तस्लीमा, मौत से पहले तुम्हें अफसोस तो होगा !

tasleema

by –: लायंस हन्नान अंसारी,

अकसर विवादों से घिरी रहने वाली बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने सोशल मीडिया पर यह बड़ा खुलासा किया है कि उनके पूर्वज हिंदू थे और उनके एक पूर्वज का नाम हरधन सरकार था , जिनका बेटा मिमेनसिंह (बांग्लादेश) में धर्मपरिवर्तन करके मुसलमान बन गया था।नसरीन ने ट्वीट करके कहा है, “मेरे हिंदू पूर्वज का नाम हरधन सरकार था। वे कायस्थ थे। उनके बेटे ने धर्मपरिवर्तन करके इस्लाम धर्म अपना लिया था। ये सूफी प्रभाव था? धर्म परिवर्तन करने के लिए वह मजबूर किए गए थे? मैं नहीं जानती।”

अपने हिंदू प्रशंसकों के पूछने पर कि क्या वह हिंदू धर्म में लौटना पसंद करेंगी,? लेखिका ने ट्वीट करके कहा, “मैं पहले ही तर्कवाद औऱ मानवतावाद में कन्वर्ट हो चुकी हूं। यह फाइनल है।”
कहा जाता है कि जिंदगी के साथ ही मौत की भी शुरुआत हो जाती है। मौत से पहले का वक्त कुछ सीखने, समझने और नेक काम करने के लिए होता है, ताकि इन्सान सुकून के साथ इस दुनिया को अलविदा कह सके। मौत से ही जिंदगी का खात्मा नहीं होता। उसके बाद एक नई जिंदगी और नए सफर की शुरुआत होती है।मेरी आज की यह पोस्ट समर्पित है तीन लोगों के नाम। ये तीन लोग हैं- तस्लीमा नसरीन, द्वारकानाथ कोटनिस और अयमान अल-जवाहिरी। इन तीनों में कई बातें असमान हो सकती हैं लेकिन कुछ बातों की समानता भी है।

इनमें सबसे बड़ी समानता है- ये सभी बहुत प्रतिभाशाली डाॅक्टर हैं। मुख्य पहचान के तौर पर अल-जवाहिरी आतंकी संगठन अलकायदा का कुख्यात नेता है, जबकि तस्लीमा नसरीन विवादित लेखिका हैं। द्वारकानाथ कोटनिस का जिक्र मैं सबसे आखिर में करूंगा।मैं शुरुआत करता हूं तस्लीमा के साथ जिन्होंने अब तक कई विवादित किताबें लिखी हैं। तसलीमा का जन्म 25 अगस्त, 1962 को डॉ रजब अली और उनकी पत्नी एदुल आरा (Edul Ara) के यहां मिमेनसिंह नाम के शहर में हुआ था। यह लेखिका तीन बार शादी कर चुकी हैं। उनका पहला विवाह बंगाली कवि रूद्र मोहम्मद शाहीदुल्लाह और दूसरा विवाह एक बंगाली पत्रकार नयीमुल इस्लाम खान से हुआ था। उनका तीसरा विवाह एक संपादक मिनार महमूद से हुआ था।

मैंने उनकी कुछ पुस्तकों के अंश पढ़े हैं और सोशल मीडिया में आ रहे उनके विचार जानने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि तस्लीमा शायद अपनी जिंदगी के मकसद को लेकर अनिश्चय की स्थिति में रही हैं। एक महिला जो कोशिश करतीं तो शायद कुछ लोगों के लिए फरिश्ता बन सकती थीं, उन्होंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा बेमकसद गुजार दिया।उन्हें धर्म की बड़ाई पसंद नहीं है, मैं उनकी इस इच्छा का सम्मान करता हूं। वे शराब को पसंद करती हैं और गर्व के साथ बताती हैं कि उनका बाॅयफ्रेंड उनसे उम्र में बहुत छोटा है। यह उनकी निजी जिंदगी है जिसका उन्हें पूरा अधिकार है। वे कहती हैं कि दुनिया के हर मर्द एक जैसे होते हैं।

ये उनके निजी विचार हैं जिनका सही-गलत का फैसला करना मैं जरूरी नहीं समझता। मैं उनका समर्पित पाठक नहीं हूं, फिर भी मैं लेखन के उनके अधिकार की इज्जत करूंगा।
तस्लीमा का जिन लोगों के साथ विरोध है और जिन्हें वे पसंद या नापसंद करती हैं, उन पर अपनी राय देने का वक्त अब नहीं रहा। मैं तस्लीमा के बारे में यह पढ़कर हैरान हूं कि एक काबिल डाॅक्टर ने कैसे अपनी तालीम, तरक्की, अक्लमंदी और हुनर में अपने हाथों आग लगा दी।उनका विरोध अपनी जगह है लेकिन उन्हें अपनी काबिलियत का सकारात्मक कार्यों के लिए इस्तेमाल करना चाहिए था। ऐसा न करने का जितना नुकसान तस्लीमा को हुआ उतना ही इस दुनिया को भी है।

तस्लीमा के लिए मैं अभिव्यक्ति के अधिकार का पुरजोर समर्थन करता हूं, लेकिन वह सिर्फ विरोध पर ही आधारित नहीं होनी चाहिए। अगर उन्हें किसी मौलवी, पंडित या पादरी में कमी नजर आती है तो कलम के जरिए उनका विरोध जायज है लेकिन यह भी जरूरी है कि आप बदले में इस दुनिया को क्या देकर जा रहे हैं।इस काबिल डाॅक्टर के बांग्लादेश में प्रवेश पर प्रतिबंध है। तस्लीमा न जाएं बांग्लादेश लेकिन दुनिया इतनी बड़ी है और इतने लोग बीमार व बेसहारा हैं.. उनके इलाज से उन्हें किसने रोका है?दुनिया में लाखों लोग सिर्फ इस वजह से मर जाते हैं क्योंकि उन्हें सही वक्त पर डाॅक्टर की मदद नहीं मिल पाती। क्या ही अच्छा होता, अगर तस्लीमा इस दुनिया के गरीब और बीमार लोगों का सहारा बनी होतीं!

अल-जवाहिरी का मामला इससे ठीक अलग है। यह मशहूर और हुनरमंद डाॅक्टर कुरआन को तो मानता है लेकिन कुरआन की नहीं मानता। इस शख्स ने अपनी ज्यादातर जिंदगी मासूम लोगों का कत्ल करने और बेगुनाहों का खून बहाने में गुजार दी।क्या ही अच्छा होता, अगर वह बंदूक के ट्रिगर के बजाय बीमार और गरीबों की नब्ज से मुहब्बत करता! अगर वह दहशत का ये खूनी खेल छोड़कर लोगों को नई जिंदगी देने की कोशिश करता तो शायद ऊपर वाला भी उसके कई गुनाह माफ कर देता।द्वारकानाथ कोटनिस भी एक डाॅक्टर थे। जब दुनिया में दूसरा महायुद्ध छिड़ा हुआ था और जंग के शोले सुलग रहे थे तब डाॅ. कोटनिस ने चीन में जख्मी और बीमार लोगों की बहुत सेवा की। उन पर ऐसा जुनून सवार था कि दूसरों की जान बचाने में उन्होंने अपने शरीर की भी परवाह नहीं की।

दूसराें की जिंदगी बचाते हुए ही इस युवा डाॅक्टर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। चीन के लोग आज तक उनके बलिदान को नहीं भूले हैं और उन्हें देवता की तरह याद करते हैं।
काश, तस्लीमा और अल-जवाहिरी ने उनके बारे में पढ़ा होता! अल-जवाहिरी के लिए वापसी के रास्ते आसान नहीं हैं लेकिन तस्लीमा के लिए आज भी कई रास्ते खुले हैं। मैं तस्लीमा को अपने फैसले पर सोचने के लिए यह बिनमांगी राय देना चाहूंगा, वर्ना मौत से पहले उन्हें अफसोस तो बहुत होगा।चलते-चलतेः आपके न होने से इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन आपके होने से दुनिया को बहुत फर्क पड़ सकता है। अपनी काबिलियत का एक भाग इस दुनिया को अधिक सुंदर बनाने में लगाइए।

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3 thoughts on “तस्लीमा, मौत से पहले तुम्हें अफसोस तो होगा !

  • January 24, 2016 at 12:30 am
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    Waaah..Ansari sahb..apki soch wa nzariya ko daad deni pdegi…bahut khub aaapne apni soch ko logo tk pahuchya…agr aaapki bat taslima ji tk pahuchti hai to shayd wo apna nazariya bdl le r bhlai ki rah me age aye…umid ki ja skti hai..

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  • January 24, 2016 at 12:34 pm
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    बहुत सही विश्लेषण किया आपने गर आपका विरोध मोलवी पंडित पादरी से है तो आपने क्या किया आप डॉ.है आजाद ख्याल है लेकिन दुनिया वंही है!
    बहुत बढ़िया बात ही बात में करारा व्यंग अल ज़वाहिरी कुरआन को मानता है,लेकिन कुरआन की नही मानता बहुत अच्छा तंज,
    तस्लीमा मौत से पहले तुम्हे अफसोस तो होगा,
    पर फिर कुछ नही होगा लोग तुम्हे तुम्हारी अच्छाई की वजह से कम बुराई की वजह से ज़ियादा जानेंगे,
    आपको बहुत बहुत शुक्रिया इस लेख के लिए!

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  • January 25, 2016 at 10:11 am
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    आप अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात कर रहे हैं, इस विचार के लिए ही लड़ लीजिए, मुस्लिम समुदाय का भला हो जाएगा. मुस्लिमो की जो सबसे बड़ी समस्या है, वो सिर्फ़ यही है. बाकि समस्या तो सिर्फ़ इस एक बीमारी की वजह से पनपती है. बीमारी सिर्फ़ एक है.

    एक डॉ साहब का नाम लेना आप भूल गये. जाकिर नायक. उन्होने कितने लोगो की सेवा करी? वो अभिव्यक्ति की आज़ादी के विरोधी है. कहते हैं, जब हमे पता है कि 2 और 2, चार होते हैं, तो तीन और पाँच पढ़ाने वालो को क्यूँ इजाज़त दी जाए?

    अब पता नही ज़वाहिरी की तरह, हन्नान साहब की नज़र मे, डॉ जाकिर साहब सिर्फ़ क़ुरान को मानते हैं या उसकी भी मानते हैं.

    जिंदगी का मकसद होना चाहिए. ज़वाहिरी और जाकिर साहब, इस जिंदगी का मकसद, परलोक मे कामयाबी मानते हैं, और उस कामयाबी का रास्ता, एक और सिर्फ़ एक व्यक्ति की नकल करना है.
    जाकिर साहब की नज़र मे, उस व्यक्ति की तरह दाढ़ी रखना, टोपी पहनना भी परीक्षा मे एकाध नंबर दिलवा देगा. अब चूँकि, वो व्यक्ति शायर नही है, संगीतकार नही है, वैज्ञानिक नही है, डाँसर नही है, सीए नही है और भी बहुत कुछ नही है, सो इनको भी नही होना.

    ऐसे ऐसे निकम्मे लोग भरे पड़े हैं, इस दुनिया मे जो दूसरी दुनिया के ही ख्वाबो मे पड़े हैं, और उन्हे नींद से उठाने वाला भी कोई नही. जो उठाने की कोशिश करे, उसकी जान के पीछे पड जाए.

    और जो लोग थोड़े बहुत जगे हुए हैं, उन्हे भी ईश्वर का डर दिखा के सुला दोगे.

    जैसे ईश्वर नही हुआ, गब्बर सिंह हो गया. सो जा बेटा नही तो गब्बर आ जाएगा.
    इस दुनिया मे आज लोगो को सुलाने वाले लोग बहुत है, और वो मज़े मार रहे है. जगाने वालो की शामत आ रखी है.

    बाकी तसलीमा के व्यक्तिगत विचारो पे क्या कहना, जब तक वो किसी ओर पे जबरन ना थोपे, या उसकी आलोचना के प्रति असहिष्णु ना हो.

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