तारिक फतेह की फतेह!

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by — संजय तिवारी

तारिक फतेह फिर चर्चा में हैं। बीते डेढ़ दो सालों से वे अक्सर चर्चा में रहते हैं क्योंकि अचानक से भारतीय आसमान पर उदित हुए हैं। भारत के मुसलमान उनसे पाकिस्तान के मुसलमानों से भी ज्यादा नफरत करते हैं। कम्युनिस्ट तो खैर गाली देते ही हैं।

लेकिन तारेक फतेह के बारे में कम लोग जानते हैं कि वे मुसलमान तो हैं ही, मार्क्सिस्ट भी हैं। इस्लाम की उनकी आलोचना उनके मार्क्सिस्ट बैकग्राउण्ड के कारण ही है। तारिक फतेह पाकिस्तान में पत्रकार थे। जैसे एक मार्क्सवादी कठमुल्लापन और सत्तातंत्र के खिलाफ बोलता है वैसे ही उन्होंने भी बोलना शुरू किया। यह बात पाकिस्तानी सैन्य हुक्मरानों को हजम नहीं हुई। उन्होंने तारिक की तुड़ाई करने के बाद जेल में डाल दिया। अंदर बाहर होते होते आखिर में तारिक फतेह कनाडा चले गये और कनाडा में उन पाकिस्तानियों के समूह से जुड़ गये जो पाकिस्तान को एक प्रगतिशील अपनी मिट्टी से जुड़ा पाकिस्तान देखना चाहते थे, सऊदी अरब की फोटोकॉपी नहीं।

यहां इसी समूह से जुड़ने के बाद वे भारत आये और वही सब बोलना शुरू किया जो कनाडा के प्राइवेट चैनलों पर बोलते थे। वे घोषित तौर पर कठमुल्लेपन के खिलाफ लिखते बोलते रहे हैं। इसलिए कनाडा में सरकार उनकी सलाह भी लेती है, शायद मदद भी करती हो। इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ तारेक फतेह एक मुखर आवाज हैं। लेकिन भारत आकर जब वही सब बोलना शुरू किया तो पहला विरोध मुसलमानों ने ही दर्ज किया। वो दम से कहते हैं कि मैं हिन्दुस्तानी मुसलमान हूं। राजपूत पंजाबी। तुम अरब से आये होगे, मेरा पांच हजार साल से इस मिट्टी से रिश्ता है।

यह तारिक फतेह की वह पहचान है जिससे आमतौर पर हिन्दुस्तानी मुसलमान को दूर किया जा रहा है। सऊदी के पैसे पर चलनेवाले मदरसों में होनेवाली पढ़ाई और मस्जिदों में होनेवाली तकरीर मुसलमानों को यह समझा रही है कि तुम पहले मुसलमान हो और आखिर में भी सिर्फ मुसलमान हो। इसके अलावा तुम्हारी कोई पहचान नहीं है। जो कुछ है वह सिर्फ अरबी संस्कृति है। अरबियों में भी उस नज्दी कबीले की संस्कृति जिसके लोग बीते कई दशकों से सऊदी अरब पर शासन कर रहे हैं। अरबियों में भी वैसे ही सांस्कृतिक विविधता है जैसे किसी देश या समाज में होती है। तरह तरह की पगड़ी, लबादा ये सब अरबियों को ही आपस में एक दूसरे से अलग पहचान देती हैं लेकिन सऊदी शासक के पैसे से जो नये तरह का इस्लाम फैलाया गया है वह दुनिया के मुसलमानों पर समान रूप से सऊदी संस्कृति लाद देना चाहता है।

अल्लामा इकबाल ने इसका विरोध किया था। वे मुसलमानों के लिए अलग जमीन चाहते थे लेकिन उस अलग जमीन पर अरबी इस्लाम को बेदखल करते थे। उनकी ख्वाहिश थी कि एक हिन्दुस्तानी इस्लाम होना चाहिए जो यहां की मिट्टी, सभ्यता और संस्कृति में रचा बसा हो। दुर्भाग्य ये है कि मुसलमानों ने अलग पाकिस्तान तो ले लिया लेकिन हिन्दुस्तानी इस्लाम हासिल नहीं कर पाये। उन्होंने अरबी इस्लाम को अपनी सांस्कृतिक पहचान बना लिया। जाहिर है, ऐसे में कोई तारिक फतेह जैसे मुसलमान सीना ठोककर कहता है कि वह हिन्दुस्तानी मुसलमान है और उसे औरंगजेब से नहीं बल्कि दाराशिकोह से मोहब्बत है तो जेहनी तौर पर बीमार मुससमान उसका विरोध शुरू कर देते हैं। कमी तारिक फतेह में नहीं है, कमी है इन मुसलमानों में जिन्हें इस कदर गुमराह कर दिया गया है कि वे अपनी जमीन को अपनी कहने से डर रहे हैं। अपनी पहचान को अपनी बताने से डर रहे हैं। तारिक फतेह इस जड़ता के खिलाफ पानी में फेंके गये उस कंकर के समान हैं जिसने पूरे पानी में हलचल पैदा कर दिया है।

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12 thoughts on “तारिक फतेह की फतेह!

  • October 10, 2016 at 12:44 pm
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    http://visfot.blogspot.in/से साभार शुक्रिया . एक बात की बिसहड़ा में तिरंगे के अपमान पर सभी लेखक पत्रकार जिनका की कुछ नाम हे कुछ पहचान हे कोई विश्वसनीयता हे सभी ने इसकी आलोचना की बुरा महसूस किया सिर्फ एक ने नहीं किया सिर्फ इस तिवारी

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  • October 10, 2016 at 12:52 pm
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    तारेक फ़तेह, बहुत ही बढ़िया चिंतक और विचारक है,मैं उनके कार्यक्रम रावल टीवी पे देखता आया हूँ. जब तक वो भारत या भारत के टीवी चैनल्स पे नही आए थे, तब तक उनका टारगेट उपमहाद्वीप के मुसलमान थे, जिनको वो अलग तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करते थे, उनकी शैली भी परिपक्व लगती थी.
    लेकिन भारतीय टीवी चैनल्स का रुख़ करते ही, उन्होने अपना दर्शक वर्ग भी बदल दिया, और वो जुनूनी भारतीय वर्ग के चहेते बनने की कोशिश मे, अपनी संजीदा शैली को छोड़ते जा रहे हैं, जो मेरी नज़र मे कोई फ़ायदेमंद नही है.

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  • October 10, 2016 at 1:02 pm
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    बिलकुल जाकिर भाई में भी इस विषय पर लेख की सोच रहा हु तारिक फ़तेह अच्छे आदमी हे हम इन्हें तब से जानते हे जब कनाडा से बाहर किसी ने इनका नाम तक नहीं सूना होगा अपना काम ये वैश्विक इस्लाम के तहत करे या अलीगढ़ जामिया आये जाए तो ठीक हे मगर हिन्दू कठमुल्लाओ की गोद में तो ना बैठे यहाँ पर संजय तिवारी जैसे नए नए जोशीले ” संघी मुल्ला ” इनके फैन हो रही हे हे” भोकाल ” चतुर्वेदी जैसे जैसे रग रग में ज़हरीले लोग , इनके साथ सेल्फी ले रहे हे . रजत शर्मा जैसे पत्रकारिता के काले धब्बे के साथ प्रोग्राम — हे कोई लाभ — ?

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    • October 10, 2016 at 1:23 pm
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      Tarek fatah is an opportunist. He was a Marxist and KGB agent and worked in Pak and Saudi. Than after fall of Soviet union, he went to Canada and there he found a new audience, Islamophobiacs. There he used his daughters as a honey trap to get favours from conservative govt. and soon became popular in pro Israel as well as Neo Nazi circles due to his fanatical opposition to Islam and Pakistan. He also worked with khalistanis until RAW warned him to not to mess with them. This time Harper govt saved his neck. After Harper govt lost to Justin Trudeau, he became more desperate to find a new market & “home”! Hence his love for India.

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  • October 12, 2016 at 8:49 am
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    हालांकि हम कह तो रहे हे की तारिक हिन्दू कठमूल्लवादी ताकतों की गोद में ना बैठे अलीगढ़ जामिया जाए एजुकेटिड कमुस्लिमो पर प्रभाव डाले मगर सच हे की पहले शायद उन्हें जामिया में रोका गया था तब का शमशाद इलाही शम्स का लेख तारेक फतह और जामिया प्रकरण पर : जनवाद पर इस्लामी ताकतों का हमला .बंगलादेश और भारत की आजादी से जुड़े प्रश्नों पर एक किताब लिखने के सन्दर्भ में तारेक फतह इन दिनों कनैडा से भारत यात्रा पर है. दो दिन पहले दिल्लीकी जामिया मिलिया इस्लामिया विश्व विद्यालय में उनका एक प्रश्नौत्तर कार्यक्रम होना तय था जिसे कथित इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव के चलते रद्द कर दिया गया. भारत और उसके जनतंत्र को लेकर तारेक फतह जैसे बहुत से बुद्धीजीवी अक्सर भ्रम में रहते है लेकिन जैसे ही कडुवे यथार्थ से दो चार होते है तब उन्हें जमीनी हकीकत का पता चलता है.मेरा स्पष्ट मत है कि तारेक फतह भारत में किसी भी जगह मुसमानो के बीच स्वतन्त्र रूप से अपने विचार सार्वजनिक रूप से नहीं रख सकते. भारत के मुसलमानों में आलोचना सुनने की क्षमता न तो पहले थी न अब है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय हो या जामिया …दोनों परिसरों में इस्लाम के प्रति किसी आलोचनात्मक आवाज को सुनना संभव ही नहीं है.दो वर्ष पूर्व मेरठ विश्वविद्यालय परिसर में न्यू ऐज इस्लाम डाट काम के संस्थापक और सूफी इस्लाम के प्रवक्ता सुल्तान शाहीन को जमाती मुसलमान छात्रों ने ३ मिनट भी नहीं बोलने दिया था

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  • October 12, 2016 at 8:50 am
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    इसी परिसर में इस्लाम के विश्व विख्यात विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान साहब के हाथ से माइक छीन लिया गया था और उन्हें बेइज्जत करके परिसर छोड़ने को मजबूर किया गया. अब हालत यहाँ तक पंहुच चुके है कि इस्लाम की धर्म निरपेक्ष व्याख्या करने वाले बुद्धीजीवियों तक के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा जा रहा है, तब भारत में तारेक फतह जैसे बेबाक राजनीतिक इस्लाम के कटु आलोचक को भला कैसे सुना जा सकता है? मजे कि बात यह है कि ये तीनो लोग मुसलमान है. इस्लाम पर कोई भौतिकवादी, संदेहवादी, यथार्थवादी, नास्तिक, बुद्धीवादी या मार्क्सवादी बोले इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती. जब मुसलमानों के कथित शिक्षण संस्थानों का बौद्धिक स्तर इस हद तक गिर चुका हो, तब आप मुस्लिम समाज के चिंतन के स्तर का अंदाजा खुद ही लगा सकते है. यह भी सच नहीं की सौ प्रतिशत मुस्लिम आबादी की सोच इन फासीवादियो से मिलती हो? लेकिन ऐतिहासिक रूप से बुनियाद परस्त मुस्लिम ताकतों ने लिबरल सोच के मुलसमानो पर अपने भय की गिरफ्त बनाए रखने में कामयाबी पायी है जिसके चलते यह बड़ा वर्ग अपनी चुप्प आपराधिक चुप्पी के जरिये अपना समर्पण कर चुका है. जामिया जैसे प्रसंगों के माध्यम से इस्लाम के राजनितिक फासीवाद का भारत सहित विश्वव्यापी चरित्र आसानी से समझा जा सकता है जिसके खिलाफ तारेक फतह की आवाज को दुनिया में हमेशा याद किया जाएगा.

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  • October 12, 2016 at 8:55 am
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    २०१३शमशाद इलाही शम्स भारत के मुसलमानों द्वारा कट्टरपंथी इस्लाम की सलफी अवधारणा के पीछे छिपे कारणों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समीक्षा भी करनी होगी. बोलने के मौलिक अधिकार और धार्मिक भावनाओ को भड़काने जैसे लच्छेदार मुहावरों को गौर से अगर देखे तो पायेंगे कि एक तरफ इस विषय पर जनवादी शक्तियो द्वारा इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों के सामने आपराधिक समर्पण दिखेगा दूसरी तरफ मुसलमानों के भीतरफासीवादी शक्तियों द्वारा जनतान्त्रिक अधिकारों के आवरण तले पूरे मुस्लिम समाज में अपनी पकड़ बनाने की एक सतत प्रक्रिया दिखाई पड़ेगी जिसके तार सऊदी अरब और इरान तक से जुड़े नज़र आयेगे.तारेक फतह के प्रकरण पर वामपंथी ताकते ठीक उसी तरह चुप्पी साधे है . बोलने की आज़ादी के लिए संघर्ष करने से बड़ा कार्यभार शायद अब उनका चुप रह कर इन मुस्लिम साम्प्रदायिक ताकतों का अघोषित समर्थन करना भर रह गया है. लगता है इतिहास से कोई सबक सीखने की आदत अब उनमे नहीं रही न ही समझ. इरान में तुदेह पार्टी ने खुमैनी के शाने बशाने संघर्ष किया और इरान की हकूमत मुल्लाहो के हाथ में आते ही सबसे पहले तुदेह पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का कत्लेआम इस्लाम के नाम पर किया गया जिसमे लगभग २० हजार कम्यूनिस्टो ने शहादते दी. आज भी यह प्रक्रिया रुकी नहीं है. इसी तरह दूसरे इस्लामी मुल्को में कम्यूनिस्टो को गाज़ा में, ट्युनिसिया और मिस्र में बली का बकरा बनाया गया है और आज भी बनाया जा रहा है. केंद्र की सरकार भारतीय मुसलमानों के सलफीकरण और सफविदकरण दोनों ही मुद्दों पर चुप्पी साधे बैठी है. इस अत्यंत खतरनाक खेल में जीत किसी भी पक्ष की नहीं होगी अगर होगा तो सर्वत्र विध्वंस जिसमे कोई भी न बचेगा

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  • October 12, 2016 at 8:56 am
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    अभी समय आ गया है कि भारत के जनवादी राजनीतिक संगठन इस प्रश्न पर अपनी स्थिती स्पष्ट करे कि क्या सार्वजनिक जीवन में धर्म आधारित राजनीति को अनुमति दी जानी चाहिए ? या उन्हें शट-अप कह कर घर बैठने के लिए विवश किया जाए? जाहिर है यह काम क़ानून से नहीं होगा इसके लिए कड़ा राजनीतिक संघर्ष करने और मज़बूत इच्छा शक्ति की दरकार है. इससे पहले की बहुत देर हो जाए यह कार्य अतिशीघ्र किया जाना चाहिए. तारेक फतह पर जामिया में हुए इस विवाद ने मुझे १९९१ में वहां के लुम्पन छात्रों द्वारा प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन के विरोध की यादे ताज़ा कर दी है जिसे माजूदा विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का वरदहस्त हासिल था. आज अगर ऐसे मौक़ा परस्त लोग देश के सत्ता संस्थानों के उच्च पदों पर बैठे है तब उनकी हकुमत से इस्लामी फासीवाद के विरुद्ध कोई लड़ाई तेज़ हो इस गलत फहमी में कौन रह सकता है? शमशाद इलाही शम्स २०१३

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  • October 16, 2016 at 2:48 pm
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    Haider Rizvi
    14 October at 18:15 ·
    इस्लाम गुफाओं में ध्यान लगाता था, इस्लाम बकरियां चराता था, इस्लाम रेगिस्तान में रोज़े रखता था, इस्लाम जौ की सूखी रोटियां खाता था, इस्लाम की पहली सफ़ में अजम और अफ्रीकी गुलाम खड़े होते थे, इस्लाम तलवार पर सुलह को तरजीह देता था, इस्लाम रात-रात भर शहर में घूम भूखों का पेट भरता था, इस्लाम ज़रूरत पड़ने पर जुल्फेकार बन जाता था और वक़्त पड़ने पर असग़र का गला बन जाता था………….
    ये महलों के गुलाम मुल्ला, विधायकों के तलवे चाटते दाढ़ी वाले, चुनावी लहर में मीडिया को अपनी पसंदीदा पार्टी बताने वाले अमामाधारी, यह हुसैन का गम पढने के लिए मेहनताना मांगते लफ्फाज़, यह सऊदी के कलमे पढ़ते मुछमुंडे, यह अरबी, उर्दू, फ़ारसी जुबानो की तिजारत करते आलिम…………. ये न कभी इस्लाम थे न रहेंगे……
    चेत जाओ इससे पहले कि हम तो मुसलमान रहे और हमारा जेहन तालिबान बन जाय.Haider Rizvi

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  • October 16, 2016 at 6:34 pm
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    “यह हुसैन का गम पढने के लिये मेहनताना मांगते लफ्फाज ” ऐसे शिया मुस्लिम अच्छे लगते है वह कम से कम अपनी बुद्धिं का उपयोग तो करते है
    इसी बुनियाद में कुरान हदीसो की भी समीक्षा सभी मुस्लिमो को करनी चाहिए

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  • December 22, 2016 at 5:56 pm
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    Tabish SiddiquiYesterday at 10:00 · ये “तैमूर” का प्रकरण तारिक़ फ़तेह साहब का फैलाया हुवा है.. उनकी उम्र हो चली है मगर एक बात वो अच्छी तरह जानते हैं कि भक्तों को किस स्तर से समझाना है.. बुद्धिजीवी हैं.. समझदार हैं.. अच्छी तरह जानते हैं कि इन लाल्लुओं को कौन सा लॉलीपॉप दिया जाय जिसे ये कम से कम पंद्रह दिन चूसेंतैमूर तो अरबी का शब्द है जिसका अर्थ होता है लौह, लौह पुरुष, सेक्सी, ख़ुद्दार.. निर्भर करता है कि किन अर्थों में आप इसे इस्तेमाल करते हैं.. लौह पुरुष सरदार पटेल को आप तैमूर सरदार पटेल कह सकते हैं.. और इस का ये मतलब नहीं निकलेगा कि आपने उनको “तैमूर लंग” बोल दिया.. जब तक कोई ये न कहें कि मैं तैमूर हूँ तैमूर लंग जैसा.. तैमूर नाम बहुत पहले से प्रचलित हैमगर तारिक़ फ़तेह साहब का नाम “तारिक़” आता है “तारिक़ इब्न ज़ियाद” से.. जो कि उमैय्यह ख़लीफ़ा अल-वालिद का सेनापति था.. इसी ने ख़लीफ़ा के हुक्म से स्पेन पर विजय पायी थी और इस्लाम का परचम लहराया था.. लोगों ने तारिक़ नाम उसी “तारिक़ इब्ने ज़ियाद” के नाम पर रखना शुरू किया.. और ये जो तारिक़ साहब की फतह है ये वही स्पेन वाली फतह है जहाँ हज़ारों लाखों लोगों का ख़ून बहाया गया था.. उनसे पूछिए कि अपना नाम क्यों नहीं बदलते हैं साहब.. क्यों एक बर्बर आतंकी का नाम ढो रहे हैं पचहत्तर साल से?मसला ये नहीं है कि तारिक़ साहब ने इस पर विरोध जताया है.. मसला ये है कि भक्त इसे ले उड़े हैं और सबको देशद्रोही बोल रहे हैं कल से जो इस नाम को सपोर्ट करे.. एक संघी बुद्धिजीवी लेखक ने तो यहाँ तक लिख दिया कि मुसलमान लोग मुहम्मद ग़ौरी के नाम पर मुहम्मद, इब्राहीम लोधी के नाम पर इब्राहीम नाम रखते हैं अपने बच्चे का.. अब बताईये ज़रा.. इनके अक़ल की कोई सीमा है? कल बोलेंगे कि दाऊद इब्राहीम के नाम पर दाऊद नाम रखा जाता है.. दाऊद पैग़म्बर का नाम है, इब्राहीम पैग़म्बर हैं मुहम्मद पैग़म्बर हैं.. मगर कौन इन्हें समझाए.. इन्हें ढेले की समझ नहीं होती हैभक्तों..अगर हम कहें कि मोदी जी के माता पिता ने उनका नाम “मोदी टायर” के नाम रखा है क्यूंकि उनको बचपन से टायर बहुत पसंद था और वो टायर की तरह दौड़ते रहना चाहते थे इस देश से उस देश तो ये कुतर्क आपको कैसा लगेगा?तैमूर अरबी शब्द को मेरा सपोर्ट है, तैमूर नाम को मेरा सपोर्ट है.. तैमूर मुहम्मद, तैमूर अली, तैमूर खान, तैमूर अंसारी जैसे नामो को हमेशा मेरा सपोर्ट है.. हाँ कोई “तैमूर लंग” रखेगा तो वो मुझे पसंद नहीं आएगा.. मगर फिर भी वो उसकी मर्ज़ी क्यूंकि लाखों जयचंद्र नाम वाले भी भारत में मिल जाएंगे~ताबिश

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  • November 24, 2017 at 3:25 am
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