ध्यानचंद से पहले ही धोनी का बायोपिक भी, हिट भी ” यानी आगे भी खेलो में कोई उमीद नहीं !

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हॉकी के सबसे बड़े खिलाडी ध्यांचंद से पहले सचिन को भारत रत्न देने की बेहूदगी तो कोंग्रेस सरकार ने की ही थी अब फिर से उनका अपमान हो रहा हे .कई ओलम्पिक गोल्ड दिलवाने वाले ध्यानचंद की जिस तरह उपेक्षा हो रही हे उससे साफ हे की आने वाले समय में भारत के लिए खेलो में कोई उमीद नहीं हे वरिष्ठ फिल्म लेखक जयप्रकाश चोकसे बताते हे की मुम्बई की आरती और पूजा शेट्टी बहनो ने काफी खर्चा करके ध्यानचंद पर फिल्म के लिए पटकथा लिखवाई हुई हे मगर सालो से उनकी बायोपिक पर फिल्म का काम शुरू नहीं हो पाया हे क्योकि कोई भी सितारा ध्यानचंद बनने को इसलिए राजी नहीं हे क्योकि परदे पर ही सही मगर हॉकी जैसे ताकत के खिलाडी वो भी ध्यानचंद दिखने में दांतो से पसीना आ जाएगा ये जानते हुए भी की ऐसी फिल्म उनको अनेक देशी विदेशी अवार्ड भी दिलवा सकती हे तब भी नहीं , क्योकि कोई भी सितारा ध्यानचंद बनने दिखने के लिए की जाने वाली कड़ी मेहनत करने को राजी नहीं हे इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता हे की भारत के लोगो ( ऊँचे भी ) में दमखम की कितनी कमी हे आगे भी भला कैसे मैडल आएंगे — ? ये वही सितारे हे जो रोज दावा करते मिलते हे की फला फिल्म के लिए इतना वजन बढ़ाया या घटाया या ऐसी तैयारी की वैसी तैयारी की . अब यही लोग ध्यानचंद वो भी सिर्फ परदे पर भी बनने को तैयार नहीं हे क्योकि हॉकी जैसा दमखम का खेल सिर्फ परदे पर ही खेलने के लिए भी जो तैयारी चाहिए उसके लिए भी इनमे हिम्मत नहीं हे जबकि उधर देखिये की जिस क्रिकेट जैसे फालतू खेल की फ़र्ज़ी उपलब्धियों पर हमसे ज़बरदस्ती गर्व करवाया जाता हे उसके ही एक खिलाडी धोनी पर ही कितने आराम से बायोपिक बन भी गया यही नहीं वो काफी हिट भी हो गया यानी इस खेल का खिलाडी बनना ( परदे पर ) इतना आसान हे वही ध्यानचंद बनने से कितने ही नौजवान सितारे साफ़ इनकार कर चुके हे क्योकि कोई परदे पर भी हॉकी या फुटबॉल का खिलाडी दिखने के लिए भी होने वाली मेहनत पसीने और चोटो को तैयार नहीं हे ले देकर आमिर खान से ही कुछ उमीद की जा सकती हे मगर एक अकेला भला क्या क्या कर सकता हे हाल ही में वो अपनी कुछ जान तक जोखिम में डाल कर 25 25 किलो वेट बढ़ घटाकर दंगल फिल्म के लिए पहलवान महावीर सिंह की जवानी और अधेड़ावस्था फिल्मा चुके हे .

धोनी पर बनी बायोपिक का हिट होना भी दुखी करने वाली बात हे धोनी एक अच्छे खिलाडी हे मगर कोई ऐसे महानतम भी नहीं हे की जिन पर पिक्चर बनाई जाती मगर क्रिकेट फिल्म और धर्म क्योकि भारतीय जनता की अफीम हे सो एक क्रिकेट खिलाडी धोनी पर उनके के रिटायर होने से भी पहले ही उन पर फिल्म तक बन कर तैयार हो गयी जबकि धोनी की खेल में सारी की सारी उपलब्धिया भी उस दौर की हे जब ये खेल ही सारा भारत बेस्ड हो चुका हे ऐसे में धोनी की उपलब्धियां कितनी असली हे कितनी फ़र्ज़ी हे कुछ कहा नहीं जा सकता हे भारत की 2007 वर्ल्ड कप हार के बाद जब क्रिकेट को भारी घाटा हो रहा था भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता हल्की से उतार पर थी तभी पहला टी २० आता हे जिसमे भारत की जीत के बाद क्रिकेट का ये नया फॉर्मेट सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन जाता हे आई पि एल आता हे उसमे क्या क्या गड़बड़िया होती हे कैसे धोनी की टीम चेन्नई के मालिक श्रीनिवासन बी सी सी आई के अध्यक्ष भी होते हे कैसे फिर धोनी का एकछत्र राज़ हो ता हे आई पि एल में सट्टेबाज़िया होती हे खिलाड़ियों का नाम आता हे दबाया जाता हे सब जानते हे धोनी ने जो क्रिकेट वर्ल्ड कप 2011 जिताया उसके फाइनल से पहले एक पत्रकार साफ़ लिखते हे की भारत की जीत तो ”तय” हे फाइनल में श्रीलंका के खिलाड़ियों की बॉडी लेंग्वेज कही से भी वर्ल्ड कप फाइनल वाली नहीं थी वेस्टइंडीज जैसी टीम का तो पिछले सालो में ये हाल हुआ की उसके खिलाडी टीम से ज़्यादा बहुत ज़्यादा भारत और आई पि एल को महत्व देने लगे क्रिकेट में पूरी तरह ही ये हाल हे की ऑस्ट्रेलिया को छोड़ कर लगभग सभी देश सिर्फ भारत के साथ और भारत में खेल को उत्सुक रहते हे हार पर भी खुश होते हे पुराने खिलाडी बी सी सी आई से पैसा लेते हे और बदले में बी सी सी आई के फर्ज़ीवाड़े के खिलाफ कुछ नहीं बोलते हे भारत को छोड़ कर सभी देशो में मैदान खाली रहने लगे हे!

क्रिकेट अब सिर्फ भारत के दम पर ज़िंदा हे अब इस खेल के सभी नियम कायदे सब कुछ भारत के हिसाब से ही बनते हे यानी इन्ही सब हालातो के बीच में ही धोनी ने अपनी कामयाबियां हासिल की ? जिन्हें कोई भी सच्चा खेल प्रेमी कभी कोई खास महत्व दे ही नहीं सकता हे जो ध्यानचंद की उपलब्धियों के सामने कुछ भी महत्व नहीं रखती हे मगर उसी ध्यांचंद का पिछले सालो में लगातार दूसरी बार अपमान हुआ हे जब उनसे पहले ही धोनी की बायोपिक फिल्म भी आ चुकी हे और हिट भी हो चुकी हे साफ़ हे की तमाम लफ्फाजियों दावो के बाद भी आने वाले समय में भी भारत के लिए खेलो में कोई उमीद नहीं दिखाई देती हे देश में भयंकर गेर बराबरी आम आदमी को जहा रोजी रोटी से ही फुर्सत नहीं हे वही ऊँचा अमीर सम्पन्न वर्ग यहाँ इतना अधिक आराम उठा रहा हे की वो बिलकुल पिलपिला और गिलगिला हो चुका हे उच्च वर्ग यही पिलपिला और गिलगिलापन फिल्म सितारों ने दर्शाया जब उन्होंने ध्यानचंद पर बनने वाली फिल्म से साफ़ पीठ दिखा दी . जिस देश में ध्यानचंद जैसे महान खिलाडी का अपमान और सचिन जेसो को भारत रत्न और धोनी जेसो पर फिल्म बनती हो वो भला खाक खेलो में कुछ कर सकता हे आगे भी खेलो में भारत के लिए कोई भी उमीद नहीं हे!
( (सिकंदर हयात से इस नंबर पे 9911631954 संपर्क कर सकते है !)

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3 thoughts on “ध्यानचंद से पहले ही धोनी का बायोपिक भी, हिट भी ” यानी आगे भी खेलो में कोई उमीद नहीं !

  • November 5, 2016 at 12:31 pm
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    में आप से सहमत हु के इस देश ने असली हीरो खेल में ध्यान चाँद को वह मुक़ाम नहीं दे पाया जिसका वह हक़दार था ! नकली हीरो सचिन तेंदुलकर, धोनी को हीरो बना कर पेश किया गया जबके ये हीरो बज्रवाड़ की पैदवार है ! आप ने सही सवाल उठाया है सिकंदर हयात जी . धन्यवाद

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  • November 7, 2016 at 9:45 am
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    बहुत ही बुरा हाल हो रहा हे अंसारी जी भारत का , चारो तरफ इतनी गेर बराबरी हे की कुछ भी अच्छा हो नहीं रहा हे ना हो सकता हे ना यहाँ कोई अछि फिल्म या सीरियल बन रहा हे न अछि किताबे हे ना लेख सुधीर चौधरी चेतनभगत अर्णव जैसे लोगो का बोलबाला हे खेल में हम अपनी एक विधानसभा से भी छोटे देश भी पीछे हे गुजराती पूंजी के धौंस से एक बेहद मामूली इंसान पि एम् बन जाता हे इतनी बड़ी फ़िल्मी दुनिया में किसी में दम नहीं हे की वो अपने देश के सबसे बड़े खिलाडी ध्यानचंद का रोल कर सके . आराम की जिंदगी इन्हें बिलकुल पिलपिला और गिलगिला घिनोना बना दिया हे चारो तरफ ऐसे ही लोग दिखेंगे

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  • October 30, 2018 at 10:43 am
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    पाठको लेख के नीचे दिया गया नंबर में छोड़ चूका हु मेरा नंबर 9971712174 हे ———–सोच क़र भी घिन आती हे की अब क्या इस फालतू खेल की फ़र्ज़ी और खरीदी हुई उपलब्धियों के आधार पर विराट को भी भारत रत्न दिया जाएगा या तो सचिन से भारत रत्न वापस लिया जाए या इस थकेले विराट को भी दे दिया जाए , प्रमोद महाजन की भला क्या गलती थी की वो अपने आका के लिए सौ करोड़ में भारत रत्न खरीदना चाहता था – हिन्दू कठमुल्वाद दुनिया की सबसे भ्र्ष्ट दुष्ट कायर और आलसी विचारधारा हे इसी के प्रभाव से कोई आदमी सचिन विराट अमिताभ जेसो पर प्रशंसक हो सकता हे लानत हे —————————————————————————————————————————
    Devanshu Jha8 · तो सचिन विराट हो जाते….
    मैं जानता हूं इस शीर्षक को पढ़कर कई सचिन प्रेमी लट्ठ लेकर मेरी तलाश में निकल पड़े होंगे । लेकिन क्या करूं समय कहां ठहरता है । एक वक्त ऐसा भी था जब सचिन के आउट होने पर खाना मेरे हलक से नीचे नहीं उतरता था । सचिन ने जीत के हर्ष से कहीं अधिक हार की विषण्णता हमें दी है । भले ही वे व्यक्तिगत प्रतिभा में बहुत आगे रहे हों पर पिच पर उनका शौर्य बहुत बिखरा हुआ है ।
    सचिन और विराट की तुलना में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि सचिन ने दुनिया ने तमाम सूरमा गेंदबाजों को झेला। बल्कि यूं कहिए किउनके छक्के छुड़ा दिये( जो कि अपने मुंह मियां मिट्ठू होने से अधिक नहीं ) जबकि विराट कोहली तो बस देवांशु झा टाइप गेंदबाजों को मार रहे हैं । अब कोई गेंदबाज कहां होता है..!मुझे याद है, एक समय सचिन ब्रैडमेन भी बन ही गए थे !! तुलना करने वालों के चरण धरने को मैं तब भी व्याकुल था, आज भी हूं । यहां भी तर्क यह कि सचिन ने तो धुरंधरों को खेला और ब्रैडमेन तो अंडर आर्म और पिच पर ऐसे ही गेंद घड़का देने वालों गेंदबाजों को मार मार कर अमर हो गए । दिलचस्प यह कि उतने ही फुद्दू गेंदबाजों को खेलते हुए उनका कोई समकालीन उनके आसपास तो क्या.. मीलों दूर तक नहीं दीखता । ब्रैडमैन एक किंवदंती हैं । उनके 29 शतकों में दैत्याकार शतकों का अंबार है । बारह दोहरे और दो तिहरे शतक । अपनी अंतिम पारी में वे चार रन से चूक गए.. चार रन और जोड़े होते तो औसत सौ का होता । बुद्धि की बलिहारी यह कि उनसे आधे औसत पर खड़े लोगों की तुलना होने लगी ।एक वक्त जब सहवाग तीसरा तिहरा शतक जड़ने के मुहाने पर थे, तब भारत में उन्हें भी ब्रैडमैन घोषित कर ही दिया गया था । गोया, ब्रैडमेन कोई पावरोटी बेचने वाला हो । हुंह एक हुआ.. दूसरा न होगा !! आकलन करते हुए कभी उसका लाघव और प्राबल्य देखा क्या..?
    कुछ ऐसा ही विराट कोहली के साथ हो रहा है । विराट की निरंतरता, पौरुष, संतुलन और युद्धकौशल अद्वितीय महारथी सरीखा है । मैं पूछना चाहता हूं कि जब दुनिया से महान गेंदबाजों की खेप चुक ही गई तो सभी विराट क्यों नहीं हो जाते..? क्यों नहीं विराट जैसे अविश्वसनीय औसत के साथ सभी रन बना रहे ?क्यों नहीं शतकों का अंबार लगा रहे, क्यों नहीं जीत के प्रति हमें विराट की ही तरह आश्वस्त कर रहे ? रोहित शर्मा में प्रतिभा कूट कूट कर भरी हुई लेकिन मैदान पर कार्यान्वयन कैसा है..या दुनिया का कोई दूसरा बल्लेबाज़ खोजकर ला दीजिए, जिसमें विराट जैसी निरंतरता हो । वह तो रोबो है, जिसकी प्रोग्रामिंग कर दी गई है । कोई आसपास है ही नहीं ।
    सचिन अपने जीवन में विराट जैसा विश्वास तो कभी भर ही नहीं सके । उन्हें देखकर हम कभी यह संतोष न कर सके कि अब तो बेड़ा पार लगने ही वाला है क्योंकि शतक जमाने के साथ-साथ नौका डुबोने में भी उनका सानी नहीं था । पता चला कि सचिन के स्ट्रेट ड्राइव का सौन्दर्य देखकर अभी ताली बजा ही रहे थे कि अगली गेंद पर वे गली में गुम हो गए । सचिन के पास महान प्रतिभा थी । तूणीर में आग्नेयास्त्र से लेकर ब्रह्मास्त्र तक थे लेकिन शरक्षेप और निर्णायक रण में वे उनका संधान न कर पाते थे ।
    अर्जुन और कर्ण महान धनुर्धर थे । दोनों की धनुर्विद्या का परिचय पाकर लोग वाह-वाह कर उठते थे पर दोनों महान योद्धा भी थे । रण में उतरते तो पराजय की छाया भी नहीं पड़ने देते । सचिन का निजी आवरण तो घना है लेकिन अपराजेय शूर का आलोक नहीं है । वे कभी भी बल्ला सौंप सकते थे । विराट में वो पौरुष है, भले ही सचिन के बल्ले से निकलने वाले शॉट्स सा सौन्दर्य ना हो ।
    अब गेंदबाजों के मिथक पर आते हैं । यह एक विशुद्ध छायावाद है कि सचिन ने धुरंधर गेंदबाजों की बखिया उधेड़ दी । सबसे पहले पाकिस्तान। सचिन का डेब्यू 89 का है और 89 के बाद 99 तक भारत-पाक में कोई टेस्ट सीरीज नहीं हुई । दस वर्ष ! ये वो दस वर्ष हैं जब दुनिया भर के पिचों पर वसीम अकरम और वकार यूनुस की पदचाप सुनाई देती थी । सचिन ने इन दोनों को उनके यौवन के उफान पर झेला ही नहीं । इसके बावजूद टेस्ट में सचिन महान का पाकिस्तान के खिलाफ 37 का औसत है । हैरत तो यह कि अब तक हमारे प्रशंसक विश्वकप में शोएब अख्तर की गेंद पर एक छक्के से छूट ही नहीं पा रहे जबकि विराट कोहली ने पाकिस्तान के सभी गेंदबाजों की खबर ली है और लंबी-लंबी पारियां खेली हैं । यकीन ना हो तो पाकिस्तानियों से पूछ कर देख लो कि विराट और सचिन में किसे पवेलियन भेजना पहले पसंद करोगे..सचिन ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ उत्कृष्ट प्रदर्शन किया लेकिन उनके खाते में एक भी श्रृंखला ऐसी नहीं है, जिसमें उनका बल्ला शुरू से आखिर तक बोला हो । अपने करियर में उन्होंने एक सीरीज़ में सर्वाधिक 495 रन बनाए हैं । तीन शतक । दुनिया के धुरंधर टेस्ट बल्लेबाजों का आंकड़ा उठा कर देख लीजिए.. ब्रैडमैन से लेकर गावस्कर, लारा, पोन्टिंग..तक । इन सबों ने एक एक श्रृंखला में छह सौ.. सात सौ आठ सौ रन तक बनाए हैं । मारमार के भूस भर दिया है । लंबी लंबी पारियों के पर्वत खड़े कर दिये हैं । मगर सचिन के हिस्से में यह नहीं है । वन डे में उनका सबसे तेज़ सैकड़ा जिम्बाब्वे के खिलाफ है । हेनरी ओलंगा जैसे गरीब गेंदबाज के खिलाफ 70 गेंदों में शतक बनाया है उन्होंने । हालांकि, मैं यह कह कर उनके साथ अन्याय नहीं कर सकता कि उन्हें मारना नहीं आता था । दर्जनों पारियों में वे बीस-बीस गेंदें कम खेलकर शतक पूरा करते रहे ।और यह गेंदबाजी का मिथक ही बेकार है । मैं कह सकता हूं कि गावस्कर ने दुनिया के सबसे महान गेंदबाजों को खेला । सचिन के दौर में मार्शल, होल्डिंग, क्राफ्ट, एंडी रॉबर्ट्स, गार्नर, लिली, थामसन नहीं थे । वेस्ट इंडीज के वॉल्श और एम्ब्रोज को सचिन ने खेला लेकिन बहुत कम । दोनों सचिन के शिखर काल में अपनी ढलान पर थे और रिटायर हो गए । दक्षिण अफ्रीका में डोनाल्ड को उन्होंने कभी डोमिनेट नहीं किया । औसत देख लीजिए । जब इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ रन बनाए तब कुछ अच्छे गेंदबाज थे । अगर दुनिया के श्रेष्ठ बल्लेबाज़ का तमगा पाया है तो श्रेष्ठ को झेलना भी होगा । पा्किस्तान के तेज गेंदबाजों को तो छोड़िए वे सकलैन मुश्ताक को भी कभी उस तरह से नहीं पढ़ सके जिस तरह से गावस्कर अपने समय के महान स्पिनर को पढ़ पाते थे । सचिन में आवेग है, प्रवाह है, प्रभा है, चमत्कार है पर धीरोदात्त नायक का स्थैर्य नहीं है । वह नहीं कि धनु धर लिया तो ध्वस्त कर ही लौटेंगे ।
    सचिन हमारे गौरव हैं । लेकिन क्रिकेट के अंतिम हस्ताक्षर नहीं है । समय निरंतर आगे बढ़ता है और यह समय किसी और का है । निस्संदेह
    वन डे का पहला दोहरा शतक उनके ही नाम है । उन्होंने एक दिवसीय मैचों में कई बार विजय दिलवाई लेकिन विराट इस मामले में उनसे बहुत आगे हैं । यह आदमी तो अविश्वसनीय प्रतीत होता है।
    सचिन से भारतीय क्रिकेट का एक नया रूप खुलता है । सचिन एक सुंदर वृक्ष हैं, जिसमें भांति भांति के फूल खिले परंतु सचिन वटवृक्ष नहीं हैं, जिसकी छाया विस्तृत होती है..जो रौद्र धूप से तपे यात्रियों में छांह की आश्वस्ति भरता है । हर दौर के नायक का सम्मान होना चाहिए । मोह हमें बांधता है सचिन के मोह से मुक्त होकर देखना होगा । सचिन मेरे हमउम्र हैं, उनसे जैसा जुड़ाव था, वैसा विराट से नहीं है लेकिन विराट एक महारथी बल्लेबाज़ हैं । जब धनुष उठाते हैं तो विपक्ष को मूर्छा आ जाती है….

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