाद्वीप की आबादी दो अरब के आस पास जाने वाली हे सांस लेने की भी जगह नहीं बच रही हे ये सब भी इसी लड़कियों को दबा कर रखने की खफ्त के कारण हुआ वर्ना देखे की दुनिया में कही भी भारत उपमहाद्वीप के जैसी आबादी नहीं हे मुस्लिम देशो में भी नहीं अधिकांश मुस्लिम देशो में भी आबादी बेहद कम हे

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  • May 4, 2016 at 7:47 pm
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    वाहिद रजा साहब, लेकिन हिजाब का वर्तमान बुर्क़ा-स्वरूप ही इस्लाम से जुड़ा है, ये विवाद का विषय है, और हन्नान साहब ने उसपे ही सवाल किया है, इस लेख मे.

    कपड़े कितने खुले, तंग या बदन ढँकने वाले होने चाहिए, ये व्यक्ति अपनी समझ, सामाजिक परिवेश, और अपनी सुविधा से निर्धारित कर ले. लेकिन चेहरो को ढँकने वाले हिजाब को मज़हबी और अनिवार्य बताना बेहद चिंताजंक है.
    चेहरा, इंसान की शक्सियत का सबसे अहम हिस्सा है. हमारी पहचान के तमाम दस्तावेज़ो मे हमारे शरीर के हिस्से की अनिवार्यता होती है. हम सैकड़ो हज़ारो की भीड़ मे शरीर के सिर्फ़ इस हिस्से से ही लोगो की पहचान कर लेते हैं. हमारे मन के भावों को भी चेहरा बयान करता है, ऐसी सूरत मे अगर कोई भी मुसलमान, चेहरे को छिपाने वाले हिजाब को मज़हबी लिबास बताता है, इस्लाम की नकारात्मक छवि दुनिया के सामने रख रहा है.

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  • May 4, 2016 at 9:08 pm
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    हिजाब मे आप चेहरे को छोड़, सारे अंग ढन्के, उसे इतना ढीला बना दें कि शरीर की आकृति का कोई अनुमान नही हो पाए, कोई दिक्कत नही. लेकिन ये सब करके, लड़कियों को गुणवत्ता वाली तालीम ज़रूर दें, उसे सशक्त बनाए. क़ौम की आधी आबादी को, घरो मे क़ैद करके, हम स्वस्थ समाज का निर्माण नही कर सकते.

    शालीनता और दकियानूसी विचारो मे फ़र्क होता है.

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  • May 6, 2016 at 1:43 pm
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    वैसे तो आपके लेख के जवाब में मेरा ‘छत के निचे छाता क्यों ? ‘नाम का लेख यहाँ पहले से मौजूद है ! फिर भी आपके लेख में जो नयी बात आई है उसपर कुछ सवाल
    1.औरतो के सतीत्व से आपका क्या मतलब है ?सतीत्व की आपकी क्या परिभाषा है जनाब फिर उस हिसाब से पुरुषों के सतीत्व का क्या ?? और कुरआन में इस सतीत्व की रक्षा के लिए उसके तरीके केलिए क्या कुछ नहीं लिखा गया ? अगर है तो क्या वह पर्दा ,बुरका आदि उपायों के विपरीत है ? अगर नहीं तो फिर पर्दा बुर्का इस्लाम हो या आपकी नए खोज के अनुसार संस्कृति इसके श्रेय और आलोचना से इस्लाम को कैसे अलग रखा जा सकता है ?
    2. और ये बढ़िया रास्ता निकाला आपने की इस्लामी संस्कृति और इस्लाम अलग अलग है कहकर ! वाह साहब जो धर्म और उसका ईश्वर कुरआन के एक शब्द से भी टस से मस होने की इजाजत नहीं देता और ऐसा करने वाले को तुरंत काफ़िर करार देता हो वह कुरआन से विपरीत पूरी की पूरी संस्कृति को न सिर्फ अपनाने बल्कि उसको फूलने फलने की इजाजत देता है यह दावा करना किस बौद्धिक दिवालियेपन की निशानी है साहब ?
    3.कल क्या इसी संस्कृतिकी आड़ लेकर आप इस्लामी आतंकवाद को भी सही करार देना शुरू नहीं करेंगे ? की भाई ये तो कुरआन में नहीं है लेकिन संस्कृति में जुड़ गया !!!
    सिर्फ कुरआन में कुछ होने न होने से कुरआन नहीं बक्शा जाएगा जनाब ! बल्कि जो भी इस्लाम में कहिये या मुसलमान में कहिये या फिर आपकी नयी संघी खोज संस्कृति कहिये उसके पक्ष या विपक्ष में न सिर्फ कुरआन स्पष्ट रूप से क्या कहता है और मुसलमान उसपर कितना अमल करता है इस आधार पर अपने कुरआन ,इस्लाम ,और संस्कृति को बख्शने की कोशिश कीजिये ! अगर कुरआन इसमें नाकाम है तो जिम्मेदारी लेने की भी हिम्मत रखिये ! यूँ बच्चों की तरह इसको उसको ऊँगली दिखाकर कुरआन ,इस्लाम और मुसलमान के बिगड़ने का रोना रोने से आप स्वयं इस्लाम ,कुरआन के ईश्वरीय और न जाने क्या क्या होने के दावे को खारिज करवाते हो यह मत भूलिए ! क्यों ईश्वरीय वो नहीं होता जो इंसानो से इतना बिगड़ जाए की उसकी पैरवी करने की जरुरत पड़ जाए !

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  • May 6, 2016 at 1:46 pm
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    क्यों की ईश्वरीय वो नहीं होता जो इंसानो से इतना बिगड़ जाए की उसकी पैरवी करने की जरुरत पड़ जाए !

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  • July 31, 2016 at 2:17 pm
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    Again same stupid logic every one knows this dam idiot thing burqa doesn’t suit Indian climate so drop it it’s a sin where our ladies wear this stupid symbol of Arab

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  • December 22, 2016 at 1:47 pm
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    Sanjay Tiwari1 hr · तीन मेल स्टार हैं इस दौर में। शाहरुख। आमिर और सैफ। तीनों को अपने धर्म मजहब में एक अदद पत्नी नहीं मिली। जब प्यार मोहब्बत शादी करना हुआ तो उन्हें अपने मजहब के दायरे से बाहर जाना पड़ा। एक चौथा भी जाना चाहता था लेकिन ऐश्वर्या ने साथ नहीं दिया इसलिए अकेला रह गया।इन चारों को अगर आप मुस्लिम समाज के नजरिए से देखें तो पायेंगे कि बीस करोड़ लोगों की दुनिया औरतों को लेकर इतनी दमित और पिछड़ी है कि कोई सफल आदमी अपने लिए जीवनसाथी नहीं खोज सकता। जीवनसाथी का मतलब बुर्क में लिपटी एक काली आकृति नहीं होती। मनुष्य मन की इच्छाएं समान होती हैं वो धर्म बदल देने से बदल नहीं जातीं। इसलिए जैसे ही आप अपने नियम खुद निर्धारित करने लगते हैं तो आपको भी सहज लोग पसंद आते हैं।लेकिन इस्लाम औरतों के दमन का सबसे कारगर हथियार है। जब औरत की गुलामी की बात आती है तो बाकी धर्म भी इसके तरीकों के आगे बौने साबित होते हैं। एक से एक तरीके गढ़े गये हैं। ये शायद मनुष्य मन की कमजोरियां होती हैं जो औरत को ज्यादा से ज्यादा नियंत्रित करता है क्योंकि वह अपनी वासनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है। स्त्री अंगों के प्रति पुरुष में बहुत जबर्दस्त आकर्षण होता है। पूरब की सभ्यता में जो धर्म पनपे उन्होंने इस आकर्षण से पार पाने के लिए स्त्री के दमन का रास्ता नहीं पकड़ा। उन्होेंने आत्म दमन और संयम को अपना मार्ग बनाया। इसलिए हिन्दू हो या बौद्ध या फिर जैन आप इनकी जीवनशैली देखेंगे तो पायेंगे कि पुरुष सामान्यत: यौन कुंठा का शिकार है। यह उसका संयम के नाम पर किया जानेवाला दमन है जो उसे कुंठित कर देता है।अरब की कबीलाई सभ्यता में इस्लाम से पहले बिल्कुल यही पद्धति थी। औरतों पर नियंत्रण के कोई सख्त नियम कानून नहीं थे। बल्कि इस्माइल के प्रभाव में जो स्थानीय धर्म परंपराएं पनपीं उनमें औरत का सम्मान था। खुद मोहम्मद साहब का कुरैश कबीला किसी देवता का नहीं बल्कि देवी का उपासक था। जो काला पत्थर काबा में लगाया गया है, जिसे हज के दौरान मुसलमान चूमते हैं वह उसी कुरैश कबीले की देवी का पत्थर है जिससे मोहम्मद साहब ताल्लुक रखते थे। उनकी पहली पत्नी खुद एक सफल व्यवसायी थीं। जाहिर सी बात है, किसी बंद समाज में कोई महिला सफल कारोबारी नहीं हो सकती थी।लेकिन बाद में बहुत सारी गड़बड़ की गयी और उस पर इस्लाम का आवरण चढ़ा दिया गया। युद्ध में जीती जानेवाली औरतों के बंटवारे वाले नियम को चार शादी का नियम बना दिया गया। जिस हिजाब का मतलब हया होता है उसे स्कार्फ बना दिया गया जो कि अनिवार्य रूप से औरत के सिर पर रहना ही चाहिए। औरतों के सामान्य रूप से खांसने पादने तक पर फतवे जारी कर दिये गये। ये सब नियम कानून असल में पुरुष की अपनी कामोत्तेजना को न भड़कने देने के साधन थे जिन्हें औरतों पर लाद दिया गया। स्त्री देह के प्रति पुरुष के मन में जो स्वाभाविक आकर्षण है उसको नियंत्रित करने के लिए इस्लाम में दुनियाभर के नियम कानून गढ़े गये और स्त्री को विकृत किया गया।

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  • December 22, 2016 at 1:47 pm
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    Sanjay Tiwari1 ht visfot news networkrआज इस्लाम में औरतों की क्या दुर्दशा है इसे जानने के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था में मुस्लिम लड़कियोम की हिस्सेदारी देखकर लगा लीजिए। कभी जिस फिल्म इंडस्ट्री में एक से एक प्रतिभावान मुस्लिम लड़कियां अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाती थीं आज वहां एक कायदे की अभिनेत्री नहीं मिलेगी। यह ऊपरी तौर पर चाहे जो लगे लेकिन गहरे में यह बीमारी का लक्षण बताता है कि कैसे एक समाज धर्म के नाम पर भीतर ही भीतर बीमार हो गया है। शाहरुख की गौरी और सैफ अली की करीना उसी बीमारी का लक्षण हैं। लेकिन मुसलमानों का दुर्भाग्य यह है कि उन्हें जिस बीमारी पर रोना पीटना चाहिए वो उस पर ताली बजाते हैं। वे उसी को जन्नत बता रहे हैं जो जीवित इंसान के दोजख हैं।Sanjay Tiwari1 t visfot news network

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  • September 5, 2017 at 8:27 am
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    Sheetal P सिंह India DialogueLike Page
    1 hr · Tazikistan ने हिजाब पर बैन लगाया
    98% मुस्लिम आबादी वाले देश की संसद ने कहा कि यह हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं
    साहसिक फैसला
    https://sputniknews.com/asia/201709051057085756-tajikistan-muslim-veils-ban/ Sheetal P Singh added 2 new photos.Follow
    3 September at 22:09 ·
    ये IPS हैं और महाराष्ट्र में पुलिस के बड़े बड़े ओहदों पर रहे हैं । जिनके साथ अपनी पत्नी को लेकर खड़े हैं उनको बलातकार के दो मामलों में सजा हो चुकी है और कत्ल के मामले पेंडिंग हैं |

    इनकेमुंबई केफ्लैट को इनके किरायेदार कालगर्ल रैकेट में स्तेमाल करते दो बरस पहले पकड़े गये थे |

    आप समझ सकते हैंकि ये पुलिस के कितने काबिल अफसर रहे होंगे कि जरायमपेशा लोगों की सोहबत में हैं जाने अनजाने ।

    अब देश इनके हाथ है !

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  • September 8, 2017 at 9:22 am
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    Dhananjay Singh
    22 August at 19:54 ·
    एनडीटीवी पर आरिफ मोहम्मद खान साहब बता रहे हैं की शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला संसद से पलटने के पीछे राजीव जी के ऊपर मुस्लिम कट्टरपंथियों का दबाव कत्तई नहीं था.कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं अर्जुन सिंह,नरसिम्हा राव और एनडी तिवारी का दबाव था की — ”हम मुसलमानों के समाज सुधारक नहीं हैं,वो गड्ढे में पड़े रहना चाहते हैं तो हम अपने वोट बैंक को क्यों बर्बाद करें”.
    देश की एक बड़ी आबादी के अहम मसले पर यह बहुत ही बड़ी बात है जिसे वो अपने अनेक इंटरव्यूज में कह चुके हैं.जिनकी स्मृति कमजोर है उन्हें याद रहना चाहिए की तत्कालीन गृह राज्यमंत्री आरिफ साहब ने सरकार की तरफ से शाहबानो फैसले पर (179 रु.20 पैसे महीने गुजारा भत्ता दिए जाने के फैसले और तलाक के मुद्दे पर) संसद में जोरदार भाषण दिया था. दबाव बढ़ने पर जब राजीव जी ने यू टर्न मारकर संसद से मामला पलटवा दिया तो आरिफ साहब ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया था.
    खरीखरी-खुरखुरी ——– # अभी भी अदालती फैसले पर उन लोगों को मुस्लिम बहनों का बड़ा ध्यान आ रहा है जो मुस्लिम भाइयों का झोला चेक करके कहीं और का रास्ता दिखाना चाहते Dhananjay Singh

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  • November 21, 2017 at 10:22 am
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    ”Geeta Yatharth
    16 November at 10:59 ·
    मुझे भी मिला था. आपको भी मिला होगा.
    ‘दूधों नहाओ और पूतों फलों.’
    (पूत मतलब बेटा.)
    नई बहुओ को सबसे ज्यादा मिलने वाला आशीर्वाद.
    क्योंकि बेटी होना आशीर्वाद नहीं, प्रकोप होता हो.
    सड़ी हुई कल्चर.Geeta यथार्थ ” इस बकवास कल्चर की धज़्ज़िया तो हमारे दसवीं फेल और ट्रक ड्राइवर बाप और पांचवी फेल अम्मी ने बीसियों बरस पहले ही उड़ा दी थी दोनों के पांच लड़के और पांच लड़किया थी एक टाइम दोनों के पास तीन लड़किया और एक लड़का था तब पड़ोस की जाट औरतो को देख कर बड़ा आश्चर्य होता था की लड़के को कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं मिलता हे बराबर ही . तब उन जाट औरतो का एक डायलॉग था ” एक एक लोंडिया को ऐसे पालती हे जैसे एकलौती औलाद हो ” मगर आदर्श कोई भी हो नए विचार लाने हो क्रांति करनी हो तो उसकी बड़ी भारी कीमत भी देनी पड़ती हे जो लोग कहते हे की वो आदर्शो पर बदलाव नए विचारो पर चल रहे हे मगर कोई कीमत नहीं चूका रहे हे तो समझ जाओ की चल ही नहीं रहे हे आज छोटी सिस्टर डॉक्टर बन गयी हे एक बड़ी हेल्थ प्रॉब्लम से जुड़े विषय पर पि एच डी कम्प्लीट कर ली हे मुस्लिम वो भी सय्यद कोई आरक्षन नहीं किसी का सपोर्ट नहीं कुछ नहीं ये सब जिस एटीट्यूड के कारण हुआ उसी के कारण भि पिछले दिनों बड़े भाई की मौत हो गयी

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    • November 22, 2017 at 6:35 pm
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      उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय के चुनाव हो रहे हे एक जगह से ” मेयर ” के लिए हमारी कज़िन सिस्टर भी उमीदवार हे देखे क्या होता हे

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  • March 30, 2018 at 4:49 pm
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    लड़कियों पर जैसा ये संघी दयानन्द पांडेय लिखता हे हमारे यहाँ तो उलटा हे -हम वेस्ट यु पि के सुन्नी सय्यद लोग हे लड़कियों से जुड़ा कोई भी कैसा भी भेदभाव कोई चिंता कोई नीचा हमारे समाज में यहाँ तो ऐसा कुछ दूर दूर तक नहीं हे वो भी आज से नहीं शायद बीस सालो से – इस क्रांति में हमारे माँ बाप जैसे लोगो की भी बड़ी भूमिका रही होगी जिन्होंने अस्सी के दशक में ही अपनी कई बेटियों लड़कियों को बिलकुल बराबरी का और सामान्य ट्रीटमेंट दिया हलाकि दोनों विलेजर टाइप ही थे मुज्जफरनगर के , अम्मी पांचवी फेल और पापा दसवीं फेल एक किसान फिर ट्रक मालिक और ड्राइवर , इसी का नतीजा आज ये हुआ की छोटी सिस्टर आज डॉक्टर बन गयी पि एच डी पूरी कर ली वो भी दिल्ली की एक बहुत ही मेडिकल समस्या जैसे महत्वपूर्ण विषय पर , लेकिन क्रांति कोई भी हो वो खून और बलिदान मांगती हे शायद इसी क्रांति की वजह से भी हमारा एक करोड़ का नुक्सान और एक अकाल मौत हुई वजह आदर्शो और क्रांति पर चलना – ——————————————- खेर जैसा ये संघी दयानन्द पांडेय लिखता हे शादी खोजने निकलिए तो समाज बाजा बजा देता है
    पेंटिंग : राजा रवि वर्मा
    बेटी का पिता होना आदमी को राजा बना देता है
    शादी खोजने निकलिए तो समाज बाजा बजा देता है
    राजा बहुत हुए दुनिया में पर बेटी का पिता वह घायल राजा है
    जिस के मुकुट पर हर कोई सवालों का पत्थर उछाल देता है
    हल कोई नहीं देता सब सवाल करते हैं जैसे प्रहार करते हैं
    बेटी का बाप है आख़िर हर किसी को सारा हिसाब देता है

    ड़के का बाप तो पैदाईशी ख़ुदा है लड़की के पिता को
    यह समाज सर्कस की एक चलती फिरती लाश बना देता है
    लड़का चाहता है विश्व सुंदरी नयन नक्श तीखे नौकरी वाली
    मां चाहती है घर की नौकरानी बेटे का बाप बाज़ार सजा देता है
    नीलाम घर सजा हुआ है दुल्हों का फरमाईशों की चादर ओढ़े
    कौन कितनी ऊंची बोली लगा सकता है वह अंदाज़ा लगा लेता है
    विकास समानता बराबरी क़ानून ढकोसला है समाज दोगला है
    लड़कियां कम हैं अनुपात में पर दाम लड़कों का बढ़ा देता है
    पढ़ी लिखी हैं सुंदर हैं नौकरी वाली भी हुनर और सलीक़े से भरपूर
    जहालत का मारा सड़ा समाज उन्हें औरत होने की सज़ा देता है

    उम्र बढ़ाती हुई बेटियां ख़ामोश हैं , पिता सिर झुकाए बैठे हैं
    बेरहम वक्त उन के सुलगते अरमानों का ताजिया उठा देता है

    बात करते हुए वह आकाश देखता है , बोलता कम टटोलता ज़्यादा है
    लड़के का बाप है उस की ऐंठ अकड़ और अहंकार यह बता देता है

    मसाला खाते शराब पीते भईया यहां वहां मुंह मारने में टॉपर हैं
    बेटे का बाप उसे हुंडी समझता है शादी के बाज़ार में भजा देता है

    सिर के बाल भी ग़ायब चेहरे पर अय्याशियों के भाव अटखेलियां करते
    आंख से दारु महकती है बाप का जलवा उसे मंहगा दूल्हा बना देता है

    जितने ऐब हैं ज़माने में सभी से सुसज्जित है हर कोई जानता समझता
    लेकिन बेटे का बाप अंधा होता है उसे सारे गुणों की खान बता देता है

    पंडित है , लग्न लिस्ट तमाम चोंचले भी बता तू कहां-कहां फिट होता है
    आप को नहीं मालूम कोई बात नहीं इवेंट मैनेजर यह सब बता देता है

    संस्कार और रिश्ता नहीं अब तड़क भड़क है इवेंट का तमाशा है
    शादी के रिश्ते को यही इवेंट करोड़ों अरबों का व्यापार बना देता है

    आदमी किश्तों में सांस लेता है टूटता बिखरता है और मर जाता है
    यह शादी नहीं फांसी की रस्म है जालिम समाज हर कदम बता देता है

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  • May 19, 2018 at 9:01 pm
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    Apoorva Pratap Singh3 hrs · बाज़ार बताता है कि ऐसे दिखना और दिखाना कूल या हॉट है। आपकी क्लीवेज आपकी हॉटनेस के पारे को ऊपर ले जाती है। किसी तरह के कपड़े आपको सेक्सी दिखाते हैं और किस तरह के ‘बहनजी’.एक घटना बताने को मन है। पिछले साल जेएलएफ की बात होगी। जनवरी में बीस के आसपास की तारीख रही होगी। मैं अपनी एक-दो स्टूडेंट्स को लेकर वाशरूम की ओर जा रही थी उधर से चेहरे पर फ्रेश टचअप कर तीन लड़कियां आ रही थीं। एकदम युवा और जोश से भरी हुई। उनमें से एक ने मिनीस्कर्ट के साथ स्पेगेटी पहना था। बताइए जयपुर में जनवरी के मौसम क्या ऐसा होता है? जेएलएफ में भीड़ खूब होती है। हम भी अपने जैकेट उतार हाथ में ले लेते हैं, शॉल मोड़कर कंधे पर लेकिन स्पेगेटी और सिल्क का स्कार्फ? वह यूरोपियन होती तो भी मान लेती कि उनके यहां ऐसा गर्मी या स्प्रिंग का सीजन होता है। पर भारतीय परिवेश में उस लड़की की वह धजा मौसम और परिवेश के अनुसार तो बिल्कुल नहीं थी। मैं देर तक सोचती रही कि किसने उसके दिमाग मे यह छवि गढ़ी कि ऐसा दिखना स्मार्ट, कुल/हॉट या अच्छा दिखना है? अगर यह मानसिकता नहीं थी फिर क्यों उसने वह कपड़े पहने थे?
    आप मई-जून की गर्मी में काले बुर्के में लिपटी स्त्री को देख धार्मिक पाखंड वाली मानसिकता पर नाराज़ हो सकते हैं, आप घर में भी दुपट्टे और आँचल संभालती स्त्री को देख समाज की देह को टैबू मानने पर गुस्सा कर सकते हैं पर मौसम को नजरअंदाज कर और शरीर को कष्ट देने की हद तक के कपड़े पहनकर आकर्षक लगने की इस मानसिकता के लिए बाज़ार और पढ़ी-लिखी समझदार लड़कियों की इस फैशनपरस्ती वाली मूर्खता को नहीं कोस सकते। तब आप निजता के अधिकार और माई चॉइस के जुमले के आगे पिछड़े करार दिए जाएंगे।
    अगर कपड़ों से छेड़छाड़ या बलात्कारी मानसिकता नहीं बनती तो कपड़ों से आपकी छवि भी नहीं बनती। फिर आप क्यों उन्हीं कपड़ों के लिए आतुर होतीं हैं जो बाज़ार की नज़र में आपको साबित करे?
    सबसे पहले मूल सवाल पर आते हैं- हम कपड़े क्यों पहनते हैं? आखिर कपड़ों का ईजाद क्यों हुआ? कपड़ों से पहले मनुष्य पेड़ों की छाल ही क्यों पहनता था? जहन तक मनुष्यता के विकासक्रम में हमने पढ़ा है और समझा है शरीर की सुरक्षा के लिए।
    कपड़े पहनने की जरूरत मौसम और बाहरी परिवेश से शरीर की सुरक्षा के लिए है। इसीलिए तो हम मौसम के अनुकूल कपड़े पहनते हैं। जाड़े और गर्मी के कपड़ों में अंतर क्या सिर्फ फैशन के नाम पर किया जा सकता है? नहीं न?

    समाज के विकास के साथ कपड़ों के बनाने और बेचने में बहुत कुछ बदला पर यह मूल बात आज भी नहीं बदल सकती कि शरीर की सुरक्षा के लिए उनका होना जरूरी है। कुछ लोग कपड़ों को नग्नता और शर्म से जोड़ते हैं। पर मेरा मानना है कपड़ों से किसी किस्म की शर्म का पर्दा नहीं होता। वह आपके मन का भरम है। कपड़ों से संबंधित शर्म की नैतिकता समाज ने किस विसंगति में गढ़ी वह अलग अध्ययन का विषय है।
    फिर जब आज वस्त्र उद्योग में फैशन के इस होड़ वाले समय में, माई चॉइस वाले दौर में जब लड़कियां/स्त्रियाँ समाज की मानसिकता को कोसते हुए वैसे कपड़े पहनने पर ही खास तवज्जो देती हैं जो उनके उभारों को सुस्पष्ट रूप से उकेर सकें, जो उनकी छटा को बढ़ा सकें, जो सुडौल टांगों की ओर नज़रों को खींच सकें, जो उन्हें हॉट,सेक्सी कहलवा महफ़िल की नज़रों के लिए चुंबक बनवा सके तो क्या यह एक सहज बात है?
    कल मैं कह रही थी अपनी देह के प्रति सहजता अपनाने वाले दृष्टिकोण की बाबत। अगर ढंकना-छिपाना सहज नहीं है तो खास-खास तरीके से दिखाना और उभारना कैसी सहजता कही जाएगी? आप सूट पहन कर पिछड़ा और शॉर्ट्स पहन कर आत्मविश्वास से भरी हुई क्यों महसूस करती हैं? अगर शॉर्ट्स में आराम है, गर्मी से राहत है तो वही पहनिए लेकिन किसी खास तरीके से वह आपको स्मार्ट लगाने वाला है उस फितूर को भूल जाइए।
    सभी पैंटी पहनते हैं तो पहनने पर सामान्य रहिए न कि स्किन हगिंग जेगिंग या स्टॉकिंग के नीचे पैंटी लाइनर लगाने को परेशान।
    अव्वल तो ऐसे कपड़े पहनने का क्या तुक जिनको देख कर लगे कि आपने इनको स्किन के साथ सिलवा ही रखा है पर फिर आप जानती हैं वह आपने इसीलिए पहना है ताकि नज़रें आपकी ओर मुडे।

    हम उन नज़रों को बुरा कहते हैं, देखने वालों को कुंठित और समाज की मानसिकता को पिछड़ा लेकिन सवाल तो यही है कि कपड़े आपने शरीर के आराम, अपने व्यकित्व और मौसम को ध्यान में रख कर नहीं अपने शरीर को एक वस्तु मान कर उसका प्रदर्शन करने को पहने हैं।
    बड़ी बारीक सी लाइन है माई चॉइस और बाजार की चॉइस में। बॉयफ्रेंड के साथ फ़िल्म देखते जाते हुए आपकी चॉइस क्यों नहीं एक ढीले ढाले कुर्ते और सलवार, चूड़ीदार या जीन्स की ही होती है? क्यों आप पेंसिल हील, उधड़ी सिलाई वाले शॉर्ट्स और क्रॉप टॉप को तरजीह देती हैं? क्या कहा, उसमें आप कांफिन्डेन्ट फील करती हैं? छोड़िए किसे मूर्ख बनाना भला? दस-ग्यारह बजे जब फ़िल्म खत्म कर, डिनर खा लौटेंगी तो दस कदम सीधे चला नहीं जाएगा, खुदा न खास्ता कोई अनहोनी हो तो दौड़ना तो दूर तेज़ चल भी न सकेंगी।
    मैं मानती हूं कि आपके कपड़े किसी को इनविटेशन नहीं देते। लेकिन आप खुद नहीं मानती हैं। बाज़ार आपको मनवाता है कि ऐसे कपड़े आपको कामना योग्य बनाते हैं। आप ऐसे देह-दिखाऊ और उत्तेजक कहे जाने वाले कपड़े पहनती हैं और तब चाहती हैं कि लोगों में नहीं जिसे आप चाहें लोलुपता उसी के मन मे उभरे। तो प्यारी लड़कियों बाकी लोग भी इसी समाज और इसी बाज़ार के बीच बढ़ रहे हैं। आपकी चाहना आदर्श है पर आपके आसपास की दुनिया यथार्थ .

    – सुदीप्ति

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  • July 1, 2018 at 10:12 pm
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    Mohd Zahid shared a post.
    Yesterday at 21:02 ·
    बढ़ते बलात्कार का दोषी कौन ?

    “पेज ? लाईक और शेयर करे”

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    ज़ाहिदनामा
    Yesterday at 21:00 ·
    बढ़ते बलात्कार का दोषी कौन ?

    भारत में जिस तरह बलात्कार विशेषकर छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएँ बढ़ी हैं उसका सबसे अधिक ज़िम्मेदार उच्चतम न्यायालय के वह निर्णय हैं जो सेक्स के संबन्ध में फटाक से आ जाते हैं।

    और उनमें सबसे अधिक ज़िम्मेदार है मोबाईल आपरेटर्स के दबाव में पोर्न साईट को उच्चतम न्यालय द्वारा भारत में फ्री कर देना।

    एक पोर्न विशेषज्ञ मित्र के अनुसार ऐसी लाखों पोर्न साईट में लाखों ऐसी विभत्स कैटेगरी होती है जिसको देख देख कर पुरुष वैसा ही वहशी हो जाता है।

    यही वहशीपना आज भारतीय समाज में हर कुछ दिन बाद देखने को मिल जाता है , मुट्ठी में पोर्न लिए ऐसे वहशियों का आसान शिकार मासूम छोटी बेटियाँ हैं जो उस अंकल के बहकाने फुसलाने में आ जाती हैं जिनको वह अपने पापा , मामा या चाचा जैसा समझ कर उनके पास आ जाती हैं और ये चाचा मामा या बड़े भाई जैसे लोग मुट्ठी में पोर्न लिए विभत्सता की हर सीमा पार करते हुए सेक्स या बलात्कार से अनजान छोटी छोटी मासूम बच्चियों को काल के पाताल में पहुचा देते हैं।

    उच्चतम न्यायालय के सेक्स से संबन्धित निर्णयों में तिव्रता सचमुच हैरान कर देने वाली है कि जहाँ प्रमुख मुकदमें 75-75 साल से इसी कोर्ट के सामने लंबित हैं वहीं “गे” “लेस्बियन” “लिव इन” “पोर्न साईट्स फ्री करना” और इनसे उत्पन्न अवैध संतान समेत सभी संबन्धों को वैध बनाते निर्णय इतनी त्वरित गति से आते हैं कि लगता है कि उच्चतम न्यायलय यदि इन पर निर्णय ना दे तो देश की गति ही रुक जाए।

    इस संदर्भ में इस्लामिक व्यवस्था पर भी ध्यान देने लायक है जो केवल सेक्स को संतानोत्पत्ती के लिए सीमित करता है , इस्लाम सेक्स के बारे में बिलावजह और बेसमय सोचने और देखने तक को तथा बिलावजह अपने गुप्तांगों को छूने को भी मना करता है जिससे शरीर में उत्तेजना ना पैदा हो।

    सीधी सी बात है कि इसके बारे में जितना सोचो उतना मन उत्तेजित होकर अनियंत्रित होगा और इंसान गलत कदम उठाएगा। इस्लाम इंसान की काम-क्रिणा समेत सभी इंद्रियों को अपने बस में करके इंसान को शांत और संयमित जीवन जीने का हुक्म देता है।

    और आज का समाज वह हर कार्य करता है जिससे इंसान की समस्त इंद्रियाँ अनियंत्रित हों , और वह हो रही हैं इसीलिए बलात्कार और छोटी बच्चियों से बलात्कार बढ़ता जा रहा है क्युंकि वह अनियंत्रित इंद्रियों वाले कामातुर हैवान का सबसे आसान चारा है।

    इस्लाम आज की स्थीति को बहुत पहले समझ गया इसीलिए थोड़ी सी बड़ी होती बच्ची पर अधिक निगरानी करने को कहता है और किसी नामेहरम के साथ अकेले में रहने देने को मना करता है।

    पर इस्लाम के इन निर्देशों को मानता कौन है ?

    आज का मुसलमान भी नहीं।——————————————————————————————————————————————
    नरुका जितेन्द्रYesterday at 18:23 · अचानक से शरीयत कानून की वकालत करने वालों की भरमार नजर आने लगी है। बड़ा आश्चर्य है कि लोग धार्मिक कानूनों की वकालत करते हैं जबकि सभी धर्म प्रवर्ति से महिलाओं को गुलाम बनाये रखने की साजिशों से भरे पड़े हैं। मत भूलिए शरीयत वाले अफगानिस्तान सऊदी भी सबसे असुरक्षित 5 देशों में। सऊदी धनी देश है कम जन संख्या तो सम्पूर्णता मे कानून व्यवस्था अधिक दुरुस्त हो सकती है।
    पर ये कैसा मजाक है सऊदी को महिलाओं के लिए जन्नत बताना जहां महिलाओं को अभी हाल ही में जाकर ड्राइविंग का अधिकार मिला। महिलाएं खेलों में हिस्सा नहीं ले सकतीं। पहली बार 2012 ओलंपिक में हिजाब में दौड़ती धावक देखी होंगी उसकी भी देश मे आलोचना हुई।
    वहां खुद बलात्कार पीड़िता को सजा हो सकती, शिकायत करना साबित करना कितना मुश्किल ये 2 खबर लिंक दे रहा हूँ खुद समझें स्थिति।

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  • January 27, 2020 at 11:16 am
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    Ashok Kumar Pandey
    15 mins ·
    बुर्क़ा पर्दा शाहीन बाग़

    हाँ यह सच है कि बुर्क़ा या घूँघट या पर्दा देखकर पहला ख़याल आता है मुझे भी पिछड़ेपन का। लेकिन सच इतना ही नहीं है।

    महिलाएँ जिस परिवेश में रहती हैं, जितना दबाव होता है उन पर ख़ुद को पाक-साफ़ रखने का, बहुत सी चीज़ें उन्हें करनी होती हैं दबाव में और सामाजिक-सांस्कृतिक ट्रेनिंग से कई बार उनकी choice भी उसी हिसाब से निर्मित होती है। मम्मी कहती थीं – महीने भर गांव में घूँघट कर लेना अम्माजी की डाँट सुनने और दुनिया भर की भन-भन झेलने से अच्छा है।

    हम अक्सर सशक्तीकरण को प्रतीकों में देखते हैं। मसलन सर पर पल्ला रखने वाली ग़ुलाम जींस पहनने वाली आज़ाद। सिगरेट पीने वाली युवती आज़ाद लेकिन हुक्का पीने वाली सर ढँकी दादी ग़ुलाम। इसी तर्क से शाहीनबाग़ में बुर्क़ा पहने आई औरतें ग़ुलाम! मज़ेदार यह कि यही तर्क तो कपड़े से पहचान करने वालों के हैं जो ‘मर्द रज़ाई में सो रहे हैं और औरतों को सड़क पर भेज दिया है’ जैसे जुमले उछालते हैं।

    बहुत सम्भव है कि यह एक टैक्टिस लगी हो कई लोगों को कि भयावह दमन से बचने के लिए महिलाओं को आगे किया जाए। लेकिन डायलेटिक्स न समझने की दिक़्क़त यह कि आप समझ ही नहीं पा रहे कि एक बार उन्होंने संघर्ष का रस छक लिया तो वे वही नहीं रहीं जो थीं अब तक। पिछले सवा महीनों में एक ऐसी दुनिया खुली है उनके सामने जिसे अब तक उन्होंने या तो नहीं देखा था या जिसे उन्हें ख़राब की तरह पेश किया था – नारे लगाती कॉलेज की लड़कियाँ, औरतों के समूह गीत गाते हुए, नाटक करते हुए, कंधे से कंधा लगाकर लड़ते पुरुष और महिलाएँ, आज़ादी के नारे, बराबरी की बातें। यह सब उनके मानस में रोज़ उतर रहा है। कल जो भी हो लेकिन उनके भीतर यह उतर चुका है जिसका असर चार दिन में नहीं ख़त्म होगा। सवाल उनके ज़ेहन में आ चुके होंगे और ख़ुद की ताक़त का अहसास भी। वे आई भले किसी के कहने पर हों लेकिन यहाँ उन्होंने अपने अस्तित्व का एक और पहलू देखा है जिसका असर दीर्घ काल में होगा।

    बुर्क़ा यहाँ इनकी क़ैद नहीं पहचान बन गया है। पहचान को असर्ट करने की ज़िद पैदा हुई है और दूसरी पहचानों के साथ बराबरी के स्तर पर चलने का तरीक़ा सीखा है। उन्होंने जाना है कि देश में ऐसे लाखों-करोड़ों लोग हैं जिन्होंने धार्मिक जकड़बंदी की जगह सभी धर्मों के सम्मान और इस बराबरी के लिए लड़ने की राह चुनी है, हर हिंदू संघी नहीं है। वे सोचेंगी कि लीग के सहारे नहीं बल्कि अपनी क़ौम के इंसाफ़पसंद लोगों के सहारे वे सुरक्षित होंगी। यह सवाल उनके सामने आएगा कि भारत का मुस्तकबिल धर्मनिरपेक्षता में ही है। बचपन में पढ़ी कहानियों को अपने सामने ज़िंदा देखा है उन्होंने।

    और उन्होंने ही क्यों? हममें से कितने लोग थे जिन्होंने अपने शहर के शाहीनबाग़ देखे थे? हमारे लिए भी तो वे बाहरी इलाक़े रहे थे जहाँ कभी ईद-बक़रीद गए तो गए। हमने भी तो देखा है कि उन बंद इलाक़ों में कितनी खुली खिड़कियाँ हैं कितने बढ़े हुए हाथ हैं कितना साझा दर्द है कितने साझे सपने हैं और कितनी उम्मीद है उनके साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने में।

    माफ़ कीजिए लेकिन मै मेरा घर मेरा परिवार ही नहीं मैं मेरा वाला फ़ेमिनिज़म मेरी किताब मेरी फ़ोटो वाली भी तमाम लोगों से अधिक उम्मीद उन बुर्क़ा और पल्लू वाली हिंदू-मुस्लिम औरतों से है मुल्क को। तय उन्हें करना है कि माथे के आँचल को परचम बनाएँगी या कंधे पर लटका झंडा थामेंगी या बालों को ज़ोर से उनमें कस नारे लगाएँगी। आज वे कह रही हैं – उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे – देखना है हम कितने क़दम चल पाते हैं।

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