नहीं रहे डा.तुलसीराम!

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डा.तुलसीराम नहीं रहे यह मेरे लिये गहन व्यक्तिगत आघात है। जिन लोगों ने मुझे बहुत प्रेरित किया उनमें डा.तुलसीराम भी थे। मेरा उनसे परिचय डा.रिपुसूदन सिंह के माध्यम से हुआ। उसके पहले भी वे गम्भीर रूप से बीमार रह चुके थे। जिसमें उनकी नेत्र ज्योति काफी हद तक क्षीण हो गयी थी। फिर भी उन्होंने लिखना पढऩा नहीं छोड़ा। उन दिनों उन्होंने भारत अश्वघोष के नाम से दलित चेतना की एक प्रखर पत्रिका निकाली और मुझे उसका उत्तरप्रदेश ब्यूरो चीफ बनाया। मेरी हर स्टोरी को वे बहुत प्रमुखता से छापते थे। डा.तुलसीराम दलित चिंतक जरूर थे लेकिन संकीर्णता कहीं से उन्हें छू नहीं गयी थी। भारत अश्वघोष में डा.रिपुसूदन सिंह और मुझे बराबर स्थान देने की वजह से उनसे कई बातें कही गयीं। गैर दलितों को क्यों महत्व दे रहे हैं यह सवाल किया गया। पर उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि दलित मुक्ति की लड़ाई मानवता की लड़ाई है और मानवीय मूल्यों में विश्वास करने वाले लोग चाहे वो किसी जाति वर्ग के हों। इस लड़ाई में सहभागी बन सकते हैं। मुझे रिपुसूदन सिंह और केपी सिंह की इस बारे में निष्ठा में कोई संदेह नहीं है। इस कारण उनके विषय में किसी आपत्ति को मैं स्वीकार नहीं करूंगा।

भारत अश्वघोष बेहद तीखी पत्रिका थी। सवर्ण वर्चस्ववाद के खिलाफ इस पत्रिका में डा.तुलसीराम इतने पैने मुहावरे इस्तेमाल करते थे कि जातिवादी शक्तियां तिलमिला कर रह जाती थीं। भारत अश्वघोष एक डेढ़ साल ही चल पायी लेकिन इसका हर अंक संग्रहणीय है। इस पत्रिका ने दलित चेतना के जागरण में महत्वपूर्ण योगदान किया। पत्रिका की भारी मांग थी लेकिन इसके बावजूद हम लोग पत्रिका के लिये विज्ञापन नहीं जुटा सके जिससे पत्रिका असमय दम तोडऩे को मजबूर हो गयी। पत्रिका बंद होने के कई वर्षों बाद तक दलित समाज के बड़े नौकरशाह से लेकर आम आदमी तक कहते रहे कि भारत अश्वघोष फिर शुरू कराओ। उनके आग्रह को लेकर मैं एक बार फिर तुलसीरामजी से मिलने दिल्ली पहुंचा लेकिन वे दोबारा इस हद तक बीमारी से ग्रस्त हो गये थे कि कई दिन अचेत बने रहे।

डा.तुलसीराम के साथ मैंने कई सेमीनार में भी सहभागिता की। रायबरेली में बौद्ध धर्म पर हुए सेमिनार में देश भर के दलित विद्वान इकट्ठे हुए थे। उन्होंने मुझसे भी भाषण कराया। खुद वे बोले तो समय की सीमायें टूट गयीं। उन्होंने लगभग तीन घंटे तक धारा प्रवाह भाषण दिया। फिर भी सुनने वाले ऊबे नहीं बल्कि मंत्रमुग्ध होकर उनको सुनते रहे। उन्होंने खुद ही अपना वक्तव्य समाप्त किया। मैंने देखा कि उन्हें विराम लेते देख लोग उद्वेलित हो गये क्योंकि उनकी बौद्धिक क्षुधा शांत नहीं हुई थी। लोगों के आग्रह पर इसके बाद सवाल और उनके जवाब का सत्र शुरू हुआ। फिर एक बार डा.तुलसीराम मंच पर जम गये और यह सत्र भी घंटों चला। मैं आश्चर्यचकित था कि तुलसीराम जी में बीमार होते हुए भी कितनी क्षमता है। ज्ञान का कितना भंडार है। हर सवाल का जवाब बहुत ही अकादमिक जानकारियों के साथ दे रहे थे।
उन्हें न केवल दलित साहित्य पर अधिकार था बल्कि माक्र्सवाद के भी वे विशेषज्ञ थे। आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के चुनाव में अतुल अंजान को हराकर वे राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गये थे। दलित चिंतक के रूप में अवतार में आने के पहले उन्होंने माक्र्सवाद के लिये बहुत काम किया। सोवियत मामलों में उनको मास्टरी थी। उरई के डीवी कालेज में सोवियत संघ के विघटन के बाद उनका एक व्याख्यान मैंने सुना। उन्होंने इसमें कम्युनिस्ट शासन के दौरान सोवियत संघ में विरोध की अभिव्यक्तियों के लिये गोपनीय तौर पर तैयार किये गये हस्तलिखित अखबार और उनके वितरण के बारे में बताया। सारी जानकारियां बेहद अछूती थीं लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के लिये इस सीमा तक समर्पण के बावजूद एक दिन उनका मोह भंग हो गया। उन्होंने पाया कि भारत के कम्युनिस्ट जाति चेतना से ऊपर नहीं उठ पाये हैं और न उठ सकते हैं। इसके बावजूद वे माक्र्सवाद और अम्बेडकर वाद को मिलाकर नया रास्ता बनाने के पक्षधर थे और उनका कहना था कि इसी रास्ते से देश की समस्याओं का समाधान हो सकता है।

उनकी आत्मकथा इस समय बेहद चर्चा में है। बीमारी के पिछले दौर से उबरने के बाद वे कुछ ही समय हुआ जब फिर से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हुए लेकिन बीमारी का उनके मस्तिष्क और विलक्षण चिंतन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। इस मामले में महापंडित राहुल सांकृत्यायन से पूरी तरह अलग नजर आते हैं। बीमार शरीर में बौद्धिक ऊर्जस्विता को उन्होंने और प्रखर किया जो उनके अन्तिम समय के लेखन से स्पष्ट है।

किसी समाज का सशक्तीकरण उसमें पैदा होने वाली बौद्धिक प्रतिभाओं से ही होता है। शम्बूक वध की कहानी प्रतीकात्मक है। पता नहीं किसी शम्बूक का वध किया गया या नहीं लेकिन मेरी व्यक्तिगत धारणा है कि यह एक लाक्षणिक किवदंती है। शम्बूक वध यानि दलित समाज को बौद्धिक अधिकार से वंचित किये जाने का उपक्रम। यही कदम था जिसका इतना दूरगामी प्रभाव हुआ कि सदियों तक दलित मूलभूत मानवीय अधिकारों तक से वंचित किये जाते रहे और अन्याय पूर्ण व्यवस्था का फिर भी उनकी ओर से कोई प्रभावी प्रतिरोध नहीं हुआ। दलित समाज की मुक्ति यात्रा नये सिरे से बाबा साहब डा.अम्बेडकर के पदार्पण के कारण संभव हुई। बाबा साहब यानि आधुनिक काल खण्ड के शम्बूक ऋषि। उनके पास कोई राजनैतिक शक्ति नहीं थी, कोई सत्ता नहीं रही। वैचारिक जागरण की अलख जगाने की क्षमता उनमें थी। जिसकी बदौलत उन्होंने वर्ण व्यवस्था के किले को भेदने में सफलता हासिल की। उनका इतिहास दलित समाज को यह सबक देकर गया था कि वह बौद्धिकों को तैयार करे और सहेजे लेकिन दलित नेतृत्व जिनके हाथ में पहुंचा। उनकी सोच ठीक इससे उलट रही। इसी कारण देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश में दलितों की अपनी दम पर सरकार बनने के बाद डा.तुलसीराम जैसे महामानवों को उसके द्वारा किसी तरह की प्रतिष्ठा नहीं मिल पायी। दलित नेतृत्व उनके हाथ में चला गया जो बौद्धिकता के विरोधी हैं। तात्कालिक तौर पर सत्ता हथियाने के गुर में सफल होने की वजह से दलित समाज उनको अपना उद्धारक मान रहा हो लेकिन इसके दूरगामी नतीजे इस समाज के लिये बेहद खतरनाक होंगे। तथाकथित दलित नेतृत्व ही इस युग में शम्बूकों का संहारक बना हुआ है। बौद्धिक नेतृत्व विहीन होकर दलित समाज ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है जहां उसके शक्तिहीन हो जाने और फिर काला युग लौट आने का खतरा पैदा हो रहा है। डा.तुलसीराम की परंपरा में दलित समाज में अभी भी कई प्रखर चिंतक हैं। राजनीतिक नेतृत्व को बल प्रदान करने के साथ-साथ दलित समाज को अपने इन चिंतकों के लिये भी सोचना होगा।

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