नसीरुद्दीन शाह :कभी कभी किसी एक नाम में ही इतना वज़न होता है की आगे कुछ भी लिखने की ज़रूरत नहीं होती!

By– Faiyaz Siddiauie

कभी कभी किसी एक नाम में ही इतना वज़न होता है की आगे कुछ भी लिखने की ज़रूरत नहीं होती।बॉलीवुड के हर अहद में स्ट्रगल का होना ऐसा ही है जैसे पेट के साथ भूख का होना।जब बात कला फ़िल्मों के अदाकारों की हो तो स्ट्रगल पर बात ही नहीं करनी चाहिए, यानी सूरज रात में निकले तो फिर ये दास्ताँ सुनी भी जाए वरना दिन में सूरज निकलने पर उसका ज़िक्र भी क्यों करना।बम्बई में सात साल तक चप्पल के मुसलसल इम्तेहनों के बाद छोटे मोटे रोल करने के बाद नसीर साहब मेन फ़्रेम में आए मगर ये सफ़र भी उतनी सुहानी न रही क्योंकि जब टैलेंट ज़्यादा हो और कमाई कम तो नींद बिस्तर कहाँ पहचानती है।इसलिए कला फ़िल्मों के साथ कमर्शियल भी करना ऐसे क़िरदारों की बड़ी ज़रूरतों में शुमार है, बाक़ी इस छलांग पर भी सबने गलतियाँ करी है, और ज़ाहिर है नसीर साहब ने भी पैसे को एहमियत दिया जो के सबकी तरह उनका भी एक निजी फ़ैसला था।कुछ फ़िल्मों को हटा दें तो त्रिदेव फ़िल्म में मेरी तरह कई जवान और बूढ़े लोगों ने भी उनके साथ ओए ओए कहा, क्योंकि तिरछी टोपी वाले का दौर भी था तो इसके साथ झूमा, नाचा भी गया।कला हो या कमर्शियल अगर क़िरदार में दम हो तो कहानी ख़ुद नाज़ उठा ले, और ऐसा कई दफ़े करने में पूरी तरह से कामयाब रहे।सरफ़रोश ने जहाँ एक अलग जलवा रखा वहीं नसीर साहब ने अपने ढ़लते उम्र में इश्क़िया का क़िरदार निभा कर सिनेमा में नई ऊर्जा भर दी थी।आ वेडनेसडे जैसी फ़िल्म इतने ऊंचे शिखर पर है की उसे अब क्या ही टटोले, बाक़ी राठौर साहब आज कल नाम में मज़हब ढूँढ़ने लगे हैं, वो अलग बात है।ऐसे शख़्स की तारीफ़ करना भी एक ऐसी ज़िम्मेदारी है जिसे कुछ हद तक निभाया जा सकता है मगर मुक़म्मल नहीं किया जा सकता।’ग़ालिब नाम दुनिया के लिए बस एक नाम नहीं है, एक इतिहास है जिसके लिए किताब, सिनेमा और न जाने कितने ऐसे प्लेटफ़ॉर्म हाथ फैलाये उनका रुतबा अपने सर का ताज बनाकर दुनिया को दिखाना चाहते हैं।

ग़ालिब का कहानी, नसीरुद्दीन साहब का क़िरदार और एक दिलचस्प वाक़्यागुलज़ार साहब ने जब पर्दे पर ग़ालिब साहब को लोगों के सामने लाने का ज़िक्र किया तो उन्होंने संजीव साहब को इसके लिए सबसे अच्छा क़िरदार मान लिया था और ये बात सिर्फ़ नसीर साहब को अच्छी नहीं लगी।उन्होंने गुलज़ार साहब को फ़ोन कर ये कहा था की ये रोल उनसे बेहतर कोई नहीं निभा सकता, क्योंकि उनकी उर्दू बेहतर थी और चेहरा संजीव साहब से ज़्यादा उनका मिलता था। और भी ऐसी कई बातों से उन्होंने रज़ामंद कर लिया था और उसके बाद जो क़िरदार निभाया गया वो अपने आप में इतिहास है।दुनिया के सामने ग़ालिब को इस सलीक़े से भी लाया गया जो पढ़ने में दिलचस्पी नहीं रखते थे उन्होंने पहले देखा और फिर ग़ालिब को पढ़ने लगे और नसीरुद्दीन साहब को देखने लगे।यही होता है क़िरदार का जादू जो दर्शक के ज़ेहन में अपना एक नायाब मक़ाम बना लेता है।ख़ैर नसीर साहब के लिए सब कुछ गूगल पर और किताबों पर मिल जाएगा, मगर क्योंकि सिनेमा में ये मेरे सबसे पसंदीदा क़िरदार रहे हैं इसलिए इनके लिए लिखना मेरे लिए किसी फ़र्ज़ जैसा हशुरू शुरू में दो तीन दफ़े जब मैं नया नया मुम्बई गया था तो तक़रीबन तीन चार ऑटो और कैब वालों को नसीर साहब के नाम का एक ख़त दिया था कि अगर सिनेमा से कोई भी ताल्लुक़ रखने वाला उनकी गाड़ी में बैठे तो ख़त उनको दे दें और वो नसीर साहब के हवाले कर दें। ज़रा अजीब है, ठीक है काफ़ी अजीब है मगर शायद बचपन अपने नाम की पर्ची ऐसे ही काटता है।ख़ैर बात उन तक नहीं पहुँची और 2005 से उनके साथ फ़िल्म में काम करने का सपना सपना ही रहा।अब बस उनके लिए एक स्क्रिप्ट लिख रखा है मगर ये उम्मीद भी हवा में किसी डमाडोल पतंग की तरह कहीं दफ़न ही हो जाना है।जन्मदिन मुबारक़ नसीर साहब, हयात मुक़र्रर तक आप जियें एक सेहतमंद ज़िन्दगी।आपके बेबाक़ बोलने पर बेशूमार दुआएँ और मोहब्बत।।

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