नई किताब— एक देश बारह दुनिया (हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर)

लेखक: शिरीष खरे

नई किताब— एक देश बारह दुनिया (हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर)
लेखक: शिरीष खरे
प्रकाशक: राजपाल एंड सन्स, नई-दिल्ली
पृष्ठ: 208
अमेजन लिंक: https://amzn.to/3nc6f5U

‘‘जब मुख्यधारा की मीडिया में अदृश्य संकटग्रस्त क्षेत्रों की ज़मीनी सच्चाई वाले रिपोर्ताज लगभग गायब हो गए हैं तब इस पुस्तक का सम्बन्ध एक बड़ी जनसंख्या को छूते देश के इलाकों से है जिसमें शिरीष खरे ने विशेषकर गाँवों की त्रासदी, उम्मीद और उथल-पुथल की परत-दर-परत पड़ताल की है।’’
-हर्ष मंदर, सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक

‘‘यह देश-देहात के मौजूदा और भावी संकटों से संबंधित नया तथा ज़रूरी दस्तावेज़ है।’’
-आनंद पटवर्धन, डॉक्युमेंट्री फिल्मकार

‘‘इक्कीसवीं सदी के मेट्रो-बुलेट ट्रेन के भारत में विभिन्न प्रदेशों के वंचित जनों की ज़िन्दगियों के किस्से एक बिलकुल दूसरे ही हिन्दुस्तान को पेश करते हैं, हिन्दुस्तान जो स्थिर है, गतिहीन है और बिलकुल ठहरा हुआ है।’’
-रामशरण जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

‘‘एक देश बारह दुनिया’ पुस्तक बहुत साफ-साफ बताती है जिसे हम विकास कहते हैं वह एक बहुत बड़ी आबादी के लिए कैसे एक जहरीला फल है। देश की तरक्की के नाम पर उजाड़े जा रहे लोगों का एक और हिंदुस्तान है जो हमारे ‘भारत’ और ‘इंडिया’ से अलग है। कुछ और ध्यान से देख पाएंगे कि विकास के सिर्फ आर्थिक आयाम नहीं है, उसके बहुत स्पष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम भी हैं, जिनके आधार पर एक बड़ी आबादी को उपनिवेश की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि एक छोटी-सी आबादी का संसार चमकता-दमकता रहे।
जैसा कि किताब के नाम से ही स्पष्ट है किताब में बारह रिपोर्ट हैं- कुपोषण के शिकार महाराष्ट्र के आदिवासी अंचल से लेकर राजस्थान के बायतु तक, नर्मदा की त्रासदी से लेकर बस्तर के घावों तक फैली यह कहानियां एक अलग हिंदुस्तान का पता बताती हैं।
हालांकि, ऐसा नहीं है कि यह पता हमें मालूम नहीं है, ऐसा भी नहीं है कि पहली बार हम इस स्च्चाई से परिचित हो रहे हैं। लेकिन, यह किताब हमसे अपना मुंह चुराने का एक मौका छीन लेती है। यह हमें एक बैडोल, हिलते-डलते, आईने के सामने खड़ा कर देती है, जिसमें हम अपने समाज का कुरूप चेहरा फिर देखने को मजबूर होते हैं।
किताब का नाम ‘एक देश बारह दुनिया है’, लेकिन यह दुनिया भी एक ही है। इसके दुख और उत्पीड़न की कहानी एक ही है। किताब के लेखक बीच्बी-च में अपने मनोभावों की, घर-परिवार और रिश्तों की बात भी करते चलते हैं, इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कोई लेखक किस तरह के द्वन्द के बीच बनता है।’’
— प्रियदर्शन

‘‘शिरीष खरे की किताब ‘एक देश बारह दुनिया’ कई दिन पहले आ गई थी। मैं इस किताब को यात्रा वृत्तांत समझकर पढ़ना मुल्तवी किए हुए था। यात्रा पर कहीं जा नहीं पा रहा ऐसे में यात्रा की किताब क्या पढ़ना। आज पढ़ना शुरू किया तो अफ़सोस हुआ कि जिस तरह किसी इंसान को लेकर पूर्व धारणा नहीं बनानी चाहिए उसी तरह किसी किताब को बिना पढ़े उसके बारे में राय नहीं बनाई चाहिए। शीर्षक पर लिखे ‘हाशिए पर छूटे भारत की तस्वीर’ पढ़कर समझना चाहिए था कि किताब का कलेवर अलग है। लेकिन मन में धारणा बनी हुई थी कि यात्रा की किताब है। है तो यह यात्राओं से ही उपजी किताब लेकिन ‘न्यू इंडिया’, ‘स्मार्ट सिटी’ के दौर में ‘भारत माता ग्राम वासिनी’ की यात्रा है। शिरीष खरे ने लंबे समय तक पत्रकारिता की है और ज़मीनी पत्रकारिता की है। इस किताब के स्थलों, पात्रों से परिचित होना अभाव भरे भारत के उस रूप से परिचित होना है जो न जाने कब से उपेक्षित है, वंचित, अपने पहचान के लिए, अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। चाहे वे महाराष्ट्र के मेला घाट के कुपोषित, संघर्षरत आदिवासी हों या मुंबई के कमाठीपुरा की सेक्स वर्कर्स के जीवन की कथाएँ। कमाठीपुरा और नागपाड़ा के जीवन की बहुत अंतरंग झांकियाँ हैं इस किताब में, उस रहस्यमय रूमान से अलग जो ऐसे इलाक़ों को लेकर हमारी कल्पनाओं में रहा है या जितना हमने वेश्याओं के क़िस्से कहानियों से जाना है। किताब में मराठवाड़ा की घुमंतू जनजातियों के जीवन के दृश्य हैं, नट समुदाय, मदारी समुदाय के जीवन को लेखक ने करीब से देखा और उनके बारे में मार्मिक ढंग से लिखा है। जो बंजारे अपनी कला से कभी लोगों का मनोरंजन करते थे आज उनको देश के आम नागरिक के अधिकार भी नहीं हैं। मराठवाड़ा गन्ना उत्पादन के लिए जाना जाता है लेकिन वहाँ के गन्ना मज़दूरों की सुध कौन लेता है? आज भी उनके साथ ग़ुलामों सा बर्ताव किया जाता है। लेखक का यह सवाल उचित है कि ‘क्या हमारा सिस्टम मज़दूर को नागरिक बनने से रोकता है।’ बस्तर के जीवन और राजनीति के द्वंद्व से जुड़ी कथाएँ हैं, अमरकण्टक का बदलता पर्यावरण है। यह एक पत्रकार के अंदर के साहित्यकार की किताब है जिसकी दर्जन भर कथाएँ किसी लम्बे शोक गीत की तरह हैं-उदास और गुमनाम। राजपाल एण्ड संज से प्रकाशित यह किताब यात्रा की तो है लेकिन ऐसी यात्राओं की किताब है जिन पर हम अक्सर निकलना नहीं चाहते, ऐसी लोगों की किताब जिनको हम देखते तो हैं पहचान नहीं पाते, जिनके बारे में जानते तो हैं मिलना नहीं चाहते!’’

पिछले दो दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय शिरीष खरे वंचित और पीड़ित समुदायों के पक्ष में लिखते रहे हैं। राजस्थान पत्रिका और तहलका में कार्य करते हुए इनकी करीब एक हज़ार रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं। भारतीय गाँवों पर उत्कृष्ट रिपोर्टिंग के लिए वर्ष 2013 में ‘भारतीय प्रेस परिषद’ और वर्ष 2009, 2013 और 2020 में ‘संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष’ द्वारा लैंगिक संवेदनशीलता पर स्टोरीज़ के लिए ‘लाडली मीडिया अवार्ड’ सहित सात राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों से सम्मानित शिरीष खरे की अभी तक दो पुस्तकें ‘तहक़ीकात’ और ‘उम्मीद की पाठशाला’ प्रकाशित हो चुकी हैं।
इनका सम्पर्क है – shirish2410@gmail.com

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