“जी नहीं आज़ादी गांधी नेहरू ने ही दिलवाई थी”

nehru-gandhi

अजित डोभाल जी राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार हे एक बेमिसाल जासूस रहे रिटायरमेंट के बाद विवेकानंद फाउंडेशन से जुड़े जिसकी मोदी सरकार में विशेष भूमिका आप पढ़े http://tehelkahindi.com/what-makes-vivekananda-international-foundation-modi-governments-favourite/ ऊपर वीडियो में अजित साहब और स्वामी जी भारत की आज़ादी का क्रेडिट सुभाष चंद्रबोस जी और आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को देते हे सुभाष बाबू की ईमानदारी और देशभक्ति को सेल्यूट करते हुए भी हम विनम्रता के साथ ये कहना चाहेंगे की ये कहना की भारत की आज़ादी का क्रेडिट सुभाष बाबू और उनकी आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को ही हे ये हमें तो बोस बाबू के सम्मान और उन्हें भारत की आज़ादी का क्रेडिट देने से अधिक गांधी नेहरू से आज़ादी की लड़ाई में विजय का क्रेडिट लेने का प्रयास अधिक लगता हे जो आज की चुनावी राज़नीति में भी अनुकूल हे क्योकि गांधी नेहरू कमजोर तो मतलब भारत में सेकुलरिज़म की जड़ कमजोर और कांग्रेस पार्टी भी कमजोर ये कमजोर तो एक पार्टी विशेष को ही इसका सबसे अधिक राज़नीतिक फायदा मिलेगा ? पिछले दिनों अपूर्वानंद जी लिखते हे की ” स्वाधीनता आंदोलन में नेहरू के प्रतिपक्षी के रूप में सुभाषचन्द्र बोस का नाम लिया जाता है. नेहरू-बोस के पत्राचार को पढ़ने से दोनों के राजनैतिक दृष्टिकोण का फ़र्क़ समझ आता है. लेकिन उसे सबसे सटीक तरीक़े से समझा था तरुण भगत सिंह ने.वह सुभाष को जुनूनी राष्ट्रवादी और नेहरू को अन्तरराष्ट्रीयतावादी मानते थे और नेहरू को ही नौजवानों के लिए उपयुक्त नेता मानते थे.नेहरू का राष्ट्रवाद कभी भी सुभाष की तरह बदहवास नहीं हो सकता था कि हिटलर का सहयोग करने को तैयार हो जाए.” लेखक पेट्रिक फ्रेंच भारत की आज़ादी पर अपनी किताब ” आज़ादी या मौत ” में नीरद सी चौधरी के हवाले से लिखते हे की पेज 267 ‘ बोस के बारे में काफी शानदार दंत कथाय प्रचलित हे बंगाली मध्यवर्ग भावनावश यह मानने को बाध्य हे की सुभाष बोस के माध्यम से उन्होंने भारत को राज़नीतिक सवतंत्रता दिलाने में एक निर्णायक भूमिका निभाई हे और जहा तक संभव हो वे ग़ांधी जी की भूमिका को नीचा दिखाते हे ‘ कांग्रेस के अस्तित्व में आने के बाद पहले तीस वर्षो के दौरान इसमें बंगालियों का वर्चस्व रहा , लेकिन गांधी जी के उदयीमान होने के बाद उन्हें एक तरफ हटा दिया गया सं 1917 से लेकर आज़ादी तक केवल चितरंजनदास और सुभाष बोस ही केवल ऐसे बंगाली हुए जिन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर काम किया नीरद चौधरी ने बोस को लेकर जो दर्ष्टिकोण प्रस्तुत किया उसे आज बहुत ही कम भारतीय स्वीकार करते हे राष्ट्रिय नायक के तौर पर उनकी काफी ऊँची छवि हे और यह भी उनके बारे में व्याप्त राज़नीतिक सांस्कर्तिक मांगो को देखते हुए निश्चित लिया गया पेज 281 ”आज भारत में बोस की झूठी प्रशंसा करना अपने चरम पर हे . वह मनोवैज्ञानिक रूप से एक ऐसे देशभक्त का अहम किरदार हे जो ब्रिटिश के खिलाफ खड़ा हुआ , जबकि सच्चाई यह हे की उसकी इंडियन नेशनल आर्मी का का सामरिक महत्व अप्रासंगिक हे यह ब्रिटिश को भारत से खदेड़ने में कोई भूमिका नहीं निभा पाई , हालांकि आईएनए पर चले गए अभियोगों ने साम्राज़ी प्रशासन के अस्थायीकरण में जरूर सहायता बोस का मानना था की ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेकना हमारा नैतिक दायित्व हे और हमें यह लक्ष्य किसी भी कीमत पर हासिल करना हे इसी वज़ह से उसने जर्मन और जापानियों से भी संधि कर ली थी और अजीबोगरीब ढंग की सैन्य गतिविधिया भी चलाई . आखिरी शब्द ढाका अखबार के संपादक के थे ” में मानता हु की सुभाषबाबू एक देशभक्त थे लेकिन वह — और अदूरदर्शी थे अपनी जवानी के दिनों में भी ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ता रहा लेकिन में आपको एक बात बताना चाहता हु अगर मुझसे पूछा जाता की आप जापान जर्मनी और ब्रिटेन में से किसे अपना शासक चुनेंगे तो में हमेशा ब्रिटिश को ही चुनता ” . सुभाष बाबू का सम्मान करते हुए भी हम कहेंगे की भारत की आज़ादी का सबसे अधिक क्रेडिट गांधी नेहरू को ही था इन्होने ही एक लोकतान्त्रिक सेकुलर भारत गढ़ा था ये ही थे जो भारत नाम का विचार कोने कोने गाव गाव तक लेकर गए थे ये ही थे जो भारत के साथ साथ बाकी सभी देशो की भी चिंता करते थे ये ही थे जिन्हे दुनिया भर के लोग जनता लेखक नेता अधिकारी अध्यापक बुद्धिजीवी जानते थे मानते थे सवांद करते थे पत्राचार विचार विमर्श करते थे सारी दुनिया में इनकी साख थी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ी आर्थिक ताकत था अमेरिका और फासिज़्म के खिलाफ लड़ाई में दो करोड़ कुर्बानिया देकर और बर्लिन पर झंडा गाड़ कर सबसे अधिक प्रतिष्ठा के मुकाम पर था सोवियत संघ ये दोनों ही राज़ी न होते तो ना इज़राइल बनता और ना ही भारत को फ़ौरन आज़ादी देने का फैसला होता इन दोनों देशो में किसकी गुडविल थी क्या जर्मनी जापान के साथी बोस बाबू की या गांधी नेहरू की ? खुद ही फैसला कीजिये पाठको ? विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन कमजोर हो चूका था भारत पर वो तब ही कब्ज़ा रख सकता था जब एक बड़ी ब्रिटिश फ़ौज़ रखने की आर्थिक और सैनिक सहायता अमेरिका उसे देने पर राज़ी होता मगर दुनिया जानती हे की अमेरिका तो पहले से ही भारत को आज़ाद ही करने पर दबाव डाल रहा था अमेरिका और उसकी जनता का ये दबाव की भारत को आज़ाद करो किसके लिए था क्या बोस बाबू के लिए जिन्होंने अमेरिका के दुश्मन जापान के साथ गठबंधन किया था या उस आदमी ( गांधी ) के लिए जिसका अमेरिका का सबसे बड़ा वैज्ञानिक आईंस्टीन प्रशंसक था ? कहा जाता हे की ब्रिटिश सरकार डर गयी थी की इंडियन नेशनल आर्मी उसके खिलाफ लड़ी थी इससे ब्रिटिश घबरा गए थे सवाल ये हे की उस इंडियन नेशनल आर्मी को किसने रोका था क्या अमेरिकी सोवियत फ़ौज़ ने ? नहीं न बोस बाबू की इंडियन नेशनल आर्मी के खिलाफ भी भारत की फ़ौज़ ही लड़ी थी जिसमे भी भारतीय ही थे फिर क्यों भला ब्रिटिश इतना घबराते ? घबराते तो तब जब सारी की सारी भारतीय फ़ौज़ बगावत कर देती फिर अमेरिका या सोवियत की मदद से ब्रिटिश भारत को जीतते तब अलग बात होती . सच तो यही हे की गांधी नेहरू और कांग्रेस के बड़े बड़े आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन की नीव हिलायी ( बकौल चे गुएरा ) गांधी नेहरू ने अपनी उदारता महानता वैश्विकता से दुनिया का दिल जीता जनमत बनाया . जो भी था ब्रिटेन अमेरिका लोकतान्त्रिक देश थे ही जहा जनमत की बुद्धिजीवियों की राय की पूरी तरह अनदेखी नहीं कर सकते थे इसी कारण विश्वयुद्ध के बाद ये जानते हुए भी की भारत गया तो ब्रिटेन का सारा सम्राज़ धीरे धीरे हाथ से निकल जाएगा ( निकला भी ) फिर भी ब्रिटेन ने भारत को आज़ादी देना स्वीकार किया और गांधी नेहरू के प्रयासों से एक महान लोकतान्त्रिक सेकुलर भारत बनाया गया .

https://www.youtube.com/watch?v=SKpl7v_c-Qo

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41 thoughts on ““जी नहीं आज़ादी गांधी नेहरू ने ही दिलवाई थी”

  • January 10, 2015 at 3:42 pm
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    अफज़ल भाई ये ऊपर ” बाय अजित डोभाल ” सही नहीं हे लेख मेरा हे वहा प्लीज़ मेरा नाम दीजिये नीचे वीडियो और भाषण अजित साहब का हे शुक्रिया . बाकी एक बार फिर कहूँगा पाठको हमेशा याद रहे की गांधी नेहरू कमजोर तो मतलब एक सेकुलर लिबरल लोकतान्त्रिक समाजवादी भारत की जड़ कमजोर हमेशा याद रहे

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  • January 11, 2015 at 10:20 am
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    अजित डोभाल साहब भारत के बाहर भी काफी चर्चा में हे http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2015/01/150104_wusatullah_blog_letter_ajit_doval_rns यहाँ भी में भी उनसे सहमत नहीं हु जो उन्होंने पॉलिसी बताई वो दुनिया के किसी भी कोने में सही हो भी सकती हे मगर भारतीय उपमहादीप में नहीं क्योकि यहाँ इंसानी जान की कोई कीमत नहीं हे यहाँ भी डोभाल साहब से सहमत नहीं हे https://www.youtube.com/watch?v=2IjWF-8lTu8 हमारा मानना हे की वो कोई ज़बरदस्त सीनियर स्पाई होंगे दुनिया भर में ऐसे बहुत से ऐसे बेमिसाल जासूस लोग दसियों बीसियो साल छुप कर पहचान बदल कर जासूसी करते हे वार्ना क्यों भला ऐसा कोई शख्स जो पक्का सनातनी हे और मुस्लिम दिख कर भी पूजापाठ मूर्ति पूजा करता हे जिसका परिवार भी बकौल डोभाल साहब की खत्म कर दिया गया था वो अकेला हे तो फिर भला वो पाक में क्यों रहेगा ? वो भी ऊपर से मुस्लिम बनकर क्यों भला ? उसी भारत हरिदूार बनारस आ जाना चाहिए था चाहे जैसे भी ? या फिर पाकिस्तान में भी कई हिन्दू सिख मंदिर तीर्थ हे वहा वो रहता पूजा पाठ में लीन रहता तो भी सही था अब ये बात मुझे तो अपनी मोटी अक्ल से लगता हे की ये युवाओ में हिंदुत्व के प्रति जोश जगाने के लिए हे जब जोश जागेगा तो वो जोशीला फिर कोई ममता मुलायम नितीश केजरीवाल शरद पवार नवीन राहुल के लिए तो वोट करेगा नहीं ?

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    • April 16, 2015 at 9:10 am
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      अजित डोभाल जिस निती की बात करते है वो एन्टी भारतीय लोगो के लिए है । पाकिस्तान के लिए है पर भारत में एन्टी इन्डियन और पाकिस्तान प्रस्त लोगो की अलग इज्जत होती है । अगर आज को हिन्दू नेता पाकिस्तान के खिलाफ बोलता है ।उसे मुस्लिम विरोधी होने का रंग दे दिया जाता है। ये विचार नही किया जाता किस संदर्भ मे कहाँ गया है। कट्टर पन्थी विचार को मरोड़ कर ऐसा रंग देते है की भारत में मुसलमानो के खिलाफ साजिश हो रही है। हिन्दु को इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कोई पुजा कैसे करता है । हम मजार में भी मत्था टेक लेते है। चर्च में भी चले जाते है। परन्तु जब हमारी पुजा पद्यति की बात आती है । हमारे धार्मिक स्थल की होती है हम आसान निशाना होते है। क्योंकि बुद्धि से खाली बुद्धिजीवीयों को हमारे ऊपर तंज कसने पर कोई परेशानी नही होती बाकि धर्म पर जान जाने का खतरा होता है। घर वापसी पर हंगामा खड़ा करने वाले धर्मान्तरण पर चुप हो जाते है। गैर को हम हिन्दू नही बना अपनों को वापस बुला रहे है। घर वापसी का विरोध करने वाले धर्मानतरण पर चुप हो जाते है। दोनों काम को बन्द कर देना चाहिए फिर ऐसो की दुकनदारी नही चलेगी

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      • April 19, 2015 at 12:07 pm
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        ये शायद आपका इस साइट पर पहला कॉमेंट हे यहाँ आपका बहुत बहुत स्वागत हे जो आप कह रहे हे वो अलग मुद्दा हे यहाँ मेरा कहना ये हे की एक पक्का सनातनी भला मुस्लिम दिखने को सवांग करके पाक में क्यों रहना चाहेगा क्यों भला ? जबकि उसके कोई आगे पीछे भी नहीं हे तो फिर उसे थोड़ा सा खतरा उठकर भारत आजाना चाहिए आखिर पाक में भी तो सवांग करके आप कुछ खतरा ही उठा रहे हे उन्हें तो भारत आ जाना चाहिए भले ही उन्हें यहाँ जेल में रहना पड़ता मगर यहाँ वो खुल कर अपनी मूर्तिपूजा तो कर सकते थे यही कह रहा था

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  • January 11, 2015 at 11:50 am
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    Why Muslims feel offended by Such a great Institute of repute…………….Thanks for this info , I would highly recommend the Noble work done by the league of greatest intellectuals of Great India………….

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  • January 11, 2015 at 1:14 pm
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    आने वले दिनो मे लग्त है के भारत को अजाद करने का शरय नाथु राम गोद्से को जाये गा . गान्धि, नेहअरु को लोग भुल जये गे

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    • January 11, 2015 at 3:27 pm
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      गांधी नेहरू के कमजोर होने का मतलब हे की भारत में कांग्रेस – सेकुलरिज़म समाजवाद सर्वोदय लोकतंत्र आदि की जड़े कमजोर और एक पार्टी और संघटन का बेहद फायदा कांग्रेस की तो हमें चिंता नहीं हे बाकी की बहुत चिंता हे इसलिए हम गांधी नेहरू से आज़ादी का क्रेडिट लेकर उन्हें कमजोर करने की बात का कड़ा विरोध करते हे कांग्रेस का बेड़ागर्क होने से तो अब शायद ही कोई रोक सके जिस पार्टी में सिब्ब्बल खुर्शीद चिदंबरम ( जिन्होंने सत्ता की मलाई लगातार दस साल तक खायी और अब पार्टी को अपने हाल पर छोड़ कर अपने काम धंधो में बिजी हे लानत हे ऐसे नेताओ पर )

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  • January 11, 2015 at 8:31 pm
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    सुभाष चंद्रा नेताजी के वाल पोस्ट से साभार–

    जातिगत जनगणना के फायदे::::
    1.अगर जातिगत जनगणना हो जाती है तो यह पता चल जाएगा की किस जात की कितनी संख्या है ,और उसको उस अनुपात में आरक्षण द्वारा सरकारी नौकरी दे दी जायेगी ,ताकि सभी जातियों की बेरोजगारी दूर कीजा सके !!
    2. जातिगत जनगणना से यह जानकारी मिल जायेगी की कौन सी जात कितनी पढ़ी लिखी है और कौन से जात मेंकितने अनपढ़ है ताकि उन जातियों को विशेष रूप से एजुकेशन लेने के लिए प्रेरित किया जाय और उनकी अशिक्षा दूर की जा सके !!
    3. जातिगत जनगणना से OBC की सही आबादी मालुम हो जायेगी ताकि बार बार हाई कोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में बैठे ब्राह्मण यह न बोल सके की हमें ओबीसी की सही आबादी नहीं मालुम है इसलिए उनको रिजर्वेशन कितना दिया जाय यह हम नहीं कह सकते
    4. जातिगत जनगणना से तह भी पता चल जाएगा की किस जातियों में कितने IAS IPS IRS IFS कितने टीचर कितने लेक्चरर कितने vice चांसलर है और कितने झाड़ू खाते में है कितने टेम्परेरी है कितने परमानेंट जॉब वाले है ताकि सारी असलियत सामने आ जाए की कौन सी जात का कब्ज्जा कहा है और कौन सी जात कहा कहा से गायब है !!
    5. जातिगत जनगणना से सबसे ज्यादा फायदा 52% से जयादा आबादी वाले ओबीसी को होगा क्योकि संख्या मालूम होने पर ही वो उसी अनुपात में भारत के बजट में अपनी भागीदारी माग पायेगा ,मतलब अगर 20 लाख करोड़ का बजट है तो उसके हिस्से में 11 लाख करोड़ रुपये आयेंगे
    6. जातिगत जनगणना से यह भी पता चल जाएगा की कौन सी जातियों में महिलाए ज्यादा है और कौन सी जातियों में महिलाए कम है ,किस जात में बूढ़े ज्यादा है किस जात में बच्चे ज्यादा है ताकि उस हिसाब से कन्या भ्रूण ह्त्या ,बच्चो का कुपोषण रोका जा सके
    7. जातिगत जनगणना में यह भी पता चल जाएगा की किस जात के पास पक्का मकान है और किस जात के लोगफुटपाथ पर सोकर जीवन बिता रहे है ताकि गरीब और पिछड़ी जातियों को पक्के मकानों का बंदोबस्त कियाजा सके
    8. जातिगत जनगणना में यह भी पता चल जाएगा की किस जात के पास कितनी खेती है कितनी प्रोपर्टी हैऔर कौन सी जात भुखमरी से मर रही है ताकि उन जातियों की दशा सुधारने के लिए अलग से बजट का प्रावधान किया जा सके
    9. जातिगत जनगणना से सभी जातियों को आर्थिक सामाजिक भौगोलिक स्तिथि का सही आकलन हो पायेगा
    10. जातिगत जनगणना भारत में समानता स्थापित कर सभी लोगो को उनकी सभी प्राकृतिक और भौगोलिक संपदाओ में बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करेगा
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    • January 29, 2015 at 5:42 pm
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      जातिगत जनगणना, मतलब देश के 125 करोड़ लोगो का आंकलन दस या बारह श्रेणियों में करना, क्या यही उपलब्धि है देश की आजादी के इतने सालो बाद, फेसबुक, और whatsapp घर गर पहुँच गए और भारत सरकार और नीति आयोग बस दस या बारह रेट हुए नाम ही सीख पाया, अगर जाति के आधार पर ही नीति निर्धारण करना है तो नौकरियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओ और विश्वविद्यालयों की जरुरत ही क्या है, बस जाति पूछो और काम पर लगा दो,
      दरअसल हमें जरुरत देश की जीडीपी बढ़ने की नहीं बल्कि देश की समझ विकसित करने की है,

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  • January 14, 2015 at 8:17 pm
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    एक दूसरे ब्लॉग से sikander hayat
    January 14,2015 at 10:12 AM EET
    पाठको शरद भाई ने जो गांधी नेहरू सुभाष भगत सिंह की तुलना की वो बिलकुल गलत हे ये सब मोदी संघ के लिए समर्थन जुटाने के प्रोपेगण्डे हे और कुछ नहीं हम इस विषय पर खबर की खबर पर लेख ” जी नहीं आज़ादी गांधी नेहरू ने ही दिलवाई थी ” लिख चुके हे शरद भाई की अजीबो गरीब थ्योरी माने तो किसी को भी नेतर्त्व के लिए जिन्दा नहीं रहना चाहिए और मोदी जी ने कोई संघर्ष नहीं किया वो भी वंशवाद की वजह से ही आगे बढे थे भारत में नब्बे % लोग वंश और किस्मत यानी सही समय पर सही जगह होने से ही आगे बढ़ते हे मोदी जी ने ना अपनी मेहनत से बहनो की शादिया ना भाइयो को पढ़ाया उन्होंने तो परिवार छोड़ दिया था ( गृहदाह में जलने वाले वीर सेनिको से काम नहीं होते- प्रेमचंद ) सही समय पर उन्हें अविवाहित इनामदार साहब मिले जिन्होंने पुत्र की तरह सरंक्षण दिया और उसी संरक्षण में मोदी जी आगे बढे तो ये भी कोई संघर्ष नहीं कहा जा सकता हे उनकी किस्मत थी संघर्ष से आगे बढ़ने वालो में तो एक विनम्रता एक उदारता सवतः आ जाती हे जिसके मोदी जी में कोई खास लक्षण नहीं दीखते हे
    जवाब दें(sikander hayat को जवाब )- sikander hayat
    January 14,2015 at 12:44 PM EET
    गृहदाह में जलने वाले गृहस्त लोग युद्ध के सेनिको से कम नहीं होते हे अब देखे की मोदी जी ने तो शादी की ना वो अपने परिवार के साथ रहे किशोरावस्था में ही उन्होंने घर छोड़ दिया था फिर किस संघर्ष की बात करते हे मोदी जी ? हम अपनी खुदकी थोड़ी ही इतनी चिंता में घुलते हे जितनी परिवार से जुडी चिन्ताओ में ? मोदी जी तो परिवार के साथ रहे ही नहीं बस बचपन में एक दो दफे चाय क्या बेच ली वो भी चाय वाले नहीं बल्कि शायद चाय ठेकेदार के बेटे के रूप में क्या बड़ी बात हो गयी सच तो ये हे की बचपन में तो ये सब अभाव या कुछ भी हो वो सब इतना सालता भी नहीं हे तब तो हम माँ बाप की छाया में मस्त होते हे असली संघर्ष तो कुछ बड़े होने पर ही शुरू होता हे जब हमें चीज़े हालात समझ में आने लगते हे बहनो की शादिया भाइयो की पढ़ाई मकान का किराया माँ या बाप की बीमारी आदि बाते सामने आती हे तो तब ही तो 17 18 की आयु में मोदी जी अपना घर और बीवी को छोड़ कर जा चुके थे जिम्मेदारिया उन्होंने ली नहीं जिम्मेदारिया और उनके तनाव उसीको मिलते हे जो उन्हें लेने चाहे ना लेना चाहे तो कोई जिम्मेदारियों के तनाव दबाव खिचाव किसी को भी ज़बरदस्ती नहीं दिए जा सकते हे जैसे देखे की कभी नहीं पढ़ा सुना की मोदी जी ने अपनी तरफ जसोदबेंन की दूसरी शादी कराने की उनका घर बसाने की कोई कोशिश ही की हो कभी ? सीधी सी बात हे की वो जिम्मेदारिया के तनाव नहीं लेते थे फिर किस संघर्ष का ढोल पीटा जाता हे ?

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    • January 15, 2015 at 7:31 pm
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      आप अलग से हमारे बारे मे हमे बताये बिना यहा-वहा क्यो लिखते है हयात भाई, इसी ब्लॉग पर हम भी है और आप भी तो फिर इंतजार किसका है :)…..आपके काफी बार काफी कुछ लिखा मगर आप हमारे मिजाज के बारे मे जानते है कि हमसे सम्बंधित बात पर हमे अपनी बात कहने का पूरा हक है , लगता है आपकी बजाय डिस्कसन हमे ही हमे ही शुरु करना पड़ेगा , तो चलिये ऐसा ही सही !! पहले कॉमेंट मे हम आप द्वारा हम पर उठाये गये कुछ सवालो की असलियत और पूर्वाग्रह का फर्क सामने रखने की कोशिश कारते है…..

      1-आप कहते है हमने नेहरू गाँधी की तुलना सुभाष और भगत सिंह से की है??……हमने आज तक किसी डिस्कसन मे कभी नेहरू जी का नाम तक नही लिया तो उनकी तुलना वाला आपका पॉइंट कैसे संभव है ??…………

      2-हमने हर बार और बार-2 गाँधी जी को “दूसरो की तरह ही” एक स्वतंत्रता सेनानी माना है , अगर आपने इसके उलट कुछ देखा हो तो उस हिस्से को यहा पेस्ट करके सामे रखिये, हम सिर्फ अपने लिखे पर ही कुछ बोल सकते है.

      3-गाँधी जी का विरोधी नेहरू जी का समर्थक नही हो सकता का क्या मतलब है ?? दोनो की लाइफ के कई अलग-2 पहलू है कैसे हर बार दोनो को उससे जोड़ा जायेगा ?? दांडी मार्च से नेहरू जी को कैसे जोड़ेंगे आप ?? अगर कोई देश के पहले प्रधान मंत्री से सम्बंधित बात करना चाहेगा तो उसमे गाँधी जी का नाम कैसे आयेगा ??……. आपके इन्ही पूर्वाग्रहो के लिये हमारा और आपका आमने-सामने का डिस्कसन बेहद जरूरी है !!…………
      तीनो पायंट्स पर आपकी प्रतिक्रिया मिले तब आयेज का डिस्कसन शुरु करते है…शुक्रिया

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  • January 15, 2015 at 11:00 pm
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    यह लेख 10 तारीख का हे और आपका ये कॉमेंट भी 12 का हे ? जो सब साफ़ करता हे jaulee को जवाब )- sharad on nbt
    January 12,2015 at 07:00 AM EET
    सही कहा आपने यह देश वास्तव मे अंधो का ही देश है !!……गाँधी जी भी बाकियो की तरह ही एक स्वतंत्रता सेनानी थे इसमे कोई शक नही मगर उनका जन्म हुआ 1869 मे और देश को ग़ुलामी से आज़ाद करवाने के लिये वे देश मे आये 1915 मे (यानि 46 साल की उम्र मे) !! जबकि मात्र 22 साल की उम्र मे भगत सिंह और सरना देश के लिये खुद को बलिदान कर चुके थे ??….. विश्व युध मे एशिया मे जापान ने अंग्रेजो के पइर उखाड़ दिये थे मगर 78 लोगो की भारी भरकम भीड़ ?? के साथ दांडी मार्च करने वालो की जिद के चलते लाखो भारतीय सैनिको को अंग्रेजो की तरफ से लडवाया गया और देश की ग़ुलामी के कई दशक और बढ गये ?? वास्तव मे ये अंधो का ही देश है जहा जापानियो के हाथो कई हज़ार युधबंदी भारतीयो की जान बचाने वाले सुभाष चंद्र बोस पर उनको वरीयता दी जाती है जिन्होने 10 बटवारे के बाद लाख हिन्दुओ की हत्या करने वाले पाकिस्तान को 55 करोड़ देने की जिद पकड लि थी ??……………….. वास्तव मे यह देश अंधो का ही देश है !!
    जवाब दें खेर कोई बात नहीं में जवाब देता हु

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    • January 15, 2015 at 11:02 pm
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      आपने लिखा ”-आप कहते है हमने नेहरू गाँधी की तुलना सुभाष और भगत सिंह से की है??……हमने आज तक किसी डिस्कसन मे कभी नेहरू जी का नाम तक नही लिया तो उनकी तुलना वाला आपका पॉइंट कैसे संभव है ??… ”(Sharad on nbt को जवाब )- sikander hayat
      January 15,2015 at 12:02 PM EET
      आप जहा चाहे जितने चाहे पायंट्स मे अपनी बात रख ले मे लेख लिख कर उन सब बातो का जवाब दूंगा जेसे हाल ही मे विस्फोट के संपादक संजय तिवारी जी और अजित डोभाल साहब की बातो पर मेने लेख लिखे वेसे ही और शरद साहब आएसा तो हो नही सकता की कोई गाँधी का तो विरोधी हो और नेहरू का समर्थक हो ? य संभव नही है इसलिये आप गाँधी के साथ साथ नेहरू विरोधी भी होंगे ही . और य सुभाष और भगत सिंह की जयजयकार और कुछ नही संघ का तरीका है गाँधी नेहरू की जड खोदने का और कुछ नही वर्ना इन दोनो का भी संघ बज़रंग से छत्तीस का आंकड़ा ही था जिनके रंग मे आप पूरी तरह अब रंग चुके है

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      • January 15, 2015 at 11:13 pm
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        गांधी नेहरू को अलग अलग करके नहीं देखा जा सकता हे कोई गांधी विरोधी नेहरू समर्थक नहीं हो सकता जैसा की एक गांधी वध समर्थक वर्ग के व्यक्ति ने कहा भी साफ़ साफ़ की गांधी से पहले तो नेहरू को मारना था नेहरू को गांधी ने ही गधा उन्ही के कहने पर नेहरू ने सारा कुलीन जीवन छोड़ा गांधी कहकर भी गए थे की जब में नहीं रहूँगा तो नेहरू ही मेरी भाषा बोलेगा और कई मुद्दो पर बताया तो हे की नेहरू मतभेद होते हुए भी एक आस्थावान व्यक्ति की तरह ना समझ आने वाले जादू के सामने समर्पण कर देते थे मेरा मेन मुद्दा ये हे की गांधी नेहरू को डाउन करने का एक ही मकसद हो सकता हे संघ को मजबूत करना संघ मज़बूत तो हिन्दू कटट्रपंथ मज़बूत हिन्दू कटरपंथ मज़बूत तो मुस्लिम कटट्रपंथ भी और मज़बूत यही तो हम नहीं चाहते हे और गांधी सिर्फ एक सवतंत्रता सेनानी नहीं थे नहीं थे गांधी एक सेकुलर लोकतान्त्रिक आधुनिक भारत के निर्माता हे और नेहरू उनके दाहिने हाथ थे —- जारि

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    • January 15, 2015 at 11:12 pm
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      हयात भाई हमारे कॉमेंट मे नेहरू जी का नाम हमे तो कही नज़र नही आया 🙂 आपको नज़र आया हो तो बताइये ??….हमारा सवाल गौर से पढिये और जवाब देने मे जल्दबाजी मत कीजिये ….

      नेहरू जी का नाम मतलब जब तक हमारे कॉमेंट मे नेहरू जी का नाम ना मिले तक तक हमारे पिछले कॉमेंट्स मे उसे ढूंढने पर अपनी एनर्जी लगाइये…गुडलक 🙂

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      • January 15, 2015 at 11:15 pm
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        तो आप ही वो ” मन्त्र ” बता दीजिये शरद भाई जिसके आधार पर आप गांधी से तो मतभेद रखते हे मगर उन्ही विषयो पर आप नेहरू के विषय में क्या राय रखते हे ? — जारी

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    • January 15, 2015 at 11:14 pm
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      वैसे गाँधी जी के बारे मे दी गयी हमारेी कौन सी जानकारी गलत है जिसे आप चुनौती देना चाहते है 🙂

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      • January 15, 2015 at 11:18 pm
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        वैसे हमारा लेख ही गांधी पर हे उसकी कौन सी लाइन को आप चुनौती देना चाहेंगे ? — जारी

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        • January 15, 2015 at 11:21 pm
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          हमने तो आपके लेख पर कोई कॉमेंट किया ही नही था ये तो आप ही हमे जबरदस्ती यहा खींच लाये है !! नेहरू जी का नाम हमारे किसी कॉमेंट मे नही मिला हो तो उस बात को खत्म तो कीजिये क्यो अपना . समय जाया कर रहे है ??

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          • January 15, 2015 at 11:26 pm
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            जैसी आपकी मर्जी आप भले ही हमारे सवालो के जवाब ना दे कोई दिक्कत नहीं हे बाकी में कल परसो आपके बाकी सवालो ख्यालो के जवाब दूंगा

  • January 15, 2015 at 11:37 pm
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    आपने लिखा ”आप अलग से हमारे बारे मे हमे बताये बिना यहा-वहा क्यो लिखते है ” वहा मेने देर से देखा था जिस कारण आपका कॉमेंट काफी नीचे जा चूका था इसलिए मेने जवाब दे पर क्लिक की जगह ऊपर ही कॉमेंट लिख दिया था बाकी कल लिखता हु जैसे विभाजन दंगो में गांधी की भूमिका

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  • January 24, 2016 at 5:02 pm
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    अब देखिये इतना हल्ला किया जा रहा था फाइलों का मानो उनसे साफ़ होगा की नेहरू जी ने सुभाष बाबू को कहा छुपा रखवा रखा था ? जबकि उनमे कबाड़ के सिवा कुछ नहीं मिला नेता जी के कथित रिश्तेदार भी शायद अटेंशन मिलने से बेहतर महसूस कर रहे हे ? इस सब प्रोपेगण्डे की जड़ में हे बंगाल चुनाव और नेहरू जी की इमेज खराब करना क्योकि नेहरू ही भारत के लोकतंत्र और सेकुलरिस्म की नीव थे उसी पर ये वार किया जा रहा हे आडवाणी जी ने यु ही नहीं फिर से इमरजेंसी की आशंका जताई थी पाकिस्तान से रिलेटिड मोहन भास्कर की किताब पढ़ रहा था में पाकिस्तान में भारत का जासूस था वि किताब हो कोई भी पाकिस्तान से जुड़ा अध्यन हर गैर कठमुल्ला पाकिस्तान की तबाही की जड़ वहा किसी नेहरू का ना होना बताता हे

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  • January 24, 2016 at 6:58 pm
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    ”किंगशुक नाग अपनी किताब ‘अटलबिहारी वाजपेयी- ए मैन फ़ॉर ऑल सीज़न’ में लिखते हैं कि एक बार नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था, “इनसे मिलिए. ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं. हमेशा मेरी आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूँ.’’
    एक बार एक दूसरे विदेशी मेहमान से नेहरू ने वाजपेयी का परिचय संभावित भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी कराया था. वाजपेयी के मन में भी नेहरू के लिए बहुत इज़्ज़त थी. 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री के रूप में अपना कार्यभार सँभालने साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर गए तो उन्होंने नोट किया कि दीवार पर लगा नेहरू का एक चित्र ग़ायब है. ” बी बी सी
    नेहरू देश के लिए क्या थे इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता हे की देश के पहले शुद्ध गैर नेहरूवादी पी एम ने दो ही साल में देश की एकता को किस कदर नुक्सान पंहुचावा दिया हे

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  • September 20, 2016 at 9:51 am
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    ” विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन” इस देश का सबसे अधिक बजट पाने वाला “एनजीओ” है जो सीधे सीधे संघ नियंत्रित है और पूरी दुनिया से फंड लेकर संघ को फाईनेन्स करता है। ऐसे समझिए कि “विवेकानंद इंटरनैशनल फाउंडेशन” संघ का एक बौद्धिक मंच है जहाँ सरकार के बड़े पदों से सेवानिवृत्त लोग सरकार की गोपनीय सूचनाएँ संघ से साझा करते हैं । सोचिएगा कि देश की सभी व्यवस्था पर “संघ” का कैसा अप्रत्यक्ष कब्ज़ा है।
    समझ गये होंगे कि इस देश का खूफिया तंत्र किसके हाथों में है। और यहाँ से केवल डोभल की ही नहीं बल्कि नृपेन्द्र मिश्र को भी प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव और पी के मिश्र को प्रधानमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद पर बिठाया गया। यहाँ देश हित से ऊपर संघ हित को वरियता दी गयी है जिसके परिणाम आपके सामने हैं।सोचिएगा कि अजित डाभोल किस तरह के जेम्स बांड हैं कि उरी में 4 आतंकवादी सेना के एक हेडक्वार्टर का 7 सुरक्षा चक्र भेद कर अंदर तक चले आए और 18 जवानों को शहीद कर दिया । 7 सुरक्षा चक्र, हम आप एक चक्र भी पार नहीं कर सकते ” लेखक का नाम मालूम नहीं क्योकि कई पेज पर था खेर जो भी हे उनका साभार

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  • November 28, 2016 at 9:32 pm
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    Om Thanvi
    26 November at 22:58 ·
    लोग मुझसे पूछते हैं, मैं गांधी और अहिंसा का समर्थक हूँ तो चे-फ़िदेल का प्रशंसक कैसे हो सकता हूँ?
    सही है कि आप गांधी और भगत सिंह दोनों के अनुगामी नहीं सकते, क्योंकि दोनों के संघर्ष के रास्ते जुदा थे। गांधीजी का ‘हथियार’ ही अहिंसा थी, जबकि भगत सिंह को हिंसा से झिझक न थी।
    लेकिन अनुगामी नहीं हो सकते, क्या इसका मतलब यह होगा कि उनके क्रांति के जज़्बे को समझने की कोशिश भी नहीं कर सकते।
    क्यूबा की क्रांति के बाद चे गेवारा को फ़िदेल कास्त्रो ने कुछ देशों की यात्रा पर भेजा था। भारत से नेहरूजी ख़ास बुलावा था। भारत नए क्यूबा को मान्यता देने वालों में आगे था। काहिरा से चे भारत आए। नेहरू, वीके कृष्णमेनन, श्रीमन्नारायण, एपी जैन आदि मंत्रियों, अधिकारियों से मिले।
    भारत से लौटकर चे ने फ़िदेल कास्त्रो को अपनी जो रिपोर्ट सौंपी, वह – कोई पचास साल बाद – मुझे हवाना में मिल गई। चे के घर से, जो अब एक स्मारक सा है। रिपोर्ट, ज़ाहिर है, स्पानी भाषा में थी। मैंने दिल्ली लौटकर उसका श्री प्रभाती नौटियाल से अनुवाद करवाया। पहली बार वह भारतीय मानस के सम्मुख हुई।
    उस रिपोर्ट में चे ने भारत की आज़ादी में सत्याग्रह अर्थात् गांधी मार्ग का प्रशंसा के नज़रिए से उल्लेख किया है। अशोक होटल में ऑल इंडिया रेडियो को जो इंटरव्यू उन्होंने दिया, उसमें भी उन्होंने गांधी मार्ग से हासिल स्वाधीनता का आदर से उल्लेख किया।
    जब बंदूक़धारी चे गेवारा गांधी को समझने की कोशिश कर सकते हैं, हम चे को (दूसरे शब्दों में चे-फ़िदेल के जज़्बे को) समझने की कोशिश क्यों नहीं कर सकते?

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  • October 2, 2017 at 10:16 pm
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    Abhijeet Singh
    11 hrs ·
    गोडसे और गांधी दोनों मेरे हैं क्योंकि मैं हिन्दू हूँ.
    ____________________________________________
    हम कई बार इतिहास को महज इसलिए बंद नजरिये से पढ़ते हैं या देखते हैं कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे. गांधी-गोडसे प्रकरण भी इतिहास की ऐसी ही त्रासदी है. हममें से अधिकांश ऐसे हैं जो गांधी-गोडसे प्रकरण के सामने आते ही निरुत्तर, असहज, शर्मिंदा और मौन हो जाते हैं परन्तु क्या इतिहास और तथ्यों को सिर्फ इसलिए झुठला दिया जाए कि ये हमारी छवि के खिलाफ जायेगी? हमें सांप्रदायिक बना देगी?
    क्या उस वक़्त गोडसे ही अकेले थे जो गांधी को पसंद नहीं करते थे? इतिहास तो ऐसा नहीं कहता. उस वक़्त के कांग्रेस का हर राष्ट्रवादी नेता चाहता था कि अब अप्रासंगिक हो चुके गांधी अलग और मौन रहे यही बेहतर है. पटेल से नेहरु तक की मंशायें ऐसी ही थी, पाकिस्तान से लूट-पीट कर आने वाला हर हिन्दू और सिख गांधी के लिए बद्दुआ ही निकाल रहा था. बाकी लोग बस बापू के मौत की कामना ही करते रह गए और गोडसे ने पहल कर दी, एक गलती कर दी, अपनी भावनाओं पर नियंत्रण न रख सके और बापू की हत्या कर दी, जो निंदनीय हैं पर सवाल ये भी है कि क्या गोडसे को सिर्फ “गांधी के हत्यारे” की संज्ञा देकर इतिश्री कर ली जाए? उन वजहों की तफ्सीश न की जाए जिसने गोडसे को इस कृत्य पर उकसाया? अदालत में गोडसे के द्वारा दिए अकाट्य तर्कों को भी भुला दिया जाए? क्या ये भी भूल जाया जाये कि गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर न्यायधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा था
    “नाथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थीं और उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन मौजूद आम लोगों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नाथूराम निर्दोष है।”
    क्या इस बात पर भी चर्चा न हो कि गांधी के एक निरर्थक अनशन का विरोध गोडसे ने क्यों किया था?
    कहते हैं जब इंसान का अंतिम वक़्त करीब हो तो उसकी हार्दिक आकांक्षा उसके मुख से अभिव्यक्त होती है, गांधी जी ने अंतिम वक़्त में राम का नाम लिया जो मोक्ष कारक माना जाता है यानि बापू की आकांक्षा मोक्ष प्राप्त करने की थी जबकि गोडसे फांसी के फंदे पर झूलते वक़्त भारत माता की स्तुति ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि ‘ गा रहे थे ! गांधी जी ने अपनी वसीयत नेहरुओं के लिए छोड़ी तो गोडसे ने कहा कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे जीवन बीमा से इतने पैसे सोमनाथ मंदिर के जीर्णोधार के लिए दिए जाए. गांधी ने जहाँ अपने मानस पुत्र के लिए भारत माँ का विभाजन मान लिया वहीँ गोडसे की आत्मा आज भी अपने अस्थियों के विसर्जन के लिए भारत के अखंड होने और पवित्र सिन्धु नदी के पूरी तरह भारत भू से बहने की प्रतीक्षा कर रही है.
    भारत भूमि के विभाजन के प्रतिस्वरूप हुए व्यापक हिन्दू संहार, हिन्दू ललनाओं के वैधव्य और लूटी गई हिन्दू अस्मिता ने गोडसे को व्यथित कर दिया था पर बापू की आत्मा तो हिन्दू संहार पर नहीं रोई और न ही उनके विस्थापन पर कुछ किया.
    अगर गांधी जी के चरित्र और महानता का आकलन उनके दागदार किरदारों को छोड़कर किया जाता है तो गोडसे के किरदार में गांधी वध के अलावा और कौन सा दाग था? गोडसे का भी सम्रग मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाए? ये क्यों न देखा जाए कि गोडसे नाम का वह युवा एक विचारक, पत्रकार एवं सच्चा राष्ट्रभक्त भी था, समाज सुधारक भी था, उन्होंने ऐसे कई सहभोज कार्यक्रमों का आयोजन करवाया था जिसमें समाज के हर तबके के लोग आते थे.
    आप पूछेंगे गांधी और गोडसे के बारे में मेरी राय क्या है? गांधी सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ हिन्दू भले ही हों पर राजनीतिक रूप से हिन्दू और आजाद हिन्दुस्तान के शत्रु थे, भारत को आजादी तो गांधी ने भी दिलवाई पर आजाद भारत और हिन्दू समाज को क्लीव बना कर घुटने पर लाने वाले गांधी ही थे और उधर वध करने के अधिकारी न होते हुये भी गांधी की हत्या करने वाले गोडसे सांस्कृतिक रूप से भले ही श्रेष्ठता के मानदंडों पर खड़े न उतरते हों पर राजनीतिक रूप से हिन्दुओं के सबसे बड़े मित्र थे.
    यही मेरी दृष्टि है, मेरा हिन्दू मानस इस सोच के साथ दोनों का मूल्यांकन करता है.
    ~ अभिजीत——————————————————————————————-Nitin Thakur
    6 hrs ·
    महात्मा गांधी ने अपने अनोखे और विवादित प्रयोगों को खुद स्वीकारा. कमियों को खुलकर लिखा. ऐसा कुछ नहीं है जो उनके विरोधियों ने गुपचुप ढंग से पता लगाया हो. उनकी छवि मलिन करने के लिए जिन बातों को तोड़ा मरोड़ा गया वो उन्होंने खुद ही ज़ाहिर की थीं. गांधी से किसी ने पूछा था कि बुरा क्या है. उन्होंने कहा था कि जो आप छिपाएं वही गलत होने की संभावना ज़्यादा है. हमने थोड़ा थोड़ा उनसे सीखा है.Nitin Thakur
    7 hrs ·
    गांधी के चरखा कातने और भगत सिंह के गोली चलाने को अलग समझनेवाले लोग एक्शन ही देख पाते हैं.. एक्शन के पीछे चिंतन और दर्शन को समझने की मानसिक क्षमता विकसित होना उनमें अभी बाकी है।Nitin Thakur
    8 hrs ·
    अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक के महापुरुषों ने गांधी को अपना आदर्श माना और अहिंसा की अनोखी सी लेकिन प्रभावशाली राजनैतिक राह चुनी। गांधी की स्वीकार्यता को चुनौती देनेवाले समझ लें कि उस ओबामा की टेबल पर भी गांधी की मूर्ति है जो अफगानिस्तान से लेकर इराक तक बम बरसाता है और उन मोदी जी को भी विदेश में जाकर गांधी का बार-बार नाम लेना पड़ता है जिनके मूल संगठन को गांधी और गांधीवादियों से हमेशा दिक्कत रही है। इतने दुष्प्रचारों के बावजूद मेरी पीढ़ी से मुझ समेत कितने ही लोग गांधी के तौर तरीकों से आकर्षण महसूस करते हैं। मैं तो वो हूं जिसने ग्यारहवीं में गोड़से के बयान को पढ़कर उसके समर्थन में ग्रुप ही बना लिया था। नाथूराम गोड़से के छोटे भाई गोपाल गोड़से के मेरे नाम खत तो आज भी सुरक्षित हैं। गांधी ने मुझे कब नफरतियों के चंगुल से निकाल लिया मालूम नहीं, इसके लिए मैं महात्मा का ऋणी हूं।Nitin Thakur
    12 hrs ·
    कुछ दिन पहले एक सज्जन ने कमाल की बात कही थी- 23 की उम्र में गांधी भी भगत सिंह थे, भगत सिंह फांसी ना चढ़ते तो कुछ साल बाद गांधी हो जाते।
    सचमुच, मैं भी मानता हूं दोनों अलग नहीं थे.. सिर्फ उम्र का फर्क था जो विचारों में परिपक्वता, उदारता और विस्तार तीनों बढ़ाती हैNitin Thakur
    1 hr ·
    सबको मालूम है कि महात्मा गांधी ने मतभेद के चलते 1938 में सुभाषचंद्र बोस की कांग्रेस अध्यक्ष पद दावेदारी का विरोध किया था। गांधी के दक्षिणपंथी विरोधी आज तक इस विरोध के लिए गांधी की आलोचना करते हैं। वैसे क्या उन्हें मालूम है कि उनके पसंदीदा सरदार पटेल भी सुभाष के खिलाफ खड़े थे और विरोध कैसे करें इसकी सलाह खत लिखकर गांधी से लेते थे। इतिहास को एक ही नज़र से देख फिज़ा ज़हरीली ना बनाएं।Devanshu Jha
    5 hrs ·
    जिन्हें हिन्दी लिखने का बुनियादी शऊर नहीं है। जिन्हें झूठ शब्द लिखना नहीं आता। जिनकी चार लाइन की पोस्ट में वर्तनी की चौदह गलतियां होती हैं । जिनका दिन पॉर्न देखने में बीत जाता है । जिन्होंने लड़कियों को माल के सिवा के कुछ नहीं समझा । जिन्होंने अपनी जिन्दगी में भ्रष्टाचार,चोरी, भाई-भतीजावाद और बदमाशी के हर मौके भुनाए । जो अपने काम के प्रति रत्ती भर ईमानदार नहीं हैं । जिनका निजी जीवन कमियों के सैकड़ों छिद्रों से भरा हुआ है । वही राष्ट्रवाद के प्रबल पुरोधा हैं ! वो गांधी के लिए अपशब्द लिखते हैं । वो बेहूदा और परले दरजे के मूर्ख ! कवि बन कर कविता बांच रहे हैं ! छंद के छायावादी बन रहे हैं !! बौद्धिक विमर्श कर रहे हैं !!! नए सिरे से इतिहास पढ़ा रहे हैं ! अरे…! यमुना के नाले में गोते लगा कर मर जाओ !! गधे हो…वो भी सबसे सड़ी हुई प्रजाति के ! बहस या समालोचना की एक मर्यादा होती है । और कविता क्या लिख रहे हो, डेढ़ सौ साल पुरानी स्टाइल में ? बेहूदे…! अंड बंड लिख देने से पा लोगे उस विराट पुरुष को ?—————————————-Urmilesh Urmil
    10 hrs ·
    जो भी करो भाई, पर गांधी जी का नाम मत लो! यह कैसा स्वच्छता अभियान है, जिसमें सड़क, गली और घर की सफाई की बात हो रही है, पर मन की सफाई की नहीं! मन में नफरत और हिंसा भरी जा रही है। तेजी से हिंसक और असहिष्णु होते समाज में भला स्वच्छता कैसे हासिल होगी? अधिक मुनाफे के लिए खाने-पीने की चीजों में जहरीले पदार्थ मिलाये जा रहे हैं। पानी से लेकर हवा तक में जहर घोला जा रहा है। पर स्वच्छता मिशन की कामयाबी का दावा भी हो रहा है! हम सचमुच हवाबाज और दावेबाज लोग हैं, जिन्हें नारेबाजी पसंद है, जयकार पसंद है, ठोस काम और बदलाव नहीं!ushya Mitra
    7 hrs · Patna ·
    Pushya Mitraआइये बहस करें… बताइये गांधी क्यों पसंद नहीं आते आपको…
    …………………………………………………………………………………..
    आज सुबह-सवेरे गांधी को लेकर अपनी एक खबर का लिंक पोस्ट किया तो उस पर बड़े अजीब कमेंट आये… किसी ने उन्हें पुराना फर्नीचर कहा, किसी ने देश को गुमराह करने वाला, किसी ने पटेल को बेहतर बताया, तो किसी ने शास्त्री जी को याद किया. इस स्टेटस के इतर फेसबुक पर कई मित्रों ने अलग-अलग एंगल से लिखा है और गांधी को खारिज करने की कोशिश की है. वाट्सएप पर तो आज का हिट चुटकुला है, – हैप्पी बर्ड्डे गांधी बाबा… कुछ दिन तो गुजारिये हमारे पर्स में… यह सब पढ़कर मन परेशान हो उठा… कमेंट में लिख भी डाला कि जिस रोज इस देश से गांधी के नाम का पुराना फर्नीचर हटा दिया गया, उस रोज यह देश छोड़ दूंगा.
    यह सच है कि गांधी भले ही नोट पर हों, वोट पर हों, सफाई अभियान के पोस्टरों पर हों, थानों-कचहरियों-दफ्तरों की दीवारों पर हों, चौक-चौराहों पर हों… मगर लोगों के दिल में उतने नहीं हैं, जितना होना चाहिए… और यह आज की बात नहीं है, आज तो नाथूराम गोडसे के समर्थकों को भी लगता है कि उनका राज आ गया है. आज नहीं, न जाने कब से, मेरे जन्म से काफी पहले से ही यह मुहावरा इस देश में चलता रहा है- मजबूरी का नाम महात्मा गांधी…
    कुछ लोगों के लिए गांधी बेवकूफ हैं, आजादी तो सुभाष, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की वजह से आयी थी, थप्पड़ के लिए दूसरा गाल बढ़ा देना कोई समझदारी की बात है भला? कई लोगों के लिए गांधी काइयां हैं, उनमें हिंदुत्ववादी भी हैं और बहुजनवादी भी, यहां तक कि वामपंथी भी… क्योंकि इनके हिसाब से गांधी ने चोरी छिपे कभी मुसलमानों को समर्थन दिया, तो कभी पाकिस्तान की तरफदारी की, कभी सवर्णवाद को बढ़ावा दिया तो कभी बिरला जैसे पूंजीपतियों को… कुछ लोगों को गांधी का ब्रह्मचर्य भी ढोंग और अय्याशी लगता रहा है… इस पर तो मनोवैज्ञानिकों ने बकायदा किताबें भी लिखी हैं… किताब तो वामपंथी लेखक यशपाल ने भी लिखी थी, गांधीवाद की शव परीक्षा… वामपंथियों को इस बात से भी नारजगी रही है कि गांधी ने भगत सिंह की फांसी की सजा कम कराने के लिए कुछ नहीं किया… इस बात से तो हिंदुवादी संघी भी नाराज रहते हैं… कहते हैं, आजादी आने से पहले ही नेहरू और पटेल भी इस बुड्ढे की जिद से परेशान रहने लगे थे… आरोप तो यह भी है कि गांधी की जासूसी तक करायी जाती थी…
    इसके बावजूद गांधी का आजतक इस्तेमाल होता रहा है. भाजपा और संघ की सरकारें भी कर रही हैं. नेहरू से लेकर मोदी तक हर प्रधानमंत्री को इनकी तसवीरों का इस्तेमाल करना पड़ा. आज वामपंथी भी मोदी विरोध के लिए गांधी को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं. तो क्या समझें…? गांधी किसकी मजबूरी है, क्या इस देश की राजनीति की, जिसका काम गांधी के बगैर एक पल नहीं चलता… सत्तर साल बाद भी नहीं… नीतीश भी जब दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ अपने अभियान की शुरुआत करते हैं, तो दो अक्तूबर का दिन चुनते हैं… इससे पहले जब राष्ट्रीय राजनीति में छाना था तो उन्होंने चंपारण सत्याग्रह के प्रतीक को चुना और गांधी की राह का अभियान चलाया… बाद में वे भाजपा के साथ हो गये…
    ऐसे में इस विडंबना को क्या समझें कि गांधी नोट में, वोट में, झंडे में और दफ्तरों में तो हैं, मगर लोगों के दिल में नहीं हैं. युवा वर्ग हमेशा से गांधी से बहुत इंस्पायर नहीं रहा… मगर आज यह स्थिति कहीं अधिक निराशाजनक लग रही है… लिहाजा इस गांधी जयंती पर एक ही काम करने की इच्छा हो रही है, वह है गांधी को लेकर दोस्तों के साथ एक स्वस्थ बहस करने की…
    आप बतायें कि आप गांधी को क्यों पसंद नहीं करते हैं, मैं बताऊंगा कि गांधी क्यों मेरे लिए आदर्श हैं… आप मुझे मुत्मइन करने की कोशिश करें, मैं आपको समझाने की कोशिश करूंगा… इस बहस पर हर तरह की टिप्पणी का स्वागत है, मैं किसी टिप्पणी से आहत नहीं होउंगा और इससे आपके हमारे संबंधों पर असर नहीं होगा… आप खुल कर अपने मन की बात कहेंगे तो मैं आपका आभारी रहूंगा…. आइये बहस करें…
    ( इस स्टेटस के साथ मित्र Vikram Nayak के स्केच को उनकी अनुमति से इस्तेमाल कर रहा हूं.)Pushya Mitra

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  • October 11, 2017 at 3:17 pm
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    क्या गांधीजी भगतसिंह को बचा सकते थे ?
    नरेश बारिया स्वदेशी

    आज के दौर का युवा ना कभी लायब्रेरी में जाकर इतिहास का एक पन्ना पढ़ता है , ना ही कभी कोई तथ्यों को सच्चाई की कसौटी पर खंगालता है । बस उसके मोबाइल में जो झूठ किसी ने पेश किया होता है, वो उसी झूठ को सच मानकर महाज्ञानी बन जाता है । आज के ज़माने में सोशल मीडिया सबसे बड़ा झू्ठ फैलाने का अड्डा है । और हैरत की बात यह है की ज़्यादातर गांधीजी के विषय पर झू्ठ फैलाने उन्हें गालियाँ देने का काम वो लोग करते है जो अपने आपको सबसे बड़े धार्मिक होने का दावा करते हैं ।

    जो व्यक्ति इंसान तो क्या चींटी मारने को भी महापाप समझता हो , उस व्यक्ति पर भारत के कुछ लोग भगत सिंह और उनके साथियों को मरवाने का आरोप लगा रहे है ! गांधीजी कभी खूनी , चोर , लुटेरे के भी फांसी के पक्ष में नही रहे , ऐसे व्यक्ति पर भगतसिंह जैसे देशभक्त को नहीं बचाने का आरोप ? बापू पर ऐसे घटिया आरोप लगाने वाले किस विचारधारा के हैं, वो कहने की आवश्कता नहीं।

    भगत सिंह और उनके साथियों पर एसएसपी जे.पी सांडर्स की हत्या का मुकदमा चल रहा था । सांडर्स हत्या कांड में भगत सिंह के अपने ही साथी जय गोपाल और हंसराज वोहरा ने सरकारी गवाह बनकर अदालत में गवाही दी थी । ( जब एसेम्बली में बम फोड़ा गया था तब भी भगतसिंह के खिलाफ उनके अपने आदमी ने ही गवाही दी थी । ) सांडर्स हत्या में अंग्रेजों की दिखावे की अदालत ने भगत सिंह , सुख देव और राजगुरु जी को २४ मार्च १९३१ सुबह ७ बजे फांसी देने का हुकुम सुनाया था।

    ‘भगतसिंह की फांसी रुक सकती थी यदि गांधी चाहते तो ‘– इस विचार को फैलाने वालों को शायद यह नहीं मालूम की महात्मा गांधी ने खुद का बचाव भी कभी नहीं किया , अपने जीवनकाल में जब -जब गांधीजी को सज़ा सुनाई गई , उन्होंने हंमेशा अंग्रेजी हुकुमत से यही कहा कि– ‘ हाँ , मैंने ये जुर्म किया है . . . अपने देशवासियों को जगाया है ।’ यही नही , चौरी – चौरा कांड में वो २३ पुलिसकर्मी (ज़्यादातर भारतीय मूल के ) मारे गये थे तब वो हत्याकांड की सारी ज़िम्मेदारी गांधीजी ने अपने आप पर लेते हुए कोर्ट में यह मांग की कि मुझे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए । ‘ ( जो व्यक्ति हमारे विचारों का नही होता , उसका बचाव हम सार्वजनिक स्थानों पर तो क्या उनका बचाव हम सोशल मीडिया पर भी नहीं करते , मगर फिर भी गांधीजी ने भगतसिंह का बचाव किया । ) क्रांतिकारीयों में और गांधीजी में हिंसा और अहिंसा के मुद्दे पर मतभेद था , मनभेद तो लेषमात्र भी न था ।

    गांधीजी की सोच यह थी कि क्रांतिकारी गतिविधि का सामना करने के लिए अंग्रेज़ सरकार फौजी खर्च बढाती है , जो हम गरीबों के पैसों से वसूला जाता है । इतनी भिन्न सोच होने के बावजूद गांधीजी क्रांतिकारीयों को बचाने आगे आए ।

    सांडर्स हत्या और भगतसिंह की फांसी की परिस्थितीयाँ कैसे निर्माण हुई उस पर नज़र डालते है ।

    १९२८ में अंग्रेजों ने जॉन सायमन को भारतीय स्थिति पर रिपोर्ट देने और राजनीतिक सुधारों की सिफारिश के लिए नियुक्त किया, जिसे सायमन कमिशन से जाना जाता है । सायमन कमिशन भारत के भाग्य का फैसला करने वाला था , परंतु आश्चर्य तो इस बात का था कि इस कमिशन में एक भी भारतीय नहीं था । महात्मा गांधी ने निश्र्चय कर लिया सायमन की इतनी अधिक उपेक्षा कर देनी है कि मानो हमने उनके अस्तित्व को ही नकार दिया हो । गांधीजी की घोषणा का असर ये हुआ कि पूरे भारत में जॉन सायमन को विरोध का सामना करना पड़ा । जगह जगह काले झंडे दिखाए जा रहे थे । सायमन गो बैक , सायमन वापस जाओ के गगन भेदी नारे लग रहे थे । गांधीजी का बहिष्कार इतना बुलंद था कि उन्होंने कमिशन का कभी नाम तक अपनी ज़ुबान से नहीं लिया ।

    इसमें ये बात तो निश्चित थी कि ये विरोध पूरे अहिंसक तरीके से हो रहा था । अंग्रेजों की लाठियों की बौछार से पं० नेहरुजी लखनऊ में बुरी तरह घायल हो गए । लाहौर में बुज़ुर्ग लालालाजपत रायजी पर अंग्रेजों ने इतनी बेरहमी से लाठियाँ बरसाईं की लालाजी वहीं पर शहीद हो गए । ये नज़ारा भगतसिंह से देखा नहीं गया । भगतसिंह ने लालाजी के चरणों को चूमते हुए लाठी बरसाने वाले जेम्स स्कोर्ट को मारने का निर्णय किया ।

    क्रांतिकारीयों ने स्कोर्ट को मारने की रणनीति बनाई । स्कोर्ट पुलिस स्टेशन से कब बाहर आए उस बात की जानकारी देने का काम जयगोपाल को दिया गया । मगर पुलिस स्टेशन से स्कोर्ट की जगह सांडर्स बाहर आया और जयगोपाल ने सांडर्स को पहचानने में गलती कर दी और गलत सिग्नल दे दिया । भगत सिंह कुछ समझे उसके पहले राजगुरु ने अपनी पिस्तौल से गोली चला दी । ये देखकर भगत सिंह ने भी सांडर्स पर गोलियों की बौछार कर दी । इस तरह गलती से स्कोर्ट की जगह सांडर्स मारा गया ।

    ये गलती क्रांतिकारीयों को मन ही मन खाए जा रही थी , क्योंकि स्कोर्ट को मारकर लालाजी की हत्या का बदला लेने वाला बैनर क्रांतिकारीयों ने पहले ही बनाकर रखा था । सांडर्स हत्याकांड के बाद अंग्रेजों को चकमा देकर भगतसिंह , चन्द्रशेखर आझाद और राजगुरु लाहौर से कलकता आने में सफल रहे । उस घटना के बाद क्रांतिकारीयो ने एक साल तक कोई गतिविधि नहीं की । अंग्रेज़ क्रांतिकारीयों को हत्यारा कह रही थी । अपने माथे पर लगा हत्यारे का लेबल क्रांतिकारीयों को बर्दाश्त नहीं हो रहा था । वे हत्यारे नहीं बल्कि जनता को जागरूक करने वाले क्रांतिकारी थे । अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए भगतसिंह ने असेम्बली में बम फैका ।

    यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि जान लेने और जान देने वाले नवयुवक इस बार किसी की जान नहीं जाए ऐसी परवाह कर रहे थे । भगतसिंह ने जानबूझकर बेअसर ( अहिंसक ) बम बनाया , वो भी असेम्बली में रिक्त स्थान पर फेंका जहाँ पर कोई मौजूद नहीं था । जबकि लालाजी की मौत का कारण सायमन उसी असेम्बली में मौजूद था । भगतसिंह चाहते तो बम सायमन पर फैंककर लालाजी की मौत का बदला ले सकते थे फिर भी भगतसिंह ने इस बार मौका होने के बावजूद अहिंसक तरीका अपनाया ।

    चाहे जो हो , भले ही क्रांतिकारी गांधी की अहिंसा को उस हद तक नही पसंद करते थे , पर इस बात से इन्कार नही किया जा सकता है कि अहिंसा अपना काम धीरे धीरे कर रही थी । जेल में भारतीय कैदियों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ भगतसिंह ने जो रास्ता चुना वो भी संपूर्ण तरीके से अहिंसक ही था , वो था गांधीजी का सबसे बड़ा हथियार अनशन । जेल में मिल रही असुविधा के विषय पर भगतसिंह ने बहुत सौम्य रूप में पत्र लिखा था ।

    जब अनशन लंबा चला उसमें एक साथी जतिन दास की मौत हो गई तब कांग्रेस की विनती को मान देकर भगतसिंह ने अपना अनशन छोड़ा था । गांधीजी के करीबी मित्रों में से एक प्राणजीवन मेहता भगतसिंह जी को जेल में मिलने गए तब भगतसिंह जी ने प्राणजीवन मेहता से पंडित नेहरुजी और सुभाषचंद्र का विशेष तौर से धन्यवाद माना , क्योंकि नेताजी और नेहरुजी शुरुआत से ही भगतसिंह जी के केस में रूचि ले रहे थे | नेहरुजी ने ही अंग्रेज़ सरकार से भगतसिंह को राजकीय कैदी घोषित करने की मांग की थी |

    भगतसिंह , सुखदेव , राजगुरु को ७ अक्टूम्बर १९३० के दिन फांसी की सज़ा सुनाई गई थी । मुकदमा ११ फरवरी १९३१ तक चला , फैसले में कोई बदलाव नही आया ।

    दरअसल १९३० में गांधीजी ने नमक सत्याग्रह आंदोलन किया था । उस अहिंसक आंदोलन की दुनियाभर में चर्चा हुयी थी और उसे अंग्रेजी हुकुमत की काफी किरकिरी हुई । अंग्रेजों ने गुस्से में आकर कांग्रेस पार्टी को असंवैधानिक पार्टी घोषित कर दिया । कांग्रेस के सभी दफ़्तरों में छापे डाले गये , गांधीजी समेत कई बड़े कांग्रेसी नेताओं को जेल में डाला गया । आजादी की लड़ाई लड़ने वाली प्रमुख कांग्रेस पार्टी को अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो गया था ।

    गांधीजी जब जेल में थे तब अदालत भगतसिंह को फांसी का फैसला सुना चुकी थी । फैसले पर वायसराय की अंतिम मुहर लगनी बाकी थी । गांधीजी जैसे ही २६ जनवरी १९३१ में जेल से रिहा हुए उन पर भगतसिंह की फांसी रुकवाने का दबाव बन गया । १७ फरवरी और ५ मार्च १९३१ के दौरान गांधीजी का तत्कालीन वायसराय इरविन के साथ ऐतिहासिक करार चल रहा था । उस करार को ” गांधी – इरविन समझौता ” के नाम से भी जाना जाता है । उस समझौते के मुताबिक गांधीजी ने अंग्रेजों की कुछ शर्तें मानकर भारत के ९० हज़ार से ज़्यादा कैदियों को जेल से छुड़वाया था । सभी देश प्रेमी ये चाहते थे कि गांधीजी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके भगतसिंह , सुखदेव , राजगुरु को बचाए ।

    समझौते में हिंसा के आरोपी कैदियों को छोड़ने के लिए अंग्रेज़ राज़ी नहीं थे । भगतसिंह की फांसी पर वायसराय इरविन की मुहर लगनी अभी बाकी थी । वैसे भी गांधीजी फांसी की व्यवस्था में यकीन नहीं रखते थे । इसलिए गांधीजी ने वॉइसरॉय इरविन को फांसी को उम्र कैद में बदलने हेतु १८ फरवरी, १९ मार्च और २३ मार्च के तीन चिट्ठियाँ लिखी थीं | गांधीजी ने वायसराय के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि यदि आप फांसी के फैसले को सज़ा में परिवर्तित करते हैं तो आप क्रांतिपक्ष को बहुत हद तक शांत कर सकते है । ये रोज़ रोज़ का खूनखराबा रुक सकता है । वायसराय ने कहा कि ये मुमकिन नही है क्योंकि भगतसिंह ने हमारे पुलिस ऑफिसर की हत्या की है ।

    इस पर गांधीजी ने कहा कि जान के बदले जान लेना हमे धर्म नहीं सिखाता । वैसे भी फांसी उस व्यक्ति को सुधरने का एक भी मौका नही देती ! भगतसिंह ने जो किया वो अपनी मानसिक अस्थिरता के कारण किया । वैसे भी कानून कहता है , मानसिक अस्थिरता वाले को फांसी की नहीं इलाज की ज़रूरत होती है । गांधीजी ने ईसाई धर्म और प्रभु इशु का वास्ता देते हुए कहा कि यदि बच्चों ने अपनी नासमझी में कोई अपराध किया भी है तो जान लेने का हक केवल ईश्वर को है । यही बात प्रभु यीशु भी मानते थे । वायसराय ने फांसी पर नरमी अपनाने का गांधीजी को आश्वासन दिया था । समझौते के दौरान ये तय हुआ था कि जेल से निकलने के बाद कोई भी क्रांतिकारी या सत्याग्रही ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध काम नही करेगा । सरकार- विरुद्ध किसी भी गतिविधि में शामिल नही होगा ।

    किन्तु गांधी को बदनाम करने हेतु ” गांधी – इरविन समझौते ” को ” लिजंट ऑफ़ भगतसिंह ” फिल्म में बहुत ही घटिया तरीके से दर्शाया गया ! ! ! उस वक्त के मशहूर लेखक वीर सावरकर ने भी अपने किसी भी पत्रक में भगत सिंह की फांसी रद्द करवाने की बात नहीं लिखी . . . . उल्टा तत्कालीन सरसंघसंचालक ” केशव बलीराम हेडगेवार जी ” ने अपने मुख पत्र में फरमान जारी किया कि गांधी के सत्याग्रह से सभी को अलिप्त ( दूर ) रहना । हेडगेवार ने तो यहाँ तक कह दिया था कि नौजवानों को भगतसिंह जैसे छिछोरे देशभक्त से दूर ही रहना चाहिए ।

    १९२० में ब्रिटिश सरकार की ऐसी ही कुछ शर्तें मनवाकर गांधीजी ने लोक मान्य तिलक , वल्लभ भाई के बड़े भाई विठ्ठल भाई पटेल और वीर सावरकर की कालापानी की सज़ा रद्द करवाने की मांग की थी । और यही अंग्रेजों की शर्तें सावरकर ने मान ली और १९२१ कालापानी तथा १९२४ में वे जेल से रिहा कर दिए गए । भगत सिंह की फांसी रद्द होने की सुगबुगाहट को फैलते ही सिविल सर्विस ऑफिसर में रोष फैल गया । तत्कालीन पंजाब के गवर्नर केडर ने गवर्नर पद से इस्तीफा देने की धमकी ब्रिटिश सरकार को दे दी !

    ब्रिटिश सरकार की गणित के मुताबिक़ यदि गवर्नर केडर अपने पद से इस्तीफा देता है तो उनके बहुत सारे सहयोगी जो म्यांमार , अफगानिस्तान , अरब देशो में ब्रिटिश सरकार की नौकरीयाँ करते हैं वे सामूहिक तौर पर इस्तीफा दे सकते हैं । वे सारे ब्रिटिश युवक स्वदेश लौट सकते है । नए युवको को ब्रिटेन से नौकरी पर लाना मुश्किल हो सकता है । गांधीजी को इस बात की भनक लगते ही वे २२ मार्च को वायसराय इरविन से मिलने पहुँच गए और इरविन को अपना आश्वासन याद दिलाया । २३ मार्च को गांधीजी ने वायसराय को चिठ्ठी भी लिखी थी , चिठ्ठी में लिखा था कि फांसी के फैसले को अनिश्चित काल तक अमल में न लाया जाय । कृपया भगत सिंह और उनके साथियों को जीवन का एक मौका दीजिए । ( ये बात लॉर्ड इरविन ने अपनी डायरी में लिखी थी )

    अंग्रेज़ सरकार गांधीजी की हर बात माने उसके लिए वो बाध्य नहीं थी । वैसे भी अंग्रेज़ सरकार भगतसिंह की फांसी रद्द करवाकर गांधी को जनता की नज़र में हीरो क्यों बनाती ? वो तो आए ही थे देश में फूट पैदाकर राज करने के लिए ! और उन्होंने यही किया , भगतसिंह और उनके साथियो को तय तारीख के पहले , यानि २४ मार्च के पहले २३ मार्च शाम ७:३३ को ही फांसी दे दी . . . . !

    सभी मुद्दे पर अपना नफा – नुकसान देखने वाली अंग्रेज़ सरकार ने भगत सिंह की फांसी से अपना दो प्रकार का फायदा कर लिया ! एक भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी की जान ले ली और गांधी जैसे सत्यवादी को जनता की नज़र में गिराने की कौशिश की ! अंग्रेज़ की कूटनिति का परिणाम यह आया की आज भी कुछ लोग भगतसिंह जी की फांसी को लेकर के गांधीजी को दोषी मान रहे है . . . . मनगढ़ंत आरोप लगाकर गांधीजी को बदनाम कर रहे है . ( आरोप लगाने वाले उन मूर्खों को सोचना चाहिए कि गांधीजी ने अंग्रेजों से कहा था कि आप भारत छोडकर चले जाइये , क्या उसी वक्त गांधीजी की बात मानकर अंग्रेज़ भारत छोडकर चले गये थे ? ? ? )

    किन्तु सच तो यह है कि भगतसिंह स्वयं के लिए किसी भी प्रकार की क्षमा याचना नहीं चाहते थे । उन्हें दृढ़विश्वास था कि उनकी शहादत देश के हित में होगी । भगतसिंह जी स्वयं जानते थे कि जिस रास्ते पर वे चल रहे हैं उसका आखिरी अंजाम फांसी ही है । इसीलिए वे किसी से भी अपने जीवन की आस नहीं रखते थे । भगतसिंहजी के पिता किशनसिंह जी ने फांसी की सजा रद्द करने की ब्रिटिश सरकार से गुहार लगाई तो भगत सिंह अपने पिता पर गुस्सा हो गए । उन्होंने अपने पिता को यहाँ तक कह दिया कि आपने मेरी पीठ में छुरा घोंपा है । अपने जीवन के अंतिम दिनो में भगत सिंह ने अपने साथी कैदियों से कहा था कि मुझे फांसी के फंदे तक जाने से कोई नहीं रोक सकता ।

    दूसरा सच यह है कि भगतसिंह के हिंसा के मार्ग का समर्थन खुद उनके पिता किशनसिंह जी भी नहीं करते थे । किशनसिंह जी भगतसिंह को समझाते थे कि हमें गांधीजी के अहिंसा मार्ग से अंग्रेजों से आजादी लेनी चाहिए । भगतसिंह ने अपने पिता से जवाब में ये कहा कि गांधीजी महान है उसमें कोई दोराय नही लेकिन अंग्रेज़ जैसे ज़ालिमो से अहिंसा के रास्ते से नहीं लड़ा जा सकता ।

    लालालाजपत राय कट्टर हिन्दूवादी थे । भगत सिंह रूस के नेता लेनिन को अपना आदर्श मानते थे । भगतसिंह ईश्वरी शक्ति में विश्वास नहीं रखते थे । वे नास्तिक थे । इस बात को लेकर भगतसिंह के खुद अपने साथियों एवं लालालाजपत राय के बीच स्पष्ट मतभेद थे । भगत सिंहजी ने अपने अंतिम दिनों में ” मैं नास्तिक क्यों हूँ ” नामक निबंध लिखा था । लालाजी ने भगतसिंह को रुसी एजंट तक कह दिया था । लालाजी ने कहा कि ये क्रांतिकारियों के नाम पर कुछेक बेरोज़गारों की टोली है और अगर इन्हें अभी पचास-पचास रुपए की नौकरी दे दी जाय तो ये लोग सारी देशभक्ति भूल जाएंगे । क्रांतिकारियों की सोच भी लालाजी के प्रति कुछ ठीक नही थी , क्रांतिकारियों ने लालाजी को मरा हुआ नेता कह दिया था । लाहौर की गलियो में पर्चे भी बांटे थे ।

    गांधीजी ने कभी किसी क्रांतिकारी को आतंकवादी नहीं कहा । गांधीजी ने कभी किसी विदेशी कानून का समर्थन नहीं किया । गांधीजी का कोई भी परिवार का सदस्य ” ईस्ट इंडिया कंपनी ” में काम नही करता था । जो लोग ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करते थे , जिन्होंने कभी आज़ादी के आंदोलन में कभी भाग नहीं लिया , जिन्होंने देश का तिरंगा झंडा फाड़ दिया था । उन लोगो को भी गांधीजी ने कभी देशद्रोही या देश का गद्दार नहीं कहा ।

    जिन लोगो ने गांधी के सत्याग्रह में कभी भाग नहीं लिया , भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ रहे , आंदोलन की रणनीतियाँ अंग्रेजो को बताकर आंदोलन को नाकामयाब करने की कोशिशें करते रहे । उन्हें भी गांधीजीने कभी देशद्रोही या देश के गद्दार नहीं कहा । और आज कुछ पाखंडियों द्वारा इतना बड़ा झूठ फैलाया जाता है कि गांधीजी ने क्रांतिकारियों को आतंकवादी कहा था । यदि गांधीजीने किसी को आतंकवादी या देशद्रोही कहा होता तो आज के वक्त गांधीजी द्वारा लगाए गए उन आरोपों से पिंड छुड़ाना मुश्किल होता ! न्यूज़ चैनलो में दिनरात चर्चा की होड़ लगी होती ।

    चंद्रशेखर आज़ाद के ख़ुफ़िया ठिकाने पर सिपाही लाने वाला ना तो वो कांग्रेसी था ना ही वो गांधीवादी था ! वो चन्द्रशेखर आज़ाद का अपना आदमी ” वीरभद्र तिवारी ” था ! भगतसिंह के खिलाफ गवाही देने वाले ना तो वो कांग्रेसी थे ना ही वो गांधीवादी थे । वे दोनों भगतसिंह के क्रांतिकारी जोड़ीदार ” जय गोपाल और घोष बाबू ” थे ! बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ गवाही देने वाले शोभा सिंह और शादी लाल थे जो कांग्रेस के घोर विरोधी थे! बटुकेश्वर दत्त जब आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहे थे तब गांधीजी के ही प्रयासों से बटुकेश्वर दत्त की १९३८ में जेल से रिहाई हुई थी । फिर यही बटुकेश्वर दत्त १९४२ में गांधीजी का अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए |

    शुरुआत के दिनों में चन्द्रशेखर आज़ाद , भगतसिंह , राजगुरु ये तीनों क्रांतिकारीयों में देशभक्ति की भावना गांधीजी के प्रभाव के कारण ही आई । फिर भी उस दुबले पतले बूढ़े गांधी को इतनी गालियाँ ? जो लोग भगतसिंह के कंधे पर बंदूक रखकर गांधीजी को गालियाँ दे रहे हैं उन लोगो को भगतसिंह के गांधीजी के सम्मान में लिखे हुए लेख पढ़ लेने चाहिए ।

    यदि हिंसा से ही आजादी आती , तो १८५७ में ही आजादी मिल गयी होती क्योंकि भारतीयों ने अंग्रेजों की जान माल का जितना नुकसान १८५७ के गदर में किया था उतना कभी किसी ने भी नही किया था । १८५७ में अंग्रेजो के मुद्दे पर सभी राजे रजवाड़े एक हो गए थे । किन्तु १९३१ तक आते-आते ज़्यादातर राजे रजवाड़े अंग्रेजो के अंग बन चुके थे ।

    गांधीजी की सोच थी कि यदि हिंसा का मार्ग लोकप्रिय हो गया तो आने वाले आजाद भारत में भी अपनों से न्याय पाने के लिए लोग हिंसा का मार्ग ही चुनेंगे । अहिंसा कागज़ी बात बनकर रहे जाएगी ।
    भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस के गांधीजी से हिंसा और अहिंसा को लेकर मतभेद थे । बाकी वे दोनों ही गांधीजी का सम्मान करते थे । आजकल कुछ लोगों द्वारा गांधीजी विरुद्ध भगतसिंह बनाने की कोशिश हो रही है वैसा खुद भगतसिंह भी नहीं करते थे । फरवरी १९३१ में अपने एक लेख में भगतसिंह लिखते है कि गांधीजी ने मजदूरों को सत्याग्रह आंदोलन में भागीदार बनाकर मज़दूर क्रांति की नई शुरुआत कर दी है । क्रांतिकारीयों को इस अहिंसा के फरिश्ते को उनका योग्य स्थान देना चाहिए ।दूसरी बात भगतसिंह ने ये भी कही थी कि हिंसा अंतिम क्षण में इस्तमाल करने की चीज़ है वर्ना अहिंसा के मार्ग से ही क्रांति लाई जानी चाहिए । तो ये थी शहीदे आज़म भगतसिंह की वाणी । यदि गांधीजी के मन में भगत सिंह को लेकर कोई खोट होती तो फांसी के तीन दिन बाद कांग्रेस अधिवेशन में भगतसिंहजी के पिता सरदार किशनसिंहजी और सुखदेवजी के भाई मथुरादासजी गांधीजी से मिलने क्यों आते ?फांसी के बाद भगतसिंहजी ने तो गांधीजी के लिए कोई संदेश नही छोड़ा मगर सुखदेवजी ने गांधीजी के नाम ज़रुर एक चिठ्ठी लिखी थी । उस चिठ्ठी की शुरुआत करते हुए सुखदेवजी ने लिखा था ” आदर्णीय महात्माजी ” । सुखदेवजी की चिठ्ठी गांधीजी के प्रति थोड़ी नाराज़गी भरी थी लेकिन उस चिठ्ठी का सार कोई समझ नही पा रहा था तब गांधीजी अपनी जगह से उठकर चिठ्ठी अपने हाथ में लेकर वहां बैठे लोगो को समझाते हुए कहते हैं कि ये बच्चा चिठ्ठी के जरिए यह कहना चाहता है कि मैंने उन्हे फांसी से बचाने का उचित प्रयास नहीं किया . . . . गांधीजी का मनोबल इतना मजबूत था कि उन्होने सुखदेव जी की ये चिठ्ठी दूसरे दिन यंग इंडिया अखबार के पहले पन्ने पर छपवाई ।गांधीजी वो विभूति थे जो प्यार से मिली हुई चीज़ के साथ- साथ नफरत से मिली भेंट भी विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर लेते थे । अधिवेशन में पहुँचने के पहले कुछ लोगो ने भगतसिंह के समर्थन में और गांधीजी के ख़िलाफ़ नारे लगाए और उन्हें कपड़े की बनावट के काले फूल दिए गए। गांधीजी ने वो नफरत रुपी काले फूल सहज भाव से स्वीकारते हुए अपने आश्रम भेज दिए ।
    इस घटना को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने गांधीजी को सुरक्षा देने का फैसला किया मगर बुराई में भी अच्छाई देखने वाले गांधीजी ने ये कहते हुए सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया कि नौजवानों का विरोध बहुत ही संयमित था । अगर वे चाहते तो मुझ पर हिंसा भी कर सकते थे कपड़े के काले फूल मेरे मुंह पर फेंक कर मेरा अपमान कर सकते थे लेकिन उन नौजवानों ने मेरे साथ ऐसी कोई हरकत नहीं की जिससे कि मुझे सुरक्षा लेनी पड़े ।नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने जब आजाद हिंद फ़ौज बनाई तब उस सेना की पहली टुकड़ी का नाम गांधी ब्रिगेड रखा था । जब नेताजी से उनके अपने एक साथी ने पूछा– आजादी मिलने के बाद हम क्या करेंगे ? नेताजी ने उत्तर दिया , हम गांधीजी की तरह दीन – दुखियों की सेवा करेंगे । यह भी ध्यान रखिये कि गांधीजी को सबसे पहले राष्ट्रपिता सुभाषचंद्र बोस जी ने ही कहा था । नरेश बारिया स्वदेशी
    जिन देशभक्तों ने देश के लिए अपनी जान दी , वे भी कभी गांधीजी को कटुवचन नहीं बोले , मगर जिन लोगों ने देश के लिए अपना नाख़ून तक नही कटवाया वो लोग आज गांधीजी को गालियाँ देते हैं। समझ में नहीं आता कि कौनसा धर्म इंसान को अपने ही बुजुर्गों को गालियाँ देना सिखाता है ?जो व्यक्ति लोगों को श्री राम जैसी मर्यादा सिखाता हो; श्री कृष्ण जैसा प्रेम करना सिखाता हो; हरीशचन्द्र जैसी सत्यता सिखाता हो; बुद्ध और महावीर की तरह अहिंसा का पालन करना सिखाता हो — क्या वो व्यक्ति किसी क्रांतिकारी को मरवा सकता है ? जो व्यक्ति अपने भजनो में ये गाता फिरता हो कि ” पर दुःखे उपकार करे तो , मन अभिमान ना आवे रे ” उस पर अपनी लोकप्रियता बचाने का आरोप ?
    गांधीजी वैष्णव थे इसलिए कहते थे कि वैष्णव जन उसे कहते हैं जो पराई पीड़ा जानता है । किन्तु भारत जैसा आध्यात्मिक देश गांधी जैसे सत्यवादी का सत्य जानने में नाकाम हो रहा है ।नरेश बारिया स्वदेशी
    (लेखक प्रतिबद्ध गाँधीवादी हैं और राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट के महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं.)

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  • November 21, 2017 at 10:17 pm
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    इसमें कोई शक नहीं की गाँधी जिन्दा रहते तो पार्टीशन टिकने वाला नहीं था जिन्ना की भी अक्ल ठिकाने आ गयी थी ”Saurabh Bajpaiसंयोजक, राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट
    15 November at 19:36 ·
    अंग्रेज़ हो या मुहम्मद अली ज़िन्ना को एक छोटा-सा पत्थर भी कभी न मारने वाले नथूराम गोडसे को अपना आदर्श मानने वालो से मेरे (नरेश बारीया स्वदेशी) कुछ सवाल हैं।
    ********************
    1. 7/10/1930 भगतसिंह को कोर्ट ने फांसी की सज़ा सुनाई उस वक्त गांधीजी नमक सत्याग्रह करने के जुर्म में जेल में थे. 26/1/1931 के दिन गांधीजी जेल से रिहा हुए किंतु सावरकर, नथूराम और हेडगेवार तो जेल से आजाद घूम रहे थे. इन्होने भगतसिंह को बचाने के लिए क्या कीया ?
    2. गोडसे ग्रुप ने २५ जून १९३४ फिर १९३९, १९४४ और १९४६ में गांधीजी पर जान लेवा हमला क्यों किया ? इन सालों में पाकिस्तान को ५५ करोड़ देने का मुद्दा ही नही था !
    3. वैसे भी देश विभाजन दस्तावेज पर सबसे पहले सरदार पटेल ने हस्ताक्षर किए थे. सिखो की ओर से सरदार बलदेव सिंह ने विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार किया गया था| विभाजन की घोषणा ऑल इंडिया रेडियो पर पंडित नेहरु ने की थी।
    4. नाथूराम और उनकी टीम गांधीजी की प्रार्थना सभाओ में हथगोले फैकते थे तब उन्हें बाकी लोगो की जान की फ़िक्र क्यों नही होती थी? प्रार्थना सभाओ में हथगोले फेंकना कौन सी धर्म-पुस्तक में लिखा है?
    5. ये भी एक झूठ फैलाया जा रहा है की नथुराम ने सरेंडर किया था जबकि सच तो ये है की नाथूराम को रघुमाली ने धरदबोचा था ।
    6. जब गांधीजी को गोली मारने के बाद लोगो में यह अफवाह फ़ैल गई थी की हत्यारा मुसलमान है। लोग मुसलमान के खिलाफ सबक सिखाने के नारे लगा रहे थे तब गोडसे चुप क्यों था ? अपनी पहचान क्यों नही बता रहा था ? पुणे के मामा गाडगिल द्वारा नथुराम गोडसे की पहचान हुई । तबतक वो चुप क्यों था।
    7. सारा भारत जानता था की गांधीजी देश विभाजन के सख्त खिलाफ थे , बटवारे के बाद उन्होने पाकीस्तान को फिर से भारत में शामिल करने के लिए भारत से पाकिस्तान पदयात्रा करने की घोषणा भी करदी थी . . . .
    ? तब फिर सच बताओ गांधीजी की हत्या का कारण क्या था गोडसे का मंदिर बनाने वालों| चलो मैं ही बताता हूँ. गांधीजी की हत्या के कारण निम्न थे:
    १ ) देश का झंडा तिरंगा क्यों ? भगवा क्यों नही ?
    २ ) हरिजनो को कुंवे – तालाब से पानी भरने की छूट क्यों ?
    ३ ) हरिजनों को मंदिर में प्रवेश क्यों ?
    ४ ) महिलाओं को घर के परदे से निकालकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश क्यों ?
    ५ ) भजन में ईश्वर के साथ अल्लाह क्यों ?
    ६ ) हिन्दू – मुस्लिम एकता की बाते क्यों ?
    ७ ) सभी धर्म – वर्ण को साथ में लेकर चलने की बात क्यों ?
    ८ ) १९३२ में हुआ पूना पैक्ट समझोते में हरिजनो को इतनी सहूलियत क्यों ? ”

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  • December 5, 2017 at 6:12 pm
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    Vijay Akshit
    16 hrs ·
    गांधी और अम्बेडकर दोनों की कटु आलोचना है इसमें । सहिष्णु लोग ही पढ़ने की हिम्मत करें ।
    #वोल्गा_से _गंगा’
    “अच्छा! मैं आपका नाम जान सकता हूँ ?
    मेरा नाम सुमेर है । मैं पटना कॉलेज में पंचम वर्ष का विद्यार्थी हूँ ।
    और मेरा नाम रामबालक ओझा है । मैं भी एक वक्त पटना कॉलेज का विद्यार्थी रह चुका हूं , किंतु उसे बीस साल से ऊपर हुए । एक मित्र ने जोर दिया, नही तो मैं एमए किये बिना ही असहयोग कर रहा था ।
    खैर ! वैसा होने पर भी मुझे अफसोस न होता । मुझे इन वर्षों में साफ मालूम होने लगा है कि यह स्कूल कॉलेज की पढ़ाई अनर्थकारी विद्या है
    तो आपने वह विद्या भुला दी होगी ?
    करीब करीब बिल्कुल भूल जाती, मैं कोरी सलेट हो जाता, तो कितना अच्छा होता । उस वक्त मैं सच्चाई को अच्छी तरह पकड़ पाता ।
    अर्थात बुद्धि के नही बल्कि श्रद्धा के पथ पर आंख मूंदकर आरूढ़ होते ?
    श्रद्धा के पथ को आप बुरा समझते है सुमेर बाबू?
    मैं बाबू नही हूँ ओझा जी । मैं एक साधारण चमार का लड़का हूँ । मेरे घर मे एक धूर भर भी जमीन नही है, थी किंतु जमीदार ने जबरजस्ती दखल कर वहां अपना बगीचा बनवा लिया । मां कूट-पीसकर अब भी पेट पालती है । मुझे पहले एक सज्जन की कृपा फिर स्कालरशिप यहां तक लाई । इस तरह आप समझ सकते है कि मैं बाबू शब्द का मुश्तहक नही हूँ ।
    आदतवश सुनिये सुमेर जी । लेकिन मुझे आपका जो परिचय अभी मिला है, उससे मुझे बड़ी खुसी हुई है । जानते है गांधी जी के एक शिष्य को हरिजन तरुण को इस प्रकार संग्राम करते देख कितना आनंद होता होगा ।
    ओझा जी ! मैं आपसे और बातें करना चाहता हूं और स्नेह के साथ, इसलिए यदि आप मेरे मतभेद को पहले ही जान लें, तो मैं समझता हूं अच्छा होगा । मैं हरिजन नाम से सख्त घृणा करता हूँ । मैं हरिजन पत्र को पुराण पंथी भारत को अंधकार युग की ओर खींचने वाला पत्र समझता हूं और गांधी को अपनी जात का दुश्मन ।
    आप अपनी जाति पर गांधीजी का कोई उपकार नही मानते ?
    उतना ही उपकार मानता हूं जितना मजदूर को मिल मालिक का मानना चाहिए ।
    गांधी जी मालिक बनने के लिए नही कहते ।
    जमीदारों पूंजीपतियों राजाओं को वली-संरक्षक-गार्जियन कहने का दूसरा अर्थ क्या हो सकता है ? गांधी जी का हमारे साथ प्रेम इसलिए है कि हम हिंदुयों में से निकल न जाएं । पूना में आमरण अनसन इसलिए किया था कि हम हिंदुयों को हज़ार वर्षों से सस्ते दासों की जरूरत थी , और हमारी जाती ने उसकी पूर्ति की । पहले हमें दास कहा जाता था अब गांधी जी हरिजन कहकर हमारा उद्धार करने की बात करते है । शायद हिंदुयों के बाद हरि ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन रहा है । आप खुद समझ सकते है, ऐसे हरि का जन बनना हम कब पसंद करेंगे ?
    तो आप भगवान को भी नही मानते?
    किस उपकार का? हज़ारों वर्षों से हमारी जाति पशु से बदतर अछूत अपमानित समझी जा रही है और उसी भगवान के नाम पर जो हिंदुयों की बड़ी बड़ी जातियों की जरा जरा सी बात पर अवतार लेता रहा, रथ हांकता रहा, किंतु सैकड़ो पीढ़ियों से हमारी स्त्रियों की इज़्ज़त बिगाड़ी जाती रही । हम बाजारों में, सोनपुर के मेले में पशुयों की तरह बिकते रहे, आज भी गाली मार कहना, भूखे मरना ही हमारे लिए भगवान की दया है बतलाई जाती है । इतना होने पर भी जिस भगवान के कान में जूं तक नही रेंगी, उसे माने हमारी बला ।
    तो आप डॉक्टर अम्बेडकर के रास्ते को पसंद करते होंगे?
    गलत । डॉक्टर अम्बेडकर भुक्तभोगी है । मुझे भी प्रथम द्वितीय वर्ष में हिन्दू लड़कों ने होस्टल में नही रहने दिया, किंतु मैं अम्बेडकर के रास्ते और कांग्रेसी अछूत नेताओ के रास्ते मे कोई अंतर नही देखता । और मेरी समझ में वह रास्ता गांधी बिड़ला बजाज रास्ते से भी मिल जाता है । उसका अर्थ है, अछूतों में भी कुछ पांच पांच छै छै हज़ार महीना पाने वाले बन जाएं । अछूतों के पास यदि एक दो देशी रियायतें नही तो एक दो छोटी मोटी जमीदारियाँ ही आ जाएं । मगर इससे दस करोड़ अछूतों की दयनीय दशा दूर नही की जा सकती ।
    तो आपका मतलब है, शोषण बंद होना चाहिए ?
    हाँ, गरीबों की कमाई पर मोटे मोटे होने वालों का भारत मे नामो निशान यदि न रहे तभी हमारी समस्या हल हो सकती है ।
    गांधी जी इसीलिए तो हाथ के कपड़े हाथ के गुड़ हाथ के चावल – सभी हाथ की चीज़ों के इस्तेमाल करने पर जोर देते है ।
    हाँ बिड़ले और बजाजो के रुपये के बल पर । जब खादी संघ को लाख दो लाख का घाटा होता है तो कोई सेठ उठकर चेक काट देता है । यदि यकीन होता है, कि गांधी के चर्खे-करघे से उनकी मिलें बंद हो जाएंगी और मोती के हार और रेशम की साड़ियां सपना हो जाएंगी, तो याद रखिये ओझा जी! कोई सेठ सेठानी गांधी जी की आरती उतारने न आते ।
    तो आप गांधीवादियों को दलाल समझते है?
    मुझे इसमें जरा भी संदेह नही है । जो कुछ कोर कसर थी उसे उन्होंने घर फूँक नीति के विरुद्ध हिंदुस्तानी सेठों के हुयाँ हुयाँ में शामिल हो पूरा कर दिया । Vijay Akshit”
    #copy

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  • January 22, 2018 at 1:19 pm
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    Nitin Thakur
    1 hr ·
    सुभाषचंद्र बोस के साथ महात्मा गांधी के मतभेदों को गांधी विरोधियों ने खूब उछाला है। 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नेताजी के सामने गांधी ने पट्टाभिसीतारमैया को उतारा था। उनके पास कई कांग्रेसी सुभाष के खिलाफ शिकायत लेकर आए थे। चुनाव हुए और गांधी के समर्थन के बावजूद सीतारमैया हार गए। सुभाष को 1580 वोट मिले थे जबकि सीतारमैया को महज़ 1377 वोट मिल सके। गांधी जी ने इसके बाद एक बड़ी गलती की। अपनी हताशा नहीं छिपा सके और इस हार को अपनी हार बताते हुए कह दिया कि जो भी कार्यकारिणी छोड़ना चाहें वो छोड़ सकते हैं। 14 में से 12 सदस्यों ने तुरंत इस्तीफा दे दिया जिसके बाद सुभाष ने भी इस्तीफा सौंप कर कांग्रेस से हमेशा के लिए किनारा कर लिया।
    अब सुनाता हूं गांधी से जुड़ी दूसरी कहानी जो कम ही बताई जाती है। इस घटना के करीब तीन साल बाद 1942 के अगस्त महीने में AICC के 13 वामपंथी सदस्यों ने भारत छोड़ो आंदोलन प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया। ऐसा करने के उनके अपने कारण थे, जैसे आंदोलन में साथ ना देने के संघ की अपनी वजहें थीं। गांधी ने खुद से असहमत इन वामपंथियों को बुरा भला नहीं कहा। गांधी अपनी गलती से सीख रहे थे। उनका पूरा जीवन ही इस बात का सबूत था। गांधी ने उन असहमत 13 सदस्यो को बधाई देते हुए कहा कि उन्हें प्रस्ताव पर वोटिंग में अपनी हार के कारण लज्जित होने की ज़रूरत नहीं है। पिछले बीस सालों से हम यही सीख रहे हैं कि हम तब भी हिम्मत ना हारें जब हम बिल्कुल अल्पमत में हों और हम पर लोग हंसें। इस विश्वास से कि हम सही हैं हमने अपने विश्वासों पर दृढ़ रहना सीखा है। यही उचित है कि हम इस दृढ़ आस्था के साहस को बनाए रखें क्योंकि यह मनुष्य को आदर्श बनाती है तथा उसके नैतिक स्तर को ऊंचा उठाती है, इसलिए मैं यह देखकर खुश हुआ कि इन मित्रों ने उस सिद्धांत को हृदयंगम किया जिसका मैंने पिछले पचास सालों से अनुसरण करने का प्रयास किया है।

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  • January 30, 2018 at 12:19 pm
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    इसमें कोई शक नहीं हे की बहुत से दलित लेखक नेता आदि सिर्फ अपनी इमेज बनाने और चर्चा की खातिर गाँधी और प्रेमचंद को ज़बर्दस्ती निशाने पर लेते रहे हे उन्हे पता हे की इसमें खतरा भी कुछ नहीं हे भला कौन गाँधी या प्रेमचंद का समर्थक हमला या मुकदमा करने आ रहा हे यानी इसमें सिर्फ आना ही आना हे और कुछ नहीं तो चर्चा का सुख तो होगा ही एक पाकिस्तानी किस्सा भी हे की तीस जनवरी से पहले गाँधी पाकिस्तान आने वाले थे तो लाहौर में मुस्लिम लीग के नेता ने एक पुलिस अधिकारी से पूछा की गाँधी यहाँ आएंगे तो उन्हें कोई खतरा तो नहीं होगा———– ? अधिकारी ने कहा उन्हें तो नहीं जनाब मगर आप लोगो को जरूर खतरा हो जाएगा Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna2 hrs · Dehra Dun · जिस कारण से मायावती गांधी को गालियां बकती रही हैं , लगभग उसी कारण से गोडसे ने गांघी को मारा है ।आधुनिक युग मे , बुद्ध के पश्चात गांधी से बढ़ कर दलित समुद्धारक शायद ही कोई हुआ हो । अब जबतक मायावती गांधी का प्रतिमा भंजन न करे , उन्हें दलित विरोधी न सिद्ध करे , तब तक उसे दलितों की एकमात्र अधिष्ठात्री देवी कौन माने ?
    इसी तरह मन, वचन और कर्म से सच्चे , पावन वैष्णव हिन्दू गांधी को हिन्दू विरोधी साबित किये बगैर क्रूर , आततायी हिन्दू धर्म ध्वजियों की दाल कैसे गलती ?सर्व विदित है , की हत्या न होती , तो 15 दिन बाद गांधी अल्प संख्यक ( हिंदुओं ) पर हो रहे ज़ुल्मों का प्रतिकार करने पाकिस्तान जा रहे थे । यह बात सावरकर और जिन्ना दोनों के लिए समान रूप से परेशानी का सबब थी । अतः गांघी का हनन न करते , तो क्या करते ।
    और एक तथ्य गोडसे को त्यागी , बलिदानी सिद्ध करने वालों के दृष्टिगोचर । गांधी को हतने से पहले नराधम नीच नाथू राम चंदे की रक़म से अपना भारी भरकम बीमा करा चुका था , और उसका साथी पाहवा 2 दिन पहले उसी चंदे की रकम से रंडी बाज़ी करते पकड़ा गया था

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  • April 15, 2018 at 10:50 pm
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    Manoj
    13 April at 13:32 ·
    ‘कुछ शहर के लोग भी जालिम थे..
    कुछ मुझे मरने का शौक़ भी था’
    1947 में भारत विभाजन के वक़्त सिंध में 51% से ज्यादा हिन्दू आबादी थी..सिंध विभाजन की मीटिंग में सिन्धी हिन्दुओं के प्रतिनिधि लाला दौलतराम जगतराम ,नेहरु,गाँधी, जिन्ना व अन्य नेता बटवारे की रूपरेखा तैयार कर रहे थे ..मीटिंग में तय हुआ की राजस्थान के 3 रेगिस्तानी जिले बाड़मेर ,जालोर,जैसलमेर ,..और सिंध के 4 हिन्दु बहुल जिले नगरपारकर ,थारपारकर ,उमरकोट (तब अमरकोट)और हैदराबाद को मिलाकर एक पृथक सिंध राज्य बनाया जाये और इस सिंध को भारत में सम्मिलित करने पर सहमति भी बन गयी.. अर्थार्त पंजाब की ही तरह सिंध का भी बटवारा तय हो गया था और हिन्दू बहुल जिले भारत में आने थे ..मगर नेहरु और सिन्धी प्रतिनिधि ने सारा सिंध प्रान्त पाकिस्तान को देने की वकालत इस तथ्य के आधार पर की कि ‘सिन्धी हिन्दू चीनी की तरह है जो कहीं भी घुल मिल कर रह लेगा’..और इस तरह सारा सिंध पाकिस्तान को तोहफे में दे कर नेहरु ने अपना ‘बड़ा दिल’ दिखाते हुए ‘धरमनिर्पेक्षता ‘ की मिसाल कायम की.बाद में लाला दौलतराम को नेहरु की कैबिनेट में मंत्री भी बनाया गया.
    जरा सोचिये कितनी ही हिन्दू बच्चियां की इज्जत लुटने से बच जाती,,मासूम लोगों को जबरन धर्म परिवर्तन की पीड़ा से न गुजरना पड़ता .. अगर उस वक़्त के निक्कमें भारतीय प्रतिनिधि दूरंदेशी से काम लेते.नेहरु-गाँधी तो चले गए मगर करोड़ों हिंदुस्तानिओं की जिंदगी नासूर बना गए.

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  • May 1, 2018 at 6:04 pm
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    Nitin Thakur
    Yesterday at 15:22 ·
    कल महात्मा गांधी के अंतिम उपवास पर चर्चा छिड़ी। हर किसी की इस पर अपनी राय थी। मैंने जो लिखा शायद बहुत से दोस्तों को स्पष्ट नहीं हो सका। इतिहास पर लिखी गई संक्षिप्त पोस्ट में जहां कई तरह की घटनाओं, नज़रिये, व्यक्तियों और परिस्थितियों के परिणामस्वरूप कुछ घटता है वहां यही खतरा रहता है। विस्तार से ना लिखी गई बातों के कई अर्थ निकलते हैं। अब इस लंबी पोस्ट के ज़िम्मेदार आप हैं क्योंकि मुझे कुछ विस्तार में जाना पड़ा। हालांकि मैं जानता हूं कि इसके बाद भी कई बातें अधूरी रह जाएंगी।

    महात्मा गांधी हिंदू-मुस्लिम हिंसा से बेहद परेशान थे। 9 सितंबर 1947 को दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने जो माहौल देखा उसमें उनका चिंतित होना स्वाभाविक था। दुनिया की नज़र हिंदुस्तान पर थी और दिल्ली में जो भी चल रहा था उस पर पैनी नज़र गांधी की थी। चौतरफा निराशा से भरे गांधी जी ने 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन शुरू कर दिया। ये अचानक किया गया फैसला था जिसकी घोषणा 12 जनवरी की शाम को ही हुई थी। नेहरू और पटेल से रोज़ मिलते रहने के बावजूद उन्होंने अनशन की बात किसी से नहीं बताई थी। बापू ने 12 जनवरी की शाम प्रार्थना सभा के भाषण में जो कहा उससे उनके अनशन करने की वजहों पर थोड़ी रौशनी पड़ रही है। उन्होंने कहा था कि वो कलकत्ते से दिल्ली आने के बाद पश्चिमी पंजाब जा रहे थे लेकिन ‘मुर्दों के शहर के समान’ दिखनेवाली दिल्ली की हालत भांप कर वो यहीं रुक गए। गांधी आगे बोलते हैं कि हिंदू, सिख और मुसलमानों में दिली दोस्ती के लिए मैं तरस रहा हूं लेकिन आज उसका अस्तित्व नहीं है। मुझे मेरी लाचारी खाए जा रही है और पिछले तीन दिन से इस बारे में मैं विचार कर रहा हूं। आखिरी निर्णय बिजली की तरह मेरे सामने चमक गया है और मैं खुश हूं।
    उन्होंने दो टूक कहा था कि अगर सारे हिंदुस्तान पर- या कम से कम दिल्ली पर उपवास का ठीक असर हुआ तो ये जल्दी भी छूट सकता है।

    उस समय गांधी जी को पूरे हिंदुस्तान और तब बन चुके पाकिस्तान से खूब खत आते थे। किसी में प्रार्थना, किसी में सवाल, किसी में गाली लिखी होती थी। इस समय तक ऐसे खतों की बाढ़ आ गई थी जिसमें उन्हें मुसलमानों का हिमायती कहकर कोसा जाता था। नफरत की आंधी के बीच शांति की बात कहनेवाले बूढ़े के प्रति सबकी अपनी राय थी और दुर्भाग्य से अंधे हो चुके समाज में अधिकांश मुखर लोग उन्हें कोस ही रहे थे। चूंकि गांधी भारत में मारे जा रहे मुसलमानों को लेकर खुलेआम फिक्र जता रहे थे (पाकिस्तान में मारे जा रहे हिंदुओं-सिखों के प्रति भी) तो कई हिंदूवादी रुझान के लोगों ने प्रचारित करना शुरू कर दिया कि वो सरदार पटेल के गृहमंत्रालय के खिलाफ हैं और उसे बदनाम कर रहे हैं। यूं भी गांधी जी की एक वैश्विक अपील थी। उनकी जताई जा रही फिक्र को पूरी दुनिया सुन रही थी। गांधी विरोधियों ने कहना शुरू किया कि गांधी की बातों से दुनिया को यही संदेश जा रहा है कि भारत में मुसलमानों पर बड़ा अत्याचार हो रहा है। एक खत उनके पास आया जिसमें इस बात पर चिंता ज़ाहिर की गई कि आपके उपवास से पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र के सामने ये कहने का बहाना मिल जाएगा कि गांधी जी अपने हिंदू अनुयायियों से, जिन्होंने हिंदुस्तान में मुसलमानों की ज़िंदगी आफत में डाल रखी है, पागलपन छुड़ाने के लिए उपवास कर रहे हैं।

    मुश्किल हालात और सवालों के घेरे में जूझते गांधी जी के लिए हर पल तनावपूर्ण होता जा रहा था। ये तनाव अंग्रेज़ नहीं बल्कि इस मुल्क के लोग उन्हें दे रहे थे। जब प्रश्न मनुष्य के जीवन का हो तब कुछ लोग उन्हें कूटनीति और राजनीति पर ध्यान लगाने की सलाह दे रहे थे। गांधी जी हिंसा की आग बुझाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे और इसीलिए उनकी प्राथमिकताओं में तब राष्ट्र के छवि निर्माण और वैश्विक संकट जैसे प्रश्न थे ही नहीं। ऐसा नहीं कि वो पाकिस्तान को नहीं डपटते थे। उन्होंने 15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान में भारी हिंसा की खबर सुनने के बाद कहा था- मैं मुसलमानों को कहना चाहता हूं कि आपके नाम से पाकिस्तान में ऐसा बनता रहे तो पीछे हिंदुस्तान के लोग कहां तक बर्दाश्त करेंगे? मेरी तरह सौ आदमी भी फाका करें तो भी नहीं रुक सकता है।
    महात्मा गांधी जानते थे कि एकतरफा अहिंसा से कुछ नहीं होगा जब तक कि दूसरे पक्ष से भी उसी तरह का रिस्पॉन्स ना आए। उन्हें खूब मालूम था कि हर किसी के सब्र का एक पैमाना होता ही है।

    और फिर अनशन के तीसरे ही दिन पहला नाटकीय प्रभाव हुआ। भारत सरकार ने अपना वो फैसला बदल डाला जिसके मुताबिक उसने तय किया था कि पाकिस्तान को जो 55 करोड़ रुपया दिया जाना था वो कश्मीर मसले के निपटने के बाद जारी किया जाएगा। अंग्रेज़ों द्वारा सत्ता हस्तांतरण के वक्त 375 करोड़ रुपए का कैश सरकारी कोष में था। पाकिस्तान के हिस्से में 75 करोड़ रुपए आते थे जिसमें 14 अगस्त 1947 को ही 20 करोड़ दिए जा चुके थे। इससे पहले कि शेष राशि पाकिस्तानी सरकार को दी जाती कश्मीर गर्म हो गया। भारत सरकार ने माना कि यदि 55 करोड़ रुपया दिया गया तो पाकिस्तान उसका प्रयोग कश्मीर में जारी युद्ध में करेगा। गांधी सरकारों के बीच चल रही माथापच्ची से अलग चाहते थे कि पाकिस्तान को रकम देकर दोनों देशों के बीच बढ़ती तल्खी में से एक वजह खत्म की जाए। पटेल का रुख साफ था लेकिन दोनों तरफ की हिंसा से निराश गांधी को जान जोखिम में डालकर बैठा देख पटेल और नेहरू हिल गए। उन्होंने फैसला बदल दिया। 15 जनवरी की रात बकाया रकम के लिए आदेश जारी हो गए। अगले दिन गांधी अपने अनुयायियों के इस फैसले से खुश दिखे। उन्होंने देश की सरकार को ज़िम्मेदार बताते हुए खूब तारीफ की। उसे बड़े दिल वाला हुकूमत कहा। उन्होंने कहा- ”इसमें मुसलमानों को संतुष्ट करने की बात नहीं है। यह तो अपने आपको संतुष्ट करने की बात है। कोई भी हुकूमत जो बहुत बड़ी जनता की प्रतिनिधि है, बेसमझ जनता से तालियां पिटवाने के लिए कोई कदम नहीं उठा सकती है।” आगे भी पढ़िए जो उन्होंने कहा- ”मगर हिंदुस्तान की हुकूमत
    का ये कदम सच्चे माने में दोस्ती बढ़ाने और मिठास पैदा करनेवाली चीज़ है। इससे पाकिस्तान की भी परीक्षा हो जाएगी। नतीजा यह होना चाहिए कि न सिर्फ कश्मीर का, बल्कि हुिंदुस्तान और पाकिस्तान में जितने मतभेद हैं सबका सम्मानजनक आपस-आपस में फैसला हो जाए। ”

    गांधी जी के अनशन का पाकिस्तान में भी प्रभाव पड़ रहा था। वहां से तार आने लगे। उन्हें अनशन तोड़ने के लिए मनाया जाने लगा। तब गांधी जी ने वहां के लिए भी संदेश भिजवाया। इस बीच सरदार पटेल की स्थिति गृहमंत्री के तौर पर बेहद जटिल हो गई। शांति प्रयासों के लिए जैसी आलोचना गांधी की हो रही थी, वैसी ही आलोचना गांधी जी को अनशन के लिए विवश करने पर पटेल की हो रही थी। विड़ंबना ये थी कि दोनों कर्तव्यों से बंधे थे मगर परिस्थितियों के सामने मजबूर होकर एक-दूसरे के सामने खड़े कर दिए गए थे। 15 जनवरी की सुबह ही सरदार पटेल ने गांधी जी को खत लिखकर अपना दुख ज़ाहिर किया और खुद को गृहमंत्री के भार से मुक्त करने का आग्रह किया। वो खूब समझ रहे थे कि एक तरफ वो खुद गांधी के अनुयायी हैं लेकिन दूसरी तरफ एक नए आज़ाद हुए देश की सुरक्षा का ज़िम्मा भी उनके हाथों में है और नई भूमिका में ऐसा बहुत कुछ करना पड़ रहा है जो उन्हें उनके गुरू के सामने असहज बना रहा है। मतभेद ज़ाहिर थे, और गांधी के दुश्मनों को इससे मौका मिल गया था। उन्होंने पटेल के कंधे पर रखकर बंदूक चलानी शुरू कर दी थी। ये बात गांधी,नेहरू और पटेल को समझ आ रही थी। आज तीनों नहीं हैं लेकिन खेल जारी है।

    पटेल किसी और ही मिट्टी के थे। ऊपर से कठोर लेकिन अंदर से कोमल, मगर हर कोई गांंधी जी और 55 करोड़ रुपए वाले मुद्दे पर उतनी सहनशीलता और बारीक सोच नहीं रखता था। बिड़ला भवन के बाहर नारेबाज़ इकट्ठे होकर नारे लगा रहे थे- गांधी को मरने दो, खून का बदला खून से लेंगे। कट्टरपंथ की राह पर चल रही जनता में आम राय थी कि पटेल नायक हैं और गांधी खलनायक। इससे आगे की राह आम लोगों को सूझ भी नहीं सकती थी। 13 से शुरू हुआ अनशन 17 तक चिंताजनक बन गया। नेहरू ने आम सभा में कहा- गांधी जी का चले जाना भारत की आत्मा का चले जाना होगा।
    पाकिस्तान में सहायता व पुनर्वास मंत्री गजनफर अली खां ने दोनों देशों के लोगों से कहा कि गांधी के उपवास से उनकी आंखें खुल जानी चाहिए और उन्हें अपने किए पर शर्म आनी चाहिए।

    राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में केंद्रीय शांति समिति का गठन हुआ। गांधी की सभी 7 शर्तें मान ली गईं। 17 जनवरी को मौलानाओं का एक समूह गांधी जी से मिलने पहुंचा। उन्होंने बताया कि हालात सुधर रहे हैं। यहां तक कि कराची जा चुके कुछ मुसलमान परिवार लौटना चाहते हैं। सब्ज़ी मंडी से कुछ व्यापारी चले आए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि मुसलमानों के साथ बंद किया गया व्यापार वो फिर शुरू कर रहे हैं। भीड़ बढ़ने लगी। बिड़ला भवन के बाहर हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई के नारे सुने जाने लगे। 18 जनवरी तक गांधी जी की जान की फिक्र सब पर हावी थी। कुछेक थे जो अब तक नफरत की आग में जल रहे थे। एक शांति प्रतिज्ञा तैयार कराई गई। हिंदी और उर्दू में लिखवाई गई। भाई-भाई की तरह रहने की प्रतिज्ञाएं की गईं। प्रतिज्ञा पर हिंदू महासभा, आरएसएस, सिख, मुसलमान, शरणार्थी, दिल्ली प्रशासन के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। सबने एक के बाद एक छोटे भाषण दिए। गांधी जी को आश्वासन दिया कि अब एक-दूसरे को नहीं मारेंगे।

    इसके बाद उनका अनशन टूट गया था लेकिन नफरत पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। उनकी हत्या के चार असफल प्रयासों के बाद नई घटनाओं ने गांधी विरोधियों को पागल कर दिया था। 55 करोड़ रुपए वाली बात एक नया बहाना बन कर जुड़ गई। ये साफ हो गया था कि गांधी अपने दम पर सरकारों के फैसले बदल सकते हैं। अभी उनका प्रभाव कायम था। गोड़से ने गांधी हत्या की सुनवाई के दौरान अपने कृत्य के पीछे कई वजहें बताईं और 55 करोड़ की रकम का भी ज़िक्र किया। बहुत लोग कहते मिले कि इस रकम का उल्लेख तो नाथूराम ने इसलिए किया ताकि हत्या को जस्टिफाई किया जा सके। मुझे समझ ही नहीं आया कि इस बात से गांधी की हत्या जायज़ कैसे हो जाएगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि तर्क देनेवाले खुद भी इस बात से सहमत हैं कि 55 करोड़ रुपए नहीं देने चाहिए थे और अगर ‘वाकई’ इस मुद्दे पर हत्या कर दी गई तो वो ‘कहीं ना कहीं’ उचित है???!!!
    खैर..
    #इतिइतिहास
    (स्रोत- गांधी एक असंभव संभावना, BEYOND DOUBT, मैंने गांधी वध क्यों किया)

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  • June 2, 2018 at 7:19 am
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    Girraj Ved19 hrs · भगवा गैंग की नेहरू से नफरत की वजह !!
    नेहरू जी का व्यक्तित्व इतना विराट है की कमसेकम मैं तो देश को आजाद करवाने से लेकर देश निर्माण में उनके योगदान और लोकतंत्र की नींव को मज़बूती देकर देश के विकास को रफ्तार देने की, उनकी मेहनत और समर्पण की समीक्षा के लायक नहीँ हूँ !
    फिर भी जितनी मेरी जानकारी है उसके आधार पर कुछ लिखूं उससे पहले “ये तस्वीर देखना जरुरी है !”
    ये तस्वीर 1957 की है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु जी ने झारखंड में दामोदर वैली में बने पंचेत बांध का उद्घाटन उसी बाँध के निर्माण में काम करने वाली एक महिला मजदूर बुधुनी से करवाया था !
    क्योंकि नेहरू जी न प्रचार के भूखे थे न हर काम का श्रेय खुद लेना चाहते थे ! उनको लगता था की देश के विकास और किसी भी निर्माण की असल हकदार सरकार नहीँ देश की जनता, मजदूर और किसान है !
    एक राष्ट्रवादी जननेता के लिए जब सरकार से बढ़कर जनता महत्वपूर्ण हो जाती है उसे ही हम सही मायने में राष्ट्रवादी कह सकते है !
    नेहरू जी का राष्ट्रवाद इस देश के विकास, तरक्की, भाईचारे, समानता और एकता का राष्ट्रवाद था !
    और अब एक राष्ट्रवाद, वर्तमान सरकार और उसके मुखिया का है ! ये राष्ट्रवाद देश की तरक्की, समानता और विकास का नहीँ बल्कि उसकी सनक का राष्ट्रवाद है ! एक पागल वहशी और प्रचार के भूखे का राष्ट्रवाद है ! उस वहशी का राष्ट्रवाद है जो नेहरू, गाँधी, अम्बेडकर की नस्ल और इतिहास बदलने आया और बहुत अल्प समय में ही खुद एक बदनाम नस्ल के रुप में याद किया जाने लगा है !
    आज भले ही उसका इतिहास कुछ लोगों के लिए भक्ति का और बाकी के लिए खौफ का राष्ट्रवाद हो लेकिन इतिहास में इसे सिर्फ घिनौना राष्ट्रवाद लिखा जायेगा !
    इस भगवा गैंग की नेहरू जी से नफरत की सबसे बड़ी वजह इनके डीएनए में है ! कौन नहीँ जानता की आरएसएस देश की प्रगतिशील ताकतों का हमेशा से विरोध करता रहा है, और आजादी के तुरंत बाद ही गांधी जी की हत्या कर अपनी मंशा को जगजाहिर भी कर दिया !
    कौन थे नेहरू ?
    देश की आजादी के वक़्त व्याप्त आराजकता, भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, साम्प्रदायिक दंगों और हजारो कमियों के बावजूद स्वतंत्रता के बाद नेहरू ने अपने हाथ आये देश को संवारकर, कुछ ही सालों में विश्व में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करवाई !
    नेहरू सिर्फ एक नेता नहीँ, एक ऐसे युगद्रष्टा थे जिन्होंने आने वाले समय की पदचाप को सुना और शायद यही वजह है कि उन्होंने न केवल आईआईटी, आईआईएम और विश्वविद्यालयों की स्थापना की बल्कि देश में उद्योग धंधों की नींव रखी ! इन संस्थानों, उद्योगों व कलकारखानों को वे देश के आधुनिक मंदिर मानते थे ! नेहरू जी ने आजादी के बाद विभाजन की विभीषिका से निपटने के साथ साथ देश को विकास-पथ पर ‘आराम हराम है’ के नारे के साथ गतिमान रखकर ‘सूई से लेकर जहाज तक’ में आत्मनिर्भर बनाया !
    लेकिन 2014 में नेहरू को विरमित करने के लिए मीडिया और कॉर्पोरेट के सहयोग से खतरनाक साजिश के तहत उन हत्यारे और गुंडों के हाथ में जिनका इतिहास कायरता और गद्दारी से भरा हुआ था, उनके हाथों में देश की बागडोर को सौंप दिया गया !
    ऐसे सनकी और वहशियों के हाथ में, जिन्हे न तो इतिहास की सटीक जानकारी है और न ही वह अपनी जानकारी दुरूस्त ही करना चाहते है ! ऐसे में देश की उन तमाम संस्थाओं ने जिनपर देश के लोकतंत्र का दारोमदार टिका हुआ है, उसे एक-एक कर मिटाना शुरू कर दिया है ! ये जांच एजेंसियों के अलावा देश के सर्वोच्च न्यायालय तक को खरीदने या मिटाने पर तुल गये है ! देश के बैंकिंग प्रणाली के सर्वोच्च निकाय आरबीआई में अपने एक एजेंट को नियुक्त कर देश की बैंकिंग प्रणाली को तहस-नहस कर दिया और देश की जनता पर नोटबंदी जैसी काले नियम लाद दिये और एक ही रात में देशवासियों को भिखारी बना दिया ! जिस कारण तकरीबन डेढ़ सौ से अधिक लोगों की जान चली गई !
    इन अराजक हत्यारो ने अपनी उपस्थिति लगातार बनाये रखने के लिए देश भर में हिन्दु-मुस्लिम, साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के बाद दलितों- पिछड़ों -आदिवासियों -औरतों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है ! छात्रों को अशिक्षित रखने के लिए शिक्षण संस्थानों पर हमले तेज कर दिये, इनके विरोध में खड़े पानेसर, कलिबुर्गी, गौरी लंकेश जैसे बुद्धिजीवीयो की हत्या कर दी गई ताकि सवाल उठाने वाला कोई न बचे ! इसके अतिरिक्त चुनाव के माध्यम से उसे कभी बेदखल नहीं किया जा सके इसके लिए उसने चुनाव प्रणाली में अपने एजेंट घुसा दिये और चुनाव आयोग को अपना हथियार बना लिया !
    लेकिन नेहरू जी को शायद आज के दौर का अंदेशा था ! इसलिए, हत्यारों की उपस्थिति को रोकने की खातिर नेहरू ने देश में लोकतंत्र की नींव को मजबूती से बिठाया था ! इस कारण इन अपराधियों और हत्यारों को इस लोकतंत्र में घुटन महसूस हो रही है, वह अपनी मनमाफिक देश में तानाशाही लागू नहीं कर पा रहे है, विरोध के स्वर हर दिन उठ रहे है ! और विरोध के यह स्वर बढ़ते ही जा रहे है !
    देश की जनता अपनी सवालों पर एकजुट हो रही है ! रोज सड़कों पर उतर रही है ! इन हत्यारे- अपराधियों के गिरोह के खिलाफ नारे लगा रही है !
    यही कारण है कि इन अपराधियों- हत्यारे लोगों का गिरोह नेहरू से नफरत करता है, उसके खानदान से नफरत करता है और दिन- रात उसके खिलाफ आग उगलता रहता है !
    दरअसल इनको पीढ़ा और दर्द नेहरू से नहीँ नेहरू के बनाये मजबूत लोकतंत्र से है ! जहाँ ये खुलकर तानाशाही नहीँ कर पा रहे !———————–
    Girraj Ved
    27 May at 11:41 ·
    #चार_साल_बेमिसाल – 1
    ( विदेश में बजता डंका )

    कुछ भी हो लेकिन जब से माननीय की सरकार आयी है देश बदला या नहीँ, ये तो नहीँ पता लेकिन देशवासियों के सोचने का तरीका वाक़ई बदल गया !
    कुछ साल पहले तक भारत का कोई प्रधानमंत्री विदेश जाता था तो ये बड़ी खबर होती थी, लोग विदेश यात्रा और वहाँ हुऐ समझौतों की जानकारी के लिए उत्साहित रहते थे !
    लेकिन अब भारत का प्रधानमंत्री विदेश जाये ये कोई खबर नहीँ बनती, अब बड़ी खबर ये बनती है की “भारत के प्रधानमंत्री भारत आये”
    और माननीय के विदेश में रहते हुऐ, देश के लोग किसी अंतर्राष्ट्रीय समझौते का इंतजार नहीँ करते ! वो बस इस चिंता में रहते है की माननीय कहीं इस बार भी देश की झंड नहीँ करवा दे !
    कहीं राष्ट्रगान सुनकर चहलकदमी करने लगे ! जहाँ लिखा हो यहाँ पैर रखना मना है वहीँ पैर रखकर फोटो खिंचवाने लगे ! किसी कटे हुऐ रिबिन को फिरसे काटने लग जाये ! गांजे की पिनक में किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष को जबर्दस्ती अपनी और खींचने लगे ! और कहीं फिर कैमरा सूंघते हुऐ पकड़े जायें !

    वैसे ये देश का सौभाग्य है की देश को सत्तर सालों में ऐक ऐसा बहुराष्ट्रीय प्रधानमंत्री मिला है ! जो स्पेश शटल से भी तेज गति से दुनिया का चक्कर काट रहा है !
    बस सारी दुनिया ही मूर्ख है जो माननीय को सीरियस नहीँ ले रही ! बंदा बेचारा विदेशी इन्वेस्टमेंट के चक्कर में इतनी उछलकूद मचा रहा है जितनी तो एक बंदर फल खाने के लिए आम के पेड़ पर नहीँ मचाता !

    लेकिन माननीय की फूटी किस्मत कहो की पिछले चार साल में बाकी खर्चा एक तरफ़ रख कर सिर्फ साहब के विमानों के ईंधन की बात करे तो माननीय ने जितने रुपए का विमानों में ईंधन फूंक दिया, कुल मिलाकर उतने रूपयों का भी विदेशी इन्वेस्टमेंट इन चार सालों में नहीँ आ पाया !

    ऐसा भी नहीँ है की माननीय मेहनत नहीँ कर रहे
    बताईये माननीय ने कहाँ कहाँ मेहनत नहीँ की ! नेपाल को कई टन चंदन की लकड़ियां भिजवाई ताकि वहाँ महायज्ञ हो और नेपाल विश्व का पहला हिंदू राष्ट्र बन सके लेकिन हाय रे माननीय की किस्मत सत्तर सालों से भारत के छोटे भाई की तरह रहने वाले नेपाल ने सबसे पहले तो वहाँ भारत के टीवी चैनलो पर बैन लगाया फिर भारतीय मुद्रा पर फिर आँखों में आँख डालकर बोल दिया अपनी हद में रहो और फिर वहाँ लाल झंडे वालों की सरकार बनाकर साहब की जली पर लाल मिर्च और रगड़ दी !

    भक्त बेचारे सोचते थे की माननीय के आते ही चीन नाक रगड़ने लगेगा ! लेकिन माननीय ने तो चीन वाले को बुलाकर यहाँ झूला झुलाया, चरणों में लहालोट होने लगे ! माननीय ने शायद लगे रहो मुन्ना भाई मूवी देखी होगी की ऐसा करने से उनका ह्रदय परिवर्तन होगा ! लेकिन वो ठहरे आधी बंद आँखों वाले बंदर ! अपने देश पहुँचते ही बोलने लगे, जाओ हम नहीँ रखते दोस्ती वोस्ती तुमने झूला झुलाया लेकिन घोड़ा बनकर हमको सवारी करवाई ही नहीँ !

    और अमरीका वाला, उसको जिताने के लिए तो साहब की मंडली ने यहाँ हवन पूजन तक कर डाले और उसके जीतते ही माननीय दंडवत करते पहुँच गये की, मालिक आपका ही सहारा है ! लेकिन वो ठहरा अंकल सैम माननीय की मदद करने की बजाय लाखों भारतीयो का वीजा और रद्द कर दिया ! बोला की तुम्हारा देश बदल रहा है, जाओ पहले उसे ही जाकर बदलो, यहाँ गंदगी मत फैलाओ !

    फिर माननीय को अक्ल आयी की इन बड़े लोगों से कुछ नहीँ मिलना तो जापान वाले को बुला भेजा ! सोचा की बुलेट ट्रेन दे देगा इसलिए गंगा घाट पर तीन घंटे तक आरती भी दिखायी ! और वो जापानी वहीँ गंगा घाट पर माननीय के कान में बोल गया, यार तुम इतने वेल्ले लोग हो तुम्हे बुलेट ट्रेन की क्या जरुरत !

    आखिर में जब जी हुजुरी से न कोई बात बनी, न कहीं इज्जत मिली ! तो साहब आगये अपने गुजराती व्यापारी वाले अंदाज़ में की इज्जत मिले नहीँ तो खरीद लो,
    तो साहब ने बड़े झंडाबरदारों को छोड़कर, छोटों पर ध्यान दिया और लगे खजाना बाँटने
    वियतनाम 3300 करोड़
    नेपाल 10,000 करोड़
    मंगोलिया 1000 करोड़
    भूटान 750 करोड़
    वो भी ऐसे वक़्त में जब, देश मे करोड़ों लोगो को दो वक्त कि रोटी तक नसीब नहीँ होती, इंजेक्शन के 20 रुपए नहीँ होने पर बच्चे बाप कि बाँहो मे दम तोड़ रहे है, कहीँ दाना मांझी 12 किलोमीटर तक पत्नी कि लाश कंधों पर ढो रहे है, तो कहीं 12 साल की संतोषी भात भात कहते कहते मर रही है ! भुखमरी में देश टॉप पर आगया !
    वो क्या कहते है –
    घर मे नहीँ दाने बुढ़िया चली भुनाने !

    लेकिन कहते है न इज्जत है तो सबकुछ है ! आखिरकार किसी और का तो नहीँ लेकिन मंगोलिया वालो का दिल पसीजा और उन्होंने एक हजार करोड़ रुपए के बदले साहब को एक मंगोलियन घोड़ा गिफ्ट किया… लेकिन माननीय की किस्मत यहाँ भी धोखा दे गयी ! मंगोलियन कस्टम अधिकारियों ने घोड़े को ये कहकर एयरपोर्ट पर ही रोक लिया की एक गधे के हाथ में मंगोलियन घोड़े की लगाम अच्छी नहीँ लगती ! ये पूरे मंगोलियन घोडो का अपमान है !

    खैर अभी एक साल बचा है और हमें यकीन है… साहब विदेशों में अपना डंका बजाकर रहें
    Girraj Ved
    31 May at 23:16 ·
    आज के नतीजों की रिपोर्ट
    —————————
    Sudhir Chaudhary – कैराना की हार मोदीजी का मास्टर स्ट्रोक !
    आज हम DNA में इसी पर विस्तृत चर्चा करेंगे !

    Anjana Om Kashyap – मोदीजी कैराना हारे लेकिन दिल जीते (आँसू पोंछते हुऐ )

    Amish Devgan – कैराना की जीत क्या मोदीजी के खिलाफ विपक्ष की साजिश है !

    Rohit Sardana – मोदीजी हारकर भी जीत गये और विपक्ष जीतकर भी हार गया !

    Rubika Liyaquat – क्या मोदीजी की हार राष्ट्रवाद की हार और साम्प्रदायिकता की जीत है !

    Arnab Goswami – आइये जानते है कैराना में विपक्षी जीत का आईएसआई कनेक्शन !

    ———
    रिपोर्ट के आधार पर समीक्षा…….
    अंजना ॐ मोदी को रुबिका लियाकत से कड़ी टक्कर मिलने वाली है, अंजना ज्यादा जाना पहचाना चेहरा है लेकिन भक्ति और समर्पण में रुबिका कहीं आगे है ! अंजना को अपने भक्ति मुकाम को कायम रखना है तो और ज्यादा समर्पण और भक्ति पर उतरना पड़ेगा !

    सुधीर तिहाड़ी फिलहाल टॉप पर बना हुआ है ! लेकिन अमीष देवगन जिस रफ्तार से टॉप के लिए दौड़ लगा रहा है ये सुधीर के लिए खतरे की घंटी है ! दोनो में ज्यादा अंतर नहीँ ! अमीष देवगन इतना तो बता देता है की मोदीजी के तलुओ में प्रति घंटा कितना मिलीलीटर पसीना आता है और उनका टेस्ट कैसा है ! लेकिन तिहाड़ी उस पसीने के टेस्ट के साथ साथ उनकी रासायनिक संरचना भी समझा देता है ! अमीष को थोड़ी सी मेहनत की और जरुरत है फिर तिहाड़ी दूसरे नम्बर पर होगा !

    साबूदाना और गोबरस्वामी दोनो में दिमाग की कमी है ये दोनो कई बार अतिउत्तेजना में शीघ्र पतन का शिकार हो जाते है और खुद की पार्टी वालों से ही सवाल कर डालते है ! हालाँकि साथ साथ गलती का अहसान होते ही शर्मिन्दगी और मोटा भाई के डर से चेहरा तुरंत पीला पड़ जाता है जैसे डायरिया के मरीज हो ! लेकिन ये दोनो हद दर्जे के जाहिल और बेशर्म है फौरन अपनी पार्टी वाले से क्षमा माँगकर साठ साल बनाम चार साल पर उतर आते है और बहश किसी भी मुद्दे पर हो उसमे हिंदू मुस्लिम एंगल जरुर घुसा देंगे ! वैसे इन दोनो को तिहाड़ी या अमीष से कोचिंग की जरुरत है !
    ………..
    बाकी आज भक्ति में लीन होने के बावजूद मीडिया की हालत यूँ हो रही है जैसे सारे दलाल एंकर बाल विधवा हो गये हो ! वैसे हमारे गुप्त सूत्रों से जो जानकारी मिल रही है उसके हिसाब से मीडिया वालो की कड़ी मेहनत के बावजूद भाजपा के हारते ही तड़ीपार ने इन सारे दलालों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है !

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  • October 10, 2019 at 12:05 am
    Permalink

    ”लेकिन चे के भारत-दर्शन में मुझे सबसे अहम बात यह लगी कि उन्होंने बगैर झिझक, भारत की स्वतंत्रता में गांधीजी के ‘‘सत्याग्रह’’ की भूमिका को पहचाना। रिपोर्ट में उनके अपने शब्द हैं: ‘‘जनता के असंतोष के बड़े-बड़े शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अंग्रेजी उपनिवेशवाद को आखिरकार उस देश को हमेशा के लिए छोड़ने को बाध्य कर दिया, जिसका शोषण वह पिछले डेढ़ सौ वर्षों से कर रहा था।’’ ” om thanvi

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  • November 29, 2019 at 10:38 am
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    मनीष सिंह
    27 November at 14:56 ·
    नेताजी…!! ड्यूस !! फ़्यूहरर !!

    नेताजी का जो मतलब हिंदी में होता है, वही ड्यूस का इटालियन में होता है, और वही मतलब फ़्यूहरर का जर्मन में होता है। आधुनिक भारत के इतिहास में इतना इंट्रेस्टिंग किरदार कोई नही है, जो सुभाष चन्द्र बोस का है। जिनके गांधी के शिष्यत्व से शुरू हुए राजनैतिक आगाज की इंतहा हिटलर से हाथ मिलाने से होती है।

    उड़ीसा के कटक में पैदा हुए, और रेवेंनशा कालेज से पढ़े सुभाष बचपन से इंटेलिजेंट, तेज तर्रार थे। कलकत्ता में उच्च शिक्षा के बाद कैम्ब्रिज गए। बाप से वादा किया था कलेक्टरी पास करने का, और परीक्षा में चौथी रैंक भी लाये। मगर अंग्रेजों की ताबेदारी करे उनकी जूती.. 1921 में रिजाइन करके भारत लौट आये।

    चितरंजन दास के प्रभाव में कांग्रेस पार्टी से जुड़े। युवक कांग्रेस प्रेजिडेंट हुए। जेल वेल जाना होने लगा। एक दूसरा युवा नेता भी सीढ़ियां चढ़ रहा था, वैसा ही इंटेलिजेंट, धनी और अंग्रेजीदां। नेहरू से खूब छनी। जब 1927 में एआईसीसी की कलकत्ता बैठक हुई, सारे इंतज़ामात का जिम्मा सुभाष को दिया गया।

    और भाई ने कमाल कर दिखाया। सारे वालंटियर्स को शानदार वर्दी सिलवाकर दी, उसी अंग्रेज टेलर “हर्मन्स” से जो अंग्रेजो की वर्दियां सीता था। सबके शानदार बूट, बेल्ट , सभी डिग्निट्रीज का स्वागत युवा वालंटियर सेल्युट से करते। अब युवा सुभाष ने बिल्कुल स्टाइलिश योरोपियन स्वैग से प्लान किया था। उस बुड्ढे बापू को पसंद न आया।

    इस दौरान एक जेल यात्रा के बाद, सुभाष योरोप चले गए। 1933 से 35 का ये पीरियड फासिज्म और नाजी दलों के उभार का था। वे मुसोलिनी से मिले, योरोप में रह रहे भारतीय राष्ट्रवादियों से मिले, ऑर्गनाइज़्ड मिलिशिया से सत्ता प्रयोग सफल हो रहा था। इसी दौरान अपनी एक किताब लिखी। नेशनल सोशलिज्म से प्रभावित सुभाष का ख्याल यही पका कि भारत को भी आजादी और तरक्की के लिए क़माल अतातुर्क जैसे बेनोवेलेंट अथ्रोटोरियन रेजीम की जरूरत है। खैर.. 1935 में वे वापस भारत आ चुके थे।

    सुभाष अब तक कांग्रेस के बड़े लीडर्स में गिने जाने लगे थे। हालांकि वो रेडिकल ज्यादा थे, सो गांधी का फेवर नेहरू को ज्यादा था। पार्टी में दोनों लोकप्रिय थे। त्रिपुरी अधिवेशन वे गांधी पर चढ़ाई कर बैठे, खिलाफत करके भी अध्यक्ष का चुनाव जीत गए। गांधी जिद पकड बैठे। सुभाष ने पद छोड़ दिया। रहे कांग्रेस में ही, मगर एक ब्लॉक अलग बना लिया। फारवर्ड ब्लॉक, पेशावर से मद्रास तक उनके समर्थक ब्लॉक से जुड़ गए।

    दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ। अंग्रेजो ने भारत को शामिल कर दिया। महासभा, आरएसएस और मुस्लिम लीग ने सरकार को समर्थन दिया, कांग्रेस विरोध में थी। कांग्रेस में फारवर्ड ब्लॉक वाले सबसे गर्म विरोध कर रहे थे। अंग्रेजो ने सुभाष बाबू को नजरबन्द कर दिया।

    अब सुभाष चंद्र बोस का वो समय शुरू होता है, जिसने उन्हें किवदन्ती बना दिया। कब उन्होंने दाढ़ी बढ़ाई, कब खिड़की से कूदकर ट्रेन में बैठकर पेशावर पहुंच गए। वहाँ से गूंगा- बहरा पठान बनकर ( लोकल पश्तो नही आती थी) अफगनिस्तान, वहाँ से रूस पहुंच गए, फिर रोम याने इटली और फिर जर्मनी।

    मई 1941 में हिटलर से मिले, भारत को आजाद करने के लिए मदद मांगी। रूस की मदद से भारत पर सैनिक हमले का प्रस्ताव था। हिटलर को भारत मे कोई रुचि नही थी। वैसे भी लन्दन जीत लेने पर दिल्ली ऐसे ही उसकी हो जाती। मगर फिलहाल ब्रिटिश को तंग करने का एक हथियार उसे मिल गया था। अफ्रीका में पकड़े गए 3000 भारतीय ब्रिटिश फौजी, प्रिजन कैम्पो में थे। उनका एक इंडियन लीजियन (दस्ता) बनवाने का वादा किया। एक रेडियो स्टेशन खुलवा दिया, जिसमे बोस एन्टी ब्रिटिश भाषण देते, और ब्रिटिश भारतीय फौजो को भारतीयता के नाम पर जर्मनों से नहीं लड़ने का संदेश देते।

    रहने खाने का इंतजाम ठीक था। बोस ने विवाह भी किया, उसी लड़की से जिससे पिछले बार योरोप दौरे में मुलाकात हुई थी। एक लड़की हुई, नाम रखा अनिता। इंडियन लीजियन के वो लीडर थे। लीजियन वाले अपने लीडर को क्या कहकर पुकारें ? पड़ोस के इटली में मुसोलिनी को “ड्यूस” याने नेता कहते थे, अपने घर याने जर्मन में हिटलर को “माई फ़्यूहरर” याने “मेरा नेता” कहते थे। सुभाष बाबू को भी “हमारे नेता” का प्रस्ताव मिला। उन्होंने “नेताजी” स्वीकार किया।

    मगर बोस को यह सब रास नही आ रहा था। वे नाजी प्रोपगंडा की विशाल मशीन के महत्वहीन पुर्जे हो गए थे। रेडियो स्टेशन चलाने वो नही आये थे। हिटलर से दोबारा मिलने का अवसर नही मिल रहा था। जर्मनी से बाहर अब वो ब्रिटेन के खासे बड़े एनिमी हो चुके थे। किसी तरह जापान जाने की इजाजत मिली। एक सबमरीन में बैठकर वे मेडागास्कर होते हुए जापान अधिकृत सिंगापुर आये।

    यहां अलग ही बवाल कट रहा था। जापान पूरा ईस्ट-एशिया कब्जाने के फिराक में था। जहां आप कब्जा करना चाहते हों, वहां की जनता विद्रोह कर दे तो मामला आसान हो जाता है। जापानी चाणक्य लोगो ने सिंगापुर में एक इंडिया लीग बनाई थी, जिसकी लीडरशिप रासबिहारी बोस कर रहे थे, जो खास इफेक्टिव नही थे। सुभाषचंद्र बोस को इसकी कमान दी गयी।

    युध्द के दौरन पकड़े गए ब्रिटिश भारतीय फौजी उन्हें दिए गए। इस फ़ौज को उन्होंने नया नाम दिया- आजाद हिंद फौज। नया नारा दिया- चलो दिल्ली। तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा, के उद्घोष के साथ आजाद हिंद फौज आगे बढ़ी।

    सुभाष ने अपने रेडियो सन्देश में भारतीय जनता को भी एड्रेस किया। गांधी को राष्ट्रपिता बताते हुए उनको अपना नेता कहा। फ़ौज में नेहरू ब्रिगेड़, गांधी ब्रिगेड, रानी झांसी रेजिमेंट जैसे नाम दिया। अब पता नही, की गांधी-नेहरू की क्या प्रतिक्रिया थी, मगर पब्लिक दीवानी हो गई। कुछ बड़ा होने वाला है, का फील आया।

    सुभाष ने सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार बनाई। याने जब कभी ब्रिटिश हारे, तो जापानियों के संरक्षण में यही सरकार दिल्ली में बैठती। हालांकि एटमी हमले के बाद जापानी हार गए।

    सोचता हूँ, जीत जाते तो क्या होता। दिल्ली में फ़्यूहरर.. मेरा मतलब नेताजी की सरकार होती। किंतनी स्वतंत्र होती? क्या उसका इकबाल वैसा ही होता जैसा अंडमान में ढाई साल आजाद हिंद सरकार का रहा?? अंडमानी लोगो ने 1945 में जापानियों/आजाद हिंद सरकार के जाने , और वापस ब्रिटिश राज कायम होने पर चैन की सांस ली थी। दरअसल पूरे दौर में नेताजी के हाथ मे कोई ताकत थी ही नही। उनका सिर्फ इस्तेमाल हो रहा था।

    नेताजी के देश के प्रति समर्पण पर कोई सवाल उठाया नही जा सकता। मगर 1940 में भारत छोड़ने के बाद वे दुनिया की ईविल ताकतों के हाथ का खिलौना बन गए थे, इसमे भी कोई शक नही।

    मगर युद्ध और मुहब्बत में सब जायज भी है। और यहाँ तो मामला देश से मुहब्बत का था।मनीष सिंह

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  • January 24, 2020 at 6:53 pm
    Permalink

    Rajesh Priyadarshi
    Yesterday at 11:15 ·
    क्या आपको याद है कि मोदी सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी फ़ाइलों को सार्वजनिक करने का अभियान किस उत्साह से चलाया था? उम्मीद यही थी कि उसमें ऐसा कुछ निकल आएगा जो नेहरू को बदनाम करने के काम आएगा, लेकिन यही पता चला कि सुभाष बाबू के बाद उनकी पत्नी एमिलि शेंकल और बेटी अनीता बोस का सबसे ज़्यादा ख़याल नेहरू ने रखा. इसके बाद उस प्रोजेक्ट की हवा निकल गई. अनीता बोस कई बार भारत आईं और नेहरू की मेहमान के तौर पर उनके घर में रहीं. गांधी-नेहरू से सुभाष चंद्र बोस के रिश्तों के बारे में अनेक भ्रांतियां फैलाई गई हैं. इतिहास जानने वाले जानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज में तीन ब्रिगेडें थीं—गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड और महिलाओं वाली रानी लक्ष्मीबाई ब्रिगेड. मतभेद हुए थे लेकिन दोनों तरफ़ से सम्मान में कोई कमी नहीं थी, दोनों में से किसी को, एक दूसरे के नीयत पर शक नहीं था, तरीके में अंतर हो सकता है, लक्ष्य एक ही था—भारत की आज़ादी.

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  • April 14, 2020 at 11:04 pm
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    Ashok Kumar Pandey
    आज कई जगह देखा कि गाँधी को जाति व्यवस्था का समर्थक बताया गया है। ऐसे सरलीकरण घातक हैं और ग़लत अभिप्राय की ओर ले जाते हैं।
    गाँधी से पहले कांग्रेस के सर्वमान्य नेता रहे तिलक जाति को लेकर इतने कट्टर थे कि अस्पृश्यता सम्बन्धी एक पर्चे पर बंद बैठक में सहमति जताने के बावजूद हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और ‘छोटी जाति के लोग काउंसिल में जाकर क्या करेंगे’ जैसा बयान दिया था। अपने साथी रहे अगरकर को महिला शिक्षा और दलित उद्धार जैसी नीतियों के समर्थन पर ‘नीच कुत्ते’ जैसी उपाधि दी थी तिलक ने। पुणे का पेशवा समर्थक समाज (याद रखें पेशवा भारत का इकलौता ब्राह्मण रजवाड़ा था) जो राष्ट्रवादी हुआ था उसके पीछे सोच यही था कि अंग्रेज़ों को हटाकर ब्राह्मण राज ले आएँगे। यही वजह थी कि फुले जैसे लोग इस राष्ट्रवाद का हिस्सा नहीं हो सकते थे।
    तिलक के बाद जब गाँधी का प्रभाव कांग्रेस में बढ़ा तो उन्होंने ज़ाहिर तौर पर इस सोच का विरोध किया और जनता के व्यापक तबके को साथ लिया। छूआछूत विरोध गाँधी लगातार करते रहे। यहाँ तक कि नोआखली में उन्होंने जिन दो चीज़ों पर ज़ोर दिया उसमें छूआछूत की समाप्ति और मुसलमानों में पर्दे का उन्मूलन शामिल था।
    गोडसे पुणे की उसी ब्राह्मण विचारधारा का प्रतिनिधि था जो गाँधी के ख़िलाफ़ हो गई थी, हालाँकि अपने आरम्भिक काल में उसने कांग्रेस के जाति उन्मूलन आंदोलनों में भाग लेने की बात कही है। जगन फणनीस से लेकर मनोहर मालगाँवकर तक अनेक लेखकों ने पुणे और महाराष्ट्र में गाँधी से नफ़रत के पीछे उनका हाथ बताया है जो ख़ुद को तिलक की परम्परा का कहते थे। हालाँकि तिलक ने मुस्लिम समाज के प्रतिनिधित्व के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जबकि ख़ुद को उनका अनुयायी कहने वाले दलितों के साथ मुसलमानों के भी ख़िलाफ़ ज़हर उगलते थे और सावरकर की हिंदू महासभा से जुड़े।
    आज़ादी की लड़ाई में और हिंदू समाज के भीतर आलोड़नों के उस दौर में अम्बेडकर हों या गाँधी, कमी सबमें निकाली जा सकती है। अगर गाँधी दलितों को लेकर उतने आक्रामक समर्थक की भूमिका में नज़र नहीं आते और कुछ जगहों पर चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का समर्थन करते नज़र आते हैं तो अम्बेडकर कई जगहों पर प्रचण्ड इस्लाम विरोधी नज़र आते हैं। हर विचारक की अपनी सीमाएँ होती हैं और उन्हें रेखांकित किया जाना चाहिए लेकिन इनके आधार पर यहाँ वहाँ से संदर्भ उठाकर मुर्ग़ा लड़ाना बेवक़ूफ़ी है या फिर शातिरी। बचना चाहिए

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  • June 19, 2020 at 12:19 pm
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    Ashok Kumar Pandey
    एक झूठ अच्छे-अच्छे समझदारों द्वारा फैलाया जाता है कि गाँधी जब दिल्ली आते तो बिड़ला हाउस ठहरते थे।

    गाँधी दिल्ली आने पर हरिजन कॉलोनी में ठहरते थे। जब क्रिप्स मिशन आया था तो उसके सदस्यों के साथ अनकी मीटिंग वहीं हुई थी। नेहरू पटेल आदि के साथ बैठक भी वहीं हुई। रिहा होकर आज़ाद हिंद फ़ौज के लोग भी यहीं उनसे मिलने आए थे। वहीं एक पार्क में शाम को उनकी प्रार्थना सभा होती और सुबह संघ वाले शाखा लगाते।

    दंगाग्रस्त नोआख़ली के श्रीरामपुर गाँव में दो महीने रहने के बाद (पूरा क़िस्सा जानने के लिए वहाँ उनके सचिव की भूमिका में रहे प्रो निर्मल कुमार बोस की किताब My Days With Gandhi पढ़ सकते हैं) जब वह दिल्ली लौटे तो सीधे वहीं जाना चाहते थे लेकिन पटेल ने बताया कि वहाँ रेफ़्यूजी ठहरे हुए हैं और उनके वहाँ जाने से भारी अव्यवस्था होगी। सुरक्षा के लिहाज़ से सरकार ने बिड़ला हाउस का चयन किया है। गांधी बहुत बेमन से उस इलाक़े में ठहरे जिससे सरवेंट क्वॉर्टर लगे हुए थे। दुर्भाग्य से यह उनका बिड़ला हाउस में पहला और आख़िरी प्रवास हो गया।

    रेफ़्रेन्स के लिए पेन या फ़िशर की लिखी जीवनी या फिर प्यारेलाल का संस्मरण पढ़ लें।

    गांधी जब गोलमेज़ सम्मेलन में गए तो रुकने के लिए उन्होंने लंदन का वेस्टएंड इलाक़ा चुना जहाँ कामगार वर्ग के लोग रहते थे। दस बाई सात के कमरे में ठहरे वह जहाँ बिस्तर की जगह काठ का एक टुकड़ा था। तब उनकी होस्ट रहीं मुरियल लिस्टर ने उस प्रवास का एक संस्मरण लिखा है – Entertaining Gandhi. पढ़ा जाना चाहिए।


    एक और बात। बिड़ला परिवार ने दान में नहीं दिया था अपना घर गाँधी स्मृति बनाने के लिए। लम्बी चली थी बातचीत और अच्छा-ख़ासा मुआवज़ा और एक ज़मीन लेकर दिया गया था वह घर गांधी स्मृति बनाने के लिए।

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