तो भारत ने छठी बार विश्व कप में पाकिस्तान को हरा दिया!

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BY क्षितिज राय

तो भारत ने छठी बार विश्व कप में पाकिस्तान को हरा दिया. दिल को अजीब सा सुकून मिला. बल्ले और गेंद की कश्मकश के बीज से उपजा ये सुकून ऐतिहासिक है. क्रिकेट से मेरा याराना 1996 विश्वकप के बाद से ही जुड़ गया था. घर पे नया रंगीन टी वी आया था तब, गोदरेज का फ्रिज भी तभी आया था शायद. जीवन का पहला भारत पाक मैच भी तभी देखा था तब. आज भी याद है अजय जडेजा के वे छक्के. पापा कुर्सी से उछ्ल पड़ते थे हर छक्के पर! माँ भी कोने में खड़ी रहती थी…हालाँकि उसे सिवाय सय्यद किरमानी के अलावा किरकेट का ए बी सी भी नहीं पता था! अब भी याद है कि पागल के माफिक चीखा था जब वेंकटेश प्रसाद ने आमिर सोहेल को बोल्ड किया था… पिछली गेंद पे चौका मार के बड़ा हीरो बन रहा था! तब शायद पहली बार मैंने नारे जैसा कुछ लगाया था. ९० के दशक के क्रिकेट के दीवानों की वो चीख शायद समेकित राष्ट्रवादी नारों की शुरुआत थी! १९९६ का वो माहौल आज भी जेहन में ताज़ा है. भारतीय बाजारों के उदारीकरण की तासीर की सबसे अच्छे तरीके से कोई बयां करता है तो वो क्रिकेट है! देखा जाये तो वैश्वीकरण और क्रिकेट के ‘इंडिया’ को दीवाना बना देने की गति बिलकुल एक जैसी है- विस्फोटक!

घर में फ्रिज का आना और टी-वी पर कोका-कोला के विज्ञापन का आना दोनों अपने में अभूतपूर्व घटना थी! दूरदर्शन युग के मुझ जैसे टी-वी दर्शक के लिए हर ओवर के बाद कोका-कोला और फिलिप्स के तपे रेकॉर्डर का विज्ञापन रोमांच की हद थी! १९९६ के विश्वकप की ही बात है जब सेमी-फ़ाइनल में श्रीलंका और भारत की टक्कर थी! दोपहर के २.३० बजे से मैच शुरू होना था…मैं सुबह से ही मानो ख़ुशी, रोमांच और अनजाने डर के घूँट लगा रहा था! हर मैच से पहले मैं मुख्यतःतीन तरह के डर से जूझता था..पहला की मैच के बीच में बत्ती न गुल हो जाए; बिहार के हर क्रिकेट प्रेमी के लिए मैच वाले दिन विद्युत् विभाग राज्य का सबसे महत्वपूर्ण विभाग होता था…, दूसरा की कहीं सचिन जल्दी आउट न हो जाए…..; तौबा-तौबा, ये एक ऐसा डर है जिसके चलते मैं आज भी टोटके के तौर पर सचिन को पहली गेंद खेलता नहीं देख सकता…, और तीसरा की कहीं भारत हार न जाए!! दोपहर में माँ खाना परोसती, मैं बेचैनी भरे दो कौर निगलता…बार-बार निगाहें ऊपर बल्ब की तरफ जाती…हे दुर्गा माँ..प्लीज़ आज बत्ती मत काटना! पापा भी जल्दी जल्दी पान के बीड़े लगते…और हम टी-वी के सामने जा बैठते! उस समय का क्रिकेट एक्स्ट्रा आज के आइपीएल वाले प्री मैच शोज़ जितना ग्लामोरोसू तो नहीं होता था…तब किरकेट के रहनुमा चीयर गिर्ल्स के चीर हरण का मजा लेने के बजाय इन-स्विंग और आउट-स्विंग पर ज्यादा बतियाते थे! टॉस के टाइम से ही मियाज़ गरमा जाता था….आज भी याद है जब अर्जुन रणतुँगा सिक्का उछाला था..और अजहरुद्दीन टेल्स कहिस था….!

पप्पा जी हनुमान जी का नाम लेकर कमरे से बाहर चले जाते थे…पहली गेंद वो भी नहीं देखते थे..! पर क्या फायदा….जम के थूराए थे प्रसाद एंड कंपनी! जयसूर्या और कालुवितरना पगला गया था उस दिन…मार चौका बुखार छोड़ा दिया था! और हम सब को भक्क मार गया था. पप्पा जी अब भी आशान्वित थे….टिपिकल इंडियन टीम के फैन के माफिक! दुआओं ने कालुवितरना को चलता किया तो ताली बजाते बजाते हाथ दरद दे दिया था..पर अरविन्द दी सिल्वा नाम के प्राणी से पाला पड़ना बाकी था! मैच के बीच में ही पंद्रह ओवर के बीच ड्रिंक्स की ट्रॉली जब मैदान में गयी तो मैं ये ही सोच के हैरान था की कोका कोला की बोतल चलती कैसे है! कोक और पेप्सी से मेरे लगाव का एकमात्र कारण क्रिकेट ही है – इतना न पेप्सी कप और विल्स कप देखा है की अब इनके प्रोडक्ट्स से एक किरकेटिया रिश्ता सा जुड़ गया है! कल पान दूकान पर बेंसन-हेजेस की सिगरेट ली, तब सहसा याद आया की भारत-और साउथ अफ्रीका के बीच भी कई बार यही बेंसन-हेजेस कप हुआ करता था!!

शाम हुई २८० का लक्ष्य था…..सचिन उस दिन भारत का खेवनहार था…..काम्बली-तम्ब्ली से हम लोग कोई उम्मीद न कभी किये थे और ना करते…मांजरेकर तो भार था टीम पर! और वही हुआ जिसका डर था….सचिन टिका तो रहा..पर दिन में जिस पिच पर गेंद बल्ले पर एकदम सीधा आ रही थी..शाम होते-होते मुरली की गेंद उसी पिच पर तांडव नृत्य करने लगी! १२० रन पर ८ विक्केट..मैं खुद को चुट्टी काट रहा था….पापा अब दार्शनिक टाइप से भसनिया रहे थे…’बेटा ये ही जीवन है…आज जीत कल हार…..इ सब चोट्टा है..पैसा के लिए खेलता है….तुमको क्या मिलेगा..जाओ पढो-लिखो!’ मुझे पता था..पापा जी भी फ्रस्टिया गए थे…! टी-वी के सामने से कोई भी नहीं हटा….फिर तो आग लगा दी थी सबने! काम्बली रोते हुए बाहर आया था! इडेन जब जल रहा था तो उस आग को बुझाने की औकात सिर्फ एक भगवान् के पास थी – वो सचिन था….सिर्फ एक बार वो मैदान में आया..सब चुप!

क्रिकेट उसके बाद से आदत बन गया! खेल न होके सम्बन्ध बन गया…! भारतीयता पर तमाम अकादमिक किताबें चाटने के बाद भी, मुझे अब भी भारतीयता तब ही समझ आती है जब सचिन बैटिंग कर रहा होता है! मेरे लिए क्रिकेट अब भी सफ़र का वो ‘आइस-ब्रेकर’ है जिसके सहारे मैं अजनबी चेहरों से सहज संवाद स्थापित कर पाता हूँ! आय भाई जी…क्या स्कोर है…और फिर बातें शुरू हो जाती है जो फिर थकने का नाम नहीं लेती! किरकेट का ये खेल, खेल न होकर हमारे बचपन का वो साथी है जिसके साथ हमारा साहचर्य बे-शर्त न था…किरकेट मेरी जिंदगी का शायद पहला रिश्ता था जिसे मैंने चुना था…मेरा पहला प्यार जो मैंने किया था बगैर किसी से पूछे! क्रिकेट मेरे लिए ‘बड़ा’ हो जाने का पहला नॉन-सेक्सुअल एहसास है!

मेरे बचपन को कार्टून नेटवर्क नहीं उपलब्ध था….उसके लिए एप्पल का मतलब सेब ही था, आई-पोड नहीं, मेरे बचपन की फ्रेंड-लिस्ट में चार-छे ही दोस्त थे…१२०० नहीं, घर के चारों तरफ बियाबान जंगल था…कोई माल नहीं-कोई मॉल नहीं! न मेरी किस्मत में लिन्किन-पार्क और माइकल जैक्सन थे जिनके लिए मैं दीवाना होता और न ही अंगरेजी फ़िल्में थी जो मुझे अर्नोल्ड के पीछे भगाती! नियति ने मेरी किस्मत में सिर्फ एक बी-पी-एल का टी-वी, दूरदर्शन चैनल, एक रेडियो, एक बल्ला और कुछ दोस्त दिए थे! मुझे बचपन में सिर्फ सचिन, गांगुली और अजहर दीखते थे! मेरे लिए खलनायक मतलब अकरम, अकीब जावेद और शोएब अख्तर हुआ करते थे….दायें-विंग वाले लोग गलत न समझे..वे बस क्रिकेट के मैदान के खलनायक थे…मुस्लिम नहीं!

क्रिकेट मेरा सर-दर्द भी था..और मेरा डिस्प्रीन भी! अब भी याद है एडेन गार्डेन का वो टेस्ट मैच जब अख्तर ने तीन गेंद पर सचिन, द्रविड़ और सदगोपन रमेश को चलता कर दिया था! मैं थर-थर कांपने लगा था….मुझे बुखार चढ़ गया था..और पापा ने डांटा था- ‘खेल है, खेल की तरह देखो!’ मैं उनको क्या बोलता- ‘सचिन मेरे लिए खेल नहीं है….विश्वास है…जितना आप!!’

१९९९ विश्वकप की बात है….भारत और ज़िम्बाब्वे का मैच था…..आखिरी ओवर में तीन रन चाहिए थे…..नयन मोंगिया ने हद कर दी थी तब….अजीबो-गरीब शक्ल वाले हेनरी ओलंगा ने आखिरी ओवर में श्रीनाथ सहित तीन विकेट ले भारत को तीन रन की करारी शिकश्त दी थी! पापा ने गुस्से में रेडियो पटक दिया था….इ बनरवा साला ओलंगा…मुह न कान है- हरा दिया इंडिया को! रंगभेद नहीं ये किरकेटवाद है, सर! चूर हुए रेडियो को देख माँ हम-दोनों बाप बेटे पर कितना गुस्सा हुई थी- जला दीजिए इंडिया के लिए घर को आप दोनों- ई मैच ना होके जी का जंजाल हो गया है- ना खाते हैं टाइम पे…न सुतते हैं..जब देखो मैच-मैच-मैच!!! मेरा भी मन किया था की पापा को बोले की खेल है, खेल की तरह देखिये!

उस दिन एहसास हुआ था..की किरकेट हम बाप-बेटे को कितना करीब ले आता है…बिलकुल दोस्त की तरह!! कभी कभी तो लगता है की अपने महिला मित्र के बारे में पापा को किसी रोमांचक मैच के आखिरी ओवर के दौरान बता दूंगा…सब मान जायेंगे..शायद ये भी की वो हमारी जात की नहीं! क्रिकेट सब दूरियां पाट देगा! इसीलिए मुझे लगता है की क्रिकेट को भारत में साल भर चलते रहना चाहिए..कई समस्याओं का सटीक और त्वरित निदान हो जाएगा! अगले मैच में पिता के अंतिम संस्कार से लौटे सचिन को छक्का जड़ते देख मेरे पिता ने मेरी और भी देखा था – तुम भी सचिन जैसा ही कुछ करना- येही सोचा था पापा ने उस दिन!

हर सन्डे, मैदान में हम मैच खेलते थे….इधर पापा साधारण ब्याज से मेरी दोस्ती करवाने की फिराक में रहते..उधर हम खिसकने के. आठ साल का था जब पापा पहला बैट ला के दिए थे…मैंने बहुत जिद की थी की एम-आर-एफ का ला दीजिएगा..सचिन उसी से खेलता है! उस दिन ऋषि-नदीम और अपने अन्य मित्रों के बीच मैं हीरो था….! आह…तब हम सबका निक-नेम हुआ करता था…कौन सचिन होगा..कौन गांगुली…कौन द्रविड़..कौन अजहर! अच्छी खासी लड़ाई और कूटनीतिक जोड़-तोड़ के बाद मैं सचिन बन ही जाता था…..अजहर हम अक्सर नदीम को बनाते थे….आज सोच कर बड़ा अजीब लगता है…हम अजहर क्यूँ नहीं कहलाना चाहते थे! वो अजहर को न चुनना शायद इक घटिया शुरुआत थी- अवधारणा के संक्रमण का पहला चिन्ह!

तब एक पत्रिका आती थी – ‘क्रिकेट सम्राट’, शायद अब भी आती हो. पूरी एक थाक पड़ी है इस पत्रिका की मेरे पास अब भी- अब पढना छूट गया..पर तब चाट जाता था उसको! विश्व क्रिकेट ही नहीं, रणजी-दिलीप ट्राफी-और महिला क्रिकेट हर इक मैच की खबर रहती थी! अब शायद ही किसी को सन १९९७ के इंग्लिश बोलिंग अटैक याद हो- पर हमें अंगेस फ्राज़ेर, एलन मुलाली, फिल टाफ्नेल और मार्क इल्हाम का नाम जुबानी याद रहता था! भारतीय टीम में आये गए कितने होनहारों के फैन बेस के अहम् हिस्सा हुआ करते थे हम – कितने लोग जानते हैं आज विजय भरद्वाज, अबे कुर्विला, रोबिन सिंह, शरणदीप सिंह और ऋषिकेश कानितकर को! उस दिन जब ढाका में independence cup के फ़ाइनल में भारत ने पाकिस्तान के ३१४ का लक्ष्य पाया था और कानितकर ने आखिरी चौका जड़ा था – हमने सरे-शाम कानितकर के नारे लगाये थे…..अब बेचारे को राजस्थान रणजी के कप्तान के तौर पर जब देखता हूँ..लगता है मेरी किरकेटिया दुनिया का एक और हीरो गुमनाम हो गया! तब कर्टनी वाल्श और एम्ब्रोस हमारे लिए नंदन-चम्पक में पढ़ी कहानियों वाले असुर और दानव से कम नहीं थे! लारा के चौकों का डर, चंद्रपौल के जम जाने का डर, मक्ग्राथ का इन स्विंग का डर, अख्तर की रफ़्तार का डर और सचिन के आउट होने डर – ये वो डर हैं जिनसे मैं अपने बचपन से ले कर जवानी तक दहलता आया हूँ! तब कमेन्ट्री सुनने की भी अपनी विधि होती थी – मैं चौकी के एक कोने में बाएं पैर को दायें पे चढ़ा कर बैठता था ताकि भारत का विक्केट न गिरे…और क्या मजाल किसी की कोई मुझे ता-इन्निंग हिला दे मुझे! पांव में झिन-झीनी सी हो जाती थी..तब भी हिलने का नाम नहीं!पापा जी बगल में कुर्सी पर बैठे है- रेडियो के चैनल को सही frequency पर मिलाना भी एक कला थी!

क्रिकेट का मैच हमारे लिए उत्सव था- सचिन हमारा भगवान् और टी-वी, रेडियो वो मंदिर जहाँ हम किरकेटिया श्रद्धालु जमते थे! कल दिल्ली के एक संभ्रांत coffee हाउस में बैठा भारत-पाक मैच देखने के दौरान दिल में थोड़ी टीस उठ रही थी – यहाँ बिजली के गुल होने का डर नहीं था, न ही सचिन के आउट होने का न…मेरे बगल में बैठी दोस्त मैच के बीच में ‘the economic times’ के पन्ने पलट रही थी! लाहौल- विलाकुवत! मतलब कैसे…कैसे कोई किसी भारत पाक मैच के बीच में कुछ भी और कर सकता है- मेरा टोकना उसे बेतुका सा लगा…! और तब ही मैं समझ गया की ९० का वो सुनहरा दशक और उसकी किरकेटिया यादें कहीं पीछे छूट गयी है. अब कोई बच्चा ड्रिंक्स की ट्रॉली को देख आह्लादित नहीं होता होगा, अब विज्ञापन रोमांचित नहीं करते, और न ही कोई बच्चा मैच शुरू होने के दो घंटे पहले से नरभसाया हुआ प्रतीत होता है! फॉर them it’s just another match yaar!!

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10 thoughts on “तो भारत ने छठी बार विश्व कप में पाकिस्तान को हरा दिया!

  • February 18, 2015 at 10:37 pm
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    सही कहा अब क्रिकेट के साथ कोई इमोशनल जुड़ाव नहीं रहा हे खासकर आई पी एल ने क्रिकेट के साथ जुडी राष्ट्रवादी बकवास की जड़ हिला दी जो की बहुत अच्छा ही हुआ आई पी एल नाम के जहर में से ये अमृत निकल आया हे अब क्रिकेट की लोकप्रियता उतार पर जानी ही हे में दिल्ली में जहा रहता हु वहा तो अब फुटबॉल के सामने क्रिकेट को कोई पूछता भी नहीं हे यहाँ तक की भारत पाकिस्तान वर्ल्ड कप मैच के दौरान भी मेने देखा की मैदान खाली नहीं थी लोग कोई खास दिलचस्पी नहीं ले रहे थे ये तो निट्ठले फेसबुकिये टीवितरिये ही थे जो इस मैच को लेकर पागलपन दिखा रहे थे और मिडिया को तो ज़ाहिर हे हर बकवास में फूल दिलचस्पी रहती ही हे कुल मिलाकर बहुत अच्छा हे हे की क्रिकेट का पागलपन अब उतार पर हे मेरा भी कभी लेखक वाला हाल था मगर अब मेने भी कड़ी मेहनत करके हड्डी पसली एक करके ही सही मगर अब फुटबॉल खेलना सीख लिया हे जो अब में हमेशा खेलूंगा क्रिकेट अब मुझे बहुत ही पिटा हुआ बोरिंग खेल लगता हे

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    • February 18, 2015 at 10:42 pm
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      लेकिन क्रिकेट में भारत पाकिस्तान के मैच हम जैसे लोगो को तो बेहद तनाव ही देते हे कोई भी जीते हमें तो दुःख ही मिलता हे हालात ही ऐसे हे भारत जीते तो क्रिकेट से जुड़े भारत के पूंजीवादी पिशाचों की जीत होती हे फिर हिन्दू कठमुल्लाओं की बकवास उधर पाकिस्तान जीते तो भी कठमुल्लाओं की और मुस्लिम सुप्रियॉरिटी वादियों की टर्र टर्र टर्र काव कांव भेजा पका देती हे हमारे तो ये सभी दुश्मन ही हे नतीजा कुछ भी हो हमारे तो दुश्मन के ही पक्ष में जाता हे बहुत दुखद हमारे लिए तो

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  • February 19, 2015 at 7:38 am
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    बी पी गौतम सवतंत्र पत्रकार सटीक लिखते हे की ” दुःख की बात यह है कि भारत सरकार से ऊपर जाकर क्रिकेट बोर्ड ने क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया है। भारत और पाकिस्तान की मूल रंजिश को वो क्रिकेट में भुना लेता है। एक झटके में अरबों-खरबों पैदा कर लेता है, इससे भारत के हालात और अधिक खराब हो रहे हैं। ग्लैमर और अपार धन के चलते युवा क्रिकेटर की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे भारत के मूल खेलों पर बड़ा संकट गहरा रहा है, साथ ही क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ने के कारण पकिस्तान और भारत के जनमानस के बीच क्रिकेट बोर्ड खाई और गहरी कर देता है, जिसका दुष्परिणाम आम जनमानस को ही नहीं, बल्कि दोनों राष्ट्रों को विभिन्न रूपों में झेलना पड़ता है, इसलिए भारत सरकार को विश्व समुदाय के समक्ष स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि क्रिकेट भारत का आधिकारिक खेल नहीं है और न ही इसका भारत की आन, बान, शान से कोई मतलब है। क्रिकेट की हार-जीत को मात्र उन खिलाड़ियों की ही हार-जीत माना जाये, जो इस खेल में भाग ले रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं ट्वीटर पर क्रिकेट को लेकर ट्वीट कर रहे हैं, ऐसे में यह संभावना कम ही है कि वे भारत में क्रिकेट पर अंकुश लगाने का विचार भी करेंगे।

    खैर, बात अमेरिका और चीन की करते हैं। विश्व के तमाम देशों की तरह इन दोनों देशों के नागरिक भी ब्रिटेन के लोगों से ईर्ष्या करते हैं, लेकिन भारतीयों की तरह सिर्फ दिखावा नहीं करते। अमेरिका और चीन के नागरिक ईर्ष्या को आज तक निभा रहे हैं। विश्व का प्रथम मैच खेलने वाले अमेरिका में लोग क्रिकेट का नाम तक लेना पसंद नहीं करते। ब्रिटेन की मूल भाषा अंग्रेजी की जगह उन्होंने अपनी भाषा का अविष्कार किया, जो अब ब्रिटेन की अंग्रेजी की तरह ही विश्व भर में फैल चुकी है। क्रिकेट के खेल में गेंद हाथों में रहती है, इसलिए अमेरिका ने फुटबाल को अपनाया, वे गेंद को पैर से खेलते हैं। ब्रिटेन में चार्ल्स नाम बेहद लोकप्रिय और सम्मानित है, लेकिन अमेरिकी यह नाम कुत्तों को देना ज्यादा पसंद करते हैं, ऐसे ही हालात क्रिकेट को लेकर चीन में हैं। विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश चीन में लोग क्रिकेट का नाम तक नहीं जानते। इन दोनों देशों में क्रिकेट न होने के कारण जुआरियों को बड़ा नुकसान हो रहा है, इसलिए वे इन दोनों देशों में क्रिकेट फैलाने के प्रयास लगातार कर रहे हैं और जुआरियों की मदद कर रहे हैं अप्रवासी, जिनमें भारतीयों का नाम सबसे ऊपर हैं।”

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  • February 19, 2015 at 3:10 pm
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    लेकिन बात जब लेखक ने क्रिकेट सम्राट की की तो हमने भी ये मेगज़ीन और इसके पुराने पुराने 80 और 90 – के दशक के एडिशन मुज्जफरनगर में खूब ढूंढ ढूंढ कर पढ़े थे और आज नेट के ज़माने में भी कोई खेल का ऐसा विकिपीडिया नहीं होगा जैसा इस मेगज़ीन ने हमें बना दिया था और इस पत्रिका के असल रत्न थे चरनपाल सिंह सोबती जो कमाल कमाल लेखक थे बहुत बेहतरीन लेखक पूरी तरह निस्पक्ष होकर गहन जानकारी रोचकता के साथ लिखते थे आज वैसा खेल लेखन कही भी नहीं दिख सकता हे सोबती जी को सलाम

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  • February 20, 2015 at 11:49 am
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    एकदम खरी बात लिखी है आपने और ब्लॉग का एक-एक शब्द 100% सही है !! राष्‍ट्रीयता की आड़ मे दोनो ही देशो की जनता को बड़ी सफाई से उनकी भावनाये भड़का कर बेवकूफ बना कर उनकी जेब से मोटा माल निकलवाया जेया रहा है और यह सब बड़ी पक्की प्लॅनिंग से हो रहा है !!

    1-मात्र कुछ सेकेण्ड के विग्यापन को टी वी पर दिखाने के लिये चेनल लाखो रुपया लेता है तो क्या दिन मे 2-4 घंटे “सिर्फ क्रिकेट” दिखाने पर क्या पैसा नही लिया जाता होगा ?? कौन देता होगा वह मोतेी रकम और बड़ा सवाल है की किसलिये देता होगा ??

    2-कुछ चेनल्स तो भारत और पाकिस्तान के पुराने खिलाड़ियो की तू-तू मे-मे वाली नौटंकी भी मैच से पहले दिखाते है ताकि जिस भारतीय या पाकिस्तानी को क्रिकेट का शौक ना हो तो वह भी अपने दुश्मन देश के खिलाड़ियो की फब्तियो का करारा जवाब देने के लिये क्रिकेट के मैच और खिलाड़ियो के विग्यापन वाले प्रॉडक्ट्स पर पैसा खर्च कर अपना “राष्ट्र-हित”?? मे अपना योगदान?? दे सके

    3-एक और बात देखने को मिलती है कि किसी जमाने मे दिन दो खिलाड़ियो के बीच मैदान पर कहासुनी हुई थी उनको स्टूडियो मे एक साथ बुला कर मेच के मेच को छटपटा बनाने मे उनका भी भरपूर इस्तेमाल किया जाता है

    ४-आज का क्रिकेट हमे खेल कम और सट्टेबाजी जयदा लगती है जिसकी खबरे अक्सर आती ही रहती है !!

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  • March 10, 2015 at 10:28 pm
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    पाकिस्तानी सरफ़राज़ नवाज़ का कहना सही भी हो भी सकता हे की भारत की मनमर्ज़ी की पिचे ही बनाई जा रही हे इस खेल पर अब बिलकुल यकीं मत कीजिये इस पर समय बर्बाद मत कीजिये अब ये खेल पूरी तरह सिर्फ भारत के हम जैसे मूर्खो की दीवानगी पर टिका हे कोण जाने यही भारतीय क्रिकेटरों की थोड़ी बहुत सफलताओ का राज़ भी हो पढ़े ” पर्थ। ऑस्ट्रेलिया-अफगानिस्तान मैच का ही किस्सा सुनें। क्रिकेट के दीवाने एक भारतीय ने इस मैच के बदले नेट से किसी और मैच के टिकट खरीद लिए। यहां स्टेडियम आकर देखा तो गलती समझ आई। स्टेडियम की टिकट खिड़की पर जाकर बताया और कहा कि अगर टिकट मिल जाए तो वे अभी खरीदने को तैयार हैं। टिकट खिड़की पर बैठी महिला ने वहीं से निकाल कर एक टिकट उन्हें दे दिया। जब उन्होंने दाम पूछे तो जवाब आया ‘कुछ नहीं, ये तो कांप्लीमेंट्री है’।
    क्या आप भारत में किसी भी जगह यह कल्पना कर सकते हैं! रांची हो या रायपुर और मैच भले ही स्कॉटलैंड और हॉलैंड का ही क्यों ना हो, टिकट नहीं मिलने वाले। हमारे यहां सही में क्रिकेट देखने का नशा है। अभी तक आधा से ज्यादा ऑस्ट्रेलिया घूम लिया है लेकिन सड़कों पर भटकते हुए एक बार भी नहीं लगा कि यहां वर्ल्ड कप क्रिकेट जैसा भी कुछ हो रहा है। सड़कें और लोग आम दिनों की ही तरह हैं। आप पूरे शहर को छान मारें तो भी एक ऐसा बड़ा सा होर्डिंग नजर नहीं आएगा जो यह बता रहा हो कि यहां क्रिकेट का वर्ल्ड-कप हो रहा है। यहां तक कि अखबारों में मैच रिपोर्टिंग तो छप रही है लेकिन मजाल है कि एक भी विज्ञापन में किसी खिलाड़ी का चेहरा नजर आ जाए। लगता है या तो इन खिलाड़ियों पर लोगों को यकीन नहीं है या खिलाड़ियों से जुड़ी चीजों पर।
    क्रिकेट की सबसे मजबूत टीम है ऑस्ट्रेलिया और एक से बढ़कर एक सितारे हैं इस टीम में। फिर क्या बात है कि इनके नाम से कोई चीज नहीं बिकती है। यहां तक कि अभी तक टी वी पर भी एक विज्ञापन किसी खिलाड़ी का नहीं देखा। ब्रेट ली क्रिकेट छोड़ चुके हैं पर उनके विज्ञापन भारत में अभी भी नजर आ जाते हैं। हमारे उड़न सिख मिल्खा सिंह भी आजकल च्वनप्राश के विज्ञापन कर रहे हैं। नए-पुराने कई खिलाड़ी हम टी वी के छोटे पर्दे पर रोज देख रहे हैं।
    सोचता हूं कि यदि क्रिकेट यहां भारत से बेहतर खेला जा रहा है तो फिर यहां के खिलाड़ियों को लेकर कोई क्रेज क्यों नहीं है। यहां समझ में आता है कि सभी देशों के खिलाड़ी क्यों भारत में आईपीएल खेलने को उतावले रहते हैं। वैसे भी इस वर्ल्ड-कप में बड़े प्रायोजक रिलायंस और एमआरएफ टायर ही हैं यानी आईसीसी को 80 फीसदी कमाई तो भारत से ही मिलती है। यह भयावह कल्पना है कि अगर भारत क्रिकेट खेलना छोड़ दे तो क्रिकेट का क्या होगा। क्रिकेट के जनक इंग्लैंड में ही क्रिकेट के बुरे हाल हैं तो वेस्टइंडीज से तो पहले ही बास्केटबॉल को विदा कर दिया गया है।
    तो क्या यह भारत का बाजार ही नहीं है जो क्रिकेट को सांसें दे रहा है। क्या सारे देश हमारे लिए या हमारे दम पर क्रिकेट नहीं खेल रहे हैं? ऑस्ट्रेलिया में खिलाड़ियों की हालत भी अच्छी नहीं है। न्यूजीलैंड के क्रिस क्रेन्स तो गाड़ियों की सफाई कर रहे हैं। वेस्टइंडीज में कर्टली एम्ब्रोस गा-बजाकर गुजारा कर रहे हैं। बोर्ड से खिलाड़ियों की तनातनी भी यहां चल ही रही है।
    सभी देशों में क्रिकेट का बाजार ठंडा है तो फिर उसे इतनी गरमी मिल कहां से रही है, यकीनन भारत से। दुनिया की नजरें अगर भारत के बाजार पर हैं तो क्रिकेट इससे कैसे अलग रह सकता है। भले ही वर्ल्ड कप के आयोजन को ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड मिलकर अंजाम दे रहे हों मगर सही में कर्ताधर्ता तो भारत ही है। भारत का बाजार है।”

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  • March 20, 2015 at 5:27 pm
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    बांलादेश के कमाल साहब को सेल्यूट जो इन्होने क्रिकेट पर छाय भारतीय पूंजीवादी पिशाचों के खिलाफ आवाज़ उठाई ना केवल आरोप सही हो सकते हे बल्कि पिछले वर्ल्ड कप भी बिका हुआ हो सकता हे . जब ये खेल पूरी तरह से सिर्फ भारत के पेसो ( जो जनता का खून चूस कर आते हे ) के दम् पर चल रहा हे तो भला क्या ताजुब हे की हर कप में भारत की कामयाबी सुनिश्चित की जाती होगी वैसे खेर आज ख़ुशी का दिन हे की पाकिस्तान हार गया बहुत बढ़िया रिलिजियस कठमुल्लाओं की हार हुई इसके बाद इंशाल्लाह ऑस्ट्रेलिया भारतीय पूंजीवादी कठमुल्लाओं को भी शिकस्त देगा घिन आती हे इस खेल से

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    • March 23, 2015 at 7:41 am
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      भारत के पूंजीवादी पिशाचों ने इस खेल का स्तर कितना गिरा दिया इसका अंदाज़ा इस वर्ल्ड कप को देख कर लगाइये की क्वाटरफाइनल तक में भी कोई रोमांच नाम की चीज़ नहीं दिख रही हे खिलाड़ियों में कोई किलर इंस्टिक का नाम नहीं दिख रहा हे यही नहीं कप का बकवास फॉर्मेट भी इसलिए रखा जाता हे ताकि भारतीय टीम के 1992 या 2007 की तरह लुढ़कने का कोई खतरा ही ना हो क्योकि इस मनहूस खेल में सारा पैसा आपके हमारे ही खून पसीने का लगा हुआ हे बाकी किसी देश के लोगो को क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं हे अब देखिये की ये बकवास फॉर्मेट 1996 से ये कहकर ढोया जा रहा हे की इससे नए देश वर्ल्ड कप में खेलेंगे तो क्रिकेट की लोकप्रियता और स्तर बढ़ेगा मगर 19 सालो में ऐसा कुछ नहीं हुआ हे साफ़ हे की ये बेहूदा फॉर्मेट भारतीय टीम की सुरक्षा के लिए ही हे वो बात अलग हे की अब शायद इस सुरक्षा चक्र की भी जरुरत नहीं हे सभी टीम वैसे ही समझ गयी हे की भारत जीतेगा भारत से और पैसा क्रिकेट में उलीचा जाएगा तो इसी में उनका भी ” फायदा ” हे तरस तो उन लोगो पर आता हे ( हालांकि अब संख्या कुछ कम तो हुई ही हे ) जो अब भी इस सड़ियल खेल के प्रति इमोशन रखते हे

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      • March 26, 2015 at 4:56 pm
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        भारतीय क्रिकेट टीम की हार सभी विवेकशील लोगो को बहुत बहुत मुबारक हो पाकिस्तान और भारत दोनों क्रिकेट टीम की हार बहुत सुखद हे ये धार्मिक कठमुल्लावादियो और पूंजीवादी पिशाचों की हार हे ये दोनों विचारधाराय और लोग इंसान की खाल में वो भेड़िये हे जो भारतीय उपमहादीप की सौ करोड़ गरीब और निरीह जनता का खून पीते हे बहुत बधाई

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        • March 27, 2015 at 8:07 am
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          जिस तरह से धोनी आउट हुए उससे आप अंदाज़ा लगा सकता हे की देश के खेल संसधानो का सारा पैसा अरबो रुपया खा कर भी इन खिलाड़ियों में किलर इंस्टिक की कितनी कमी हे एक तो कमी हे दूसरी बात उन्हें भारत के क्रिकेट प्रेमी अफ़ीमचियो पर पूरा भरोसा इन्हे पता हे की बाद में जब ये फिर से जिम्बाब्वे को बुरी तरह हराएंगे तो ये अफीमची फिर से झूमने लगगेंगे पूंजीवादी पिशाचों के फेवरिट हमारे पी एम ने भी हार के बाद बजाय इस खेल के खिलाफ कुछ बोलने के जो खरबो रुपया देश का पीकर भी कोई खास रिज़ल्ट नहीं देता को सांत्वना ही दी उनसे यही उमीद थी जैसे वो खुद हज़ारो करोड़ खर्चा करवा कर पी एम बने मगर कोई रिज़ल्ट नहीं देने वाले इसके आलावा क्रिकेट के दलाल यानी पुराने खिलाडी कुछ पत्रकार भी लोगो के गुस्से पर पानी डालने की कोशिश कर रहे हे करे क्यों न क्रिकेट की बहती गंगा में ये लोग भी सूना हे की बिना खेले खूब कमाते हे कुछ के तो सुना हे की बोर्ड से अनुबंध भी इसी काम के लिए

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