ट्रैक टू डिप्लोमेसी पर हाफिज का दाग

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प्रधानमंत्री मोदी के साथ बाबा रामदेव। और बाब रामदेव के साथ प्रताप वैदिक। यह दो तस्वीरे मोदी सरकार से वेद प्रताप वैदिक की कितनी निकटता दिखलाती है। सवाल उठ सकते हैं। लेकिन देश में हर कोई जानता है कि चुनाव के दौर में नरेन्द्र मोदी के लिये बाब रामदेव योग छोड़कर राजनीतिक यात्रा पर निकले थे और वेद प्रताप वैदिक ने सबसे पहले मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाने पर लेख लिखा था। तो फिर पाकिस्तान में ऐसी तस्वीरों को किस रुप में देखा जाता होगा। खासकर तब जब कश्मीर को लेकर बीजेपी लगातार गरजती रही हो और संघ परिवार हमेशा कश्मीर के लिये दो दो हाथ करने को तैयार रहता हो । ऐसे मोड़ पर मोदी के पीएम बनने के बाद पाकिस्तान में भी भारत के ऐसे चिंतकों को महत्व दिया जाने लगा, जिनका पाकिस्तान पहले से आना जाना हो और जिनकी करीबी संघ परिवार या कहे मोदी सरकार की विचारधापरा से हो। वेद प्रताप वैदिक इस घेरे में पाकिस्तान के लिये फिट बैठते हैं, क्योंकि बीते एक बरस के दौर में मनमोहन सरकार के खिलाफ लगातार लिखने वाले वैदिक बीजेपी और मोदी के हक में लिख रहे थे। वैसे माना यह भी जाता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ मोदी के शपथ ग्रहण में आ जाये इसके लिये वेद प्रताप वैदिक भी लगातार अपनी डिप्लामेसी चला रहे थे। वह लगातार पाकिस्तान सरकार के संपर्क में थे। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष में रहने के दौरान बीजेपी ने हमेशा पाकिस्तान को जिस तल्खी के साथ निशाने पर लिया उसके बाद सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार के सामने भी संकट रहा कि वह कैसे संबंधों को आगे बढाये। क्योंकि युद्द या हमले का रास्ता मोदी की उस छवि को धो देता जिसके आसरे विकास का ककहरा चुनाव प्रचार के दौरान देश में पढ़ाया गया। इसलिये ध्यान दें तो पाकिस्तान क पीएम के साथ पहली मुलाकात के बाद से ही विकास की लकीर खिंचने के मद्देनजर ही समझौतों का जिक्र पाकिस्तान से हुआ न। यहां तक कि सार्क सैटेलाइट का जिक्र पर प्रधानमंत्री मोदी ने जतलाया कि भारत का रुख पाकिस्तान को लेकर बिलकुल अलग ही नहीं संबधों को खासा आगे बढ़ाने का है।

इसी दायरे में वेद प्रताप वैदिक ने पाकिस्तान की यात्रा की और पाकिस्तान के प्रभावी लोगों से मुलाकातों में मोदी सरकार के प्रति राय बदलने की पहल भी की। यानी चाहे सरकार ने अधिकारिक तौर पर वैदिक को ट्रैक टू डिप्लामैसी के लिये अधिकृत नहीं किया हो लेकिन वैदिक की समूची पहल सरकार के साथ अपनी निकटता को बताते हुये संबंधों को मोदी सरकार के अनुकुल बनाने की ही रही। लेकिन हाफिज का जिन्न समूची डिप्लोमैसी को ही पटरी से उतार देगा, यह जनादेश की खुमारी में किसी ने सोचा नहीं। और यह खुमारी उतर जाये यह संघ परिवार के लिये जरुरी है। इसीलिये ना आरएसएस ना ही बीजेपी या कहे मोदी सरकार में से कोई वैदिक के बचाव में आया। क्योंकि वैदिक की डिप्लामैसी कश्मीर को लेकर पाकिस्तानियों को लुभाने वाली भी है और कश्मीर पर संघ की धारा के खिलाफ भी। याद कीजिये तो कश्मीर के नक्शे को भारत के हक में बदलने के लिये संघ हमेशा से ताल ठोंकते आया है। यानी आरएसएस हमेशा इस हक में रहा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को भारत अपने कब्जे में ले ले। लेकिन संघ की इस मोटी लकीर पर भारत पाकिस्तान के बीच एलओसी हमेशा से हावी रही है। यानी दिल्ली की कोई सरकार एलओसी को मिटा दें और पीओके को अपने कब्जे में ले ले यह किसी सत्ता ने सोचा नहीं। या कहे इस दिशा में कभी कोई कदम बढ़ाने के लिये कदम नहीं बढाये। लेकिन नरेन्द्र मोदी के पीएम बनते ही संघ परिवार के विचार राजनीतिक धारा के तौर पर रेगने लगे इससे इंकार नहीं किया जा सकता । क्योंकि पहली बार मोदी के चुनाव प्रचार में संघ परिवार राजनीतिक तौर पर ना सिर्फ सक्रिय हुआ बल्कि अपनी विचारधारा को भी राजनीतिक तौर विस्तार देने
के लिये मैदान में उतरा। और संघ लगातार कश्मीर को लेकर अपनी बात को कैसे रखता रहा यह बीते 12 बरस के पन्नो को पलटकर समझा जा सकता है। 2002 में केन्द्र में वाजपेयी की सरकार थी लेकिन उस वक्त भी आरएसएस के तेवर कश्मीर को तल्ख थे ।

2002 में तो हिन्दुवादी पार्टी के नाम पर आरएस अपने उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारने के लिये भी तैयार हुआ था । और विधानसभा चुनाव में कई जगह संघ का मोर्चा और बीजेपी उम्मीदवार चुनावी
मैदान में टकराये भी। फिर दो बरस पहले संघ के मुखिया मोहन भागवत ने दशहरा भाषण के वक्त नागपुर में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को अपने कब्जे में लेने की खुली वकालत यह कहकर की थी। सेना भेजकर पीओके को अपने कब्जे में ना लेना सरकारों की कमजोरी रही है। अब सवाल है कि संघ के विचारों को मोदी सरकार अपनायेगी या नहीं। क्योंकि पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध बनाने की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी के शपथग्रहण के साथ ही शुरु हुई । और जिस तरह पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ भारत आये और उसके बाद पाकिस्तान जाकर वेद प्रताप वैदिक ने नवाज शरीफ से मुलाकात की । उसने ही इस सच को बल दिया कि पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्तो की खोज में ट्रैक टू डिप्लोमैसी का रास्ता बनाया जा रहा है । और इसी कड़ी में हाफिज सईद से वैदिक की मुलाकात हुई । लेकिन सरकार ने यह कहकर तो पल्ला झाड़ लिया कि वैदिक और हाफिज सईद की मुलाकात की कोई जानकारी उन्हें नहीं थी । लेकिन यही से सबसे बडा सवाल उठता है कि आखिर सरकार को क्या पता नहीं चला कि वेद प्रताप वैदिक हाफिज सईद से मुलाकात कर रहे हैं। क्या पाकिस्तान में भारत के हाईकमीशन को कोई जानकारी नहीं थी । क्या भारत की खुफिया एंजेसी वाकई
अंधेरे में रही । जबकि पाकिस्तान गये भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य तो लौट आये लेकिन वैदिक ने अपना वीजा 20 दिन बढ़ाया । और पाकिस्तान ने वैदिक को 20 दिन रहने की इजाजत भी दी। तो यह असंभव है कि भारत और पाकिस्तान के उच्चायोग के अधिकारियो को जानकारी ही ना हो कि वैदिक पाकिस्तान में क्यों रुक रहे हैं। फिर दूसरा बड़ा सवाल है कि हाफिज सईद के साथ जब कोई मुलाकात बिना कई दरवाजों से इजाजत मिलने से पहले हो ही नहीं सकती है तो फिर अचानक कैसे वैदिक की मुलाकात हाफिज सईद से हो गयी। जबकि लाहौर में हर कोई जानता है कि जौहर टाउन मोहल्ले में हाफिज सईद के घर तक कोई आसानी से नहीं पहुंच सकता है। पत्रकार को भी हाफिज सईद से मुलाकात से पहले कई माध्यमों से गुजरना पड़ता है। खासकर अमेरिका ने जब से हाफिज सईद को आतंकवादी करार दिया है, उसके बाद से हाफिज की सुरक्षा का सबसे मजबूत घेरा आईएसआई है। अगर वेद प्रताप वैदिक को इन चैनलों से नहीं गुजरना पड़ा तो इसका मतलब साफ है कि सरकार को पहले से पता था कि मुलाकात होगी या मुलाकात होनी चाहिये। यह जानकारी भारतीय उच्चायोग को भी जरुर होगी। फिर वेद प्रताप वैदिक की कोई अपनी पहचान एसी नहीं कि जिससे लगे कि पाकिस्तान की पीएम से लेकर हाफिज सईद तक मिलने को बेताब हो। क्योंकि समाचार एंजेसी में काम करने के अलावे अंतरराष्ट्रीय विषयों पर कालम लिकने वाले वेद प्रताप वैदिक दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर क्लास भी लेते रहे है । यानी सरकार अगर पीछे ना खड़ी हो तो फिर पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष से लेकर दुनिया के सबसे बडे आतंकवादी का वैदिक से मुलाकात के लिये मचलने का कोई मतलब नहीं है। तो सवाल है कि क्या वाकई ट्रैक टू डिप्लोमेटक ट्रिप पर पाकिस्तान गये थे। इसीलिये प्रधानमंत्री मोदी को लेकर खुले विचार हाफिज सईद व्यक्त कर रहा था और वे प्रताप वैदिक सुन रहे थे।

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5 thoughts on “ट्रैक टू डिप्लोमेसी पर हाफिज का दाग

  • July 17, 2014 at 8:41 am
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    अफ़सोस चुनाव हारने पर भी कांग्रेस और राहुल को अक्ल नहीं आई वो वैदिक के मुद्दे पर वैसी ही घटिया बेहूदा राज़नीति कर रहे हे जैसा की भाजपा और सुषमा जी ”एक के बदले दस सर लाओ ” जैसी बेहूदा बाते करके करती हे कॉंग्रेस्स को समझ नहीं आता की घटिया उग्र और युद्धप्रिय लोग तो भाजपा शिव सेना जैसी पार्टियो को ही वोट देंगे कॉंग्रेस्स को तो अच्छी सेकुलर उदार शांतिप्रियता की ही बातो से वोट मिलेंगे कोई कह सकता हे की नहीं जी नुक्सान होगा तो नुकसान तो फिर भी हुआ न कोंग्रेस लगभग ख़त्म हो गयी जो लोग जीते वो अपने से जीते कांग्रेस से नहीं अब इससे ज़्यादा नुक्सान क्या होगा

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    • July 17, 2014 at 6:29 pm
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      कॉमेंट में एक गलती हो गयी हे ” —–घटिया उग्र और युद्धप्रिय लोग तो भाजपा शिव सेना जैसी पार्टियो को ही वोट देंगे ” यहाँ में ” कुछ ” लिखना भूल गया क्षमा चाहूंगा

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  • July 17, 2014 at 8:41 am
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    भारत के हर दूसरे बड़े और कामयाब आदमी की तरह वैदिक जी के साथ भी कई अच्छे बुरे किस्से किवदंतियां दुमछल्ले की तरह लगी गई हे खेर में उनका सम्मान इस वजह से करता हु की चाहे जो हो जैसे हो मगर वो भारत पाक मित्रता के काम में लगे हुए हे विभिन पाक न्यूज़ चैनेलो पर आते हे पिछले साल भी जब इन्ही दिनों जब एल ओ सी विवाद पर पाक मिडिया में बात होरही थी की भारतीय मिडिया न्यूज़ चेनेल इतना युद्धप्रिय क्यों हे तब वैदिक जी ने ही उन्हें समझया था की युद्ध वुध की बात नहीं हे इन्हे हर वक्त कोई न कोई तमाशा चाहिए ही होता हे अब इस साल वो खुद ही तमाशे का शिकार हो गए (इससे न्यूज़ चैनेलो को फायदा भी होता हे और इनके गुरु घंटालो को आराम भी मिलता हे ) वैदिक जी जिस मिशन में लगे हे उसके लिए में उनका सम्मान करता हु पाकिस्तान तो तरुण विजय जी भी जाते रहते हे मगर ज़ाहिर हे उनका मिशन नहीं हे भारत पाक दोस्ती मध्य एशिया ईरान तक सड़क और रेल हमें किसी भी कीमत पर चाहिए वैदिक जी ये समझते जानते और मानते प्रचारित करते हे इसलिए उनका सम्मान करता हु कुछ भी करके पाक को साथ लाओ साधो ताकि यहाँ रोटी कपडा मकान की 100 करोड़ लोगो की समस्या खत्म हो बाकी बाद में देखा जाएगा

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  • July 17, 2014 at 8:45 am
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    sikander hayat • 2 days ago
    कमाल हे उधर पाकिस्तान में भी जितने भी पत्रकार या बुद्धजीवी भारत के साथ दोस्ती के तलबगार हे उनके बारे में भी कटरपन्ति या उनके विरोधी यही कहते हे की ये हर हुकूमत की सेवा करते हे
    sikander hayat sikander hayat • 2 days ago
    मोदी जी फिलहाल अमित शाह के अलावा किसी के सर पर हाथ नहीं रख रहे दीखते हे ऐसा लगता हे की मोदी जी के करीब होने की कोई जंग छिड़ी हुई हे उसी का एक मोर्चा ये ” वैदिक आहूति ” लग रही हे
    sikander hayat • 2 days ago
    एक बात और हम मुशरफ का स्वागत कर चुके हे मुंबई संसद हमले से अधिक लोग कारगिल में शहीद हुए थे और कारगिल सिर्फ सिर्फ मुशरफ की निजी खफ्त थी कारगिल मुशरफ साहब का बचपन का सपना था जिसे सीने से लगाय वो कई बार हुक़ुमरानो खासकर बेनज़ीर जी की झिड़की भी खा चुके थे खेर अपना सपना जो उन्होंने हज़ारो लोगो की जान लेकर ” अधूरापूरा ”किया तो मुशरफ ज़्यादा बड़े अपराधी हुए जिनका इस्तकबाल अटल मनमोहन दोनों कर चुके हे

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  • July 17, 2014 at 11:17 pm
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    सवाल ये भी उठता हे की वैदिक जी को क्यों इतना चीख चीख कर अपना बायोडेटा बताना पड़ रहा हे इसका कारण आतमुगदता के साथ साथ ये भी हो सकता हे की किस तरह से हमारे यहाँ अंग्रेजी मिडिया तो खेर हिंदी वालो को कुछ समझता ही नहीं हे साथ साथ खुद हिंदी वाले भी किसी हिंदी वाले ( जब तक वो उनके ऊपर कृपा न करे न कर चूका हो ) को कुछ समझते ही नहीं हे हिंदी वालो में भी अंग्रेजी वालो की बड़ाई करने का रोग बढ़ता ही जा रहा हे
    वैदिक साहब दुआरा बार बार अपना बाओडेटा बाचने पर उनके खिलाफ सबसे अधिक हल्ला हिंदी वाले ही कर रहे हे की वो आत्मुग्द हे बड़बोले हे ये हे वो हे चलिए हे सवाल ये हे की क्या हिंदी वालो ने तब इतना हल्ला किया था जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक खुद को पी एम् के बाद दूसरी कुर्सी का आदमी बताते थे – ? तब तो चू भी नहीं की होगी

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